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Monday, November 11, 2013

आप चिंता मत करिये, अगले साल हम दस दिन पहले से भीख लेने के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लेंगे..............

हमारे देश में कैसे चरित्रहीनता के छोटे से पौधे ने बरगद का पेड़ का रुप धारण कर लिया हैं, उसकी बानगी मैंने इस बार छठव्रत में देखी। आम तौर पर ज्यादातर लोग छठव्रत के दौरान, उदारता दिखाते हैं। इस उदारता के दौरान आपको अजीबोगरीब हरकतें देखने को मिलेंगी। जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी में कंजूसी के विश्व रिकार्ड बनाये हैं, वह भी छठ व्रत के दौरान, इस प्रकार की उदारता दिखाता हैं कि जैसे वो व्यक्ति अपनी उदारता के लिए भी विश्वरिकार्ड बनाने के लिए उतावला हो। मेरा बचपन पटना के एक छोटे से मुहल्ले सुलतानपुर में बीता हैं। वहां मैंने बचपन में देखा हैं कि जिसके घर मैं कद्दू होता, वो छठ आने के एक महीने पहले से ही कद्दू के पौधे पर ध्यान देता और जैसे ही नहाय खा का दिन होता, वो अपने यहां पैदा हुए कद्दू को बड़े ही सहेज कर, उन घरों तक कद्दू को मुफ्त में इस प्रकार पहुंचाता, जैसे वो भी इस महाव्रत के दौरान थोड़ा सा पुण्य का भागीदार बन जाये। इसी प्रकार सूप बनानेवाले दलितों का समूह, वहीं भाव लेता जो जरुरी हो, न कि छठ के बहाने सूप से अधिक कमाई करने की उसकी मंशा होती। चूंकि वो जानता था कि छठव्रत के दौरान लोग, मोल जोल नहीं करते, जो मुंह से निकल गया, दे देते। क्या वो दिन थे, सेवा भाव के। हर गली-मुहल्ले सेवा भाव से ओत-प्रोत होते। जिसका आटे का मिल होता, वो तो खरना के दिन सुबह से ही अपने मिल को साफ सफाई करके तैयार रखता और छठव्रती अपना आटा मुफ्त पीसा लिया करते, कोई पैसा देने की बात भी करता, तो मिल वाला यह कहकर पैसा लेने से इनकार करता कि यहीं बहाने छठि मइया हमारी सेवा स्वीकार कर रही हैं, यहीं क्या कम हैं। पर अब ऐसी बात नहीं दिखती। सभी मुनाफा कमाने में लगे हैं, क्योंकि अब उन्हें लगता है कि छठ साल में एक बार आनेवाला पर्व हैं, चलो कमालो, नहीं तो फिर ऐसा मौका बार बार नहीं मिलेगा। भला कद्दू, सूप, दौरा, केला, गुड़ और गेहूं आदि के लिए लोग इस प्रकार की मार्केंटिग हमेशा थोड़े ही किया करते हैं, प्रोफेशनल बन जाओ, अपने जमीर को थोड़े दिनों के लिए मिटा दो और शुद्ध मुनाफा कमाने के लिए मुनाफाखोर बन जाओ।
चलिए छोड़िये, कहा भी जाता हैं कि जीने के दो मार्ग हैं एक सत्य का रास्ता और दूसरा असत्य का। जब से सृष्टि बनी है, तभी से ये मार्ग जीवंत हैं, जो लोग सत्य का मार्ग चूनते हैं, उन्हें भी आनन्द मिलता हैं और जो असत्यमार्ग पर चलते हैं, उन्हे भी आनन्द मिलता हैं, अब कौन किस प्रकार का आनन्द लेता हैं, वो जाने। ठीक छठ में भी वो चीजें सामने दिखाई पड़ रही हैं, किसी को छठव्रतियों की सेवा में आनन्द प्राप्त होता हैं तो किसी को छठव्रतियों के सेवा के नाम पर उनसे पूरा सेवाकर वसूलने में आनन्द प्राप्त होता हैं।
इधर मैं कई वर्षों से रांची के चुटिया में रहता हूं। वहां मैंने इस बार अजीबोगरीब चीजें दिखी। चुटिया थाने के ठीक सामने एक दवा की दुकान हैं। संभवतः वो दुकान विक्की सिंह की हैं। जब से इलेक्ट्रानिक मीडिया से मेरा नाता टूटा हैं, तब से मैं थोड़ी देर के लिए वहां से गुजरने के क्रम में विक्की सिंह के दुकान में बैठ जाया करता हूं। इसी बीच छठव्रत आया, पता चला कि विक्की सिंह, हिन्दुस्तानी क्लब चलाते हैं, जिसमें कई युवा शामिल हैं। इस हिन्दुस्तानी क्लब के अध्यक्ष खुद विक्की सिंह हैं। एक सायं जब मैं दुकान पर बैठा था, तो कुछ लोग आये, और विक्की सिंह को कहा कि मेरा नाम लिख लीजिये। विक्की सिंह उठे और उन लोगों का नाम लिख लिये। मैंने विक्की सिंह से पूछा कि विक्की, आप बताये ये नाम लिखाने का क्या चक्कर हैं। विक्की सिंह ने बताया कि पिछले चार सालों से वे छठव्रत के खरना के दिन, उनलोगों के बीच छठव्रत की सामग्री( जैसे – सूप, साड़ी, नारियल, फल, दूध, ईख इत्यादि) बांटते हैं, जो छठव्रत करने में असमर्थ हैं। हमें ये सुनकर अच्छा लगा कि चलों आज के युवा भी इस प्रकार के कार्यों में निस्वार्थ भाव से लगे हैं। मैंने दूसरे सवाल पूछे कि कितने लोगों को आप बांटते हैं और ये पैसा कहां से आता हैं। विक्की ने बताया कि वे पिछले चार सालों से बांटते आ रहे हैं, शुरुआत 36 लोगों से हुई थी, इस बार 95 लोगों को देना हैं। जिसमें सूप उन्हीं के क्लब के रमेश शर्मा और दूध का इंतजाम मुन्ना सिंह कर देते हैं, बाकी सारी व्यवस्था उनकी यानी विक्की की हैं। सुनकर बहुत आनन्दित हुआ, देर रात हो चली थी, मैं घर पहुंचा। बहुत ही आत्मविभोर हुआ, कि छठव्रत का अर्थ ही सेवा भाव हैं, और ये युवा गर ऐसा करते हैं तो सचमुच वे प्रभु के बहुत ही निकट हैं, उसे और कुछ करने की क्या जरुरत हैं। उसके दुकान और आंगन में तो ऐसे ही सूर्यनारायण और छठि मइया खेलती होंगी। उसे कही जाने की कोई जरुरत ही नहीं। इसी सोच में दूसरे दिन हम फिर विक्की की दुकान पर पहुंचे, पता चला कि अब रजिस्ट्रेशन का काम पूरा हो चला हैं। रजिस्ट्रेशन का मतलब, जिन्हें छठव्रत की सामग्री देनी होती हैं, हिन्दुस्तानी क्लब के लोग, उसकी पूर्व में ही सूची बना लेते हैं, ताकि वितरण के दिन, कोई गड़बड़ी नहीं हो। मैं बहुत ही खुश था। अचानक, कुछ महिलाओं का समूह उनके दुकान पर आ गया। महिलाएं बोली कि उनका नाम भी लिख लिया जाय। दुकान पर बैठे, क्लब के सदस्यों के साथ विक्की ने कहा कि चूंकि जितने लोगों का इस बार देना हैं, उनकी सूची पूरी हो गयी हैं, अब हम देने में असमर्थ हैं, अब हम आपको अगले साल देंगे, पर शर्त यहीं हैं कि जिस दिन हमलोगों तिथि मुकर्रर करते हैं, अपना नाम सूची में दर्ज कराने की, उस तिथि तक आपलोग अपना नाम दर्ज करा दें। इन महिलाओं ने कहा कि आप चिंता मत करिये, अगले साल हम दस दिन पहले से भीख लेने के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लेंगे..............। पर इस बार दे दीजिये। ये वो लोग थे, जिन्हें ईश्वर ने गरीब नहीं बनाया, जिनके हाथों व कानों में सोने के गहने साफ बता रहे थे, कि इन्हें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है, पर मुफ्त में छठव्रत करने का एक शायद अपना अलग आनन्द होगा, और मुफ्त में सूप, साड़ी वगैरह मिल जाये तो क्या गलत हैं। हद तो तब हो गयी कि ये महिलाएं, पूर्व विधानसभाध्यक्ष सी पी सिंह से पैरवी भी करवा ली। अब युवा क्या करते। उन्हें इनका नाम दर्ज करना पड़ा। यानी हवन करने में युवाओँ के हाथ जलने का खतरा साफ नजर आ रहा था, पर मुफ्त में छठव्रत के नाम पर बेवजह कष्ट प्रदान करनेवालों को दया नही आ रही थी। कमाल हैं, जिस देश में ऐसे ऐसे लोग हो, जो छठ के नाम पर भी, भीख मांगने की कला पर गर्व करते हो, और ये कहते हो कि हम एक साल बाद भीख मांगने के लिए, पहले से ही रजिस्ट्रेशन करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे तो क्या आपको लगता हैं कि ऐसे लोगों पर भगवान सूर्य नारायण और छठि मइया कृपा लूटायेंगी। जो लोग दूसरे के मुख का आहार छीनने में अपनी शान समझते हो, उस पर ईश्वर की दया कैसे हो सकती हैं। इन युवाओं ने तो उन बेसहारों और गरीबों के लिए कार्यक्रम चलाया, जिनको ईश्वर ने कुछ भी नहीं दिया, पर इन बेसहारों और गरीबों पर लालचियों को दया नहीं आ रही तो क्या कहेंगे। ऐसे हम उन बेसहारों और गरीबों को भी कह देते हैं कि आपको व्रत करने के लिए किसी भी चीज की जरुरत नहीं, बस आप इतना करिये कि किसी भी जलाशय अथवा कूएं पर चल जाइये। जिस दिन पहला अर्घ्य हो, उस दिन भगवान भास्कर के समक्ष दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो जाइये और एक लोटा जल लेकर अर्घ्य दे दीजिए और यहीं कार्य दूसरे दिन करिये। आपका व्रत सफल हो जायेगा और ईश्वर मनोवांछित वर अवश्य देंगे, क्योंकि भगवान केवल भाव देखते हैं, क्या आपको पता नहीं भगवान राम तो भाव में बहकर शबरी के जूठे बेर खा लिये थे तो ऐसे में आपके एक लोटे जल क्यों नहीं भगवान भास्कर, और छठि मइया अर्घ्य स्वरुप ग्रहण करेंगी। धन्य हैं। हिन्दुस्तानी क्लब के वे युवा जो इस मंहगाई में भी छवठ्रतियों की सेवा में स्वयं को समिधा बना डाला। ईश्वर की उन पर कृपा अवश्य हो, ईश्वर से हमारी यहीं प्रार्थना है।

Sunday, December 2, 2012

ए गोपाल भैया, हमरा डर लागता, पहुंचा द...................................

ये उस वक्त की बात हैं, जब मेरी उम्र करीब छः - सात साल रही होगी। मां - बाबुजी प्रतिदिन रात के वक्त जब हम सोने जाते, तो एक से एक कहानियां सुनाते। वो कहानी निरंतर, मेरे लिए मार्गदर्शन का काम करती। आज भी, जब मैं एकांत में होता हूं, तो उनकी यादें अनायास, आती रहती हैं, साथ ही जीने का मार्ग प्रशस्त करती हैं। जीवन कैसा हो, किसके लिए हो, ये भी सहज भाव से बता जाया करती हैं। एक बार जब मुझे किसी बात को लेकर बहुत डर लगा, तो मेरी मां ने मुझे समझाया कि भगवान तो सभी जगह हैं, वो हमेशा हमारी सहायता को तत्पर रहते हैं, तो फिर डर किस बात का। बस करना सिर्फ इतना हैं, कि उस प्रभु को हमेशा याद रखना हैं। 
प्रभु को याद रखना हैं, ये कहते हुए, मेरी मां ने मुझे एक कहानी सुनाया जो आज भी मुझे प्रेरित करती हैं। चूंकि मां ग्रामीण परिवेश से थी, तो उसकी बातों में ग्रामीण भाषाओं और शब्दों के भाव स्पष्ट रुप से दिखाई पड़ते। मां कहानियां सुनाती और कहानी सुनने के क्रम में, मैं हुंकारी भरे जाता। इधर मां कहानी सुनाने के क्रम में बड़े ही सहज भाव से मेरे सर पर हाथ फिराया करती, तथा मेरे बालों में अपनी उँगलिया फिराया करती। मां का कहानी कहना और हाथों की जादूई स्पर्श, हमें स्वर्ग का आनन्द करा दिया करती। मैं भी उस वक्त रात की प्रतीक्षा करता और खुब ध्यान से मां के द्वारा कही गयी कहानियों को अपने हृदय में भरा करता। 
जाड़े की सर्द भरी रात, जमीन पर रखे धान के पुआल पर बिछे फटे चीटे खेंदरे, मां के जादूई स्पर्शवाले हाथों की थाप और मां के मुख से निकली कहानियों के बीच कब नींद आ जाती, हमें पता ही नहीं चलता। सुबह हुई, लीजिए, फटी - पुरानी धोती की गांथी बन गयी और उन गांथियों में ठंड महाराज, हमें हरा दें, ऐसा ठंड महराज का मजाल नहीं। भाई गांथी तो गांथी हैं। इसका जवाब कभी भी, आज के हजारों - लाखों रुपये के गर्म कपड़े नहीं दे सकते, ये तो गंवई पोशाक हैं, जो बिहार के आज भी सुदूरवर्ती इलाकों में, ठेठ गांव में देखने को मिल जायेगा।
लीजिए, हमारी यहीं सबसे बड़ी दिक्कत हैं, हम आपको चले थे कहानी सुनाने और लिख रहे हैं पोशाक वृतांत, ये तो बड़ा ही गड़बड़झाला हैं। तो लीजिए आप भी सुनिये, जो मैने अपनी मां से सुना, वो भी छः - सात साल की उम्र में, शायद आपको अच्छा लगे। मां ने कहना शुरु किया कि बहुत पहले, मेरे जैसा ही एक छोटा सा बालक, जिसका नाम श्याम था। वो अपनी मां के साथ रहा करता था। मां उसकी बहुत गरीब थी, पर उसका श्याम पढ़ लिखकर एक चरित्रवान नागरिक बने, ऐसा सोचा करती। एक दिन, उसने पास के ही एक गांव के स्कूल में श्याम का नाम लिखवा दिया, पर दिकक्त ये थी कि स्कूल जाने से लेकर आने तक में घने जंगल का रास्ता पार करना, श्याम के लिए खतरे से खाली नहीं था। एक दिन उसने अपनी मां से कहा कि मां, मुझे स्कूल जाने में डर लगता हैं। तभी उसकी मां ने कहां कि बेटा जहां भी डर लगे, तुम अपने बड़े भैया, गोपाल भैया को पुकारना। वो आयेंगे और तुम्हें घर से स्कूल और स्कूल से घर तक पहुंचा देंगे। फिर क्या था। श्याम की सारी परेशानी दूर होती दिखाई दी। जब वो घर से स्कूल जा रहा था, तभी जंगल के रास्ते में उसे डर सताने लगी, उसने बड़े ही दर्द भरी आवाज से गोपाल भैया को आवाज दी। श्याम ने कहा -- ऐ गोपाल भैया हमरा डर लागता पहुंचा द....। फिर क्या था गोपाल भैया आये और श्याम की छोटी सी अंगूली को पकड़, स्कूल तक पहुंचा दिया। जब स्कूल से वह घर लौटने लगा तब फिर उसने आवाज दी- ऐ गोपाल भइया हमरा डर लागता पहुंचा द....। पुनः गोपाल भैया आये और श्याम को स्कूल से घर तक पहुंचा दिया। इसी प्रकार से ये रोज का क्रम बन गया। श्याम की गोपाल भैया से दोस्ती हो गयी, गोपाल भैया रोज श्याम के साथ घुलमिलकर स्कूल और घर तक पहुंचाने का कार्य करने लगे। 
एक दिन स्कुल में जन्माष्टमी का त्यौहार मनाने का कार्यक्रम रखा गया। स्कूल के प्राचार्य ने सभी बच्चों को अपने अपने घर से दुध लाने का आदेश दिया। सभी बच्चे ने दुध लाने की हामी भरी। दुध से खीर बनाया जाना था, और फिर भगवान कृष्ण को भोग लगाया जाना था, क्योंकि भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव जो था। श्याम ने अपनी मां से दूध की मांग कर दी। बेचारी श्याम की गरीब मां, दुध कहां से लाती, उसके पास तो एक पैसे तक नहीं थे। वो क्या करती। उसने सहज भाव से कह दिया कि श्याम, तुम अपने गोपाल भैया से क्यों नहीं दूध मांग लेते। श्याम ने कहां - ठीक हैं मां ,मैं गोपाल भइया से ही दूध मांग लूंगा। इधर श्याम जैसे ही घर से स्कूल के लिए निकला। उसने गोपाल भैया से दूध की मांग कर दी। गोपाल भैया ने एक छोटी सी लुटिया में दूध की व्यवस्था कर दी। जब श्याम छोटी सी लुटिया में दूध लेकर पहुंचा तो देखा की सभी बच्चे बड़े बड़े पात्रों में दूध लेकर आये थे। स्कूल के शिक्षक, बड़े बड़े पात्रो में लाये गये दूध की अच्छी व्यवस्था कर रहे थे, ताकि वे सारे दूध जल्द से जल्द सुरक्षित रख लिये जाये, पर बेचारे श्याम के पास तो छोटी सी लुटिया हैं, उसकी ओर तो शिक्षक देख ही नहीं रहे। उसने बड़ी ही विनम्रता से शिक्षक से दूध लेने के लिए विनती की। फिर भी शिक्षक ने श्याम की बातों पर ध्यान देना जरुरी नहीं समझा। शायद उन्हें लगा हो कि छोटी सी लुटिया की दूध से कही अच्छा है कि बड़े पात्रों के दूध को जल्द से जल्द रख लिया जाय। शिक्षक द्वारा श्याम की बात को बार - बार अनसूनी कर देने तथा श्याम द्वारा बार - बार अनुरोध किये जाने पर, शिक्षक क्रुद्ध हो, झल्ला उठे। लाओ - अपनी लूटिया, देखते है कितना दूध हैं। शिक्षक ने लूटिया से अपने पात्र में दूध डालना शुरु किया।
ये क्या -- प्रभु की कृपा। लुटिया की दूध तो समाप्त ही नहीं हो रही। सारे के सारे पात्र दूध से भर गये। शिक्षक हैरान, सारे बच्चे हैरान, ये कैसे हो सकता हैं। बात स्कूल के प्राचार्य तक पहुंच गयी। प्राचार्य ने श्याम को बुलाया कि श्याम ये छोटी सी अद्भुत दूध से भरी लुटिया किसने दी। श्याम ने बड़े ही आदर से प्राचार्य को कहा कि गुरुजी ये हमारे गोपाल भैया ने दिया हैं। प्राचार्य ने कहां कि तुम मुझे अपने गोपाल भैया से मिला सकते हो। श्याम ने कहां - क्यों नहीं गुरुजी, वो मेरे साथ हमेशा घर से स्कूल और स्कूल से घर आया जाया करते हैं। प्राचार्य ने कहा कि आज हम तुम्हारे साथ घर चलेंगे। श्याम ने कहा कि क्यों नहीं गुरुजी। आज आप जरुर चले। मेरे गोपाल भैया बहुत ही सुंदर और बहुत ही अच्छे हैं। श्याम ने जैसे ही कहा, प्राचार्य श्याम के साथ स्कूल से श्याम के घर की ओर निकल पड़े। श्याम जैसे ही स्कूल से निकला, उसने आवाज दी - ऐ गोपाल भैया, हमरा डर लागता पहुंचा द। गोपाल भैया ने कहा कि श्याम आज तो तुम्हारे स्कूल के प्राचार्य, तुम्हारे साथ साथ चल रहे हैं, फिर भी डर लग रहा हैं। श्याम ने कहा - भैया, आप हमारे साथ चलिये, हमे बहुत ही अच्छा लगता हैं। गोपाल भैया, श्याम के निश्चल भावयुक्त बातों को सुन प्रभावित हो गये, और श्याम के साथ चल पड़े। इधर स्कूल से घर तक श्याम, अपने प्राचार्य के साथ आ चुका था, पर ये क्या प्राचार्य को, जिनकी तलाश थी, वो तो उन्हें दीखे नहीं। प्राचार्य ने श्याम से शिकायत की, कहा - श्याम तुमने तो कहा था कि तुम गोपाल भैया से मिलाओगे, पर तुमने अपने गोपाल भैया से मिलाया नहीं। श्याम ने कहा कि प्राचार्य महोदय, आपने मेरे गोपाल भैया को देखा नहीं, ये क्या गोपाल भैया, मेरे साथ खड़े हैं, बहुत ही सुंदर, हाथ में मुरली लिए, कितनी इनकी सुंदर छवि हैं, मैं देख रहा हूं, आप नहीं.......।
भगवान मुस्कुराये, शायद, भगवान की मुस्कुराहट कुछ संदेश दे रही थी, कि जो सहज हैं, सरल हैं, सहृदय हैं, उसके लिए, भगवान को तो हर समय आना पड़ता हैं, इसलिए भय कैसा। 
मेरी मां ने कहां- भगवान, सर्वत्र हैं, कोई अनाथ नहीं हैं, सभी सनाथ हैं, इसलिए डर कैसा, उन्हें पुकारो, वो तु्म्हारे साथ हैं। आज भी हमें लगता हैं कि वो तो हमारे साथ हैं। कभी वो अलग, हमसे हुए ही नहीं।

Tuesday, June 19, 2012

जय जगन्नाथ.........

भारत धर्मभूमि, कर्मभूमि व त्यागभूमि हैं। इस देश के सभी प्रांतों के एक प्रधान देवता हैं। जो इन प्रांतों में प्राचीन काल से पूजित व वंदित रहे हैं। यहीं उन क्षेत्रों के भरण पोषण से लेकर आध्यात्मिक सुख भी प्रदान करते हैं। जैसे -- झारखंड में बाबा वैद्यनाथ, बंगाल में माता काली की प्रधानता हैं, ठीक उसी प्रकार उत्कल प्रदेश यानी उड़ीसा प्रांत के प्रधान देवता भगवान जगन्नाथ हैं। शंख व श्रीक्षेत्र से जाना जानेवाला ये पुरी क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा व बड़े भाई बलभद्र के साथ विराजते हैं और जैसे ही आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि आती हैं वे विशेष रथों में आरुढ़ होकर आम जन को अभिलषित व मुक्ति प्रदान करने हेतु अपने गर्भ गृह से निकल पड़ते हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में आज भी लोग ये कहते नहीं भूलते ----------------उड़ीसा जगन्नाथपुरी में भले विराजो जी, भले विराजो जी साधो भले विराजो जी, उड़ीसा जगन्नाथ पुरी में भले विरोजो जी...........। इनकी महिमा जिसने भी गायी, वो धन्य हो गया। जो भगवान जगन्नाथ को मानते हैं, उनका मानना हैं कि भगवान जगन्नाथ राधा और कृष्ण की युगलमूर्ति हैं और इन्हीं से सारे जगत् की उत्पत्ति हुई। भगवान जगन्नाथ क्या नहीं हैं। वे तो सामान्य जन के देवता हैं। वे तो सामान्य जन के कल्याण के लिए गर्भगृह से बाहर निकलकर, सामान्य जन के दुख दर्द में शामिल होते हैं, यहीं नहीं स्वयं दर्शन देकर सरल सहज और सहृदय होने का सभी में भाव भी भरते हैं। शायद यहीं कारण हैं कि स्कंदपुराण तो साफ कहता हैं कि जो भी प्राणी भगवान जगन्नाथ के प्रति समर्पित हैं, या जो उनके नाम का सदैव संकीर्तन करते हैं या उनके रथों को खीचते हैं या जिस ओर उनकी रथयात्रा चल रही हैं, उसमें भाग लेते हैं या उनके दर्शन करते हैं, भगवान जगन्नाथ उनकी सारी कष्ट हर लेते हैं और उसे अंत में मोक्ष भी प्रदान कर देते हैं। भगवान जगन्नाथ की पुरी में निकलनेवाली रथयात्रा में तीन रथ प्रमुख होते हैं -- पहला रथ को तालध्वज रथ कहते हैं जिसमें बलभद्र, दूसरे रथ को पद्मध्वज कहते हैं, जिन पर बहन सुभद्रा और उसके पाद गरुड़ ध्वज होता हैं, जिस पर भगवान जगन्नाथ विराजते हैं। हालांकि कई प्रांतों में एक ही रथ पर सभी विराजते हैं और रथयात्रा का आनन्द लेते हुए लोग, भगवान के श्रीचरणों में स्वयं को समर्पित कर देते हैं। मूलतः रथयात्रा में भाव की ही प्रधानता हैं...........। ठीक उसी प्रकार जैसे कि गोस्वामी तुलसीदास, श्रीरामचरितमानस में कहते हैं कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभू मूरति दीखै तिन तैसी। रथयात्रा की एक अद्भुत कथा हैं..........कहते हैं कि एक बार भगवान कृष्ण रुक्मिणी के साथ शयनगृह में शयन कर रहे थे तभी उनके मुख से राधे राधे के स्वर निकल पड़े। ये बात रुक्मिणी ने अन्य पटरानियों को सुनाया। रुक्मिणी ने यहां तक कह डाला कि प्रभु आज भी राधे को नहीं भूले हैं, वह भी तब, जबकि रुक्मिणी समेत कई पटरानियों ने प्रभु की खूब सेवा की। ये बात कि प्रभु के मुख से राधे - राधे क्यूं निकले। माता रोहिणी के पास सभी इस रहस्य को जानने पहुंची। इधर रोहिणी ने कथा सुनाना प्रारंभ किया पर कथा प्रारंभ करने के पहले सुभद्रा को पहरे पर लगा दिया गया कि सुभद्रा किसी को कथा पूर्ण होने के पूर्व आने न दे। इधर जब कथा प्रारंभ हुई तभी बलभद्र और कृष्ण उस स्थान पर आ गये। इधर माता रोहिणी रुक्मिणी समेत अन्य पटरानियों को भगवान कृष्ण के अद्भुत प्रेमलीलाओं और रहस्यों को सुनाना प्रारंभ किया। रोहिणी के उक्त कथासार को सुनते हुए भगवान कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा इस प्रकार से भावविह्वल हो गये कि उनका शरीर दिखाई ही नहीं पड़ रहा था, यहां तक कि सुदर्शन चक्र की भी हालत वैसी ही हो गयी, पर जैसे ही उक्त समय नारद वहां पहुंचे, सभी पूर्वावस्था में आ गये। भगवान के इस अद्भुत रुप को केवल नारद ने देखा और उन्होंने इस सुंदर स्वरुप और छवि को अपने आंखों में बसा लिया। साथ ही ये सुंदर स्वरुप सभी के लिए सुलभ हो, उन्होंने भगवान से प्रार्थना की. भगवान ने नारद की ये बातें भी मान ली। तभी से भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बलभद्र पुरी में विराजकर सब को धन्य - धन्य कर रहे हैं और ये कथा युगों - युगों से चली आ रही हैं। यहीं कारण हैं कि इस रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ सुभद्रा होती हैं, जो नगर परिभ्रमण करने के लिए निकलती हैं। रथयात्रा भारतीय संस्कृति की प्राण हैं। पूरे भारतवर्ष में आषाढ़ शुक्लपक्ष द्वितीया तिथि को रथयात्रा का आयोजन होता हैं, अब तो विदेशों में भी रथयात्रा खूब धूमधाम से मनायी जाने लगी हैं। खासकर अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ से जूड़े लोग इस रथयात्रा को भव्यता से मनाते हैं, इनकी रथयात्रा का विशेष आकर्षण भी होता हैं।
झारखंड की राजधानी रांची समेत सरायकेला - खरसावां में भी रथयात्रा धूमधाम से मनाया जाता हैं। खासकर रांची स्थित जगन्नाथपुर मंदिर की रथयात्रा का कुछ खास विशेष महत्व हैं। पिछले सवा तीन सौ सालों से विराज रहे भगवान जगन्नाथ और उनकी रथयात्रा के समय यहां का दृश्य देखनेलायक होता हैं। जब लाखों लोग इस मंदिर के चारों ओर इकट्ठे होकर जय जगन्नाथ बोल उठते हैं, और भावपूर्ण हृदय से भगवान जगन्नाथ की रथ को खीचकर मौसीबाड़ी लाते हैं। करीब दस दिनों तक यहां इस दौरान मेला भी चलता रहता हैं, जिसमें दैनिक जीवनोपयोगी सामग्रियां मिलती रहती हैं। सचमुच भगवान जगन्नाथ का जो भी हुआ, भगवान जगन्नाथ उसके हो गये। रांची के जगन्नाथपुर मंदिर के बारे में कहा जाता हैं कि आज से करीब सवा तीन सौ साल पहले यहां एक ठाकुर एनीनाथ शाहदेव राजा हुए, जिनके स्वपन में बार बार भगवान जगन्नाथ की छवि दिखाई दी। उन्होंने इस स्वपन को बार - बार देखे जाने पर यहां भगवान जगन्नाथ को स्थापित करने का निश्चय किया। फिर उन्होंने पुरी से भगवान जगन्नाथ के विग्रहों को लाकर यहां विधि विधान से स्थापित कराया और आज रांचीवासियों को खुशी हैं कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए उन्हें अब ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ता, भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र यहां भी सुलभ हो गये और रथयात्रा की विधा यहां भी चल पड़ी। जय जगन्नाथ...........................

Friday, November 18, 2011

मुझे मेरा बचपन लौटा दो.....................


पता नहीं क्यूं...। आज मुझे मेरा बचपन याद आ रहा हैं। वो दौड़ लगाना, छुक- छुक करती रेल की तरह भागते जाना, तालाबों, खेतों - खलिहानों के बीच दौड़ते जाना, जाड़े के दिनों में हांडी में आलू रख औंधा लगाना, हवाओं से भी तेज भागते हुए, उसकी खिल्ली उड़ाना, अपने बाल दोस्तों के बीच सभा करना, मस्ती के आलम में डूबे रहना, बिजली कटने के बाद, बिजली आने पर हंगामा मचाते हुए, घर की ओर लौटना.... वो समय फिर जिंदगी में लौट कर क्यूं नहीं आता.........।
आज तो कंम्पयूटर का युग हैं, अपने बचपन की तलाश, मैं जब आज के बच्चों से करता हूं, तो पता चलता हैं कि आज के बच्चों और कल के बच्चों की सोच और बालपन में काफी अंतर आया हैं, कुछ में तो आज के बच्चे बहुत आगे निकल चुके हैं तो कुछ में बहुत पीछे..............।
कमाल के वो दिन थे, एक से एक खेल। मानो किसी ने खेल पर शोध कर, एक से एक खेल का इजाद किया हो। एक खेल खत्म नहीं हुआ कि दूसरा खेल शुरु और दुसरा खेल खत्म नहीं हुआ कि तीसरा खेल शुरु, खेलों के जैसे मौसम हुआ करते, ठीक उसी प्रकार जैसे पर्वों और त्योहारों के.....।
कहां से शुरु करुं और कहां से अंत। मुझे समझ में नहीं आ रहा, पर इतना जरुर हैं, जो भी लिंखूंगा, शायद वो पाठकों को पसंद आये या कुछ पाठकों को लगेगा कि अरे वे इस खेल को अपने जीवन में कभी उतार चुके हैं। खेलों में सबसे पहला और मनोरंजक खेल होता, पहाड़ - पानी। कई के घर के ओटे पहाड़ बन जाते और ओटे की जमीन पानी बन जाती। इसमें भाग लेनेवाले बाल सदस्यों की कोई सीमा नहीं रहती, जो भी शामिल हो जाये, अच्छा हैं, लेकिन सबसे पहले पानी में कौन रहेगा। इसके लिए चुनाव होता। वह भी चुनाव बड़ा मनोरंजक होता, कविताओं के सहारे, सबसे पहले पानी के अंदर रहनेवाले बाल सदस्य का चुनाव होता.................
कविता इस प्रकार की होती.......................
दस, बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर, अस्सी, नब्बे, सौ,
सौ में लागा धागा, चोर निकलके भागा,
पाव रोटी बिस्कुट, मेम खाये कुट-कुट
साहेब बोला भेरी गुड।
जैसे ही गुड आता, जिसके पास ये शब्द बोलते हुए आ गये, वो बाहर होता जाता और जो अंत में पड़ा वो पानी में रह गया। अब पानी में रहनेवाला बाल सदस्य पहाड़ पर रहनेवाले बाल सदस्यों का पीछा करता, वह भी तब जब पहाड़ पर रहनेवाला कोई बाल सदस्य पानी में उतरने की कोशिश करता.....। जो कोई पानी में रहनेवाले बाल सदस्य से स्पर्श हो जाता, फिर वहीं वैसा क्रम दुहराता चला जाता....। इसी प्रकार ये क्रम चलता जाता, कब ऐसे में समय बीत जाता पता ही नहीं चलता। इसी तरह एक और खेल था -- बिल्ली चुहा। एक छोटा सा ओटा का कोना, जिसमें आवश्यकता से अधिक बच्चे बैठ जाते, और एक दूसरे को ठेलने की कोशिश करते, इसी क्रम में बच्चों का दल एक दूसरे को पछाड़ रहा होता, यानी ओटे से हटा रहा होता, हटनेवाला बच्चा और ओटे पर कब्जा करनेवाला बच्चा एक दूसरे को देख खिलखिला रहा होता, इस दरम्यान बच्चे, कुछ दोहे भी पढ़ रहे होते, जैसे - ऐ बिल्ली, क्या चुहा, धक्कम धुक्कम होए लड़ईया...............।
जब रात में बिजली कट गयी रहती तो हमारे मुहल्ले के गली में रहनेवाले किसानों के बच्चे सड़कों पर आ जाते. वे भी एक से एक खेल, खेला करते। खेल का नाम था - एक मन की सुतरी। इस खेल में भी बच्चों की संख्या अनिश्चित रहती, खेल बड़ा मनोरंजक होता। जो सबसे बड़ा बच्चा होता, वो ओटे पर बैठकर, एक बच्चे का हाथों से आंखें मूंदकर, ये पूछता कि आटी से पाटी, फलां बच्चे की ... किधर पाटी। गर वो बच्चा सही बता देता, तो कोई बात नहीं, लेकिन गर गलत बताता, तो उसे उस बच्चे को, अपने पीठ पर तब तक चढ़ाये रखना होता, जब तक वो सही उत्तर नहीं दे देता। इस क्रम में ओटे पर बैठा सबसे बड़ा सदस्य, एक हाथ से उसकी आंख मूंदकर, दूसरे हाथों को पीठ पर रख अंगूलियों की संख्या को दर्शाता और पूछता -- एक मन की सूतरी बरियारी घोड़ी के गो....। वो गर संख्या सही बता दिया कि पांच या दो। तो बस पीठ पर चढ़ा बाल सदस्य, नीचे उतर जाता और फिर उसे वो करना पड़ता, जो वो बाल सदस्य कर रहा था................।
इसी प्रकार का खेल था -- चिट्ठी का खेल। इसमें भी बच्चों की संख्या कोई निश्चित नहीं रहती। एक वरिष्ठ बाल सदस्य - एक अन्य बाल सदस्य को अपने पास रखता, और अन्य बाल सदस्यों को दूर भेज देता। फिर वरिष्ठ बाल सदस्य, एक एक कर बाल सदस्यों को अपने पास बुलाता, कहता - ए राजा।
दूसरा बाल सदस्य -- क्या खाजा
वरिष्ठ बाल सदस्य -- तेरे बाप कन से चिट्ठी आया।
दूसरा बाल सदस्य -- क्या क्या।
वरिष्ठ बाल सदस्य -- हाथी, घोड़ा, एरोप्लेन, हेलीकाप्टर, कार, फटफटिया
दूसरा बाल सदस्य -- अपने पसंद का कोई यातायात का साधन बोल देता, वरिष्ठ बाल सदस्य के इशारे पर कोई भी बच्चा, वो यातायात के साधन की आवाज निकालता हुआ जाता, ओर उसे ले आता। इसी प्रकार, एक एक कर बाल सदस्य, वरिष्ठ बाल सदस्य के पास आते जाते और खेल खत्म हो जाता।
दादी अम्मा के खेल का जवाब ही नहीं था। एक वरिष्ठ बाल सदस्य किसी उंचे जगह पर बैठकर, दादी अम्मा बन जाता, और दूसरे कई बाल सदस्य शोर करते हुए, दादी अम्मा बनी हुई बाल सदस्य के पास जाकर चिल्लाते - दादी अम्मा, दादी अम्मा खेलने जाउ
दादी अम्मा बोलती - नहीं बच्चों
फिर - दादी अम्मा, दादी अम्मा खेलने जाउं
दादी अम्मा बोलती - नहीं बच्चों।
फिर - दादी अम्मा, दादी अम्मा खेलने जाउ
दादी अम्मा बोलती - जाओ बच्चों, इसके बाद बच्चे खूब खेलकूद कर शोर मचा रहे होते। इसके बाद दादी अम्मा बच्चों को बुलाती और कहती।
दादी अम्मा - आओ बच्चों।
बच्चे शोर कर बोलते - नहीं आउंगीं
दादी बोलती - सोने का गिलास दुंगी।
बच्चे - नहीं आऊंगी।
दादी - सोने का कटोरो दुंगी।
बच्चे - नहीं आउंगी।
दादी - सोने का किताब दुंगी।
बच्चे - नहीं आउँगी।
दादी - सोने का भगवान दुंगी।
बच्चे - आउंगी।
और जब बच्चे, दादी अम्मा के पास पहुंचते, तो दादी अम्मा बना बच्चा, अपने बच्चों को लाड प्यार कर रहा होता।
फिर दादी पूछती। कहा गये थे - नानी कन।
दादी -- क्या - क्या खाये
बच्चे - लड्डू पेड़ा
दादी - हमारे लिये क्या लाये
बच्चे - गुड़़ का पकौड़ा, गुड़़ का पकौड़ा, बोलने के साथ ही बच्चे भाग निकलते, और इधर गुस्से से लाल पीली होती दादी, बच्चों को दौड़ा दी होती।
एक खेल था - सोने का पुल। ये ऐसा था कि रोज टूटता और रोज जूटता अथवा बनता। दो बच्चे एक दूसरे के विपरीत खड़े हो जाते, अपने दोनों हाथों को ऊंचा उठाते हुए, जोड़े रहते और पुल बन जाता। कई लड़कों का दल, पंक्तिबद्ध होकर, खड़ो होता। आगे वाला बच्चा - पुल से अनुरोध करता और कहता -- सोने के पुल में जाने दो।
पुल कहता -- सोने का पुल टूट गया।
बच्चे - हीरा मोती जूड़वा दो।
पुल - दाम कौन देगा।
बच्चे - पीछे वाला।
और इस प्रकार जो पीछे होता, पुल बना सदस्य उसे पकड़ लेता और पूछता किस तरफ रहोगे, हमारी या दूसरी तरफ। पकड़ा गया बाल सदस्य, नखरे दिखाता, और अपनी मर्जी के अनुसार पुल बने दो बालसदस्यों में से किसी एक का चुनाव कर लेता।
कितना पानी - गोपी चंदर।
अपने मुहल्ले में कई बच्चे ऐसे होते जो कई बाल सदस्यों के साथ मिलकर हाथों से जोड़ एक गोलाकर शृंखला बना लेता और गोल गोल घूमा करते। इस गोल- गोल घूमने के बीच एक बाल सदस्य होता, उससे पूछा करते, कहते - हरा समुंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी।
बीच में पड़ा मछली बना, बाल सदस्य, पांव के पास हाथ लाकर, कहता, इतना पानी। इसी तरह गोलाकार घूमते बच्चे पूछा करते और मछली बना बाल सदस्य हाथों से इशारा करते हुए बताता, कि इतना पानी, वो भी तब तक, जब तक पानी सर से पार न कर जाये, यानी बिना पानी के ही खेल का मजा आ जाता।
खेल - खेल में पढ़ाई का भी मजा, कई बच्चे ले लिया करते। गणित तो इससे मजबूत जरुर हो जाता। खेल का नाम था - सीताराम चिल्होरियो।
इस खेल में दो दल होते। जिसमें बाल सद्स्यों की संख्या समान होती। दोनों दल विपरीत दिशा में जाते। एक निश्चित समय में छुपा कर, लाईन पारकर, संख्याओं को निर्देशित करते। जब समय पार कर जाता और जिस दल को लगता था कि वो संख्या में जीत सकता हैं वो सीताराम चिल्हौरियो बोल दिया करताष यानी काम खत्म। अब आप इससे अधिक नहीं लिख सकते। दोनों दल एक दूसरे के लाईन पारे हुए पंक्तियों को काटने का प्रयास करते। जो दल नहीं ढूंढ सका वो पंक्ति के आधार पर, काउंट कर विजेता बन जाता।
बारिश के दिनों में में तो मजे ही मजे थे। भगवान से विशेष प्रार्थना की जाती कि हे प्रभु। स्कुल की छुट्टी के समय, इतना पानी बरसे की, बस भींगते हुए, घर जाने का मौका मिले, पर भगवान प्रार्थना स्वीकार ही नहीं करते, लेकिन जिस दिन प्रार्थना स्वीकार करते। उस दिन भींगने का मजा जरुर लेते। इधर मां भी जैसे कोपमुद्रा में दरवाजे पर खड़ी मिलती, खूब डांट मिलती, कभी भुजदंड से पिटाई भी हो जाती। मां को शायद बीमारी का ज्यादा खतरा रहता, लेकिन बीमारी ऐसी की आती ही नहीं। पिटाई स्वीकार था, पर बारिश में न भींगना मंजूर नहीं। गर कभी बुखार लग गयी तो सेवा सुश्रुषा शुऱु। भगवान से प्रार्थना से लेकर मस्जिद की दुआओँ तक की दौड़ हो जाती। घर में सभी लोग, इतना भाव देते की, पूछिये मत, ऐसा लगता कि इस रोज के कच - कच से अच्छा है कि बीमारी की एक्टिंग ही, कर ली जाये।
इधर जब इन्द्र भगवान जब ज्यादा मेहरबान हो जाते, तो लीजिए, बच्चों के दल ने सोचा कि क्या उपाय किया जाय। बादलों को फाड़ने की व्यवस्था भी बच्चों पर रहती। सभी बच्चे मिल जाते। एक लंबी फट्टी या लोहे के डंडे का जूगार किया जाता और एक छोड़ पर कपड़ें की लूत्ती बनायी जाती, जिसमें मिट्टी का तेल डालकर, आग लगाया जाता। फिर एक एक घर जाकर, उस लुत्ती में तेल डलवाया जाता। सारे बच्चे, घर - घर जाते और कहते जाते -- बदरी के ..... में लुत्ती फुत्ती, करे गोसाईयां घामे घाम। पता नहीं क्या और कैसे। इंद्र भगवान को बच्चों की ये विनती सुनायी पड़ जाती और देखते देखते आकाश साफ हो जाता। फिर क्या बच्चे अपनी जीत पर फूंले नहीं समाते।
इसी प्रकार, जब बारिश के क्रम में धूप दिखायी पड़ जाता तो माना जाता कि जंगल में सियार की शादी हो रही हैं। हाथी को देख लेने पर तो सारे बच्चे उछल पड़ते और सभी के जूबां पर एक ही दोहा.....
आम के लकड़ी कराकरी, हथिया --- भराभरी।
आम के लकड़ी कादो में, हथिया .... भादो में।
ये कविता पता नहीं होठों पर कैसे आ जाते... आज तक समझ में नहीं आया। किसी को देख - कैसे अपने आप कविता और दोहे बनकर तैयार हो जाती, होठों पर शब्दों का जाल फैल जाता, कई बार समझने की कोशिश की पर समझ में नहीं आया, सोचता हूं कि गर अगली बार नयीं जिंदगी मिली तो मैं इस बचपन के अंश को खोना नहीं चाहूंगा।

Tuesday, August 24, 2010

क्या हैं रक्षाबंधन.......?

रक्षाबंधन पर विशेष ------------------
रक्षाबंधन की व्यापकता तो इसके शब्दों में हैं, पर कुछ इतिहासकारों और फिल्मकारों ने इसकी व्यापकता को इतना सीमित कर दिया हैं कि ये सिर्फ भाई और बहनों का त्यौहार बन कर रह गया हैं, क्या सचमुच ये त्योहार भाई बहन का हैं या इसका संबंध मानवीय मूल्यों और राष्ट्र की रक्षा से हैं। आईये हम इसी पर आज चर्चा करते हैं ----------------------
सर्वप्रथम रक्षाबंधन की जो धार्मिक कथा हैं वो इस प्रकार हैं -----------------
भविष्य पुराण में एक प्रसंग हैं एक बार देवताओं और राक्षसों में भयंकर युद्ध हुआ, लगातार बारह वर्षों तक युद्ध करते करते देवताओं के हालत पस्त हो गये, कोई विकल्प न मिलता देख, देवताओं के गुरु वृहस्पति ने देवराज इन्द्र को अपना विचार दिया कि वे युद्ध को रोक दें, पर इन्द्राणी ने कहा कि देवगुरु देवताओं को युद्ध रोकने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि आज श्रावण पूर्णिमा हैं, इसलिए वो इस दिन देवराज इन्द्र को रक्षा सूत्र बांधेगी, जिसके प्रभाव से देवता अवश्य जीतेंगे, और देवलोक की रक्षा हो सकेगी। इस प्रकार देवराज इन्द्र की जीत हुई और देवलोक राक्षसों से सुरक्षित हो गया। ये कथा बताती हैं कि रक्षाबंधन किस भाव और किस रिश्तों का प्रतीक हैं। न तो इन्द्राणी देवराज इन्द्र की बहन थी और न देवराज इन्द्र, इन्द्राणी के भाई तो फिर इसका मकसद क्या था, मकसद केवल एक था देवलोक की रक्षा।
अब उस मंत्र की ओर ध्यान दें, जिस मंत्र को ब्राह्मण समुदाय अपने यजमानों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधते हुए कहते हैं।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

जिस रक्षा सूत्र से दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने राक्षसराज महाबलशाली बली की सुरक्षा प्रदान की थी, वहीं रक्षा आज तुम्हारे कलाई पर बांधा जा रहा हैं, ये रक्षासूत्र उसी भांति तुम्हारी रक्षा करें। ये मंत्र भी ये बताने के लिए काफी हैं कि ये पर्व किसका हैं, और किस भाव का प्रतीक हैं।
अब वैदिक मंत्र की ओर ध्यान दें, ये भी वहीं कह रहा हैं जो कि पूर्व के श्लोक का भावार्थ हैं -----------------------
ऊं जा बध्नन् दाक्षायणा हिरण्यंशतानीकाय सुमनस्यमानाः।
तन्म आ बध्नामि शतशारदायायुष्मांजरिदष्टर्यथासम्।।

कमाल हैं, इस महान पर्व को केवल भाई बहनों तक सीमित कर देना, इस पर्व की महानता को लघुता में प्रकट करने के समान हैं। जरा खुद बताईये जिस देश में दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती की पूजा शक्ति, धन और विद्या की प्राप्ति के लिए की जाती हो, वो स्त्री वर्ग अपनी रक्षा के लिए पुरुषों से रक्षा की कल्पना कैसे कर सकती हैं। जरा सोचिये, जिस देश में सावित्री अपने पति सत्यवान की प्राण रक्षा के लिए यम से लड़कर अपने पति के प्राण को वापस ले आती हो, उसे भला रक्षा की क्या जरुरत, जिस देश में सीता, रावण की बनी अशोकवाटिका में रहकर अपने सम्मान की रक्षा स्वयं कर लेती हो, जिस देश में अनुसूया अपने सतीत्व के बल पर भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बालक बना देती हो, जिस देश में महान वीरांगना लक्ष्मीबाई अकेले अंग्रेजों के दांत खट्टे कर देती हो, भला उस वर्ग को कैसे कोई रक्षा करने का वचन दे सकता हैं, वो तो खुद बलशाली हैं, वो तो केवल हमारे मस्तक पर तिलक लगा दें और शुभाशीष दे दें तो हमारी रक्षा हो जायेगी, हम उसकी रक्षा क्या करें, अतः जरुरत हैं, रक्षाबंधन की महत्ता को समझने की।
आज देश की जो स्थिति हैं, वह अंदर और बाहर दोनों से शक्तिहीन और श्रीहीन होता चला जा रहा हैं, देश के राजनीतिज्ञ इन सबसे अलग अपनी और अपने परिवार की भलाई से कुछ अलग सोचने नहीं हो, ऐसी स्थिति में इस रक्षाबंधन के पर्व की महत्ता और बढ़ जाती हैं, कि देश की रक्षा और संप्रभुता की रक्षा कैसे की जाय, एक तरफ चीन हमारी सीमाओं को छोटा करने में लगा हैं, दूसरी ओर पाकिस्तान और जिसे हमने स्वतंत्र कराया बांगलादेश, वो हमे नीचा दिखाने पर तुला है, ऐसे हालत में हम केवल इस पर्व को भाई बहन का पर्व बनाकर, और फिल्मी गीतों में ढालकर भूला दें, तो ये मूर्खता के सिवा कुछ नहीं, हमारे वेद और उपनिषद यहीं बताते हैं कि रक्षा बंधन का पर्व ये सीख देता हैं कि सोचो कि तुम अपने देश और समाज की रक्षा कैसे करोगे, आज की मौजूदा हालात में, चिंतन करों, देश तुम्हारा, समाज तुम्हारा, और तुम फिल्मी लटकों – झटकों में पड़ें हो ऐसे में ये राम और कृष्ण की भूमि का क्या होगा। क्या तुम्हें देवराज इन्द्र और दैत्यगुरु शुक्राचार्य की कथा नहीं मालूम। गर नहीं मालूम हैं तो अपने पूर्वजों की कथाओं को आज के दिन सुनों।
आज भी धार्मिक कार्यक्रमों में रक्षासूत्र बांधने का प्रचलन हैं, उसका मूल मकसद होता हैं कि आप धर्मानुसार आचरण करते हुए स्वयं की रक्षा करों, क्योंकि
वेद और उपनिषद कहते हैं कि --------------
धर्मों रक्षति रक्षितः अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता हैं, धर्म उसकी रक्षा करता हैं, इससे ज्यादा कुछ जानने की आवश्यकता नहीं। धर्म भी व्यापक हैं, उसे समुदाय में मत तौलिये। धर्म एक ही हैं, सत्य आचरण। कहा भी गया हैं – सत्य धारयति धर्मः।