Showing posts with label उपचुनाव. Show all posts
Showing posts with label उपचुनाव. Show all posts

Friday, April 14, 2017

....... और लिट्टीपाड़ा में भाजपा हार गयी।

ये किसकी हार है? दस लोग दस किस्म की बातें...
कुछ लोग इसे रघुवर सरकार की हार मानते हैं।
कुछ लोग इसे रघुवर दास की व्यक्तिगत हार मानते हैं। कुछ लोग रघुवर सरकार की गलत नीतियों की हार मानते हैं।
कुछ लोग इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हार मानते हैं। कुछ लोग झारखण्ड मुक्ति मोर्चा की परंपरागत सीट मानते हुए भाजपा की हार को अवश्यम्भावी मानते हैं, पर हार के मूल कारण सिर्फ यहीं है, मैं इसे नहीं मानता... लिट्टीपाड़ा में भाजपा की हार के और भी कई कारण है, जिस पर ध्यान देना जरुरी है, और इस हार पर कोई ध्यान दे या न दें, पर रघुवर दास को इस पर ध्यान देना जरुरी है, अगर वे चाहते है कि उनका राजनीतिक कैरियर उज्जवल रहे।
एक बात और, जो हमारे फेसबुक से जुड़े है या जो भले ही न जुड़े हो, पर गाहे-बगाहे हमारे फेसबुक वाल पर आकर नजरे चार करते है, वे अवश्य जानते है कि मैंने 1 अप्रैल को क्या लिखा था... मैंने खोलकर लिख दिया था कि लिट्टीपाड़ा में भाजपा की हार तय, साइमन को जीत की अग्रिम बधाई। ये बाते मैंने ऐसे ही नहीं लिख दी थी, ये मैंने अपने अनुभवों के आधार पर लिखी थी।
जरा रघुवर दास बताये कि
क्या अर्जुन मुंडा चाहेंगे कि हेमलाल मुर्मू लिट्टीपाड़ा सीट से चुनाव जीत जाये और इस जीत का श्रेय रघुवर दास लेकर चले जाये और फिर इस जीत पर रघुवर दास ये कहें कि जो भाजपा में रहते बाबूलाल नहीं कर सकें, अर्जुन मुंडा नहीं कर सकें, वो रघुवर दास ने कर दिया। क्या भाजपा में ही रहकर लुईस मरांडी चाहेंगी कि वो लिट्टीपाड़ा से हेमलाल मुर्मू को जीता कर संताल परगना क्षेत्र में एक नये प्रतिद्वंदी को जन्म दे दें, जो आगे चलकर उनका ही पत्ता काट दें। ये रघुवर दास को स्वयं सोचना होगा।
यहीं नहीं, लिट्टीपाड़ा में भाजपा के हार के और भी कई कारण है...
पहला कारण भाजपा में आत्मघातियों की संख्या का सर्वाधिक होना, जो कहने को तो भाजपा में थे, पर वे दिल से चाहते थे कि यहां से झामुमो जीते और इस हार का ठीकरा वे रघुवर दास के माथे फोड़े और ये कहें कि रघुवर की नीतियों को जनता नकार दी, वे जिस विकास के मुद्दे पर चल रहे है, जनता उनसे इत्तेफाक नहीं रखती, जबकि सच्चाई यह है कि जिस विधानसभा सीट के आज चुनाव परिणाम आये है, वहां की जनता को भी विकास से कोई मतलब नहीं, वह विकास और वोट का मतलब तीर-धनुष से अधिक नहीं जानती। वहां स्थिति ऐसी है कि आप चाहे जो कर लें, वहां जीतेगा भी तीर-धनुष और हारेगा भी तीर-धनुष, क्योंकि वहां की जो सामाजिक स्थिति ऐसी बन चुकी है कि उसे भेद पाना सामान्य सी व्यक्ति की औकात नहीं।
दूसरा कारण रघुवर दास के कनफूंकवों का आंतक है, मुख्यमंत्री रघुवर दास कनफूंकवों से इस प्रकार घिर गये है, जैसे लगता है कि कनफूंकवे उनके सर्वश्रेष्ठ शुभचिन्तक हैं                                                                                                                                                                                       जबकि सच्चाई यह है कि इन कनफूंकवों ने इनकी हर जगह ऐसी जगहंसाई कर दी है कि अब ये चाहकर भी अपनी बेहतरी नहीं कर सकते, मोमेंटम झारखण्ड का आयोजन कर हाथी को उड़वा देना, उन्हीं में से एक है, जिसकी आलोचना झारखण्ड ही नहीं बल्कि दूसरी जगहों के लोगों ने भी की।
तीसरा कारण भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं को सम्मान न देकर, उनकी खिल्ली उड़ाना, मजाक उड़ाना भी है, साथ ही अपने मंत्रियों को नीचा दिखाते हुए नौकरशाहों को तवज्जों देना भी है, आये दिन देखा जा रहा है कि जहां भी मुख्यमंत्री रघुवर दास का कार्यक्रम होता है, यहां की मुख्य सचिव स्वयं को नेता से कम स्वयं को नहीं शो कर रही है, यहीं हाल राज्य के अन्य आईएएस अधिकारियों का है, स्थिति यह हो गयी कि मंत्रियों को, विधायकों को ये अब आईएएस अधिकारी भाव ही नहीं देते, इससे जनता और जनप्रतिनिधियों में सरकार के प्रति गुस्सा पनप रहा है, जो वोट के रुप में सामने आ रहा है। हाल ही में कई कार्यक्रमों में भाजपा विधायकों-मंत्रियों को भाषण देने का मौका ही नहीं मिल रहा और ये सारा मौका मिल जा रहा है, आईएएस अधिकारियों को, जिनका काम भाषण देना कम, और सरकार के कार्यों और विकासात्मक योजनाओं को क्रियान्वयन करना है, पर देखा जा रहा है कि नौकरशाह काम कम और भाषण कुछ ज्यादा देने लगे है, जिसका परिणाम सामने है।
चौथा कारण संघ से सरकार की दूरी। ज्यादातर राज्यों में जहां भाजपा की सरकारें है वहां संघ और सरकार में एक मधुर संबंध है, जिसके द्वारा सरकार अनेक कार्यक्रमों का सृजन कर समाज और राज्य को नई दिशा दे रहीं है, जबकि इसके उलट यहां की सरकार संघ के पदाधिकारियों और उसके अनुषांगिक संगठनों को ही ठेंगा दिखा रही है, जिससे संघ के लोगों ने लिट्टीपाड़ा विधानसभा चुनाव से स्वयं को दूर कर लिया।
पांचवा कारण रघुवर सरकार ऐसे-ऐसे लोगों को आगे बढ़ा रहीं है, जो किसी भी दृष्टिकोण से भाजपा को पसंद नहीं करते, ऐसे लोगों को हर प्रकार से सहयोग कर रही है, उन्हें पुरस्कृत कर रही है, उन्हें खुलकर आर्थिक मदद कर रही है और जो लोग इनके लिये जान देते है, उन्हें ही शोषण कर रही है, आज ही का परिणाम देखिये एक झामुमो के परिवार को रघुवर सरकार ने कई बार पुरस्कृत किया, उसे मोमेंटम झारखण्ड में बुलाकर उसकी आरती उतारी और आज वहीं शख्स रघुवर दास को फेसबुक वॉल पर गाली दे रहा है, पर रघुवर दास को ये मालूम हो तब न...
छठा कारण रघुवर दास की कार्यप्रणाली के खिलाफ बढ़ता असंतोष, जिसकी जानकारी मुख्यमंत्री रघुवर दास को नहीं है, क्योंकि कनफूंकवें उन्हें इस प्रकार से अपहरण कर चुके है, कि उन्हें सही और गलत की जानकारी का ऐहसास नहीं, मैं देख रहा हूं कि जब भी कोई उन्हें सही जानकारी देने की कोशिश करता है, कनफूंकवे उसी व्यक्ति की मुख्यमंत्री के द्वारा मुख्यमंत्री का कान फूंककर, उसकी बांट लगा देते है, जिसका परिणाम सामने है, पहले लोहरदगा, फिर पांकी और अब लिट्टीपाड़ा।
सातवां कारण राज्य में विकास योजनाओं की लूट का बढ़ता प्रचलन- राज्य के आईएएस-आईपीएस अधिकारियों का दल जमकर लूट मचा रहा है और इस लूट में वे अपने घर के बेरोजगार बच्चों को भी शामिल कर रहे है, ठेकेदारों को कहा जा रहा है कि वे अपनी कंपनी में उनके बच्चों के शेयर दें, जिसका लाभ ठेकेदार और वरीय अधिकारी दोनों मिलकर सहजीविता के आधार पर उठा रहे हैं, अगर यहीं सब चलता रहा तो एक दिन झारखण्ड में एक भी विकास योजनाएं जमीन पर नहीं दिखेंगी, जबकि लूटेरों के घर और परिवार मालामाल होकर झारखण्ड से बाहर बस जायेंगे।
अभी भी वक्त है, मुख्यमंत्री रघुवर दास संभल जाये, नहीं तो आनेवाले समय में भाजपा एक भी लोकसभा की सीट नहीं जीत पायेंगी और न विधानसभा में उनका नाम लेनेवाला होगा।
जरा मुख्यमंत्री खुद सोचे, उन्होंने कनफूंकवों के कहने पर सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को एक लाख स्मार्टफोन दिलवा दिये, तो क्या हुआ, वोट मिल गया... जिन आदिम जनजाति के युवाओं को नियुक्ति पत्र मिल चुकी थी, कनफूंकवों के कहने पर फिर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों नियुक्ति पत्र दिलवा दिया, क्या इससे वोट मिल गया... मैं पुछता हूँ कि साहेबगंज में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों इसी समय पुल का शिलान्यास कराने की क्या जरुरत थी, आपने सोचा कि इसका माइलेज मिलेगा और हो गया उलटा... अरे भाई जनता की नब्ज आप नहीं  जानते, इसलिए हम बताते है, कनफूंकवों की मत सुनिये, नौकरशाहों पर लगाम लगाइये, जो लोग योग्य है, उन्हें इज्जत दीजिये, जो गलत कर रहे है, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाइये, अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाइये, अपने परिवार के लोगों पर लगाम लगाईये तथा बेहतर झारखण्ड के निर्माण में प्रमुख भुमिका निभाइये पर आप ये बातें मानेंगे, हमें नहीं लगता, क्योंकि कनफूंकवों से आगे आप निकल ही नहीं पायेंगे।
दूसरी ओर झामुमो के हेमंत सोरेन को हम बधाई जरुर देंगे, क्योंकि जहां एक ओर सत्ता की सारी मशीनिरियां उनकी पार्टी को हराने में लगी थी, हेमंत ने सारी मशीनरियों को धत्ता बताते हुए अपने कार्यकर्ताओं की मदद से भाजपा को उसकी औकात बताई, साइमन को जीत दिलाई, पर साइमन कल क्या करेंगे? खुद साइमन को नहीं पता, इसलिए हेमंत को ज्यादा कूदने की आवश्यकता नहीं, बल्कि वे सामान्य ढंग से इस जीत को ले, ज्यादा न उछले, क्योंकि भाजपा की हार, उसके लोगों ने खुद इस बार मिलकर कराई है...

Thursday, June 6, 2013

बिहार ने लालू की लालटेन की लौ बढ़ाई, जबकि नीतीश के तीर भोथर किये.................

बिहार में महराजगंज लोकसभा के उपचुनाव के परिणाम आ गये। राजद के प्रभुनाथ सिंह 1 लाख 37 हजार से भी अधिक मतों से जीते। जदयू के पी के शाही दूसरे नंबर पर रहे, जबकि कांग्रेस की जमानत तक जब्त हो गयी। लालू की बल्ले - बल्ले है। चुनाव परिणाम के पहले चक्र की मतगणना के बाद ही वे दहाड़ रहे थे। टीवी पर उनका बयान आ रहा था, कह रहे थे कि प्रभुनाथ लालटेन लेकर दौड़ रहा हैं। नीतीश का हाल क्या होगा - गइल गइल भइसिया पानी में। ब्रह्मर्षि समाज की जय जयकार कर रहे थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इस बार ब्रह्मर्षि समाज के लोगों ने दिल खोलकर उनका साथ दिया हैं और हुआ भी ऐसा ही। बेचारे पी के शाही जिस नीतीश के विकास का तीर लेकर महराजगंज में खूंटा गाड़ने का प्रयास कर रहे थे, उनका खूंटा प्रथम चक्र की मतगणना के बाद ही उखड़ गया। उन्होंने बयान दे डाला कि कार्यकर्ताओं का उत्साह व जोश नहीं था और पार्टी के अंदर चल रही भीतरघात और गठबंधन धर्म के ठीक से निर्वहन नहीं होने के कारण उनकी हार हो गयी। इधर लालू दहाड़ रहे थे, और दिल्ली में नीतीश, छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह से गुफ्तगूं कर रहे थे। टीवी पर ये भी दिखा कि जब नीतीश, रमण सिंह से बातें कर रहे थे, तब छायाकारों का समूह, इनकी छवि को अपने कैमरे में कैद कर रहा था, पर ये क्या जैसे ही नरेन्द्र मोदी उधर से निकले छायाकारों का समूह मोदी की ओर दौड़ पड़ा। 
पांच जून को देश के कई हिस्सों में हुए लोकसभा और विधानसभा के चुनाव परिणामों ने सभी पार्टियों को सबक सिखायी हैं, पर सच्चाई ये हैं कि किसी भी दल ने इस सबक को सीखने की कोशिश नहीं की।
गुजरात में चार विधानसभा सीटों और दो लोकसभा सीटों पर भाजपा को मिली भारी जीत, इस बात का संकेत हैं कि गुजरात की जनता नरेन्द्र मोदी को छोड़ना नहीं चाहती, उसे लगता हैं कि नरेन्द्र मोदी के हाथों में ही गुजरात का भविष्य हैं। जनता का फैसला शिरोधार्य होना भी चाहिए। पर बिहार में क्या हो रहा हैं। लगातार नीतीश के विकास का हव्वा खड़ा करनेवाले नीतीश के चाटूकारों की हवा निकल गयी हैं। बोलती बंद हैं। कल तक नीतीश - नीतीश जपनेवाले और इसी दरम्यान भाजपा की वैशाखी पर सरकार चलाते हुए भाजपा को ही आंख दिखानेवाले, मौसमी शेर गायब दीखे। महराजगंज की हार ने, उनकी सारी हेकड़ी निकाल दी हैं। जदयू के इन छुटभैयें नेताओं को लगता था कि बिहार की जनता नीतीश के आगे नतमस्तक हैं। जो नीतीश बोलेंगे, वो मानेगी। नीतीश का विकास, बिहार में सर चढ़कर बोल रहा हैं। ये हवाई किले बनानेवाले को पता नहीं कि विकास कोई सड़क बनाने और बिजली का खंभा खड़ा करने का ही नाम नहीं, उसके आगे रोजगार उपलब्ध कराने का भी नाम हैं। हद तो तब हो गयी कि आज भी बिहार के सुदुरवर्ती गांवों के लोग महाराष्ट्र और गुजरात में रोजी - रोटी कमाने के लिए जा रहे हैं, पर इन्हें रोकने के लिए बिहार सरकार ने कोई योजनाएँ नहीं बनायी। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के चिरकुट नेता बिहारियों को गाली देते थे और उसी महाराष्ट्र में जाकर नीतीश मनसे की जी हुजूरी करते दीखे। शायद बिहार की जनता इस दोहरे चरित्र को भूल गयी, उन्हें लगता होगा और जिस गुजरात ने आजतक बिहार की जनता के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला, उस गुजरात की जनता का अपमान, इस नीतीश ने बार - बार किया, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विषवमन कर। नीतीश को लगता हैं कि दुनिया की सारी खूबियां इन्हीं में हैं। खुब अहं में डूबे हैं। विज्ञापन के चाबूक से अखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों को हांक रहे हैं, समझते हैं कि सम्राट अशोक हो गये, पर उन्हें नहीं मालूम कि बिहार की जनता तो असल में बिहार की जनता हैं। सबसे अनोखी। यहां जातिवाद सर चढ़कर बोलता हैं। लालू ने जातिवाद की सीढ़ी चढकर महराजगंज की लहलहाती फसल दुबारा काटी हैं। राजपूत -यादव तो उसके परंपरागत वोट हैं, भला वो मतदाता राजद से छिटके कब थे, छिटके तो मुस्लिम थे, फिर ससर गये, और लालू के लालटेन की जीत पक्की। रही बात भूमिहार जाति की, तो ये जाति अभी नीतीश से बिदकी हैं ही, ब्याज समेत इसने अपना किराया वसूल लिया और पी के शाही की तीर को भोथर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
हमें याद हैं कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर ने सामान्य बातचीत के दौरान कहा था कि भला बिहार में विकास के नाम पर वोट मिलता हैं क्या। यहां तो जातिवाद और बयार पर वोट मिलता हैं। जनता को जातीयता का बीयर पिलाते रहिए, अपना उल्लू सीधा करते रहिए और जब जीत जाईये तो अपने अनुसार उसका अर्थ निकालिये। ये हैं हमारा बिहार। उसे कभी तीर तो कभी लालटेन और कभी कमल खिलाने में आनन्द आता हैं पर वो भी जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर। बेचारी कांग्रेस जो कल तक इसी के सहारे राज करती थी, आज सारी जातियां उससे बिदक गयी हैं, देखते हैं, ये बिदकी जातियां कब कांग्रेस की ओर आती हैं  या कांग्रेस इसी तरह पिछलग्गू बनकर, बिहार में अपना काम चलाती रहेगी। फिलहाल बिहार की जनता ने लालू और उसकी पार्टी को च्यवनप्राश खिलाया हैं, ताकत दी हैं। ताकत मिलते ही, लालू अपनी आदत से लाचार हैं ही, फिर से शुरु कर दिया हैं दहाड़ना। देखते हैं कब तक दहाड़ते हैं, रही बात नीतीश की, तो मैं कहूंगा, कि अब भी वक्त हैं, अहं त्यागे और किसी की आलोचना व किसी के खिलाफ विषवमन करने से अच्छा हैं, बिहार की जनता का सम्मान बरकरार रखने में ध्यान लगाये। यहीं उनके लिए और उनकी पार्टी की सेहत के लिए बेहतर होगा।

Monday, June 11, 2012

जो बिकते हैं, उन्हें ही खरीदा जाता हैं.............

जो बिकते हैं, उन्हें ही खरीदा जाता हैं, जो बिकते नहीं, उन्हें खरीदने की किसी की औकात नहीं। जब जनता बिकने पर आ जाये, तो समझ लीजिए -- देश व लोकतंत्र को बड़ा खतरा हैं और ऐसे देश को कोई भी किसी भी कीमत पर खरीद कर, उस देश और उस देश की जनता की औकात बता सकता हैं। कमाल हैं -- सत्तालोलुपता, स्वोपकार की भावना और घटियास्तर की मनोवृत्ति ने समाज और देश को इतना नीचे ले आया हैं कि चाह कर भी ये देश व समाज आगे निकल ही नहीं सकता। मैं उस समाज और घर में पैदा लिया हूं - जहां एक चावल को मींजकर, पता लगा लिया जाता हैं कि चावल पका अथवा या नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार हटिया विधानसभा का उपचुनाव हो रहा हैं और जिस कदर विभिन्न दलों के प्रत्याशियों ने पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की यहां बोली लगायी हैं और इस बोली के अनुरुप, हटिया के मतदाता और कार्यकर्ता बिकते दीखे गये, रांची के पत्रकारों पर बिकने का तमगा लगा, उससे साफ पता चलता हैं कि यहां का परिणाम क्या आयेगा और इससे देश व लोकतंत्र को कितना खतरा उत्पन्न हो गया हैं।
फिलहाल जो सज्जनवृंद देश व समाज को नयी दिशा देना चाहते हैं और जिनका लोकतंत्र में विश्वास हैं, जो विधानसभा और लोकसभा का चुनाव सत्यनिष्ठा से लड़ना चाहते हैं, उनके लिए ये मतदाता रेट सूची नीचे दिया जा रहा हैं, कृपया देख लें, ताकि उन्हें पता लग जाये कि यहां चुनाव लड़ना एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति के लिए कितना मुश्किल सा हो गया हैं, और इसका श्रेय जाता हैं, उन धनाढ्यों को जिन्होंने चुनाव लड़कर, मतदान को भी बाजार बना दिया। बाजार क्या होता हैं, उसमें कैसे - कैसे लोग बिजनेस करते हैं, हमें लगता हैं कि ये बताने की जरुरत नहीं।
फिलहाल -- मतदाता रेट सूची पर ध्यान दें..................।
मतदाता रेट सूची
1. मतदाताओं के घर पर पर्चा या पोस्टल साटने का रेट.....100 रुपये।
2. मतदाताओं के घर पर झंडा लगाने का रेट..................200 रुपये।
3. मतदाताओं के घर के ओटे से नुक्कड़ सभा करने का रेट.300 रुपये।
4. मतदाताओं के घऱ के किसी सदस्य को कार्यकर्ता
नियुक्त करने का रेट.....................400 रुपये / प्रतिदिन। मुर्गा -मांस, चावल रोटी और शराब का प्रबंध प्रतिदिन करना होगा, अलग से।
5. मतदाताओं के घर के सभी सदस्यों के वोट प्राप्त करने का रेट... 1000 रुपये / प्रति मतदाता की दर से।
कमाल हैं, पूर्व में पत्रकारों पर पेड न्यूज को लेकर, संवाददाताओं और समाचार पत्रों पर आरोप लगते रहे थे, और ये आरोप सही भी हैं, पर जब मतदाताओं ने भी इस आर्थिक युग में अपनी रेट तय कर दी, तब तो लगता हैं कि इस देश का भगवान ही मालिक हैं।
ऐसा क्यूं हुआ, क्यूं हो रहा हैं। इसका भी मतदाताओं ने जवाब ढूंढ लिया हैं। वे साफ कहते हैं कि ये प्रत्याशी देश व समाज के लिए चुनाव तो लड़ नहीं रहे। ये लड़ रहे हैं, अपनी पत्नी, अपने बेटे- बेटियों और मित्रों के लिए तो ऐसे में भला हम इनसे देश व समाज के प्रति निष्ठा रखने का विश्वास इन पर क्यों करें। ये आज दिखाई पड़ रहे हैं तो चलो, इनसे जितना बन सकें, निकाल लो। भला कल क्या होगा, इसकी चिंता हम क्यों करें और ऐसे भी देश व समाज की चिंता सिर्फ हम गरीब क्यों करें, इन्हें क्यों नहीं करना चाहिए। देश पर खतरा हो तो बलिदान दें हमारे बेटे और मजे लूटे ये। गर दुख ही करना हैं तो सभी करेंगे और हम भी अपने हक का देश लूट रहे हैं, इसमें गलत क्या हैं।
बात भी ठीक हैं। जरा हटिया के स्कूलों में देखिये -- एनसीसी में किसका बच्चा हैं। सब उन्हीं का बच्चा हैं, जो मैला ढोते हैं, जिनका बाप गली मोहल्लों में टायर पंक्चर ठीक कर रहा होता हैं, जो सिलाई करके अपने परिवार को चला रहा होता हैं। जिसके परिवार का सदस्य या बेटा, उसके घर से कोसो दूर सीमा पर देश की रक्षा करने के लिए डटा हैं, जो रोज खेती मजदूरी करके पेट पालता हैं। क्या एनसीसी और देश की रक्षा करने के लिए इन्हीं गरीबों के बच्चे मिले हैं और संभ्रांतों - धनाढंयों के बच्चे एनसीसी में क्यों नहीं हैं या उनके बच्चे देश की सीमा पर क्यों नहीं दिखाई पड़ते। इसका जवाब तो न तो सरकार के पास हैं और न बुद्धिजीवियों के पास। अपने देश में जाति - वर्ग संघर्ष के नाम पर क्या हो रहा हैं। सभी जातियों में अमीर और गरीब की ऐसी खाई बन गयी हैं कि अमीर, गरीब को देख ही नहीं रहा तो भला चुनाव के माहौल में गरीब, अमीरों के चोचलेबाजी -- देश और समाज के बारे में क्यों सोचे। इसलिए उसने भी मतदाता रेट खोल लिये। इसमें गलत क्या हैं।
हमारे देश के महापुरुषों ने जो लोकतंत्र की कल्पना की थी। जिस देश का सपना संजोया था। वो क्या यहीं था क्या। जहां पर आज के नेताओं ने लाकर हमें छोड़ दिया हैं। आज जितने भी घोटाले हुए, उसकी जांच का परिणाम क्या हुआ। नतीजा सिफर। आजादी के बाद किसी भी घोटालेबाज नेताओं को न्यायालय द्वारा सजा मिली, उत्तर होगा नहीं, तो फिर हम गरीब ही देश की सेवा के लिए बने हैं क्या। जरा समाजवादियों की परिकल्पना देखिये -- एक अपने देश में पार्टी हैं - समाजवादी पार्टी। खूब राममनोहर लोहिया का नाम लेती हैं। जब आपातकाल की घोषणा हुई थी देश में। तो इस पार्टी के लोगों ने 1977 में नारा दिया था -- इंदिरा गांधी के खिलाफ कि वो चाहती हैं परिवार राज, हम चाहते हैं आम जनता की राज। जरा पूछो। उस समाजवादी पार्टी के मुलायम से कि तुम बताओ, तुम संसद में हो, बेटा को मुख्यमंत्री बना दिये हो, बहु को क्न्नोज से जीता कर सांसद बना दिया। ये कैसा समाजवाद हैं। उन कांग्रेसियों, भाजपाईयों और बसपाईयों से पूछो कि तुम्हारी क्या मजबूरी थी कि तुमने एक कैंडिडेट भी मुलायम के बहु के खिलाफ नहीं दिया। पर सवाल पूछने और जवाब देने का फूर्सत किसे हैं, सभी लूट रहे हैं, तो मतदाताओं ने भी करवट ली हैं कि हम भी क्यों नहीं अपना रेट तय करें। शायद ये रेट देश के सभी भागों में धीरे - धीरे अपना जलवा बिखेरेगा और सही मायनों में एक बार फिर परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़कर, अपनी पूर्व की श्रेणी में आ खड़ा होगा। ऐसे भी हमारे बाप दादाओं ने गुलामी देखी हैं, हमने गुलामी देखी ही नहीं, हमें भी तो गुलामी देखने का उतना ही अधिकार हैं। जब हमारे नेता व मतदाता दोनों लूटनेवाली स्थिति में आ जायेंगे तो फिर क्या होगा............। सबको मालूम हैं...................।