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Saturday, May 4, 2013

बेचारा बंसल मामा, रेलमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देगा......

रेलमत्री पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे। कांग्रेस भी कह चुकी हैं कि पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे। भला बंसल इस्तीफा क्यों दे, इस्तीफा तो वो देता हैं, जिसके पास जमीर होती हैं। अब कांग्रेसियों के पास जमीर तो हैं नहीं, तो भला रेलमंत्री अपने पद से इस्तीफा क्यों दे। इस्तीफा तो दिया था, हमारे लाल बहादुर शास्त्री ने, जब उनके कार्यकाल में एक रेल दुर्घटना हो गयी थी। हम आपको बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री इस घटना के लिए जिम्मेवार नहीं थे, फिर भी नैतिकता के आधार पर कि उनके कार्यकाल के दौरान इतनी बड़ी दुर्घटना हुई थी उन्होंने रेलमंत्रालय संभालने से ही इनकार कर दिया था।
आज पवन कुमार बंसल को देखिये। इसके भांजे विजय कुमार सिंगला को सीबीआई ने 90 लाख रुपये घूस लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया। यह रकम विजय को उन्हें बतौर रिश्वत दो दिन पहले ही रेलवे बोर्ड के सदस्य बनाये गये महेश कुमार ने भिजवाई थी। पूरी डील दो करोड़ की थी और फिर भी बेशर्मी से रेलमंत्री पवन कुमार बंसल कहता है कि वो इस्तीफा नहीं देगा। कांग्रेस भी पवन कुमार बंसल के बचाव में निर्लज्जता के साथ खड़ी हो गयी हैं, ऐसे भी निर्लज्ज को लज्जा कहा आती हैं। कांग्रेस अच्छी तरह भारतीय जनता की नब्ज टटोल चुकी हैं, वो जानती हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं बनता, इस देश में भारत की सीमा चीन छोटा क्यूं न कर दें, ये मुद्दा नहीं बनता। जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी, वो उतना बड़ा नेता, इसलिए भ्रष्टाचार में लिप्त रहो, चीन से अपने देश की सीमा छोटी कराते रहो और फिर निर्लज्जता के साथी तीसरे टर्म के लिेए वोट मांगने को तैयार रहो। 
जनता के पास विकल्प तो हैं ही नहीं, वो क्या करेगी, अंततः कांग्रेस के साथ ही खड़ी होगी। गर किसी कारण से बहुमत नहीं भी आया तो निर्लजज्ता की श्रेणी में खड़े होने के लिए लालायित नीतीश एक न एक दिन, उनके साथ खड़े हो ही जायेंगे। बिहार में लालू और रामविलास, यूपी में मुलायम और मायावती  तो पहले से ही सोनिया नाम केवलम् का मंत्र जाप कर रहे हैं, दक्षिण में करुणानिधि और बची खुची वामपंथी पार्टियां, ये क्या करेंगी, अतंतः उन्हीं के शरण में आयेगी। देश भाड़ में जाय, हमने थोड़ी ही ठीका ले रखा हैं, आराम से लूटेंगे, विदेश में पैसे रखेंगे और फिर पूरे परिवार के साथ विदेश में कहीं बस जायेंगे। ये देश कोई रहने का हैं। देश तो इटली हैं, जहां की सोनिया माता हैं, जिनकी कृपा से राहुल और प्रियंका जी हैं। देश तो अमरीका, इंगलैंड और स्विटजरलैंड हैं, उनकी सरकारों के जूतों पर अपना नाक रगड़कर, वहां का नागरिकता प्राप्त कर लेंगे, यानी जब तक जिंदा रहेंगे, मस्ती में रहकर, पूरा जीवन गुजार देंगे।
इसलिए पवन कुमार बंसल, उसी श्रेणी के नेता हैं। सर्वदा सोनिया-राहुल और प्रियंका में अपना सर्वस्व लूटाने, चाटुकारिता करने, चरणवंदना करने, गणेश परिक्रमा करने में बड़ी ही श्रद्धा दिखाते हैं। जिसके एवज में वरदान स्वरुप रेल मंत्रालय उन्हें संभालने को मिला। आपको याद होगा, जब वे पहली बार रेलमंत्री बने थे, तो अपने भाषण में सोनिया जी की बड़ी ही श्रद्धा से नाम लिया था, राजीव गांधी का बड़ा ही नाम लिया था। उन्हें दुसरा कोई नाम याद ही नहीं था, क्योंकि जब सोनिया और राहुल जैसे भगवन् की उनके उपर कृपा हैं, तो जरुरत क्या हैं, अन्य का नाम लेने की। धन्य हैं, आज के नेता, आज के रेलमंत्री पवन कुमार बंसल जो रेल मंत्री के पद पर रहते हुए, अपने भांजे से सुंदर - सुंदर कार्य कराते हुए, भ्रष्टाचार का नया रिकार्ड बनाते हैं, ऐसे ही नेताओं से तो भारत की सुंदर तस्वीर बनती हैं। हम चाहेंगे कि देश में एक निर्लज्जता का भी एवार्ड देने की परंपरा की शुरुआत हो, ताकि ऐसे निर्लज्जों को पुरस्कृत किया जा सके, क्योंकि इन्होंने निर्लज्जता का रिकार्ड बना रखा हैं।

Thursday, December 20, 2012

गुजरात की जनता का अपमान बंद कर, जनादेश का सम्मान करें राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित नेता..........................

गुजरात की जनता ने एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के हाथों में गुजरात की बागडोर सौंप दी हैं। इस बार भी भारी बहुमत के साथ नरेन्द्र मोदी सत्तारुढ़ हुए हैं। ये अलग बात हैं कि इस भारी जीत को उनके विरोधी पचा नहीं रहे हैं, और फिर धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए, उन्हें धर्मनिरपेक्ष बताने से इनकार कर रहे हैं। इसकी शुरुआत, बिहार से ही हुई हैं। बिहार में भाजपा की वैशाखी पर टिकी, नीतीश की पार्टी के एक प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा हैं कि वे नरेन्द्र मोदी को धर्मनिरपेक्ष नहीं मानते। ऐसे भी समय - समय पर इनकी पार्टी और इनके बहुत सारे नेता, जिसमें राजद से जदयू में गये शिवानंद तिवारी और राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी हैं जो नरेन्द्र मोदी को समय - समय पर नीचा दिखाने के लिए बेतुके बयान देते रहते हैं पर उन्हें नहीं मालूम कि उनका इस प्रकार का बयान, नरेन्द्र मोदी का अपमान नहीं, बल्कि सीधे तौर पर गुजरात की छः करोड. जनता का अपमान कर देता हैं, जो नरेन्द्र मोदी को बार - बार सत्ता सौंपता हैं। 
ऐसे ही लोग मीडिया में भी हैं। जो गाहे - बगाहे नरेन्द्र मोदी को नाना प्रकार के विभूषणों से समय - समय पर अलंकृत करते रहते हैं। जब - जब चुनाव आते हैं, इन मीडिया हाउस को कई साल पहले हुए गुजरात के दंगे याद आने लगते हैं, और इसका दृश्य वे बार - बार अपने टीवी चैनलों के माध्यम से जनता को दिखाने शुरु करते हैं। यहीं नहीं इस दंगे में नरेन्द्र मोदी को लपेटने का भी प्रयास करते है, पर गुजरात की जनता शायद इस घटना को उस रुप में नहीं लेती और अपने ढंग से मतदान कर, सबको बता देती हैं कि उसे अपने नरेन्द्र पर कितना भरोसा हैं। 
सवाल उठता हैं कि गुजरात में दगे हुए, तो उसके लिए भाजपा के नरेन्द्र मोदी दोषी, तो फिर हाल ही में असम में जो दंगे हुए, उसके लिए असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई व भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोषी क्यों नहीं। देश की भुतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो पूरे देश में सिक्ख विरोधी दंगे फैले, उसके लिए कांग्रेसी दोषी क्यों नहीं, जबकि उस वक्त देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी का दंगे पर ही विवादास्पद बयान आ गया था। दंगों पर मीडिया और देश के मूर्धन्य नेताओं का दोहरा मापदंड क्यों। आपके पास कानून हैं, संविधान हैं। आपके पास गर सबूत हैं, तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाये, कोई रोक रखा हैं क्या। अदालत में उन्हें दोषी सिद्ध करें और फिर बोले कि वो नरेन्द्र मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, पर बिना किसी सबूत के किसी व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष न बताकर, उसे दोषी सिद्ध कर देना, क्या गलत नहीं हैं।
इधर मैं देख रहा हूं कि जिसकी कोई औकात नहीं, जो खुद भाजपा के वैशाखी पर सत्तासुख प्राप्त कर रहे हैं,  या जिन्होंने सत्तासुख पाया हैं। जो समय - समय पर भाजपा का सहयोग लेकर संविधान में प्रमोशन पर संशोधन के समर्थन का सहयोग लेने को लालायित भी रहते हैं, पर जब भाजपा को सहयोग करने की बात आती हैं तब उसे सांप्रदायिक कहकर, कन्नी काट लेते हैं, जैसे लगता हैं कि भाजपा अछूत हैं, उसे भारतीय राजनीति में रहने का कोई हक ही नहीं। अब तो कई पार्टियों ने धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट जारी करने का दुकान भी खोल दिया हैं। ये समय - समय पर धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट जारी भी करते रहते हैं। जबकि सबसे बड़े सांप्रदायिक और जातिवाद तथा परिवारवाद के पोषक वहीं हैं। मुलायम की पार्टी समाजवादी पार्टी हो या लालू की पार्टी राजद अथवा मायावती की पार्टी बसपा। क्या ये पार्टियां जातिवाद का सहारा लेकर देश को तोड़ने का काम नहीं करती, क्या जातिवाद से देश को खतरा नहीं हैं। सांप्रदायिकता से देश को खतरा और जातिवाद से देश बनता हैं क्या। इस देश में तो ज्यादातर पार्टियां जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष घोषित की हुई हैं, वे खुद घोर सांप्रदायिक और जातिवाद की शिकार हैं। हाल ही में जाति आधारित जनगणना करवाकर,  इन पार्टियों ने सिद्ध कर दिया कि इनकी मानसिकता कितनी भयानक हैं और देश को तोड़ने के लिए ये कितना बड़ा षडयंत्र रच रहे हैं। 
इसमें कोई दो मत नहीं कि आज देश को नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं की जरुरत हैं, क्योंकि वो जो कहता हैं, वो करता हैं। वो जाति की राजनीति नहीं करता। वो अपने छः करोड़ गुजरातियों की बात करता हैं। वो किसी दूसरे प्रांत से आये, नागरिकों को ये कहकर नहीं दुत्कारता कि तुम बिहारी हो, अपने प्रांत लौट जाओ। आज भी गुजरात के कई शहरों में लाखों की संख्या में बिहारी रहते हैं और गुजरात के विकास में चार चांद लगा रहे हैं साथ ही अपने बिहार में रह रहे परिवारों का भरण - पोषण कर रहे हैं। जरा दिल्ली में देखिये - शीला दीक्षित बिहारियों और यूपी के लोगों के बारे में क्या बयान जारी करती हैं। ये तो कांग्रेसी हैं। इनका इस प्रकार का बिहार व यूपी के लोगों के बारे में घटिया बयान क्यों आता हैं, पर जब शोर मचता हैं तो वो अपने बयान में क्यों सुधार करती हैं। पूछिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृश्वी राज चौहान से कि जब महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर अत्याचार होते हैं तब ये अपना मुंह क्यों सी लेते हैं। ये कुछ उदाहरण हैं। सभी को अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए। 
सब ने नरेन्द्र मोदी के नाम पर गुजरात की जनता का अपमान किया हैं। साथ ही अपमान करने का सिलसिला रुका भी नहीं हैं, जारी हैं। मीडिया व देश के कुछ पार्टियों के नेता अभी भी नरेन्द्र मोदी को सांप्रदायिक बनाने पर तूले हैं। जरुरत हैं जैसे गुजरात की जनता, गोधरा और अन्य दंगे भूलकर, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात को आगे बढ़ाने के लिए लालायित हैं। सभी मीडिया और अन्य पार्टियों के लोग अपने बयानों और कार्यो में सुधार लाये और गुजरात की जनता का अपमान करने का काम नहीं करें, क्योंकि आपको किसी ने ये अधिकार नहीं दिया कि आप बेवजह, उनका अपमान करें..............।

Wednesday, December 19, 2012

दिल्ली में दुष्कर्म, पूरा देश आंदोलित, संसद में बहस - वो रो रही थी, मंत्री जी हंस रहे थे..........................

पूरे देश ने देखा कि दिल्ली में दुष्कर्म, संसद में बहस  - वो रो रही थी, मंत्री जी हंस रहे थे। सारा देश दिल्ली में हुई गैंगरैप वाली घटना को लेकर शर्मसार हैं, आंदोलित हैं। जिनके पास चरित्र हैं, वे स्वयं को मानव कहने पर अपमानित महसूस कर रहे हैं, पर कांग्रेसियों को लज्जा नहीं आती, ये देखिये, संसद में क्या कर रहे हैं। जब राज्यसभा में दिल्ली में गैंग रैप को लेकर, समुचा सदन अवाक् था। घटना को अंजाम देनेवालों आततायियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग कर रहा था। देश के संसदीय कार्य राज्यमंत्री राजीव शुक्ला मंगलवार को उस गंभीर बहस के दौरान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। जबकि इसी सदन में जया बच्चन अपनी भावनाओं को रोक नहीं पायी और उनकी आँखों से आंसू छलक पड़े, हालांकि जिस पार्टी से जया बच्चन आती हैं, उनके नेता मुलायम सिंह यादव की तो बात ही निराली हैं। इनके नेता मुलायम सिंह यादव, विधानसभा चुनाव के दौरान, सिद्धार्थनगर जिले में आयोजित एक चुनावी सभा के दौरान ये कह डाला था कि हमें सत्ता में लाईये, आपको देंगे बलात्कार भत्ता। ऐसे भी हम आपको बता दें कि जैसे हर विषय पर हर पार्टियों की अलग - अलग विचारधारा होती हैं, और वे उन विचारधाराओं को मूर्तरुप देने के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं। उसी प्रकार बलात्कार जैसे विषय पर भी इनकी अलग - अलग विचारधारा हैं।  संयोग से गर किसी ने इनके घर में ऐसी घटना कर डाली तो उसकी खैर नहीं, वे कानून खुद अपने हाथों में ले लेंगे, पर सामान्य जनों के लिए कानून, संविधान और पता नहीं क्या - क्या कह डालेंगे। जो उन्हें पता तक नहीं होता।
सबसे पहले कांग्रेसियों को देखिये कि इन्होंने समय - समय पर बलात्कार के बारे में क्या कहा हैं। सबसे पहले हरियाणा चलिए, जहां 2012 में इतने रेप के कांड हुए कि ये प्रदेश इसी के नाम से ज्यादा जाना जाने लगा। यहां के कांग्रेसी नेता इस कांड पर क्या - क्या बयान दिये हैं। जरा गौर करे। हरियाणा कांग्रेस के प्रवक्ता धरमवीर गोयल के अनुसार बलात्कार के लिए महिलाएं ही जिम्मेवार हैं, 90 फीसदी महिलाएं स्वेच्छा से रेप कराती हैं।
हरियाणा के ही विधायक संपत मीणा कहते हैं कि बलात्कार के लिए चाउमिन और पिज्जा जिम्मेवार हैं। कभी सोनिया गांधी ने ही हरियाणा कांड पर कहा था कि बलात्कार सिर्फ हरियाणा में ही नहीं पूरे देश में होते हैं। ऐसे में हम आपको बता दें कि कांग्रेसी सिर्फ बलात्कारियों पर ही इतनी उदारता नहीं दिखाते ये तो देश को मिट्टी में मिलानेवाली ताकतों पर भी अपनी कृपा बरसाते हैं। जैसे हाल ही में आपने गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को सुना होगा कि कैसे उन्होंने सदन में हाफिज सईद को श्री लगाकर संबोधित किया। ऐसे इसी पार्टी का एक पागल नेता, जिसे दिग्विजय सिंह के नाम से जाना जाता हैं, ये ऐसी हरकतें बराबर किया करता हैं।
आप कहेंगे कि मुझे ये बात लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी। मेरा कहना हैं कि जहां के राजनीतिज्ञों की सोच बलात्कार वाले मुद्दे पर एकमत नहीं हैं. जो इस प्रकार की अमानुषिक घटना को सामान्य ढंग से लेते हो। अपराधियों को सम्मान देते हो तथा गंभीर विषयों पर जब बहस हो तो उसे हंसी में उडा़ देते हो। तब ऐसी हालत में हम ऐसे राजनीतिज्ञों से ये क्यूं आशा रखे, कि ये देश में कानून का शासन स्थापित करेंगे और बलात्कार के दोषियों को सजा दिलवायेंगे। ये तो हमारी लाशों पर राजनीति कर रहे हैं। हमारी संतानों को, वे पशुओं से भी बदतर समझते हैं, तभी तो सत्ता का स्वाद चख रहे, इन मंत्रियों के चेहरे पर मुस्कान दिखी, गर ऐसा नहीं होता तो फिर ये भी हमारी तरह, आंदोलित व आक्रोशित होते। साथ ही गैर - जिम्मेदारानां बयान नहीं देते।
हम आपको बता दें कि आज जरुरत हैं, हर परिवार को कि वे अपनी बेटियों को लक्ष्मीबाई बनाये। ये संभव हैं। गर आपने लक्ष्मीबाई बना दिया यानी स्वरक्षा के उपाय बता दिये तो फिर किसी की हिम्मत नहीं होगी कि वो आपकी बेटी को छू भी सकें। क्योंकि सरकार और पुलिस से स्वरक्षा का विश्वास रखना मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। ये सरकार और ये पुलिस, सिर्फ और सिर्फ नेताओं और उनकी बहु-बेटियों की हिफाजत के लिए हैं। आम जनता के लिए नहीं। आम जनता तो बनी ही हैं - इन नेताओं की खुराक, जमकर, जहां होता हैं ये अपने पेट में, अपने हिसाब से खुराक डाल लेते हैं।

Saturday, September 22, 2012

हमारे प्रधानमंत्री डायलॉग बहुत अच्छा बोल लेते हैं......................

ल यानी 21 सितम्बर 2012 को अपने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का हिंदी में भाषण सुनने को मिला। आमतौर पर अंग्रेजी में बोलनेवाले मनमोहन सिंह को शायद ये परमज्ञान हो गया होगा कि यहां की जनता अंग्रेजी थोड़ा कम जानती हैं, इसलिए हिंदी में पहले और बाद में उन्होंने अंग्रेजी का सहारा लिया, हालांकि आम तौर पर देखा गया हैं कि जब अंग्रेजी में ये बड़े बड़े महानुभाव भाषण दे देते हैं तो इनके भाषण का हिंदी अनुवाद ये कहकर पेश नहीं किया जाता कि उनके हिंदी भाषण को पढ़ा हुआ मान लिया जाय, और लोग पढ़ा हुआ मान लेते हैं। ऐसे भी, मेरा ये विषय भी नहीं कि उन्होंने किस भाषा में भाषण दिया, क्योंकि ये महाशय अपने देश की सम्मान के प्रति कितना गंभीर हैं, वो देश की जनता जानती हैं।
अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को अभी एफडीआई की जरुरत हैं। उन्होंने बड़ी ही बेशर्मी से ये भी कहा कि 1991 में जब आर्थिक सुधार कार्यक्रम देश में शुरु किये गये तो यहीं लोग जो आज विरोध कर रहे थे, उस वक्त भी विरोध करना शुरु किया था, पर आज उसका क्या फायदा मिला, सभी को ज्ञात हैं। उन्होंने ये भी बड़े बेशर्मी से कह दिया कि देश के ज्यादातर हिस्सों में ज्यादातर लोग एक साल में छह सिंलिंडर से ही काम चला लेते हैं, पर ये नहीं बताया कि उनके ( प्रधानमंत्री के ) घर में कितने सिलिंडर, एक साल में खर्च होते हैं। कल के भाषण में इतना तो स्पष्ट हो गया कि हमारे प्रधानमंत्री डायलॉग बहुत अच्छा बोल लेते हैं। इसलिए हम तो यहीं चाहेंगे कि जैसे उन्होंने ब्यूरोक्रेट में रहकर अपनी पोजीशन ठीक की। राजनीति में हाथ पांव मारकर बिना किसी लोकसभा चुनाव जीते, प्रधानमंत्री बन गये। अब उन्हें फिल्मी दुनिया में भी हाथ अजमाना चाहिए, निःसंदह वे तीनों शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान को परास्त कर सुपर स्टार बन जायेंगे और इस प्रकार से एक रिकार्ड भी बना लेंगे, कि एक व्यक्ति जो हर जगह फिट हैं, वो सिर्फ और सिर्फ मनमोहन हैं। बेचारे प्रधानमंत्री ऐसे तो बहुत कम बोलते हैं, कम बोलने का रिकार्ड भी उन्ही के पास हैं, जब ममता बनर्जी ने जैसे ही एफडीआई मुद्दे पर, केन्द्र से अपना समर्थन वापस लिया, उनका मुंह खुल गया और जनता से सहयोग मांगने लगे।
इधर कल तक एफडीआई के विरोध में भारत बंद में शामिल होनेवाली समाजवादी पार्टी, जिसका चरित्र सदैव संदिग्ध रहा हैं। उसके बड़े नेता मुलायम सिंह यादव, सोनिया गांधी के चरण कमल पर लोटने के लिेए मजबूर हो गये। याद रखिये ये वहीं मुलायम हैं जो दो दिन पहले कोलकाता में कांग्रेस को कोस चुके हैं। ये वहीं मुलायम हैं जिनकी जीभ प्रधानमंत्री पद के लिए हमेशा लपलपायी रही हैं। ये वहीं मुलायम हैं, जिन्होंने अपने पुरे खानदान को राजनीति में घुसाकर, उन्हें अनुप्राणित किया हैं। ये वहीं मुलायम हैं, जिन्हें वामपंथी नेता एबी वर्द्धन, एनसीपी के कई नेता, थर्ड फ्रंड की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में देर तक नहीं की हैं, और उतनी ही जल्दी, इस नेता यानी मुलायम ने कांग्रेस के गोद में बैठने में अपनी पुरुषार्थ दिखा दी। ये कहकर कि वे नहीं चाहते कि देश में सांप्रदायिक शक्तियां मजबूत हो। यानी देश मुलायम की जातिगत राजनीति के कारण और कांग्रेस की गलत आर्थिक नीतियों के कारण भले ही भाड़ में चला जाये, पर मुलायम  और सोनिया की बादशाहत किसी भी प्रकार से कम नहीं होने चाहिेये। ये हैं हमारे देश के नेताओं का दोहरे चरित्र को उजागर करती आज की राजनीति। ऐसे ऐसे नेता, हमारे देश को महान बनाने के लिए, आजकल पैदा लिेए हैं, जो देश को अमरीका और अन्य देशों के हाथों गिरवी रखकर, उऩके उपनिवेश शासक के तौर पर खुद को प्रतिष्ठित करने का सपना देख रहे हैं। क्या होगा, इस देश का, जहां ऐसे ऐसे घटिया स्तर के नेताओं की फौज आज विद्यमान हैं।
कल हमारे प्रधानमंत्री ये भी बोले कि अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों में आयी आर्थिक मंदी का असर भारत में भी देखने को मिला हैं, पर हमारे उपर उतना बोझ नहीं पड़ा हैं। मैं कहता हूं की गर नहीं पड़ा तो डीजल का भाव क्यों बढ़ा दिया। यहीं नहीं हमारे प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में डीजल का उपयोग बड़े बड़े अमीर करते हैं, क्या देश के खेतों में काम करने वाले किसानों और खेतिहर मजदूरों के डीजल पंपिंग सेट, पेट्रोल पर चलते हैं। क्या हमारे देश के सारे के सारे किसान अमीर हो गये। क्या प्रधानमंत्री का इस प्रकार दिया गया बयान करोंड़ों किसानों के मुंह पर तमाचा नहीं हैं। प्रधानमंत्री जी, आम जनता से सहयोग मांगते हो, कठोर फैसले लेने की मजबूरी का हवाला देते हो, और खुद तुम्हारे मंत्रिमंडल के लोग जनता की गाढ़ी कमायी के अरबों - खरबों रुपये लूटकर विदेशों में जमा कर दे रहे हैं, साथ ही लूटने का क्रम जारी भी हैं। उस भ्रष्टाचार पर आप अंकुश नहीं लगाते और आम जनता को देश के लिए जीने की दुहाई देते हो यानी हम जिंदगी भर देश के लिए सब कुछ लुटाते रहे और आप जिंदगी भर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर शान बघारते रहो और अंत में तिंरगा को लपेटकर, अपने सैल्यूट भी मरवाओ। क्या बात हैं। ये सिर्फ, इसी देश भारत में होता हैं और कहीं नहीं। दूसरा देश होता तो स्थिति कुछ और होती। बगल में चीन हैं -- देख लो। तुम्हारी - हमारी सदैव औकात बताता हैं और हमारी इतनी भी ताकत नहीं कि उसकी औकात बता दें। पूरा देश चीनी माल से अटा पटा हैं। मैं पूछता हूं हमारे प्रधानमंत्री ये तो बताये कि चीन के किस नगर में, मेरे देश की बनी सामग्रियां बिकती दिखायी दे रही हैं, गर नहीं तो इसके लिए जिम्मेवार कौन हैं। पिछले 65 सालों में दस साल निकाल दें तो कांग्रेस की ही सरकार रही हैं, और इस देश का बंटाधार कांग्रेस और इसको सहयोग करनेवाली पार्टियां के सिवा किसी और ने नहीं किया। ऐसे में आम जनता, आप के इस लल्लो - चप्पो वाली भाषण पर विश्वास क्यों करे। आप प्रधानमंत्री हैं -- 2014 तक आपको मिला हैं, शासन करने को। करते रहिये, देश को विदेशियों के हाथो लूटवाते रहिये। आगे देखते हैं कि 2014 के बाद कोई देश से प्यार करनेवाला सहीं व्यक्ति मिलता हैं या नहीं, जो प्रधानमंत्री पद पर रहकर, देश का सम्मान बढ़ा सके।

Monday, June 11, 2012

जो बिकते हैं, उन्हें ही खरीदा जाता हैं.............

जो बिकते हैं, उन्हें ही खरीदा जाता हैं, जो बिकते नहीं, उन्हें खरीदने की किसी की औकात नहीं। जब जनता बिकने पर आ जाये, तो समझ लीजिए -- देश व लोकतंत्र को बड़ा खतरा हैं और ऐसे देश को कोई भी किसी भी कीमत पर खरीद कर, उस देश और उस देश की जनता की औकात बता सकता हैं। कमाल हैं -- सत्तालोलुपता, स्वोपकार की भावना और घटियास्तर की मनोवृत्ति ने समाज और देश को इतना नीचे ले आया हैं कि चाह कर भी ये देश व समाज आगे निकल ही नहीं सकता। मैं उस समाज और घर में पैदा लिया हूं - जहां एक चावल को मींजकर, पता लगा लिया जाता हैं कि चावल पका अथवा या नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार हटिया विधानसभा का उपचुनाव हो रहा हैं और जिस कदर विभिन्न दलों के प्रत्याशियों ने पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की यहां बोली लगायी हैं और इस बोली के अनुरुप, हटिया के मतदाता और कार्यकर्ता बिकते दीखे गये, रांची के पत्रकारों पर बिकने का तमगा लगा, उससे साफ पता चलता हैं कि यहां का परिणाम क्या आयेगा और इससे देश व लोकतंत्र को कितना खतरा उत्पन्न हो गया हैं।
फिलहाल जो सज्जनवृंद देश व समाज को नयी दिशा देना चाहते हैं और जिनका लोकतंत्र में विश्वास हैं, जो विधानसभा और लोकसभा का चुनाव सत्यनिष्ठा से लड़ना चाहते हैं, उनके लिए ये मतदाता रेट सूची नीचे दिया जा रहा हैं, कृपया देख लें, ताकि उन्हें पता लग जाये कि यहां चुनाव लड़ना एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति के लिए कितना मुश्किल सा हो गया हैं, और इसका श्रेय जाता हैं, उन धनाढ्यों को जिन्होंने चुनाव लड़कर, मतदान को भी बाजार बना दिया। बाजार क्या होता हैं, उसमें कैसे - कैसे लोग बिजनेस करते हैं, हमें लगता हैं कि ये बताने की जरुरत नहीं।
फिलहाल -- मतदाता रेट सूची पर ध्यान दें..................।
मतदाता रेट सूची
1. मतदाताओं के घर पर पर्चा या पोस्टल साटने का रेट.....100 रुपये।
2. मतदाताओं के घर पर झंडा लगाने का रेट..................200 रुपये।
3. मतदाताओं के घर के ओटे से नुक्कड़ सभा करने का रेट.300 रुपये।
4. मतदाताओं के घऱ के किसी सदस्य को कार्यकर्ता
नियुक्त करने का रेट.....................400 रुपये / प्रतिदिन। मुर्गा -मांस, चावल रोटी और शराब का प्रबंध प्रतिदिन करना होगा, अलग से।
5. मतदाताओं के घर के सभी सदस्यों के वोट प्राप्त करने का रेट... 1000 रुपये / प्रति मतदाता की दर से।
कमाल हैं, पूर्व में पत्रकारों पर पेड न्यूज को लेकर, संवाददाताओं और समाचार पत्रों पर आरोप लगते रहे थे, और ये आरोप सही भी हैं, पर जब मतदाताओं ने भी इस आर्थिक युग में अपनी रेट तय कर दी, तब तो लगता हैं कि इस देश का भगवान ही मालिक हैं।
ऐसा क्यूं हुआ, क्यूं हो रहा हैं। इसका भी मतदाताओं ने जवाब ढूंढ लिया हैं। वे साफ कहते हैं कि ये प्रत्याशी देश व समाज के लिए चुनाव तो लड़ नहीं रहे। ये लड़ रहे हैं, अपनी पत्नी, अपने बेटे- बेटियों और मित्रों के लिए तो ऐसे में भला हम इनसे देश व समाज के प्रति निष्ठा रखने का विश्वास इन पर क्यों करें। ये आज दिखाई पड़ रहे हैं तो चलो, इनसे जितना बन सकें, निकाल लो। भला कल क्या होगा, इसकी चिंता हम क्यों करें और ऐसे भी देश व समाज की चिंता सिर्फ हम गरीब क्यों करें, इन्हें क्यों नहीं करना चाहिए। देश पर खतरा हो तो बलिदान दें हमारे बेटे और मजे लूटे ये। गर दुख ही करना हैं तो सभी करेंगे और हम भी अपने हक का देश लूट रहे हैं, इसमें गलत क्या हैं।
बात भी ठीक हैं। जरा हटिया के स्कूलों में देखिये -- एनसीसी में किसका बच्चा हैं। सब उन्हीं का बच्चा हैं, जो मैला ढोते हैं, जिनका बाप गली मोहल्लों में टायर पंक्चर ठीक कर रहा होता हैं, जो सिलाई करके अपने परिवार को चला रहा होता हैं। जिसके परिवार का सदस्य या बेटा, उसके घर से कोसो दूर सीमा पर देश की रक्षा करने के लिए डटा हैं, जो रोज खेती मजदूरी करके पेट पालता हैं। क्या एनसीसी और देश की रक्षा करने के लिए इन्हीं गरीबों के बच्चे मिले हैं और संभ्रांतों - धनाढंयों के बच्चे एनसीसी में क्यों नहीं हैं या उनके बच्चे देश की सीमा पर क्यों नहीं दिखाई पड़ते। इसका जवाब तो न तो सरकार के पास हैं और न बुद्धिजीवियों के पास। अपने देश में जाति - वर्ग संघर्ष के नाम पर क्या हो रहा हैं। सभी जातियों में अमीर और गरीब की ऐसी खाई बन गयी हैं कि अमीर, गरीब को देख ही नहीं रहा तो भला चुनाव के माहौल में गरीब, अमीरों के चोचलेबाजी -- देश और समाज के बारे में क्यों सोचे। इसलिए उसने भी मतदाता रेट खोल लिये। इसमें गलत क्या हैं।
हमारे देश के महापुरुषों ने जो लोकतंत्र की कल्पना की थी। जिस देश का सपना संजोया था। वो क्या यहीं था क्या। जहां पर आज के नेताओं ने लाकर हमें छोड़ दिया हैं। आज जितने भी घोटाले हुए, उसकी जांच का परिणाम क्या हुआ। नतीजा सिफर। आजादी के बाद किसी भी घोटालेबाज नेताओं को न्यायालय द्वारा सजा मिली, उत्तर होगा नहीं, तो फिर हम गरीब ही देश की सेवा के लिए बने हैं क्या। जरा समाजवादियों की परिकल्पना देखिये -- एक अपने देश में पार्टी हैं - समाजवादी पार्टी। खूब राममनोहर लोहिया का नाम लेती हैं। जब आपातकाल की घोषणा हुई थी देश में। तो इस पार्टी के लोगों ने 1977 में नारा दिया था -- इंदिरा गांधी के खिलाफ कि वो चाहती हैं परिवार राज, हम चाहते हैं आम जनता की राज। जरा पूछो। उस समाजवादी पार्टी के मुलायम से कि तुम बताओ, तुम संसद में हो, बेटा को मुख्यमंत्री बना दिये हो, बहु को क्न्नोज से जीता कर सांसद बना दिया। ये कैसा समाजवाद हैं। उन कांग्रेसियों, भाजपाईयों और बसपाईयों से पूछो कि तुम्हारी क्या मजबूरी थी कि तुमने एक कैंडिडेट भी मुलायम के बहु के खिलाफ नहीं दिया। पर सवाल पूछने और जवाब देने का फूर्सत किसे हैं, सभी लूट रहे हैं, तो मतदाताओं ने भी करवट ली हैं कि हम भी क्यों नहीं अपना रेट तय करें। शायद ये रेट देश के सभी भागों में धीरे - धीरे अपना जलवा बिखेरेगा और सही मायनों में एक बार फिर परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़कर, अपनी पूर्व की श्रेणी में आ खड़ा होगा। ऐसे भी हमारे बाप दादाओं ने गुलामी देखी हैं, हमने गुलामी देखी ही नहीं, हमें भी तो गुलामी देखने का उतना ही अधिकार हैं। जब हमारे नेता व मतदाता दोनों लूटनेवाली स्थिति में आ जायेंगे तो फिर क्या होगा............। सबको मालूम हैं...................।

Wednesday, March 7, 2012

गुंडों को क्या हैं, हाथी से उतरे, साईकिल पर चढ़ गये ---------------


देश की नजर, 6 मार्च को होनेवाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों पर थी, पर मेरी नजर ज्यादातर उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम पर थी, कि वहां की जनता क्या जनादेश देती हैं। जनता ने जनादेश दे दिया। पिछली बार मायावती की झोली भर दी थी, इस बार मुलायम की झोली भर दी। ऐसी झोली भर दी कि पांच सालों तक कोई किच किच न हो। कोई राजनीतिज्ञ उलाहना न दे कि जनता ने जनादेश तो दिया पर बहुमत नहीं। अब लो दे दिया, काम करो। इसके पहले बहुमत मायावती को दिया, पर मायावती को अपनी मूर्ति और हाथी को सजाने से, वक्त ही नहीं मिला कि वो उत्तर प्रदेश के बारे में सोचे। मायावती तो जानती हैं कि यूपी के दलित, हाथी को छोड़कर, दूसरे पर बटन दबा ही नहीं सकते और रही बात पंडितों और मुस्लिमों की, तो पंडितों को दक्षिणास्वरुप विधानसभा की टिकट और मुस्लिमों को भाजपा का भय दिखाकर, फिर से सत्ता हासिल कर लेंगे, पर ऐसा हो न सका। बसपा का नारा -- चढ़ गुंडे की छाती पर, बटन दबेंगी हाथी पर और ब्राह्मण शंख बजायेगा, हाथी दिल्ली जायेगा। काम नहीं आया और हाथी लखनउ तक, ही सिमट गया। इधर समाजवादी पार्टी की बल्ले बल्ले हैं, जनता ने पूर्ण बहुमत दे दिया। बांछे खिल गयी। बहुमत की बात तो समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने सपने में भी नहीं सोची होगी, पर आज बहुमत हैं। न कांग्रेस को मनाने का झंझट और न निर्दलीयों के आगे घूटने टेकने की जरुरत। बस सब बम - बम हैं। भाई यूपी की जनता ने एक बार भाजपा को भी पूर्ण बहुमत दे दिया था, पर राम मंदिर की आस्था और मंदिर निर्माण की दृढ़संकल्पिता, उसे कहीं की नहीं रखी और भाजपा आज तीसरे नंबर पर आकर अटक गयी। लगता हैं कि भाजपा फिर कभी सत्ता में नहीं आयेगी। लेकिन देश की राजनीति ऐसी हैं कि कब कौन उछलकर मुख्यमंत्री पद पर चला जायेगा या किस की फिर से बहुमत आ जायेगी, कहां नहीं जा सकता। एक समय था कि लोग जनसंघ( अब भाजपा ) और उसके नेताओं के बारे में बोलते थे कि ये पार्टी कभी सत्ता में नहीं आयेगी, पर ये पार्टी देश की बागडोर भी संभाली, कई प्रदेशों में इनकी सरकार हैं, इसलिए इस पर बोलना व लिखना बेकार हैं।
इधर जब जनादेश का परिणाम आ रहा था, तब देश के राष्ट्रीय समाचार पत्रों व राष्ट्रीय चैनलों में कार्यरत कांग्रेस भक्त पत्रकार, जो कल तक यूपी में कांग्रेस की शानदार सफलता का दंभ भरते आ रहे थे। अपना चेहरा छुपाते नजर आये। कुछ ऐसे बेशर्म कांग्रेस भक्त पत्रकार भी थे, जो बेशर्मी की सारी हदें पारकर, अपना चेहरा बार - बार चैनलों पर दिखा रहे थे। खैर कांग्रेस का जो होना था। हो गया। कांग्रेस पार्टी आज भी परिवारों की पार्टी हैं। हाई - फाई पार्टी हैं। जिसमें जनता की भागीदारी कम, नेताओं के खानदानों की भागीदारी ज्यादा होती हैं, और परिणाम सबके सामने हैं।
समाजवादी पार्टी -- नाम कितना सुंदर। समाज की बात करनेवाली यानी सामाजिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, देश व समाज को आगे ले जानेवाली पार्टी। पर क्या लगता हैं कि इस पार्टी से उत्तरप्रदेश का भला होगा। आज तो देश के सभी समाचार पत्रों में बड़े बड़े संपादक, और अन्य स्तंभकार, मुलायम पुत्र अखिलेश की जय जय कर रहे हैं। चाटुकारिता की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। मुलायम को सही युवराज बता रहे हैं। राहुल पर फब्तियां कस रहे हैं। ये लिखनेवाले और बोलनेवाले वो लोग हैं, जो लाखों नहीं, करोड़ों में खेलते हैं। जो यूपी की गांवों और गलियों का इतिहास भूगोल भी नहीं जानते, पर बता रहे हैं कि यूपी को अखिलेश यादव नया मार्ग दिखायेंगे, अब यूपी बहुत आगे निकल जायेगा। सपा दिल्ली में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी। हां हां क्यों नहीं निभायेगी, जनता ने भूमिका निभाने के लिए ही तो जनादेश दिया हैं। पर आज अखिलेश के आगे नतमस्तक होकर, अखिलेश यादव की चरणवंदना करनेवाले ये सारे पत्रकार, जब कांग्रेस दूसरे या तीसरे नंबर पर अथवा अपनी सीटें पूर्व के विधानसभा चुनाव के मुकाबले दुगनी कर लेती तो फिर देखते क्या होता। ये सारे के सारे पत्रकार राहुल शरणं गच्छामि कहकर, राहुल गांधी की चरणवंदना में लगे रहते। हम आपको ये भी बता दें कि भारतीय राजनीति और यहां की जनता कैसे जनादेश देती हैं, वो सबको पता हैं.............कल विदेशियों के हाथ में गर ये सत्ता सौंप दें तो इस पर भी किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि यहां किसे अपने देश और समाज की बढ़ोतरी की चिंता हैं, सभी अपने आप में लगे हैं। समाजवादी पार्टी को ही ले लो। ये समाजवाद की बात करते हैं। इंदिरा गांधी के शासनकाल के समय परिवारवाद की आलोचना करनेवाले इन समाजवादियों से पूछों कि तुम आज क्या कर रहे हो। जरा देखो -- मुलायम सिंह यादव, सांसद हैं अब मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, बेटा अखिलेश यादव खुद सांसद हैं और मुलायम की बहु डिंपल ये भी सांसद बनने जा रही थी, पर जनता ने इन्हें जिताकर नहीं भेजा, गर भेज देती तो ये भी सांसद होती। जिस पार्टी की सोच, अपने परिवार पर आकर सिमट जाती हैं, वो समाजवादी कैसे हो सकता हैं। सवाल ये हैं।
सवाल ये भी हैं -- कि जिस पार्टी ने अभी सत्ता संभाला नहीं हैं। अभी तक अपना नेता चुना नहीं हैं। ये अलग बात हैं कि मुलायम ही मुख्यमंत्री होंगे और इनके बाद इनके बेटे, कांग्रेस की तरह अपनी पार्टी का झंडा ढोयेंगे, यूपी संभालेंगे। जब चुनाव परिणाम आते ही इनके गुड़ों ने अपनी औकात दिखानी शुरु कर दी तो आनेवाले समय में क्या होगा। क्या लोगों को मालूम नहीं कि गुंडों का क्या हैं, हाथी से उतरे और साईकिल पर चढ गये। समाजवादी पार्टी के लोगों ने क्या गुंडागर्दी दिखायी हैं जरा देखिये --- सपा के बहुमत की खबर आते ही यूपी के दस शहरों में सपा के गुंडों ने बवाल काटे। यूपी के संभल में सपा प्रत्याशी की जीत पर जीत में बौराएं गुंडों ने गोलियां चलायी, एक बच्चे की मौत हो गयी। झांसी में सपाईयों ने पत्रकारों को बाथरुम में बंद कर घंटों बंधक बनाये रखा। मेरठ, फैजाबाद, आगरा, संभल में स्थिति ऐसी हो गयी कि आंसूगैस के गोले छोड़ने पड़े। ये तो शुरुआत हैं, अभी पांच साल बाकी हैं। आप मानकर चलिये, कि सपा के राज में क्या होने जा रहा हैं............। पर इसके बावजूद हम चाहेंगे कि यूपी, अन्य विकसित हो रहे प्रदेशों की तरह विकसित हो, लेकिन ऐसा नयी सरकार कर पायेगी, क्योंकि गुंडे साइकिल पर बैठकर अभी से ही इतनी तेजी दिखा दी कि सारे सपने ही टूटते नजर आ रहे हैं। हां एक खुशखबरी हैं -- कांग्रेस व सपा भक्त पत्रकारों के लिए, कि वे मुलायम और अखिलेश का चरणवंदना कर अपनी किस्मत आजमायेंगे और अपने हिस्से का यूपी लूटकर, मुलायम और मुलायम के परिवार की तरह समाजवाद का असली चरित्र पत्रकारिता में दिखायेंगे।