Monday, November 5, 2012

इन बेशर्म पत्रकारों को तनिक लज्जा नहीं आती............................

आज सुबह सुबह मैंने सारे समाचार पत्रों को खंगाला हैं। सभी समाचार पत्रों ने नीतीश की स्तुतिगान की हैं। स्तुतिगान करना आवश्यक भी था, क्योंकि अब विज्ञापन नहीं छपते हैं। विज्ञापन के बदले, ऐसे समाचार छाप दिये जाते हैं, जो विज्ञापन का ही काम करता हैं और उसके बदले, उसकी एक बड़ी राशि समाचार से प्रभावित होनेवाले व्यक्ति अथवा संस्थानों से ले लिेये जाते हैं। ऐसा देश के सभी समाचार पत्र कर रहे हैं, इसलिए राष्ट्रीय से लेकर, क्षेत्रीय समाचार पत्रों ने भी वहीं किया, जिसका मैंने पूर्व में आकलन किया था। इसके पहले, इस तरह का काम, सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय टीवी चैनल कल कर चुके हैं। 
आज सुबह - सुबह करीब सारे राष्ट्रीय चैनल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को फांसी पर लटकाने के लिए बेताब दीखे, लगे हाथों भाजपा के चिरप्रतिद्वंदी कांग्रेस पार्टी की ओर से भाजपा अध्यक्ष नितिन के खिलाफ बयान भी आ गया, जिसे इन चैनलों द्वारा दिखाया और सुनाया भी जा रहा हैं। हद हो गयी, इसे लेकर विशेष समाचार प्रसारित शुरु कर दिये गये हैं। समाचार क्या हैं, जरा आप ही पढ़िये और विचार कीजिये। भोपाल के एक कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने एक बयान दिया कि विवेकानंद और दाउद के आईक्यू एक ही थे, पर एक ने उस आईक्यू द्वारा देश और विश्व को नयी दिशा दी तो दूसरे ने विध्वंसात्मक कार्य कर मानवता का अहित किया। अब आप ही बताये, इसमें गलत क्या हैं। आज भी हम राम और रावण, कृष्ण और कंस का तुलनात्मक विवरण अपने बच्चों को नहीं देते हैं क्या और इस विवरण के द्वारा, हम बच्चों में ये प्रेरणा नहीं भरते हैं क्या, कि तुम्हें राम बनना हैं, तुम्हें कृष्ण बनना हैं, तुम्हें विवेकानन्द जैसा बनना हैं, जिससे हमारा समाज और हमारा राष्ट्र गौरवान्वित हो। ऐसा हम जब करते हैं तो फिर नितिन गडकरी के खिलाफ हाय तौबा क्यों। ये तो वहीं बात हुई, बेसिरपैर के बाल का खाल निकालना। गर राष्ट्रीय चैनल के पत्रकारों को कोई बात नहीं समझ आती या वे पागल हो गये हो तो इसमें नितिन गडकरी को हलाल करने की आवश्यकता क्यों। इन्हें खुद आगरा अथवा रांची के मनःचिकित्सा अस्पतालों में जाकर शरण लेनी चाहिए।
इन दिनों देश का सर्वाधिक नुकसान तथाकथित पत्रकारों द्वारा हो रहा हैं। ये सभी कांग्रेसभक्त बनकर, देश की अस्मिता व इसके वैभवशाली इतिहास पर कुठाराघात कर रहे हैं और इसके बदले वे कांग्रेस से उपकृत होते जा रहे हैं। हमारे पास कई सबूत हैं, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि अब तक इन मीडिया हाउस के मालिकों और पत्रकारों ने क्या किया हैं। कोई इस प्रकार के समाचारों को प्रसारित व प्रकाशित कर प्रधानमंत्री का प्रेस सलाहकार बन जाता हैं तो कोई राज्यसभा के सांसद के रुप में उपकृत होता हैं, कोई इसी के आड़ में अपना व्यवसाय चलाता हैं तो कोई अपने बेटे - बेटियों और संगे संबंधियों को सरकारी अथवा कारपोरेट जगत में लाखों - करोंड़ों के पैकेज पर नौकरी दिलवाता हैं। ऐसे में इन पत्रकारों द्वारा प्रकाशित अथवा प्रसारित खबरों पर अपना मन बनाना, देश के साथ खिलवाड़ करने के सिवा कुछ नहीं। इसलिए सभी देशवासियों को चाहिए, कि ऐसे पत्रकारों से अपनी दूरियां बनाये और इनके द्वारा प्रकाशित और प्रसारित समाचारों के प्रति कड़ा प्रतिवाद करें, ऐसा माहौल बनाये, कि इनके कुकर्मों से देश को बचाया जा सकें। क्योंकि परमाणु बम से भी ज्यादा खतरनाक, इनके विचार हैं। परमाणु बम से केवल एक खास इलाका प्रभावित होता हैं, पर इनके  खतरनाक विचार, पूरे भारत को निगलने के लिए तैयार हैं। ऐसे भी इन घटियास्तर के पत्रकारों की सोच पर अंकुश लगाने के लिए संविधान में कुछ भी नहीं हैं, ये स्वयं को देश के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताकर देश की जनता को दिग्भ्रमित भी कर रहे हैं। इसलिए सावधान हो, और इन घटियास्तर के चैनलों व पत्रकारों को अपने वैचारिक जागरुकता से पराजित करने के लिेए, मिलकर एक ऐसा कदम उठाये, कि ये सारे पत्रकार भारत की जनता से थर्रा उठे।

Sunday, November 4, 2012

बिहार को विशेष दर्जा क्यों, पुरुषार्थ जगाने के बदले, भीख मांगने की नयी परंपरा की शुरुआत क्यों...........

बिहार को विशेष दर्जा चाहिए। नीतीश ने इसके लिए अधिकार रैली पटना में बुलायी हैं। बड़ी संख्या में बिहार के सुदुरवर्ती इलाकों से लोग पहुंचे हैं, इस अधिकार रैली में। हालांकि इस प्रकार की रैली में लोग कैसे आते हैं, कैसे बुलाये जाते हैं, किस प्रकार के प्रलोभन दिये जाते हैं, ये बिहार की जनता रग - रग जानती हैं। ऐसे भी बिहार विकास के लिए कम, रैली और रैलाओं के लिए ही जाना जाता हैं। इसके पहले भी लालू प्रसाद जैसे घाघ नेता पटना में रैली बुला चुके हैं, उसका रसास्वादन भी कर चुके हैं, पर फिलहाल इनके हालत पस्त हैं। आज गर ये रैली बुलाये तो शायद ही, इनके द्वारा पूर्व में बुलायी गयी रैली, जितनी भीड़ भी जूट सके। पर जनता तो जनता हैं, कभी लालू तो अब नीतीश, आनेवाले समय में कभी दूसरे नेताओं को भी ये श्रेय वह दे दें तो अतिश्यिोक्ति नहीं होगी। 
चलिये भविष्य की बात छोड़े। अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता हैं। अतीत गरीब रैला, लाठी में तेलपिलावन रैला से होते हुए अधिकार रैली तक पहुंच चुका हैं। हर जदयू विधायक ने अपने अपने हिसाब से इस रैली में अपने लोग को बुलाने में, जमकर कसरत की हैं, जिसका रिजल्ट अधिकार रैली में देखने को मिला हैं। हम आपको बता दें कि ऐसे पूरे देश में रैली व रैला का दौर चल पड़ा हैं। लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी तो दिल्ली में आज ही के दिन कांग्रेस ने भी अपनी शक्ति प्रदर्शन कर, एक तरह से 2014 के लोकसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया हैं। जमकर सभी पार्टियों ने एक दूसरे को लताडा़ भी हैं और भ्रष्टाचार कें मुद्दे पर स्वयं को पाक साफ और महंगाई के लिए एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ा। अब जनता परेशान है कि इन रैलियों में किसे वे पाक साफ समझे और किसे कटघऱे में रखे। इसी बीच हिमाचल प्रदेश में आज मतदान चल रहा हैं, जबकि गुजरात में मतदान होना बाकी हैं, पर गुजरात और हिमाचल से जो संकेत मिल रहे हैं, वो साफ हैं कि जनता कांग्रेस से दूरी बना चुकी हैं और लोकसभा का चुनाव जब भी हो, कांग्रेस को विपक्ष में इस बार बैठने का जरुर मौका मिलेगा।
और अब हम बात करते हैं, बिहार की। जब से दूसरी बार नीतीश ने बिहार में सत्ता संभाली। वे बिहार के विशेष दर्जा दिलाने की मांग पर ज्यादा जोर देते रहे। बात यहां आती हैं कि बिहार को ही विशेष दर्जा क्यों, अन्य प्रदेशों को क्यों नहीं। देश में और भी बिहार जैसे कई प्रांत हैं, जो विकास से कोसो दूर हैं, उन्हें क्यों नहीं विशेष दर्जा मिलना चाहिए। दूसरी बात, नीतीश को ये परमज्ञान उस वक्त क्यों नहीं प्राप्त हुआ, जब वे एनडीए के शासनकाल में केन्द्र में एक जिम्मेदार मंत्रालय संभाल रहे थे और बिहार में रावडी़ देवी का शासन था। बिहार में रावड़ी भी तो वहीं बात कह रही थी और ये बार - बार इसका विरोध कर रहे थे। यानी आप जो बोलो वो देववाणी और बाकी बोले वो असुरवाणी। क्या सोच हैं - नीतीश जैसे लोगों की। जो लोग नीतीश को नजदीक से जानते हैं कि वो अच्छी तरह जानते हैं कि ये व्यक्ति, स्वयंप्रभु, भाग्यविधाता, अपने को मानता हैं। ये अपने आगे किसी को नहीं लगाता, चाहे वो जदयू में शरद यादव जैसे लोग ही क्यों न हो। हालांकि इसी अहं में वो नरेन्द्र मोदी को भी चुनौती दे डालता हैं पर इसकी ताकत इतनी नहीं कि वो नरेन्द्र मोदी से आंख में आंख मिलाकर बात भी कर सकें। इसने अहं में आकर कई बार गुजरात की जनता का भी अपमान किया, पर गुजरात की जनता, ऐसे - ऐसे व्यक्ति को, ज्यादा महत्व नहीं देती, मुझे अच्छी तरह मालूम हैं। नीतीश के बार में, मैं एक और बात कह दूं कि जिनकी याददाश्त थोड़ा कमजोर हैं तो उनके लिए उदाहरण दे देता हूं कि ये वहीं नीतीश हैं -- जिसने पिछली बार लोकसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह की बांका से टिकट कटवा दी थी। ये अलग बात हैं कि दिग्विजय सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में लोकसभा का चुनाव लड़कर नीतीश को, उसकी औकात बता दी। आज दिग्विजय सिंह दुनिया में नहीं हैं, पर ऐसा नहीं कि उनके नहीं रहने से नीतीश के कारगुजारियों पर बोलने व लिखनेवाला कोई नहीं।
ज्यादातर लोग नीतीश को एक बेहतर शासक के रुप में मानते हैं। वे इसलिए मानते है कि लालू का जिसने शासनकाल देखा हैं, वे मानते है कि अब भी लालू से नीतीश बेहतर हैं, पर क्या, हम इन्हें भी अराजकता फैलाने का वहीं मौका दें, जो कभी लालू को दिया था। आज भी मुजफ्फरपुर की नवरुणा कहां हैं, किसी को पता नहीं। अपहरण, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक सौहार्द्र की स्थिति क्या हैं, बिहार में किसी से छुपा नहीं। फिलहाल बिहार तो आतंक का रणक्षेत्र बनता जा रहा हैं। देश के किसी भी हाल में आंतकी घटनाएं हो रही हैं, उसका किसी न किसी प्रकार से सूत्र बिहार में मिल जा रहा हैं। ऐसे में बिहार का क्या सम्मान हैं, और क्यो विशेष दर्जा मिलना चाहिए। हमारी समझ से परे हैं। 
मैं भी बिहार का रहनेवाला हूं। मैंने लालू यादव का शासन भी देखा और नीतीश का भी शासन देखा। वहां क्या स्थिति हैं। मुझसे बेहतर कौन जानता है। एक घटना सुनाता हैं। आज से तीन साल पहले पटना के गांधी मैदान में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। ये उस वक्त की बात हैं जब बिहार में विधानसभा के चुनाव की रणभेरी बज चुकी थी। एक दक्षिण से प्रसारित होनेवाली टीवी चैनल में जब हमने समाचार देखने के लिए, नौ बजे रात्रि में टीवी खोला तो देखा कि रात्रि के नौ बजे से लेकर नौ बजकर 22 मिनट तक नीतीश ही नीतीश दिखाई पड़ रहे थे। जब हमने इस संबंध में पता लगाया तो पता चला की नीतीश ने उक्त चैनल को पेड न्यूज के रुप में अपने पक्ष में इस्तेमाल करवाया। जब हमने इस संबंध मे पटना के ही एक वरिष्ठ पत्रकार जो नीतीश भक्त हैं, पूर्व में खुब पत्रकारिता जगत में नाम भी कमाया हैं, वयोवृद्ध हैं। इस संबंध में बात की तब उनका कहना था कि ये गलत नहीं हैं, हर नेता को अधिकार हैं कि वो अपने पक्ष में ऐसा करें । कमाल हैं नीतीश पेड न्यूज के आधार पर अति महत्वपूर्ण समाचारों को रुकवाकर अपने लिए चैनल को इस्तेमाल करें तो सहीं, बाकी करें तो गलत हैं।
अंत में, बिहार को किसी भी हालत में विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलना चाहिए, और इस प्रकार की केन्द्र पर बेवजह दबाव की राजनीति भी बंद होनी चाहिए। नहीं तो, हर प्रदेश के लोग ऐसा करना शुरु करेंगे। ऐसे में पूरे देश में अराजकता की स्थिति पैदा होंगी, देश टूटने के कगार पर होगा। अच्छा होगा कि बिहार के नेता, अपने पुरुषार्थ को जगाकर, स्वयं बिहार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये। ऐसे देश में कई राज्य हैं, जो स्वयं आगे बढ़े हैं, किसी से भीख नहीं मांगा और न ही विशेष राज्य का दर्जा के लिए, अधिकार रैली का आयोजन, अपने प्रांत में कराया, तो फिर बिहार में इस प्रकार की अधिकार रैली क्यों.........................

Saturday, November 3, 2012

आज लिखने व बोलने की नहीं, कर के दिखाने की जरुरत हैं..............................

सचमुच आज लिखने व बोलने की नहीं, कर के दिखाने की जरुरत हैं। रांची से एक प्रकाशित अखबार जिसकी, मैं तहेदिल से इज्जत करता हूं, गर उसे एक दिन भी नहीं पढ़ूं तो मैं बेचैन हो जाता हूं। पर मैं इन दिनों देख रहा हूं कि इस अखबार को भी, अन्य अखबारों की तरह हवा लगी हैं। वो ऐसी चीजे लिख दे रहा हैं कि जिसे पढ़कर, मन व्यथित हो उठा हैं। इस अखबार में चरित्र, धन, भ्रष्टाचार और अन्य विषयों पर हमेशा सारगर्भित आलेख पढ़ने को मिलते हैं, पर मेरा मानना हैं कि केवल लिख देने से, उन विषयों का समाज व राष्ट्र में पदार्पण हो जायेगा, ऐसा संभव नहीं हैं। कल यानी 2 नवम्बर को इस अखबार ने आदर्श डाक्टरों की सूची से संबंधित प्रथम पृष्ठ पर समाचार प्रकाशित किया। जिसमें रांची के डा. के के सिन्हा को आदर्श डाक्टर के रुप में स्थापित किया। मै रांची की ही जनता से पूछता हूं कि क्या डा. के के सिन्हा, जिनकी चिकित्सीय फीस 1000 रुपये हैं। जिनसे इलाज कराने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता हैं। साथ ही जिनसे इलाज कराने के लिए नेताओं व मंत्रियों से पैरवी करानी पड़ती हैं। जो मुख्यमंत्री, कारपोरेट जगत के मठाधीशों, विभिन्न अखबारों के मालिकों व संपादकों को मुफ्त इलाज मुहैया कराते हो और गरीबों से एक हजार रुपये, फीस वसूलते हो। जो अपने यहां इलाज कराने आये, मरीजों का निबंधन भी नहीं कराते हो, जिससे ये पता लगे कि उन्होंने एक दिन में कितने मरीजों की जांच की। ताकि पता चल सकें कि वे एक दिन में कितने रोगियों को देखकर, कितने रुपये उनसे वसूले। जिनका समाचार बाप - बेटे से संबंधित मारपीट का कई समाचारों में सुर्खियां बन चुका हो। क्या उक्त अखबार बता सकता हैं कि इन्होंने कब और किस समय, गरीबों के लिए अपने दरवाजे खोले। ठीक वैसे ही जैसे लालपुर के डा. एस पी मुखर्जी के दरवाजे, गरीबों के लिए सदा खुले रहते हैं। आदर्श का मतलब क्या हैं.............। अपने लिए अच्छा होना, सिर्फ अपने लिेए कमाई करना, और आदर्श होना ये दोनों अलग अलग बाते हैं। ये सभी को समझना चाहिए। आदर्श वहीं हैं, जिनका जीवन अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिेए हो।
एक बात और। किसी व्यक्ति की आमदनी दस लाख रुपये प्रति माह हैं  और वो ईमानदारी की बात करें तो शोभा नहीं देता। शोभा उसे देता हैं, जिसकी आमदनी न के बराबर हो, और उसने पूरा जीवन ईमानदारी से, वह भी विपरीत परिस्थितियों में गुजार दें, तब वो प्रेरणास्रोत व आदर्श बन जाता हैं। इस रांची में एक से एक डाक्टर हैं, जो बेईमान भी हैं, चरित्रहीन भी हैं पर आदर्श भी हैं, लेकिन आदर्श का पैमाना जब डा. के के सिन्हा जैसे लोगों के पास आकर शरण लेता हैं,तो हम जैसे लोगों को असहनीय पीड़ा होती हैं।
आजकल आदर्शवादिता के नाम पर पुरस्कार देने की भी योजना चल पड़ी हैं। ऐसे ऐसे लोगों को पुरस्कार दे दिया जाता हैं कि हमें समझ में नहीं आता कि उन्हें ये पुरस्कार देने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी। हाल ही में रेडिशन ब्लू जैसे महंगे होटल में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के एक अधिकारी को, जो मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के बहुत ही निकट हैं। सुनने में आया हैं कि जो वह बोलता हैं, मुख्यमंत्री उसकी बातों को अच्छे बच्चों की तरह मान लेते हैं। उसे पुरस्कृत किया गया। उसे ये पुरस्कार लक्ष्मी लाडली योजना के लिए दिया गया। यानी सारा श्रेय उसे दे दिया गया, जिसने लक्ष्मी लाडली योजना के लिए क्या किया। उसे खुद ही पता नही। घोर आश्चर्य हैं। इसी तरह एक बार, रेलवे के एक महिला कर्मचारी को भी पुरस्कृत कर दिया गया, ये कहकर कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्र लेखन के लिए, पुरस्कृत किया जा रहा हैं। सच्चाई ये हैं कि कितने पत्र उक्त महिला ने, उक्त अखबार को भेजे, उसे खुद ही पता नहीं होगा, पर पुरस्कार दिया गया और लेनेवाले ने ले भी लिया। 
ऐसे में, एक सवाल उठता हैं कि क्या इस प्रकार की कारगुजारियों से समाज बदलेगा, आंदोलन सफल होगा। उत्तर होगा - नहीं, तो क्या किया जाना चाहिए। हमारा नम्र निवेदन हैं कि स्वयं पर ध्यान दीजिये। वहीं लिखिये जो सार्थक हो। वो मत लिखिये, जिससे लोग दिग्भ्रमित हो जाये, क्योंकि जो आप लिखते हैं या छापते हैं, वो आप नहीं जानते कि यहां की जनता, उसको किस रुप में लेती हैं। गर लोगों का विश्वास डोला तो फिर झारखंड को एक बड़ी क्षति होगी, क्योंकि मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रांची से जितने भी अखबार छपते हैं, उनमें से आप एकदम अलग हैं, पर आप भी जब अन्य अखबारों जैसे होंगे तो फिर झारखंड की जनता किस पर विश्वास करेगी। बड़ी विनम्रता से, करवद्ध प्रार्थना करता हूं कि झारखंड से निकलनेवाली और पूरे राष्ट्र में एक अलग छवि रखनेवाली इस अखबार को गिरने से बचाये। ये झारखंड हित में हैं...................................

Thursday, October 11, 2012

कौआ और भैस भी काला हैं, इनका क्या होगा नीतीशजी.............................

बहुत पहले कहानियां सुना करता था कि जब किसी राजा या शहंशाह की सवारी किसी रास्ते से गुजरती तो उस रास्ते पर चलनेवाले या किसी न किसी प्रकार से जूड़े रहनेवाले को आगाह किया जाता कि जहांपनाह की सवारी आ रही हैं, सभी होशियार हो जाये.............। अब हालांकि ऐसा देखने को नहीं मिलता, पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों जब से अधिकार यात्रा पर निकले हैं और जिस प्रकार से उनका चारो ओर विरोध हो रहा हैं। हम ये कह सकते हैं कि जिस प्रकार जूतमपैजार हो रहा हैं। कहीं उनकी सभा में कुर्सियां तो कहीं चप्पल जूते तक बरस रहे हैं। ऐसे में उनके अधिकार यात्रा से संबंधित अधिकारियों ने ऐसी ऐसी कारनामें शुरु की हैं, जिस कारण उनकी ये यात्रा, अधिकार कम शर्मनाक यात्रा में ज्यादा तब्दील हो गयी हैं, पर नीतीश तो नीतीश हैं। उन पर इन सभी चीजों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। फिलहाल सत्ता के मद में वे इतने डूब गये हैं कि उन्हें अपना विरोध भी पसंद नहीं, गर कोई उनका विरोध करता हैं तो वे उसे इतने अच्छे ढंग से देख ले रहे हैं कि जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं।  
इसमें कोई दो मत नहीं कि लालू का पन्द्रह साल का शासन नरकमय था, पर नीतीश जी आपको इसका ही तो लाभ मिला कि जनता ने लालू एंड कंपनी को सत्ता से हटाकर, आपको सत्ता सौंप दी, पर आपने तो इन दिनों हद कर दी हैं। जैसे साढ़ लाल रंग देखकर भड़क जाता हैं, वैसे ही आप काला रंग देखकर भड़क जा रहे हैं। स्थिति ऐसी हैं कि आपके कई सभाओं में बिहार की बहू बेटियों के शरीर से काला दुपट्टा तक उतरवा लिया जा रहा हैं, पर आपको शर्म नहीं आ रही। कई जगहों पर युवाओं से काला टी शर्ट उतरवा लिया गया हैं। अगर कहीं मुस्लिम महिलाएं काला बुर्का पहनकर आपकी सभा में आ गयी तो आप क्या करेंगे, तब तो आपको मुस्लिम वोट ही खिसक जायेगा, पर हमें लगता हैं कि आप ऐसी गुस्ताखी नहीं करेंगे, क्योंकि आप बहुत ही चालाक हैं। कभी - कभी तो मैं सोचता हूं कि गर आपका वश चले तो आप पूरे बिहार से भैस और कौए का न सफाया कर दें क्योंकि इनका रंग भी काला हैं। ऐसे तो मैं आपको अच्छी तरह से जानता हूं कि आप बिहार के प्रति कितने ईमानदार है। अगला जब 2014 का लोकसभा चुनाव होगा तो आपकी सारी हेकड़ी निकल जायेगी और साथ ही आपके साथ चलनेवाले भाजपा और भाजपा के सुशील कुमार मोदी की भी हवा निकल जायेगी, क्योंकि  आपको शायद नहीं पता हैं कि लालू एंड कंपनी को खोने के लिए कम और पाने के लिए ज्यादा हैं, जबकि आपको खोने के लिए ज्यादा और पाने के लिए कम हैं। 
इधर आपकी नरेंद्र मोदी से ज्यादा नाराजगी दीखती हैं। पर सच्चाई ये हैं कि नरेंद्र मोदी ने कभी भी गुजरात के लिए विशेष पैकेज की मांग नहीं की। फिर भी गुजरात प्रगति के शिखर पर हैं, पर आप बिहार के लिए स्पेशल पैकेज की मांग के लिए अधिकार यात्रा पर निकल गये हैं, जबकि सच्चाई ये हैं कि जब बिहार में लालू - रावड़ी का शासन था, तब भी बिहार के लिए विशेष पैकेज की मांग की गयी थी, और आप जब केन्द्र में सत्तासीन थे, तब उसका विरोध किया था, अब विशेष पैकेज की मांग आपने कहां से शुरु कर दी, ये हमारी समझ से परे हैं।
आपने आजकल पूरे बिहार को शराब पीनेवाला प्रदेश बना दिया। जहां मैं रहता हूं वहां गली - गली में शराब बिक रही हैं, गांजा बिक रहे हैं। दूध के स्टाल तक पर शराब बिक रहे हैं, दिक्कत तो ये हैं कि हम अपने बच्चों को कैसे संस्कारित करें, क्योंकि अब तो शराबी, पीकर वो नंगा नाच कर रहे हैं, कि आम महिला आपको कोस रही हैं। कहीं ऐसा नहीं कि इनकी हाय आपको लेकर डूब जाये। फिर भी आपको तीन साल और शासन करने का लाइसेंस मिला हैं, आराम से शासन करते रहिए, नरेंद्र मोदी और भाजपा को धकियाते रहिये, बिहार का नाम डूबाते रहिए, कांग्रेस और सोनिया - राहुल से संबंध मजबूत करते रहिए। हमारा वोट देने का वक्त आयेगा तो हम आपको सत्ता से धकेल जरुर देंगे। फिर उसके बाद आप किसी भी लड़की से काला दुपट्टा उतरवाने का प्रयास तो दूर उधर नजर उठाकर देख भी नहीं पायेंगे।

Tuesday, October 9, 2012

ये हैं भारतीय रेल की चाय और टीटीई की महिमा............

मैं पिछले दिनों पटना और सिंकदराबाद की यात्रा पर था। इस दौरान भारतीय रेल की कई विशेषताओं से दो - चार हुआ। सर्वाधिक दृश्य टीटीई से संबंधित देखने को मिले। वह भी रेल के अंदर और रेल के बाहर भी। सबसे पहले बात रांची जंक्शन की। जब मैं धनबाद में ईटीवी कार्यालय में कार्यरत था। तब बार - बार रांची से धनबाद और धनबाद से रांची आया जाया करता था। उस दौरान मूलतः साप्ताहिक यात्रा हुआ करती थी। हमारे कई पत्रकार मित्र इस दौरान हमसे मिलते और बोकारो - रांची रेल पथ पर एक चाय विक्रेता की चर्चा किये बिना नहीं रुकते। वे बार - बार कहते कि एक चायवाला हैं, जो इस रेल पथ पर चाय बेचता हैं। आवाज लगाता हैं - कि खराब से खराब चाय पीजिये, पर लोग जब उसकी चाय पीते तो वो चाय सबसे शानदार चाय होती। कई पत्रकार मित्रों ने तो उस चायवाले की शान में कई समाचार भी अपने समाचार पत्रों में प्रकाशित किये। हमें भी एक दो बार वो चायवाला उस दौरान मिला था, पर मुझे चाय उतनी पसंद नहीं, इसलिए उसकी चाय पर हमारी ध्यान कभी गयी ही नहीं। पर पिछले दिनों 4 अक्टूबर को जब मैं पटना से रांची की ओर 18623 अप राजेन्द्रनगर - हटिया एक्सप्रेस से रवाना हुआ, तो 5 अक्टूबर की सुबह 6 बजे मुरी के आसपास उक्त चायवाला मिला, जो हमेशा की तरह खराब से खराब चाय पीजिये की रट लगाता हुआ,  मेरे डब्बे से गुजरा। मेरी पत्नी को चाय बहुत ही पसंद हैं। उन्होंने चायवाले को आवाज दी। चायवाला आया और एक कप उनकी ओर बढ़ा दिया। मैंने भी उससे गुफ्तगूं करते हुए कहा कि भाई तुम्हारी चाय तो बहुत ही नामी हैं, कई हमारे पत्रकार मित्र ने तुम्हारी प्रशंसा की हैं। ये कहकर कि तुम बोलते हो, खराब से खराब चाय पीजिये, पर सच में ये चाय बहुत ही अच्छी होती हैं। वह भी खुब प्रसन्न होकर बोला कि हां सर, कई अखबारों में तो उसका समाचार भी छपा हैं। इसी चाय को लेकर, लेकिन पहले वो भैस के दूध का चाय बेचता था, पर अब तो पाकेट वाला दूध का चाय हैं, फिर भी ये चाय आपको और चाय से बेहतर ही मिलेगी। मैंने पूछा कि इसके क्या दाम हैं। उसने कहा - दस रुपये प्रतिकप। मैंने बोला -- ये तुम्हें नहीं लगता कि चाय का दाम जरुरत से ज्यादा हैं। उसने कहा कि हां साहब जरुरत से ज्यादा तो हैं ही, पर क्या करें। ट्रेन में चाय बेचनी हैं तो टीटीई और अन्य लोगों को मुफ्त सेवा देनी ही हैं। ऐसे में उनकी ओर की गयी मुफ्त सेवा का कर, तो आपलोगों से ही वसूलेंगे न। उस चायवाले ने बड़ी ईमानदारी से ये बता दिया कि किस प्रकार टीटीई उससे अपनी रंगदारी वसूलते हैं, और इसका खामियाजा आम यात्रियों को भुगतना पड़ता हैं और सामान्य रेलयात्री टीटीई के चाय का भी अलग से रंगदारीस्वरुप उस चायवाले को भुगतान करते हैं। 
इधर जैसे ही रांची जंक्शन उतरा। तब जल्द से नहा धो. पूजा - पाठ कर, मैं अपने कार्यालय पहुंचा। वहां पता चला कि अपने चैनल की समाचारवाचिका भी रांची जंक्शन के मुख्यद्वार पर कार्यरत टीटीईकर्मियों की कोपभाजन बन गयी हैं। पता चला कि रांची जंक्शन के मुख्यद्वार पर तैनात महिला टीटीईकर्मियों ने इन पर ये आरोप मढ़ दिया कि समाचारवाचिका बेटिकट यात्रा कर रही हैं। जबकि उनके पास टिकट मौजूद थे, ये अलग बात हैं कि उनका टिकट, उस पर्स में था, जिस पर्स को उचक्कों ने ट्रेन के रांची जंक्शन पहुंचने के पहले ही चुरा लिया था। इस बात की जानकारी और प्राथमिकी की रिपोर्ट दिखाने के बावजूद, उक्त महिला टीटीईकर्मियों ने उनके साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया, जिससे वो अभी भी उबर नहीं पायी हैं। सवाल उठता हैं कि क्या किसी भी टीटीई को किसी भी रेलयात्रियों के साथ दुर्व्यवहार करने का हक हैं, गर नहीं तो फिर ऐसा क्यों। क्या इसका जवाब भारतीय रेलवे का कोई अधिकारी दे सकता हैं। समाचारवाचिका बार बार अपना पीएनआर नं., कोच नंबर, बर्थ नं. बता रही थी, पर उक्त महिलाटीटीई, जिनकी संख्या 6-7 बतायी जा रही थी, वो इनकी कोई बात सुनने को तैयार क्यों नहीं थी, कहीं ऐसा तो नहीं कि इनका मकसद सिर्फ ये था कि समाचारवाचिका को कैसे सरेआम बेइज्जत किया जाय, जिसमें वो कामयाब रही। क्या ये शर्मनाक नहीं, क्या किसी रेलयात्री के साथ ऐसा किया जाना चाहिए।
और अब पटना से सिकंदराबाद की........। 27 सितम्बर को हम पटना से सिकंदराबाद की ओर चले। हमारे साथ पांच - छः लोग थे। रेल में सर्विस दे रहे पैंट्री ब्वाय से मेरे साथ चल रहे लोगों ने चाय मांगी। उक्त पैंटी ब्वाय ने पटना जंक्शन पर ही थर्मस से निकालकर पांच - छः चाय सभी को दिये, वो चाय इतनी अच्छी थी कि दुबारा सिकंदराबाद तक पहुंचने के बाद भी वैसी चाय नहीं मिली, क्योंकि अन्य चाय जो दिये जा रहे थे पैंट्री कार के अंदर, वो हम कह सकते हैं कि प्रथम दृष्टया पीनेलायक नहीं थे, मजबूरी में ही पीया जा सकता था। जब हमने नागपुर और वल्लारशाह स्टेशन के बीच, उसी पैँट्री ब्वाय से थर्मसवाली चाय पीलाने को कही तो उसने कहा माफ करे जनाब, ये चाय आपको मिल नहीं सकती, ये खासमखास लोगों के लिए ही हैं। फिर हमने देखा कि वो पैंट्रीब्वाय पास में ही बैठे सात - आठ टीटीई जो वल्लारशाह स्टेशन से जूडे थे, आराम से उन्हें ससम्मान पिलायी और उनसे पैसे भी नहीं लिये। जब मैंने उससे पूछा कि हमलोगों ने तुमसे चाय मांगी, वह भी पैसों से तो तुमने नहीं दी, इन्हें बिना पैसे के कैसे चाय दे दिये। उसने कहा कि जनाब हमारी मजबूरी समझे, आपको तो एक दो दिन सफर करना हैं, हमें तो इनके साथ इस रास्ते पर बराबर चलना हैं। मैं समझ गया - भई अपनी अपनी किस्मत हैं। भारतीय रेल में किसी को बिना पैसे की अच्छी चाय मिल जाती हैं और किसी को पैसे देने पर भी नहीं मिलती और जिन यात्रियों को मिलती भी हैं तो वे दूसरे की चाय के पैसे का भी भुगतान कर देते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता। ये हैं भारतीय रेल की चाय और टीटीई की महिमा............

Saturday, September 22, 2012

हमारे प्रधानमंत्री डायलॉग बहुत अच्छा बोल लेते हैं......................

ल यानी 21 सितम्बर 2012 को अपने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का हिंदी में भाषण सुनने को मिला। आमतौर पर अंग्रेजी में बोलनेवाले मनमोहन सिंह को शायद ये परमज्ञान हो गया होगा कि यहां की जनता अंग्रेजी थोड़ा कम जानती हैं, इसलिए हिंदी में पहले और बाद में उन्होंने अंग्रेजी का सहारा लिया, हालांकि आम तौर पर देखा गया हैं कि जब अंग्रेजी में ये बड़े बड़े महानुभाव भाषण दे देते हैं तो इनके भाषण का हिंदी अनुवाद ये कहकर पेश नहीं किया जाता कि उनके हिंदी भाषण को पढ़ा हुआ मान लिया जाय, और लोग पढ़ा हुआ मान लेते हैं। ऐसे भी, मेरा ये विषय भी नहीं कि उन्होंने किस भाषा में भाषण दिया, क्योंकि ये महाशय अपने देश की सम्मान के प्रति कितना गंभीर हैं, वो देश की जनता जानती हैं।
अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को अभी एफडीआई की जरुरत हैं। उन्होंने बड़ी ही बेशर्मी से ये भी कहा कि 1991 में जब आर्थिक सुधार कार्यक्रम देश में शुरु किये गये तो यहीं लोग जो आज विरोध कर रहे थे, उस वक्त भी विरोध करना शुरु किया था, पर आज उसका क्या फायदा मिला, सभी को ज्ञात हैं। उन्होंने ये भी बड़े बेशर्मी से कह दिया कि देश के ज्यादातर हिस्सों में ज्यादातर लोग एक साल में छह सिंलिंडर से ही काम चला लेते हैं, पर ये नहीं बताया कि उनके ( प्रधानमंत्री के ) घर में कितने सिलिंडर, एक साल में खर्च होते हैं। कल के भाषण में इतना तो स्पष्ट हो गया कि हमारे प्रधानमंत्री डायलॉग बहुत अच्छा बोल लेते हैं। इसलिए हम तो यहीं चाहेंगे कि जैसे उन्होंने ब्यूरोक्रेट में रहकर अपनी पोजीशन ठीक की। राजनीति में हाथ पांव मारकर बिना किसी लोकसभा चुनाव जीते, प्रधानमंत्री बन गये। अब उन्हें फिल्मी दुनिया में भी हाथ अजमाना चाहिए, निःसंदह वे तीनों शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान को परास्त कर सुपर स्टार बन जायेंगे और इस प्रकार से एक रिकार्ड भी बना लेंगे, कि एक व्यक्ति जो हर जगह फिट हैं, वो सिर्फ और सिर्फ मनमोहन हैं। बेचारे प्रधानमंत्री ऐसे तो बहुत कम बोलते हैं, कम बोलने का रिकार्ड भी उन्ही के पास हैं, जब ममता बनर्जी ने जैसे ही एफडीआई मुद्दे पर, केन्द्र से अपना समर्थन वापस लिया, उनका मुंह खुल गया और जनता से सहयोग मांगने लगे।
इधर कल तक एफडीआई के विरोध में भारत बंद में शामिल होनेवाली समाजवादी पार्टी, जिसका चरित्र सदैव संदिग्ध रहा हैं। उसके बड़े नेता मुलायम सिंह यादव, सोनिया गांधी के चरण कमल पर लोटने के लिेए मजबूर हो गये। याद रखिये ये वहीं मुलायम हैं जो दो दिन पहले कोलकाता में कांग्रेस को कोस चुके हैं। ये वहीं मुलायम हैं जिनकी जीभ प्रधानमंत्री पद के लिए हमेशा लपलपायी रही हैं। ये वहीं मुलायम हैं, जिन्होंने अपने पुरे खानदान को राजनीति में घुसाकर, उन्हें अनुप्राणित किया हैं। ये वहीं मुलायम हैं, जिन्हें वामपंथी नेता एबी वर्द्धन, एनसीपी के कई नेता, थर्ड फ्रंड की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में देर तक नहीं की हैं, और उतनी ही जल्दी, इस नेता यानी मुलायम ने कांग्रेस के गोद में बैठने में अपनी पुरुषार्थ दिखा दी। ये कहकर कि वे नहीं चाहते कि देश में सांप्रदायिक शक्तियां मजबूत हो। यानी देश मुलायम की जातिगत राजनीति के कारण और कांग्रेस की गलत आर्थिक नीतियों के कारण भले ही भाड़ में चला जाये, पर मुलायम  और सोनिया की बादशाहत किसी भी प्रकार से कम नहीं होने चाहिेये। ये हैं हमारे देश के नेताओं का दोहरे चरित्र को उजागर करती आज की राजनीति। ऐसे ऐसे नेता, हमारे देश को महान बनाने के लिए, आजकल पैदा लिेए हैं, जो देश को अमरीका और अन्य देशों के हाथों गिरवी रखकर, उऩके उपनिवेश शासक के तौर पर खुद को प्रतिष्ठित करने का सपना देख रहे हैं। क्या होगा, इस देश का, जहां ऐसे ऐसे घटिया स्तर के नेताओं की फौज आज विद्यमान हैं।
कल हमारे प्रधानमंत्री ये भी बोले कि अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों में आयी आर्थिक मंदी का असर भारत में भी देखने को मिला हैं, पर हमारे उपर उतना बोझ नहीं पड़ा हैं। मैं कहता हूं की गर नहीं पड़ा तो डीजल का भाव क्यों बढ़ा दिया। यहीं नहीं हमारे प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में डीजल का उपयोग बड़े बड़े अमीर करते हैं, क्या देश के खेतों में काम करने वाले किसानों और खेतिहर मजदूरों के डीजल पंपिंग सेट, पेट्रोल पर चलते हैं। क्या हमारे देश के सारे के सारे किसान अमीर हो गये। क्या प्रधानमंत्री का इस प्रकार दिया गया बयान करोंड़ों किसानों के मुंह पर तमाचा नहीं हैं। प्रधानमंत्री जी, आम जनता से सहयोग मांगते हो, कठोर फैसले लेने की मजबूरी का हवाला देते हो, और खुद तुम्हारे मंत्रिमंडल के लोग जनता की गाढ़ी कमायी के अरबों - खरबों रुपये लूटकर विदेशों में जमा कर दे रहे हैं, साथ ही लूटने का क्रम जारी भी हैं। उस भ्रष्टाचार पर आप अंकुश नहीं लगाते और आम जनता को देश के लिए जीने की दुहाई देते हो यानी हम जिंदगी भर देश के लिए सब कुछ लुटाते रहे और आप जिंदगी भर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर शान बघारते रहो और अंत में तिंरगा को लपेटकर, अपने सैल्यूट भी मरवाओ। क्या बात हैं। ये सिर्फ, इसी देश भारत में होता हैं और कहीं नहीं। दूसरा देश होता तो स्थिति कुछ और होती। बगल में चीन हैं -- देख लो। तुम्हारी - हमारी सदैव औकात बताता हैं और हमारी इतनी भी ताकत नहीं कि उसकी औकात बता दें। पूरा देश चीनी माल से अटा पटा हैं। मैं पूछता हूं हमारे प्रधानमंत्री ये तो बताये कि चीन के किस नगर में, मेरे देश की बनी सामग्रियां बिकती दिखायी दे रही हैं, गर नहीं तो इसके लिए जिम्मेवार कौन हैं। पिछले 65 सालों में दस साल निकाल दें तो कांग्रेस की ही सरकार रही हैं, और इस देश का बंटाधार कांग्रेस और इसको सहयोग करनेवाली पार्टियां के सिवा किसी और ने नहीं किया। ऐसे में आम जनता, आप के इस लल्लो - चप्पो वाली भाषण पर विश्वास क्यों करे। आप प्रधानमंत्री हैं -- 2014 तक आपको मिला हैं, शासन करने को। करते रहिये, देश को विदेशियों के हाथो लूटवाते रहिये। आगे देखते हैं कि 2014 के बाद कोई देश से प्यार करनेवाला सहीं व्यक्ति मिलता हैं या नहीं, जो प्रधानमंत्री पद पर रहकर, देश का सम्मान बढ़ा सके।

Saturday, September 15, 2012

शर्मनाक, हमारे नेताओं ने देश को बाजार बना दिया.............................

एक सवाल -------
1. भारत के प्रधानमंत्री व उनके मंत्रिपरिषद् से,
2. कांग्रेसियों से,
3. कांग्रेस के पिछलग्गू पार्टियों व अन्यान्य संगठनों से, तथा
4. कांग्रेस भक्त पत्रकारों से.
जब देश को बाजार ही बनाना था, तो 1947 के पूर्व भारत के अमर स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त क्यों कराया, अंग्रेज तो वहीं कर रहे थे, जो आज की हमारी सरकार आजादी के 65 साल बाद करने के लिए बेकरार हैं। जब मैट्रिक का मैं विद्यार्थी था, उस वक्त रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी देखने को मिली। इस गांधी फिल्म में एक दृश्य हैं -- जिसमें एक अंग्रेज, स्वतंत्रता सेनानियों पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहता हैं कि तुम जो स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हो, क्या तुम इस स्वतंत्रता को बचाकर रख पाओगे, कुछ ही साल बाद तुम गुलाम हो जाओगे। वह संवाद, अक्षरशः हमे आज सत्य दिखता हैं। हमारी मनमोहन सरकार, थाल में सजाकर अपने देश भारत को, विदेशियों के आगे रख दिया कि वे आये और देश का मान मर्दन करें, अपने देश में बने विदेशी सामानों को भारत की छाती पर रखकर, भारत को ही बर्बाद कर दे, और इस कार्य में दिल खोलकर सहायता कर रहे, वे चारों जिससे हमने सवाल पूछे हैं -------------
आज सुबह सभी कांग्रेस भक्त मीडिया बंधुओं ने एक समाचार प्रकाशित किया हैं, जिसमें उन्होंने एफडीआई की केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी और उसके फायदे को प्रमुखता से छापा हैं, पर सच्चाई क्या हैं, आजादी के बाद से लेकर आज तक वह किसान-मजदूर और वो देशभक्त परिवार महसूस कर रहा हैं, जो इस देश से सच्चा प्यार करता हैं। हमें तो कभी - कभी अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर तरस आती हैं, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राहुल और सोनिया के इशारों पे हमेशा ता-ता-थै-या करते नजर आते हैं। विदेशी शासकों के प्रमुखों के साथ इनकी जब फोटो दिखती हैं तो इनका दब्बूपन व कायरता साफ झलकता हैं। संसद में जब ये बोल रहे होते हैं तो इनकी आवाज सिंह सी नहीं, बिल्ली सी प्रतीत होती हैं।
14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के दिन, इनकी कृपा से विदेशी ताकतों के आगे झूकनेवाले भारतीय नहीं, बल्कि उन देशभक्त भारतीय परिवारों पर दो बम फटे, जिनकी जिंदगी सिर्फ भारत पर शुरु होती हैं और भारत पर ही खत्म हो जाती हैं। इस मनमोहन सरकार ने भारतीय किसानों की जिंदगी तबाह कर दी, डीजल का दाम 5.90 रुपये बढ़ाकर और मध्यम वर्गीय परिवारों को ये बताकर कि अब आपको मात्र साल में 6 सिलिण्डर मिलेंगे, सब्सिडी पर, इसके बाद आपको अपनी जरुरत पूरी करने के लिेए एक सिलिण्डर के 750 रुपये देने पड़ेंगे। साथ ही यह भी कह डाला कि देश अभी गंभीर संकटों से जूझ रहा हैं और इसके लिए कड़े फैसले सरकार को लेने पड़े हैं। इसलिए ऐसे हालात में देशवासियों को समान रुप से संकट झेलने को तैयार रहना चाहिए, यानी जिसकी रोज की आमदनी 26 रुपये और जिसकी रोज की आमदनी दस हजार रुपये हैं, सभी एक जैसी समस्याएं झेले। हैं न हैरानी वाली बात। हाल ही में मैंने अखबारों में पढ़ा कि हमारे प्रधानमंत्री की जमा राशि मात्र एक साल में दोगुणी हो गयी, जबकि मैंने जिन बैंकों में पैसे डाले हैं वो आज तक एक क्या पांच साल में भी  दोगुणे नहीं किये। शायद हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास अलादीन के चिराग होंगे, जिससे वे अपनी आर्थिक स्थिति जब चाहे दोगुणे या पांच गुणे कर लेते होंगे। काश प्रधानमंत्री जी वहीं अलादीन के चिराग, संपूर्ण देश के नागरिकों को दे देते तो कितना अच्छा होता। कांग्रेस की ही नेता हैं -- शीला दीक्षित जो दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं, बड़ी बेशर्मी से बयान देती हैं कि ठीक हैं सिलिण्डर व डीजल के दाम बढ़ गये, पर लोगों की सैलरी भी तो बढ़ी हैं, तो मैं पूछता हूं कि हे शीले, ये बताओ कि देश में कितने लोग सैलरी पर जीवित हैं, गर नहीं तो तुम ऐसी घटिया स्तर का बयान क्यों दी। ऐसे भी इन कांग्रेसियों के बयान को देखेंगे तो पायेंगे कि इनके बयान गैरजिम्मेदाराना, बेहूदापन और घटियास्तर से भरे होते हैं। उदाहरण के लिए कपिल सिब्बल, मणीष तिवारी और दिग्विजय सिंह के बयानों को आप देख सकते हैं। 
ऐसे तो पूरे देश में विपक्षी दल भी इस डीजल की मूल्यवृद्धि, सिलिण्डर में सब्सिडी की कटौती पर हाय तौबा मचा रहे हैं, हो सकता हैं कि कांग्रेस की सरकार सोची समझी रणनीति के तहत एक - दो रुपये डीजल का दाम घटा दे या इसी तरह की निर्णय सिलिण्डर पर भी कर दें पर जरा सोचिये आज इस देश की ऐसी हालत किसने की। आखिर देश के सभी नेताओं के पास बेतहाशा दौलत कहां से आये, गर आ भी गये तो ये बेतहाशा दौलत इन्होंने कहां छुपा रखा हैं। आखिर देश आर्थिक संकट से जूझ रहा हैं तो इनमें त्याग की भावना क्यों नहीं, ये क्यों नहीं अपने काले धन को भारत में लाकर, भारत को आर्थिक शक्ति बना देते हैं। सच्चाई तो ये हैं कि हमारे देश के नेताओं की जमीर मर चुकी हैं। ये अपने खानदान को सांसद बनाते हैं, देश व राज्य की बागडोर सौपते हैं। इनके खानदान विदेशों में अपने लिए शान की जिंदगी जीने के लिेए विलासिता संबंधी वस्तुओं का उपयोग करते हैं और देश की जनता को जाति व सांप्रदायिकता की आग में झोंक कर अपना उल्लू सीधा करते हैं, और देश की जनता पर जब इस प्रकार के बम फूंटते हैं तो जनता कराहने के सिवा कुछ नहीं कर पाती।
कमाल हैं, अपनी सरकार मंगल ग्रह पर उपग्रह भेजने की बात करती हैं। मिसाइल बनाने की बात करती हैं, प्रक्षेपास्त्र छोड़ने की बात करती हैं, पर सच्चाई ये हैं कि यहां की 90 प्रतिशत जनता पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का शासन चलता हैं, सच बात तो ये हैं कि ये कंपनियां गर भारत से हाथ खींच ले तो यहां की जनता पागलों की तरह अपने बालों को नोंच रही होगी, क्योंकि इनके बालों में शैम्पू से लेकर, इन्हें नहलाने, कपड़े धोने, दांत साफ करने, यहां तक की शौचालय में हाथ धुलाने का काम इऩ्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ले रखा हैं और ये सब देने हैं कांग्रेस की। उस कांग्रेस की, जिसमें महात्मां गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, सरदार पटेल जैसे नेताओं की भागीदारी रहीं, दुर्भाग्य उस कांग्रेस में सोनिया, राहुल, शीला, मनमोहन, दिग्विजय जैसे घटिया स्तर के नेता हैं। अरे महात्मा गांधी को नाथुराम गोडसे ने एक बार मारा, पर गांधी को, उनके विचारों को सर्वाधिक हत्या किसी ने की, तो वह और कोई नहीं ये कांग्रेसी ही हैं। आज स्वतंत्रता के बाद गांधी और बिनोवा के विचारों को अपनाते हुए, ग्राम स्वराज्य की बात पर अमल की गयी होती, तो देश आज बाजार नहीं बनता।
आज सारा देश जब कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण कराह रहा हैं तो देश की युवा पीढ़ी और देशभक्त जनता को चाहिए कि कांग्रेस से अपना नाता तोड़े और ईमानदारीपूर्वक जीवन व्यतीत करे। एफडीआई हमारे सरकार की मजबूरी हो सकती हैं, पर हमारी मजबूरी नहीं। आराम से स्वदेशी वस्तूओ का उपभोग करें, जब विकल्प न मिले तो विदेशी वस्तुओ का उपयोग करें। जो नेता या पार्टियां या मीडिया हाउस विदेशी वस्तूओं का उपभोग करती हैं या विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती हैं, उसका बहिष्कार करें। उनका स्पर्श किया हुआ सामग्रियों का भी परित्याग करें। याद रखे, देश है तो आप हैं, देश नहीं तो कुछ नहीं। बड़ी त्याग और बलिदान से हमारे पूर्वजों ने देश को स्वतंत्र कराया हैं, कृपया अपने देश को बाजार बनने न दे, हांलांकि देश के सर्वोच्च संस्थाओं पर बैठे हमारे नेताओं ने देश को गुलाम बनाने के लिेए कोई कसर नहीं छोड़ रखी हैं, फिर भी एक और लड़ाई लडने के लिेए स्वयं को तैयार रखे और इस बार की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा खतरनाकर होगी, क्योंकि दुश्मन अब अपने घर में भी एक नहीं, अनेक हैं......................................

Tuesday, September 11, 2012

अर्जुन मुंडा सरकार के दो साल......................

अर्जुन मुंडा सरकार के दो साल हो गये। उस सरकार के दो साल हुए, जिस सरकार में शामिल दलों में आपसी समन्वयता हैं ही नहीं। इस सरकार की यहीं सबसे बड़ी प्रमुख बात हैं। सांप्रदायिकता के नाम पर भाजपा को हरदम गाली देनेवाली झामुमो और निरंतर सत्ता के निकट गणेश परिक्रमा करनेवाली आजसू जैसी दलों की खिचड़ी सरकार ने जैसे तैसे दो साल पूरे कर लिये हैं। ये सचमुच बड़ी बात हैं। कहने को एक बार फिर अर्जुन भक्त पत्रकार व मीडिया वहीं कह रहे हैं, जो एक साल पहले कहा था, यानी उनके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं हैं, इसलिए वे कहेंगे क्या। निरंतर सरकारी विज्ञापनों की चाहत ने उन्हें सत्य बात लिखने और बोलने से रोका भी हैं, पर हम अपनी क्या कहें, कहे बिना और लिखे बिना रुक नहीं सकता, इसलिए मन किया, लिख रहा हूं. जनता निर्णय करें, सत्य क्या हैं और असत्य क्या हैं।
एक बार फिर एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक ने लिखा हैं कि पंचायत चुनाव और राष्ट्रीय खेल इस सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि हैं, पर सच्चाई ये है कि ये दोनों उपलब्धि पिछले साल की हैं, न कि इस साल की। हुआ तो ये हैं कि सरकार ने पंचायत चुनाव तो कराये पर पंचायतों को अधिकार ही नहीं दिये, यानी शादी तो कराया पर दुल्हा-दुल्हन का मिलन ही नहीं कराया, जब दुल्हा-मिलेंगे ही नहीं तो फिर ये शादी हो या नहीं, क्या फर्क पड़ता हैं, आज भी पंचायत प्रतिनिधि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, कुछ दिन पहले तो इन्होंने झारखंड बंद का ऐलान भी किया, जिसका असर भी देखने को मिला, पर सरकार के उपर जूं तक नहीं रेंगी।
राष्ट्रीय खेल करानेवाली मुंडा सरकार से पूछिये कि पिछले साल की उपलब्धि, इस साल भी गिनाने में लगे हैं तो ये बताये कि इस साल उन्हीं पिचों व मैदानों पर खेल का कौन सा राष्ट्रीय आयोजन हुआ। सच्चाई ये हैं कि इन खेल स्टेडियमों में आशा नाइट व आयटम सांग गानेवाली कलाकारों का जमावड़ा हो रहा हैं या इन स्टेडियमों का वे लोग यूज कर रहे हैं जो किसी न किसी क्षेत्र में पावर रखते हैं और इन पावरों का यूज कर अपने - अपने लिए इन स्टेडियमों को यूज कर रहे हैं। इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या हो सकती हैं।
इस साल मुख्यमंत्री दुर्घटनाग्रस्त हुए, ईश्वरीय कृपा बाल - बाल बच गये, उन्हें कुछ भी नहीं हुआ। ईश्वर को इसके लिेए कोटि कोटि धन्यवाद, पर एक सवाल मुंडाजी से भी कि ऐसी हालात में वे रिम्स न जाकर अपोलो क्यों गये, क्या उनकी इलाज रिम्स में बेहतर ढंग से नहीं हो सकती थी, गर वे अपोलो के बदले रिम्स जाते तो रिम्स की विश्वसनीयता में चार चांद लगता और यहां के डाक्टरों और यहां इलाज कराने आये मरीजों और उनके परिवारों का मनोबल भी बढ़ता, वे ये कहते कि हमारा मुख्यमंत्री भी वहीं इलाज कराता हैं, जहां सामान्य लोग जाते हैं, कितनी बड़ी बात होती। 
इसी साल मुख्यमंत्री ने अपने विशेषाधिकार से उन पत्रकारों को अपने विशेषाधिकार से लाखों रुपये दे डाले, जो उनकी आरती उतारने में लगे रहते हैं, वह भी फैलोशिप और लाइफटाइम एचीवमेंट के नाम पर। पत्रकारों ने लिया भी। एक ही परिवार से कई लोग उपकृत भी हुए, पर क्या ऐसे फैलोशिप और लाइफटाइम एचीवमेंट का पुरुस्कार लेने व देने से झारखंड का सम्मान बढ़ गया या हम वहीं ढाक के तीन पात पर विचरण कर रहे हैं। 
सच्चाई तो ये हैं कि इस प्रकार की आरती उतारने और उतरवाने की परंपरा को त्यागकर स्थानीयता नीति पर सरकार जल्द से जल्द कुछ ठोस प्रयास करती। पड़ोसी छतीसगढ़  स्थानीयता नीति स्पष्ट कर दिया पर झारखंड में देखिए, पिछले साल एक कमेटी बनती हैं और वो कमेटी दो साल में एक बार मीटिंग करती हैं और उस मीटिंग में भी कुछ निकल कर नहीं आता। क्या ये शर्मनाक नहीं हैं।
इस सरकार में शामिल दलों के नेताओं और यहां के अधिकारियों ने एक काम बहुत अच्छा किया कि वे जनता के पैसों से जर्मनी, इंग्लैंड और अमेरिका का खुद दौरा किया, वह भी स्टडी टूर के नाम पर और पता नहीं क्या क्या। पर उस स्टडी टूर का कितना फायदा मिला वो तो मैं झारखंड की राजधानी रांची समेत कई जिलों की स्थिति देखकर आनन्दित हो जाता हूं। अपने ही लोगों के माथे पर सर रखकर कैसे विकास के नाम पर, उस जमीन को औने पौने दाम पर देश के उद्योगपतियों को जमीन शिफ्ट कर दी जाती हैं, इसे देखकर हमें हैरानी होती हैं, पर इसके लिए, सिर्फ अर्जुन मुंडा को ही दोषी ठहराना मै उचित नहीं समझता, क्योंकि इसके लिए पक्ष व विपक्ष दोनों जिम्मेदार हैं, पर वर्तमान सरकार इतना तो जरुर कर सकती थी कि वो ऐसे कृत्यों पर लगाम लगाती। 
राजधानी रांची तो नर्क लगता हैं, किसी भी प्रकार से ये राजधानी लगता ही नहीं। सारा का सारा नगर तबेला नजर आता हैं। प्रतिदिन जाम, जल जमाव, अव्यवस्थित बाजार इसकी शोभा बन गयी हैं, जबकि राजधानी किसी भी प्रांत का दर्पण हैं, पर इसकी शोभा कैसे बढ़े, इस पर किसी का भी ध्यान नहीं हैं। राज्य की राजधानी रांची में यहां वरीय पुलिस अधिकारियों का काम रह गया हैं -- छोटे छोटे चोरों को पकड़ना और अपनी फोटो खींचवाकर, अखबारों व इलेक्ट्रानिक मीडिया में दिखलाना, जबकि इसी रांची से कई आतंकी, दूसरे राज्यों की पुलिस पकड़कर, अपने यहां ले जा चुकी हैं, ये शैली हैं - यहां की पुलिस के काम करने की और इन पुलिस पर सरकार का कुछ भी नहीं चलता। यानी यहां किसकी सरकार हैं, कैसी सरकार हैं, पता ही नहीं चल रहा, फिर भी दो साल इस सरकार ने पूरे कर लिए, चलिए हम सब मिलकर, इस सरकार की जय बोले.....क्योंकि अर्जुन तो अर्जुन हैं, वो अपने तरकस में हर प्रकार के बाण रखे हैं, जो समय समय पर यूज करता रहता हैं, हो सकता हैं कि एक दिन उसके तरकस से ऐसा भी बाण निकले, जिससे झारखंड की सारी समस्याओं का ही अंत हो जाय, इसलिए हम उस दिन का इंतजार करें, साथ ही इस सरकार के मनोबल को भी बढ़ाये, इन आशाओं के साथ की आनेवाले समय में कुछ न कुछ नया अवश्य होगा...................

Monday, September 10, 2012

यूपी में ब्राह्मणों की कोई मदद न करें, समाजवादी पार्टी का ऐलान....................

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी बहुमत है। ये वहीं पार्टी हैं जिसके स्वयंभू अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव हैं। जिनका समाजवाद अपने परिवार से शुरु होता हैं और अपने परिवार पर ही खत्म होता हैं। जिन्होंने अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाया, खुद लोकसभा में सांसद हैं, अपने बहू को भी सांसद बनवा दिया हैं साथ ही अपने रिश्तेदारों को भी उपकृत किया हैं। फिलहाल इन्होंने और इनके बेटे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पूरे प्रदेश में ऐलान किया हैं कि उनकी पार्टी के विधायक ब्राह्मणों की कोई मदद नहीं करें, क्योंकि ब्राह्मणों ने पिछली बार बहुजन समाज पार्टी को वोट दिया था और ऐसे भी ये वर्ग मुलायम सिंह यादव यानी उनके परिवार की पार्टी के पक्ष में मतदान नहीं करता। इसका खुलासा  इन्हीं के पार्टी के एक विधायक जो सुलतानपुर जिले के इसौली विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से जीते हैं। जिनका नाम अबरार अहमद हैं, ने की हैं। ये खुलासा अबरार अहमद ने उस वक्त की, जब ब्राह्मणों का एक प्रतिनिधिमंडल अबरार अहमद से मिला। जिसने ताल ठोक कर कहा कि वो मुसलमान हैं और मुसलमानों के वोट से जीतकर आया हैं, कुछ हिंदु जाति के बैकवर्ड लोगों ने वोट दिया इस आधार पर वो चुनाव जीता, इसलिए वो ब्राह्मणों की कोई मदद नहीं करेगा। जब भी मदद करेगा तो वह मुसलमानों की मदद करेगा, क्योंकि वो मुसलमानों की वोट से जीतकर आया हैं, ऐसे भी उसके प्रदेश के नेता, पार्टी के नेता ब्राह्मणों की कोई मदद नहीं करे, इसकी घोषणा कर दी हैं, इसलिए अब तो ब्राह्मण भूल जाये कि यूपी में उनका कोई तारणहार भी हैं। 
संविधान कहता हैं या जब कोई जनप्रतिनिधि विधायक बनता हैं तो वह शपथ लेता हैं कि वो बिना किसी भेदभाव के सारे लोगों की समस्याओं को सुनेगा और अपनी सेवा देगा, पर जब एक विधायक अपनी ही पार्टी के मुखिय़ा के इशारों पर काम करते हुए एक वर्ग के खिलाफ विषवमन करता हो तो इसे आप क्या कहेंगे। ऐसे भी उत्तर प्रदेश में गुंडागर्दी, व्यभिचार और अपराध सामान्य सी बात हैं और इन सारे घटनाओं को कौन अंजाम देता हैं, ये भी बात किसी से छुपी नहीं हैं। अखिलेश के कुर्सी पर पहुचते ही ये सारे लोग प्रसन्न हैं, क्यूं प्रसन्न हैं, कारण स्पष्ट हैं, अपनी सरकार हैं, अपने लोग हैं, खुलकर गुंडागर्दी करो, विषवमन करो, राज्य में सरकार अपनी, केन्द्र में भी ढुलमुल सरकार, जिसे समय समय पर समाजवादी पार्टी की जरुरत पड़ती हैं तो भला, उन्हें कौन रोकेगा, सच्चाई यहीं भी हैं।
इन समाजवादियों को भाजपा में सांप्रदायिकता दिखाई पड़ती हैं, पर इनके द्वारा फैलायी जा रही जातियता व साँप्रदायिकता कितनी खतरनाक हैं, वो किसी को दिखाई नहीं देता। पत्रकारों में भी बहुत सारे ऐसे वर्ग हैं जो कांग्रेस भक्त होने के साथ साथ मुलायम भक्त भी हैं, जिन्हें ये सब दिखाई नहीं देता। इन्हें तो सारी अच्छाईयां मुलायम और अखिलेश में ही दिखाई देते हैं, कारण कि इन पत्रकारों को उनके हक का हिस्सा आराम से पहुंचा दिया जाता हैं। इसलिए ये फिलहाल अपने हृदय में ऊं मुलायमाय नमः अथवा ऊं अखिलेशाय नमः का अक्षरशः जाप कर रहे हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में माई (मुस्लिम - यादव गठजोड़ ) समीकरण इस प्रकार आगे आया हैं कि इस आंधी से इस पार्टी ने पूरे प्रदेश के भाईचारे व एकता को प्रभावित कर दिया हैं। कम से कम हाल ही में सत्ता से बेदखल बसपा के शासनकाल  में ऐसी स्थिति नहीं थी। आश्चर्य इस बात की हैं सत्ता के मद में ये दोनों समुदाय के लोग इस प्रकार से अऩ्य लोगों के जीवन को रौंद रहे हैं, जिससे लगता हैं कि यहां जीना दूभर हो गया हैं और एक बार फिर उत्तर प्रदेश जंगल राज की ओर बढ़ गया। साथ ही ये जंगल राज तब तक चलेगा, जब तक पांच साल के लिेए इन्हें मिला निबंधन पत्र की अवधि समाप्त नहीं हो जाती। 
जो लोग लालू के शासन को बिहार में देखे हैं, साथ ही लालू का वो शासन का रसास्वादन करना चाहते हैं तो फिर उन्हें यूपी का रुख कर लेना चाहिए। सब कुछ वैसा ही हैं। नया कुछ भी नहीं हैं। और ये मानकर चलिए कि इन पांच सालों में वो सब कुछ होगा, जिसे एक सभ्य समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता। ऐसे भी इधर ब्राह्मणों को गालियां देना इस देश में फैशन हो गया हैं। हिंदू समाज तो गालियां देता ही हैं अब मुस्लिमों की भी बन पड़ी हैं, वे भी मुलायम और अखिलेश जैसे नेताओं के इशारे पर गालियां देते हैं। कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को मार मार कर वहां का मुस्लिम समुदाय भगा दिया, पर मुलायम और अखिलेश को उनका दर्द सुनायी नहीं पड़ता, क्योंकि इन्हें तो ब्राह्मण वोट नहीं देता, भला ये ब्राह्मणों की क्यों सोचे। ये दलितों की भी क्यों सोचे, क्योंकि ये दलित तो बसपा को वोट देते हैं। ये तो सिर्फ यादवों और मुस्लिमों की वोट से जीतकर आये हैं, इसलिए पांच साल तक यादवों और मुस्लिमों की बल्ले बल्ले........। जहां के नेताओं की इस प्रकार की घटिया सोच होती हैं उस देश का किसी भी काल में भला नहीं हो सकता वो हमेशा ही गुलाम था, गुलाम हैं और गुलाम ही रहेगा, क्योंकि गुलामी तो मानसिकता में होती हैं और वो गुलामी मानसिकता तो आज भी बाप -बेटे और उनके चाचा आजम खान में दिखाई पड़ ही जाती हैं। इसलिए हे अखिलेश, हे मुलायम, हे आजम। जमकर यूपी का बंटाधार करो, तुम्हारे लोगों ने पांच साल की रजिस्ट्री तुम्हारे नाम से कर दिया हैं और हां याद रहे बिहार और गुजरात की तरह, यूपी को विकास के पथ पर मत लाना, क्योंकि गर तुमने ऐसा किया तो तुम्हारी नाक कट जायेगी।

Saturday, August 18, 2012

भारत के मुसलमानों में गुस्सा जायज या नाजायज....................

भारत के मुसलमानों में गुस्सा हैं, वह भी रमजान के महीने में, कहा जाता हैं कि ये महीना बड़ा ही पाक होता हैं। इस महीने में गुस्सा कहीं से भी जायज नहीं हैं, बल्कि ये समय खुदा से नेह लगाने का होता हैं, पर बेचारे क्या करें, वे गुस्से में हैं और इस गुस्से में वे, वो सारे काम कर रहे हैं, जिसकी जितनी भी निंदा की जाय कम हैं। ये मुंबई के आजाद मैदान में इकट्ठे होते हैं और अमर जवान के शिलाखंड को पैरों से रौंदते हैं। मीडिया के ओबी वैन को आग के हवाले कर देते हैं। रांची में ये दुकानों में तोड़ - फोड़ करते हैं तथा यहां के लोगों को भयाक्रांत करते हैं। उत्तर प्रदेश में भगवान महावीर की प्रतिमा को तो़डते हैं और राह चलती महिलाओं के कपड़े फाड़ते हैं और ये सब होता हैं असम में बांगलादेशी घुसपैठियों को समर्थन देने के नाम पर। जब ये कुकर्म कर रहे होते हैं तो इन कांग्रेसशासित अथवा कांग्रेस समर्थित पार्टियों की सरकारें इनका मनोबल बढ़ाने के लिए सहयोग भी करती हैं ताकि सांप्रदायिक सौहार्द बनी रहे। कमाल हैं असम में बांगलादेशी घुसपैठियों ने असम के नागरिकों का जीना मुहाल कर दिया हैं। वे असम के मूल निवासियों को सहीं से रहने नहीं दे रहे,  इसकी चिंता उन्हें नहीं हैं, पर जिस प्रकार से असम के आदिवासी अपने अधिकारों का हनन होता देख, उनका विरोध कर रहे हैं, तब ये उन असमियों पर आग बबूले होकर, पूरे भारत को सांप्रदायिकता की आग में झोंक देना चाहते हैं। वे भारत में रहकर म्यामांर की घटना से भी दुखी हैं साथ ही इसके लिए वे भारतीयों को सबक सीखाने से नहीं चूक रहे...................................
पर इन मुसलमानों को इस पर दुख नहीं होता और न ही गुस्सा आता कि
क. कैसे पाकिस्तान में हर महीनें 25-30 हिंदू समुदाय की लड़कियों का बलात्कार और अपहरण किया जा रहा हैं।
ख. कैसे हर महीने हिंदू और सिक्खों की लड़कियों का अपहरण कर उन्हें जबरन हिंदू से मुसलमान बनाया जा रहा हैं जिसका सीधा प्रसारण पाकिस्तान के चैनलों द्वारा किया जा रहा हैं।
ग. कैसे हर दिन पाकिस्तान से हिंदू और सिक्खों की टोली वहां हो रहे अत्याचार से भयभीत होकर भारत लौट रही हैं,  याद रहे हाल ही में 250 हिंदू परिवार पाकिस्तान से भारत लौट आये हैं।
घ. कैसे पाकिस्तान के चैनलों में कार्यरत एंकर और उनके गेस्ट हिंदूओं के खिलाफ एक से एक मुहावरों का प्रयोग करते हैं और हिंदूओं को दोयम दर्जे का अछूत समझते हुए काफिर कहकर पुकारते हैं।
ड. कैसे भारत के ही कश्मीर घाटी में वहां से चुन चुन कर हिंदूओं को निष्कासित कर दिया और आज ये हिंदू भारत के विभिन्न कोने में मारे मारे फिर रहे हैं।
बात अब यहां ये हैं कि पाकिस्तान से मार खाकर हिंदू भारत आ गये, कश्मीर से मार खाकर भारत के हिंदू बहुल क्षेत्रों में जीवन बसर कर रहे हैं, कल ये हिंदू जब अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जायेंगे तो फिर ये कौन से मुल्क में जाकर बसेंगे, जब यहां के मुसलमान, इन हिंदूओं पर अत्याचार करना शुरु करेंगे। आज हिंदू बहुसंख्यक इलाकों में इनके तेवर ऐसे हैं, तो जब ये बहुसंख्यक होंगे तो ये क्या करेंगे। जिस बांगलादेश को भारत ने स्वतंत्र कराया, वहीं बांगलादेश अब भारत को निगलने के लिए तैयार हैं। वहां हो रहे जनसंख्या विस्फोट से भारत के अनेक राज्य प्रभावित हैं तो जब भारत में जनसंख्या विस्फोट होगा, उसका क्या होगा।
संसद में असम को लेकर चर्चाएं हुई हैं, उस चर्चा में लालू प्रसाद यादव जैसे घटिया स्तर के नेता की बातें मसखरें टाइप होती हो और जहां ऐसे ऐसे मसखरों की फौज असम समस्या को नहीं समझ पा रही हो तो हम कैसे समझे कि ये बिहार के मसखरे नेता अपने ही प्रदेश यानी बिहार में जो पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया, सहरसा में बांगलादेशियों ने जो हालात पैदा कर दिये हैं, उससे निजात दिलायेंगे, ये तो अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए पैदा हुए हैं,  इन्हें देश से क्या मतलब। पत्नी को मुख्यमंत्री बनवायेंगे और सारी गलतियों के लिए एक कुड़ादान हैं ही -- भाजपा। उसके मत्थे सब पटक देंगे। बिहार तरक्की कर रहा हैं तो इसके लिए लालू यादव और बिहार विनाश के कगार पर तो बस इसके लिए भाजपा।
आश्चर्य इस बात की हैं कि ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर जो नेता या पार्टी देशहित नहीं देखती उसके लिए हम कौन सा शब्द इस्तेमाल करें। समझ में नहीं आ रहा। वोटबैंक की राजनीति ने तो देश को वो कबाड़ा किया हैं कि देश उसका दंश लगता है कि स्वतंत्रता के बाद से आज भी झेल रहा हैं और ये लगता हैं कि जब तक ये देश फिर से गुलाम नहीं हो जाता ये चलता रहेगा। हमें लगता हैं कि देश को गर स्वतंत्र कराने का श्रेय कांग्रेस को जाता हैं तो विनाश का श्रेय भी कांग्रेस को ही जायेगा, क्योंकि जो स्थितियां व परिस्थितियां कांग्रेस ने पैदा कर दिये हैं, उसकी जितनी भी निंदा की जाय कम हैं.
पिछले दो तीन दिनों से पूरे देश में एक एसएमएस ने ऐसा आतंक मचाया हैं कि उससे पूरे ऩार्थ ईस्ट के हमारे भाई बहन परेशान हैं। देश में नासुर बन चुके कुछ पाकिस्तानी और पाकिस्तान बांगलादेशी आंतकी संगठनों ने जो धर्म के नाम पर कोहराम मचाया हैं, उससे पूरा देश आंतकित हैं कि यहां क्या हो रहा हैं। मेरे देश में। पर हमारी कांग्रेस व मनमोहन और उनका समर्थन कर रही अन्य पार्टियों को उससे क्या मतलब। ऐसे हालात में भी ये वोटबैंक की राजनीति से बाज नहीं आ रही है। उन्हें 2014 का लोकसभा चुनाव दीख रहा हैं और इसमें कैसे सफलता मिलनी हैं, उसके लिए ये इस पूरी घटनाओं को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं और इसमें आहुति सामग्रियां बना दी हैं -- नार्थ ईस्ट के लोगों को। ऐसे में यहां की देशभक्त जनता को उठना आवश्यक हो गया हैं। सभी को चाहिए कि मिल जूलकर नार्थ ईस्ट के भाई बहनों को बचाने के लिेए आगे आये। उनकी सम्मान की रक्षा के लिए आगे आये और जो इनका विरोध कर रहे हैं या सबक सीखाने की बात कर रहे हैं, उन्हें गांधीवादी तरीके से बतायें कि उनका विरोध करने का तरीका, बहुत ही गलत हैं, इससे अंत में उनका ही बुरा होगा और देशवासियों के नजरों में वे खुद शक की निगाहों से देखे जायेंगे।
भारत जैसे देश में हिंसा का कोई स्थान नहीं, विरोध का तरीका सिर्फ गांधीवादी होना चाहिए ये राम, कृष्ण और बुद्ध की धरती हैं, इस धरती पर हिंसा का कोई स्थान हो ही नहीं सकता और वह भी भारतीयों का भारतीयों के विरोध में............शर्मनाक...शर्मनाक..शर्मनाक। जरुरत हैं देश में करोंड़ों की संख्या में रह रहे सत्यनिष्ठ मुस्लिमों को आगे आने की और इनके द्वारा ऐसे माहौल बनाने की,ताकि देश की बहुसंख्यक हिंदूओं को लगे कि मुट्ठी भर सिरफिरे मुसलमानों के इस आतंकी तेवर से उनका कोई लेना देना नहीं............हम भारतीय हैं और भारतीय ही रहेंगे.....................।


Tuesday, June 19, 2012

जय जगन्नाथ.........

भारत धर्मभूमि, कर्मभूमि व त्यागभूमि हैं। इस देश के सभी प्रांतों के एक प्रधान देवता हैं। जो इन प्रांतों में प्राचीन काल से पूजित व वंदित रहे हैं। यहीं उन क्षेत्रों के भरण पोषण से लेकर आध्यात्मिक सुख भी प्रदान करते हैं। जैसे -- झारखंड में बाबा वैद्यनाथ, बंगाल में माता काली की प्रधानता हैं, ठीक उसी प्रकार उत्कल प्रदेश यानी उड़ीसा प्रांत के प्रधान देवता भगवान जगन्नाथ हैं। शंख व श्रीक्षेत्र से जाना जानेवाला ये पुरी क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा व बड़े भाई बलभद्र के साथ विराजते हैं और जैसे ही आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि आती हैं वे विशेष रथों में आरुढ़ होकर आम जन को अभिलषित व मुक्ति प्रदान करने हेतु अपने गर्भ गृह से निकल पड़ते हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में आज भी लोग ये कहते नहीं भूलते ----------------उड़ीसा जगन्नाथपुरी में भले विराजो जी, भले विराजो जी साधो भले विराजो जी, उड़ीसा जगन्नाथ पुरी में भले विरोजो जी...........। इनकी महिमा जिसने भी गायी, वो धन्य हो गया। जो भगवान जगन्नाथ को मानते हैं, उनका मानना हैं कि भगवान जगन्नाथ राधा और कृष्ण की युगलमूर्ति हैं और इन्हीं से सारे जगत् की उत्पत्ति हुई। भगवान जगन्नाथ क्या नहीं हैं। वे तो सामान्य जन के देवता हैं। वे तो सामान्य जन के कल्याण के लिए गर्भगृह से बाहर निकलकर, सामान्य जन के दुख दर्द में शामिल होते हैं, यहीं नहीं स्वयं दर्शन देकर सरल सहज और सहृदय होने का सभी में भाव भी भरते हैं। शायद यहीं कारण हैं कि स्कंदपुराण तो साफ कहता हैं कि जो भी प्राणी भगवान जगन्नाथ के प्रति समर्पित हैं, या जो उनके नाम का सदैव संकीर्तन करते हैं या उनके रथों को खीचते हैं या जिस ओर उनकी रथयात्रा चल रही हैं, उसमें भाग लेते हैं या उनके दर्शन करते हैं, भगवान जगन्नाथ उनकी सारी कष्ट हर लेते हैं और उसे अंत में मोक्ष भी प्रदान कर देते हैं। भगवान जगन्नाथ की पुरी में निकलनेवाली रथयात्रा में तीन रथ प्रमुख होते हैं -- पहला रथ को तालध्वज रथ कहते हैं जिसमें बलभद्र, दूसरे रथ को पद्मध्वज कहते हैं, जिन पर बहन सुभद्रा और उसके पाद गरुड़ ध्वज होता हैं, जिस पर भगवान जगन्नाथ विराजते हैं। हालांकि कई प्रांतों में एक ही रथ पर सभी विराजते हैं और रथयात्रा का आनन्द लेते हुए लोग, भगवान के श्रीचरणों में स्वयं को समर्पित कर देते हैं। मूलतः रथयात्रा में भाव की ही प्रधानता हैं...........। ठीक उसी प्रकार जैसे कि गोस्वामी तुलसीदास, श्रीरामचरितमानस में कहते हैं कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभू मूरति दीखै तिन तैसी। रथयात्रा की एक अद्भुत कथा हैं..........कहते हैं कि एक बार भगवान कृष्ण रुक्मिणी के साथ शयनगृह में शयन कर रहे थे तभी उनके मुख से राधे राधे के स्वर निकल पड़े। ये बात रुक्मिणी ने अन्य पटरानियों को सुनाया। रुक्मिणी ने यहां तक कह डाला कि प्रभु आज भी राधे को नहीं भूले हैं, वह भी तब, जबकि रुक्मिणी समेत कई पटरानियों ने प्रभु की खूब सेवा की। ये बात कि प्रभु के मुख से राधे - राधे क्यूं निकले। माता रोहिणी के पास सभी इस रहस्य को जानने पहुंची। इधर रोहिणी ने कथा सुनाना प्रारंभ किया पर कथा प्रारंभ करने के पहले सुभद्रा को पहरे पर लगा दिया गया कि सुभद्रा किसी को कथा पूर्ण होने के पूर्व आने न दे। इधर जब कथा प्रारंभ हुई तभी बलभद्र और कृष्ण उस स्थान पर आ गये। इधर माता रोहिणी रुक्मिणी समेत अन्य पटरानियों को भगवान कृष्ण के अद्भुत प्रेमलीलाओं और रहस्यों को सुनाना प्रारंभ किया। रोहिणी के उक्त कथासार को सुनते हुए भगवान कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा इस प्रकार से भावविह्वल हो गये कि उनका शरीर दिखाई ही नहीं पड़ रहा था, यहां तक कि सुदर्शन चक्र की भी हालत वैसी ही हो गयी, पर जैसे ही उक्त समय नारद वहां पहुंचे, सभी पूर्वावस्था में आ गये। भगवान के इस अद्भुत रुप को केवल नारद ने देखा और उन्होंने इस सुंदर स्वरुप और छवि को अपने आंखों में बसा लिया। साथ ही ये सुंदर स्वरुप सभी के लिए सुलभ हो, उन्होंने भगवान से प्रार्थना की. भगवान ने नारद की ये बातें भी मान ली। तभी से भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बलभद्र पुरी में विराजकर सब को धन्य - धन्य कर रहे हैं और ये कथा युगों - युगों से चली आ रही हैं। यहीं कारण हैं कि इस रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ सुभद्रा होती हैं, जो नगर परिभ्रमण करने के लिए निकलती हैं। रथयात्रा भारतीय संस्कृति की प्राण हैं। पूरे भारतवर्ष में आषाढ़ शुक्लपक्ष द्वितीया तिथि को रथयात्रा का आयोजन होता हैं, अब तो विदेशों में भी रथयात्रा खूब धूमधाम से मनायी जाने लगी हैं। खासकर अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ से जूड़े लोग इस रथयात्रा को भव्यता से मनाते हैं, इनकी रथयात्रा का विशेष आकर्षण भी होता हैं।
झारखंड की राजधानी रांची समेत सरायकेला - खरसावां में भी रथयात्रा धूमधाम से मनाया जाता हैं। खासकर रांची स्थित जगन्नाथपुर मंदिर की रथयात्रा का कुछ खास विशेष महत्व हैं। पिछले सवा तीन सौ सालों से विराज रहे भगवान जगन्नाथ और उनकी रथयात्रा के समय यहां का दृश्य देखनेलायक होता हैं। जब लाखों लोग इस मंदिर के चारों ओर इकट्ठे होकर जय जगन्नाथ बोल उठते हैं, और भावपूर्ण हृदय से भगवान जगन्नाथ की रथ को खीचकर मौसीबाड़ी लाते हैं। करीब दस दिनों तक यहां इस दौरान मेला भी चलता रहता हैं, जिसमें दैनिक जीवनोपयोगी सामग्रियां मिलती रहती हैं। सचमुच भगवान जगन्नाथ का जो भी हुआ, भगवान जगन्नाथ उसके हो गये। रांची के जगन्नाथपुर मंदिर के बारे में कहा जाता हैं कि आज से करीब सवा तीन सौ साल पहले यहां एक ठाकुर एनीनाथ शाहदेव राजा हुए, जिनके स्वपन में बार बार भगवान जगन्नाथ की छवि दिखाई दी। उन्होंने इस स्वपन को बार - बार देखे जाने पर यहां भगवान जगन्नाथ को स्थापित करने का निश्चय किया। फिर उन्होंने पुरी से भगवान जगन्नाथ के विग्रहों को लाकर यहां विधि विधान से स्थापित कराया और आज रांचीवासियों को खुशी हैं कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए उन्हें अब ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ता, भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र यहां भी सुलभ हो गये और रथयात्रा की विधा यहां भी चल पड़ी। जय जगन्नाथ...........................

नक्षत्रों की दृष्टिकोण में मानसून

पूरे देश में मानसून की चर्चा हैं, वैज्ञानिकों ने पूर्व में घोषणा की थी कि मानसून समय पर आयेगा, पर सच्चाई ये हैं कि मौनसून केरल में सामान्य तौर पर समय से आया जरुर पर दगा भी दे गया। आज चारों ओर हाहाकार मचा हैं। खासकर रांची के आकाश में बादलों का झूंड आते जरुर हैं पर बरसते नहीं, आखिर क्यों। इधर भारतीय पंचागों और विद्वानों की मानें तो उनका कहना हैं कि इस बार मानसून उतना अच्छा नहीं रहेगा, जितना कि पिछले साल था। पिछले साल ज्यादातर वर्षा के नक्षत्र सुवृष्टि योग लेकर आये थे। इसलिए पिछले साल ये भी देखने को मिला कि इन नक्षत्रों में जमकर बारिश हुई और फसल भी अच्छी हुई, पर इस साल बात ही कुछ और हैं। भारतीय विद्वानों का समूह जो नक्षत्रों की भाषा समझता और जानता है, उसका मानना हैं कि इस बार नक्षत्र चमत्कार नहीं दिखायेंगे, क्योंकि इस बार सृवृष्टि का योग हैं ही नहीं। ज्यादातर नक्षत्रों में स्वल्पवृष्टि, खंडवृष्टि या सामान्यवृष्टि का योग हैं। ऐसे में इस बार वर्षा पिछले वर्ष की तुलना में सामान्य होगी न कि शानदार...................................

क. आद्रा -- 22 जून को प्रातः 5.29 से प्रारंभ -------- स्वल्पवृष्टि योग
ख. पुनर्वसु -- 6 जुलाई को दिन 07.04 से प्रारंभ -- खंडवृष्टि योग
ग. पुष्य --- 20 जुलाई को दिन 8.30 से प्रारंभ ----- अल्पवृष्टि योग
घ. आश्लेषा – 3 अगस्त को दिन 8.52 से प्रारंभ --- खंडवृष्टि योग
ङ. मघा – 17 अगस्त को दिन 7.39 से प्रारंभ ---- स्वल्पवृष्टि योग
च. पूर्वाफाल्गुन --- 30 अगस्त की रात 4.20 से प्रारंभ – सामान्यवृष्टि योग
छ. उत्तराफाल्गुन – 13 सितम्बर को रात 10.30 से प्रारंभ – खंडवृष्टि योग
ज. ह्स्त – 27 सितम्बर को दिन 1.53 से प्रारंभ – सामान्यवृष्टि योग
झ. चित्रा --- 10 अक्टूबर को रात्रि 2.23 से प्रारंभ – सामान्यवृष्टि योग

यानी हस्त जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में हथिया नक्षत्र कहते हैं, इसबार इस नक्षत्र में भारी बारिश या सामान्य बारिश की अपेक्षा कम बारिश होने की संभावना हैं, जबकि लोग बताते है कि हथिया की बारिश में तबाही हो जाया करती थी। इसी प्रकार उत्तरा नक्षत्र को कनवा नक्षत्र कहकर भी लोग संबोधित करते है। हमारे जनकवियों ने भी बारिश के बारे में खुलकर विचार दिया हैं और उनके विचार आज भी प्रासंगिक है.........................घाघा कवि को ले लीजिए, उन्होंने कहा हैं कि
रेवती रवे मृगशिरा तपे कछु दिन आदरा जाये
कहे घाघा जिन से श्वान भात न खाये
यानी जिस कालखंड में रेवती रव गया और मृगशिरा नक्षत्र तप गया समझ लीजिये आदरा ऐसा झमझमाएगा और फसल इतनी अच्छी होगी कि कौआ भी अघा जायेगा। ये है हमारी संस्कृति और मानसून की सांकेतिक दृष्टिकोण और हमारे पूर्वजों की भाषा. पर इस बार न तो आद्रा झमझमाने का
संकेत दे रहा हैं और न अन्य नक्षत्र ही कोई ऐसा संकेत दे रहे हैं, जो ये बता सकें कि इस बार नक्षत्र
पिछले साल की तरह शानदार बारिश कराकर भारतीयों को वारा न्यारा करेंगे।

दो सूटकेस बनाम 20 ट्रक...............

ज से ठीक पांच साल पहले, जब राष्ट्रपति के पद पर आसीन ए पी जे अब्दुल कलाम, राष्ट्रपति पद से विदा हो रहे थे, तब रांची से प्रकाशित प्रभात खबर में एक खबर छपी कि कलाम दो सूटकेस लेकर विदा होंगे, राष्ट्रपति भवन से। मैंने इस खबर को अपने दोनों बच्चों सुधांशु और हिमांशु को पढ़ाया। इस खबर से बच्चे इतने प्रभावित हुए कि, इन बच्चों ने उस खबर को प्रभात खबर से काटकर, नित्यदिन पठनीय दुर्गासप्तशती में संभालकर रख दिया। जब भी मैं या मेरे बच्चे दुर्गा सप्तशती पढ़ते अनायास अखबार का वो टुकड़ा मेरे और मेरे बच्चों के सामने से गुजर जाता.....। प्रेरणा देता कि जीने का मकसद क्या होना चाहिए.........। आज एक बार फिर वो पन्ना मेरे हाथों में हैं और बच्चों के साथ साथ, कलाम की वो सादगी हमें याद दिला गया कि जीने के मकसद क्या हैं......। एक कलाम हैं जो अपने साथ दो सूटकेस में ही जिंदगी को बांध कर एक बहुत सुंदर संदेश आम जनमानस को दे जाते हैं और एक राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी को देखिये..............।

खबर आयी हैं कि प्रतिभा पाटिल जी का सामान 20 ट्रकों में लादकर, महाराष्ट्र के तीन जगहों पर भेजा जायेगा और इस काम में राष्ट्रपति भवन के एक शीर्ष अधिकारी को लगाया गया हैं, जिसमें कुल 30 दिन लगेंगे। यहीं नहीं खबर ये भी हैं कि प्रतिभा पाटिल को पुणे के खड़की में सेना की जमीन पर बन रहे एक बंगले में रहना था, ये बंगला 2,61.00 वर्ग फुट जमीन पर बन रहा था, पर विवाद उठ जाने के कारण, अब वो वहां नहीं रहेंगी। नियमों के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति को 4500 वर्ग फुट का सरकारी बंगला या 2000 वर्ग फुट का सरकार द्वारा किराये पर लिया गया बंगला ही आवंटित किया जा सकता हैं।
कमाल देखिये -- कहां पूर्व राष्ट्रपति कलाम की सोच और कहां प्रतिभा पाटिल।
राष्ट्रपति पद पर रहते हुए एपीजे अब्दुल कलाम ने देशवासियों को संबोधन में तोहफे न लेने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि यह सांप को छूने और बदले में जहर हासिल करने के समान हैं। उन्होंने कहा था कि उपहार खतरनाक होते हैं और उनके पीछे कोई न कोई निहितार्थ होता हैं, पर मैं पूछता हूं कि आज के युग में ऐसी सोचवाले कितने लोग हैं, गर नहीं हैं, तो ऐसे व्यक्ति को पुनः राष्ट्रपति के पद पर बैठाने में सभी राजनीतिक दलों को क्या आपत्ति हैं।

बार-बार मुस्लिम प्रेम की बात करनेवाले, मुस्लिमों के आरक्षण की बात करनेवाले, सच्चर कमिटी की बातों को अक्षरशः लागू करनेवाले घड़ियाली आंसू बहानेवाले राजनीतिक दलों को, एपीजे अब्दुल कलाम में मुस्लिम क्यों नहीं दीखता। बार -बार ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण का विरोध करनेवाले लालू, मुलायम, शरद जैसे घटियास्तर के नेताओं को आज कलाम क्यों पसंद नहीं। आज कलाम के लिए ममता बनर्जी ही क्यों आगे आ रही हैं, ये अलग बात हैं कि ममता बनर्जी की राजनीति करने की सोच हमें भी पंसद नहीं, पर मुलायम जैसे घटियास्तर के नेताओं से पूछिये कि ममता के संग संयुक्त प्रेस कांफ्रेस करने के बाद, फिर कांग्रेस की गोद में बैठकर प्रणव मुखर्जी के पक्ष में बयान कैसे दे डाला। सच्चाई यहीं हैं कि समाजवाद के नाम पर सबसे ज्यादा समाज का गलाघोंटा इन्हीं घटियास्तर के नेताओं ने। एक और समाजवादी को ले लीजिए जो बिहार में सुशासन बाबू के नाम से जाना जाता हैं यानी नीतीश कुमार। उसका बयान मैने आज ही चैनलों पर देखा। उसका कहना था कि अभी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर एनडीए में चर्चाएं चल रही हैं, इसलिए वे अभी इस मुद्दे पर वे सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कह सकते। गर वे ऐसा नहीं कह सकते तो फिर मेंढ़क की तरह दलबदल में उस्ताद, उन्हीं के पार्टी के शिवानंद तिवारी ने प्रणव के पक्ष में पार्टी की ओर से कैसे बयान दे डाला। जबकि कलाम और कलाम की सोच को बिहार में जगाने की बात सर्वाधिक कोई करता हैं तो ये जदयू के लोग ही हैं और कलाम को सर्वोच्च सम्मान देने की बात आती हैं तो यहीं रोड़ा अटकाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वो कहावत हैं न बेशर्मों को शर्म कहां.....। पर सज्जनवृंद को ये भी जान लेना चाहिए कि बेशर्मों की जब लिस्ट बनाये तो ऐसे - ऐसे बेशर्म कहीं छूट न जाये। इसका ध्यान अवश्य रखे।

आज मैंने अखबार पढ़ा हैं- जिसमें कलाम साहब ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया हैं। उन्होंने एक तरह से ठीक ही किया। उनकी सोच, भले इस पर कुछ भी हो, पर हम जरुर कहेंगे कि देश में इन घटियास्तरों के सांसदों और विधायकों के मतों द्वारा सर्वोच्च स्थान पर जाना भी एक उपहार ही हैं, इसलिए कलाम साहब आपने अपनी ही बातों को अक्षरशः साबित कर दिया...........। मैं ईश्वर से प्रार्थना करुंगा कि भारत की माताएं आप ही जैसा लाल पैदा करें, जो देश व समाज के लिए गौरव हो.................।

Monday, June 11, 2012

जो बिकते हैं, उन्हें ही खरीदा जाता हैं.............

जो बिकते हैं, उन्हें ही खरीदा जाता हैं, जो बिकते नहीं, उन्हें खरीदने की किसी की औकात नहीं। जब जनता बिकने पर आ जाये, तो समझ लीजिए -- देश व लोकतंत्र को बड़ा खतरा हैं और ऐसे देश को कोई भी किसी भी कीमत पर खरीद कर, उस देश और उस देश की जनता की औकात बता सकता हैं। कमाल हैं -- सत्तालोलुपता, स्वोपकार की भावना और घटियास्तर की मनोवृत्ति ने समाज और देश को इतना नीचे ले आया हैं कि चाह कर भी ये देश व समाज आगे निकल ही नहीं सकता। मैं उस समाज और घर में पैदा लिया हूं - जहां एक चावल को मींजकर, पता लगा लिया जाता हैं कि चावल पका अथवा या नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार हटिया विधानसभा का उपचुनाव हो रहा हैं और जिस कदर विभिन्न दलों के प्रत्याशियों ने पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की यहां बोली लगायी हैं और इस बोली के अनुरुप, हटिया के मतदाता और कार्यकर्ता बिकते दीखे गये, रांची के पत्रकारों पर बिकने का तमगा लगा, उससे साफ पता चलता हैं कि यहां का परिणाम क्या आयेगा और इससे देश व लोकतंत्र को कितना खतरा उत्पन्न हो गया हैं।
फिलहाल जो सज्जनवृंद देश व समाज को नयी दिशा देना चाहते हैं और जिनका लोकतंत्र में विश्वास हैं, जो विधानसभा और लोकसभा का चुनाव सत्यनिष्ठा से लड़ना चाहते हैं, उनके लिए ये मतदाता रेट सूची नीचे दिया जा रहा हैं, कृपया देख लें, ताकि उन्हें पता लग जाये कि यहां चुनाव लड़ना एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति के लिए कितना मुश्किल सा हो गया हैं, और इसका श्रेय जाता हैं, उन धनाढ्यों को जिन्होंने चुनाव लड़कर, मतदान को भी बाजार बना दिया। बाजार क्या होता हैं, उसमें कैसे - कैसे लोग बिजनेस करते हैं, हमें लगता हैं कि ये बताने की जरुरत नहीं।
फिलहाल -- मतदाता रेट सूची पर ध्यान दें..................।
मतदाता रेट सूची
1. मतदाताओं के घर पर पर्चा या पोस्टल साटने का रेट.....100 रुपये।
2. मतदाताओं के घर पर झंडा लगाने का रेट..................200 रुपये।
3. मतदाताओं के घर के ओटे से नुक्कड़ सभा करने का रेट.300 रुपये।
4. मतदाताओं के घऱ के किसी सदस्य को कार्यकर्ता
नियुक्त करने का रेट.....................400 रुपये / प्रतिदिन। मुर्गा -मांस, चावल रोटी और शराब का प्रबंध प्रतिदिन करना होगा, अलग से।
5. मतदाताओं के घर के सभी सदस्यों के वोट प्राप्त करने का रेट... 1000 रुपये / प्रति मतदाता की दर से।
कमाल हैं, पूर्व में पत्रकारों पर पेड न्यूज को लेकर, संवाददाताओं और समाचार पत्रों पर आरोप लगते रहे थे, और ये आरोप सही भी हैं, पर जब मतदाताओं ने भी इस आर्थिक युग में अपनी रेट तय कर दी, तब तो लगता हैं कि इस देश का भगवान ही मालिक हैं।
ऐसा क्यूं हुआ, क्यूं हो रहा हैं। इसका भी मतदाताओं ने जवाब ढूंढ लिया हैं। वे साफ कहते हैं कि ये प्रत्याशी देश व समाज के लिए चुनाव तो लड़ नहीं रहे। ये लड़ रहे हैं, अपनी पत्नी, अपने बेटे- बेटियों और मित्रों के लिए तो ऐसे में भला हम इनसे देश व समाज के प्रति निष्ठा रखने का विश्वास इन पर क्यों करें। ये आज दिखाई पड़ रहे हैं तो चलो, इनसे जितना बन सकें, निकाल लो। भला कल क्या होगा, इसकी चिंता हम क्यों करें और ऐसे भी देश व समाज की चिंता सिर्फ हम गरीब क्यों करें, इन्हें क्यों नहीं करना चाहिए। देश पर खतरा हो तो बलिदान दें हमारे बेटे और मजे लूटे ये। गर दुख ही करना हैं तो सभी करेंगे और हम भी अपने हक का देश लूट रहे हैं, इसमें गलत क्या हैं।
बात भी ठीक हैं। जरा हटिया के स्कूलों में देखिये -- एनसीसी में किसका बच्चा हैं। सब उन्हीं का बच्चा हैं, जो मैला ढोते हैं, जिनका बाप गली मोहल्लों में टायर पंक्चर ठीक कर रहा होता हैं, जो सिलाई करके अपने परिवार को चला रहा होता हैं। जिसके परिवार का सदस्य या बेटा, उसके घर से कोसो दूर सीमा पर देश की रक्षा करने के लिए डटा हैं, जो रोज खेती मजदूरी करके पेट पालता हैं। क्या एनसीसी और देश की रक्षा करने के लिए इन्हीं गरीबों के बच्चे मिले हैं और संभ्रांतों - धनाढंयों के बच्चे एनसीसी में क्यों नहीं हैं या उनके बच्चे देश की सीमा पर क्यों नहीं दिखाई पड़ते। इसका जवाब तो न तो सरकार के पास हैं और न बुद्धिजीवियों के पास। अपने देश में जाति - वर्ग संघर्ष के नाम पर क्या हो रहा हैं। सभी जातियों में अमीर और गरीब की ऐसी खाई बन गयी हैं कि अमीर, गरीब को देख ही नहीं रहा तो भला चुनाव के माहौल में गरीब, अमीरों के चोचलेबाजी -- देश और समाज के बारे में क्यों सोचे। इसलिए उसने भी मतदाता रेट खोल लिये। इसमें गलत क्या हैं।
हमारे देश के महापुरुषों ने जो लोकतंत्र की कल्पना की थी। जिस देश का सपना संजोया था। वो क्या यहीं था क्या। जहां पर आज के नेताओं ने लाकर हमें छोड़ दिया हैं। आज जितने भी घोटाले हुए, उसकी जांच का परिणाम क्या हुआ। नतीजा सिफर। आजादी के बाद किसी भी घोटालेबाज नेताओं को न्यायालय द्वारा सजा मिली, उत्तर होगा नहीं, तो फिर हम गरीब ही देश की सेवा के लिए बने हैं क्या। जरा समाजवादियों की परिकल्पना देखिये -- एक अपने देश में पार्टी हैं - समाजवादी पार्टी। खूब राममनोहर लोहिया का नाम लेती हैं। जब आपातकाल की घोषणा हुई थी देश में। तो इस पार्टी के लोगों ने 1977 में नारा दिया था -- इंदिरा गांधी के खिलाफ कि वो चाहती हैं परिवार राज, हम चाहते हैं आम जनता की राज। जरा पूछो। उस समाजवादी पार्टी के मुलायम से कि तुम बताओ, तुम संसद में हो, बेटा को मुख्यमंत्री बना दिये हो, बहु को क्न्नोज से जीता कर सांसद बना दिया। ये कैसा समाजवाद हैं। उन कांग्रेसियों, भाजपाईयों और बसपाईयों से पूछो कि तुम्हारी क्या मजबूरी थी कि तुमने एक कैंडिडेट भी मुलायम के बहु के खिलाफ नहीं दिया। पर सवाल पूछने और जवाब देने का फूर्सत किसे हैं, सभी लूट रहे हैं, तो मतदाताओं ने भी करवट ली हैं कि हम भी क्यों नहीं अपना रेट तय करें। शायद ये रेट देश के सभी भागों में धीरे - धीरे अपना जलवा बिखेरेगा और सही मायनों में एक बार फिर परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़कर, अपनी पूर्व की श्रेणी में आ खड़ा होगा। ऐसे भी हमारे बाप दादाओं ने गुलामी देखी हैं, हमने गुलामी देखी ही नहीं, हमें भी तो गुलामी देखने का उतना ही अधिकार हैं। जब हमारे नेता व मतदाता दोनों लूटनेवाली स्थिति में आ जायेंगे तो फिर क्या होगा............। सबको मालूम हैं...................।

Sunday, May 13, 2012

देश तरक्की कर रहा हैं, हम इँडियन किसी से कम नहीं...............................


मैं 45 का हो गया हूं, और मेरा मानना हैं कि जो इन वर्षों में मैंने देखा। देखकर यहीं महसूस कर रहा हूं कि देश वाकई तरक्की कर रहा है। कई प्रमाण हैं मेरे पास, इसे साबित करने के लिए। ये अलग बात हैं कि आप मेरे इन सबूतों पर विश्वास करें या न करें, पर इतना जरुर कहना चाहता हूं कि आकाशवाणी पटना में जब मैं आकस्मिक उद्घषोक के रुप में कार्य करता था, तब उसके मुख्यद्वार पर महात्मा गांधी के कथन उद्धृत थे, जिसे मैं बराबर पढ़ा करता था -- वो ये था गांधी के शब्दों में कि - "मैं चाहता हूं कि मेरे घर की खिड़कियां और दरवाजे सदा के लिए खुले रहे ताकि दूसरे स्थानों की आबोहवा व उनकी संस्कृति बेरोक टोक आया जाया करें, पर मैं ये नहीं चाहूंगा कि उनके इस संस्कृति के आने जाने के कारण, अपने ही देश की संस्कृति को खतरा उत्पन्न हो जाय।" ये कथन गांधी के थे, आज गांधी जीवित नहीं हैं और न उनको याद करनेवाले जीवित हैं। हाड़-मांस के पुतलों की यहां संख्या इतनी हो गयी हैं कि इसकी संख्या एक अरब को पार कर गयी हैं। जो लोग गांधी को ढोते हैं, उन कांग्रंसियों को भी अब गांधी और गांधी के राम से एलर्जी हो गयी हैं, क्योंकि वो जानती हैं कि न तो गांधी और न गांधी के राम, उन्हें वोट दिला सकते हैं। ऐसे में गांधी के इस कथन से उन्हें क्या लेना देना। ये आलेख लिखने के बक्त एक और शख्स की अनायास याद आ गयी। नाम हैं उसका मैकाले। जिसने भारतीय शिक्षा पद्धति की नींव रखी और जिसने डेढ़ सौ वर्ष पहले कहा था, उसे खुद भारतीयों ने चरितार्थ किया। आज तो भारत के गलियों में बच्चा - बच्चा एक डायलाग बोलता हैं। उसके बोल हैं --- टम टमा टम टम, टमाटर खाये हम। अंग्रेज का बच्चा क्या जाने, अंग्रेजी जाने हम। ये बोल बताते हैं कि देश कितनी तरक्की किया हैं। इस देश में अंग्रेजी दिवस नहीं मनाया जाता, पर इस देश में अंग्रेजी बोलना व पढ़ना शान समझी जाती हैं। इस देश में हिंदी दिवस मनाया जाता हैं, पर हिंदी पढ़ने, लिखने व बोलने में मंत्री से लेकर संतरी तक को झिझक और शर्म महसूस होती हैं, स्थिति ऐसी हैं कि अब हिंदी के इस देश में शुद्ध हिंदी बोलनेवालों की संख्या विलुप्त होती जा रही हैं। भारत का एक राज्य नागालैंड की तो भाषा ही अंग्रेजी हो गयी हैं। आईये हम आपको बता देते हैं कि मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में क्या कहा था --- LORD MACAULAY ADDRESS TO THE BRITISH PARLIAMENT, 2 FEBRUARY, 1835 "I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.
" मैकाले ने कहा था -- कि मैंने भारत के कोने कोने की यात्रा की, लेकिन इस यात्रा के दौरान मुझे न तो कोई भिखारी दिखा और न ही चोर। इस देश में मैने उच्च नैतिक मूल्यों और आदर्शों को देखा। जो वहां के निवासियों में कूट कूट कर भरा था। ऐसे देश को हम तभी जीत पायेंगे जब उसकी रीढ़ मानी जानेवाली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में बदलाव करेंगे। इसलिए मैं इस बात का सुझाव देता हूं कि उस देश की पुरानी और प्राचीन शिक्षा पद्धति को बदलने की कोशिश की जाये। उनकी संस्कृति में परिवर्तन कर हम उनको जीत सकते हैं। इसलिए हमारी कोशिश विदेशी और अंग्रेजी को बढ़ावा देने की हैं। ताकि उनको लगे, कि ये सब उनकी संस्कृति से बेहतर हैं। इन कदमों के उठाये जाने के बाद ही हमारा उस देश पर पूरा प्रभुत्व हो सकता हैं, अन्यथा नहीं।"
कमाल हैं आज हम दावे के साथ कह सकते हैं कि जिस मैकाले ने ब्रिटिश सत्ता के भारत में काबिज रहने तक अपनी परिकल्पनाओं को साकार होते हुए नहीं देखा, आज वो साकार ही नहीं, बल्कि पूरा देश अंग्रेजी और अंग्रेजमय हो जाना चाहता हैं। भारत और भारतीयता तो कहीं दिखती नहीं, सिर्फ इंडिया दिखता हैं। आनेवाले समय में आर्यावर्त, जंबूद्वीप, भरतखंड, हिंदुस्तान की तरह लोग भारत कहना भूल जायेंगे और अंग्रेजों का नाम दिया इंडिया ही देश का असली नाम माना जायेगा। उदाहरणस्वरुप देश के विभिन्न राष्ट्रीय अथवा प्रादेशिक निजी चैनलों के नाम देखिये -- ज्यादातर इंडिया व इंडिया के केन्द्र में हैं, भारत और हिंद तो दीखता ही नहीं। मेरा एक मित्र अमरीका में रहता हैं, उसकी पत्नी अमरीकन मूल की हैं। एक बार उनसे बातचीत हुई थी -- वो भारत को बहुत प्यार करती हैं। कहती है कि उनकी दादी कहा करती थी कि इंडियन बहुत अच्छे होते हैं, वे एक ही पत्नी पर अपना पूरा जीवन समाप्त कर देते हैं, पर अमरीका व पश्चिम देशों में तो लड़कियों की शादी ना हुई, तलाक का सिलसिला शुरु हो जाता हैं। इसलिए वो शादी एक भारतीय से की और उसे खुशी हैं कि वो भारतीय पति आज भी उससे उतना ही प्यार करता हैं, जितना की पन्द्रह - सोलह साल पहले किया करता था। बच्चे भी दो हैं और सब खुशी से रह रहे हैं कोई दिक्कत नहीं। पर क्या -- सचमुच भारत में ऐसा हैं, या केवल अब ये गलतफहमी लोग पाल रहे हैं..............................। आप इसे स्वीकार करिये, भारत, आज इंडिया हैं। वो इंडिया जो न तो पूरी तरह अंग्रेज बन सका और न ही पूरी तरह भारतीय। बीच में यहां की अरबों आबादी पेंडूलम की तरह लटक रही हैं। पूर्व में जिस किसी देश पर आक्रमण होता था तो उस आक्रमण में अपनी संस्कृति को थोपने की आदत कुछ ज्यादा ही दिखती थी। भारत में जितने भी विदेशी आक्रमणकारी आये, उनके मूल में धर्म प्रचार और यहां की शैक्षिक संस्थाओं व संस्कृतियों को मटियामेट करना और अपने को मजबूत स्थिति में रखना ही मूल मकसद हुआ करता था। नालंदा के अवशेष खंडहर और सोमनाथ मंदिर को लूटा जाना - इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। कल के भारत और आज की इंडिया ने् कई आक्रमणकारियों व विदेशी शासकों को अपनी मिट्टी पर राज करते देखा हैं पर भारतीयों के दिलों पर राज करना इनके बूते के बाहर थी तभी मैकाले ने अपनी व्यथा ब्रिटिश संसद में रखी थी, पर आज की क्या स्थिति हैं, क्या आज कोई विदेशी यहां आकर, अपनी व्यथा, अपने देश में कर सकता हैं। उत्तर होगा -- नहीं। क्योंकि आज वो देख रहा हैं कि जो उसके यहां होता हैं वो ही इंडिया में हो रहा हैं तो किसका भारत और कैसा भारत। ये तो इंडिया हैं इंडिया। आज पूरा इंडिया अपना नया साल पहली जनवरी को मनाता हैं, उसे पता ही नहीं कि भारतीय संविधान ने उसके लिए एक अपना संवत् चुना हैं जिसे शक संवत् कहा जाता हैं और इसके भारतीय महीने जनवरी फरवरी से अलग हैं। प्रगति का सबसे पहला सोपान तो यहीं हैं कि आज कोई भी भारतीय को अपना पहला महीना, अपना पहला संवत तक याद नहीं। भारत सरकार कहती हैं कि राष्ट्रीय खेल हॉकी हैं पर सच्चाई ये हैं कि किसी भी भारतीय से आप पूछे हांकी के बारे में, तो वो हॉकी का एबीसीडी भी नहीं बता पायेगा और जब क्रिकेट की बात करें तो लीजिए, आपको उस पर एक थीसिस लिख देगा। ये बाते बता रही हैं कि देश कितनी तेजी से प्रगति कर रहा हैं, प्रगति ऐसी कि देश की सरकार चाह भी लें कि वो कुछ नया करेगी, यहां की जनता, उससे भी आगे बढ़कर, तेजी दिखा देगी। प्रगति के कुछ उदाहरण देखिये, खासकर आजादी के बाद ..........................

1. आजादी के पूर्व तक यहां के लोग मां को मैया अथवा मां कहकर पुकारते थे, पर आज वो ही मां मम्मी से होते हुए माम तक पहुंच गयी हैं, वो ही हाल पिताजी जो बाबुजी कहलाया करते थे अब पापा होते हुए, डैडी से डेड हो चुके हैं।

2. पहले घर में जब किसी का जन्मोत्सव मनाया जाता था, तो घर में सत्यनारायण की पूजा हुआ करती थी, गर ये भी नहीं हुआ तो जिसका जन्मदिन होता था, वो मंदिर जरुर जाता, तिलक जरुर लगाता और घर आकर घर में बने विशेष पकवानों का मजा लेता, घर में सभी लोग उसकी बलइयां लेते, बड़े बुजुर्ग आशीर्वाद देकर, उसे धन्य धन्य कर देते, पर अब यहां ऐसा नहीं दिखता। अब तो हर घर में केक आते हैं, मोमबत्तियां आती हैं, मोमबत्तियां जलाकर उसे फूंका जाता हैं और ताली बजाकर हैप्पी बर्थ डे टू यू का प्रचलन शुरु हो गया। सचमुच अंग्रेज नहीं होते तो ये बेचारे इंडियन अपने बच्चों का जन्मदिन भी नहीं मना पाते. मैं तो इसके लिए अंग्रेजों को बधाई दूंगा कि उन्होंने इँडियन को जन्मदिन मनाना सिखाया।

3. पहले ज्यादा भारतीय धोती पहना करते थे और माथे पर टोपी, जबकि महिला साड़िय़ों का उपभोग करती थी, पर अंग्रेजों ने भारतीयों को कपड़ा पहनाना सिखाया, आज सभी भारतीय धोती की जगह फुलपैंट पहनते हैं, जिससे उनके पांव जाड़ों के दिनों में ठंड से बच जाती हैं तथा टोपी से जो उनका लुक खराब लगता था, अब टोपी छोड़ देने से उनका लुक स्मार्ट हो गया हैं. अब तो महिलाएं साड़ियां नहीं पहनना चाहती, क्योंकि साड़ी में वो सैक्सी नहीं दिखती, टॉप जीन्स में सैक्सी दिखती हैं, इसलिए उन्हें ये पहनावा ज्यादा रुचिकर लग रहा हैं। ऐसे भी आज की महिलाओं और पुरुषों को सैक्सी दिखना, कुछ ज्यादा ही भा रहा हैं।

4. अब भारतीयों के घरों में रोटी - सब्जी या दाल चावल नहीं दिखाई देता। अब तो इसके जगह पर पिज्जा, चाउमिन, बल्गर और पता नहीं क्या क्या भोज्य पदार्थ दिखाई देने लगे हैं।

5. अब शादियों की सालगिरह भी, अंग्रेज के बच्चों के बर्थडे की तरह मनायी जाने लगी हैं। शादी का सालगिरह मनाने का प्रचलन इतना बढ़ा हैं कि होटलों व रेस्तराओं की बल्ले बल्ले हो गयी हैं। जिनकी शादी का सालगिरह होता हैं वे पति पत्नी अपने पूर्व के प्रेमी व प्रेमिकाओं को इस अवसर पर बुलाना नहीं भूलते ताकि वे अपने प्यार के उन पलों को सबके सामने शेयर कर सके। ऐसा कहना और सुनना आजकल शान समझा जाता हैं क्योंकि किसका पति कितना हैंडसम और किसकी पत्नी पहले कितनी सेक्सी थी, वो सबसे ज्यादा उसके चाहनेवालों की संख्या पर निर्भर करती हैं और ये संख्या दिखाने का सबसे सुंदर मौका होता हैं। शादी का सालगिरह मनाना। धन्य हैं अंग्रेज, जिन्होंने भारतीयों को शादी की सालगिरह का महत्व समझाया।

6. अब तो मेरे देश में विवाहित महिलाएं सिंदुर नहीं लगाती। सिंदुर लगाना, पुरातनपंथी होने का नमूना माना जाता हैं। शादी के बाद सिंदुर न लगाकर विधवाओं की तरह रहना अब शान समझा जा रहा हैं। प्रगतिशील महिलाओं की माने तो सिंदुर लगाकर महिलाएं खुद को विवाहित होने का सबूत देती हैं ऐसा पुरुष क्यों नहीं करते. भाई इनकी बातों में दम हैं। ऐसा पुरुषों के लिए कुछ न कुछ जरुर होना चाहिए, पर हमको इससे क्या मतलब, हम तो प्रगति की बात कर रहे हैं, आजकल हमारे देश की महिला व पुरुष बिना विवाह के ही आपस में पति - पत्नी की तरह रह रहे हैं और उन्हें सामाजिक मान्यता भी मिल रही हैं। गर इस दौरान इनके द्वारा बच्चे पैदा हो जाते हैं तो बच्चे को अधिकार भी हैं कि वे इन्हें अपना मम्मी या डैडी माने अथवा नहीं, या वे उन्हें माने जहां इनके इन मम्मी डैडियों ने इन्हें अपने चैन का नासूर समझकर किसी अनाथालय को दे दिया और उसके बदले में नोटों के बंडल अनाथालयों को भेज दिये।

7. पूर्व में भारतीयों को खाना खाना नहीं आता था, अंग्रेजों ने इन्हें खाना खाने के तरीके सिखाये। पहले भारतीय अपना भोजन, अपने हाथों से खाया करते थे, पर अंग्र ये छुरी और कांटों का प्रयोग कर रहे हैं, ये प्रगति का सबसे सुंदर उदाहरण हैं। आज भारत के सभी होटलों व रेस्तरों में कांटा और छुरी की भरमार हैं। कांटा और छुरी के फायदे भी अनेक हैं, जब खाना खाने के दौरान बक-झक हुई किसी से, तो आप कांटा छुरी का बेहतर इस्तेमाल भी कर सकते हैं, गर आपके पास कोई दुसरा हथियार नहीं हो।

8. पहले जो सिनेमा बनते थे वो भारतीय मूल्यों को रेखांकित करते थे। फिल्मों में भाई - बहन, मां - बाप, पति - पत्नी, भाई - भाई, घर-परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य का बोध छुपा करता था, पर अब ऐसा देखने को नहीं मिलता, अब इन सारे रिश्तों की जगह केवल लड़के - लड़कियों के प्रेम व सेक्स ने ले ली हैं, ऐसे भी जरुरी हैं कि प्रेम व सेक्स कैसे किये जाये, क्योंकि इसके बिना लेडिज और जेन्टलमैन का किरदार ठीक नहीं बन पड़ता। यहीं कारण हैं कि आज नेताओं से लेकर अन्य लोगों के जुबां पर भाईयों और बहनों की जगह लेडिज एंड जेन्टलमैन ने ले लिया हैं।

9. हमारे देश में शिक्षा में भी आमूल चुल परिवर्तन हुए हैं। धर्म - निरपेक्षता की आड़ में केन्द्र व राज्य सरकारों ने रामायण और महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों की धज्जियां उड़ा दी हैं। इनका मानना हैं कि इससे देश में सांप्रदायिकता बढ़ती हैं. इसलिए ऐसी - ऐसी चीजें पढ़ाई जा रही हैं, जिससे बच्चा केवल पैसे जमा करने की मशीन बनकर देश व समाज को अपने हाथों से बर्बाद कर सकें, और इनकी बानगी देखने को भी मिल रही हैं। आईएएस और आईपीएस की फौजों ने महानगरों में अपने लिये राजसी ठाठ-बाट के सामान इकट्ठे करने में लगे हैं, देश और समाज इनके ठेंगे पर हैं, ये जमकर भारतीयों के पैसे का सही इस्तेमाल कर रहे हैं। स्थल अध्ययन के नाम पर विदेश यात्रा करते हैं और अपनी पत्नियों के साथ, कभी - कभी ठेके पर पत्नी लेकर रंगरेलियां मनाते पकड़े जा रहे हैं, यहीं हाल हमारे प्रबुद्ध नेताओं का हैं, ये भी इसी प्रकार का कार्य कर रहे हैं।

10. देश में नेताओं की फौज इक्ट्ठी हो गयी हैं। चाहे समाजवादी हो, या दक्षिणपंथी या वामपंथी. सभी का एक ही स्वर -- मिले सुर मेरा तुम्हारा और सुर बने हमारा हैं। कल तक नहीं चलेगा परिवार का राज अलापने वाले, अपने बहु-बेटियों और बेटे दामादों को टिकट बांट कर धन्य धन्य हो रहे हैं।

11. कल तक नेता सरकारी अस्पतालों में अपना इलाज कराते थे, अब वे सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना अपनी बेईज्जती समझते हैं, इसलिए ये फाइव स्टार वाली सुविधावाली अस्पतालों में इलाज कराकर, इसके पैसे भी आम जनता से वसूलकर, भरते हैं, ये कहकर कि वे जनप्रतिनिधि हैं और आम जनता आज भी खैराती अस्पतालों में इलाज कर सीधे स्वर्गगमन कर रही हैं।

12. 15 अगस्त 1947 में जो भारत का मानचित्र था, वो अब सिकुडता नजर आ रहा हैं। चीन 1962 में भारत का एक बड़ा हिस्सा कब्जे में कर रखा हैं, जबकि अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम पर उसकी नजर टेढी हैं सो अलग। यहीं नहीं आज भी चीन के विमान और उसके सैनिक अरुणाचल प्रदेश के कई भागों को धीरे - धीरे अपने में मिलाते जा रहे हैं। इससे बड़ी देश के प्रगति का सूचक और क्या हो सकता हैं।

13. देश की संसद और राज्य की विधानसभाओं में स्पेशल कैंटीन चलती हैं, जो यहां के नेताओं और उनके चमचो को बहुत ही सस्ते दरों पर खाद्यान्न मुहैया कराती हैं, जबकि आम जनता आज भी मंहगाई से त्रस्त हैं।

14. देश के नेताओं व राजनीतिज्ञों ने शिक्षा की दो धाराएं निकाली हैं। यहां की जनता के लिए घिसी पिटी विश्वविद्यालयीय शिक्षा दे रखी हैं, जबकि अपने खानदान के बच्चों के लिए विदेश में शिक्षा दिलाने की योजना चला रखी हैं, आज भी देश के सभी बडे़ नेताओं व बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के बेटे उच्च शिक्षा के लिए भारत की बजाय विदेश की शरण लेते हैं।

15. देश के सभी प्रमुख अखबारों के अपनी वेबसाइट अश्लील चित्रों से भरी पड़ी रहती हैं, आप इन वेबसाइटों को देखकर देश की प्रगति का आइना देख सकते हैं। यहीं नहीं इन अखबारों में सेक्स और लव के चटखारे इतने अटेपटे हैं कि आपको ब्लू फिल्मों की कैसेट देखने की आवश्यकता ही नहीं पडे़गी।

16. जिस देश में कभी नानक, एकनाथ, नामदेव, नरसिह मेहता, तुलसी, कबीर, मीरा की तूती बोलती थी, आज उस देश में कृपा बरसानेवाले बाबाओं की बाढ़ आ गयी हैं. संतों की जगह रामदेव, निर्मलबाबा, आसाराम जैसे ठगों ने ले ली हैं, जो सपने दिखाकर लोगों को मूढ़ बनाने में विशेष रुचि रखते हैं।

17. इस देश में पहले श्रीरामचरितमानस की चौपाईयां घर - घर में गूंजती थी। कहा जाता था -- प्रातःकाल उठि के रघुनाथा, मात-पिता गुरु नावहि माथा। उस देश में अब मदर्स डे, फादर्स डे मनाया जाने लगा हैं, और इसके माध्यम से बताया जाता हैं कि मां और पिता क्या होते हैं।

18. जिस देश में हर महीने कोई न कोई पर्व व त्योहार हुआ करते थे, अब यहां केवल पर्व के नाम पर होली और दीवाली ही दिखाई पड़ती हैं, जबकि एक नया पर्व इस देश में अब दिखाई देने लगा हैं। जो अब हर साल 14 फरवरी को मनाया जाता हैं। इस पर्व को वैलेंन्टाईन डे कहा जाता हैं। इस पर्व के दिन हर लड़का एक लड़की को लेकर या हर लड़की एक लड़के को लेकर या लड़का - लड़का में या लड़की - लड़की से प्रेम करती हैं और इस प्रेम का लब्बो लुआब ये होता हैं कि अश्ललीलता व प्रेम की फुहड़ता चरम पर होती हैं।

19. हमारे देश में हर साल एक न एक घोटाले का पर्दाफाश होता हैं। कई घोटाले जैसे चारा घोटाला, ताबूत घोटाला, टूजी घोटाला इत्यादि। हर घोटाला खासमखास होता हैं। प्रत्यके घोटाले एक दूसरे घोटाले को मुहं चिढ़ा होता हैं कि देखों में तुमसे भी बड़ा हू। इन घोटालो में शामिल नेताओं को सजा भी नहीं होती, ये आराम से कुछ दिन ट्रायल के दौरान जेल में होते हैं, पर अंत में ससम्मान बरी भी हो जाते हैं। ये घोटालेबाज कुछ घटियास्तर के सफेदपोश पत्रकारों के साथ मिलकर नये चैनल खोलकर, अपने संत होने का एक झूठा आचरण भी पेश करते हैं, जिससे सामान्य जनता दिग्भ्रमित होती जाती हैं।

20. देश में रहनेवाले इंडियन जो यहां सरकारी सेवाओं में काम कर रहे होते हैं या जो खेती वाड़ी कर अपना जीवन यापन करते हैं, उनके धन यहां अंकगणितीय प्रणाली से बढ़ रहे हैं, पर नेताओं व आईएएस व आईपीएस अधिकारियों के धन ज्यामितीय प्रणाली से बढ़ रहे हैं।

21. अब अपने देश में कुछ - कुछ राज्यसभा की सीटे एक तरह से आरक्षित सी हो गयी हैं। जहां एक खानदान के लोग या मीडिया से जूड़े लोग पिछले पच्चीस छब्बीस वर्षों से काबिज हैं और उनका ये कब्जा आजीवन रहेगा। आज नेता का बेटा नेता ही होता हैं और उसे ही देश की बागडोर मिलेगी, ऐसा गुप्त एजेंडा को इस सफाई से यहां पेश किया जाता हैं कि जनता सदा मूर्ख बनी रहती हैं।

22. देश की भाषा, राजभाषा हिन्दी मानी गयी हैं, पर सच्चाई ये हैं कि हिंदी अंग्रेजी की दासी के सिवा कुछ नहीं। लोकसभा से लेकर राज्यसभा, विधानसभा से लेकर विधानपरिषद् तक अंग्रेजी की सल्तनत चलती हैं। हिंदी में संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देनेवाले अटलबिहारी वाजपेयी भी जब प्रधानमत्री बने तो कई जगहों पर अंग्रेजी में संवाद करना, इन्होंने शान समझा। वो कहा जाता हैं न कि हिंदी गंवारों और जाहिलों की भाषा हैं, जबकि फादर कामिल बुल्के के अनुसार - "संस्कृत महारानी, हिंदी बहुरानी और अंग्रेजी नौकरानी हैं।"

23. देश के संसद के 60 साल हो गये पर सच्चाई ये हैं कि जैसे जैसे संसद अपनी वर्षगांठ मनाता गया, वैसे वैसे ये संसद अपनी गरिमा भी खोता चला गया। केन्द्र की कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदों को घूस देकर अपनी सरकार बचायी। एक बार तो ऐसा हुआ कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने दुबारा अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदो को खरीदने की कोशिश की और वे पैसे साफ देखे गये कि कैसे सदन में रखे गये। पूरा देश देखा इस दृश्य को। जिस चैनल के पास इस दृश्य को दिखाने का जिम्मा था, उसने कांग्रेस के आला नेताओं के हाथों अपनी जमीर बेच दी, अपनी आत्मा बेच दी। यानी यहां के राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार अपनी जमीर बेचने में किसी भी अन्य देश के पत्रकारों से काफी आगे निकल चुके हैं। कितने प्वाइँट लिखूं, जितना भी लिंखूंगा कम ही होगा, बस अब आप इतना जरुर जान लीजिए कि देश काफी प्रगति कर चुका हैं............बस एक दौड़ और लगानी हैं यानी अपने सर्ट और पैंट और छोटे करने हैं...........यकीन मानिये हम अमरीकी और ब्रिटेन को मात दे देंगे। तब और गर्व से कह सकेंगे कि हम इंडियन किसी से कम नहीं.....................................।

Friday, April 13, 2012

वाह री मीडिया.......................

कल तक निर्मल बाबा को इसी मीडिया ने सर आंखों पर बिठाया और आज यहीं मीडिया उनकी खिल्ली उड़ाने में लग गयी। खिल्ली ऐसे उड़ा रही हैं, जैसे लगता हैं कि इस मीडिया को निर्मल बाबा की तरह ब्रह्मज्ञान अथवा परमज्ञान प्राप्त हो गया हो। निर्मलबाबा के बारे में जिनको थोड़ी सी भी जानकारी हैं वे बेझिझक कहते हैं कि निर्मल बाबा मीडिया की नाजायज देन हैं। इसी मीडिया ने अपने सिर्फ चंद रुपयों की लालच के खातिर अपना स्लॉट बेचा और बाबा थोड़े ही दिन में सात समंदर पार पहुंच गये। लोकप्रियता ऐसी की, आज ये मीडिया लाख उसकी आलोचना कर दें, धज्जियां उड़ा दें, पर निर्मल बाबा के भक्तों पर उसका कोई असर नहीं दीख रहा। अब तो निर्मल बाबा के भक्त इन्हें ही देख लेने की योजना बना रहे हैं, कुछ तो अदालत तक की देख लेने की बात कह रहे हैं। ये कैसी विडम्बना हैं............................
हम आपको बता दें कि जिस देश में, अकर्मण्यवादियों, बाह्यडबंरों पर रिझनेवालों तथा चमत्कार को माननेवालों की जनसंख्या रहती हैं, वहां निर्मलबाबा, रामदेवबाबा और न जाने कितने झोलझाल बाबाओं की सियासत चल पड़ती हैं, जिसके कारण पूरा देश बर्बादी के कगार पर आ खड़ा होता हैं। कल यानी गुरुवार देर रात तक एक राष्ट्रीय चैनल ने अपने आपको निर्मल बाबा से अलग करने की बेवकूफी भरी हरकत की। उसने भी निर्मल बाबा की तरह उटपुटांग हरकते अपने चैनल के माध्यम से करने की कोशिश की, पर खुद ये नहीं बताया कि.....................
क. आखिर वो 12 मई से निर्मल बाबा के इस विज्ञापन को बंद करने का क्यों ऐलान किया, तत्काल प्रभाव से उसने ये विज्ञापन क्यों नहीं बंद किया।
ख. जिस निर्मल बाबा की हरकतों को वो दिखाया करता था, उसे आज वो विज्ञापन कह रहा हैं, उसे ये परमज्ञान पहले क्यों नहीं प्राप्त हुआ।
ग. आखिर उसके इस निर्मल बाबा के हरकतों के प्रसारण करने से जो लाखों जनता की बुद्धि भ्रष्ट हुई, उसके लिए वह अपनी जिम्मेवारी क्यों नहीं लेता।
घ. आखिर उसकी इन हरकतों से जो आनेवाली पीढ़ी प्रभावित हुई, मूर्खता और अकर्मण्यता की शिकार हुई, उसके लिए वो पूरे देश से क्षमा क्यों नहीं मांगता।
ड. इस चैनल ने कल इतनी बड़ी बड़ी गलतियां और झूठ बोले, जिसे देख कर कोई भी सभ्य समाज का बुद्धिजीवी खुद शर्मसार हो जायेगा, और कहेगा कि ये भी टीआरपी का ही चक्कर हैं, यानी येन केन प्रकारेण, चाहे निर्मल बाबा से पैसे लेकर, उसकी बातें चैनल में प्रसारित करों अथवा उसकी आलोचना, टीआरपी तो आ ही रही हैं, क्योकि व्यवसाय में मुनाफा तब भी होगा और रही बात जनता की, तो उसने ठेका थोड़े ही ले रखा है। भाड़ में जाये, जनता हम अपनी दुकान चालू रखे और दुकान में तो गड़बड़ियां चलती ही हैं, उदाहरणस्वरुप जब आप एक किलो सरसो तेल के बदले नौ सौ ग्राम तेल पैक कर दे।
इधर रांची में भी सभी प्रिंट मीडिया को परमज्ञान प्राप्त हो गया हैं। दिये जा रहे हैं -- निर्मल बाबा के खिलाफ, पर रामदेवबाबा के खिलाफ लिखने में इन्हें सांप सूंघ जाता हैं। हालांकि दोनों का काम वहीं हैं। एक बेतुकी बातें करके पैसे ऐंठ रहा हैं तो दूसरा सपने दिखाकर पैसे ऐठ रहा हैं और खुद शून्य से शिखर पर पहुंच चुका हैं। आजकल निर्मल बाबा पर लिखनेवालों की बाढ़ भी आ गयी हैं। हम तो इंदर सिंह नामधारी को बधाई देंगे कि वे अपने साले को बधाई दें कि उनके कारण, उनका नाम भी आज चर्चाओं में हैं। साले के नाम व कारनामों से विख्यात होनेवाले शायद ये पहले राजनीतिज्ञ होंगे। जो बिना पैसे दिये ही, सभी चैनलों और अखबारों में धूम मचा रहे हैं। इंदर सिंह नामधारी को भी याद होगा कि यहीं अखबार वाले जब वे चुनाव लड़ रहे थे, तो उनसे पैसे के लिए देह छिल दिये थे, कि गर वे पैसे नहीं देंगे विज्ञापन के लिए, तो उनका निगेटिव प्रचार होगा। पैसे देंगे तो बस उनकी जय जयकार होगी और इससे वे चुनावी वैतरणी लोकसभा की पार कर जायेंगे। ये अलग बात हैं कि उस दिन प्रिंट मीडिया की इस ब्लैकमेलिंग के शिकार, वे बन पाये थे या नहीं। ये नामधारी ही बेहतर बता सकते हैं, पर फिर भी, आज वे बिना पैसों के सुर्खियां बटोर रहे हैं। मैं तो उन्हें दिल से बधाई देता हैं। आज रांची के सारे अखबार कोई पहले तो कोई बाद में निर्मल बाबा के खिलाफ लिखे जा रहा हैं, पर उन अखबारों से पूछिये कि रामदेव के बारे में क्या ख्याल हैं------------------------------
जरा रांची के अखबारों से पूछिये -----------------
क. कल तक योग के नाम कपालभांति करानेवाले बाबा रामदेव, योग के बाद चूर्ण, चटनी और च्यवनप्राश और अब किराना का दुकान नहीं खोल रखा हैं। क्या संत का काम किराना दुकान खोलना हैं। क्या देश में रामदेव को छोड़कर कोई पूर्व के ऐसे संत हैं जिसने किराना का दुकान खोल कर टाटा और अंबानी के कगार पर आ खड़ा हुआ हो। संत तो कबीर थे कहां करते थे -- मन लागा मेरा यार फकीरी में। संत तो गांधी थे, जिन्हें जैसे ही भारत की वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ, लंगोटी धारण कर ली, मृत्युपर्यंत लंगोटी धारण किये रहे, धन से कोई लगाव नहीं था। संत तो धनबाद के ए के राय हैं, जो तीन - तीन बार विधायक और तीन - तीन बार सांसद रहे, पर कभी भी वेतन तो दूर पेंशन तक नहीं लिया।
ख. क्या ये सही नहीं हैं कि रामदेव ने रांची में आज से छह - सात साल पहले ऐलान किया था कि भारत आगामी पांच सालों में महाशक्ति बन जायेगा। एक अखबार ने इसे सुर्खियां बनाया था, वो भी प्रथम पृष्ठ पर। क्या भारत महाशक्ति बन गया। नहीं बना तो ऐसी वाणी संत के हो ही नहीं सकते। क्योंकि संत जो बोलता हैं, वहीं होता हैं। मन, वचन और कर्म से संत एक होते हैं।
ग. देश में रामदेव ऐसे पहले संत हैं, जो पुलिस के डर से लड़कियों/ स्त्रियों की पोशाक पहनकर भाग निकले। यानी देश में इन्होंने संतों को कायरों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। पर यहां के अखबार रामदेव की पोल नहीं खोलते..................। शायद उन्हें रामदेव में देश का भविष्य दिखाई पड़ता हैं।
ऐसे तो देश में कई ऐसे संत हैं, जो खुद को संत कहते हैं पर उनके बयान और हरकत देखिये तो साफ लगता हैं कि संत का लबादा ओढ़े ये पक्के व्यापारी हैं। जो टाटा, अंबानी और मित्तल जैसे कई व्यवासायिक घरानों को भी मात देने में आगे हैं।
एक संत हैं -- आसाराम बापू भारत में रहते हैं और सामान्य जन को भरी सभा में गाली दे देते हैं और खुद को आध्यात्मिक संत कहलाने में गर्व महसूस करते हैं।
एक संत हैं - श्रीश्री रविशंकर भारत में ही रहते हैं और उन्हें सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे नक्सली हो गये प्रतीत होते हैं। पर देश व मेरे प्रदेश की मीडिया को इसकी जानकारी होते हुए भी इनके खिलाफ बोलने व लिखने में परहेज होता हैं। शायद उन्हें पता हैं कि चूहे और बिल्ली की कहानी। और अंत में उस कहानी का सारांश कि आखिर बिल्ली की गले में घंटी कौन बांधे...................।

Wednesday, April 4, 2012

खुद को पत्रकार कहते हैं..........................

1. आप आठ घंटे से अधिक पत्रकारिता को देना ही नहीं चाहते, और खुद को पत्रकार कहते हैं। सच्चाई ये हैं कि आप आठ घंटे भी पत्रकारिता को दे दें, तो आपके जीवन और समाज दोनों में क्रांति हो जाये।
2. जैसे ही आपका आठ घंटा पूरा होता हैं, आपकी बॉडी और आत्मा काम करना बंद कर देती हैं, थोड़ा सा ज्यादा समय काम क्या कर लिया, दूसरे दिन आप काम करने के लायक ही नहीं रहते, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
3. आप पत्रकारिता को ग्लैमर समझते हैं, और इसके सिवा कुछ भी नहीं, जब पत्रकारिता को ग्लैमर समझ लिया, उसी दिन आप पत्रकारिता के लिए मृतप्रायः हो गये, आपको समझ लेना चाहिए।
4. आपको अपने परिक्षेत्र की जानकारी ही नहीं रहती, कि आपके परिक्षेत्र में क्या घटनाएं घट रही हैं या घटी थी या घटेगी, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
5. आपको स्वयं पर इतना गुमान होता हैं कि जैसे दुनिया की सारी विद्या आपकी आत्मा और शरीर में समा चुकी हैं, और इसलिए आप अपने से वरीय महानुभावों की सुनते ही नहीं। जिसके कारण आप स्वयं शुन्य में विचरित करते रहते हैं, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
6. समाज के सबसे निम्नवर्ग पर आपकी दया ही नहीं रहती और समाज के उच्च वर्ग व हाई सोसाईटी की दया आप पर बनी रहे, साथ ही उनके द्वारा सदैव उपकृत रहने की इच्छा पालते हैं, इसके लिए आप अपनी पूरी जिंदगी गुजार देते हैं, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
7. अपनी जिंदगी में कोई ऐसी खबर नहीं की, जिसका प्रभाव समाज और देश पर पड़ा हो, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
8. जहां आप काम करते हैं, वहां आपको मेहनताना दिया जाता हैं, उसके बावजूद भी नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और पूंजीपतियों से धन लेकर, खुद को प्रतिष्ठित कराने का ढोंग रचते हैं और खुद को पत्रकार कहते हैं।
9. अपने चाहनेवालों और धन लेकर कोई भी काम कराने की इच्छा पालकर, गलत धंधों में लगे रहते हैं और खुद को पत्रकार कहते हैं।
10. जिन्होंने ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता का पत्रकारिता में रिकार्ड बनाया और जिंदगी गुजार दी, उनका आप इज्जत नहीं करते और उन्हें भी अपने जैसा समझते हैं और खुद को पत्रकार कहते हैं।