Monday, September 21, 2015

सरयू की नाराजगी...........

बेचारे सरयू नाराज है। रांची से प्रकाशित एक अखबार ने प्रथम पृष्ठ पर उनकी नाराजगी की खबर छापी है और साइड में नाराजगी का कारण भी बता दिया है। भाजपा नहीं मानती पर सरयू के चाहनेवाले ताल ठोंक कर, डंके की चोट पर ये कहते नहीं भूलते कि वे भाजपा के थिंक टैंक है। रांची से प्रकाशित कई अखबार उनके चरणोदक पीने को सदैव इच्छूक रहते है, जिस दिन उनकी चरणोदक मिल गई, उस दिन कई अखबार और उनके मालिक व पत्रकार स्वयं को धन्य-धन्य महसूस करते हुए, ये समझते हैं कि उनका जीवन कृतार्थ हो गया। वे दामोदर बचाओ अभियान से भी जूड़े है, पर वे कितना दामोदर को बचा पाएं है, वे खुद ही अच्छी तरह बता पाएंगे, पर जहां तक मेरा मानना है अखबारों और न्यूज चैनल में दामोदर को लेकर इनके द्वारा किये गये प्रयास का जितना ढोल पीटा जाता है, उसका एक दृष्टांत तक दामोदर को देखने से नहीं मिलता।
फिलहाल जनाब, रघुवर दास से नाराज है। नाराज होना भी चाहिए, क्योंकि मैं खुद भी सरकार के काम-काज से प्रसन्न नहीं हूं। गाहे-बगाहे कुछ अखबार जो नीतीश के प्रेमरस में डूबे रहते है, वे भी रघुवर के खिलाफ कभी एक-दो खबरें पेश कर देते हैं, ताकि उनकी खबरों की निरपेक्षता बराबर झलकती रहें, पर बिहार व बंगाल जाते ही उस अखबार की निरपेक्षता तेल लेने निकल पड़ती है।
कहने का तात्पर्य है कि खबरों में बने रहने के लिए इस प्रकार के बयान, या अपनी राजनीति चमकाने के लिए गर ये बयान है तो इसकी जमकर आलोचना होनी चाहिए। आप सरकार में हैं, सरकार के एक जिम्मेदार मंत्री है तो खुल कर कहिये कि इस में हमारी भी भागीदारी है, हम भी गुनहगार है, पर खुद को शहनशाह बनाने की पेशकश करते हुए, अपने ही मुखिया की आलोचना करना, वह भी पद पर रहकर किसी भी प्रकार से ठीक नहीं। सरयू राय जिस मंत्रालय को संभाल रहे है, वह मंत्रालय किसी भी प्रकार से छोटा या बेकार मंत्रालय नहीं है, पर जो मंत्रालय उन्हें दिया गया है, उस मंत्रालय में उनके काम-काज कैसे रहे है?, पहले ये तो उन्हें बताना ही चाहिए, हालांकि चीनी के दामों को लेकर, राशन वितरण तक राशन दुकान में किस प्रकार धांधली चल रही है, उसके चर्चें अखबारों से लेकर, मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र तक पहुंच चुके है। जिस प्रकार से राशन दुकानों में धांधलियां चल रही हैं, अब तक नये राशन कार्ड तक नहीं बांटे गये है, उससे साफ पता लगता है कि सरयू राय ने अपने मंत्रालय के साथ न्याय नहीं किया और न ही वे किसी काम के लायक है, संयोग से इन्हें अन्य विभाग की जिम्मेदारी दी गयी, तो वे वहीं करेंगे, जो हाल खाद्य आपूर्ति मंत्रालय का उन्होंने कर रखा है। मेरा मानना है कि आलोचना वहीं करें, जिसने कुछ काम करके दिखाया हो, वो नहीं कि खुद काम नहीं करें और दूसरों को प्रवचन देना शुरु कर दे।
रघुवर सरकार के एक साल होने को है पर इस राज्य में आज तक किसी भी मंत्री ने कोई भी ऐसा काम नहीं किया, जिस पर वह गर्व कर सकें, हां बेवजह की बातें, अलोकतांत्रिक कार्य, जगहंसाई के काम इतने किये कि उस पर एक अच्छी पुस्तक बन जायेगी, शायद इसीलिए इस राज्य का नाम झारखंड है, फिलहाल सरयू राय ने डायलॉगबाजी कर दी है, देखिये अब इस डायलॉगबाजी का क्या असर होता है?

Sunday, September 13, 2015

लिपिक पर तोहमत लगाने के बजाय पर्यटन विभाग के सचिव को अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए.....

लिपिक पर तोहमत लगाने के बजाय पर्यटन विभाग के सचिव को अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए। 12 सितम्बर 2015 को रांची से प्रकाशित प्रभात खबर के पृष्ठ संख्या 08 में “राज्य में फिल्म शूटिंग पर शुल्क तय नहीं” शीर्षक से एक समाचार प्रकाशित हुआ। पूरे समाचार को पढ़ने पर यहीं पता चला कि यहां सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं...। यहां लिपिक विशेष विभागों की नीति बनाता है और उस लिपिक द्वारा बनायी गयी नीति को आईएएस आफिसर अपनी नीति बताकर राज्य सरकार की कैबिनेट में भेज देता है। कैबिनेट बिना उस नीति को पढ़े, बिना उसे जाने, बिना उसे समझे। यह कहकर पास करता है कि आईएएस द्वारा बनाया गया नीति है, जरुर ही राज्य हित में होगा, समाज का भला होगा। यह मानकर उसे कैबिनेट से पास करा देता है और जब कैबिनेट द्वारा पास कराये गये उस नीति की राज्य या देश भर में थू – थू होती है, तो बड़े ही सहज भाव में वह आईएएस आफिसर अखबार के किसी पत्रकार को बुलाकर यह कहता हैं कि भाई, ये नीति उसने नहीं तैयार की थी, वह तो लिपिक ने तैयार किया था, उसी से भूल हो गयी। कमाल है, कड़वा-कड़वा थू-थू, मीठा-मीठा चप-चप। अच्छा हो, प्रशंसा मिले तो काम आईएएस आफिसर ने किया और जब शिकायत मिले, आलोचना होने लगे, तो किसी लिपिक का नाम लेकर पतली गली से निकल जाने का काम, गर देखना हो, तो झारखंड आ जाइये।
आप कहेंगे – कि ये मैं क्या लिख रहा हूं, जो आपको समझ में नहीं आ रहा। तो मैं बता देता हूं, ये सारा मामला, राज्य के पर्यटन विभाग से संबंधित है। हुआ यूं कि राज्य सरकार के पर्यटन विभाग में एक बहुत ही दिमाग वाले, आईएएस आफिसर है, उन्हें लगता हैं कि दुनिया की सारी बुद्धि उन्हीं के पास गिरवी रखी हैं, इसलिए वह तरह-तरह के तिकड़म करते हैं, और उसमें उनके विभाग की तो बदनामी होती ही हैं, राज्य सरकार का भी बाट लग जाता है।
हाल ही में इस पर्यटन विभाग के सचिव ने झारखंड फिल्म शूटिंग रेगुलेशन एक्ट 2015 को कैबिनेट से पास करवा लिया। जिसमें राज्य में एक सप्ताह के शूटिंग के लिए 50 लाख रुपये का दर इस विभाग ने निर्धारित कर दिया। एक सप्ताह के बाद की शूटिंग के लिए प्रतिदिन के हिसाब से 10 लाख रुपये अलग से लेने की बात भी कहीं गयी थी। यहीं नहीं आवेदन देने के बाद, पंद्रह दिन तक विभाग की अनुमति मिली या नहीं उसका इंतजार करने आदि का ड्रामा भी उल्लिखित था, जिसका सबसे पहले मैंने विरोध किया था, जिसे आप मेरे फेसबुक व ब्लाग पर जरुर पढ़े होंगे। बाद में सभी ने इसका पुरजोर विरोध किया। इस विरोध में भाजपा के एक बड़े नेता अर्जुन मुंडा भी शामिल हो गये। जैसे ही अर्जुन मुंडा ने विरोध किया, उक्त आईएएस आफिसर ने पल्ला झाड़ने के लिए एक नये षड्यंत्र का सहारा लिया। जिसका जिक्र मैने उपर में किया है।
सवाल अब सरकार से.........
सरकार बताये कि क्या राज्य में फिल्म की शूटिंग का दर कितना हो या फिल्म नीति बनाने का अधिकार, पर्यटन विभाग को है?
क्योंकि राज्य सरकार का ही एक विभाग मंत्रिमंडल एवं समन्वय विभाग है, जो स्पष्ट रुप से विभिन्न विभागों के कार्यों को निरुपित करता है, उसने तो इसकी जिक्र ही नहीं की है, जब जिक्र नहीं है, तो पर्यटन विभाग ने फिल्म की शूटिंग और उसकी नीतियों पर एक्ट कैसे बना दी और उस एक्ट को सरकार ने मंजूरी कैसे दे दी? ये तो पूर्णतः गड़बड़झाला है, भाई। ऐसे में तो उक्त आईएएस अधिकारी पर कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि उसने तो सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और सरकार की इजज्त ली, सो अलग......
आइये देखते है क्या कहता हैं, झारखंड सरकार का मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग?
झारखंड सरकार का मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग का अधिसूचना जो 13 जुलाई 2015 को जारी किया गया। जो राज्य के विभिन्न विभागों के कार्यों को प्रदर्शित करता है। जो सरकार के अपर सचिव जितबाहन उरांव के हस्ताक्षर से अधिसूचित है ---
सी.एस.-01/आर.-2/2015-1235/ भारत के संविधान के अनुच्छेद 166 के खंड(3) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए झारखंड के राज्यपाल, मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग की अधिसूचना संख्या -07, दिनांक 16.1.2000 द्वारा बनायी गयी “झारखंड कार्यपालिका नियमावली 2000” (समय-समय पर यथा संशोधित) की अनुसूची -1 में निम्नलिखित संशोधन करते है -----
25 क. पर्यटन विभाग......
• पर्यटन की दृष्टि से धार्मिक, ऐतिहासिक एव दर्शनीय स्थलों का विकास।
• झारखंड में होटल उद्योग का विकास।
• देशी एवं विदेशी पर्यटकों के लिए आवास, परिवहन, मार्गदर्शन एवं उपहार की व्यवस्था।
• पर्यटन साहित्य प्रकाशन एवं विभिन्न साधनों द्वारा प्रचार।
• पर्यटन व्यवस्था के लिए स्थापित भिन्न –भिन्न साधनों द्वारा प्रचार।
• पर्यटन व्यवस्था के लिए स्थापित संस्थाओं जैसे – पर्यटन सूचना केन्द्र, युवा आवास, टुरिस्ट बंगला।
• पर्यटन में नियोजित सभी पदाधिकारियों का नियंत्रण।
• पर्यटन के दखल में सभी भवनों का प्रशासनिक प्रभार।
• सराय और सरायपाल।
• सभी सरकारी निरीक्षण भवन/गेस्ट हाउस का संचालन।
• पर्यटन सुरक्षा।
यानी कहीं भी फिल्म से संबंधित एक शब्द भी इसमें नहीं हैं, फिर भी पर्यटन विभाग के जनाब फिल्म शूटिंग की नीतियां व एक्ट बनाने में लग गये और लगे हाथों जो भी झारखंड में फिल्म बन रहे थे या बनाने की जो लोग सोच रहे थे, उनकी सोच का ही उक्त महाशय ने श्राद्ध कर डाला।
अब कुछ सवाल, सरकार से......
• क्या ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो गड़बड़ियां निकलने पर स्वयं को दोषी न मानकर लिपिक के सर गलतियों को मढ़ देते है?
• क्या ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो उनका काम नहीं हैं, फिर भी दूसरे के कामों में अड़ंगा लगाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते है?
• क्या ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो राज्य में किसी भी अच्छे काम को होने नहीं देना चाहते?
• क्या ऐसे अधिकारियों की गलती पकड में आने के बाद भी जब राज्य सरकार उक्त अधिकारी पर कोई कारर्वाई नहीं करें तो क्या लगता हैं कि यहां सरकार नाम की कोई चीज है?

Tuesday, September 1, 2015

धन्य है, रे भैया, झारखंड का पर्यटन विभाग.............

रांची से प्रकाशित “हिन्दुस्तान” समाचार पत्र के रांची लाइव नामक
पृष्ठ पर एक रिपोर्ट छपी है। रिपोर्ट है - “फिल्म सिटी की ओर
झारखंड ने बढ़ाया पहला कदम”। इस रिपोर्ट में राज्य के पर्यटन,
कला –संस्कृति और युवा कार्य विभाग और उसके सचिव अविनाश
कुमार की जमकर आरती उतारी गयी है। इस आरती में मुख्यमंत्री
रघुवर दास को भी शामिल किया गया है, यह कहकर कि जो
अविनाश कुमार ने फिल्मसिटी पर रिपोर्ट बनायी है, उस रिपोर्ट को
सीएम ने स्वीकृति दे दी है, गर ऐसा है तो यकीन मानिये, राज्य में
फिल्म उद्योग का भट्ठा बैठ जायेगा और इस राज्य में फिल्म
निर्माण, पर्यटन, कला संस्कृति और युवाओं के सपनों का श्राद्ध हो
जायेगा। श्राद्ध की तैयारी भी प्रस्ताव में बहुत अच्छे ढंग से कर ली
गयी है। कमाल है, अभी फिल्म नीति बनी नहीं, और गुपचुप तरीके
से झारखंड फिल्म शूंटिग रेगुलेशन – 2015 का निर्माण और सीएम
की स्वीकृति तथा हिन्दुस्तान अखबार में आज इस पर रिपोर्ट बताता
है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
आखिर कौन लोग हैं, जो राज्य में फिल्म उद्योग को फलने – फूलने
नहीं देना चाहते हैं, उसका काला चिट्ठा है आज के हिन्दुस्तान
अखबार की यह रिपोर्ट।
अब हम बात करते हैं, आज अखबार में छपी रिपोर्ट की, जिसका हम
अक्षरशः आपरेशन करेंगे।
अखबार ने छापा हैं कि अविनाश कुमार द्वारा बनाये गये प्रस्ताव में
वर्णित हैं कि फिल्म शूटिंग से संबंधित कार्यों को देखने के लिए
पर्यटन विभाग के सचिव को नोडल आफिसर बनाया जायेगा।
मेरा मानना हैं कि आप ही प्रस्ताव बनाओ, और आप ही प्रधान बन
जाओ, ये आप कर सकते हैं, पर सच्चाई ये हैं कि भारत सरकार से
लेकर, विभिन्न राज्यों के राज्य सरकार तक फिल्मों से संबंधित सारे
कार्य सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ही देखता है, गर आपको नहीं
विश्वास हैं तो जाकर भारत सरकार का आफिसियल वेबसाइट या
तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश या किसी भी राज्य का आफिसियल
वेबसाइट देख सकते है।
अखबार ने लिखा है कि जिस किसी भी व्यक्ति को फिल्म निर्माण
करनी होगी, उसके लिए एक आवेदन विभाग को देना होगा, आवेदन
के साथ शुल्क भी तय होगा, जो वापस नहीं होगा। 15 दिनों के अँदर
संबंधित व्यक्ति को विभाग की ओर से सूचित किया जायेगा कि
फिल्म शूटिंग की इजाजत है या नहीं।
मेरा मानना हैं कि जहां आज तक कोई फिल्म बनाने नहीं आया, जहां
किसी ने झांकने तक की कोशिश नहीं की, वहां माहौल बनाने के
पहले, माहौल बिगाड़ने की इजाजत उक्त अधिकारी को किसने दे दी?
क्या आपके यहां राज खोसला के परिवार के लोग, बी आर चोपड़ा के
लोग, यश चोपड़ा के लोग, राजकपूर के परिवार के लोग, राजश्री
प्रोडक्शन्स, रामोजी राव से जूड़े आदि फिल्म निर्माण की हस्तियां
आपके यहां हाथ जोड़कर आवेदन देने के लिए, वह भी शुल्क के साथ,
वह भी कि आप शूटिंग की इजाजत देंगे या नहीं, मन में भाव रखकर
आवेदन करेंगी कि आप की अपेक्षा वह उन राज्यों में अपना फिल्म
निर्माण करेंगी, जहां की सरकारों ने सुविधाओं का पिटारा खोल दिया
हैं। कमाल हैं एक तरफ आप दिल्ली और अन्य शहरों में उद्योग धंधे
राज्य में खुले इसके लिए व्यापार मेला में प्रतिभागी के रुप में भाग
ले रहे हो, और यहां जब अवसर खुलने की बात हो रही हैं तो जो
यहां आने की सोच रहे हैं, उनसे अपनी आरती उतरवाने की सारी
योजनाओँ को मूर्त्तरुप देने में लगे हो, कमाल हैं भाई तुम्हारी सोच
की। फिल्म निर्माण से जूड़ी हस्तियां तुम्हारे 15 दिन के इंतजार की
अपेक्षा इंडोर या आउटडोर शूटिंग के लिए हैदराबाद या अन्य फिल्म
सिटी में अपना आशियाना नहीं ढूंढेंगी क्या। ये बातें तुम्हें समझ में
क्यों नहीं आती।
अखबार ने लिखा हैं कि प्रस्ताव में शूटिंग का शुल्क विभाग तय
करेगा। एक सप्ताह से अधिक शूटिंग चलाने पर प्रतिदिन दस हजार
रुपये देना होगा, इसके अलावा अगर सुरक्षा के लिहाज से पुलिस की
जरुरत हैं, तो उसका शुल्क अलग होगा।
आश्चर्य हैं रे भाई, आप मुंह पर खुब अच्छे-अच्छे कंपनी का पाउडर
और तेल मल लीजिये, एक भी फिल्म निर्माता आपके यहां इस प्रकार
की नीति रखेंगे तो नहीं आयेगा, क्योंकि कई राज्य सरकार इस प्रकार
की सुविधा मुफ्त में मुहैया करा रही हैं।
जिसने भी इस प्रकार की नीति बनायी हैं, उसकी सोच पर मुझे तरस
आता हैं, आज हमें ये भी पता लग गया कि क्या कारण हैं कि
पर्यटन झारखंड में पिछड़ गया, अरे जहां इस प्रकार के अधिकारी
होंगे, उस राज्य का तो भगवान ही मालिक है।

वाह-वाह, बिहार का नेता है.................

ये बिहार का नेता है
वाह-वाह, बिहार का नेता है
लालटेन तीर हाथ पकड़
सबका अपमान कर जाता है
वाह-वाह.............
जो पशुचारा खा जाता है
पत्नी को सीएम बनाता है
जो जातिवाद फैलाता है
संकीर्णता रास रचाता है
महिला को धौंस दिखाता है
जो बिहार बंटवाता है
वाह-वाह..........
जनता को नित दिन ठगता है
चश्मबाग दिखलाता है
कल तक हाथ में कमल दिखा
आज लालेटन पकड़ाता है
जहां चाणक्य ने जन्म लिया
जो चंद्रगुप्त प्रधान किया
वहा कंस बन करके नेता
खुद को कृष्ण बोलवाता है
वाह-वाह.................
जो कसमें बहुत ही खाता हैं
कहता बिजली दिलवाता है
पांच साल अब बीत गया
फिर भी वह नही शरमाता है
वाह वाह...................
खुद ही अनीति कर जाता हैं
पर नीतीश कुमार कहलाता है
बार-बार भीख मांग मांग
सब के आगे नच जाता है
वाह वाह...............
पटना में गंदगी करा दिया
पूरे बिहार को शरमा दिया
कभी केजरी, कभी मुल्लू
कभी सोनिया को, ठुमक दिखाता है
वाह वाह..................

Wednesday, August 26, 2015

“मांझी – द माउंटेन मैन” ये बाते कुछ हजम नहीं हुई...........

“मांझी – द माउंटेन मैन”
ये बाते कुछ हजम नहीं हुई...........
आजकल “मांझी – द माउंटेन मैन” फिल्म की चर्चा जोरों पर है। जिसे देखो – दिये जा रहा हैं। टीवी पर मांझी, अखबारों में मांझी, पत्रों में मांझी और पत्रिकाओं में मांझी। कोई मांझी से खुद को जबर्दस्ती जोड़े जा रहा हैं, पुरानी अखबारों के कतरन के साथ कि सबसे पहले हमनें इस खबर को स्थान दिया था, तो कोई अखबार दिये जा रहा हैं, कि गर वो नहीं होता तो मांझी को इतना स्थान नहीं मिलता, लोग जानते ही नहीं, जबकि सच्चाई ये हैं कि आपका हर अच्छा काम, आपको वो स्थान दिलाकर रहता हैं, जिसके आप हकदार हैं, चाहे इसके लिए आपके जीवन में कितनी भी रुकावटें क्यों नहीं आये। दशरथ मांझी – उसके जीते जागते उदाहरण है। एक ऐसा व्यक्ति जो दलित समुदाय से आता है। जिसका जीवन ही गाली से शुरु होता हैं और गाली पर ही खत्म हो जाता है, पर ये व्यक्ति किसी का प्रतिकार नहीं करता, वह तो कठोर पठार को काटकर, सड़क बना देता हैं, जिस रास्ते पर आज लोग चल रहे हैं, उसके लिए उसने कितनी गालियां सुनी, कितने ताने सहे, कितने थपेड़ें सहे, पर लक्ष्य को पाकर रहा। इस लक्ष्य को पाने के लिए, उसे क्या-क्या नहीं करना पड़ा। पर वो स्थितियां व परिस्थितियां आज भी मौजूद है।
जरा देखिये........
उसके नाम पर फिल्म बन गयी, पर उसके लोगों व समुदाय का क्या हाल हैं....जिन लोगों ने उसके नाम पर करोड़ों कमाए या कमा रहे हैं, उन्होंने क्या किया?
एक चैनल हैं, मैं उसे अराष्ट्रीय चैनल मानता हूं, नाम हैं – एनडीटीवी। देख रहा था, जिसमें दशरथ मांझी के परिवार के लोग बोल रहे थे कि सुप्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान आये। बोले कि दशरथ का घर बनवा देंगे, पर घर आज तक नहीं बना। क्या आमिर खान के पास इतने पैसे भी नहीं कि वो दशरथ मांझी के परिवार को दो कोठरी का घर बनवाकर दे दें। और जब उसे बनवाना नहीं था तो फिर वायदा क्यों किया।
दूसरी बात, दशरथ मांझी के ही परिवार से जूड़े एक महिला का कहना था कि वो पानी के लिए काफी दिक्कत उठा रही हैं, एक चापाकल हो जाता तो मजा आ जाता। क्या वहां एक चापाकल लगवाने की भी ताकत किसी में नहीं हैं। जबकि अखबारवाले या पत्रकार जो चिल्ला – चिल्लाकर भोंपू बजाकर ये कह रहे है कि मैंने पहले छापी तो क्या वे भी इस हालात में नहीं कि वहां एक चापाकल लगवा दें। हद हो गयी भाई। हमें पानी की जरुरत हैं और लोग कह रहे हैं अखबार पढ़ों, हमें भोजन की जरुरत हैं और लोग कह रहे हैं सिनेमा देखो। कमाल है........
और फिल्म भी मैंने देखी, देखकर निहाल हो गया.......
फिल्म में श्रीमती इंदिरा गांधी भी हैं, जो बोल रही हैं कि उनके हाथों को मजबूत करिये, कमाल है गरीबी हटाओ की बात हो रही हैं, इमरजेंसी के पहले का चित्रण हैं और हाथ को मजबूत की बात। कोई बता सकता हैं कि इंदिरा जी का चुनाव चिह्न हाथ कब हुआ।
यहीं नहीं, मांझी दिल्ली जा रहा हैं और जनक्रांति की बात हो रही हैं, ये जनक्रांति क्या हैं भाई, कब हुआ था......हमें तो मालूम नहीं। हां संपूर्ण क्रांति सुना था, जयप्रकाश नारायण ने आह्वान किया था। बात 1974-75 की हैं। यानी जो मन करें दिखा दो, जो मन करें तकिया- तकिया खेला दों, और माल बटोर लो। दशरथ के नाम पर पैसा और ख्याति मिले और क्या चाहिए......

देश जाये तेल लेने और मांझी का परिवार जाये तेल लेने। हम तो बम बम हो गये न.......

Tuesday, August 18, 2015

ऐसे आईएएस व आईपीएस अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई हो...........

15 अगस्त बीते हुए तीन दिन हो गये, पर झारखंड में नियोजित आईएएस और आईपीएस को, अभी भी स्वतंत्रता दिवस की खुमारी नहीं उतरी हैं। वे बेमतलब के दिये जा रहे है, आम जनता की गाढ़ी कमाई दोनों हाथों से लूटा रहे हैं और अखबारों के मालिकों की तिजोरी भरते चले जा रहे हैं। तिजोरी भरने के चक्कर में ये आईएएस और आईपीएस मुख्यमंत्री तक को मात दे रहे हैं। अभी भी विभिन्न अखबारों में उनके द्वारा दिये जा रहे भारतीय स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं – लंबे-चौड़े रुप में छपते चले जा रहे हैं। क्या ये बता सकते हैं कि इससे आम जनता को क्या फायदा हो रहा है। किसी झारखंड की जनता ने इनसे शुभकामना संदेश मांगा हैं क्या। गर नहीं तो फिर ये ऐसा क्यूं कर रहे हैं।
जरा इन आईएएस-आईपीएस से पूछिए कि वे जो विज्ञापन के नाम पर दोनों हाथों से राज्य के राजस्व को लूटा रहे हैं, क्या कभी अपने पैसे से अपने घर के किसी सदस्य का इसी प्रकार का विज्ञापन कभी छपवाया हैं। उत्तर होगा – नहीं। तो फिर आम जनता के पैसे को वे इस तरह क्यूं बर्बाद कर रहे हैं।
क्या मुख्यमंत्री को इस पर संज्ञान नहीं लेना चाहिए...........
हम तो चाहेंगे कि भारतीय स्वतंत्रता दिवस के नाम पर जिन – जिन अधिकारियों ने बेवजह के विज्ञापन विभिन्न अखबारों में छपवाएं हैं, उसका भुगतान इन अधिकारियों के मिलनेवाले वेतन से करायी जाय, ताकि फिर कोई अधिकारी इस प्रकार की हरकतें न करें। आम तौर पर विज्ञापन जनहित में सरकार की विभिन्न योजनाओँ को जन-जन तक पहुंचाने के लिए किया जाता हैं, पर यहां तो गजब हो गया हैं। इस प्रकार से स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर विज्ञापन की गंगा – यमुना, अखबारों में बहा दी जाती हैं कि पूछिये मत। जिसका औचित्य भी नहीं होता।
आजकल तो एक नया फैशन चल पड़ा हैं, अब तो अखबारों के जन्मदिन पर भी ये अधिकारी सरकार का खजाना जमकर लूटा रहे हैं और अखबारों को विज्ञापन की राशि से मुंह भर दे रहे हैं, गर इस गरीब राज्य में यहां के अधिकारी इसी प्रकार की हरकतें करेंगे तो यकीन मानिये, राज्य की जनता का बहुत बड़ा अहित हो जायेगा। इसलिए मुख्यमंत्री को चाहिए कि इस प्रकार के अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें और उनसे पूछे कि जो विज्ञापन निकाले गये या निकाले जा रहे हैं, उनके औचित्य क्या थे। कम से कम इनसे कारण पृच्छा तो होनी ही चाहिए और इस प्रकार के विज्ञापन देने की प्रथा पर तत्काल प्रभाव से रोकनी चाहिए, ताकि जनता के पैसे का दुरुपयोग न हो।

Friday, August 14, 2015

एकश्चन्द्र तमो हन्ति ना च तारा शतैरपि.......

आप 31 के हो जाएं,
या 62 के,
क्या फर्क पड़ता है राज्य अथवा देश को,
जब आपने औरों की तरह चरित्रहीनता का लबादा ओढ़ लिया,
ये सच हैं कि,
आप पहले एक स्थान से छपते थे,
पर आपका सम्मान था,
आज, अब कई जगहों से छप रहे हैं,
पर यकीन मानिये,
आपने वो मुकाम खो दिया,
जो आम जनता के दिल में,
आपके लिए विशेष तौर पर पनपा था,
हां, आपने वो मुकाम खुद बनाया था,
पर आपने उसे अपने ही हाथों से मिटाया,
आप तो ये भी कह सकते हैं
तो क्या हुआ,
हां, क्या हुआ,
पर सम्मान वाले को सम्मान की चिंता होती हैं न,
आप तो सम्मान को ही ऐसी जगह बैठा दिया,
कि बेचारी नीलाम हो गयी,
चले थे, मशाल लेकर,
अधेरे को चीरने,
पर अंधेरे ने ही आपको निगल लिया,
आपको क्या,
आप उस मां से पूछिए,
जिसने आपके लिए अपना बेटा खो दिया,
उस पत्नी से पूछिए,
जिसने आपके लिए अपना पति खो दिया,
आपके लिए तो सुभाषित की एक पंक्ति ही काफी हैं,
समझना हैं तो समझिए,
नहीं समझना हैं, तो मत समझिए,
आप तो ऐसे भी कई जगह से छपने शुरु कर दिए हैं,
वो कहते हैं न कि कनगोजर को एक पैर टूट गया,
तो क्या हुआ,
ठीक हैं भाई, ऐसा ही सोचिए,
पर जाते – जाते एक सुभाषित की पंक्ति आपके लिए,
एकश्चन्द्र तमो हन्ति ना च तारा शतैरपि.......

Thursday, August 13, 2015

नीतीश का डीएनए करे पुकार...............

नीतीश का डीएनए करे पुकार
बबुआ नीतीश अब जइब हार
पहले दिया लालू को झटका
बाद में दिया भाजपा को अटका
लगे हाथ मांझी को पटका
फिर दिया चारा लालू को डाल
बबूआ नीतीश अब जइब हार
जंगल राज का देख रहा सपना
गंदगी - मैला से ढक दिया पटना
न कोई नीति न हैं सिद्धांत
बबुआ नीतीश अब जइब हार
राबड़ी खुश हो, देख रही सपना
घूटना टेक, नीतीश हुआ अपना
एमएलए बनेगा, पुतर हमार
बबुआ नीतीश अब जइब हार
तीर- लालेटन मे होड़ मची है
भ्रम पाल, सब लगी हुई है
जनता पटखनी देने को तैयार
बबुआ नीतीश अब जइब हार

Tuesday, August 4, 2015

बिहार में पत्नी युग की शुरुआत......

आज अखबारों में पढ़ा। बोकरादी बाबू यानी शत्रुघ्न सिन्हा अपनी पत्नी पूनम सिन्हा को जदयू का टिकट दिलाने के लिए बेचैन है। ऐसे भी उनके प्रिय कुशासन बाबू यानी नीतीश कुमार, जब बोकरादी बाबू के लिए कुछ भी करने को तैयार हो... तो ऐसे में पूनम सिन्हा को जदयू की टिकट मिलने में दिक्कत नहीं होगी...यानी कल तक लोकनायक जयप्रकाश को अपना जगतगुरु शंकराचार्य बतानेवाले, संपूर्ण क्रांति में अपना सिद्धांत ढूंढनेवाले, इंदिरा गांधी को परिवारवाद के नाम पर कोसनेवाले, जंगलराज के अधिष्ठापक लालू यादव के पदचिह्नों पर चल दिये हैं, जैसे लालू ने अपनी पत्नी को सीएम बनाया। बोकरादी बाबू को सीएम बनाने की औकात नहीं, तो कम से कम अपनी पत्नी को विधायक ही बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं तो क्या गलत हैं। बिहार पुराण में तो लिखा ही हैं - सर्वे गुणाः भार्ययामाश्रयन्ति अर्थात् सारे गुण पत्नी का आश्रय लेते हैं, इसलिए जो व्यक्ति पत्नी के चरणचिह्नों पर बलिहारी होते हुए पत्नी के लिए ही जीता और पत्नी के लिए ही मर जाता हैं, वहीं व्यक्ति असली में नेता, असली में अभिनेता और असली में महान नागरिक हैं....भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाखां -ये सारे के सारे महान देशभक्त..निरामूर्ख थे, असली देशभक्त तो अपने बोकरादी बाबू है...इसलिए बिहार के सारे युवाओँ को बोकरादी बाबू से प्रेरणा लेते हुए, देश के लिए जीना छोड़कर, सिर्फ और सिर्फ अपनी पत्नी के लिए जीने का संकल्प लेना चाहिए, क्योंकि पत्नी हैं तो जीवन हैं, पत्नी हैं तो आनन्द हैं और पत्नी हैं तो सारे तीर्थ है.........
ऐसे भी बोकरादी बाबू के कभी दोस्त रहे, सुपरस्टार दिवंगत अभिनेता राजेश खन्ना ने फिल्म "सौतन" में अपनी पत्नी को मनाने के लिए एक गाना गाया था, उसके बोल थे.....
सासु तीरथ, ससुरा तीरथ, तीरथ साला-साली है
अरे दुनिया के सब तीरथ झूठे चारो धाम घरवाली है......
जब चारो धाम घरवाली ही हैं तो फिर बोकरादी बाबू, अपनी पत्नी के लिए इतना कर रहे हैं तो गलत क्या हैं। अब जहां से बोकरादी बाबू की पत्नी लडे़गी, वहां की जनता क्या निर्णय लेती हैं, मेरा ध्यान उसी ओर होगा...चलिए बिहार में पत्नी युग की शुरुआत करने के लिए महान नेता लालू और बोकरादी बाबू दोनों को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनाएँ....साथ ही कुशासन बाबू को भी मेरी ओर से बधाई, क्योेंकि लालू के बाद पत्नी युग को बढ़ावा देने के लिए इन्होंने भी तो कमर कस ली....

Monday, July 27, 2015

सरकार कायर है, पर जनता नहीं.........

सरकार कायर है, पर जनता नहीं.........
जनता ऐसे अखबारों/चैनलों का बहिष्कार करें, ऐसे पत्रकारों का बहिष्कार करें.............
• जिन्हें नेताओं में खुदा दीखता हो(आजकल रांची से प्रकाशित एक अखबार को नीतीश कुमार में खुदा दीख रहा है)........
• जो झूठी खबरें बार-बार प्रकाशित करता हो(एक अखबार ने छाप दिया कि राज्यपाल की गाड़ी बीस मिनट तक खड़ी रही, गाड़ी में पेट्रोल नहीं रहने के कारण)........
• जो विज्ञापन के लिए सामाजिक ताना-बाना को तोड़ता हो, और बिल्डरों-गुंडों को, अपने अखबारों में, देश के दिवंगत महान नेताओं की तरह पेश करता हो.......
• जो बिल्डरों से अपने कार्यक्रम को संपन्न कराने के लिए मुंहमांगी रकम वसूलता हो, और वह बिल्डर झारखंड की आम जनता के पैसे को चकमा देकर लूट लेता हो.........
• जो अपने मातहत कार्य करनेवाले, कर्मचारियों और पत्रकारों को सही समय पर तो दूर, उन्हें उचित पारिश्रमिक नहीं देते हो, जिस पारिश्रमिक के बारे में केन्द्र सरकार या राज्य सरकार ने एक मानदंड स्थापित किया हो..........
देश आपका, प्रदेश आपका। जिम्मेवारी आपकी भी बनती है। क्या प्रतिदिन, आप चार-पांच रुपये में अखबार, सिर्फ इसलिए खरीदते हैं कि वे जो मन करें, छाप दें और आप उसे पढ़ने के लिए मजबूर हो। आप चैनल वालों को हर महीने दो सौ से तीन सौ रुपये इसलिए देते हैं कि वे जो मन करें वो दिखाएँ और आपके परिवार, समाज और देश का माहौल खराब कर दें। नहीं न, तो फिर आज ही इनके खिलाफ कमर कसिए और हल्ला बोलिए, पर गांधीवादी तरीके से..........

यानी बिहारी बाबू बन गये बोकरादी बाबू.........

अब तो नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं लेकिन हम आपको बता दें कि जब से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बात चली थी, तभी से बिहार का एक भाजपा नेता व फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को बोकरादी की बीमारी लग गयी, बेचारा पगला गया। उसे नीतीश और लालू में खुदा नजर आने लगा। कारण बिहार के लोग भी जानते हैं और हम भी, गर कोई नहीं जानता हैं, तो वह भी जान ले, चूंकि शत्रुघ्न सिन्हा की जिंदगी में गर कोई उसका सबसे बड़ा शत्रु हैं तो वह हैं अमिताभ बच्चन। अमिताभ बच्चन और नरेन्द्र मोदी के बीच किस प्रकार की दोस्ती चल रही हैं, वह सभी जानते है। कैसे नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए और डीडी किसान चैनल को प्रमोट करने के लिए अमिताभ बच्चन को स्थान दिया। ऐसे में भला शत्रुघ्न सिन्हा को बोकरादी की बीमारी का बढ़ जाना स्वाभाविक हैं, इसलिए वह नरेन्द्र मोदी को थोड़ा डोज देना चाहता हैं, पर वो नहीं जानता कि नरेन्द्र मोदी एक ऐसे शख्स का नाम हैं कि वह शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई लोगों की बोकरादी छुड़ा चुका हैं, ऐसे अभी जिस शत्रुघ्न सिन्हा को नीतीश व लालू में खुदा नजर आ रहा हैं, उन दोनों को नरेन्द्र मोदी जो हैं, बोकरादी छुड़ा चुका हैं तो फिर शत्रुघ्न सिन्हा किस खेत का मूली है....शत्रुघ्न सिन्हा, बिहार के लिए क्या किया हैं, सभी जानते हैं। जब फिल्म स्टार था, जब उसकी चलती थी तो बोला था कि वो बिहार के लोगों के लिए कुछ करना चाहता हैं, कैंसर हास्पिटल खोलने की बात करता था, पर सच्चाई ये हैं कि इसने बिहार के लोगों को सपना तो दिखाया, पर उसने सपने पूरे नहीं किये। हां बिहार के लोगों को समय - समय पर धोखा देकर, वह कई बार सांसद जरुर बन गया। जरा इस बोका बिहारी से पूछिये कि वह सांसद रहते हुए, बिहार के लिए क्या किया...पता चलेगा कुछ नहीं, फिलहाल अमिताभ बच्चन को मिल रही इज्जत से वह पागलपन का शिकार हो गया हैं, इसलिए कभी वो याकूब मेनन जैसे आतंकी के पक्ष में तो कभी नीतीश व लालू के पक्ष में अनाप-शनाप बयान दिये जा रहा है, और जिस थाली में खा रहा हैं, उसी में छेद कर रहा हैं। ये हैं बिहारी बाबू का असली चेहरा...यानी बिहारी बाबू बन गये बोकरादी बाबू.........

Wednesday, July 22, 2015

अब इन मूर्खों को कौन समझाएं............

हजारीबाग की खबर, आज चर्चा में है, सूर्खियों में हैं, जितने लोग, उतनी ही चर्चाएं, इस चर्चा से लोगों की बुद्धिमता, और यहां के संपादकों/पत्रकारों/छायाकारों के विशाल ज्ञान भंडार का भी पता चल गया है। रांची से प्रकाशित सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने एक खबर फोटो के साथ लगायी है। जिसमें राज्य की मानव संसाधन मंत्री नीरा यादव हजारीबाग के एक स्कूल में पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम के चित्र पर जीते जी माला पहना दी, श्रद्धांजलि दे दी। अखबारों ने ये भी लिख दिया कि ऐसा कार्य संवैधानिक पद पर बैठे हुए, व्यक्ति ने की हैं। उनका इशारा इस ओर है कि माननीय मानव संसाधन मंत्री नीरा यादव को ऐसा नहीं करना चाहिए था। कुछ अखबारों ने नीरा यादव के बयान भी छापे है, बयान इस प्रकार है कि जैसे लगता हो कि नीरा यादव को भी लगता हैं कि उन्होंने ऐसा कर कुछ गलत कर दिया। जब मन में पछतावा का बोध हो, तो इसे प्रायश्चित के रुप में देखा जाना चाहिए, यानी संबंधित व्यक्ति को लगता हैं कि उसने ऐसा कर गलत किया है.....
पर माननीय मानव संसाधन मंत्री नीरा यादव जी, और यहां के महान अखबारों के महान संपादकों आज मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं, शायद वो कहानी आप सुने भीं होंगे, पर आज आर्थिक उदारीकरण की बहाव में आप इतना बह गये कि आपको पता ही नहीं चल रहा हैं कि आप कहां हैं, भारत या विदेश में। इसमें आपकी भी गलती नहीं, ये सब समय का कुचक्र हैं, ये अभी चलेगा........
वो कहानी इस प्रकार है.......
एकलव्य नामक एक भील बालक था। उसे पता लगा कि द्रोणाचार्य कौरवों और पांडवों को धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे हैं। वह भील बालक द्रोणाचार्य के पास गया और उसे भी धनुर्विद्या की शिक्षा मिले, इसकी प्रार्थना की, पर द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या की शिक्षा देने से मना कर दिया। उस भील बालक एकलव्य ने संकल्प किया, कि वह जैसे भी हो, धनुर्विद्या सीखेगा। उसने वन में जाकर द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनायी और उसे गुरु मान लिया। प्रतिदिन उस प्रतिमा पर जाकर माल्यार्पण करना, उसका पूजन करना, उसका दिनचर्या बन गया, और इस प्रकार स्वयं धनुर्भ्यास करने लगा। एक दिन द्रोणाचार्य को उसके दिव्य धनुर्ज्ञान का पता चला। वे अपने शिष्यों के साथ उस भील बालक एकलब्य को ढूंढने निकले। वह रास्ते में ही मिला। द्रोणाचार्य को देख, एकलव्य ने प्रणाम किया। द्रोणाचार्य को समझते देर नहीं लगी, कि ये वहीं बालक एकलव्य हैं, जिसके धनुर्ज्ञान ने उन्हें यहां तक ले आया है। द्रोणाचार्य ने पूछा-बालक एकलव्य तुम्हारे गुरु कौन है, जिन्होंने ऐसी दिव्य शिक्षा दी। एकलव्य ने बड़ी ही विनम्रता से कहा - वो गुरु आप ही हैं महाशय। द्रोणाचार्य आश्चर्य में पड़ गये। द्रोणाचार्य ने कहा - कैसे। एकलव्य ने कहा कि मैं प्रतिदिन आपकी प्रतिमा के समक्ष, आपको प्रणाम कर, आदर देकर, मैं धनुर्भ्यास करता हूं, जिसके बल पर आज मैं धनुर्धर बन सका। द्रोणाचार्य आश्चर्य में पड़ गये और जब उन्होंने फूल-मालाओं से लदी अपनी प्रतिमा देखी, तो वे और आश्चर्य में पड़ गये। अंत में द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा के रुप में एकलव्य का अगूंठा ले लिया, पर गुरुभक्ति और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धऱ के रुप में एकलव्य आज भी जिंदा हैं।
ये जीवंत कथा, बहुत कुछ बता देती है कि जीवित व्यक्ति को पूजा जाना चाहिए या नहीं.......गर नहीं समझ में आ रहा तो और मैं इसे विस्तार से बता देता हूं। एकलव्य जब गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा का प्रतिदिन पूजा करता था, उस वक्त द्रोणाचार्य मरे नहीं थे, वे शारीरिक वेश में सभी के सामने मौजूद थे। ये आज के संपादकों/पत्रकारों/छायाकारों को जान लेना चाहिए। साथ ही अपराधबोध से ग्रसित मानव संसाधन मंत्री को भी जान लेना चाहिए। अपने यहां गुरु को देव से भी बड़ा माना गया हैं, उच्च स्थान दिया गया है। जरा इस पँक्ति को देखिये...
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, जो गोविंद दियो बताय।।
तैतरियोपनिषद् कहता है.....
मातृदेवो भव
पितृदेवो भव
गुरु देवो भव
अतिथिदेवो भव
यानी तीसरा स्थान गुरु का है, इस कारण भी हृदय में देव भाव रखकर, जिन गुरु के प्रति आप सम्मान प्रकट कर रहे है और वे गुरु जब आपके समक्ष किसी कारण से जीवित रहने के बावजूद मौजूद नहीं हो, तब भी उनके चित्र पर माल्यार्पण करना, उनकी आरती तक उतारने में कोई बुराई नहीं। हां बुराई तब है, जब वो गुरु जीवित हो या मृत, पर आपके मन में उनके प्रति श्रद्धा नहीं, ऐसे हालात में आप क्या है - मनुष्य या पशु, स्वयं समझ लीजिये। हमें लगता हैं कि सभी लोगों के मन में ये बात स्पष्ट हो गयी होगी, कि मंत्री नीरा यादव ने एपीजे अब्दुल कलाम के चित्र पर माल्यार्पण कर, या उन्हें तिलक लगाकर कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ें। हां शर्मिंदगी उन्हें उठानी चाहिए, जो स्वयं को बहुत बड़े शंकराचार्य मानकर, अखबारों में बेवजह इस प्रकार की फोटो डालकर, बेवजह का समाचार बनाकर, पूरे प्रदेश के नागरिकों में भ्रांति फैला दी.............

Tuesday, July 21, 2015

सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठनेवालों को ये जान लेना चाहिए कि वो जो कर रहे हैं, वह भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही आता है, जैसे.............

सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठनेवालों को ये जान लेना चाहिए कि वो जो कर रहे हैं, वह भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही आता है, जैसे.............
1. सत्ता में आते ही किसी अन्य दल के विधायकों को तोड़कर अपने दल में मिला लेना ( याद करें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के 13 दिन के शासन के भाषण का वह अंश - किसी दल को तोड़कर सत्ता प्राप्त करनी हो तो ऐसी सत्ता को हम चिमटे से भी छूना पसंद नही करते....)
2. सत्ता में आते ही, अपने कर्मचारियों और जनता के हितों को न देख, सबसे पहला अपना हित देखना और अपने, अपने मंत्रियों और विधायकों साथ ही अन्य दलों के विधायकों के वेतन में वृद्धि करने का प्रस्ताव स्वीकार करना ( याद रहे, आप जन प्रतिनिधि है, जन सेवक हैं न कि शासकीय कर्मचारी और अधिकारी...)
3. सत्ता में आते ही, एक ऐसे व्यक्ति (एक न्यूज चैनल के मालिक) के घर जाकर चाय पीने की हिमाकत करना-भोजन करना, जिसे न्यायालय एक आरोप में खोज रही हैं। जिसके खिलाफ गैरजमानतीय वारंट जारी है और जिसे आपकी पुलिस उसे गिरफ्तार करने के बजाय, उसे सुरक्षा दे रखी है।
4. सत्ता में आते ही सदन में ये बयान देना कि जयपुर के एक यौन शोषण के आरोपी को पुलिस गिरफ्तार करने राजस्थान जायेगी और बाद में आप ही के एक पुलिस प्रवक्ता का ये बयान की उक्त आरोपी के खिलाफ कोई वारंट जारी नही हुआ हैं, इसलिए उसकी गिरफ्तारी नहीं हो सकती और बाद में उसी आरोपी के चैनल में जाकर शान से अपना इंटरव्यू प्रसारित करवाना। इससे किसका मनोबल बढ़ा, उस बेटी का जिसने उक्त व्यक्ति पर यौन शोषण का आरोप लगाया, या उस व्यक्ति का जिस पर यौन शोषण का आरोप है, हद तो तब हो गयी, कि वो व्यक्ति अंत में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ विदेश यात्रा में भी शामिल हो गया। आश्चर्य, घोर आश्चर्य.......
5. जनता की सुरक्षा पर ध्यान न देकर, अपनी सुरक्षा के लिए पांच-पांच पजेरो निकलवाना, क्या ये सचमुच बहुत ज्यादा जरुरी हैं, अरे आप जब उपमुख्यमंत्री थे तो आप बिना सुरक्षा के चला करते थे, आज क्या हो गया.............
6. जो देश के लिए मरे, उस शहीद को देने के लिए मात्र 2 लाख और अपनी सुरक्षा के लिए एक करोड़ की गाड़ियों का काफिला की खरीद................वाह रे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवाले नेता, वाह री सरकार......तुम्हारा जवाब नहीं......
7. 1 जून को मैंने फेसबुक पर एक आलेख पोस्ट किया और किसी ने उसकी सूध तक नहीं ली...........वो आलेख इस प्रकार था, पर किसी ने उस पर कार्रवाई तक नहीं कि...आलेख था.......
बच्चे परिणाम चाहते हैं...........
आखिर आप ये तो बताएं कि इन बच्चों ने कौन सा पाप किया है कि आपके वरीय पुलिस अधिकारी इनकी बात नहीं सुनते या इनकी वेदना पर अट्टहास करने से बाज नहीं आते..................
हम जहां रहते हैं, वहां एक बहुत ही गरीब घर का बच्चा रहता है, नाम है – लखू। उसने कुछ सपने देखे है, अपने परिवार के लिए, उसे लगता हैं कि अब सपने पूरे होनेवाले है, वह भी तब जब जैप विज्ञापन संख्या – 02/2011 के बोर्ड नं. 1 का मेरिट लिस्ट निकलेगा। लखू जैसे एक नहीं कई लड़के होंगे, जिनकी हैसियत या औकात नहीं कि दिल्ली या और किसी महानगर में जाकर हराम के पैसे कमानेवाले परिवार के बच्चों की तरह आईएएस व आईपीएस की तैयारी कर सकें। हां मैं एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि गर इन्हें मौका मिले और सरकार मदद कर दें, इन बच्चों की, तो यकीन मानिये हराम की कमाई खानेवाले इन बापों के बेटे किसी जिंदगी में अपने बाप के सपनों को पूरा नहीं कर पायेंगे, क्योंकि तब इन सभी पर इन गरीब ईमानदार बापों के बेटों का कब्जा होगा।
8. आज भी, जो पैरवीपुत्र हैं, धनकुबेर हैं, रांची में विभिन्न पदों पर कुंडली मार कर वर्षों से बैठे हैं, उन्हें उस पद से नहीं हटाया जाता, पर सामान्य लोगों पर आज भी तलवार लटकती हैं। आज प्रभात खबर ने तो ऐसे लोगों के नाम तक छाप डाले हैं, क्या राज्य सरकार ऐसे लोगों का स्थानांतरण करेगी, इसका क्या जवाब हैं, सरकार के पास.....जनता जानना चाहती है।

क्योंकि ये भी भ्रष्टाचार है..................

14 जुलाई को प्रभात खबर के प्रथम पृष्ठ पर "हटाये जायेंगे रांची के अवर निबंधक" नाम से खबर छपी है। इस खबर को लेकर प्रभात खबर ने पिछले दिनों 8 जुलाई को इसी से संबंधित खबर "हाल रांची रजिस्ट्री कार्यालय का.....हर दिन तीन लाख की अवैध कमाई" नामक खबर का एक दृष्टांत भी दिया है। इस दृष्टांत के माध्यम से उक्त अखबार ने अपनी पीठ भी थपथपायी हैं कि देखिये हमारे खबर का असर, कैसे प्रभात खबर के एक खबर के इशारे पर भूकंप हो जाता हैं, और सरकार में बैठे अधिकारी, अपने पावर का इस्तेमाल करते हुए भ्रष्ट अधिकारियों को पल भर में स्थानांतरण कर देते है।
भाई प्रभात खबर, मेरी ओर से भी तुम्हें बधाई, क्योंकि सचमुच तुम जो लिखते हो, तो गजब हो जाता हैं। भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ लिखते हो, तो उक्त भ्रष्ट अधिकारी की शामत आ जाती हैं। तुम्हारी तो इतनी चलती हैं कि तुम्हारे अखबार में छपी खबरों पर न्यायालय संज्ञान भी लेता हैं और संज्ञान ही नहीं, उस खबर पर संबंधित विभाग और सरकार के अधिकारियों पर न्यायालय तल्ख टिप्पणी भी कर देता है। भला ऐसी औकात यहां पर किस की हैं, जिसकी इतनी चलती हो।
मेरा तो सरकार से अनुरोध हैं कि जब इस अखबार की इतनी चलती हो, और ये भ्रष्टाचार पर इतना लिखता हैं तो क्या जरुरत हैं राज्य में एंटी करप्शन ब्यूरो बनाने की। क्यों नहीं, इस अखबार के संपादक को या उसके मातहत कार्य करनेवाले किसी पत्रकार को इस विभाग की जिम्मेवारी सौप दी जाये। इससे भ्रष्टाचार पर लगाम भी कस जायेगा, और सरकार की किरकिरी भी नहीं होगी। राज्य में राम-राज्य आ जायेगा। ऐसे में न्यायालय को किसी बात को लेकर संज्ञान लेने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। क्यों कैसी रहीं............
और अब सवाल हमारा रघुवर सरकार, उसमें शामिल मंत्रियों और राज्य के अधिकारियों से...........
1. क्या राज्य में अखबार तय करेंगे कि कौन सा अधिकारी/कर्मचारी भ्रष्ट हैं या कौन सा अधिकारी सत्यवादी और कर्तव्यनिष्ठ?
2. क्या जो अखबार ने आज अथवा 8 जूलाई को खबर छापी हैं, उसके पास कोई प्रमाण हैं?, क्या किसी ने आरोप लगाया? या उक्त अखबार के पास कोई ऐसा प्रमाण जिससे पता लगता हो कि उक्त कार्यालय के सभी अधिकारी/कर्मचारी भ्रष्ट है? (क्योंकि उक्त अखबार ने बहुत ही गंभीर आरोप लगाये हैं ये कहकर कि वसूली में कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक है शामिल, सभी काम के लिए तय है रेट, उसने किसी को नहीं छोड़ा है।)
3. गर भ्रष्टाचार में, अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक शामिल हैं, जैसा कि प्रभात खबर ने लिखा है तो फिर सिर्फ एक अधिकारी को स्थानांतरण की बलि क्यों चढ़ाई जा रही हैं?, पूरे आफिस का ही कायापलट क्यों नहीं किया जा रहा?
4. इसकी भी क्या गारंटी कि जिस रांची के अवर निबंधक का स्थानांतरण, राजमहल निबंधन कार्यालय में और राजमहल निबंधन कार्यालय के अवर निबंधक का स्थानांतरण रांची निबंधन कार्यालय में किया जाने का प्रस्ताव हैं, ऐसा हो जाने पर रांची निबंधन कार्यालय और राजमहल निबंधन कार्यालय में यानी दोनों जगह रामराज्य स्थापित हो जायेगा।
5. क्या किसी भी अधिकारी व कर्मचारी का स्थानांतरण कर दिये जाने से वह व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त रहना छोड़ देता है? गर ऐसा नहीं हैं तो फिर उसका स्थानांतरण के बजाय, वो जहां हैं, उसे वहीं ठीक करने की जरुरत सरकार और उसके अधिकारी क्यों नहीं समझते या उसकी किये गलती कि राज्य सरकार के नियमों व उपनियमों के तहत वहीं दंड क्यों नहीं दिया जाता.....
6. गर जिस भ्रष्ट व्यक्ति का स्थानांतरण हो रहा हैं और वह व्यक्ति जहां जा रहा हैं, क्या वहां वह भ्रष्टाचार नहीं फैलायेगा, इसकी क्या गारंटी है?
और इसकी भी क्या गारंटी कि जिस व्यक्ति को उसके स्थान पर लाया जा रहा हैं, वो शत् प्रतिशत दूध का धूला हैं.............
माननीय मुख्यमंत्री रघुवर दास जी और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों......क्या आपको पता नहीं कि लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक जनसभा के दौरान क्या भाषण दिया था, गर आपको नहीं मालूम तो मैं आपको सुना देता हूं.......उस वक्त के प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाषण में कहा था कि गुजरात में उनके पास एक भ्रष्ट अधिकारी के स्थानांतरण की बात आयी, तो उन्होंने कहा कि इसकी क्या गारंटी कि ये भ्रष्ट अधिकारी जहां इसका स्थानांतरण होगा, वहां जाकर शरीफ हो जायेगा....अरे गर ये गलत हैं तो दूसरी जगह के लोगों ने कौन सा पाप किया हैं कि वहां भेजकर ऐसे भ्रष्ट लोगों को बैठा दूं...हम ऐसा क्यों नहीं करते कि इस भ्रष्ट व्यक्ति को ही, जहां हैं, वहीं ऐसा टाइट कर दें कि वो भ्रष्टाचार से तौबा कर लें। गुजरात में यहीं तर्ज पर काम शुरु हुआ, उन्हें खुशी हैं कि सभी अधिकारियों ने गुजरात को बेहतर बनाने में मदद की और गुजरात, आज गुजरात हैं..............
क्या ये भाषण नरेन्द्र मोदी ने केवल जनता को सुनाने के लिए कहीं थी, गर ऐसा नहीं तो फिर यहीं बातें रघुवर दास और उनके मंत्रियों के कानों में क्यों नहीं जाती, गर नहीं जाती तो ये दुर्भाग्य हैं.............
अरे भाई, कौन ऐसा विभाग हैं, जहां भ्रष्टाचार नहीं हैं, अरे भ्रष्टाचार तो आजकल सदाचार का ताबीज बन चुका है, गर हम सबको स्थानांतरण करना शुरु कर देंगे, तो फिर अलग से एक स्थानांतरण विभाग खोलना पड़ जायेगा..........
मेरा मानना हैं, भ्रष्टाचार से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, प्रमाण मिल जाये, छोड़िये मत, कड़ी से कड़ी सजा दीजिये, ऐसी सजा दीजिये कि उसे नानी याद आ जाये, पर किसी अखबार के कहने, लिखने पर नहीं...........
गर आपने ऐसा शुरु किया, तो एक नई परंपरा की शुरुआत होगी, एक पत्रकार जायेगा और किसी अधिकारी को धमकी देगा कि हम आपके खिलाफ अनाप-शनाप छापेंगे और आपको यहां से तबादला करा देंगे, फिर क्या होगा, गर वो ईमानदार अधिकारी भी होगा तो वह ब्लैकमेलिंग का शिकार होगा, क्योंकि फिर उसे रांची का एटमोस्फेयर, बच्चों की पढ़ाई वगैरह की चिंता होगी और लीजिये एक नया भ्रष्टाचार का जन्म.....
क्या यहां के नेता और मंत्री नहीं जानते, कि यहां किस तरह की पत्रकारिता हो रही हैं, पत्रकारिता के नाम पर किस प्रकार की दलाली हो रही हैं.....गर सब जानते हैं, तो इस प्रकार की दलाली को भी बंद करने के लिए सरकार पहल करें, क्योंकि ये भी भ्रष्टाचार हैं...............

एक संपादक की रघुवरभक्ति..............

संयोग से आज 11 जुलाई के दो अखबार मेरे सामने है। एक प्रभात खबर और दूसरा दैनिक जागरण। आम तौर पर दैनिक जागरण, मैं नहीं पढ़ा करता, क्योंकि उसके बहुत सारे कारण है। उन कारणों को गर मैं गिनाना शुरु करूं तो रामायण और महाभारत से भी बड़ा महाकाव्य बन जायेगा और न तो मैं वेदव्यास और न ही वाल्मीकि बनने के लिए पैदा हुआ हूं, बस किसी तरह एक अच्छे इंसान के रुप में दुनिया से विदा हो जाऊं। इसी के लिए मैं फिलहाल प्रयासरत हूं।
अभी - अभी एक मेरे प्रिय मित्र दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ को लेकर मेरे सामने आये। जिसमें रांची के स्थानीय संपादक का एक आलेख है - झारखंड में भ्रष्टाचार। इस आलेख को पढ़कर मुझे महसूस हुआ कि उक्त संपादक के हृदय में भाजपा और रघुवर भक्ति की अविरल धारा बह रही है। आप उस धारा को राम-केवट की भक्ति से जोड़कर देख सकते है। ऐसे भी दैनिक जागरण और भाजपा का आपस में अन्योन्याश्रय संबंध है।
क्या गजब का आलेख है। संपादक ने मधु कोड़ा को याद रखा है, भ्रष्टाचार की सारी उपाधि उन्हीं की श्रेणी में डाल दी हैं, पर अर्जुन मुंडा को साफ बचा लिया, ये कहकर कि उन पर कोई भ्रष्टाचार के आरोप ही नहीं है, यानी वहीं पुरानी कहावत बच गये तो संत, पकड़े गये तो चोर.....वाली पद्धति पर अपने आलेख को समर्पित किया है। अरे संपादक जी, आप ही के यहां कई ऐसे रिपोर्टर जरुर होंगे, जो विधानसभा की रिपोर्टिंग करते होंगे, उनसे पूछो कि अर्जुन मुंडा के समय, खासकर विधानसभा में भाकपा माले विधायक दल के नेता महेन्द्र प्रसाद सिंह, अर्जुन मुंडा पर भ्रष्टाचार को लेकर कैसा दहाड़ा करते थे, कैसे उन्हें कटघरे में खड़ा करते थे। ये अलग बात हैं कि आज महेन्द्र प्रसाद सिंह दुनिया में नहीं है, पर आज भी ज्यादातर लोग यहीं जानते है कि भ्रष्टाचार की नींव, अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में ही पड़ी। ये अलग बात हैं कि उन भ्रष्टाचार के छींटों से वे बचकर निकल गये। जरा और देखिये, इस संपादक की बुद्धिमानी, संपादक ने रघुवर दास की भक्ति में यहां तक लिख दिया कि मुख्यमंत्री ने निगरानी ब्यूरो को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के रुप में विकसित कर यह संदेश दिया हैं कि गलत आचरण बर्दाश्त नहीं किया जायेगा.........कमाल हैं अभी तक भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो बना ही नहीं और इस संपादक महोदय ने विकसित करार दे दिया। संयोग से संपादक के इस बुद्धिमता पर 11 जुलाई के प्रभात खबर ने प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
11 जुलाई को ही रांची से प्रकाशित, प्रभात खबर, पृष्ठ संख्या 10 के उपरि कोना का सातवां और आठवां कॉलम पढ़िये, जिसमें प्रभात खबर ने छापा है कि "चार माह बीत गये, नहीं बना करप्शन ब्यूरो"। इस शीर्षक से छपे समाचार में गृह सचिव एन एन पांडेय का बयान भी है। जिसमें गृह सचिव ने कहा है कि एसीबी गठन की प्रक्रिया पूरी कर ली गयी है, सरकार की मंजूरी मिलते ही एसीबी का गठन हो जायेगा। इसका मतलब है कि अभी एसीबी यानी एंटी करप्शन ब्यूरो राज्य में अस्तित्व में नहीं है।
यानी शत् प्रतिशत झूठ के आधार पर किसी मुख्यमंत्री का यशोगान व स्तुति पढ़ना हो, तो 11 जुलाई का दैनिक जागरण उठाकर देख लीजिये। आखिर कोई संपादक ऐसा क्यों करता हैं....उसके भी बहुत सारे कारण है। कारणों को जानना भी जरुरी हैं। कई संपादक इस प्रकार का आलेख, मुख्यमंत्री से स्वयं के संबंध अच्छे हो, इसके लिए भी इस प्रकार का संपादकीय लिख डालते है। या कोई महत्वपूर्ण कार्य स्वयं को अनुप्राणित करने के लिए सीएम या सरकार से कराना हो तब लिखते है। या घाटे में चल रहे अखबार को सीएम से प्राणदान मिल जाये, विज्ञापन के रुप में, तब लिखा करते है........पर जनहित में इनसे पूछो कि वे क्या लिखते है तो पता चलेगा, जनहित जाये भाड़ में, सर्वप्रथम लक्ष्मी घर में आ जाये, कार की जगह हेलीकॉप्टर आ जाये, ये महत्वपूर्ण है........और आजकल ऐसे कार्य सभी कर रहे हैं, ये अलग बात हैं कि आज इस संपादक ने बाजी मार ली..........।
अब बात निगरानी ब्यूरो को एंटी करप्शन ब्यूरो बना दिया जाय या कुछ और इसे नाम दे दिया जाय। उससे क्या हो जायेगा। काम तो इसमें आदमी ही करेंगे गर वे आदमी भी भ्रष्ट होंगे तो क्या भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी पकड़ें जायेंगे। उत्तर होगा - नहीं। तो फिर इस प्रकार की चोंचलेबाजी क्यों। छह महीने बीत गये, अब तक इस विभाग ने कितने बड़े अधिकारियों को पकड़े हैं। गर मैं अपनी बात करुं तो मैं कहूंगा कि अब तक सरकार ने मच्छड़ ही पकड़े हैं, जबकि आज भी बड़े-बड़े भ्रष्ट अधिकारी जिन्हें आप कुछ भी पद या नाम दे दो, मस्ती में जी रहे हैं, उनका तो बाल बांका नहीं हो रहा, जबकि इसी रांची में सीबीआई ने, दूरदर्शन के एक बहुत बड़े अधिकारी को रंगेहाथों घूस लेते पकड़ा, जो एक सप्ताह बाद अवकाश पर जानेवाला था। क्या इस प्रकार की कार्य राज्य सरकार, या उसके मातहत अधिकारियों ने किया है, गर नहीं तो फिर इस प्रकार की रघुवरभक्ति से किसे फायदा मिल रहा हैं......अरे जो पत्रकारिता जनहित में न होकर, सरकारभक्ति में लीन हो जाये, उस पत्रकारिता को क्या कहेंगे, खुद वो संपादक ही समझ ले, तो बेहतर होगा...............

Sunday, June 21, 2015

नीतीश अर्थात् भस्मासुर................

बिहार में एक नेता पैदा हुआ - नीतीश, जिसे आप भस्मासुर भी कह सकते हैं, क्योंकि इस नेता को लालू के खिलाफ भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने खड़ा किया.........अब वहीं नेता भाजपा को खत्म करने की बात कर रहा हैं, पर उसे पता नहीं कि भस्मासुर तो भस्मासुर ही होता हैं, वो पैदा ही होता हैं भस्म हो जाने के लिए.....बस विधानसभा चुनाव का इंतजार कीजिये...बिहार की जनता ने तो संकल्प ले ही लिया हैं कि...............
जो लालू के संग जायेगा,
कभी सीएम न बन पायेगा.........
नीतीश का घमंड तोड़िये,
नया विकल्प चूनिये.........
बिहार का सम्मान बढाईये,
बेटे और पत्नी से प्यार करनेवाले नेता को साइड करिये...........
अबकी बार किसकी सरकार,
नीतीशविहीन बिहार सरकार.............
जो गंदगी फैलाये, वो नेता नहीं.
जो योग का विरोध करें, वो नेता हमें पसंद नहीं...........
जो बिहार से करें प्यार
वो नीतीश का घमंड तोड़ेगा इस बार............
पत्रकारों, अखबारों और चैनलों को, अपनी ओर करने की नीतीश ने की तैयारी,
रुपयो का बंडल लेकर जदयू नेता, मालिकों का मुंह बंद करने को हो रहे बेकरारी............
जिसने दलितों का किया अपमान
उस नीतीश को, न अब दें सम्मान.............

Saturday, June 20, 2015

चलनी दूसे सुप के जिन्हें बहत्तर छेद..............

बेचारे नीतीश आजकल नरेन्द्र मोदी का जंतर लेकर पटना से दिल्ली तक का सफर कर रहे हैं, ये वे जंतर लेकर जनता को बताते हैं कि नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान क्या वायदे किये थे पर नीतीश शायद भूल चुके है कि आज से ठीक पांच साल पहले उन्होंने भी बिहार की जनता को यह कहकर टोपी पहनाया था ( बिहार की जनता को जंतर पहनाया था) कि आनेवाले विधानसभा चुनाव में गर हमने बिहार के गांव- गांव तक बिजली नहीं पहुंचायी तो वे वोट मांगने बिहार की जनता के समक्ष नहीं आयेंगे.............
मैं पूछता हूं कि क्या बिहार के गांव - गांव में बिजली संकट समाप्त हो गयी, गर नहीं तो नीतीश को क्या अधिकार हैं नरेन्द्र मोदी पर ताना कसने की..............
क्या नीतीश बता सकते हैं कि जिस बिहार में अपने दुश्मन को उंचा पीढ़ा देने की रिवायत हैं, उस रिवायत को नीतीश ने कैसे धूल में मिला दिया, जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आये भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को खुद भोज पर आमंत्रित किया और खुद ही भोज देने से मना कर दिया क्या नीतीश बता सकते हैं कि इससे अपमान किसका हुआ, नीतीश का, बिहार का या भाजपा के नेताओं का............
क्या नीतीश भूल गये कि उन्होंने बिहार की लड़कियों से काला दुपट्टा कब और कैसे उतरवाने की कोशिश की थी...........
क्या नीतीश भूल गये कि उन्होंने कैसे लालू को चारा घोटाला में फंसाया और फिर लालू की गोद में बैठकर सत्ता की दुध-मलाई खाने में व्यस्त हो रहे हैं.............
कमाल हैं जिस भाजपा के साथ आठ वर्ष तक गलबहियां डाले घूम रहे थे, आज वो सांप्रदायिक हो गयी और जिस जातिवाद के खेल में प्रवीणता दिखाकर ये बिहार को घोर जातिवाद में धकेल रहे हैं, क्या बिहार को जातिवाद से खतरा नहीं.............
क्या नीतीश बता सकते हैं कि जब पूरा देश स्वच्छता अभियान में जूटा हैं तो वे झूठी अहंकार के लिए इस अभियान को भी चुनौती दे डाली हैं और पूरी राजधानी को नरक बनाने में सफलता प्राप्त कर ली ....नरक देखना हो तो बस पटना जंक्शन से बाहर आइये और करिये नीतीश के नरक का दर्शन.....
क्या नीतीश बता सकते हैं कि उन्हीं के एक पार्टी के नेता ने कहा था कि सीमा पर जवान मरने के लिए ही जाते हैं.............क्या एक नेता की ये भाषा हो सकती हैं, शर्म..शर्म...शर्म........
क्या नीतीश बता सकते हैं कि जिस नरेन्द्र मोदी ने बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए गुजरात की जनता की ओर से सहयोग राशि भेजी थी, जिसे अपनी घमंड के चलते नीतीश ने लौटा दिया था, वे आज किस मुंह से नरेन्द्र मोदी से बिहार हित में सहयोग की बात करते हैं, केन्द्र से पैसे मांगते हैं, अरे नीतीश कुमार थोड़ा सा शर्म करो.....................नहीं तो लोग कहेंगे
चलनी दूसे सूप के, जिन्हें बहत्तर छेद.......
नीतीश का घमंड तोड़िये...........नया विकल्प चुनिये.........
बिहार हित में मतदान कीजिये.......
न लालू...न नीतीश.......
जनता बदलेगी बिहार की तकदीर.........
जनहित में जारी..............

Thursday, June 4, 2015

हे प्रभु.........ये आप क्या कर रहे हैं.........


रेलवे की अच्छे दिनों की बात करनेवालों महानुभावों, रेल मंत्रियों और रेलवे के वरीय अधिकारियों क्या इस देश में राजधानी, शताब्दी, दूरंतो और गरीब रथ के रेलयात्रियों को ही इस देश में रेल यात्रा करने का अधिकार हैं......आखिर हम गरीब रेल यात्रियों पर आपका ध्यान कब जायेगा, जो मेल एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेनों से यात्रा करते हैं। मुझे जब भी नई दिल्ली से रांची आने का मौका मिला तो पाया कि दिल्ली से आनेवाली झारखंड स्वर्ण जयंती सुपरफास्ट एक्सप्रेस कभी भी समय पर रांची नहीं पहुंची, जबकि दिल्ली से ही आनेवाली राजधानी व गरीब रथ हमेशा समय पर पहुंचती है.......आखिर क्या वजह है भाई ये तो रेलवे के अधिकारियों और रेलमंत्रियों को बताना ही चाहिए............
हमने तो सोचा कि यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार था, इसलिए ऐसा होता था पर एनडीए की सरकार ने कौन सा हमलोगों के लिए पहाड़ तोड़ दिया इन एक साल में कि हम उनकी आरती उतारें.............
जरा आज देखिये 12874 अनन्तविहार-रांची एक्सप्रेस की स्थिति। 3 जून को बताया गया कि ये गाड़ी अनन्तविहार से 11.30 बजे रात्रि में खुलेगी, फिर हुआ कि ये गाड़ी 4 जून को 1.30 बजे सुबह खुलेगी, यानी जिस गाड़ी को 3 जून को 7.45 सायं में खुलना था, वो गाड़ी दूसरे दिन 1.30 बजे सुबह खुल रही हैं। वाह रे रेलवे विभाग, हद तो तब हो गयी कि 4 जून की सुबह 6.15 बजे से लेकर अभी 9.15 तक ट्रेन का अपडेट ही रेलवे रनिंग स्टेटस में नहीं है। यानी गाड़ी कहां हैं, पता ही नहीं चल रहा हैं, ट्रेन जमीन पर हैं कि हवा में हैं या आकाश में हैं, पता ही नहीं लग रहा। इस गाड़ी से मैंने जब भी यात्रा की हैं, हमने पाया हैं कि ये गाड़ी चाहे समय पर अन्नतविहार से खुले या 6 घंटे देरी से खुले यह गाड़ी इलाहाबाद पहुंचते-पहुंचते 12 घंटे विलंब हो ही जाती हैं..........भाई इस ट्रेन को किस भूत ने पकड़ लिया हैं, जो कानपुर –इलाहाबाद तक छोड़ता ही नहीं, जबकि ये भूत अन्य गाड़ियों को नहीं पकड़ता। क्या देश में सामान्य नागरिक या गरीब होना अपराध हैं क्या.......गर अपराध हैं तो सारे गरीबों को जेल में क्यों नहीं बंद करा देते......ये कहकर कि तुमलोग राजधानी और शताब्दी में बैठने के लायक ही नहीं, इसलिए तुम्हें जीने का अधिकार ही नहीं.....।
आज देखिये इस ट्रेन को 3 जून को खुलना था, और 4 जून को खुली हैं, 4 जून को रांची पहुंचना था और 5 जून को भी रांची पहुंचेगी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता, सुना हैं कि इस ट्रेन को कानपुर के भूतों ने पकड़ लिया हैं क्या कोई ऐसा देश का नागरिक हैं जो कानपुर के भूतों से मुक्त कराकर, इलाहाबाद के रास्ते, इस ट्रेन को रांची पहुंचा दें, क्योंकि इस ट्रेन में फिलहाल यात्रा कर रहे लोग तो भूतों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं, भगवान सुरेश प्रभू को याद कर रहे हैं...............
शर्मनाक....शर्मनाक...शर्मनाक, अच्छे दिनों की बात करनेवालों, तुम्हें जनता कभी माफ नहीं करेगी, हमें क्या चाहिए तुमसे अरे कम से कम ट्रेन तो समय पर चलवाओ, और कुछ नहीं करों तो कम से कम ये तो बता दो कि ये ट्रेन कहां हैं....ट्रेन इन्कवायरी सिस्टम से, क्योंकि मैं तो पिछले तीन घंटों से यहीं देख रहा हूं कि ये ट्रेन रुरा के पास रुकी हैं....बेशर्मी की भी हद हो गयी....आम जनता तो लगता हैं कि इनके द्वारा शिलाखंडों से पीसने के लिए बनी हैं, पीसते चले जा रहे हैं....कल यूपीए ने पीसा और आज एनडीए की बारी है....

Monday, June 1, 2015

मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, बच्चे परिणाम चाहते हैं....

रघुवर जी, आखिर आप ये तो बताएं कि इन बच्चों ने कौन सा पाप किया है कि आपके वरीय पुलिस अधिकारी इनकी बात नहीं सुनते या इनकी वेदना पर अट्टहास करने से बाज नहीं आते..................
हम जहां रहते हैं, वहां एक बहुत ही गरीब घर का बच्चा रहता है, नाम है – लखू। उसने कुछ सपने देखे है, अपने परिवार के लिए, उसे लगता हैं कि अब सपने पूरे होनेवाले है, वह भी तब जब जैप विज्ञापन संख्या – 02/2011 के बोर्ड नं. 1 का मेरिट लिस्ट निकलेगा। लखू जैसे एक नहीं कई लड़के होंगे, जिनकी हैसियत या औकात नहीं कि दिल्ली या और किसी महानगर में जाकर हराम के पैसे कमानेवाले परिवार के बच्चों की तरह आईएएस व आईपीएस की तैयारी कर सकें। हां मैं एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि गर इन्हें मौका मिले और सरकार मदद कर दें, इन बच्चों की, तो यकीन मानिये हराम की कमाई खानेवाले इन बापों के बेटे किसी जिंदगी में अपने बाप के सपनों को पूरा नहीं कर पायेंगे, क्योंकि तब इन सभी पर इन गरीब ईमानदार बापों के बेटों का कब्जा होगा, पर जरा देखिये इन बच्चों के साथ क्या हो रहा हैं। ये बच्चे प्रतिदिन कभी पुलिस उप महानिरीक्षक जैप, कभी प्रभारी पुलिस उप महानिरीक्षक(कार्मिक), कभी सुमन गुप्ता, पुलिस उप-महानिरीक्षक, जैप, कभी महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक का कार्यालय, कभी न्यायालय तो कभी मुख्यमंत्री जनता दरबार, यानी कौन ऐसी जगह हैं, जहां इन बच्चों ने अपने हक के लिए दरवाजा नहीं खटखटाया, पर क्या मजाल कि जिन्हें अपने कार्यों को गति देना हैं, उनके कान पर जूं तक रेंगे। भला इनके बच्चों से संबंधित मामला थोड़े ही हैं, ये तो उन बच्चों का भविष्य हैं, जो जहां जन्म लेते हैं, वहीं मर जाते हैं.....इसलिए ऐसे भी मरेंगे, वैसे भी मरेंगे। राज्य सरकार के वरीय पुलिस कर्मियों की बेशर्मी देखिये, जब ये बच्चे सूचना के अधिकार के तहत, सूचनाएं मांगते हैं, तो उनका जवाब होता हैं, प्रक्रिया जारी हैं, अरे भ्राई ये प्रक्रिया आखिर कब समाप्त होगा। इसकी कोई समय सीमा भी हैं या नहीं, या ढपोर शंखी हो गये तुम लोग। गर तुम किसी समय सीमा पर कोई परिणाम नही दे सकते तो फिर इस प्रकार का विज्ञापन क्यों निकालते हो, मत निकालो विज्ञापन और जैसा तुम हमेशा करते हो, बैक डोर से पैसे लेकर वो सारे कुकर्म कर डालों, जिसके लिए झारखंड जाना जाता है....। क्या इसके लिए इन बच्चों ने मना किया था क्या। हद तो तब हो जाती हैं, जब बच्चे किसी अखबार के संवाददाता के पास पहुंचते हैं, और वो संवाददाता भी पैसे की बात कर देता हैं और नहीं देने पर उलजूलूल छाप देता हैं।
आखिर जिन बच्चों ने जैप विज्ञापन संख्या 02/2011 का परीक्षा दिया था, जिसमें तीन बोर्ड बनाये गये थे, उसमे बोर्ड -1 एक परिणाम कब आयेगा, क्या सरकार बतायेगी, या परिणाम निकलवाकर उन बच्चों के सपनों को पूरा करेंगी, उनके भविष्य सुधारेंगी या उनके हाल पर छोड़ देंगी.......मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, इन बच्चों को आप से उत्तर चाहिए और ये उत्तर केवल उन बच्चों को ही नहीं, मुझे भी चाहिए ताकि मैं जान सकूं कि ये सरकार कितनी संवेदनशील है..................

विजय ने ताल ठोंकी और शेखर मेयर बन गया............



मैंने धनबाद को पत्रकारिता के दौरान दो-दो बार सेवाएं दी। एक जब दैनिक जागरण का ब्यूरो प्रमुख बना तब और दूसरी बार जब ईटीवी ने धनबाद की बागडोर सौंपी। नजदीक से देखा हूं, धनबाद को। यहां ए के राय जैसे महान वामपंथी विचारक व विजय झा जैसे देशभक्त लोग है तो  दूसरी ओर कई लंपटों का समूह भी हैं, जो येन-केन-प्रकारेण धनबाद को अपनी स्वार्थ के लिए बर्बाद करता रहता हैं और इसी को वो समाज सेवा के रुप में आमजन को प्रदर्शित भी करता हैं। आश्चर्य इसलिए भी कि जनता भी कभी-कभी उसके इस झांसे में आकर स्वयं को गौरवान्वित भी महसूस करती है। चलिए छोड़िये इन बातों को, अब हम बात करते हैं, इस बार हुए धनबाद के मेयर चुनाव की। इस बार मेयर के चुनाव में चंद्रशेखर अग्रवाल भारी मतों से विजयी हुए हैं। चंद्रशेखर अग्रवाल विशुद्ध रुप से भाजपाई हैं। मेयर चुनाव जीतने के बाद फिलहाल गणेश परिक्रमा करने के लिए रांची आये हुए हैं। गणेश परिक्रमा में ये सर्वप्रथम भाजपा कार्यालय जाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और कार्यालय में वरिष्ठ भाजपा नेताओं से मिल चुके हैं। तदुपरांत मुख्यमंत्री आवास जाकर मुख्यमंत्री रघुवर दास की परिक्रमा भी कर चुके हैं। सूत्रों की माने तो चंद्रशेखर अग्रवाल रघुवर गुट से आते हैं, जबकि मेरा मानना हैं कि राजनीति में कोई गुट नहीं होता, जब आप शक्तिशाली होते हैं तो सभी आपके गुट के होते हैं और जब दुर्बल होते है तो आपसे लोग कन्नी कटाते है। स्थिति ऐसी होती हैं कि वे दुर्बल व्यक्ति अथवा नेता के साथ फोटो खीचाना तो दूर, गर पुराना फोटो भी होता हैं तो उसे ऐसा दबा कर रख देते हैं कि कहीं कोई उस फोटो को फेसबुक वाल पर डालकर उसकी राजनीति की नैया न डूबा दें।
फिलहाल चंद्रशेखर अग्रवाल ने मेयर का चुनाव जीतकर धनबाद के सांसद पी एन सिंह और धनबाद के विधायक राज सिन्हा की औकात तो जरुर बता दी, क्योंकि इन दोनों नेताओं ने चंद्रशेखर अग्रवाल को हराने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दी थी। यहीं नहीं जिस चंद्रशेखर अग्रवाल को खुद को भाजपा नेता-कार्यकर्ता कहने में गर्व महसूस होता था। उस चंद्रशेखर अग्रवाल को दिन में तारे दिखाई पड़ने लगे थे, जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनसे दूरियां बनाकर, पीएन सिंह और राज सिन्हा समर्थक प्रत्याशी राज कुमार अग्रवाल को जीताने के लिए पील पड़े। बेचारे अब शेखर क्या करें। वस्तुतः सांसद पी एन सिंह और विधायक राज सिन्हा को चंद्रशेखर अग्रवाल से भविष्य में होनेवाले संकट को लेकर स्पष्ट खतरा महसूस हो रहा था। इन दोनों को लग रहा था कि गर चंद्रशेखर अग्रवाल मेयर का चुनाव जीते तो कहीं ऐसा नहीं कि भाजपा आनेवाले दिनों में सांसद का टिकट अथवा विधायकी का टिकट चंद्रशेखर अग्रवाल के लिए सुरक्षित न कर दें, क्योंकि सांसद के रुप में पीएन सिंह का कार्य धनबाद की जनता के अनुरुप नहीं रहा हैं, और न ही संसद में इन्होंने कोई ऐसा कमाल दिखाया हैं, जिस पर धनबाद की जनता गर्व कर सकें। राज सिन्हा तो चूंकि पहली बार विधायक ही बने हैं, इसलिए अभी इन पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, पर इतना तो तय हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल की जीत, पी एन सिंह और राज सिन्हा की नींद हराम कर दी हैं। आखिर चंद्रशेखर अग्रवाल को जीत कैसे मिली। उसका मूल कारण – विजय झा का शेखर अग्रवाल के लिए चाणक्य की भूमिका में प्रकट होना और पूरे चुनाव की जिम्मेदारी और उसका संचालन ही नहीं, बल्कि पूरी ईमानदारी से इसकी मानिटरिंग करना। चूंकि विजय झा, एक समय भाजपा जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं, साथ ही उनकी छवि निर्विवाद रही हैं, आज भी वे धनबाद में एक प्रतिष्ठित समाजसेवक के रुप में याद किये जाते है। पूर्व में मेयर के चुनाव में उनकी पत्नी शिवानी झा मुख्य प्रतिद्वंदी रही, इसलिए पूर्व का अनुभव भी विजय झा के साथ रहा। जिसका इस्तेमाल, उन्होंने इस चुनाव में किया और नतीजा सामने है। चंद्रशेखर अग्रवाल मेयर का चुनाव जीत गये। संभव हैं आनेवाले समय में वे सांसद और विधायकी पर भी दावा ठोंके पर ये तो भविष्य की बात हैं। हमें लगता हैं कि भाजपा को भी अब विचार करना होगा, क्या वो कांग्रेस की बी टीम होगी, या स्वयं को परिमार्जित करेगी, शुद्ध करेगी। उसे आत्ममंथन करना होगा कि  आखिर चंद्रशेखर अग्रवाल की जगह राज कुमार अग्रवाल भाजपाईयों की पसंद क्यूं बन गये। आखिर विजय झा जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का भाजपा से मोहभंग क्यों हो गया। गर एक एक कर इसी तरह से योग्य व सम्मानित व्यक्ति अपमानित होकर, भाजपा से निकलते गये तो इसमें कोई दो मत नहीं कि आनेवाले समय में जो जितना बड़ा भ्रष्ट वो उतना बड़ा भाजपा का कैंडिडेट होगा, फिर भाजपा का आम नागरिकों के हृदय में क्या स्थान होगा। भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को अभी से ही आत्ममंथन करना शुरु कर देना चाहिए। साथ हीं, हमें लगता हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल को भी समझ में आ गया होगा कि भाजपा क्या हैं, क्योंकि ये जीत उन्हें भाजपाईयों ने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति ने दिलायी, एक ऐसे जनसमूह ने दिलायी, जिसका भाजपा से प्यार नहीं था, बल्कि प्यार था, सम्मान से, प्यार था प्रतिष्ठा से, प्यार था धनबाद के स्वाभिमान और विकास से। ये बातें चंद्रशेखर अग्रवाल को गांठ बांधकर रख लेना चाहिए, नहीं तो कालांतराल में क्या स्थिति होगी, वो समझ सकते हैं, क्योंकि जनता किसी की भी जागीर नहीं होती..........