Saturday, November 21, 2015

रघुवर की अयोध्या को सरयू से खतरा....

रघुवर की अयोध्या को सरयू से खतरा...
शत्रुघ्न सिन्हा का रोल झारखंड में सरयू अदा करने को तैयार...
झारखंड भाजपा में विभीषण बनने में सरयू अन्य नेताओं से कहीं आगे...
एक लोकोक्ति है...घर का भेदी लंका ढाहे अर्थात् घर का भेदिया ही लंका को हानि पहुंचाता है। इसको आप ऐसे भी समझिये कि बिना भेदिया के लंका ढायी नहीं जा सकती...पर झारखंड में रावण तो है नहीं, यहां तो रघुवर का दास यानी खुद को हनुमान बतानेवाले रघुवर दास का शासन है, तो फिर रघुवर की अयोध्या को खतरा किससे...। इसको अगर ऐसे समझा जाये कि सरयू में जलस्तर बढ़ेगा तो अयोध्या को बाढ़ का खतरा झेलना पड़ेगा अर्थात् झारखंड के सरयू राय की हृदय वेदना का स्तर अत्यधिक होगा, तो रघुवर दास की मुख्यमंत्री पद को झटका लग सकता है। अब तक देखने में तो यहीं आ रहा है कि रघुवर दास की सरकार में सरयू राय की वेदना का स्तर बहुत अधिक बढ़ रहा है, जो कभी-कभी सरयू के मुख से आक्रोश के रुप में प्रकट होता है और धीरे-धीरे अखबारों व चैनलों की सुर्खियां बन जाता है, जिसे बाद में बहुत ही प्रेम से सरयू राय स्वयं ही अपनी वेदना को दूसरी तरह से शांत करा देते है, ठीक उसी प्रकार जैसे अयोध्या की सरयू में बढ़े जलस्तर को सरयू स्वयं ही शांत करा देती है...
इधर नीतीश के बिहार में पुनः सत्तारुढ़ होने से भले ही नीतीश स्वयं ही उतने प्रसन्न न हो, पर बिहार के भाजपाद्रोही व मुख्यमंत्री बनने का दिवास्वप्न देखने वाले बिहारी बाबू उर्फ बोकरादी बाबू अर्थात् शत्रुघ्न सिन्हा बहुत ही प्रसन्न है। ठीक बिहारी बाबू की तरह ही, झारखंड में भी भाजपा के कई बिहारी बाबू है, जो खुद को बिहारी बाबू यहां कहलाना पसंद नहीं करते, लेकिन हैं खाटी बिहारी पर झारखंड के तकदीर बने हुए है। इन्होंने भी बिहारी बाबू की तरह झारखंड में भाजपा का गड्ढा खोदना शुरु कर दिया है...। सरयू राय बिहारी बाबू का रोल सही-सहीं निभा पायेंगे या नहीं, ये तो वक्त बतायेगा, पर वे उसी राह में है। नीतीश के प्रति उनका उमड़ा प्रेम ऐसे ही नहीं है, उनके मुख से आज तक नीतीश के खिलाफ कुछ भी नहीं निकला है, वे नीतीश भक्ति में हमेशा से लगे रहते है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार विधानसभा चुनाव के क्रम में नीतीश कुमार के खिलाफ कुछ भी बोलते थे, तो सरयू राय का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ गुस्सा उनके चेहरे पर साफ दीख जाया करता था। नीतीश के ताजपोशी में नीतीश का खुद फोन घुमाकर, सरयू को आमंत्रण, इस बात का संकेत और प्रमाण है कि नीतीश ने भाजपा के अंदर रहकर उन विभिषणों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। जिनसे उनकी सत्ता को संजीवनी मिली। ये राजनीति ही है कि यहां कब किसकी कौन आरती उतारने लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता...। इसलिए ईमान की रोटी खानेवालों की संख्या राजनीति व राजनीतिबाजों से इतना नफरत करती है कि पूछिये मत। वो जानवरों पर तो भरोसा कर लेती है, पर राजनीतिज्ञों पर नहीं।
एक बात और। इन दिनों पढ़ने को मिला कि बोकरादी बाबू यानी शत्रुघ्न सिन्हा जो खुद को ट्वीटर के माध्यम से खुद को हाथी भी बोल चुके है। नागपुर गये थे, वे संघ के नेताओं व भाजपा के नेताओं से बातचीत करने के लिए वे उनके दरवाजा भी खटखटाएं पर किसी ने उन्हें भाव भी नहीं दिया...। यहां भी वे बड़बोलेपन में कह दिये कि गर सच कहना बगावत है तो समझो हम बागी है। जैसे लगता है कि दुनिया के सत्यवादी हरिश्चंद्र सिर्फ और सिर्फ बोकरादी बाबू है, दूसरा कोई नहीं...। हमारा सलाह होगा – बोकरादी बाबू को कि आप थोड़ा दरियादिली दिखाइये, सचमुच के हाथी बनिये और हाथी जैसी हरकत दिखाइये...। भाजपा से नाता तोड़िये और सदा के लिए तीर थाम लीजिये और उस तीर से लालटेन के सहारे, उन सब को अपनी बातों से दर्द पहुंचाइये जो आप को दर्द पहुंचाया, आपको मुख्यमंत्री बनने नहीं दिया...। साथ ही नीतीश को कहिये कि देखो, नीतीश भाई हम भाजपा के बिभीषण है, तुम तो अब हमारे लिए राम बन जाओ। ठीक जैसे राम ने विभीषण को गले लगाया और लंकेश बनाया। तुम भले ही मुझे बिहार का किंग न बनाओ पर मेरी बीवी-बच्चों को तो कम से कम विधायक-सांसद व मंत्री तो बना दो। हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि नीतीश, बिहारी बाबू पर कृपा दृष्टि दिखायेंगे, क्योंकि नीतीश तो भक्तवत्सल है। जब वे हरिवंश को सांसद बना सकते है, जब वे रवीश के भाई पर दयालुता दिखा सकते है तो फिर बिहारी बाबू पर क्यों नहीं...। उन्होंने तो बिहार चुनाव में भाजपा में कील ही ठोक दी...।
और इधर देखिये सरयू राय कि, जब से वे झारखंड में रघुवर मंत्रिमंडल में शामिल हुए है। रघुवर दास के नाक में दम कर दिया है। हर एक महीने पर उनका ऐसा बयान आता है, जो राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर देता है। आखिर उनका गुस्सा क्यों प्रकट होता है? उसका साफ संकेत है कि वे अपने मंत्री पद से खुश नहीं है। उन्हें मलाईदार मंत्री पद चाहिए था, पर रघुवर दास ने उन्हें खाद्य आपूर्ति मंत्रालय संभालने को दे दिया। इधर एक साल होने को हुए, पर सच पूछिये तो सरयू राय ने इस मंत्रालय का कबाड़ा बना कर रख दिया है। काम-धाम कुछ नहीं और गिलास तोड़ा आठ आना वाला हिसाब है। आज एक साल होने को आये, राज्य में किसी को नया राशन कार्ड तक नहीं मिला है। गर इक्के-दुक्के को मिले भी तो उसमें इतनी अशुद्धियां है कि पूछिये मत...। अक्टूबर महीना बीत गया, नवम्बर महीना चल रहा है और अभी तक अक्टूबर के अनाज का उठाव तक नहीं हो सका है...। इस माह के करीब 52 हजार टन चावल व गेहूं का उठाव करने में राज्य का खाद्य आपूर्ति विभाग असफल रहा है। इसके उठाव के लिए भारतीय खाद्य निगम के कार्यकारी निदेशक कोलकाता से समय विस्तार की सहमति ली गयी जिसकी तय तिथि 20 नवम्बर को समाप्त हो गयी, यानी न काम करेंगे और न करने देंगे, पर बयानबाजी कर भाजपा और मुख्यमंत्री रघुवर दास का सारा काम तमाम कर देंगे। जमकर नीतीश भक्ति में लीन रहेंगे और मंत्रिमंडल की आड़ में, सरकार की आड़ में स्वहित में अन्य कामों को निबटायेंगे। क्या ये राज्य के साथ धोखाधड़ी नहीं...।
सब को कटघरे में खड़ा करनेवाले सरयू राय राज्य की जनता को बताये कि उन्हें जो विभाग मिला, उसमें उन्होंने कौन-कौन से काम किये, जिसको लेकर जनता उन्हें माथे पर बिठाएं...। रही बात मुख्यमंत्री रघुवर दास की तो ये न तो वसुंधरा राजे सिंधिया और न ही शिवराज सिंह चौहान की तरह मुख्यमंत्री है, जो ऐसे लोगों को उनकी औकात बता दें, ये तो मामूली प्रभात खबर के मामूली संपादकों के इशारे पर वे काम करते है, जिसको एक सामान्य विधायक भी तवज्जों नहीं देता...ऐसे में ये सरयू राय जैसे अशांत मंत्रियों को शांत करा देंगे, हमें नहीं लगता...। एक साल होने को आये, सच पूछिये तो राज्य का कोई भी ऐसा मंत्री नहीं, जो ये दावे के साथ ये कह सकता है कि उसने राज्य की जनता के हित में ये कार्य किये है, उसे इसके लिए शाबाशी मिलनी चाहिए...पर हम इतना जरुर कह सकते है कि इन मंत्रियों ने ऐसी-ऐसी हरकतें जरुर की जो जग हँसाई का कारण भी बन गयी...
भाजपा में ही रहकर, भाजपा से अपने तन का वजन बढ़ानेवाले ये नेता, अपनी मातृसंगठन संघ के प्रति भी वफादार नहीं है, तो ये समाज और देश के लिए कितने वफादार होंगे, समझा जा सकता है...ये तो सत्ता में आते ही, अपने चारणों व अपने अनुचरों पर दया लुटाने में लीन हो जाते है, इन्हें देश व राज्य से क्या मतलब...। जरा नजर दौड़ाईये...झारखंड सरकार की हरकतों पर पता लग जायेगा कि जो लोग इनकी आरती उतार रहे है, वे बम बम हो रहे है, और जो इन्हें आइना दिखा रहा है, उसे ये फूंटी आंखों नहीं देख रहे, वे तो उसे ठिकाने लगाने में भी देर नहीं कर रहे...
और रही बात हमारी...तो मैं उन्हें बता दूं...
कबीर का हूं, कबीर ही रहूंगा...
कबीरा खड़ा बाजार में लिये लुआठी हाथ। जो घर जारे आपना चले हमारे साथ।।
कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर। ना काहुं से दोस्ती ना काहु से वैर।।
हमें राज्यसभा या लोकसभा में नहीं जाना और न ही किसी नेता मंत्री का चरणोदक पीना है, जो नेताओं व मंत्रियों का चरणोदक पीना चाहते हैं, पीते रहे और नीतीश या किसी अन्य राज्य के मुख्यमंत्री जैसे लोगों या अन्य नेताओं के चरणोदक पीकर कृतार्थ होते रहे...हमें क्या?

Thursday, November 19, 2015

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........
पन्द्रह साल झारखंड बने हो गये...
राज्य की जनता ने इसी बीच एक से एक नेता देखें, जिन्होंने झारखंड का नेतृत्व किया...पर किसी नेता में हिम्मत नहीं हुई कि बाबू लाल मरांडी द्वारा खींची गयी विकास की लकीर से बड़ी लकीर खींच कर दिखा दें...।
कितने नाम गिनाऊं...
अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन और अब रघुवर दास...। दावे तो सबके थे और हैं, पर जरा पूछिये कि वो कौन ऐसी चीजें है, जिसको लेकर राज्य की जनता इन पर गर्व कर सकें और ये कहें कि ये इनकी देन है – इन झारखंडी नेताओं का...झारखंड की जनता के लिए...।
सच्चाई यह है कि इन सारे नेताओं ने अपनी कोठी ठीक की, अपना दबदबा कायम किया पर जनता के हित में कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिस पर जनता इन्हें अपना मान सकें...हां इतना जरुर हुआ कि इनके यशोगान गानेवाले मीडिया में रह रहे लोग व इनके चारणों की आर्थिक स्थिति इन नेताओं के समान जरुर हो गयी...।
गर इन नेताओं के कार्यकाल को देखिये और विभिन्न अखबारों में इनके शासनकाल के दौरान विकास को पैमाना बनाकर छपे विज्ञापनों को देखे तो इनकी पोल खुलकर रह जायेगी...। ये सारे नेता बाबू लाल मरांडी के इर्द-गिर्द भी नहीं ठहरते...।
हमें याद है कि जब बाबू लाल मरांडी ने सत्ता संभाली तो बिहार के घटिया स्तर नेताओं की मार झेल रहा झारखंड को उपर उठाना कोई सामान्य कार्य नहीं था, पर बाबू लाल मरांडी ने योग्य लोगों की मदद से जो खाका तैयार किया और उस पर जो चलने की कोशिश की...उसका फायदा सबने उठाया और आज भी वह फायदा देखने को मिल रहा है...
हालांकि बाबू लाल के विकासात्मक सोच को कुंद करने और झारखंड के विकास की पटरी को धराशायी करने का प्रयास उस वक्त के नीतीश भक्त नेताओं व विधायकों ने कम नहीं किया...। जिसका खामियाजा लाल चंद महतो, जलेश्वर महतो, बच्चा सिंह, गौतम सागर राणा आज भी उठा रहे है, जबकि मधु सिंह और रमेश सिंह मुंडा तो स्वर्ग ही सिधार गये...। इसलिए इन पर बोलना अब ठीक नहीं...पर सच्चाई यहीं है...
आखिर क्या किया बाबू लाल ने...आज इस पर चर्चा होना ही चाहिए, क्योंकि झारखंड अपने स्थापना के 15 साल पूरे कर लिए और आज 16 वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है...।
बाबू लाल का झारखंड को देन......
1. झारखंड के बच्चों को बिहार से पिंड छुड़ाया और सीधे सीबीएसई पैटर्न लागू करते हुए, झारखंड के बच्चों को एनसीईआरटी की पुस्तकें निःशुल्क थमा दी...पढ़ों और खुद को गढ़ो का सिद्धांत बाबू लाल ने झारखंड के बच्चों को दिया... और किसी से भेदभाव नहीं की....
2. झारखंड की आदिवासी बालिकाएँ कल्याण विभाग को जान सकी और वे साइकिल से अपने घरों से निकलती हुई, स्कूल पहुंचने लगी...ऐसा पहली बार सुंदर सा दृश्य झारखंड में देखने को मिला, जहां बेटियां आगे निकल रही थी...वह सरकार द्वारा दिये गये साइकिल से अपने स्कूल जा रही थी।
3. बाबू लाल जानते थे कि बिना आधारभूत सरंचना के झारखंड का विकास नहीं हो सकता...इसलिए उन्होंने जर्जर झारखंड को ठोस झारखंड बनाना शुरु किया...बड़े पैमाने पर पुल-पुलिया बनाये गये...सड़कों की दशा सुधारी गयी...उस वक्त लोग बोला करते थे कि गर बसे हिचकोले खाना बंद कर दें तो समझ लो, झारखंड आ गया...
4. भारतीय रेल की मदद ली...झारखंड में अच्छी ट्रेनें इन्हीं के शासनकाल में देखने को मिली, जो रांची में इक्के – दुक्के ट्रेन देखने को मिलते थे, जहां दिल्ली जाने के लिए कोई बेहतर ट्रेन नहीं थी, इनके शासन काल में भारत सरकार के सहयोग से रांची देश के सभी महत्वपूर्ण महानगरों से रेलमार्ग द्वारा जुड़ना शुरु हुआ...यहीं नहीं कई रेलवे प्रोजेक्ट भी उन्होंने शुरु करवाएं...ज्यादा जानकारी के लिए तत्कालीन रेलमंत्री और अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कोई भी दरवाजा खटखटा सकता है...
5. बाबू लाल ने भ्रष्टाचार पर भी सीधा चोट किया... मात्र एक साल में बाबू लाल मरांडी के शासन काल में सौ से भी ज्यादा भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी निगरानी की भेंट चढ़ चुके थे।
6. झारखंड के दलितों व आदिवासियों के आर्थिक उत्थान के लिए बाबू लाल मरांडी ने उन्हें बस, टेम्पू भी उपलब्ध करायी थी...
7. किसानों को कम कीमत पर पानी पटाने के लिए डीजल चालित मशीन उपलब्ध करायी गयी, यहीं नहीं जैसे ही सुखा पड़ने की आशंका होती, वे बैठक बुलाते और एक्शन लेते, ये अलग बात थी कि जैसे ही एक्शन की बात होती, प्रकृति इतनी बारिश कर देती कि राज्य से सूखे पड़ने की आशंका ही खत्म हो जाती...
8. बाबू लाल मरांडी के शासनकाल में ही विधानसभा में सरपल्स बजट पेश होता था...
9. बाबू लाल मरांडी ने ही झारखंड के मूलवासियों को उनका हक मिले, इसके लिए डोमिसाइल नीति की घोषणा की, इस नीति में कहीं भी कुछ गड़बड़ नहीं था, पर उनके विरोधियों ने उनके खिलाफ कुचक्र रचा, जिसके वे शिकार हुए...आखिर झारखंड जिनके लिए बना, उन्हें वह हक क्यों नहीं मिलना चाहिए...आखिर जो अन्य राज्यों में भी वहां का डोमिसाइल बनाकर लाभ ले रहे है, वे यहां भी उसका लाभ ले, यानी एक व्यक्ति का परिवार दो – दो जगहों का लाभ लें और यहां के आदिवासी – मूलवासी झारखंड में भी दोयम दर्जें का नागरिक बन कर रहें, क्या ये गलत नहीं?
10. आज जो विधानसभा भवन और उच्च न्यायालय भवन निर्माण की बात हो रही है, उसके लिए ग्रेटर रांची बनाने का स्वप्न किसका था, ये तो सबको मालूम होना चाहिए...
11. ये किसी को नहीं भूलना चाहिए कि झारखंड के मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ही थे, जो विकास के आधार पर देश के सभी राज्यों में से सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रुप में उस वक्त तीसरे स्थान पर पहुंच गये थे...जो आज तक कोई नहीं पहुंच सका....
12. जब उनका शासन था तो झारखंड का सम्मान था...जरा पूछिये मधु कोड़ा से और उनका समर्थन करनेवाले झामुमो, कांग्रेस और राजद के नेताओं व विधायकों से आज वो झारखंड को सम्मान क्यों नहीं मिलता...आखिर झारखंड के सम्मान के साथ खिलवाड़ किसने की...
13. भाजपा को शिखर पर ले जाने में भी बाबू लाल मरांडी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता...हमें याद है कि झारखंड बनने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई...। उस वक्त राजनाथ सिंह, अर्जुन मुंडा और बाबू लाल मरांडी ने संयुक्त रुप से प्रेस कांफ्रेस किया था...। हमारा सवाल था – बाबू लाल मरांडी से कि गर भाजपा सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा...बाबू लाल मरांडी ने बिना देर किये बताया – अर्जुन मुंडा। तुरंत यहीं सवाल अर्जुन मुंडा से मेरा था, अर्जुन मुंडा ने जवाब दिया कि पार्टी जो कहेगी, वो करेंगे, हालांकि वे भी दरियादिली दिखा सकते थे, पर उन्होंने नहीं दिखायी। ये वो समय था जब लाल कृष्ण आडवाणी के होठों पर अटल बिहारी वाजपेयी और अटल बिहारी वाजपेयी के होठो पर आडवाणी हुआ करते थे, पर झारखंड में बाबू लाल मरांडी के होठों पर अर्जुन मुंडा तो थे, पर अर्जुन मुंडा के होठों पर बाबू लाल मरांडी नहीं थे। एक बात और...झारखंड के राजनीति के धुरंधरों को ये जान लेना चाहिए कि अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले जाने में बाबू लाल मरांडी की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी... न कि किसी और नेता की...पर काल के पहिये ने... बाबू लाल मरांडी को भाजपा से इतना दूर कर दिया कि....वे भाजपा को आज की तारीख में पसंद ही नहीं करते...और न भाजपा के नेताओं को....
14. बाबू लाल मरांडी मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान अपने विरोधियों को भी उतना ही सम्मान देते थे, जितना आज तक किसी ने नहीं दिया...याद करिये...भाकपा माले विधायक दल के नेता महेन्द्र प्रसाद सिंह के प्रति विधानसभा में दिया गया उनका बयान बहुत कुछ कह देता है...जरा आज के नेताओं का बयान देख लीजिये....हालांकि बाबू लाल मरांडी आज भी अपने विरोधियों को उतना ही सम्मान देते है...चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट और ये पूछना...क्या जी, कैसे है, सब ठीक...
15. सिंगल विंडो सिस्टम हो या ग्रेटर रांची, सब पर बाबू लाल मरांडी का विजन क्लियर था...नक्सलवाद का सफाया हो...या बेहतर झारखंड निर्माण की ललक...सचमुच बाबू लाल मरांडी आज भी झारखंड की जनता के बीच उतने ही लोकप्रिय है, जितने कल थे...ये अलग बात है कि चुनाव के समय उनके सहयोग से लोग जीत तो जाते है, पर झारखंड के दलबदलू कल्चर से अनुप्राणित होकर, ये जीते विधायक बाबू लाल मरांडी को ही ठेंगा दिखा देते है...हमें लगता है कि ऐसे लोगों को भी जनता देख रही है...
एक बार फिर बाबू लाल मरांडी को हृदय से आभार...
क्योंकि उनकी सोच, आज भी झारखंड को मजबूत करती है...

Monday, November 16, 2015

एक पत्र झारखंड के मुख्यमंत्री को..........

सेवा में,
श्री रघुवर दास, मुख्यमंत्री, झारखंड।
विषय - क्या प्रभात खबर द्वारा किये जा रहे पाप को इसलिए छोड़ देना चाहिए, कि वह झारखंड में सर्वाधिक बिकनेवाला अखबार है?
महाशय,
सर्वप्रथम, आप ये जान लीजिये......
इसी साल अप्रैल महीने में अल जजीरा चैनल लगातार भारत के नक्शे से छेड़छाड़ कर रहा था और कश्मीर का गलत मानचित्र लगाकर समाचार प्रस्तुत कर रहा था, जिसे लेकर भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कड़ी कार्रवाई करते हुए भारत में अलजजीरा के प्रसारण पर पांच दिन के लिए रोक लगा दी थी.....
इसी साल पाकिस्तान में क्या हुआ, वह भी जान लीजिये....
10 सितम्बर 2015 पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक प्रोफेसर आबिदा नसरीन से ऐसी ही गलती हो गयी, उन्होंने एक सेमिनार में पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान में नहीं दिखाया। उसका परिणाम क्या हुआ? पाकिस्तान स्थित पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने इस घटना पर वहां के वीसी से रिपोर्ट मांगी। यहीं नहीं इंस्स्टीच्यूट ऑफ एजूकेशन एंड रिसर्च की सहायक प्रोफेसर आबिदा नसरीन को तत्काल प्रभाव से तीन महीने के लिए निलंबित कर दिया गया......
इसी साल आप के झारखंड में....
धनबाद का एक लड़का, धनबाद के झरिया में, एक धार्मिक जुलूस में पाकिस्तानी झंडा लेकर चल रहा था, उस पर कार्रवाई हुई, वो जेल भेज दिया गया।
इसी साल रांची से प्रकाशित एक अखबार फारुकी तंजीम ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़नेवाला लेख प्रकाशित किया। आपने उस पर कड़ी कार्रवाई की। तो फिर ऐसे में, रांची से ही प्रकाशित अखबार प्रभात खबर जो बार-बार भारत के मानचित्र को गलत ढंग से प्रकाशित करता है, उस पर आप कार्रवाई क्यों नहीं करते....
कल का यानी 15 नवम्बर 2015 के प्रभात खबर का लाइफ संडे अखबार देखिये...जिसमें भारत के मानचित्र को दर्शाया गया है, कैसे पाक अधिकृत कश्मीर को भारत से काट कर, प्रभात खबर ने दिखाया है। आश्चर्य है कि ये गलती कोई पहली बार नही हुई, वो बार-बार गलत करता है। मेरे पास उसके कई दृष्टांत मौजूद है। वो भारत के गलत मानचित्र प्रकाशित करता है, और माफी भी नहीं मांगता। डंके की चोट पर वो गलती किये जा रहा है, और आपकी सरकार उस पर कोई कार्रवाई नहीं करती, आखिर क्यों? क्या प्रभात खबर, भारत देश से भी बड़ा है....
आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप इस पर देशहित में एक्शन लेंगे...
भवदीय
कृष्ण बिहारी मिश्र
स्वतंत्र पत्रकार,
रांची।

Saturday, November 14, 2015

बाबा रामदेव का टूटता तिलिस्म............

योगगुरु के नाम से विख्यात, बाबा रामदेव आज देश के सुप्रसिद्ध उद्योगपतियों में से एक है...। अरबों के व्यवसाय, पूरे विश्व में चल रहे उनके दवा व खाद्यान्नों के व्यापार ने विश्व के बाजारों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है...यहीं नहीं बाबा रामदेव जो कल तक योग के ब्रांड थे, आज अपने प्रतिष्ठान से उत्पादित वस्तुओं का स्वयं को ही ब्रांड के रुप में प्रस्तुत कर विज्ञापन करते हुए भी नजर आ रहे है...आज इनके पास पैसों की कमी नहीं, पैसे इनके आगे – पीछे नाचती है...।
कल तक कांग्रेस के आंखों में खटकनेवाले बाबा, आज भी कांग्रेस के आंखों में बुरी तरह खटकते है...। कांग्रेस व कांग्रेस के लोग तो इन्हें फूंटी आंख नहीं समाते और न रामदेव व रामदेव के लोगों को कांग्रेस व कांग्रेस के लोग फूंटी आंख समाते है...। दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी है। बस मौका मिलना चाहिए, दोनों एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी में एक दूसरे से बीस निकलने की कोशिश में लग जाते है। रामदेव की जितनी कांग्रेस से खुन्नस है, ठीक उसके उलट भाजपा से प्रेम...। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कट्टर प्रशसंक बाबा भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं में खासा लोकप्रिय है। कमाल यह भी है कि बाबा यादव समुदाय से आते है, ज्यादातर यादव खासकर बिहार व उत्तरप्रदेश में भाजपा को पसंद नहीं करते, वे तो लालू और मुलायम को ही अपना सब कुछ मानते है, पर रामदेव का यादव होकर भी लालू व मुलायम को रास नहीं आना ज्यादातर लोगों के समझ से परे है...
हाल ही में रांची के किशोरी चौक पर एक बैनर देखा, जिसमें यादव महासभा ने रामदेव को यादव समुदाय का बताते हुए, गौरवान्वित महसूस किया था, जबकि अपने देश में कोई भी संत चाहे उसकी जाति जन्म से कुछ भी हो, वह सर्वग्राह्य बन जाता है, क्योंकि उसका जीवन सब के लिए हो जाता है, ठीक जैसे गंगा किसी से भेदभाव नहीं करती, उसी प्रकार संत किसी से भेदभाव नहीं करते...। पर रामदेव संत हैं या यादव या उदयोगपति, इसको लेकर अब चर्चा चल पड़ी है। इतिहास खंगाले तो पता चलेगा कि देश में आज तक किसी संत ने दुकान नहीं खोली, न व्यवसाय का पल्लू पकड़कर, विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाते हुए राजनीति में दखलंदाजी की। हां, इतना जरुर किया कि जो उनके पुश्तैनी कार्य थे, उस पुश्तैनी कार्य में लगते हुए, भगवान को प्राप्त करने के मार्ग को चुन लिया। राजनीति में दक्ष और भारत स्वामिमान ट्रस्ट बनाकर, अपने चहेतों में लोकप्रिय रामदेव को शायद मालूम नहीं कि जब अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास को अपने राजमहल में बुलाने की जुर्रत की, तब गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट रुप से कहा था – मोसो कहां सीकरी सो काम अर्थात् मुझे फतेहपुर सीकरी से क्या काम... पर यहां ठीक इसके उलट है, रामदेव को राजनीतिज्ञों के बीच रहना, उठना-बैठना, राजधानी में रहनेवाले मुख्यमंत्रियों से वार्ता करना उनका आनन्द का विषय होता है।
रामदेव का रांची आना – जाना बराबर लगा रहता है। यहां के कई व्यवसायी बाबा के परम भक्त है। भाजपा की सरकार होने के कारण इनकी भक्ति का पैमाना और छलकता है। पिछले तीन नवम्बर को बाबा पुनः रांची पधारे, खुब जमकर प्रचार- प्रसार किया गया। उनके कार्यक्रम में भाग लेने के लिए शुल्क तय किये गये। ये शुल्क इंट्री कार्ड पर रखे गये थे, जिसके लिए कई व्यवसायिक केन्द्रों को कार्ड बेचने के लिए चुना गया था, पर सच्चाई ये है कि वे कार्ड इक्के दुक्के ही बिके, बाकी धरे के धरे रह गये...। रामदेव के एक दिन आने के पूर्व शोभायात्रा भी निकाली गयी, पर वह शोभा यात्रा भी बेकार साबित हुई...। बाबा 2 नवम्बर को जब सायं समय रांची हवाई अड्डे पर आये, तब वहां उनके स्वागत में भी कोई खास भीड़ दिखाई नहीं पड़ी, इतने लोग पहुंचे थे, जिन्हें हाथों से गिना जा सकता था...। जो लोग रामदेव को जानते है, वे ये भी जानते है कि पहले रामदेव का स्वागत कैसे किया जाता था? और कैसे उनके लिए जन-ज्वार उमड़ पड़ता था?
आपको ज्ञात हो, रांची से प्रकाशित एक अखबार तो बाबा रामदेव के पीछे ऐसा उमड़ता था, जैसे लगता हो, कि वे भगवान हो...। यहीं नहीं इस अखबार ने तो इनकी स्तुति भी गायी थी। उन्हें अपने यहां एक दिन का संपादक भी बना डाला था...। अखबार की आवभगत से खुश बाबा उस अखबार के पक्ष में कशीदे भी पढ़े थे। अर्जुन मुंडा के शासनकाल में आये बाबा ने ऐलान किया था कि आनेवाले पांच वर्षों में भारत विश्वगुरु बन जायेगा। प्रभात खबर ने प्रमुखता से इस खबर को प्रथम पृष्ठ पर छापा था...। पांच से ज्यादा साल बीत गये, पता नहीं भारत विश्वगुरु बना या नहीं, पर बाबा सुप्रसिद्ध उद्योगपति जरुर बन गये...उनका कारोबार विश्वस्तर तक जरुर पहुंच गया...वे संत से सुप्रसिद्ध उदयोगपति का तमगा जरुर ले लिये, यानी रामदेव पहले संत हुए, जो उद्योगपति भी है, राजनीतिज्ञ भी है, संत भी है, गुरु भी है...यानी बहुमुखी प्रतिभा के धनी...। कलयुग का प्रभाव कहिये...या और कुछ...पर सच्चाई तो यही हैं...
इन हालातों में हमारी नजर बाबा रामदेव के कार्यक्रम पर थी...अचानक 2 नवम्बर को मेरे मोबाइल पर मैसेज आया कि आप रामदेव के कार्यक्रम में सपरिवार शामिल हो, इंट्री फ्री है...। हमें समझ में नही आया...मुझे योग में दिलचस्पी नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाया जा रहा, निमंत्रण क्यों दिया जा रहा...। इसके पूर्व तो हमें संवाददाता सम्मेलन में भी नहीं बुलाया जाता था...अचानक आस-पास बैठे लोगों के पास भी इस प्रकार मैसेज आने लगे...। मुझे समझते देर नहीं लगी कि बाबा को बहुत बड़ा झटका लगनेवाला है...। लोगों की बाबा में दिलचस्पी घटने लगी है...। इंट्री कार्ड नहीं बिका है...। जब इंट्री कार्ड ही नहीं बिका और लोगों की दिलचस्पी घट रही तो फिर सुबह साढ़े सात बजे 3 नवम्बर को भीड़ कहां से आयेगी... तो नुस्खा निकाला गया, सभी को मोबाइल मैसेज करिये...बाबा से मिलिये...। सच्चाई ये है कि उसके बाद भी बाबा रामदेव को वो माइलेज नहीं मिला, जो माइलेज कभी मिला करता था...।
आज से ठीक छह-सात साल पहले एक बाइट लेने के लिए संवाददाताओं को तेल निकल जाते थे, पर आज बाबा टीवी वालों को ढूंढ रहे थे, पर टीवी वाले नजर नहीं आ रहे थे। लाइफ रांची निकालनेवाले के लिए तो बाबा एक आयटम थे, आयटम के रुप में उसने जगह दी और बाबा ने उसकी प्रशंसा कर दी...और लाइफ रांची वालों ने उसका भी न्यूज बना दिया...यानी जीव विज्ञान आपने पढ़ा होगा...तो आपने सहजीविता जरुर पढ़ा होगा... जिसमें दो जीव एक दूसरे पर आश्रित रहकर साथ – साथ जीवन जीते है और उससे किसी को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता...। इसी सहजीविता के आधार पर प्रभात खबर और रामदेव ने पिछले दिनों अपनी भूमिका निभायी।
इसी दरम्यान बाबा के मन में छुपा हुआ – भयंकर दर्द से भी मेरा आमना –सामना हुआ। बाबा रामदेव ने रांची में दर्दे बयां किया कि उन्हें नोबल पुरस्कार इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि वे काली चमड़ी वाले है, नोबेल पुरस्कार गोरी चमड़ीवालों को दिया जाता है...यानी भारत स्वाभिमान की बात करनेवाले, भारत माता की जय बोलनेवाले, भारत-भारती की जमकर दुहाई देनेवाले विदेशी पुरस्कार नोबेल के लिए कितने लालायित है...वो पता चल गया...ऐसे संत है...बाबा रामदेव...। ऐसी है, इनकी भारत भक्ति...। हमारे देश में बहुत सारे संत है, संत होंगे भी पर किसी ने ऐसी पीड़ा व्यक्त नहीं की, जो रामदेव ने कर दी...यानी हमारे देश के संत-परंपरा का अपमान...
अरे रामदेव जी संत जो होता है, वो किसी पुरस्कार का भूखा नहीं होता...
धन का भूखा नहीं होता...
वो दुकान नहीं खोलता...
वो मार्गदर्शन करता है...
वो करता नहीं, कराता है, और बदले में स्वयं के लिए कुछ नहीं कर पाता...
बाद में तो वो गर्व से यहीं कहता है...जो कबीर ने कभी कहा था...
सुना देता हूं...
यहीं चादर सुर-नर-मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैली कीनी चदरिया...
दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया...

Wednesday, November 11, 2015

धिक्कार, उन कलमों को...उन चैनलों को...

धिक्कार, उन कलमों को...उन चैनलों को...
जो बिहार चुनाव परिणाम का सही विश्लेषण न कर सकें...
• जीत कर भी हार गये नीतीश...
(संदर्भ – बिहार चुनाव परिणाम)
आइये हम आपको एक कहानी सुनाते है। दो बिल्लियां थी। उन्हें कहीं से एक रोटी मिली। एक रोटी के टूकड़े में अधिक हिस्से पाने को, वे आपस में लड़ पड़ी। दो बिल्लियों को आपस में लड़ता देख, कहीं से आए वानर ने कहां कि लाओ इस रोटी को, हम तुम दोनों के बीच में बराबर – बराबर बांट दें, फिर क्या था? बिल्लियों ने हामी भर दी और वह चालाक वानर इन दोनों बिल्लियों को मूर्ख बनाकर सारा रोटी हजम कर गया.........
बिहार चुनाव परिणाम के संदर्भ में बचपन में सुनी इस कहानी में, आप दो बिल्लियों में एक को जदयू और दूसरे को भाजपा के रुप में रख सकते है। हालांकि बहुत सारे लोगों को ये कहानी बिहार संदर्भ चुनाव में गले से नहीं उतरेगी। उतरना भी नहीं चाहिए, क्योंकि बहुत सारी ऐसी कहानियां है, जो गले में तब उतरती है, जब कोई घटना का बहुत बुरा अंजाम सामने आता है...क्योंकि कहानियां समझ में आ जाये और उस अनुरुप हम कार्य करें, ऐसा होता भी नहीं......
बिहार के चुनाव परिणाम बताते है कि नीतीश की लालू भक्ति की वजह से लालू यादव एक बार फिर किंग मेकर बने है और नीतीश स्वयं फिसड्डी। नीतीश जानते थे कि लालू कृपा बिना इस बार वे मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, इसलिए उन्होंने अपने सारे अहं का त्याग कर लालू कृपा पाने के लिए वे लालू के चरणों में लोट गये...हुआ वहीं, यादवों के नेता लालू ने, कुर्मियों के नेता नीतीश को गले लगाया और कहा कि तुम चिंता क्यों करते हो?, हम यादव नेता, तुम कुर्मी के नेता और बचा मुसलमान...तो मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु कौन है, तो वह हैं भाजपा....। मुसलमानों का नारा क्या होता है?...बस वहीं वोट उसी को जायेगा, जो भाजपा को हरायेगा....और जब हमारा कंबिनेशन बनेगा तो वो जायेगा कहां...उसका वोट इधर ही आयेगा....और हुआ वहीं....यादव, मुस्लिम और कुर्मी तीनों मिल गये और भाजपा धराशायी..........
सच्चाई यहीं है... इसमें कोई अरंतु-परंतु नहीं, ये अलग बात है कि नीतीश-लालू भक्ति और इन दिनों मोदी से परेशान मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग इस परिणाम के बाद लंबा-चौड़ा संपादकीय दिये जा रहा है...
हम आपको एक और कहानी सुनाते है.........
बिहार के एक मुख्यमंत्री थे – कर्पूरी ठाकुर। वो बराबर कहा करते थे। आप कितना भी विकास कर लो, बिहार में विकास के नाम पर वोट थोड़े ही पड़ता है। यहां तो सिर्फ कंबिनेशन चलता है...ये कंबिनेशन हमेशा से रहता है, ये अलग बात है कि इसका फायदा कोई – कोई, कभी – कभी उठाता है और कोई हमेशा उठाता रहता है....
नीतीश ने कम दिमाग नहीं लगाया था...वो मीडिया के महत्व को भी जानता था। इसलिए उसने प्रभात खबर के प्रधान संपादक पर डोरे डाले, पता चला कि ये तो राज्य सभा भेजने में ही गदगद हो जायेंगे, उसे राज्य सभा भेज दिया। फिर देखा कि एनडीटीवी को भी उपकृत करना चाहिए, पता चला कि रवीश का भाई चुनाव लड़ना चाहता है, नीतीश ने बहुत बड़ा त्याग किया। निरंतर जदयू की सीट रहनेवाली गोविंदगंज की सीट रवीश के भाई को थमा दी, कांग्रेस के टिकट पर रवीश का भाई लड़ा, ये अलग बात है कि वह चुनाव हार गया, पर कशिश चैनल के मालिक ने तो बेनीपुर में जदयू के टिकट पर आखिरकार झंडा बुलंद कर ही दिया। यानी नीतीश ने राजनीति के साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई और वो चीजें पाई, जिसको लेकर वो ज्यादा सक्रिय था.....
पर नीतीश को भी मालूम है कि सरकार तो उसकी बनी पर उसके क्या परिणाम निकले....कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। याद करिये, चुनाव परिणाम के बाद का नीतीश, लालू और अशोक का संयुक्त प्रेस काँफ्रेस। जो शारीरिक विज्ञान को जानते है, उन्हें ज्यादा दिमाग लगानी नहीं पड़ेगी, जो बयानों की तकनीक को जानते है, उन्हें भी ज्यादा दिमाग लगाना नहीं पड़ेगा। नीतीश ने चुनाव परिणाम की बारीकियां समझी और उसी के अनुसार बयान दिया, ज्यादा आक्रामकता नहीं दिखाई, चेहरे पर भी जीत का भाव नहीं दिखा, एक संशय जरुर दिखा...जबकि इसके विपरीत लालू गदगद, वो सारी बाते लालू ने कहीं, जो उनके स्वभाव में है, इस प्रेस कांफ्रेस में भी, उन्होंने उनलोगों को चेता ही दिया कि जो वोट उन्हें नहीं दिये, वे संभल जाये... यानी इशारा किस ओर था, इशारों को समझने वाले जान गये है...
अब दूसरी बात..........
नीतीश से कुछ सवाल, जो उनके भक्त पत्रकार उनसे नहीं पूछ सकते या उनसे अनुप्राणित मीडिया का वर्ग, या उनके जाति के पत्रकार नहीं पूछ सकते.....
क्या नीतीश-लालू बता सकते है, कि जब उनका गठबंधन इतना ही लोकप्रिय था और जब कुर्मी, यादव और मुस्लिमों का इतना बड़ा गठजोड़ था तो फिर वे कुर्मी, यादव और मुसलमान बहुल राजधानी पटना के पटनासिटी, कुम्हरार, दीघा, बांकीपुर और दानापुर की सीट पर बुरी तरह से क्यों हार गये?
क्या नीतीश बता सकते है कि जब उनका शासन बहुत ही लोकप्रिय था तब उनकी सीटे लालू से भी कम क्यों आयी?
क्या नीतीश बता सकते है कि जब चुनाव परिणाम आ रहा था तो राजधानी पटना के व्यवसायियों और अन्य प्रबुद्ध वर्गों में भय क्यों व्याप्त हो रहा था?
क्या नीतीश बता सकते है कि उनके स्पीकर और अन्य मंत्रियों की करारी हार कैसे हो गयी?
क्या नीतीश बता सकते है कि इतनी बड़ी जीत के बाद भी, उन्हीं के द्वारा आयोजित प्रेस कांफ्रेस में उनके चेहरे का रंग उतरा हुआ क्यों था?
क्या नीतीश दावे के साथ कह सकते है कि उन्होंने इस चुनाव में प्रधानमंत्री के खिलाफ निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग नहीं किया?
क्या नीतीश दावे के साथ कह सकते है कि उन्होंने मीडिया जगत के लालची पत्रकारों और लालची मालिकों को खुश करने के लिए वे सारे हथकंडे नहीं अपनाए, जो भाजपा ने अपनाए थे?
ये सारे सवाल सिर्फ नीतीश से पूछना चाहिए, क्योंकि वे सुशासन बाबू है, लालू से तो पूछने का सवाल ही नहीं है...क्योंकि वे खुद ही बता चुके है, इस चुनाव में कि वे क्या है?
नीतीश जी, ये याद रखिये.....जब कोई जीतता है तो उसके जीत का कारण कोई नहीं पूछता, हां जो हारता है, उसके हार के कारण गिनाएं जाते है.....
मैं जानता हूं कि बहुत सारे अखबार और मीडिया हाउस में भी जातिवादी पत्रकारों और लालची पत्रकारों का समूह पैदा हुआ है, जो कभी कांग्रेस, तो कभी भाजपा और आज आपका गुणानवाद कर रहा है, पर इससे नुकसान किसका हो रहा है। आप ये जानकर भी अनजान है....नुकसान उन बेवकूफों का हो रहा है, जो नहीं जानते कि पिछले पच्चीस और अब आज से तीस सालों तक वे अभी सड़कों, बिजली और पानी पर ही अटके हैं जबकि अन्य राज्य इन सबसे कहीं बहुत दूर निकल चुके है.....
ये बेवकूफ बन रहे लोग नहीं जानते कि उनके बच्चे विकसित होते कई राज्यों में दोयम दर्जें के नागरिक बन कर रह रहे हैं और उनकी औकात सिर्फ कुली, पोछा लगानेवाले से ज्यादा कुछ भी नहीं...
आप में जितना अहं हैं, हमें नहीं लगता कि केन्द्र और राज्य के बीच कोई मधुर संबंध रहेगा और आप बिहार को इन परिस्थितियों में जबकि राजद आपसे बीस है, कोई राज्यहित में स्वतंत्र रुप से निर्णय ले लेंगे.....
• नीतीश भक्ति और प्रभात खबर...........
सभी जानते है कि जैसे ही बिहार चुनाव की घोषणा हुई, दिल खोलकर प्रभात खबर ने लालू यादव, नीतीश कुमार, सोनिया गांधी और उनके लाडले राहुल की भक्ति में स्वयं को अनुप्राणित करना शुरु कर दिया....ऐसा होना भी चाहिए था क्योंकि नीतीश कुमार ने बिना एक पैसे प्रभात खबर से लिये, इसके प्रधान संपादक को राज्य सभा में पहुंचा दिया था....
प्रभात खबर की भूमिका देखिये, उसकी महागठबंधन भक्ति देखिए........
उसके लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत नहीं, बस 9 नवम्बर का अखबार कहीं से उठा लीजिये और सबसे पहले प्रथम पृष्ठ पर नजर दौड़ाइये...उसने भाजपा के हार के कारण गिनाएं है, लिखा है...भाजपा के हार के प्रमुख कारण, निम्नलिखित है....
• आरक्षण पर संघ प्रमुख भागवत का बयान
• नीतीश के डीएनए पर सवाल उठाना
• गोमांस को लेकर अनावश्यक बयानबाजी
• लालू को शैतान कह कर हमला करना
• नीतीश पर बिना तथ्यों के हमला करना
• प्याज, दाल की कीमतों में भारी वृद्धि
• नीतीश के मुकाबले राज्य में एनडीए के पास कोई दमदार चेहरा का न होना
• नीतीश सरकार के कामकाज के प्रति लोगों की सकारात्मक राय
यानी हार के 8 कारणों में नीतीश व लालू की भक्ति में पांच कारण जोड़ दिये गये....
यहीं नहीं प्रथम पृष्ठ पर लिख दिया लालू प्रसाद के बेटों तेज प्रताप व तेजस्वी को छोड़ कर सभी नेतापुत्रों को मिली हार, जबकि खुद पृष्ठ संख्या 13 पर शिवानंद तिवारी के बेटे को भी जीत दिखलाता है, सच्चाई क्या है? प्रभात खबर ही बेहतर बता सकता है....
इस अखबार में नीतीश के प्रशसंकों के कई आलेख भी छपे है...
पृष्ठ संख्या 13 पर प्रंजॉय गुहा ठकुराता के आलेख है – सांप्रदायिकता की राजनीति की पराजय। सवाल - ठकुराता से। 2005 व 2010 में जब नीतीश भाजपा का बांह पकड़कर सत्ता में आये थे तो उस वक्त क्या सांप्रदायिकता की राजनीति की जय हुई थी?
पृष्ठ 14 पर संपादकीय में तो नीतीश भक्ति के सिवा कुछ भी नहीं, अभिमत में रविभूषण जो वामपंथी पत्रकार है, विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी है, इनके कलम से मैंने आज तक भाजपा व संघ की प्रशंसा में दो शब्द नहीं देखे तो आज कैसे देख पाउंगा...हां पत्रकार को कभी भी किसी का सदा के लिए विरोधी या सदा के लिए प्रेमी नहीं होना चाहिए...पत्रकार को तटस्थ होना चाहिए.......
पृष्ठ संख्या 15 तो भगवान नीतीश को समर्पित है...हल्की दाढ़ीवाले बाबा नीतीश का बहुत बड़ा फोटो और उनका चरित्र वर्णन है...ये आम तौर पर होता है, जब कोई सत्ता में आता है तो उसके लिए एक विशेष पेज होता है...इस पर हमें कोई टिप्पणी नहीं करनी है.......
पृष्ठ संख्या 18 पर चरणवार भाजपा की हार का मनगढंत विश्लेषण और अजय कुमार व एमएन कर्ण का संपादकीय आधारित आलेख है, जिसमें नीतीश व लालू को भगवान का दर्जा दे दिया गया है।
और अंतिम पृष्ठ पर भाजपा व संघ का दुश्मन व जब तक जीवित रहेगा दुश्मन बना रहेगा...नाम बता देता हूं, उर्मिलेश का आलेख है। ये वहीं उर्मिलेश है, जिसे चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू में सामाजिक न्याय नजर आता है और नीतीश में शासन के सर्वगुण संपन्न होने के गुण...ये पत्रकार जहां भी भाजपा का विरोध हुआ देखता है, पुलकित हो जाता है, और जहां अपनी जाति के लोगों को जीत देखता हैं, प्रसन्न होकर उसकी स्तुति करता है....इन दिनों प्रभात खबर का चहेता बना हुआ है... इसके आलेख है........
यानी गर आप नीतीश के कट्टर समर्थक है, भाजपा का विरोध करना जानते है, तो हरिवंश को पकड़िये, प्रभात खबर से जूड़िये और कल तक खलनायक थे, तो नायक बन जाइये.........
अपनी बात.......
नीतीश के जीत के कारण...
एकमात्र जीत का कारण – जातिवादी लहर को फैलाना, लोगों को उनकी जाति का हवाला देना, यादववाद, कुर्मीवाद और अंत में मुस्लिमों के अंदर ये बात फैलाना कि भाजपा आई तो उनकी खैर नहीं........
भाजपा के हार के कारण.....
• जातिवाद लहर के आगे संप्रदायवाद की हवा निकल जाना।
• बेवजह असहिष्णुता का बवंडर विपक्षियों द्वारा अपने शुभचितकों, लेखकों, फिल्मकारों साहित्यकारों द्वारा खड़ा करना, ताकि मोदी सरकार को अल्पसंख्यक विरोधी और हिंदूवादी बताया जाय।
• भाजपा के कई नेताओं द्वारा विषवमन करना।
• भाजपा के अंदर शत्रुघ्न सिन्हा जैसे जयचंदों का बराबर अपनी ही पार्टी के खिलाफ विषवमन करना और नीतीश व लालू का प्रशंसा करना।
• भाजपा के एक नेता साक्षी महराज द्वारा दूसरे चरण के बाद भाजपा की हार स्वीकार करनेवाले बयान को जारी करना।
• एकमात्र मोदी के भाषण पर ही ध्यान टिका कर, अन्य चुनाव प्रचारों व सशक्त जनसमर्थन जुटाने पर ध्यान का न होना।
• सामान्य वर्ग द्वारा बढ़ती महंगाई के खिलाफ गुस्सा।
• प्रधानमंत्री द्वारा पूर्व में दिये गये बयान कि काला धन वापस लायेंगे, पर अभी तक उस पर कोई प्रगति का न होना, जबकि कोई भी सरकार आये, ये इतना जल्द संभव भी नहीं, पर आम जनता को लगा कि सरकार अपने इस वायदे को पूरा करने में सफल नहीं रही।
• मीडिया के एक बहुत बड़े वर्ग द्वारा नीतीश को खुलकर समर्थन करना और उसे बिहार की जनता के बीच एक महान शख्सियत के रुप में पेश करना, जैसे ये दीने इलाही अकबर हो।
• नीतीश द्वारा अनुप्राणित अखबार जैसे प्रभात खबर और कुछ चैनलों द्वारा खुलकर नीतीश भक्ति में डूब जाना।
चुनाव परिणाम के प्रभाव............
• अब नीतीश कुमार गर चाह लें कि वे स्वतंत्र रुप से बिहार के लिए कोई निर्णय कर लें, ये अब संभव नहीं है, उन्हें हर बात के लिए लालू की शरण में जाना होगा और लालू वहीं करेंगे, जो उनके हित में होगा।
• लालू सर्मथकों का स्थानीय प्रशासन पर बोलबाला रहेगा, गुंडों की जमात स्थानीय शासन पर हावी रहेगी और व्यापार में बिहार पिछड़ता चला जायेगा।
• ऐसे ही बिहार की नकारात्मक छवि पूरे देश में है, अब इसकी छवि और पुष्ट होगी, कोई भी उदयोग जगत का व्यक्ति यहां उद्योग लगाने से हिचकेगा, जो अब बचा भी होगा तो यहां से दूसरे जगहों पर वो सिफ्ट करेगा।
• ऐसे ही अहंकार में डूबे नीतीश को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से नहीं बनती, ऐसे में विकास को लेकर बिहार में संशय की स्थिति बनी रहेगी।
• पन्द्रह साल लालू-रावड़ी और दस साल नीतीश और अब फिर लालू-नीतीश मतलब एक बार फिर रोजगार की तलाश में जाने को मजबूर बेरोजगार युवकों की फौज बिहार को छोड़ अन्य राज्यों में जाने को मजबूर होगी।
• एक बार फिर बिहार के ये युवा महाराष्ट्र, असम, कर्णाटक आदि राज्यों में दोयम दर्जें के नागरिक बन कर रहने को विवश होंगे और समय-समय पर जलील होंगे, पिटाई खायेंगे...क्या नीतीश व लालू बता सकते है कि महाराष्ट्र व गुजरात से कितने युवा बिहार में रोजगार के लिए आते है।
• एक बार फिर बिहार के लोग अच्छी स्वास्थ्य सेवा के लिए बिहार से दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर होंगे।
• एक ओर जहां आंध्र प्रदेश अपनी नई राजधानी अमरावती को बसाने के लिए ठोस प्रयास कर रहा होगा, तो बिहार की जनता अपनी जातिवाद पहचान के लिए संघर्ष करती नजर आयेगी।
• एक साल में झारखंड व्यापार सुगमता सूचकांक में भारत के प्रमुख विकसित राज्यों में तीसरा स्थान बना लिया और तेजी से बढ़ते राज्यों में चौथा स्थान प्राप्त कर लिया और बिहार सबसे नीचे रहने के लिए स्थान बनाने को व्याकुल रहेगा।
• प्रभात खबर के प्रधान संपादक एक बार फिर राज्यसभा में जाने के लिए नीतीश कुमार की द्यादृष्टि पाने के लिए लालायित रहेंगे और सामान्य जनता इस बात के लिए व्याकुल रहेगी कि उसके घर से निकली बेटियां सही सलामत घर लौटेंगी भी या नहीं।
कौन कहता है कि बिहार में विकास व सुशासन की जीत है, मैं कहता हूं कि ये पूर्णतः जातिवाद की जीत है...जैसे सांप्रदायिकता बुरी है, वैसे ही जातीयता बुरी है, पर कुछ पत्रकार, कुछ बुद्धिजीवी जातीयता का तो समर्थन करते है, पर सांप्रदायिकता की आलोचना...ठीक उसी प्रकार जैसे पाकिस्तान भारत प्रायोजित आतंकवाद का तो समर्थन करता है, पर अन्य जगहों पर होनेवाले आतंकवाद की कड़ी भर्त्सना करता है...ये दोगली सोच बिहार को बर्बाद कर डालेगी...पता नहीं, बिहार की जनता को अक्ल कब आयेगी?
हमें लगता है कि एक दिन अक्ल जरुर आयेगी...पर तब तक बहुत देर हो चुका होगा...और कुछ लोग गाने गायेंगे...सब कुछ लूटा के होश में आए तो क्या किया....

Thursday, November 5, 2015

लालू यादव ब्राह्मणों को अच्छी गाली दे लेते है...........

लालू यादव ब्राह्मणों को अच्छी गाली दे लेते है...........
बिना ब्राह्मणों को गाली दिये, लालू का भोजन पचता भी नहीं.......
लालू यादव दुनिया के पहले नेता नहीं जो ब्राह्मणों को गाली देता है, ऐसे कई नेता है जो ब्राह्मणों को गाली देना शान समझते है, इससे उन्हें वोटों में बढ़ोत्तरी होती है और उनके दल का प्रचार – प्रसार भी हो जाता है। कंस की परंपरा को वर्तमान युग में भी ले चलने की उनकी सोच बहुत ही निराली है। स्थिति ऐसी है कि एक समय उनके घोर विरोधी माने जानेवाले अखबार के प्रधान संपादक भी, अपने अखबार में उनके दिव्य फोटो छापने से अब परहेज नहीं करते, क्योंकि उनके प्रिय नेता नीतीश कुमार के बड़े भाई के नाम से आजकल लालू यादव विख्यात हो रहे है.......अपने प्रिय नीतीश को वे भला निराश कैसे कर सकते है...। कुछ लोग कहते है कि शिवानंद तिवारी और मनोज झा जैसे ब्राह्मण लालू की पार्टी में है, तो भाई मेरे रावण को भी कुछ लोग ब्राह्मण कहा करते है, तो ऐसे में क्या हम शिवानंद तिवारी और मनोज झा जैसे लोगों को इसलिए हम ब्राह्मण मान लें कि उसने ब्राह्मण कुल में जन्म ले लिया। जो लालू यादव जैसे ब्राह्मण द्रोही की शरण में बैठकर, उसके भ्रष्टवाणियों को सुने, जो पशुओं के चारा खा जानेवाले भ्रष्ट नेताओं की आरती उतारे वह किसी जिंदगी में ब्राह्मण नहीं हो सकता....। उसके हाथ से तो जल ग्रहण करना या अपने बच्चों पर आशीर्वाद के रुप में पुष्प-अक्षत छिड़कवाना भी महापाप है....जो भी ब्राह्मण लालू यादव अथवा उसकी पार्टी या उसके समर्थकों का गुणगान करता है, वह महापातक है, उसे तो नर्क में भी जगह नहीं मिले....जो गोमांस का समर्थन करे, वह गोपालक कैसे हो सकता है, वह गोसंहारक है..........
सही मायनों में अभी लालू यादव को ब्राह्मण से भेंट ही नहीं हुआ है, जिस दिन भेंट हो जायेगा, उन्हें पता चल जायेगा, कि ब्राह्मण क्या होता है?, वे मनोज झा और शिवानंद तिवारी जैसे ब्राह्मण, जो उनकी चरणवंदना करते है, वे समझ लेते है कि बस अब ब्राह्मणों की यहीं औकात है...अरे लालू जी, जिस दिन ब्राह्मण अपने तेज को पहचान लिया तो फिर आप कहां रहोगे, आपको पता ही नहीं चलेगा...
हां एक बात और, आपको आपके किये का फल ब्याज समेत ईश्वर दे रहा है, फिर भी आपको शर्म नहीं...शर्म आयेगी भी कैसे, शर्मवालों को न शर्म होता है...आप तो विशुद्ध रुप से बेशर्म है....बोलने की तो आपको तमीज है नहीं और न ही आप बोलने की तमीज सीखेंगे, क्योंकि आप नमूने जो ठहरें, हमें तो लगा था कि बिहार की सत्ता से दस साल बेदखल होने के बाद आपको बुद्धि आ गयी होगी, पर आप तो वहीं है, न सुधरे थे, न सुधरे है, न सुधरेंगे........
खुब गाली दीजिये ब्राह्मणों को, हो सके तो सारे चैनलों पर संतों की तरह प्रातः का एक बुलेटिन बुक करवा लीजिये, और जी भरकर ब्राह्मणों को गाली दीजिये, क्योंकि जब तक आप ब्राह्मणों को गाली नहीं दीजियेगा, तब तक आपका और आपके दल का उद्धार कैसे होगा.....वोट कैसे मिलेगा, आप धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील कैसे कहलाइयेगा....हां आप ही के एक दल में एक नेता है, शायद उसका नाम रघुवंश प्रसाद सिंह है। उससे ज्ञान भी अर्जन करिये, वो बतायेगा कि गोमांस कब और कैसे खाया जाता है?, कौन- कौन ऋषि गोमांस खाकर भगवान को प्राप्त कर लेते थे? इससे एक नये समाज का जन्म होगा। सुबाहुवाद और मारीचवाद बिहार के कण-कण में फैलेगा, तब परिकल्पना कीजिये....अपना बिहार कितना सुंदर दीखेगा....जब सब बिहारी भाईयों के हाथों में गोमांस होगा....और जोरदार नारा लगायेंगे, नारा इस प्रकार होगा.....
गोमांस हम खायेंगे,
लालू के संग जायेंगे....
धन्य – धन्य बिहार प्रदेश,
जहां मिले गोमांस अनेक....
यादव-मुस्लिम भाई-भाई
गोमांस से करो कमाई....
भाईचारा तभी आयेगा,
जब गोमांस सब खायेगा....
शाकाहारी मुर्दाबाद,
मासांहारी जिन्दाबाद.....
शाक-सब्जी नहीं खायेंगे
केवल गोमांस घर लायेंगे.....
रोज सबेरे, एक ही काम
ब्राह्मणों का, कर दो काम तमाम....
और लालू जी आपके लिए एक और काम की बात....सारे बिहार के लोगों को बता दीजिये कि कैसे कश्मीर से सारे कश्मीरी पंडितों को भगा दिया गया और आज वहां केवल मुस्लिमों की आबादी शान से रह रही है....इसलिए बिहार में भी ब्राह्मणों को हटाने के लिए नीतीश कुमार के साथ एक व्यापक आंदोलन चलाईये ताकि बिहार से ब्राह्मणों का सदा के लिए सफाया हो जाय और आप माई समीकरण के तहत जब तक जिंदा रहे राज करें.....फिर आपके बेटे-बेटियां राज करें....कालांतराल के बाद जब मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ जाये तो फिर आप के खानदान के लोग सदा के लिए उन्हें सत्ता सौंप दें....बाद में आपकी आनेवाली पीढ़ी खुद भी यह कहकर धर्मांतरण कर लें कि उन्हें लोकतंत्र में गहरी आस्था है..........

Friday, October 30, 2015

कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...

कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...
मनमुताबिक मंतव्य लेने के लिए, लोक अभियोजक का तबादला...
प्रभार लेने के पूर्व ही, सरकार के मनमुताबिक रिपोर्ट, धनबाद डीसी को भेजा ए के सिंह-2 ने...
मुख्यमंत्री रघुवर दास राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड बनाने का दावा करते है, पर सच्चाई इसके ठीक उलट है, ऐसे में राज्य भ्रष्टाचार मुक्त होगा या यहां भ्रष्टाचार चरम सीमा पर पहुंचेगा, ये निर्णय करने का अधिकार, मैं जनता को सौंपता हूं, वह निर्णय करें और सरकार से पूछे कि आखिर ये मामला क्या है?
ढुलू महतो, भाजपा के बाघमारा विधायक है। इसके पहले ढुलू झाविमो विधायक भी रह चुके है और कभी बाबूलाल मरांडी उनके लिए ढाल का भी काम कर चुके है, पर इधर ढुलू मुद्दे पर बाबू लाल मरांडी का दल रघुवर दास का भी क्लास ले रहा है, यानी मेरे दल में है तो संत और दूसरे दल में गया तो चोर वाली कहावत....।
और अब सीधे काम की बात...
पिछले साल 24 जून 2014 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से भेजा गया F.NO.IV/15012/4/2014-CSRII पत्र जो विधायकों/सांसदों के अपराधिक मामलों को जल्द से जल्द ट्रायल कर निबटाने से संबंधित था। झारखंड सरकार को प्राप्त हुआ। इस पत्र में संबंधित जिले के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश - अध्यक्ष, संबंधित जिले के उपायुक्त – सदस्य, सबंधित जिले के वरीय पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक – सदस्य, संबंधित जिले के प्रभारी लोक अभियोजक/लोक अभियोजक – सचिव को मिलाकर एक जिलास्तरीय समन्वय समिति बनानी थी, जिसके आधार पर विधायकों/सांसदों से संबंधित अदालत में चल रहे अपराधिक मामलों का ट्रायल कर त्वरित निष्पादन करना था।
इस पत्र के आलोक में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपने विधायक ढुलू महतो पर कृपा बरसानी शुरु कर दी और गृह मंत्रालय की ओर से उपायुक्त धनबाद को पत्र भेजा कि वह विधायक ढुलू महतो से संबंधित अपराधिक मामलों से संबंधित अपना मंतव्य सरकार को प्रेषित करें, ताकि ढुलू महतो पर चलाये जा रहे सारे मुकदमे वापस ले लिये जाये। इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण मामला धनबाद कतरास थाना कांड संख्या -120/13 है, जिसमें विधायक ढुलू महतो को सजा मिलनी तय है, साथ ही उनकी विधायक पद पर भी खतरा मंडरा रहा है, विधायकी जाने का खतरा ढुलू महतो पर इतना ज्यादा हो गया है कि वे चाहते है कि जल्द से जल्द इस मामले में सरकार उन्हें दोष मुक्त कर दें, ताकि उनकी विधायकी बच जाये। इधर उपायुक्त धनबाद ने प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद से धनबाद कतरास थाना कांड संख्या – 120/13 की मुकदमा वापसी के संबंध में मंतव्य मांगा। उपायुक्त धनबाद को तत्कालीन प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी ने बिना देर किये अपने लिखित मंतव्य में मुकदमे का वापस लिया जाना लोकहित व न्यायहित के खिलाफ बता दिया।
प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद ने उपायुक्त धनबाद को 29.09.2014 पत्रांक संख्या 2952 के हवाले से अपना मंतव्य देते हुए लिखा कि –
कंडिका 4 – यह कि उपर्युक्त वाद धारा 147/148/149/341/323/353/332/290/427/283/224/225/504 भादवि के अंतर्गत सूचक रामनारायण चौधरी, तत्कालीन थाना प्रभारी, बरोरा थाना के द्वारा किया गया है जिसमें ढुलू महतो पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि वे अपने समर्थकों के सहयोग से पुलिस बल पर हरवे हथियार के साथ हमला कर गिरफ्तार वारंटी को छुड़ा ले गये एवं वादी का सर्विस पिस्टल छीनने का प्रयास किया, साथ ही पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट कर एक पुलिसकर्मी की वर्दी भी फाड़ दी। इस प्रकार इस कांड में सरकार के विरुद्ध गंभीर अपराध कर सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाई।
कंडिका 5 – यह कि, इस घटना के पूर्व भी ढुलू महतो के विरुद्ध अनुमंडल न्यायालय में निम्नलिखित वाद गवाही पर लंबित है –
1. GR4041/06, U/S 147/149/353/332/224/511 IPC
2. GR1782/06, U/S 143/144/341/353/506/290/283IPC
3. GR851/07, U/S 147/148/341/323/332/353/149/225/511 IPC
4. GR3183/10,U/S 147/148/323/341/342/353/286/186/504/506IPC
इसके अलावा और भी कई वाद भिन्न-भिन्न न्यायालय में ढुलू महतो के विरुद्ध लंबित है।
कंडिका 8 – यह कि मुकदमे की वापसी होने की स्थिति में समाज पर एक ऐसे विधायक के तौर पर छवि उभरकर सामने आएगी जो कानून तोड़कर भी कानून की गिरफ्त से बाहर है और वह सरकार के विरुद्ध कोई भी न्याय विरोधी कार्य कर सकता है।
उपर्युक्त बातों पर विचार करते हुए मेरा मंतव्य है कि विधि का शासन कायम करने हेतु इस मुकदमे को वापस करना न्यायहित व लोकहित में उचित नहीं है।
प्रभारी लोक अभियोजक, डी एम त्रिपाठी के इस मंतव्य ने सरकार की नींद उड़ा दी और ये समझ लिया गया कि डी एम त्रिपाठी के रहते ढुलू को मुकदमे से वापसी संभव नहीं, इसलिए सरकार के गृह मंत्रालय ने डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण करने का फैसला लिया और 27 जून 2015 दिन शनिवार, यानी जिस दिन झारखंड मंत्रालय बंद रहता है, प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण का आदेश दे डाला। डी एम त्रिपाठी को जिला अभियोजन कार्यालय बोकारो और डी एम त्रिपाठी की जगह अनिल कुमार सिंह-2 को अपर लोक अभियोजक धनबाद बनाकर भेजा गया, ताकि सरकार के अनुरुप अनिल कुमार सिंह -2 प्रस्ताव बनाकर उपायुक्त को भेज सकें और फिर सरकार मनमाफिक निर्णय ले सके। हुआ भी यहीं, पर इस बार सरकार की कलई खुल गयी। अनिल कुमार सिंह – 2 ने 23 जुलाई 2015 को लोक अभियोजक धनबाद के रुप में पदभार ग्रहण किया, पर पदभार ग्रहण करने के पूर्व ही सरकार के मनमुताबिक प्रस्ताव जो ढुल्लू महतो को निर्दोष साबित करता था, बनाकर 13 जुलाई 2015 को ही उपायुक्त धनबाद को संप्रेषित कर दी, जबकि उपायुक्त धनबाद ने लोक अभियोजक अनिल कुमार सिंह से रिपोर्ट भी नहीं मांगी थी। उपायुक्त ने दुबारा ढुलू महतो से संबंधित रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक धनबाद से मांगी थी, बाद में पुलिस अधीक्षक ने इस पत्र को बाघमारा डीएसपी को भेजा और इसकी प्रतिलिपि सिर्फ सूचनार्थ लोक अभियोजक को भेजी थी। पुलिस अधीक्षक के कार्यालय से जारी 6 जुलाई 2015 का पत्रांक संख्या 3448 देखा जा सकता है।
अब सवाल सरकार से, खासकर मुख्यमंत्री से.............
क. क्या सर्वोच्च न्यायालय के प्रपत्र को आधार बनाकर, एक अपराध से संबंधित व्यक्ति जो विधायक बन गया है, जिसने कानून को चुनौती दी, सरकार को चुनौती दी, लोकशाही को चुनौती दी, उसे बचाना क्या भ्रष्टाचार नहीं है?, और जब ऐसा करना भ्रष्टाचार नहीं है, तो फिर केवल ढुलू महतो को ही बचाने का ये अभियान क्यों चल रहा है?, ऐसे और भी अपराधी है, जो विधायक बने है, उन पर भी मुख्यमंत्री कृपा क्यों नही लूटा रहे?
ख. आखिर जब प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी से उपायुक्त धनबाद ने ढुलू महतो से संबंधित अपराधिक मुकदमों पर मंतव्य मांगा और डी एम त्रिपाठी ने अपना मंतव्य देने के साथ ही इसे न्यायहित और लोकहित के खिलाफ बताया तो सरकार ने इस मंतव्य को मानने से इनकार क्यों किया? डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण क्यों किया गया?
ग. डी एम त्रिपाठी की जगह पर अनिल कुमार सिंह – 2 को ही क्यों लाया गया?, जबकि उनके पहले कई ऐसे सीनियर है जो लोक अभियोजक धनबाद हो सकते थे, उन्हें न बनाकर अनिल कुमार सिंह – 2 को ही क्यों?, क्या सरकार को पता था कि अन्य लोक अभियोजक उनके सुर में सुर नहीं मिला सकते, और अनिल कुमार सिंह – 2 ऐसा कर सकते है।
घ. अनिल कुमार सिंह – 2 प्रभार लेते है – 23 जुलाई 2015 को, और वे अपना प्रस्ताव 13 जुलाई 2015 को ही धनबाद उपायुक्त के पास भेज देते है, वह भी ढुलू महतो के बचाव में, आखिर ये क्या मामला है? क्या उपायुक्त धनबाद ने उनसे कोई रिपोर्ट मांगी थी? वह भी प्रभार लेने के पूर्व ही कोई व्यक्ति वो काम कैसे कर सकता हैं?, जिसकी इजाजत कानून भी नहीं दे सकता, क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है?
ङ. क्या सरकार बता सकती है कि ऐसी भी क्या मजबूरी थी कि प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी के स्थानांतरण के लिए कार्य दिवस के दिन कार्य न करके, एक ऐसे दिन स्थानांतरण का आदेश निकाला गया, जिस दिन सरकार की आफिस ही बंद रहती है?
च. क्या राज्य सरकार की डिक्शनरी में भ्रष्टाचार का पैमाना दूसरा और अन्य के लिए कुछ और होता है?
छ. 24 अक्टूबर 2015 को सारे समाचार पत्रों में यह भी समाचार प्रकाशित हुआ है कि विधायक ढुलू महतो की गुंडागर्दी से आजिज होकर सिजुआ क्षेत्र के जीएम जे पी गुप्ता ने इस्तीफा दे दिया। जीएम जे पी गुप्ता का कहना है कि सभी चीजों के लिए सिस्टम बना हुआ है। मगर विधायक ने अनुचित रुप से दबाव बना कर उन्हें निचितपुर कोलियरी जहां एक मजदूर की मौत हुई थी। उक्त घटनास्थल पर बुलाया और जबरन चार लाख रुपये मुआवजा दिलाने की घोषणा कर दी। आपत्तिजनक शब्दों के नारे भी लगवाये। इससे आहत होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
ज. हद तो ये भी हो गयी कि 20 अक्टूबर को धनबाद के कतरास में प्रशासन द्वारा आयोजित शांति समिति के बैठक में, भाजपा विधायक ढुलू महतो ने शांति समिति में भाग ले रहे सदस्यों को चोर - चुहाड़ तक कह डाला, क्या एक विधायक की यहीं भाषा है, कि वह किसी को भी, कही भी बेइज्जत कर सकता है, वह भी यह कहकर कि वह भाजपा विधायक है।
सूत्र बताते है कि ढुल्लू महतो को बचाने के लिए मुख्यमंत्री इसलिए रुचि ले रहे हैं कि इनसे उनका राजनीतिक और अन्य स्वार्थ सिद्ध हो रहा है...और इसमें भाजपा के कद्दावर राष्ट्रीय नेताओं की भी मिलीभगत है। आश्चर्य इस बात की, कि भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं का ढुलू महतो से इतना जल्द प्रेम प्रगाढ़ हो जायेगा, यहां के नेताओं को इसका अंदाजा ही नहीं था, हालांकि कुछ दिन पहले धनबाद में भाजपा के ही विधायक फूलचंद मंडल और ढुलू महतो के गुर्गों के बीच मुठभेड़ हो चुकी है, जिसकी खबर धनबाद से प्रकाशित होनेवाली सारी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया...फिर भी राज्य सरकार का ढुल्लू प्रेम, आम जनता के लिए कौतूहल का विषय बन गया है, साथ ही मुख्यमंत्री रघुवर दास के भ्रष्टाचारमुक्त झारखंड बनाने के दावे पर अब सवाल भी उठने लगे है...
सरकार जवाब दें...

Thursday, October 29, 2015

अरविंद, लालू, ममता और नीतीश को मिलकर गोकशी दल बनाना चाहिए, तभी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सधेगी...........

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी, बीफ खाने व खिलाने को आमदा राजद नेता लालू प्रसाद यादव और उनके गो भक्षण को व्याकुल राजपूत कुलभूषण रघुवंश प्रसाद सिंह को मिलकर गोकशी दल बना लेना चाहिए।
इसके अनेक फायदे हैं.........
1. आरएसएस व भाजपा, साथ ही भारत की उन बहुसंख्यक आबादी को बार-बार चिढ़ाने का मौका मिलेगा, जो गोमांस से परहेज करते है।
2. बहुसंख्यक जमात के दिलों को भले ही ठेस लगे, वो बोल नहीं सके, पर खुद को अल्पसंख्यक कहलाने में गौरव महसूस करनेवाले मुस्लिमों व ईसाईयों का वोट सदा के लिए उन्हीं का होकर रह जायेगा।
3. किसी को बुरा लगे तो लगे, जैसे बकरे कटते हैं, मुर्गियां कटती हैं, ठीक उसी प्रकार हर मुहल्ले में गोकशी केन्द्र बनना चाहिए ताकि लोग आराम से गो मांस खाकर स्वयं को सुबाहु व मारीच समझ सके, इससे देश में लाल-क्रांति हो जायेगी। गो की जनसंख्या का नियंत्रण भी हो जायेगा और वैज्ञानिक हल भी।
4. अंग्रेजों के फूट डालो शासन करो की नीति का फायदा, आजादी के बाद भी गोहत्या के द्वारा ही सिर्फ उठाया जा सकता है, ये देश के सभी राजनीतिक दलों को बता देना चाहिए, ताकि गोकशी दलों में आपसी भाईचारा बनी रहे।
5. गो हत्या के संबंध में सुबाहु-मारीच ने जो कहा था, ऐसे विद्वानों की वाणी को जन-जन तक पहुंचाना चाहिए, ताकि महर्षि कण्व, कणाद की यह भूमि सुबाहु व मारीच जैसे लोगो के कारण जानी जाये, इससे फायदा यह होगा कि ब्राह्मणवाद भी खत्म होगा और सुबाहुवाद-मारीचवाद की नयी परंपरा जागृत होगी, इससे देश में सही रुप से समाजवाद आयेगा।
6. रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे राजद नेताओं को जयचंद व मानसिंह जैसे महान शख्सियतों के पद चिह्नों पर चलना चाहिए, क्योंकि उन्होंने विदेशी आक्रांताओं व लूटेरों के साथ एक बेहतर संबंध बनाए। महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान तो मूर्ख थे, इसलिए हमारा रघुवंश प्रसाद सिंह को सुझाव होगा, कि गांव – गांव में जयचंद व मानसिंह स्मारक समिति बनाकर हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द उत्सव मनाते हुए जनजागृति चलाए और इस आयोजन में गोमांस अवश्य खिलवाएं, ताकि सुबाहू – मारीच के सपने पूरे हो सके, ताकि महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान की आत्माएं सिसककर रोती रहे और मानसिंह व जयचंद की आत्माएं गौरवान्वित महसूस करें। लक्ष्य एक ही रखे - देश भाड़ में जाय, संस्कृति भाड़ में जाये, पर सुबाहु व मारीच के सपनों का भारत हम जरुर बनायेंगे और आनेवाले पीढ़ी को बताएंगे कि तुम राम और कृष्ण के वंशज नहीं, बल्कि तुम सुबाहु व मारीच की संतान हो, तुम्हें अकबर और मुहम्मद गोरी जैसे लोगों के लिए जीना है, जैसे ही देश में कोई ब्राह्मण जाति का टीका लगाये हुए व्यक्ति या गाय मिले, उसका सर कलम कर दो, क्योंकि उसे जीने का अधिकार ही नहीं, जीने का अधिकार सिर्फ रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे कुलभुषणों का हैं...........
7. हर सप्ताह एक बैनर लगाकर, जैसा कि आजकल फैशन चल गया है, गोकशी दलों में शामिल लोगों को गोमांस खाओ आंदोलन चलाना चाहिए, ताकि देश से सारी गाये ही समाप्त हो जाय, क्योंकि बच्चों को दूध-मक्खन-घी नहीं बल्कि मांस यत्र-तत्र-सर्वत्र उपलब्ध होना ही चाहिए।
8. गोकशी दलों को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि गर किसी मां के छाती से दूध न निकले तो डाक्टरों द्वारा प्रचारित व प्रसारित कि बच्चों को गाय का दूध पिलाये, ऐसे डाक्टरों को दंडित कर दिया जाय। ये सुनिश्चित किया जाय कि भारत में जो भी बच्चे पैदा होंगे, वे सुबाहु व मारीच की तरह गाय का दूध के बदले गाय का रक्त और फिर बड़ा होते ही गोमांस खायेंगे। इससे देश बहुत ही तरक्की करेगा............
9. जो भी व्यक्ति या दल या संस्थान गोरक्षा अभियान चलाए, उसे तत्काल फांसी पर लटकाने का भी प्रबंध होना चाहिए, क्योंकि ये माना जाये कि गोरक्षा अभियान चलाने वाले देश के सबसे बड़े शत्रु है और ये खाने की स्वतंत्रता का हनन करते है।
10. गोकशी दलों को विभिन्न मीडिया चैनलों के माध्यम से भी गोहत्या कराने को प्रेरित करना चाहिए, ताकि मीडिया में शामिल उनके भाई-बंधु-बहनें भी अनुप्राणित हो सके। मीडिया में शामिल सभी पत्रकारों और मीडिया के मालिकों को किसने कितनी गो हत्याएं की या करवायी, उस पर एक प्रतियोगिता भी रखनी चाहिए, ताकि लोग सारे काम – धाम छोड़कर गोहत्या प्रतियोगिता में शामिल होकर, देश का मान बढ़ा सके.......
11. गोकशी दलों को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जो लोग गोमांस खा रहे है, वे अपने गर्दन में एक आईकार्ड जरुर रखे, जिसमें लिखा हो, हमें गर्व है कि हम गोमांस खाये हैं, ताकि दूसरे लोग समझ ले कि सामनेवाला व्यक्ति प्रगतिशील और वह निहायत मूर्ख है।
12. गोमांस खाने के बाद गर किसी को मनुष्य के मांस खाने की आदत हो जाये, तो इसकी भी विशेष व्यवस्था करने के लिए गोकशी दल को तैयार रहना चाहिए क्योंकि खाने की स्वतंत्रता तो हर हाल में एक सामान्य व्यक्ति को होना ही चाहिए।
क्यों कैसी रहीं............
जनहित में जारी.........
खासकर बिहार के दाढ़ीवाले बाबा रघुवंश को सादर समर्पित...........

Monday, October 26, 2015

मीडिया की संकीर्ण मानसिकता...........

कल यानी 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के तहत अपनी विचारधारा भारतीय जनमानस के बीच रखने का प्रयास किया। इस कार्यक्रम को सभी चैनलों ने बारीकी से जनता के समक्ष रखा। प्रधानमंत्री ने इस मन की बात कार्यक्रम के दौरान बहुत ही अच्छी – अच्छी बातें की, गर उस पर सचमुच ध्यान दिया जाय तो मानवता और भारतीयता को बल मिलेगा। अंगदान, ग्रुप बी, सी एवं डी में साक्षात्कार की समाप्ति व सांसदों द्वारा गांवों को गोद लेकर उनके कायाकल्प का कार्य आदि बातों को प्रधानमंत्री ने जोरदार ढंग से उठाया और लगे हाथों प्रधानमंत्री ने स्वच्छता कार्यक्रम को भी जनता के समक्ष रखा।
इस स्वच्छता कार्यक्रम में मीडिया की भूमिका की भी प्रधानमंत्री ने जमकर सराहना की। प्रधानमंत्री ने आजतक, ईटीवी, जीटीवी, एबीपी, एनडीटीवी आदि चैनलों की जमकर प्रशंसा की, पर किसी चैनल ने अपने समाचार में ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने जब मीडिया की सराहना की तो उन्होंने सिर्फ एक चैनल का नाम नहीं लिया, बल्कि बहुतेरे चैनलों का नाम लिया, कुछ अखबारों का भी नाम लिया। सारे चैनलों ने अपने अपने समाचार के बुलेटिन में जब भी स्वच्छता कार्यक्रम के समाचार की बात हुई तो अपनी पीठ खुद थपथपाई, ये कहकर की प्रधानमंत्री मन की बात में उनके चैनल यानी जो चैनल समाचार प्रसारित करता, सिर्फ अपने चैनल का नाम लेकर समाचार का इतिश्री कर लेता। क्या ये संकीर्ण मानसिकता नहीं है?
अच्छा तो ये होता कि सारे चैनल, गांव व देश की सफाई के कार्यक्रम को जमीन पर उतारने की तरह अपने संकुचित मानसिकता की भी सफाई करते और ईमानदारी से लोगों को बताते कि प्रधानमंत्री ने विभिन्न चैनलों का नाम लिया और उन्हें इस बात की बधाई दी, कि वे स्वच्छता कार्यक्रम को महत्व दे रहे है।
मतलब समाज के सामने भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करनेवाले, नेताओं के बोली के बाल का खाल निकालनेवाले कितना एक दूसरे से ईर्ष्या करते है, ये बातें एक बार फिर कल स्पष्ट रुप से उजागर हो गयी। मैं रांची में भी देखता हूं कि कई अखबार बहुत अच्छे – अच्छे कार्यक्रम का आयोजन करते है, पर वह समाचार सिर्फ उसी अखबार में दिखाई पड़ता है, जो करा रहा होता है, क्या ये ईर्ष्या अथवा जलन नहीं है? गर ये ईर्ष्या व जलन है, तो फिर ऐसे लोगों से क्या समाज व देश का भला होगा, या हित होगा? इस प्रश्न को मैं जनता के समक्ष रख रहा हूं, जनता चिन्तन करें......

Friday, October 23, 2015

आनन्द की खोज.............

कल विजयादशमी समाप्त हो गयी। सभी ने आनन्द प्राप्त किया है। हर का आनन्द अलग – अलग प्रकार का है। किसी ने प्रभुता का ढूंढ लिया तो किसी ने हमेशा की तरह उस आनन्द की खोज की, जो एक पशु की चाहत होती है.....
आखिर एक पशु की पहली और अंतिम चाहत क्या है?
भोजन व मैथुन।
मैंने भी हमेशा की तरह आनन्द की खोज के लिए अपने घर से निकला। सपरिवार एक साथ निकले और एक साथ घर पहुंचे। इस दौरान अनेक कौतुक देखे, जो हम आप तक पहुंचाना चाहते है, शायद आप को कुछ प्राप्त हो.........
हमने देखा कि रांची में बड़े – बड़े पंडाल बने थे। ये पंडाल कहीं बड़े-बड़े ठेकेदारों, व्यापारियों के समूह, आला दर्जे के बेईमान व राज्य व केन्द्र सरकार के करों की चोरी करनेवालों के द्वारा बनाये गये थे, जिसका उद्घाटन ठीक उसी प्रकार के राजनीतिज्ञों व मंत्रियों के द्वारा हो रहा था। पंडाल व देवी प्रतिमाओं से जूड़े पूजा समितियों के मुख पर इस भाव का आनन्द था कि उन्होंने अपने कुकृत्यों को इस प्रकार के आयोजन से धो डाला है, जबकि राजनीतिज्ञों के मुख पर इस भाव का आनन्द था कि देखों हम तो भगवान से भी बड़े है। इनका उद्घाटन बिना हमारे संभव ही नहीं है।
अखबार वाले आनन्द पाने के चक्कर में इससे भी आगे निकल गये थे, वे मां की प्रतिमाओं व उनके दरबार का आकलन जजों के द्वारा करा रहे थे, तो कोई एसएमएस मंगवा रहा था। पूछ रहा था कि कहां की प्रतिमा और कहां का पंडाल बहुत सुंदर बना है? यानी मां और महाशक्ति को प्रतिमा मे तौल कर व जजों द्वारा तुलवा कर परम आनन्द की प्राप्ति की। चौकियेगा मत, जल्द ही ये आयोजन कर मां की प्रतिमाओँ को सर्वश्रेष्ठ बता कर अन्य सभी मां की प्रतिमाओं को नीचे भी गिरायेंगे और यहीं बात मां के दरबार यानी पंडालों पर लागू होगी। यानी हम बाजारीकरण और व्यवसायीकरण की आड़ में अपनी श्रद्धा और भक्ति को भी नीलाम कर दिया, क्योंकि हमें आनन्द जो प्राप्त करनी है।
इन्हीं में से कई दर्शनार्थियों को देखा, जो मां के दर्शन के लिए निकले थे, पर बालाओं के कपोलों और उनके वस्त्रों की ओर अनायास ही खीचे जा रहे थे, यानी उनका आनन्द इन्हीं पर सिमट जा रहा था।
अपने बाल – गोपाल के साथ निकले कई मां के भक्तों को देखा कि उनका आनन्द इस ओर था कि उनके बच्चों ने मेले का आनन्द लिया या नहीं। वे पूछते – तुमने मूर्ति देखी, तुम ने देखा कि बिजली से कैसे बाघ दहाड़ रहा था?, कैसे विष्णु की प्रतिमा जगमग कर रही थी? आदि सवालों से उनका और अपना मनोरंजन कर रहे थे।
रांची जंक्शन पर देखा भारी भीड़ थी। आयोजक की जय – जय हो रही थी, होर्डिंग्स में भी आयोजक के बड़े – बड़े फोटो लगे थे, फोटो में आयोजक चुनरी लिये दीख रहा था, मानो दुनिया का सबसे बड़ा मां का भक्त वहीं है। यहां रेलवे के भ्रष्ट अधिकारियों का समूह व आयोजक के शुभचिंतकों का समूह व मीडिया व प्रशासन के लोग बड़ी आसानी से दर्शन कर रहे थे, ठीक उसी प्रकार जैसे – बड़े मंदिरों में विशिष्ट लोगों के लिए अलग सुविधाएं होती है। वह दृश्य यहां साफ दीख रहा था। यहां आयोजक इस बात को लेकर आनन्दित था कि उसने ऐसी कलाकृति पेश कर दी, कि लोगों का झूंड उसी के आगे माथे झूका रहा है। रेलवे के भ्रष्ट अधिकारियों का समूह, इस बात को लेकर आनन्दित था कि रेलवे कार्यालय में तो उसका डंका बजता ही है, मां के दरबार में भी उसी की बजती है, और सामान्य जन इस बात को लेकर आनन्दित था कि वह तो हमेशा की तरह ठेलमठेल की जिंदगी जीता है, यहां भी जी रहा हैं तो क्या गलत है? और जो ये भीड़ देखकर कांप गया, वह दूर से ही यह कहकर प्रणाम कर लिया कि भाई भगवान तो दिल में रहते है.......
विभिन्न पंडालों के आस पास भिखमंगों की भी फौज दिखाई पड़ी, उसका आनन्द इसमें समाया था कि उसके कटोरे में इस दुर्गापूजा में कितने पैसे पड़े है?, जबकि सड़कों पर कुकरमुत्ते की तरह उगे चाट दुकानों को इस बात के आनन्द की फिक्र थी कि इस बार उसके चाट दुकानों में कितने ग्राहकों ने चाट का लुफ्त उठाया और उसकी आमदनी में बढ़ोतरी हुई या नहीं।
सड़कों पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का झूंड, विभिन्न खिलौनों को लेकर उतर गया था। उसे न तो आज हिंदू से मतलब रह गया था और न मुस्लिम से। आज उसका आनन्द व ईमान इस बात पर केन्द्रित था कि आज उसकी आमदनी कितनी होगी? जब कोई खिलौना उससे खरीदता तो उसके चेहरे की मुस्कान देखते बनती और जब कोई मोल-जोल कर भी नहीं खरीदता तो उसके चेहरे का भाव भी देखते बनता, उसकी मायूसी दिल को तोड़ देती।
रांची विश्वविद्यालय के मुख्यालय के पास, हर साल की भांति इस साल भी व्यवसायियों का एक ग्रुप भंडारा लगा रखा था। वह रास्ते में चलते मां के भक्तों को पुकारता, उन्हें दो पुड़ियां और सब्जी खिलाता और कहता ये प्रसाद है, ग्रहण करें, यहां पानी की भी अच्छी व्यवस्था थी। यानी यहां के लोगों को खिलाने में आनन्द था, शायद ये जान गये थे कि असली आनन्द तो सेवा में है। उपनिषद् तो कहता ही है – सेवा परमो धर्मः।
और अंत में
एक पहाड़ी मंदिर में एक अधेड़ महिला, एक बैग में बहुत सारे केले रखी थी, वह पहाड़ी मंदिर जानेवाली किसी भी लड़की को रोकती, उसे तिलक लगाती और उसे एक केले देती और फिर बाद में उसके पांव छू लेती। शायद उसे लगता था कि आज का दिन, ऐसा करने से उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी या मनोवांछित फल प्राप्त हो जायेगा। हम कहेंगे कि ऐसा संभव है और संभव हैं भी नहीं, पर इतना तो जरुर है कि जब वो महिला बालिकाओं के साथ ऐसा व्यवहार करती थी तब उन छोटी बालिकाओं की खुशियां देखते बनती, जो खुशियां बिखेरेगा, वहीं तो परम आनन्द की प्राप्ति करेगा, वहीं देवत्व को प्राप्त करेगा, बाकी क्या प्राप्त करेंगे, खुद ही जान लें, व समझ लें..................

Thursday, October 15, 2015

क्या बिहार में महागठबंधन से चुनाव लड़ रहे एनडीटीवी के रवीश कुमार के भाई चुनाव जीत पायेंगे...........

रांची से एक अखबार प्रकाशित होता है – खबर मंत्र। उसने 14 अक्टूबर को अपनी अभिव्यक्ति पृष्ठ पर एनडीटीवी के एक पत्रकार रवीश कुमार का उसके ब्लॉग से साभार आलेख छापा है। ये वहीं रवीश कुमार है, जो टीवी पर बहुत ही सुंदर अभिनय करने के कारण, इलेक्ट्रानिक मीडिया में जगह बनानेवाले नये – नये पत्रकारों का चहेता बना हुआ है। वह बहुत ही अच्छी – अच्छी बातें करता है, भाजपा को खूब गरियाता है, पर नीतीश का नाम जुबां पर आते ही नीतीश भक्ति में स्वयं को अनुप्राणित कर लेता है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी उसने बिहार का दौरा किया था, और उसी वक्त एक उसका आलेख प्रभात खबर में पढ़ने को मिला था, उस आलेख को पढ़ने पर मुझे साफ लगा था कि यह व्यक्ति नीतीश भक्ति में बहुत ही कन्फ्यूज्ड है, उसे जनता का नब्ज पहचानने नहीं आता। उसने उस वक्त आलेख में लिखा था कि बिहार में लोकसभा चुनाव का जो परिणाम आयेगा वह अप्रत्याशित होगा, जो भाजपा के खिलाफ रहेगा, पर हुआ ठीक इसके उलटा। भाजपा के लहर में बिहार से उसके भगवान नीतीश का ही सफाया हो गया।
फिलहाल नीतीश, लालू और राहुल की तिकड़ी से बने महालंठबंधन को जीताने के लिए अंदर ही अंदर वह सक्रिय है। खबर मंत्र में कल के छपे आलेख से फिर इसकी कलाकारी दीख रही है। बहुत कम ही लोगों को पता है कि रवीश कुमार का भाई ब्रजेश पांडे गोविंदगंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। सूत्र बताते है कि जहां से रवीश का भाई चुनाव लड़ रहा है, वहां ब्रजेश पांडे आज तक कभी गया ही नहीं, फिर भी वह जीतने के लिए हर हथकंडे अपना रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि रवीश के नीतीश भक्ति का ही कमाल है कि गोविंदगंज से मीना द्विवेदी, जो जदयू के टिकट पर लगातार दो बार चुनाव जीतती आयी थी, उस मीना द्विवेदी को नीतीश ने इस बार नहीं उतारा और ये सीट अपने भक्त रवीश को खुश करने लिए रवीश के भाई ब्रजेश को दिलवा दिया और आज ब्रजेश कांग्रेस के टिकट पर अपना किस्मत आजमा रहा है। यानी पत्रकारिता में भी, भाई – भतीजावाद शुरु और पत्रकारिता के आड़ में अब नेतागिरी भी, हालांकि हम आपको बता दें कि रवीश के भाई ब्रजेश की जीतने की उम्मीद न के बराबर है। रवीश अकेले नहीं, बहुत ऐसे पत्रकार है, जिन्हें नीतीश में भगवान नजर आता है, आनन्द नजर आता है, इसलिए नीतीश की गलतियां उसे दिखाई नहीं देती, पर जो रवीश करते है, वैसा कोई नहीं करता, यानी हाथी के दांत दिखाने को कुछ और खाने को कुछ...। हम आपको बता दें कि इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मीडिया को अपने चरणों में नतमस्तक कराने के लिए अनेक कार्य किये है, जैसे प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को राज्यसभा भेजा। बिल्डर और कशिश चैनल के मालिक सुनील चौधरी को बेनीपुर से विधानसभा का टिकट देकर उसे बिहार विधानसभा में भेजने के लिए लगा है। यहीं नहीं ऐसे कई उदाहरण है, जो बताने के लिए काफी है कि नीतीश ने मीडिया को अपने चरण छूने को कैसे विवश किया है, पर मीडिया के लोग है, जो लालच में आकर, वह सब कर रहे जो आज का नेता करता है........यानी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबने की ललक......क्योंकि उसे भी वह सब कुछ चाहिए, जो नेता के पास होता है......ये नीतीश भक्ति का ही कमाल है कि महागठबंधन के एक नेता लालू प्रसाद की अतरी में मंगलवार को सभा थी, और उस सभा से भीड़ ही गायब थी, पर गया से ही प्रकाशित प्रभात खबर में लालू प्रसाद से संबंधित यह समाचार पूर्णतः गायब है....साथ ही कई चैनलों ने इसे दिखाया ही नहीं, आखिर ये नीतीश भक्ति नहीं तो और क्या है.........

Tuesday, October 13, 2015

सिक्का उछाल बाबा और उनका राजनीतिक चुनावी सर्वे.............

बिहार में विधानसभा चुनाव क्या हो रहे है, राजनीतिक सर्वे करनेवाले विभिन्न संस्थाओं, समाचार पत्रों व चैनलों की जैसे मानो लॉटरी निकल गयी है। ये सारे के सारे विभिन्न राजनीतिक दलों से आर्थिक लाभ उठाकर उनके पक्ष में राजनीतिक सर्वे दिखा रहे है और राज्य के मतदाताओं को दिग्भ्रमित कर रहे है, पर शायद उन्हें पता नहीं कि बिहार के मतदाताओं का मस्तिष्क अन्य राज्य के मतदाताओं के ठीक उलट होता है। वह राजनीतिक दल ही नहीं बल्कि राजनीतिक सर्वे प्रस्तुत करनेवाले आंकाओं का भी दिमाग ठिकाने लगाने जानता है।
कमाल हैं कुछ सर्वे महागठबंधन जिसे लोग महालंठबंधन भी कहते है, उन्हें पहले स्थान पर दिखा रही है, तो कुछ भाजपा गठबंधन को....और ये सारे के सारे सर्वे गोलमट्ठे की तरह, ऐसी-ऐसी चीजे जनता के समक्ष रख दे रहे है, जैसे लगता हैं कि बिहार की जनता महामूर्ख है। सर्वे ही नहीं, कुछ पत्रकारों की भी इस बिहार विधानसभा चुनाव ने सिट्ठी-पिट्ठी गुम कर दी है। स्वयं को ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ बतानेवाले चैनल एनडीटीवी का एक बिहार का ही पत्रकार पिछली लोकसभा चुनाव के दौरान जब वह बिहार में चुनाव की रिपोर्टिंग कर रहा था तो उसका एक लिखित आलेख प्रभात खबर ने प्रथम पृष्ठ पर छापा था। जिसमें वह पूरी तरह कन्फ्यूज था। उस वक्त उसके अनुसार भाजपा की स्थिति बिहार में ठीक नहीं थी। मैंने सोचा कि इस बार भी उसका आलेख प्रभात खबर में दीखेगा, पर अभी तक तो दिखाई नहीं पड़ा है। शायद उसे लग रहा हैं कि कहीं ऐसा नहीं कि पिछले आलेख की तरह इस बार के आलेख का भी कही बंटाधार न हो जाय। खैर, स्वयंभू लालू भक्तों व नीतीश भक्तों की टोली उनके महालंठबंधन गठबंधन को शिखर पर दिखाने के लिए आमदा है, जबकि दूसरी टोली भाजपा को शिखर पर पहुंचा कर ही दम ले रहा है, पर सच्चाई क्या है?, जो बिहार की राजनीति जानते है.....वे जान चुके है, कि बिहार से नीतीश की इस बार विदाई तय है, लालू की विदाई तो बिहार की जनता दस साल पहले ही कर चुकी है, इसलिए उनके विदाई का सवाल तो है ही नहीं। हां, अब सवाल यह हैं कि अब किसके माथे बिहार का मौर चढ़ेगा?
इधर महालंठबंधन और भाजपा गठबंधन को शिखर पर पहुंचानेवाले राजनीतिक सर्वे को देखिये........
इन सर्वे को देख, हमें लगता है कि हमारे यहां भी एक सिक्का उछाल बाबा है, जो विशुद्ध राजनीतिक सर्वे करते है, वे जो राजनीतिक सर्वे करते है, उनका कहीं सानी नहीं। उनका राजनीतिक सर्वे कभी – कभी सटीक भी हो जाता है, कैसे? आपको बताता हूं.........
सिक्का उछाल बाबा कहते है कि अरे राजनीतिक सर्वे क्या होता है, असली राजनीतिक सर्वे तो हम करते है, मैंने पूछा – कैसे?
और जब उन्होंने जवाब दिया तो मैं भौचक्का रह गया।
उन्होंने कहा कि वे किसी भी राज्य का या देश का चुनाव परिणाम का सर्वे करना होता है तो एक सिक्का हाथ में लेते है और उसी से सर्वेक्षण कर लेते है। मैंने पूछा – यह संभव कैसे है?
उन्होंने बताया – कि वे एक सिक्के लेकर उछालते है, जितना बार सिक्का उछला यानी उतनी बार उन्होंने उस राज्य की जनता से संपर्क किया, जैसे गर चार हजार बार सिक्का उछाला तो चार हजार जनता से संपर्क हो गया।
इसी प्रकार मकान के पूर्व की कोठरी में सिक्का उछाला तो राज्य के पूर्व की जनता का विचार मिल गया। दालान में उछाला तो राज्य के मध्य भाग में रहनेवाले जनता का विचार मिल गया। इसी प्रकार उत्तर की कोठरी और दक्षिण की कोठरी, पश्चिम की कोठरी में सिक्का उछाला तो उस – उस दिशा की जनता का विचार मिल गया।
सुबह में सिक्का उछाला तो 18 वर्ष से लेकर 35 वर्ष तक के युवाओं का विचार मिल गया।
दोपहर में सिक्का उछाला तो 36 से 45 वर्ष तक के युवाओं का विचार मिल गया।
शाम में सिक्का उछाला तो 46 से उपर के आयु के युवाओं का विचार मिल गया।
रात में सिक्का उछाला तो महिला वर्ग के विचारों का पता चल गया।
सोते हुए सिक्का उछाला तो उद्योगपतियों का विचार मिल गया।
दौड़ते हुए सिक्का उछाला तो किसान – मजदूरों का विचार मिल गया
टहलते हुए सिक्का उछाला तो सामान्य वर्ग का विचार मिल गया।
दूध दूहते सिक्का उछाला तो यादव बंधुओं का विचार मिल गया।
बैठकर सिक्का उछाला तो मुस्लिम बंधुओं का विचार मिल गया।
किताब लेकर सिक्का उछाला तो सवर्णों का विचार मिल गया।
हाथ में पोछा लेकर सिक्का उछाला तो दलितों का विचार मिल गया।
मैंने तुरंत उन्हें रोका और पूछा, सिक्का उछाले तो विचार कैसे मिल गया। उन्होंने तुरंत पलट कर कहा कि आपको पत्रकार कौन बना दिया?, आपको इतना भी ज्ञान नहीं। अरे बिहार में महालंठबंधन और भाजपा गठबंधन के बीच ही न मुकाबला है तो हो गया फैसला। चित्त – महालंठबंधन और पट भाजपा गठबंधन.......मतलब समझे।
हमें हंसी आ गयी........
सिक्का उछाल बाबा ने, हमारे सामने राजनीतिक सर्वे करनेवालों की पोल खोलकर रख दी थी।

Friday, October 9, 2015

शर्मनाक घटना। ईसाई मिशनरियों ने गरीबी का मजाक उड़ाते हुए, गरीबी की सौदेबाजी की, धर्मांतरण कराया........

शर्मनाक घटना। ईसाई मिशनरियों ने गरीबी का मजाक उड़ाते हुए, गरीबी की सौदेबाजी की, धर्मांतरण कराया........
आज के प्रभात खबर में पृष्ठ संख्या 14 पर खबर छपी है। खबर चौंकानेवाला है, साथ ही यह समाचार ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के कुचक्र को सामने लाकर खड़ा कर दिया है।
गुमला के जिलपीदह गांव के 60 परिवारों ने ईसाई धर्म अपनाया हैं। ये सारे परिवार आदिम जनजाति के हैं, जो सरना धर्म को मानते थे, पर अब ईसाई धर्मानुसार आचरण कर रहे हैं, चर्च जाते हैं, ईसाई विधि से प्रार्थना कर रहे हैं। इनका कहना हैं कि उनका गांव विकास से कोसो दूर है, सड़क नहीं है, बिजली नहीं है, आजीविका का कोई साधन नहीं, अशिक्षा है। इसलिए ईसाई धर्म अपना लिया, इससे अब कम से कम उनके बच्चे पढ़ तो सकेंगे........
यानी गरीबी ने इन्हें धर्म परिवर्तन करने पर मजबूर कर दिया और इस गरीबी का नाजायज फायदा उठाया यहां के ईसाई मिशनरियों ने। ये घटना स्पष्ट करती है कि राज्य में किस प्रकार गरीबी से जूझ रहे आदिवासी बंधुओं और सरना धर्म के माननेवालों पर ईसाई मिशनरियां कुचक्र रचते हुए, उनके मूल धर्म से विमुख कर, उनकी संस्कृति पर चोट कर रही हैं।
धर्म क्या कहता है?
मेरे धर्म ने तो यहीं सिखाया कि किसी की गरीबी का नाजायज फायदा उठाना महापाप है। यह अनैतिक और अमानवीय है, फिर भी धर्म के नाम पर विदेशी धन पर ऐश करनेवालों के लिए इससे बड़ा कोई धर्म ही नहीं। ये धर्मांतरण का खेल कोई आज से नहीं चल रहा, ये अंग्रेजों के समय से चलता रहा, पर उस वक्त के आदिवासी महानायकों ने ईसाई मिशनरियों के खेल को समझा और उनका प्रतिकार किया। भगवान बिरसा मुंडा का प्रतिकार जगजाहिर है, पर आजादी के बाद, धर्मांतरण का खेल इस प्रकार चल रहा है और फलीभूत हो रहा हैं कि आनेवाले समय में झारखंड से आदिवासियों का मूल धर्म ही समाप्त हो जायेगा और ये केवल अतीत की बाते रह जायेगी।
हालांकि आदिवासी सरना धर्म को लेकर सचेत है और इस प्रकार के धर्मांतरण का समय-समय पर विरोध कर रहे हैं, पर इन्हें सफलता नहीं मिल रही। सरकार की विकास योजनाएं भ्रष्टाचार का भेंट चढ़ जा रही हैं, पर ईसाई मिशनरियों की योजनाएं सरकार के माध्यम से ही फलीभूत हो रही है और वे इसका जमकर सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर लाभ भी उठा रहे हैं और धर्मांतरण भी करा रहे है। आश्चर्य इस बात की है कि जहां ये धर्मांतरण हुआ, वहां एक सामाजिक संस्था विकास भारती भी काम करती है, पर ये विकास भारती इस जगह पर कैसे फेल हो गयी?, आश्चर्यजनक है। ये वही विकास भारती है, जिसके स्वयंभू अशोक भगत है, जिन्हें हाल ही में राष्ट्रपति ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। जो खूब इन इलाकों में विकास की गति तेज करने का ढोल पीटते है।
शर्म आनी चाहिए ईसाई मिशनरियों को.........
क्या किसी की गरीबी का नाजायज फायदा उठाना सहीं है?
क्या किसी को लालच देकर उसकी गरीबी का मजाक उड़ाना सही है?
क्या ईसाई मिशनरियां बता सकती है कि फादर कामिल बुल्के ने राम और तुलसी में क्या देखा था?
क्या धर्मांतरण कर देने से उन गरीब आदिवासियों की सारी समस्याएं समाप्त हो जायेगी?
आखिर भगवान बिरसा ने ईसाई मिशनरियों के खिलाफ हल्ला क्यों बोला था?
आखिर पश्चिम देशों में पढ़े – लिखे ईसाई समुदाय क्यों धर्मांतरित हो रहे है?
केवल सेवा का भाव मन में रखने का ढोंग करनेवालों, किसी का धर्मांतरण करके कौन सी सेवा कर रहे हो, ये तो सेवा के नाम पर धोखाधड़ी, बनियागिरी और सौदेबाजी है?
मेरे विचार से, इस घटना की जितनी निंदा की जाय, वह कम है..........
मैं सरनाधर्मावलंबियों से कहूंगा कि गरीब होना कोई पाप नहीं, पर गरीबी के नाम पर स्वयं को धर्मांतरित कर देना, अपने पूर्वजों, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति का अपमान है, ये व्यक्ति को नरक की ओर ले जाता है। अपने धर्म और अपनी संस्कृति पर मान करना सीखो, गर्व से खुद को झारखंडी कहो, आदिवासी कहो, सरनाधर्मावलंबी कहो। जो भी तुम्हारी गरीबी का फायदा उठाने की कोशिश करे, उसका मुकाबला करो, न कि उसके आगे घूटने टेक दो।

Saturday, October 3, 2015

देश में दंगा भड़काने का काम, अब मीडिया का.......

देश में दंगा भड़काने का काम, अब मीडिया का.......
देश की जनता, सावधान...
मीडिया ने देश में सांप्रदायिक उन्माद फैलाने का संकल्प ले लिया...
देश की जनता से विनम्र निवेदन है कि वे मीडिया की बातों में न आए, मीडिया में काम करनेवाले लोग, ज्यादातर बेवकूफ, आला दर्जें के गधे व खुद को तेज समझनेवाले बीमारी से पीड़ित इंसान होते हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया की सारी बुद्धिमानी उन्हीं के गिरफ्त में है, जबकि उनके सामनेवाला व्यक्ति आला दर्जें का मूर्ख है। इसलिए वे कभी – कभी समाचार पत्र तो कभी विभिन्न चैनलों में डिस्कसन के माध्यम से तो कभी फेसबुक, टिवटर, वाट्सएप पर अपना अधकचरा ज्ञान बिखरते रहते है। अपने घटियास्तर के धनपशु मालिकों के इशारे पर ताता –थैया करते हुए, देश की एकता व अखंडता के साथ खिलवाड़ भी करते है। वे अपनी अखबारों व चैनलों में अधूरी ज्ञान के चलते कभी-कभी कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा भी बता देते है।
इधर उनके दिमाग में एक जबर्दस्त कीड़ा घूस गया है, जो कैंसर और एड्स से भी ज्यादा खतरनाक है। वे आजकल गाय और गाय से संबंधित डिस्कशन, कार्टून व बेवजह के घटियास्तर के इंसानों के बयान छाप रहे, दिखा रहे और विभिन्न सूचना तंत्रों के माध्यम से इसे फैला रहे है, ताकि देश में सांप्रदायिक उन्माद फैले और देश की समरसता पूरी तरह से नष्ट हो जाये। ये किनके इशारे पर ऐसा कर रहे है, थोड़ा सा आप दिमाग लगायेंगे तो पता चल जायेगा।
सबसे पहले आप उदाहरण देख लीजिये...
रांची से प्रकाशित एक उर्दू अखबार फारुकी तंजीम ने गाय से संबंधित एक आलेख छापा, जिसके कारण पूरे राज्य में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी। इसी अखबार ने कुछ दिन पहले एक लेख छापा जिसमें लिखा था कि हिन्दुस्तान ने कभी भी पाकिस्तान से कोई जंग जीती ही नहीं।
अभी एक दो दिन पहले की घटना है – एबीपी न्यूज ने एक सेलिब्रेटी (पता नहीं वह सेलिब्रेटी है भी या नहीं, क्योंकि जिसको सेलिब्रेटी एबीपी ने कहा हैं उसे बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिसे जानते ही नहीं, लेकिन एबीपी उसे सेलिब्रेटी मानता है) के माध्यम से बयान दिखाया व अन्य संचार माध्यमों से उसे जन- जन तक पहुंचवाया कि “मैंने अभी – अभी बीफ खाया हैं आओ मेरा कत्ल कर दो”। सवाल उठता है कि कौन क्या खा रहा है?, और क्यूं खा रहा हैं?, उससे आम आदमी को क्या मतलब? कोई एबीपी से पूछने गया था क्या? कि वो सेलिब्रेटी क्या खाने में शान समझ रही है? अरे बहुत सारे देश है – जहां इसानों के मांस भी इंसान बड़े शौक से खाते है।
यहीं नहीं दिल्ली से प्रसारित एक राष्ट्रीय चैनल एनडीटीवी ने कुछ साल पहले जब दिल्ली में कथित तौर पर चर्च पर हमले हो रहे थे, तो वह बार – बार इस प्रकार के समाचार को ज्यादा प्रसारित करता था और उसमें जानबूझकर यह दिखाने की कोशिश करता था कि ऐसा करने में हिन्दू संगठनों का हाथ है, जबकि उसी के समाचार में अधिकारियों का बयान आता था कि यहां पर आग शार्ट सर्किट से लगी है, पर वह विद्युत अधिकारियों व कर्मचारियों की बातों को नजरंदाज कर, हिन्दू संगठनों पर ही इसका दोष मढ़ देता था। इसके प्रमाण हैं, मेरे पास, एनडीटीवी द्वारा प्रसारित सारे समाचार उस वक्त के, मेरे सामने देखिये, बताता हूं कि उक्त चैनल ने कैसे ढोंग करके देश में सांप्रदायिकता के बीज बोए।
एक और घटना। मैं आपको बता दूं ये कल की ही बात है, जब मैंने फेसबुक खोला, तो एक हमारे वामपंथी मित्र ने सलमान रिज्वी का एक फोटो शेयर किया। फोटो में क्या था, जान लीजिये। फोटो में था - एक साधु के पास सिर कटी लाश पड़ी है, साधु एक हाथ में नर मुंड लिये है और दूसरे हाथ में आरती का थाल लेकर गाय की आरती उतार रहा है। जब मैंने उस फोटो को देखकर, कमेंटस किया कि जनाब आपने ये फोटो शेयर तो कर दिया पर जब इसका जवाब आयेगा तो क्या आप उसे भी इसी प्रकार स्वीकार करेंगे...तुंरत मैंने देखा कि वे जनाब, जिन्होंने इस प्रकार का फोटो शेयर किया था, तुरंत उसे हटा लिया।
आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जब आप किसी की भावना से खिलवाड़ करेंगे तो आप भी अपनी भावनाओं का खिलवाड़ करवाने के लिए तैयार रहे, क्योंकि न्यूटन का तीसरा नियम साफ कहता हैं कि – क्रिया तथा प्रतिक्रिया बराबर एवं विपरीत दिशा में होती हैं, पर आज के वामपंथी सिर्फ अपनी प्रतिक्रिया दूसरे के माथे पटकना जानते हैं, पर उसके जवाब में कुछ भी लेने को तैयार नहीं, भला ऐसा भी कहीं हुआ है।
अभिव्यक्ति के नाम पर कभी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मकबूल फिदा हुसैन का बचाव किया था। वह मकबूल फिदा हुसैन जो हमारे देवी – देवताओं की नग्न चित्र बनाता था। मैं पूछता हूं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसा ही कोई हरकत कोई दूसरा वर्ग करेगा, तो उसे भी हमें स्वीकार करना पड़ेगा। एक के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे पर तलवार की मार, ये दोगली संस्कृति का प्रतीक है। अब मैं पूछता हूं कि
अपने ही देश में जो मीडिया, इस प्रकार की हरकत कर रही है, उससे क्या होगा? वैमनस्यता फैलेगी या नहीं, सांप्रदायिक उन्माद फैलेगा या नहीं, और ऐसे में फिर क्या होगा? इंसान ही इंसान को काटने के लिए दौड़ेगा तो इसे क्या कहोगे?
पहले देश में सांप्रदायिक उन्माद व जातीय उन्माद फैलाने का काम नेताओं का हुआ करता था। जिससे उन्हें फायदा भी मिलता था। सांप्रदायिक व जातीय उन्माद से उन्हें एक खास वर्ग के वोटों का ध्रुवीकरण होता था और वे सत्ता हासिल कर लेते थे। आज भी ये नेता इस कार्य को गति दे रहे है, पर अब एक नया वर्ग भी इसके साथ पैदा हुआ है। वह हैं मीडिया का। अब सांप्रदायिक व जातीय उन्माद फैलाने का काम पूरी तरह मीडिया ने ले लिया है। वह बड़े ही सुनियोजित साजिश के तहत पूरे देश में सांप्रदायिक व जातीय उन्माद फैला रही है। इसमें दक्षिणपंथी व वामपंथी दोनों मीडिया का ग्रुप शामिल है। वामपंथी मीडिया बड़े प्रेम और चालाकी से अल्पसंख्यकों की ओर से फैलाये जा रहे सांप्रदायिक उन्माद का समर्थन करता है और इसकी सारी गोष्ठियां और कार्यक्रम अल्पसंख्यकों द्वारा चलाये जा रहे संगठनों में ही आयोजित किये जाते है, जबकि बहुसंख्यकों के सांप्रदायिक उन्माद को दक्षिणपंथी संगठन समर्थन करते है। इससे पूरा देश प्रभावित हो रहा है। इसलिए आप सारे देशवासी इन मीडिया में काम करनेवाले तेज लोगों से आज ही सतर्क हो जाय। नहीं तो, न तो आप बचेंगे और न ही देश। अतः जैसे ही दाढ़ी बढ़ाकर कोई खुद को वामपंथी बताकर उपदेश दें, या टीका लगाकर दक्षिणपंथी पत्रकार बताकर आपके समक्ष उपदेश देना शुरु करें तो बस उसे वही टोकिये और कहिये, हमें आपके भाषण की जरुरत नहीं। हमें कैसे रहना हैं, हमें रहना आता है, हमें कोई ज्ञान न दें। जरा देखिये, आपके ही रांची में क्या हुआ? किसकी इज्जत गयी, पूरे देश में। इसलिए आज ही इन मीडिया व मीडियाकर्मियों से सावधान हो जाओ व देश बचाओ। सारे भारतवासी एक है। कबीर की एक वाणी याद रखो ---
कबिरा तेरा झोपड़ा गलकटियन के पास।
करेगा सो भरेगा, तू क्यों रहे उदास।।

Sunday, September 27, 2015

प्रेम से बोलिए रघुवर दास की जय...

प्रेम से बोलिए रघुवर दास की जय...
झारखंड के मुख्यमंत्री की जय...
भाजपा नेता की जय...
रांची के शांति रक्षक रघुवर दास की जय...
आज सारे अखबारों, इलेक्ट्रानिक चैनलों, फेसबुक, टिवटर में झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की जय जयकार हो रही है। जय-जयकार करनेवाले ज्यादातर पत्रकार है...। ये पत्रकार इसलिए जय-जयकार कर रहे है, ताकि मुख्यमंत्री से उनका पीआर और मजबूत हो जाय...। मुख्यमंत्री की कृपा से मिलनेवाले विज्ञापनों की राशि में बढ़ोत्तरी हो जाय... जबकि सच्चाई ये है कि मुख्यमंत्री से ये पूछा जाना चाहिए...
• कि क्या मुख्यमंत्री को ये पता नहीं था कि राज्य में पर्वों का सीजन आ रहा हैं और इसे देखते हुए असामाजिक तत्व राज्य में अशांति फैला सकते हैं, इसके बावजूद अशांति फैली, तो इसके लिए सीधे राज्य का मुख्यमंत्री जिम्मेवार नहीं है?
• राज्य के विभिन्न इलाकों में प्रतिस्थापित मंदिरों में प्रतिबंधित मांस कैसे पहुंच गये?, किसने फेंका?, क्या ऐसे लोगों को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए और जनता के समक्ष ये मिसाल नहीं रखना चाहिए कि ये है शांति में खलल डालनेवाला शख्स, इस पर कारर्वाई हो रही है?
• राज्य का मुख्यमंत्री ये बताएं कि उनका खुफिया विभाग क्या कर रहा था?, जब मंदिरों में प्रतिबंधित मांस फेंके जा रहे थे...।
• खुद मुख्यमंत्री ये घोषणा कर चुके है, राज्य में गोहत्या निषेध कानून लागू है और इसे कड़ाई से अनुपालन करने की वे सौंगध खाते है, तो फिर बड़े पैमाने पर गोहत्या राज्य में कैसे और क्यों हो रही है? झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से इस मुद्दे पर सीख लेनी चाहिए...
• मुख्यमंत्री को ये नहीं भूलना चाहिए कि पन्द्रह दिनों बाद दुर्गापूजा, उसके बाद दीपावली और फिर छठ पर्व आने को है, और इसे देखते हुए, राज्य में फिर अशांति फैलानेवाले सक्रिय हो जायेंगे, ऐसे में मुख्यमंत्री की क्या तैयारी है? ये जनता जानना चाहती है, क्या फिर दंगा भड़कने के बाद मुख्यमंत्री जनता के बीच जाकर शांति की अपील करने का इरादा रखते हैं या राज्य में अमन-चैन रहे, इसके लिए ठोस प्रयास कर रहे है?
हद हो गयी भाई, जिन्हें सरकार को इस मुद्दे पर क्लास लगानी चाहिए, वे सरकार की आरती और भजन गा रहे है, पीआर बना रहे है, विज्ञापन की चिंता कर रहे है, ऐसे में तो जनता का भगवान ही मालिक है...
यहां तो राज्य ठीक उसी प्रकार चल रहा है, वो कहावत है न...अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा....

Saturday, September 26, 2015

वे पत्रकार हैं..............

वे पत्रकार हैं...
पर बहुरुपिए हैं...
आवश्यकतानुसार रुप बदलते हैं...
कभी सांसद तो कभी नेता बन जाते हैं...
टीवी पर प्रवचन भी करते हैं...
वामपंथी बनकर खुब दहाड़ते हैं...
पर वामपंथ से कोसो दूर हो...
लाखों-करोड़ों में खेलते हैं...
वेतन तो दिखावा है...
असली माल तो घर पर इनके चाहनेवाले पहुंचा देते हैं...
जिंदगी में कभी इन बदमाशों ने किसी गरीब को एक पाव दूध भी नहीं पिलाया होगा...
पर गरीबी पर आलेख खूब लिखते हैं...
इन्कम टैक्स, प्रोफेशनल टैक्स चोरी करने में उस्ताद हैं...
पर नेताओं को गरियाने, अधिकारियों को फंसाने में सबके बाप हैं...
कहीं नौकरी नहीं मिली...
बन गये पत्रकार...
पर आज तक इंसान बनने की कोशिश नहीं कर पाये हैं...
दाढ़ी बढ़ाकर, वामपंथी बनने का किस्सा था पुराना...
अब सफाचट, मंहगे वस्त्र पहन, मेकअप खूब करवाते हैं...
अंदाजे बयां, ऐसा कि पंचतंत्र का लोमड़ी भी शरमा जाय...
पता नहीं कौन-कौन से टीवी में खुब धूम मचाते हैं...
इनके छुटभैये, अन्य हिस्सों में...
सबको पानी पिलवाते हैं...
कैमरा चमका और बूम दिखाकर...
लूट-लूट, डंस जाते हैं...
अरे टीवी, अखबारों के दल्ले...
तू क्या ज्ञान बघारेगा...
जिस दिन जनता जगेगी...
तेरा नामोनिशां न रह पायेगा...
ऐसे भी तू मरा हूआ हैं...
अब तू क्या कर सकता हैं...
कहीं मरा हुआ कोई जीव कभी...
किसी का भाग्य बदल वो सकता हैं...

Monday, September 21, 2015

दैनिक भास्कर के अनुसार पुलिसकर्मियों को डांस करने का अधिकार नहीं........

19 सितम्बर को रांची से प्रकाशित दैनिक भास्कर ने प्रथम पृष्ठ पर विभिन्न शीर्षकों से कई खबरें छापी। खबर थी – ये है पुलिस की विश्वकर्मा पूजा, डांसरों संग ठुमके लगाए, नोट उड़ाए, वर्दी का मान भी नहीं रखा, वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें – www.dainikbhaskar.com आदि-आदि।
सवाल दैनिक भास्कर से
क्या जिस जमाने में ABCD या ABCD 2 जिसका अर्थ ही होता है एनीबडी कैन डांस - फिल्में बनती हो, वहां पुलिसकर्मियों पर डांस पर रोक लगाने की बात हास्यास्पद या बेमानी नहीं है।
क्या पुलिस इंसान नहीं होते, उनका दिल नहीं होता, क्या उन्हें अपनी जिंदगी में रस घोलने का अधिकार नहीं...
क्या पुलिस केवल अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए ही बने है, कानून-व्यवस्था के लिए ही बने है, क्या उन्हें अपने परिवार के साथ हंसने-खेलने या वो करने का अधिकार नहीं, जो एक पत्रकार या उनके परिवार या दैनिक भास्कर के संपादक या किसी अखबार के संपादक किया करते है...
क्या दैनिक भास्कर बता सकता है कि भारतीय फिल्मों में ज्यादातर गाने पुलिस पर ही क्यूं बने है, साथ ही जैसे –
क. फिल्म दुश्मन – बलमा सिपहिया, हाय रे तेरे तंबूक से डर लागे, लागे रे जियरा धक धक धक धक जोर से भागे, बलमा सिपहिया......
ख. फिल्म कर्तव्य – छैला बाबू, तू कैसा दिलदार निकला, चोर समझी थी, मैं थानेदार निकला, चोर समझी थी मैं थानेदार निकला......
ग. फिल्म कालका – दारोगा जी से कहियो, सिपहिया करे चोरी...
घ. फिल्म दबंग – 1. पांडे जी., 2. मुन्नी बदनाम हुई, 3. फेविकोल से
आदि बहुतेरे गाने में क्या हो रहा है, नहीं तो एक बार फिर भारतीय फिल्मों पर नजर डाले...
फिल्में भारतीय समाज की दर्पण है, ये बताती है कि आज समाज में क्या हो रहा है...पर अखबार और उसमें काम करनेवाले लोगों की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया। वे समझ रहे हैं कि वे जो सोचते हैं, वे जो लिखते हैं, वहीं ब्रह्म वाक्य है पर वे नहीं जानते कि एक घटियास्तर की सोच पूरे समाज को प्रभावित कर डालती है और फिर उससे समाज का जो नूकसान पहुंचता है, उससे समाज को उबरने में काफी वक्त लग जाता है...
हे ईश्वर, अखबार के संपादकों व मालिकों को आप सद्बुद्धि दें ताकि वे समाज का हित कर सकें...नहीं तो ये समाज को बर्बाद करके रख देंगे...

सरयू की नाराजगी...........

बेचारे सरयू नाराज है। रांची से प्रकाशित एक अखबार ने प्रथम पृष्ठ पर उनकी नाराजगी की खबर छापी है और साइड में नाराजगी का कारण भी बता दिया है। भाजपा नहीं मानती पर सरयू के चाहनेवाले ताल ठोंक कर, डंके की चोट पर ये कहते नहीं भूलते कि वे भाजपा के थिंक टैंक है। रांची से प्रकाशित कई अखबार उनके चरणोदक पीने को सदैव इच्छूक रहते है, जिस दिन उनकी चरणोदक मिल गई, उस दिन कई अखबार और उनके मालिक व पत्रकार स्वयं को धन्य-धन्य महसूस करते हुए, ये समझते हैं कि उनका जीवन कृतार्थ हो गया। वे दामोदर बचाओ अभियान से भी जूड़े है, पर वे कितना दामोदर को बचा पाएं है, वे खुद ही अच्छी तरह बता पाएंगे, पर जहां तक मेरा मानना है अखबारों और न्यूज चैनल में दामोदर को लेकर इनके द्वारा किये गये प्रयास का जितना ढोल पीटा जाता है, उसका एक दृष्टांत तक दामोदर को देखने से नहीं मिलता।
फिलहाल जनाब, रघुवर दास से नाराज है। नाराज होना भी चाहिए, क्योंकि मैं खुद भी सरकार के काम-काज से प्रसन्न नहीं हूं। गाहे-बगाहे कुछ अखबार जो नीतीश के प्रेमरस में डूबे रहते है, वे भी रघुवर के खिलाफ कभी एक-दो खबरें पेश कर देते हैं, ताकि उनकी खबरों की निरपेक्षता बराबर झलकती रहें, पर बिहार व बंगाल जाते ही उस अखबार की निरपेक्षता तेल लेने निकल पड़ती है।
कहने का तात्पर्य है कि खबरों में बने रहने के लिए इस प्रकार के बयान, या अपनी राजनीति चमकाने के लिए गर ये बयान है तो इसकी जमकर आलोचना होनी चाहिए। आप सरकार में हैं, सरकार के एक जिम्मेदार मंत्री है तो खुल कर कहिये कि इस में हमारी भी भागीदारी है, हम भी गुनहगार है, पर खुद को शहनशाह बनाने की पेशकश करते हुए, अपने ही मुखिया की आलोचना करना, वह भी पद पर रहकर किसी भी प्रकार से ठीक नहीं। सरयू राय जिस मंत्रालय को संभाल रहे है, वह मंत्रालय किसी भी प्रकार से छोटा या बेकार मंत्रालय नहीं है, पर जो मंत्रालय उन्हें दिया गया है, उस मंत्रालय में उनके काम-काज कैसे रहे है?, पहले ये तो उन्हें बताना ही चाहिए, हालांकि चीनी के दामों को लेकर, राशन वितरण तक राशन दुकान में किस प्रकार धांधली चल रही है, उसके चर्चें अखबारों से लेकर, मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र तक पहुंच चुके है। जिस प्रकार से राशन दुकानों में धांधलियां चल रही हैं, अब तक नये राशन कार्ड तक नहीं बांटे गये है, उससे साफ पता लगता है कि सरयू राय ने अपने मंत्रालय के साथ न्याय नहीं किया और न ही वे किसी काम के लायक है, संयोग से इन्हें अन्य विभाग की जिम्मेदारी दी गयी, तो वे वहीं करेंगे, जो हाल खाद्य आपूर्ति मंत्रालय का उन्होंने कर रखा है। मेरा मानना है कि आलोचना वहीं करें, जिसने कुछ काम करके दिखाया हो, वो नहीं कि खुद काम नहीं करें और दूसरों को प्रवचन देना शुरु कर दे।
रघुवर सरकार के एक साल होने को है पर इस राज्य में आज तक किसी भी मंत्री ने कोई भी ऐसा काम नहीं किया, जिस पर वह गर्व कर सकें, हां बेवजह की बातें, अलोकतांत्रिक कार्य, जगहंसाई के काम इतने किये कि उस पर एक अच्छी पुस्तक बन जायेगी, शायद इसीलिए इस राज्य का नाम झारखंड है, फिलहाल सरयू राय ने डायलॉगबाजी कर दी है, देखिये अब इस डायलॉगबाजी का क्या असर होता है?

Sunday, September 13, 2015

लिपिक पर तोहमत लगाने के बजाय पर्यटन विभाग के सचिव को अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए.....

लिपिक पर तोहमत लगाने के बजाय पर्यटन विभाग के सचिव को अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए। 12 सितम्बर 2015 को रांची से प्रकाशित प्रभात खबर के पृष्ठ संख्या 08 में “राज्य में फिल्म शूटिंग पर शुल्क तय नहीं” शीर्षक से एक समाचार प्रकाशित हुआ। पूरे समाचार को पढ़ने पर यहीं पता चला कि यहां सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं...। यहां लिपिक विशेष विभागों की नीति बनाता है और उस लिपिक द्वारा बनायी गयी नीति को आईएएस आफिसर अपनी नीति बताकर राज्य सरकार की कैबिनेट में भेज देता है। कैबिनेट बिना उस नीति को पढ़े, बिना उसे जाने, बिना उसे समझे। यह कहकर पास करता है कि आईएएस द्वारा बनाया गया नीति है, जरुर ही राज्य हित में होगा, समाज का भला होगा। यह मानकर उसे कैबिनेट से पास करा देता है और जब कैबिनेट द्वारा पास कराये गये उस नीति की राज्य या देश भर में थू – थू होती है, तो बड़े ही सहज भाव में वह आईएएस आफिसर अखबार के किसी पत्रकार को बुलाकर यह कहता हैं कि भाई, ये नीति उसने नहीं तैयार की थी, वह तो लिपिक ने तैयार किया था, उसी से भूल हो गयी। कमाल है, कड़वा-कड़वा थू-थू, मीठा-मीठा चप-चप। अच्छा हो, प्रशंसा मिले तो काम आईएएस आफिसर ने किया और जब शिकायत मिले, आलोचना होने लगे, तो किसी लिपिक का नाम लेकर पतली गली से निकल जाने का काम, गर देखना हो, तो झारखंड आ जाइये।
आप कहेंगे – कि ये मैं क्या लिख रहा हूं, जो आपको समझ में नहीं आ रहा। तो मैं बता देता हूं, ये सारा मामला, राज्य के पर्यटन विभाग से संबंधित है। हुआ यूं कि राज्य सरकार के पर्यटन विभाग में एक बहुत ही दिमाग वाले, आईएएस आफिसर है, उन्हें लगता हैं कि दुनिया की सारी बुद्धि उन्हीं के पास गिरवी रखी हैं, इसलिए वह तरह-तरह के तिकड़म करते हैं, और उसमें उनके विभाग की तो बदनामी होती ही हैं, राज्य सरकार का भी बाट लग जाता है।
हाल ही में इस पर्यटन विभाग के सचिव ने झारखंड फिल्म शूटिंग रेगुलेशन एक्ट 2015 को कैबिनेट से पास करवा लिया। जिसमें राज्य में एक सप्ताह के शूटिंग के लिए 50 लाख रुपये का दर इस विभाग ने निर्धारित कर दिया। एक सप्ताह के बाद की शूटिंग के लिए प्रतिदिन के हिसाब से 10 लाख रुपये अलग से लेने की बात भी कहीं गयी थी। यहीं नहीं आवेदन देने के बाद, पंद्रह दिन तक विभाग की अनुमति मिली या नहीं उसका इंतजार करने आदि का ड्रामा भी उल्लिखित था, जिसका सबसे पहले मैंने विरोध किया था, जिसे आप मेरे फेसबुक व ब्लाग पर जरुर पढ़े होंगे। बाद में सभी ने इसका पुरजोर विरोध किया। इस विरोध में भाजपा के एक बड़े नेता अर्जुन मुंडा भी शामिल हो गये। जैसे ही अर्जुन मुंडा ने विरोध किया, उक्त आईएएस आफिसर ने पल्ला झाड़ने के लिए एक नये षड्यंत्र का सहारा लिया। जिसका जिक्र मैने उपर में किया है।
सवाल अब सरकार से.........
सरकार बताये कि क्या राज्य में फिल्म की शूटिंग का दर कितना हो या फिल्म नीति बनाने का अधिकार, पर्यटन विभाग को है?
क्योंकि राज्य सरकार का ही एक विभाग मंत्रिमंडल एवं समन्वय विभाग है, जो स्पष्ट रुप से विभिन्न विभागों के कार्यों को निरुपित करता है, उसने तो इसकी जिक्र ही नहीं की है, जब जिक्र नहीं है, तो पर्यटन विभाग ने फिल्म की शूटिंग और उसकी नीतियों पर एक्ट कैसे बना दी और उस एक्ट को सरकार ने मंजूरी कैसे दे दी? ये तो पूर्णतः गड़बड़झाला है, भाई। ऐसे में तो उक्त आईएएस अधिकारी पर कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि उसने तो सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और सरकार की इजज्त ली, सो अलग......
आइये देखते है क्या कहता हैं, झारखंड सरकार का मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग?
झारखंड सरकार का मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग का अधिसूचना जो 13 जुलाई 2015 को जारी किया गया। जो राज्य के विभिन्न विभागों के कार्यों को प्रदर्शित करता है। जो सरकार के अपर सचिव जितबाहन उरांव के हस्ताक्षर से अधिसूचित है ---
सी.एस.-01/आर.-2/2015-1235/ भारत के संविधान के अनुच्छेद 166 के खंड(3) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए झारखंड के राज्यपाल, मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग की अधिसूचना संख्या -07, दिनांक 16.1.2000 द्वारा बनायी गयी “झारखंड कार्यपालिका नियमावली 2000” (समय-समय पर यथा संशोधित) की अनुसूची -1 में निम्नलिखित संशोधन करते है -----
25 क. पर्यटन विभाग......
• पर्यटन की दृष्टि से धार्मिक, ऐतिहासिक एव दर्शनीय स्थलों का विकास।
• झारखंड में होटल उद्योग का विकास।
• देशी एवं विदेशी पर्यटकों के लिए आवास, परिवहन, मार्गदर्शन एवं उपहार की व्यवस्था।
• पर्यटन साहित्य प्रकाशन एवं विभिन्न साधनों द्वारा प्रचार।
• पर्यटन व्यवस्था के लिए स्थापित भिन्न –भिन्न साधनों द्वारा प्रचार।
• पर्यटन व्यवस्था के लिए स्थापित संस्थाओं जैसे – पर्यटन सूचना केन्द्र, युवा आवास, टुरिस्ट बंगला।
• पर्यटन में नियोजित सभी पदाधिकारियों का नियंत्रण।
• पर्यटन के दखल में सभी भवनों का प्रशासनिक प्रभार।
• सराय और सरायपाल।
• सभी सरकारी निरीक्षण भवन/गेस्ट हाउस का संचालन।
• पर्यटन सुरक्षा।
यानी कहीं भी फिल्म से संबंधित एक शब्द भी इसमें नहीं हैं, फिर भी पर्यटन विभाग के जनाब फिल्म शूटिंग की नीतियां व एक्ट बनाने में लग गये और लगे हाथों जो भी झारखंड में फिल्म बन रहे थे या बनाने की जो लोग सोच रहे थे, उनकी सोच का ही उक्त महाशय ने श्राद्ध कर डाला।
अब कुछ सवाल, सरकार से......
• क्या ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो गड़बड़ियां निकलने पर स्वयं को दोषी न मानकर लिपिक के सर गलतियों को मढ़ देते है?
• क्या ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो उनका काम नहीं हैं, फिर भी दूसरे के कामों में अड़ंगा लगाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते है?
• क्या ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो राज्य में किसी भी अच्छे काम को होने नहीं देना चाहते?
• क्या ऐसे अधिकारियों की गलती पकड में आने के बाद भी जब राज्य सरकार उक्त अधिकारी पर कोई कारर्वाई नहीं करें तो क्या लगता हैं कि यहां सरकार नाम की कोई चीज है?

Tuesday, September 1, 2015

धन्य है, रे भैया, झारखंड का पर्यटन विभाग.............

रांची से प्रकाशित “हिन्दुस्तान” समाचार पत्र के रांची लाइव नामक
पृष्ठ पर एक रिपोर्ट छपी है। रिपोर्ट है - “फिल्म सिटी की ओर
झारखंड ने बढ़ाया पहला कदम”। इस रिपोर्ट में राज्य के पर्यटन,
कला –संस्कृति और युवा कार्य विभाग और उसके सचिव अविनाश
कुमार की जमकर आरती उतारी गयी है। इस आरती में मुख्यमंत्री
रघुवर दास को भी शामिल किया गया है, यह कहकर कि जो
अविनाश कुमार ने फिल्मसिटी पर रिपोर्ट बनायी है, उस रिपोर्ट को
सीएम ने स्वीकृति दे दी है, गर ऐसा है तो यकीन मानिये, राज्य में
फिल्म उद्योग का भट्ठा बैठ जायेगा और इस राज्य में फिल्म
निर्माण, पर्यटन, कला संस्कृति और युवाओं के सपनों का श्राद्ध हो
जायेगा। श्राद्ध की तैयारी भी प्रस्ताव में बहुत अच्छे ढंग से कर ली
गयी है। कमाल है, अभी फिल्म नीति बनी नहीं, और गुपचुप तरीके
से झारखंड फिल्म शूंटिग रेगुलेशन – 2015 का निर्माण और सीएम
की स्वीकृति तथा हिन्दुस्तान अखबार में आज इस पर रिपोर्ट बताता
है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
आखिर कौन लोग हैं, जो राज्य में फिल्म उद्योग को फलने – फूलने
नहीं देना चाहते हैं, उसका काला चिट्ठा है आज के हिन्दुस्तान
अखबार की यह रिपोर्ट।
अब हम बात करते हैं, आज अखबार में छपी रिपोर्ट की, जिसका हम
अक्षरशः आपरेशन करेंगे।
अखबार ने छापा हैं कि अविनाश कुमार द्वारा बनाये गये प्रस्ताव में
वर्णित हैं कि फिल्म शूटिंग से संबंधित कार्यों को देखने के लिए
पर्यटन विभाग के सचिव को नोडल आफिसर बनाया जायेगा।
मेरा मानना हैं कि आप ही प्रस्ताव बनाओ, और आप ही प्रधान बन
जाओ, ये आप कर सकते हैं, पर सच्चाई ये हैं कि भारत सरकार से
लेकर, विभिन्न राज्यों के राज्य सरकार तक फिल्मों से संबंधित सारे
कार्य सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ही देखता है, गर आपको नहीं
विश्वास हैं तो जाकर भारत सरकार का आफिसियल वेबसाइट या
तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश या किसी भी राज्य का आफिसियल
वेबसाइट देख सकते है।
अखबार ने लिखा है कि जिस किसी भी व्यक्ति को फिल्म निर्माण
करनी होगी, उसके लिए एक आवेदन विभाग को देना होगा, आवेदन
के साथ शुल्क भी तय होगा, जो वापस नहीं होगा। 15 दिनों के अँदर
संबंधित व्यक्ति को विभाग की ओर से सूचित किया जायेगा कि
फिल्म शूटिंग की इजाजत है या नहीं।
मेरा मानना हैं कि जहां आज तक कोई फिल्म बनाने नहीं आया, जहां
किसी ने झांकने तक की कोशिश नहीं की, वहां माहौल बनाने के
पहले, माहौल बिगाड़ने की इजाजत उक्त अधिकारी को किसने दे दी?
क्या आपके यहां राज खोसला के परिवार के लोग, बी आर चोपड़ा के
लोग, यश चोपड़ा के लोग, राजकपूर के परिवार के लोग, राजश्री
प्रोडक्शन्स, रामोजी राव से जूड़े आदि फिल्म निर्माण की हस्तियां
आपके यहां हाथ जोड़कर आवेदन देने के लिए, वह भी शुल्क के साथ,
वह भी कि आप शूटिंग की इजाजत देंगे या नहीं, मन में भाव रखकर
आवेदन करेंगी कि आप की अपेक्षा वह उन राज्यों में अपना फिल्म
निर्माण करेंगी, जहां की सरकारों ने सुविधाओं का पिटारा खोल दिया
हैं। कमाल हैं एक तरफ आप दिल्ली और अन्य शहरों में उद्योग धंधे
राज्य में खुले इसके लिए व्यापार मेला में प्रतिभागी के रुप में भाग
ले रहे हो, और यहां जब अवसर खुलने की बात हो रही हैं तो जो
यहां आने की सोच रहे हैं, उनसे अपनी आरती उतरवाने की सारी
योजनाओँ को मूर्त्तरुप देने में लगे हो, कमाल हैं भाई तुम्हारी सोच
की। फिल्म निर्माण से जूड़ी हस्तियां तुम्हारे 15 दिन के इंतजार की
अपेक्षा इंडोर या आउटडोर शूटिंग के लिए हैदराबाद या अन्य फिल्म
सिटी में अपना आशियाना नहीं ढूंढेंगी क्या। ये बातें तुम्हें समझ में
क्यों नहीं आती।
अखबार ने लिखा हैं कि प्रस्ताव में शूटिंग का शुल्क विभाग तय
करेगा। एक सप्ताह से अधिक शूटिंग चलाने पर प्रतिदिन दस हजार
रुपये देना होगा, इसके अलावा अगर सुरक्षा के लिहाज से पुलिस की
जरुरत हैं, तो उसका शुल्क अलग होगा।
आश्चर्य हैं रे भाई, आप मुंह पर खुब अच्छे-अच्छे कंपनी का पाउडर
और तेल मल लीजिये, एक भी फिल्म निर्माता आपके यहां इस प्रकार
की नीति रखेंगे तो नहीं आयेगा, क्योंकि कई राज्य सरकार इस प्रकार
की सुविधा मुफ्त में मुहैया करा रही हैं।
जिसने भी इस प्रकार की नीति बनायी हैं, उसकी सोच पर मुझे तरस
आता हैं, आज हमें ये भी पता लग गया कि क्या कारण हैं कि
पर्यटन झारखंड में पिछड़ गया, अरे जहां इस प्रकार के अधिकारी
होंगे, उस राज्य का तो भगवान ही मालिक है।

वाह-वाह, बिहार का नेता है.................

ये बिहार का नेता है
वाह-वाह, बिहार का नेता है
लालटेन तीर हाथ पकड़
सबका अपमान कर जाता है
वाह-वाह.............
जो पशुचारा खा जाता है
पत्नी को सीएम बनाता है
जो जातिवाद फैलाता है
संकीर्णता रास रचाता है
महिला को धौंस दिखाता है
जो बिहार बंटवाता है
वाह-वाह..........
जनता को नित दिन ठगता है
चश्मबाग दिखलाता है
कल तक हाथ में कमल दिखा
आज लालेटन पकड़ाता है
जहां चाणक्य ने जन्म लिया
जो चंद्रगुप्त प्रधान किया
वहा कंस बन करके नेता
खुद को कृष्ण बोलवाता है
वाह-वाह.................
जो कसमें बहुत ही खाता हैं
कहता बिजली दिलवाता है
पांच साल अब बीत गया
फिर भी वह नही शरमाता है
वाह वाह...................
खुद ही अनीति कर जाता हैं
पर नीतीश कुमार कहलाता है
बार-बार भीख मांग मांग
सब के आगे नच जाता है
वाह वाह...............
पटना में गंदगी करा दिया
पूरे बिहार को शरमा दिया
कभी केजरी, कभी मुल्लू
कभी सोनिया को, ठुमक दिखाता है
वाह वाह..................