Tuesday, February 7, 2017

बोलिये शुक्राचार्य की जय.............

झारखण्ड के रांची स्थित सूचना भवन में आइपीआरडी में एक शुक्राचार्य है, हालांकि उसके माता – पिता ने उसका बड़ा ही सुंदर नाम रखा है, पर आप तो जानते ही है कि हमारे देश में एक नाम परिवार रखता है तो दूसरा नाम समाज रखता है। परिवार जो नाम रखता है, उसमें केवल एक ही बात निहित रहता है कि उस बालक के नाम से उसका परिचय हो जाय, जबकि समाज उस बालक के क्रियाकलापों और चरित्र के आधार पर नामकरण कर डालता है। आइपीआरडी में जो शुक्राचार्य है, उसका शुक्राचार्य नामकरण उनके क्रियाकलापों और चरित्र के आधार पर ही, वहां कार्यरत कई अधिकारियों और कर्मचारियों ने कर दिया है। शुक्राचार्य भी, इस नाम को सुनकर बहुत ही प्रसन्न होता है।
बेशर्मी, कर्तव्यहीनता, मूर्खता भरे काम, सरकारी काम-काज में कैसे बैकडोर से मनपसंदीदा चीजें प्राप्त होती है?, किसी काम को कैसे लटकाया जाता है?, इन सारे कार्यों में उसे महारत हासिल है। मुख्यमंत्री रघुवर दास के आस-पास रहनेवाले कनफूंकवों से इसकी खूब पटती है। यह कनफूंकवों को खूब टिप्स देता है, साथ ही आइपीआरडी में कार्यरत सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की छोटी से लेकर बड़ी गतिविधियों की जानकारी, ये मुख्यमंत्री के आस-पास रहनेवाले कनफूंकवों को दे दिया करता है (इस आधार पर आप फिल्म शोले के हरिराम नाई पात्र से इसकी तुलना कर सकते है), यहीं नहीं जब आइपीआरडी में टेंडर खुलता है तो यह अपने लोगों को टेंडर दिलवाने में रात-दिन एक कर देता है और जैसे ही उसके चाहनेवालों को टेंडर प्राप्त होता है, वह मिठाइयां बांटता और खूब अकड़ कर चलता है, साथ ही टेंडर प्राप्त करनेवालों को यह बताना नहीं भूलता कि उसी की कृपा से उसे टेंडर प्राप्त हुआ है, इसलिए टेंडर प्राप्त करनेवाला उसके प्रति हमेशा कृतज्ञ रहे, यह टेंडरप्राप्तकर्ता को इसका समय-समय पर भान दिलाता रहता है, साथ ही धमकी भी दे डालता है कि, नहीं तो वो मुख्यमंत्री के कनफूंकवों को कह देगा, जिससे उसकी परेशानी बढ़ जायेगी। टेंडर प्राप्त करनेवाला भी इस डर से शुक्राचार्य को अपनी सेहत के मुताबिक भेंट चढ़ा देता है, जिससे शुक्राचार्य आशीर्वाद के रूप में अभयदान दे देता है।
शुक्राचार्य की एक सबसे बड़ी विशेषता है कि जबसे बायोमिट्रिक एटेंडेंस बनना शुरू हुआ है तो वह आने और जाने के समय अपना अंगूठा बायोमिट्रिक सिस्टम में लगाना नहीं भूलता और उसके बाद बीच में वो कब आफिस से निकला और कब आया, आपको पता ही नहीं चलेगा। यहीं नहीं मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की साप्ताहिक समीक्षा बैठक में अपना चेहरा चमकाना नहीं भूलता, साथ ही अखबारों में उसकी फोटो छपे, ये भी सुनिश्चित कराना नहीं भूलता, पर इधर कुछ दिनों से उसकी फोटो अखबारों में नहीं आ रही, क्योंकि नये निदेशक ने उससे कुछ और बड़े-बड़े काम लेना शुरु कर दिया है, क्योंकि निदेशक को लगता है कि आइपीआरडी में उसके जैसा विद्वान और कनफूंकवों का मददगार कोई है ही नहीं।
इसकी विद्वता का ही हाल था कि 23 जनवरी को जब मुख्यमंत्री रघुवर दास बजट पेश कर रहे थे तो बजट पेश करने के बाद इसने बजट की प्रति लेने के लिए पत्रकारों के बीच ऐसी व्यवस्था कर दी, जिसकी आलोचना सभी ने की। गड़बड़ियों के लिए दूसरों को दोष देना और हर अच्छे कार्यों के लिए स्वयं को प्रतिष्ठित करना इसकी यादों में शुमार है। चूंकि अभी सभी का ध्यान ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट की ओर है तो नये निदेशक ने इसको अपना सबसे प्रिय व्यक्ति मानकर, कार्य करना शुरु कर दिया। हद तो यह भी है कि आजकल ये सूचना भवन में आये नये-नये पदाधिकारियों और समय-समय पर होनेवाले डीपीआरओ की मीटिंग में निदेशक के इशारे पर प्रवचन देना भी शुरु कर दिया है, जिस प्रवचन को उसके ही अधिकारी हवा में उड़ा देते है।
इसकी हरकतों से सभी परेशान है, पर कनफूंकवों के आशीर्वाद तथा नये निदेशक से उसकी मित्रता ने उसका भाव बढ़ा दिया है, जबकि दो महीने पूर्व तक इसकी हालत पस्त रहती थी, क्योंकि इसके गलत कार्यों के कारण तथा दीर्घसूत्रता के कारण शुक्राचार्य को हमेशा डांट पड़ती थी, पर इसके ढीठई ऐसी थी कि इसकी मोटी चमड़ी पर उसका असर ही नहीं पड़ता था, फिर भी आजकल ये स्वयं को निदेशक से कम नहीं समझता, कभी-कभी तो वह यह भी कह देता है कि वह निदेशक से कम है क्या?, क्योंकि जितना वेतन निदेशक को मिलता है, उससे कम तो उसे भी नहीं मिलता...

Monday, February 6, 2017

सीएम की ब्रांडिंग, कनफूंकवा और बेचारी जनता.....

ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे इस कार्यक्रम के लिए सीएम की ब्रांडिंग करनेवाले कंपनियों के हाथ-पांव फूलते जा रहे है। हर दो-तीन दिन पर कनफूंकवों की टीम, सीएम के कान में कुछ फूंक दे रही है और लीजिये ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियां नये-नये होर्डिंग्स लगाकर सीएम को खुश करने में लग जा रही है, दूसरी ओर मंत्रियों के दल ने इस समिट से धीरे-धीरे दूरियां बनानी शुरु कर दी है। कुछ तो सीधे कहते है कि यह पैसे और समय की बर्बादी है। कुछ तो यह भी कहते है कि हम दूसरे की मांग लाल देखकर, अपना मांग लाल नहीं कर सकते। झारखण्ड, गुजरात या मध्य-प्रदेश नहीं है। यह नवोदित राज्य है, यहां की जनता सर्वाधिक गरीबी से पीड़ित है, ऐसे में इस प्रकार के आयोजन से गरीबी बढ़ेगी, पूंजीपति और संपन्न होंगे।
दूसरी ओर विरोधी दलों के नेता तो ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के नाम से ही भड़क उठते है। वे कहते है कि इस प्रकार के आयोजन से झारखण्ड को नुकसान छोड़, लाभ किसी जिंदगी में नहीं हो सकता, क्योंकि सर्वाधिक पूंजी निवेश का हाल यहां की जनता भुगत रही है। पूरा प्रदेश विस्थापन का दंश झेल रहा है, पर मुख्यमंत्री रघुवर दास केवल अपनी मन की कर रहे है और अधिकारियों के कुछ समूह ने बे-सिरपैर की बातें कर पूरे प्रदेश को भ्रमित कर दिया है। विरोधी दलों के नेताओं का समूह तो यह भी कहता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास जो नित्य नये-नये होर्डिंग्स और विज्ञापन के माध्यम से जो अपनी ब्रांडिंग कर रहे है, उससे जनता का भला नहीं हो रहा, ये राज्य की जनता के पैसे का अपव्यय है, मुख्यमंत्री को समझ लेना चाहिए।
हम आपको बता दें कि फिलहाल राज्य के बाहर की तीन-तीन कंपनियां सीएम की ब्रांडिंग में लगी है, जबकि राज्य सरकार के क्रियाकलापों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए पूर्व से ही राज्य में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग कार्यरत है, पर स्थिति ऐसी है कि ये विभाग फिलहाल चूं-चूं का मुरब्बा हो गया है।
यह विभाग जो सीधे मुख्यमंत्री के सम्पर्क में है, स्वयं मुख्यमंत्री को इस विभाग के अधिकारियों पर विश्वास नहीं है, क्योंकि कनफूकवों की टीम, ऐसा मुख्यमंत्री के कान में फूंक देती है कि मुख्यमंत्री को लगता है कि उनके कनफूंकवें सही है और विभागीय अधिकारी गलत है। यहीं कारण रहा कि यहां एक वन विभाग में कार्यरत अधिकारी को विभाग का कार्यभार सौंपा गया, जिसे विभागीय कार्य की जानकारी ही नहीं। जैसे-तैसे विभाग चल रहा है, जो निकम्मे और आलसी थे, आज स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे है। आश्चर्य इस बात की है कि जिसके खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, उस अधिकारी को पुनः रांची मुख्यालय में महिमामंडित करने की तैयारी कनफूंकवों द्वारा शुरु कर दी गयी है। कुछ दिनों में ही वह अधिकारी जिसके खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, जल्द ही सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के मुख्यालय में दिखेगा, उसकी तैयारी पूरी कर ली गयी है। ...और इधर देखिये ब्रांडिग करनेवाले कंपनियों का हाल, कनफूंकवों ने इनका क्या हाल बना दिया है?
आपको याद होगा कि सर्वप्रथम धौनी द्वारा हाथी को उड़ाते हुए ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को सफल बनाने के लिए जनता से सहयोग मांगा जा रहा था, कनफूंकवों ने जैसे ही सीएम के कान में ये बात कही कि हाथी के उड़ाने से मोमेंटम झारखण्ड का मजाक उड़ रहा है। झट से आनन-फानन में हाथी के उड़ानेवाले बैनर-पोस्टर की जगह केवल धौनी का बैनर-पोस्टर जारी हुआ, हाथी को उड़ानेवाला दृश्य गायब किया गया। इसके बाद फिर कनफूंकवों ने कंपनियों के उपर अँगूली उठाई कि इससे तो धौनी का ब्रांडिग हो रहा है, सीएम रघुवर दास तो कहीं है ही नहीं। तब ऐसे हालत में कंपनियों ने धौनी और रघुवर दास, दोनों का फोटो समेत बैनर-होर्डिंग्स लगानी शुरु की। इस बैनर-पोस्टर लगाने के बाद फिर कनफूंकवों ने कहा कि सीएम इस बैनर-पोस्टर से भी खुश नहीं। कुछ नया होना चाहिए, जिसमें धौनी नहीं, सिर्फ और सिर्फ सीएम होने चाहिए, रघुवर दास होने चाहिए। ब्रांडिंग कंपनियों ने फिर से नया बैनर-पोस्टर बनवाया और आज जगह-जगह केवल रघुवर दास ही अब नजर आ रहे है और धौनी धीरे-धीरे गायब होते दिख रहे है। ज्यादा दिन नहीं, कुछ दिन के बाद, लगता है कि धौनी पूरी तरह से बैनर-पोस्टर से गायब हो जायेंगे और इन बैनरों-पोस्टरों पर रघुवर ही रघुवर दिखेंगे। ऐसे में आनेवाला ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का क्या हाल होगा? समझ लीजिये। बेचारी ब्रांडिंग कंपनियों का क्या? वो तो अपने करार के अनुसार, पैसे लेंगे चल देंगे, ब्रांडिंग किसकी हुई?, झारखण्ड की या सीएम की, ये वक्त बतायेगा, पर इतना तो तय है कि जनता को नुकसान के सिवा कुछ भी हाथ नहीं आयेगा, क्योंकि हाथी उड़ता नहीं है, यह विशालकाय प्राणी जितना खाता है, उतना ही नुकसान भी करता है, पर यहां तो राज्य सरकार और उनके अधिकारियों ने इसे उड़ाने की कोशिश कर दी है, ऐसे में झारखण्ड आज सर्वत्र हंसी का पात्र बन गया है।

मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, जनभावनाओं को समझिये, जनता आपसे खुश नहीं हैं................

राज्य की रघुवर सरकार राजधानी रांची में एक ओर 16-17 फरवरी को ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का आयोजन कर रही है, तथा राज्य में पूंजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए देश-विदेश के उद्योगपतियों को मनुहार कर रही है, वहीं 2 फरवरी को विधानसभा में पेश सीएजी की रिपोर्ट ने पूरे राज्यवासियों को हैरानी में डाल दिया है। सीएजी ने कहा है कि टाटा ने सरकारी जमीन बेच दी, जिससे राज्य को 4762 करोड़ की चोट पहुंची, जरा सोचिये अगर रघुवर सरकार द्वारा आयोजित 16-17 फरवरी का ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट अगर सफल हो जाता है तो राज्य की क्या भयावह स्थिति होगी?
संसदीय कार्य मंत्री सरयू राय ने वर्ष 2015-16 के राजस्व प्रबंधन पर सीएजी की रिपोर्ट गुरुवार को विधानसभा में पेश की थी। रिपोर्ट में टाटा और डीवीसी समेत कई कंपनियों और सरकार के राजस्व उगाही करनेवाले विभागों के कार्यकलापों पर गंभीर टिप्पणी की गई है। इसमें कहा गया है कि 11,676 करोड़ रुपये के नुकसान में से 10,282 करोड़ रुपये अभी भी वसूले जा सकते है। शेष 1394 करोड़ रुपये की वसूली संभव नहीं है। महालेखाकार ने तो प्रेस कांफ्रेस कर बताया कि टेस्ट चेक और परफार्मेंस ऑडिट में पता चला कि टाटा स्टील और डीवीसी ने अनधिकृत रूप से सरकारी जमीन बेच दी। लीज खत्म होने के बाद भी 2547 एकड़ जमीन का उपयोग किया। इससे सरकार को 3969 करोड़ रूपये का नुकसान हुआ।
दैनिक भास्कर ने इस समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया है, जबकि अखबार नहीं आंदोलन कहीं जानेवाली अखबार प्रभात खबर ने इसे इस प्रकार छापा है, जैसे लगता है कि कुछ हुआ ही नहीं, यानी कल तक सदैव कांग्रेस और अपने विरोधियों को कोसनेवाली भाजपा पर उसी के शासन काल में ऐसा दाग लगा है कि जिसे वो चाहकर भी धो नहीं सकती, फिर भी मुख्यमंत्री रघुवर दास का यह कहना कि उनके शासनकाल में भ्रष्टाचार नहीं हुआ, उनके अधिकारी ईमानदार है, इससे बड़ा मजाक दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
इस मामले को लेकर हालांकि विपक्षी दलों में सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। झाविमो सुप्रीमो बाबू लाल मरांडी ने 4 फरवरी को एक प्रेस कांफ्रेस कर कहा कि कैग के रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया है कि टाटा स्टील और डीवीसी ने अब तक 1279 – सब लीज के पट्टे बिना सरकारी अनुमोदन के जारी किये है, जिससे राज्य को 3,376.24 करोड़ का राजस्व घाटा हुआ है। अब बिना देर किये सरकार – गहराई से जांच एवं दोषियों को चिह्न्ति करने के लिए पूरे प्रकरण को सीबीआई को सौंप दे। झाविमो सुप्रीमो बाबू लाल मरांडी ने साफ कहा कि जब कैग की रिपोर्ट के आधार पर पशुपालन घोटाला, टू जी, थ्री जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कामनवेल्थ गेम घोटाला, कॉलगेट घोटाला की जांच सीबीआई को मिल सकती है, तो इसकी जांच सीबीआई को क्यों नहीं मिल सकती? झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी की बातों में दम भी है। झाविमो नेता ने तो यह भी कह दिया कि वे इस मामले को लेकर अन्य दलों के प्रतिनिधियों के साथ वे जल्द ही राज्यपाल से मिलेंगे।
इस राज्य का दुर्भाग्य है कि चाहे किसी की भी सरकार बने, अंततः यहां की निरीह जनता को ही कष्ट उठाना पड़ा है, वो कहावत है न कि कद्दू पर हसुंआ गिरे या हसुंआ पर कद्दू गिरे, नुकसान तो हर हाल में कद्दू को ही उठाना पड़ा है। सच्चाई यहीं है कि पूरे राज्य में राज्य सरकार ने ऐसी बयार बहा दी है, कि जैसे लगता है कि अगर राज्य में पूंजी निवेश नहीं हो, तो राज्य विकास करेगा ही नहीं, बल्कि इसके उलट झारखण्ड के पड़ोसी राज्य ओड़िशा, बिहार आदि राज्यों ने बिना किसी इस प्रकार के आयोजन के ही राज्य की जनता में ऐसा विश्वास भरा है कि लोगों को लगता है कि राज्य सरकार कुछ कर रही है, पर रघुवर सरकार ने झूठ का ऐसा आडम्बर रचा है कि पूछिये मत। इस झूठ के आडम्बर के खेल में हाथी को भी उड़ा दिया गया है, जबकि राज्य के सभी अखबारों और चैनलों को विज्ञापन की राशि देकर मुंह बंद कर दिया गया है, जिस कारण चाहे वह रांची से प्रकाशित होनेवाले अखबार हो या दिल्ली तथा कोलकात्ता से, सभी अखबारों और चैनलों ने अपने होठ सील लिये है। इससे होनेवाले नुकसान और राज्य की जनता की आवाज को ठेंगे पर रख दिया गया है, तथा रघुवर सरकार की आरती उतारी जा रही है। विपक्षी दलों के नेता अगर सरकार पर अंगूली भी उठा रहे है, तो उनकी बातें नहीं सुनी जा रही। राज्य की जनता इन हालातों को देखकर बेबस है, पर शायद वह अपनी खामोशी तब तक बर्दाश्त कर रही है, जब तक उसके पास विकल्प नहीं आ जाता। लोकतंत्र में पांच साल शासन की मर्यादा ने, राज्य की जनता की जान निकाल दी है। दो वर्ष बीत चुके है, तीन वर्ष अभी और राज्य की जनता को झेलना है, पर कहीं ऐसा नहीं कि राज्य की जनता सरकार के खिलाफ बगावत पर उतर जाये और राज्य के अधिकारी और राज्य के मुखिया, कुछ कर सकने की स्थिति में ही न हो, क्योंकि राज्य के मुखिया को ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है...
टाटा सबलीज मामले ने पूंजी निवेश की असलियत को जनता के समक्ष रख दिया है, अब शायद ही कोई जनता होगी, जो राज्य सरकार के इस ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के प्रति थोड़ी भी सहानुभूति रखेगी, हांलाकि विरोध तो पंचायत स्तर तक हो रहा है, पर रघुवर दास को लगता है कि वहीं सहीं है, और बाकी जनता मूर्ख...

Saturday, February 4, 2017

रघुवर राज में बेटियां असुरक्षित...........

जिधर देखिये, उधर ही, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा बुलंद करनेवाली रघुवर सरकार में बेटियां असुरक्षित है। दुष्कर्म को अंजाम देनेवाले दुष्कर्मियों के हौसले बुलंद है, पर मुख्यमंत्री रघुवर दास हाथ पर हाथ धरे बैठे है। याद करिये रांची के बूटी की वह वीभत्स घटना, जब दुष्कर्मियों ने एक लड़की के साथ दुष्कर्म करने के बाद उसकी नृशंस हत्या कर दी थी। जिसको लेकर पूरा रांची आंदोलित था। रांची बंद भी बुलाया गया था। राज्य सरकार ने जल्द दोषियों को पकड़ने की बात कहीं थी, दावा तो यह भी किया जा रहा था कि उक्त घटना में सम्मिलित लोगों तक स्थानीय पुलिस पहुंच चुकी है, जल्द ही वे गिरफ्त में होंगे, पर सच्चाई क्या है? सब को पता है। अब ये मामला सीबीआई को सौंप दिया गया है, यानी राज्य की पुलिस कितनी काबिल है, वह इस घटना से पता चल जाता है।
अभी इस घटना के कोई ज्यादा दिन भी नहीं हुए कि गढ़वा के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय रंका में कक्षा छह में पढ़नेवाली आदिम जनजाति की एक नाबालिग छात्रा के गर्भवती होने और गर्भपात के प्रयास में उसकी स्थिति गंभीर होने का समाचार दिनांक 28 जनवरी को स्थानीय अखबार प्रभात खबर में देखने को मिला। 2 फरवरी को इसी अखबार में यह भी पढ़ने को मिला कि चाईबासा के रुंगटा प्लस टू हाई स्कूल की 12 वीं छात्रा के साथ दुष्कर्म किया गया, घटना 29 जनवरी की है। इसी अखबार में बिशुनपुर से समाचार है कि वहां तीन बच्चों की मां के साथ दुष्कर्म किया गया। गर्भ में पल रही बेटियों के मर जाने और मारनेवालों को तो आज तक पुलिस ढूंढ ही नहीं पाई, जबकि गर्भ में पल रही बेटियों के मारे जाने की खबर यहां सामान्य सी है।
कहनेवाले तो ये भी कहते है कि जब मुख्यमंत्री रघुवर दास, खुद द्वारा चलाये जा रहे मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की बेटियों का गुहार नहीं सुनते, उसे अनसुना कर देते है, तो फिर इन सब घटनाओं में मुख्यमंत्री को रुचि कहा। ज्ञातव्य है कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत दो महिला संवादकर्मियों ने राज्य महिला आयोग से शिकायत की है कि यहां कार्यरत महिला संवादकर्मियों के साथ अमर्यादित व्यवहार होता है, जिसकी प्रतिलिपि मुख्यमंत्री को भी भेजी गयी। इस बात की जानकारी मुख्यमंत्री से संबंधित सारे वरीय पदाधिकारियों को है, पर इन महिला संवादकर्मियों को आज तक न्याय ही नहीं मिला। ऐसे में यह कहना कि राज्य में बेटियों का सम्मान सुरक्षित है, गलत होगा। राज्य की बेटियों को स्वयं अपने सम्मान की रक्षा के लिए आगे आना होगा, क्योंकि सरकार कैसे काम कर रही है? और किसके लिए काम कर रही है?, आपके सामने है। हद तो यह भी हो गयी है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास को राज्य की तीन करोड तीस लाख की आबादी में एक महिला तक नहीं मिल रही, जिसे राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकें, जबकि लंबी-लंबी बातें और भाषण देने की बात आये तो फिर देखिये रघुवर दास को, ये स्वयं को हनुमान भी बना डालेंगे, पर शायद रघुवर दास को पता नहीं कि हनुमान ने सीता के सम्मान की रक्षा के लिए रावण की नाक में दम कर दिया था, पर त्रेता के हनुमान और कलियुग के इस हनुमान में आकाश और जमीन का अंतर तो दिखेगा ही।

सीएम ने खोला है देखो...............

सीएम ने खोला है देखो...
केन्द्र जनसंवाद...
जनता है परेशान मगर...
न मिलता उचित जवाब...
नाम रखा है सीधी बात...
पर होती उलटी बात...
181 नंबर लगाकर...
जनता हुई परेशान...
हर महीने, हर सप्ताह...
नहीं पता, क्या करता है...
जनता निरंतर मूर्ख बनती...
अधिकारी खूब हंसता है...
दुख से परेशान जनता...
तब नारा स्वयं बनाया...
और कहा, बस तीन साल तुम...
उल्लू हमे बना लो...
उसके बाद मिलेगा झटका...
ये तुम अब जानो...
और, एक स्वर में जनता...
जोर-जोर चिल्लाई...
ऐसे सीएम पर नहीं भरोसा...
करेंगे जल्द बिदाई...
क्योंकि, सीएम करते उलटी बात...
बढ़ गई दूरी...
उलझ गई बात...

नेता जी के लिए विधानसभा..........

नेता जी के लिए विधानसभा...
वकीलों के लिए हाईकोर्ट...
पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब...
और आम जनता के लिए...
बाबा जी का ठुल्लू...
एक साल हो गये पहाड़ी मंदिर से तिरंगा गायब है...
बड़ी ताम-झाम से साहेब ने यहां तिरंगा फहराया था...
रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को रांची बुलाया था...
आम जनता को सपने दिखाया था...
आज वहां खंभा तो दिखता है, पर तिरंगा गायब है...
आज देखिये...
इसी रास्ते से साहेब का काफिला निकलता है...
पर समय नहीं कि वो तिरंगा को पुनः वहां लहरा दें...
आम जनता को एक बार फिर वहीं खुशी दिला दें...
खूब हल्ला करते है...
खेल विश्वविद्यालय देंगे...
सीसीएल से एमओयू किये है...
दो साल हो गये...
एमओयू पड़ा है...
खेल विश्वविद्यालय के लिए सब कुछ है...
ढांचा भी है, पर इनके निर्णयों और निश्चयों से ये गायब है...
एंटी करप्शन ब्यूरो बनाये है...
ये ब्यूरो ऐसा है कि...
उसे थर्ड और फोर्थ ग्रेड के कर्मचारी ही घूसखोर दिखते है...
पर ए ग्रेड और बी ग्रेड के अधिकारियों को पकड़ने में...
इसको दादी और नानी याद आ जाती है...
शायद इसे लगता है कि यहां के सारे आइएएस-आइपीएस...
दूध के धूले है...
कमाल है, बलात्कारियों का दल...
पूरे झारखण्ड में खुला घूमता है...
वो मां-बहनों की इज्जत से खेलता है...
मां-बहनों की हत्या भी कर डालता है...
पर,
अपनी पुलिस उन दुष्कर्मियों को पकड़ने में असफल रहती है...
सरकार ने इन्हें बड़े-बड़े वाहन दिये है...
ये बिना नंबर के इस वाहन पर चढ़कर खूब ऐश करते है...
पर सच्चाई ये है कि अपराधियों से ये नैन-मटका करते है...
विधि-व्यवस्था का ये हाल है...
कि बड़े – बड़े शैक्षिक संस्थानों में भी अपराधिक घटनाएं घटती है...
पर नेता और उनके दलाल...
उन शैक्षिक संस्थाओं को बचाने में ही ज्यादा समय लगाते है...
आम जनता मरने को विवश है...
किसानों-मजदूरों के लिए बड़े-बड़े दावे है...
किसान अपनी मेहनत से कमाये फसल को...
सड़कों पर फेंकने को मजबूर है...
पर मजाल है कि सरकार और उनके नुमाइंदे...
किसानों के आंसू पोछने के लिए उनके घरों तक पहुंच जाये...
पूंजीपतियों को बुलाने और झारखण्ड लूटवाने को पूरा कुनबा तैयार हैं...
जनता बेहाल है, सरकार और सरकार के नुमाइंदे मालामाल है...
इस बार हाथी उड़वाने के लिए सीएम मचल रहे है...
मचल तो आइएएस और आइपीएस भी रहे है...
यहीं मौका है...
मिलकर लूटने का पर्व जल्द ही आनेवाला है...
इन अंधेरों को पत्रकार नहीं देख पाते है...
क्योंकि उनके आका को ये राजनीतिबाज...
पहले ही खरीद चूके है...
मेडिकल हब बनाने का शोर...
हर रोज सुनाई देता है...
पर रांची में ही बने अस्पताल सदर...
कब खुलेंगे...
इसका जवाब किसी के पास नहीं है...
हरमू के सौंदर्य नाम पर खूब ढिंढोरा पीटा...
वो हरमू जो कल नदी थी...
आज नाली रुप धर लिया...
आग लगे ऐसे सौंदर्यीकरण को...
जो नदी को नाली बना दें...
नेता-अधिकारी-ठेकेदार का पेट बहुत बढ़ा दें...
जन-वन योजना, डोभा योजना...
सब बनते अखबारों में...
यहां पेड़ भी जगमग करते...
सिर्फ-सिर्फ अखबारों में...
ढूंढते रह जाओगे, मोबाइल...
नहीं मिलेगा सड़कों पे...
अपना पैसा जेब निकालो
खा लो, तुम हर हालों में...
झूठ-झूठ ही, झूठ-झूठ अब...
हर जगह दिखाई देता है...
क्या तिलिस्म है...
इस सरकार का...
वाह-वाह सब करता है...
असली मजा तो इन नेताओं की...
खूब कटती है मस्ती में...
मर गई जनता, मरती जनता...
हर हाल मरेगी, झारखण्ड में...

बियॉन्ड न्यूज.............

बियॉन्ड न्यूज, जब इस पुस्तक का लोकार्पण हो रहा था, तो मैं रांची में ही था, पर यह पुस्तक उस वक्त मेरे हाथ नहीं लगी। पुस्तक लोकार्पण के दूसरे दिन समाचार पत्रों को जब, मैं उलट रहा था। तब जाकर पता चला कि शक्ति व्रत और संजीव शेखर की लिखित पुस्तक बियॉन्ड न्यूज का लोकार्पण हुआ है। लोकार्पण के वक्त झारखण्ड विधानसभा के प्रथम विधानसभाध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा तथा अन्य विद्वान मौजूद थे। हम आपको बता दें कि संजीव शेखर से मेरी पहली मुलाकात उस वक्त हुई, जब वे स्टार न्यूज संवाददाता बनकर पहली बार रांची आये। बेहद ही शालीन और पत्रकारिता के प्रति गहरी निष्ठा, उनके स्वभाव में है, क्योंकि इनका बैक ग्राउंड बहुत ही प्रभावशाली रहा है। इनके पिता डा. शालीग्राम यादव बिहार के जाने माने शिक्षाविद् थे, जो आज दुनिया में नहीं है, पर उनकी कृति आज भी जीवित है। उपनिषद कहता भी है – कीर्तियस्य स जीवति।
विवादरहित संजीव अपने स्वभाव के कारण पत्रकार मित्रों में भी जल्दी ही लोकप्रिय हो जाते है, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यह लोकप्रियता सभी को नसीब नहीं होती। बियॉन्ड न्यूज पुस्तक में तीन पत्रकार मित्रों की कहानी है। जो संजय से जुड़े है। संजीव ने अपने पुस्तक में तीन पत्रकारों के माध्यम से वर्तमान पत्रकारिता में हो रहे ह्रास और सत्यनिष्ठ पत्रकार के दर्द को उकेरा है। एक ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार कैसे जीता है?, कैसे उसके बॉस, उसके तथाकथित पत्रकार मित्र जो दावा करते है कि उनके साथ है, पर समय – समय पर जलील करने से नहीं चूकते? कैसे एक गांव में एक पत्रकार तिल-तिल मर रहा होता है और बड़े महानगरों से आनेवाले संपादक और वरीय संवाददाताओं को दल उनका शोषण करने से नहीं चूकता? कैसे एक ईमानदार पत्रकार जो पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान एक आदर्श को लेकर आगे की ओर बढ़ता है, पर जैसे ही सच्चाई से भेंट होती है, तो उसके आदर्श एक – एक कर धूल – धूसरित होते जाते है? इस पुस्तक में एक पत्रकार के माता-पिता का दर्द तो दिखेगा ही, साथ ही उसकी आदर्श पत्नी का दर्द भी महसूस होगा कि वह कैसे अपने पति को ढाढ़स बंधाती है।
संजय के एक मित्र सजल जिसकी पत्नी मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती है, जिसकी छोटी बेटी वसुंधरा है, फिर भी वह पत्रकारिता कर रहा है, अपने उसूलों से समझौता नहीं कर रहा, अपनी बीमार पत्नी को भी देख रहा है, छोटी बिटिया को भी संभाल रहा है, साथ ही पत्रकारिता का धर्म भी निर्वहण कर रहा है, पर उसके इस बलिदान को उसका संपादक नहीं समझ रहा, जब संपादक और अखबार की धज्जियां उड़ती है तो उसे संजय के मित्र सजल की याद आती है...
कमाल है, पत्रकारिता के आदर्श एक – एक कर धूल धूसरित हो रहे है, और उस धूल – धूसरित हो रही व्यवस्था को प्रणाम कर दोनों संजय और सजल आज एक अच्छे मुकाम पर है, सजल की बेटी वसुंधरा तो आईएएस आफिसर है, पर अंजन आज भी पत्रकारिता कर रहा है और उसे तिल-तिल मरना पड़ रहा है, वह जलील भी हो रहा है, जिसके लिए वह सब कुछ लूटा रहा है, वह उसे समझने को तैयार नहीं है...
जरा इसके संवाद देखिये...
संजय के पिताजी का ये कहना – ये सब जिंदगी का एक हिस्सा है। गिरना – उठना लगा रहता है, इससे विचलित और हताश होने के बजाय तुम्हें शिक्षा लेनी चाहिए।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – अगर आप सही हैं तो गुस्सा होने की जरुरत नहीं और यदि गलत हैं तो गुस्सा होने का हक नहीं है।
ईमानदार और मेहनती लोग पत्रकारिता में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकते हैं।
मेरे विचार से, जो युवा पत्रकारिता को अपना लक्ष्य बनाकर चलना चाहते है, कम से कम वे यह पुस्तक अवश्य पढ़े, ये पुस्तक उनके लिए मार्गदर्शक का काम करेगा।
और
जो पत्रकारिता क्षेत्र में हैं, उनके लिए भी यह पुस्तक कम उपयोगी नहीं, उनके लिए तो यह पुस्तक हर प्रकार के रोगों के लिए रामबाण है...
सचमुच शक्तिव्रत और संजीव शेखर जी आपको इस पुस्तक के लिए साधुवाद...

Friday, January 27, 2017

और एक-एक कर सभी नंगे हो गये...............

और एक-एक कर सभी नंगे हो गये...
ये हैं रांची के पत्रकार,
देखिये क्या कर रहे है?
ये एक निकृष्ट बैग के लिए हाय तौबा मचा रहे हैं...
मामूली बैग, जिसकी बाजार में कीमत सौ-दो सौ से ज्यादा कुछ भी नहीं...
फिर भी मुफ्त के बैग में आनन्द की प्राप्ति होती है, इसलिए वे एक मामूली बैग को लेने के लिए लूच्चे व भिखारी की तरह हरकते कर रहे हैं...
जिन्हें बैग इन पत्रकारों को देना है, वे आराम से दूर से यह दृश्य देखकर, मुस्कुरा रहे है...
शायद वे इसलिए मुस्कुरा रहे है, कि जो काम कोई नहीं कर सका, इन्होंने कर दिया...
यानी उधर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 23 जनवरी को विधानसभा में झारखण्ड का बजट पेश किया और इधर आइपीआरडी ने पूरे विधानसभा में रांची के सभी बड़े प्रतिष्ठानों के अखबारों और चैनलों के पत्रकारों को लूच्चा व भिखारी करार दिया...
ये किसने किया, हम आपको बताते है, ये सारा श्रेय जाता है, आइपीआरडी के निदेशक राजीव लोचन बख्शी को, जिसकी खुराफाती दिमाग ने ये सारा कार्य कर दिया...
मैं पूछता हूं कि जब दीवाली में सारे पत्रकारों को मिठाई का डिब्बा, ये आइपीआरडी आराम से उनके घर तक पहुंचाता है, तो क्या यह एक मामूली बैग, जिसके लिए विधानसभा में पत्रकार भिखारियो की तरह हरकतें कर रहे हैं, उनके घर तक नहीं पहुंचा सकता था...
मेरा उत्तर है, पहुंचा सकता था, पर इसने ऐसा नहीं किया,
क्योंकि आइपीआरडी के निदेशक राजीव लोचन बख्शी को, तो विधानसभा में पत्रकारों को नंगा करना था, उसने कर दिया और पत्रकार नंगे हो गये, जरा देखिये नीचे में एक फोटो, जिसमें आइपीआरडी का निदेशक राजीव लोचन बख्शी, कैसे पत्रकारों के इस बेशर्मी वाली हरकतों को देखकर मुस्कुरा रहा है...
कमाल
है, सब की इज्जत की मिट्टी पलीद करनेवाले ये अखबार और चैनलवाले अपनी इस गंदी हरकतों को न तो छापे और न ही दिखाया, शायद उन्हें लगा कि छापेंगे और दिखायेंगे तो उनकी इज्जत चली जायेगी, अरे तुम्हारी इज्जत है कहां कि जायेगी, जनता तो तुम्हें खूब अच्छी तरह जानती है कि तुम क्या हो?

अखबारों और चैनलों के होठ सील गये हैं..................

अखबारों और चैनलों के होठ सील गये हैं...
वरीय अधिकारियों के दल ने विज्ञापन का ऐसा लालच दिखाया है कि ये अखबार और चैनलवाले आम जनता के सामने नंगे हो गये है, फिर भी बेशर्म की तरह सीना तानकर खड़े है और कह रहे है कि हम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ है, जबकि सच्चाई यह है कि ये इंसानियत के नाम पर कलंक है...
आपको मालूम होगा कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत दो बेटियों ने यहां हो रहे गलत कार्यों का विरोध किया, उनका कहना था कि मुख्यमंत्री जनंसवाद केन्द्र में कार्यरत महिलाओं के साथ अपमानजनक व्यवहार होता है, इन दोनों बेटियों ने इसकी जानकारी राज्य महिला आयोग के अध्यक्ष को पत्र के माध्यम से दी, साथ ही इसकी प्रतिलिपि भारत के प्रधानमंत्री, झारखण्ड की राज्यपाल, झारखण्ड के मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय महिला आयोग, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव और सचिव को भेजी।
पर सवाल यह है कि जब यहां राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष ही नहीं तो इन बेटियों के पत्र का संज्ञान कौन लेगा? हद हो गयी, क्या इस सरकार के पास, या इस राज्य में एक भी योग्य महिला नहीं, जो राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बन सकें। ऐसे में महिलाओं की समस्याओं का हल कौन निकालेगा? क्या ऐसे में उनलोगों का मनोबल नहीं बढ़ेगा, जो महिलाओं का अपमान करते है या उनके साथ दुर्व्यवहार करते है।
कमाल है, यहां संयोग देखिये महिला राज्यपाल है, वह महिला राज्यपाल जो बेटियों की समस्याओं को लेकर सजग है, पर वे इस मामले में सजग नहीं दिखी, जबकि इन बेटियों ने उनका भी दरवाजा खटखटाया, पर न्याय नहीं मिला... इन बेटियों ने स्वयं द्वारा लिखे पत्र की एक प्रतिलिपि राजभवन में भी दी... कमाल है राजभवन के वरीय अधिकारियों का दल जिस सूचना भवन में बैठता है, उसी के ठीक नीचे चलता है, मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र, फिर भी उसे न्याय नहीं मिलता...
गजब स्थिति है...राज्य की...
गलत करनेवाले मस्त और सहीं करनेवाले पस्त...
किसी ने ठीक ही कहा है कि जहां की सरकार हाथी उड़ाने में मस्त हो,
वहां, उसके पास वक्त कहां कि जो बेटियों को न्याय दिला सकें...
जरा देखिये...
मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र के हाल...
क. नियोक्ता लड़कियों को नियुक्ति पत्र नहीं देता, पर निलंबन पत्र अवश्य थमा देता है...
ख. उसने आंतरिक शिकायत समिति का गठन ही नहीं किया, जबकि ये ज्यादा जरुरी है, वह भी तब जहां बड़ी संख्या में लड़किया कार्यरत हो...
ग. श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन करता है, एक ही कार्य के लिए समान वेतन नहीं, बल्कि वेतन में भी असमानता है...
घ. राज्य सरकार बतायें कि यहां कार्यरत बड़ी संख्या में महिलाओं की सुरक्षा के लिए क्या विशेष व्यवस्था की है?
ऐसे कई प्रश्न है, जिसका जवाब न तो राज्य सरकार के पास है और न ही मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र चलानेवालों के पास...
यहां कार्य करनेवाले वरीय अधिकारियों का दल बहुत सारी बातें, इस शर्त पर बताता कि उनका नाम न प्रकाशित किया जाय...
वह कहता है कि
यह विभाग उसी दिन डूब गया था, जब ये विभाग सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से आइटी विभाग को दे दिया गया...
आइटी विभाग में जाते ही मनमानी शुरु हुई, महिलाओँ के साथ अपमान और दुर्व्यवहार का सिलसिला शुरू हुआ...
आइटी विभाग के वरीय अधिकारी यहां तक कि सचिव भी अपने कनीय अधिकारियों के साथ सही व्यवहार नहीं करते, जिसका परिणाम सामने है...
मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र के अधिकारियों का मनमाना रवैया...
और दोषपूर्ण कार्यप्रणाली का प्रमाण है ये सब दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं...
नाम का है, 181... ऐसी बहुत सारी शिकायतें है, जिसका हल न तो मुख्यमंत्री निकाल पाये और न ही अधिकारी, जबकि शिकायतकर्ता मारे- मारे फिर रहे है...
ऐसा मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र रहे या न रहे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता...
आम जनता को इससे कोई राहत नहीं...
कुल मिलाकर मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र चूं – चूं का मुरब्बा बन गया है...
राज्य की स्थिति ऐसी है कि
मूर्ख और चाटूकार – उपदेशक और सलाहकार बन रहे है...
और ईमानदार, अपनी इज्जत बचाने में ही ज्यादा समय बीता रहे है...
ऐसे में इन बेटियों को, राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास से या मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र से न्याय मिलेगा, इसकी संभावना कम ही दीखती है...
फिर भी निराश होने की जरुरत नहीं,
संघर्ष तो रंग लाता ही है...

धिक्कार रांची की मीडिया और मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र को ...............

धिक्कार...
रांची की मीडिया को जिन्होंने रांची की बेटियों की आवाज सुनने से इनकार कर दिया...
धिक्कार उस सरकार को जिसे पता ही नहीं कि उनकी बेटियों के संग उन्हीं के नाक के नीचे क्या हो रहा है...
रांची स्थित सूचना भवन में चल रहे मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिलाकर्मियों ने राज्य महिला आयोग को पत्र लिखा है कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत वरीय अधिकारियों एवं नियोक्ता के द्वारा उनके साथ बराबर दुर्व्यवहार किया जाता है, अपमानित किया जाता है... इन महिलाकर्मियों ने उक्त पत्र की प्रतिलिपि राष्ट्रीय महिला आयोग नई दिल्ली, प्रधानमंत्री भारत सरकार, मुख्यमंत्री झारखण्ड, राज्यपाल झारखण्ड, मुख्य न्यायाधीश झारखण्ड, मंत्री महिला एवं बाल विकास, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव और सचिव को भी भेजा है... इन महिलाकर्मियों ने अपने पत्र में लिखा है कि...
क. मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र के वरीय अधिकारियों और नियोक्ता का व्यवहार अपने महिला संवादकर्मियों के प्रति बेहद आपत्तिजनक और अशोभनीय होता है।
ख. यहां कार्यरत वरीय अधिकारियों के करतूतों से अखबार के पन्ने रंगे हुए है, पर इन वरीय अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, उदाहरणस्वरुप रांची के सुखदेवनगर थाने में इसी मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत एक महिलाकर्मी द्वारा दर्ज करायी गयी वह प्राथमिकी है, जिसकी सुनवाई भी नहीं हुई और मामले को रफा-दफा करते हुए जिस लड़की ने एफआईआर दर्ज कराया था, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
ग. जब भी कोई महिलाकर्मी बाथ रुम जाती है, तो उसका पीछा किया जाता है, उनके साथ ऐसी हरकतें की जाती है, जिसका उल्लेख वो इस पत्र में नहीं कर सकती।
घ. यहां के नियोक्ता द्वारा बराबर सामूहिक स्तर पर महिला संवादकर्मियों को अपमानित व प्रताड़ित किया जाता है।
ड. एक ही कार्य के लिए नियुक्त कई महिला संवाद कर्मियों को चेहरे देखकर वेतन का भुगतान किया जाता है, जिसमें किसी को पांच तो किसी को दस हजार वेतन भुगतान किया जाता है।
च. दो वर्ष हो गये पर किसी को भी नियुक्ति पत्र नहीं दी गयी।
छ. हाल ही में एक सप्ताह पूर्व बिना किसी सूचना के संवादकर्मियों का परीक्षा लिया गया, क्या बतायेंगे कि नियोक्ता ने यह परीक्षा किसके कहने पर और क्यों ली?
ज. भारत सरकार का आदेश है, जहां बड़ी संख्या में लड़कियों या महिलाओं का समूह कार्य करता है, वहां आंतरिक शिकायत समिति का होना जरुरी है, जिसका अध्यक्ष वहां कार्यरत वरीय महिलाकर्मी को बनाये जाने का प्रावधान है, पर आज तक सूचना भवन में मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में जहां बड़ी संख्या में लड़कियां कार्य करती है, वहां आंतरिक शिकायत समिति का गठन क्यों नहीं हुआ? ऐसे में लड़कियां किससे शिकायत करेंगी?
और अब सवाल सीधे मुख्यमंत्री रघुवर दास से...
मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, क्या आपको याद है कि जब ३ मई २०१६ को रांची के सूचना भवन में जब मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की पहली वर्षगांठ मनायी जा रही थी, तब जिन लड़कियों ने आपको मिठाई खिलाई थी, जिन्हें आपने शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया था, वह मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में आपके इस सम्मान देने के बाद एक महीने भी क्यों नहीं टिक पाई?
क्या आपको याद है कि आपके सचिव सुनील कुमार बर्णवाल ने यहीं पर कार्यरत प्रियंका पल्लवी के बारे में उस दिन आपके समक्ष क्या कहा था? मैं बता देता हूं, उन्होंने कहा था कि ये लड़की बहुत अच्छा काम कर रही है, फिर भी ऐसा क्या हुआ कि उस प्रियंका पल्लवी को एक महीने के अंदर ही बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया गया। हमारे पास एक से एक प्रमाण है, जो बताने के लिए काफी है कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, पर आपके अधिकारी इन सारी हरकतों से आंखें मूंदे है, मैं पूछता हूं, आखिर क्यों?
मेरे पास कई प्रमाण है, आइये दिखाता हूं मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की हरकतें। आप कहते कि ७० प्रतिशत शिकायतों का निष्पादन हो गया, यह सफेद झूठ के सिवा दूसरा कुछ भी नहीं... आकड़ें बिठाकर, दिखाने में आप जो आगे निकलने की कोशिश कर रहे है, वो सहीं नहीं है, सच्चाई कुछ और ही है, ये आंकड़े कैसे बैठाये जा रहे है, वो हम जानते है... अगर ये लड़कियां कह रही है कि आंतरिक शिकायत समिति का गठन अब तक क्यों नहीं की गयी तो गलत क्या है? फिर भी आप कहेंगे कि आंतरिक शिकायत समिति का गठन किया गया है, तो मैं आपसे पूछता हूं कि उस महिला का नाम बताइये जो इसका अध्यक्ष बनी और अगर अध्यक्ष बनी है तो कब बनाई गयी?
यहीं नहीं आप जो श्रम कानूनों के सरलीकरण का ढिंढोरा पीटते है कि यहां श्रम सुधारों में झारखण्ड विश्व बैंक के मानकों के आधार पर प्रथम स्थान पर है तो आप ही बताइये कि आप ही के देखरेख में चलनेवाले मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिला संवादकर्मियों को अब तक नियुक्ति पत्र क्यों नहीं मिला?
एक तरह से देखा जाये तो इसके लिए आप भी दोषी है... ये अलग बात है कि आपके खिलाफ कोई नहीं बोलता और वह भी सिर्फ इसलिए कि जो लोग गलत कर रहे है, वे आपसे अनुप्राणित है, अनुप्राणित होनेवाले वे सारे लोग है जो किसी न किसी रुप से आपसे कुछ न कुछ प्राप्त कर रहे है, चाहे प्रत्यक्ष रुप से या अप्रत्यक्ष रुप से। जरा देखिये, यहां के मीडिया को चाहे वह प्रिट हो या इलेक्ट्रानिक मीड़िया, सभी इस समाचार को खा-पका गये, क्योंकि मामला मुख्यमंत्री से जुड़ा है, क्योंकि मामला विज्ञापन से जुड़ा है, क्योंकि मामला मुख्यमंत्री से पत्रकारों के मधुर संबंधों का है... और ये हरकतें राज्य के लिए शर्मनाक है... अरे जब बेटियां मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में अपमानित महसूस कर रही है तो अन्य जगहों पर इन बेटियों का क्या होता होगा, समझने की जरुरत है, अरे जब मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिलाओं-बेटियों को सम्मान नहीं, तो हम ये कैसे समझ लें कि बुटी में जिस लड़की की दुष्कर्म के बाद नृशंस हत्या हुई, उसके अपराधियों को पकड़ने में रांची पुलिस सफल हो जायेगी। अरे ये तो सीबीआई को जैसे ही मामला दिया गया, उसी दिन पता चल गया कि यहां की सरकार कैसे और किस प्रकार शासन कर रही है? फिर भी, इतना होने के बावजूद, उन दो लड़कियों को सलाम, जिसने मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में हो रहे गड़बड़ियों पर समाज का ध्यान आकृष्ट कराया और अपनी बातें हर जगह पहुंचाने की कोशिश की... ये अलग बात है कि रांची से प्रकाशित करीब सारे अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इनकी आवाज अनसुनी कर दी... इन लड़कियों की आवाज को वे जगह देंगे भी कैसे, जो स्वयं भ्रष्टाचार की गंगोत्री में स्नान कर रहे है, वे क्या किसी की मदद करेंगे?

Friday, January 13, 2017

ये “दंगल” बहुत कुछ कह रहा है..............

ये “दंगल” बहुत कुछ कह रहा है...
कह रहा है – अब अच्छी फिल्मों के दौर फिर से शुरु होंगे। “नदिया के पार”, “हम आपके है कौन” के बाद जो रिक्तिता आ गयी थी, वो अब खत्म होनेवाला है। हमारे देश में एक प्रकार का दौर चलता है। कोई फिल्म जो सुपरहिट होती है, उसके सुपर हिट होने के बाद, ठीक उसी प्रकार की फिल्म बननी शुरु हो जाती है, अगर ऐसा होता है तो देशहित व समाजहित में एक प्रकार से क्रांति संभव है। बहुत दिनों के बाद “दंगल” फिल्म देखने को मिली, जिसे देखने के लिए पूरा समाज विभिन्न मल्टीप्लेक्सों व छविगृहों के चक्कर लगा रहा है। फिल्म टैक्स फ्री नहीं है, फिर भी इसे देखनेवालों की भीड़ खूब यहां दिखाई पड़ रही है। हाल ही में क्रिकेटर धौनी को केन्द्र में रखकर एक और फिल्म बनी थी – “धौनी – ए अनटोल्डस स्टोरी” और अब एक और फिल्म जल्द ही देखने को मिलेगी जो सचिन तेंदुलकर के जीवन पर आधारित है। फिल्म का नाम है - “ए बिलियन ड्रीम्स”। सचमुच अगर ऐसी फिल्म बननी शुरु हुई तो समाज पर उसका असर पड़ना तय है, क्योंकि फिल्मों का हमारे जीवन पर असर खूब पड़ता है... और अब हम बात कर रहे है, फिल्म “दंगल” की। आखिर “दंगल” में क्या है? कुछ दिन पूर्व सायं समय जयपुर की वरिष्ठ पत्रकार मोनालिसा ने मेरे मोबाइल पर फोन किया। सर, आपकी बहुत याद आ रही है। मैंने पूछा – क्यों? तब उसने कहा कि सर मैंने अभी फिल्म दंगल देखी है। उस फिल्म में जैसे एक पिता ने अपनी दोनों बेटियों को बेहतर बनाने के लिए दुनिया से लड़ाइयां लड़ी, ठीक उसी प्रकार आप हमें बेहतर बनाने के लिए लोगों से लड़ जाया करते। मोनालिसा का ये कहना था कि मैंने सोचा कि मुझे यह फिल्म देखनी चाहिए, तभी मेरे बेटे सुधांशु ने नई दिल्ली से मेरे और अपनी मां के लिए ऑनलाइन टिकट बुक कर दी और मैं एक जनवरी को ग्लिट्ज में पिक्चर देखने के लिए पहुंचा। पूरी फिल्म देखने के बाद, हमारे मुख से वाह निकल गयी। क्या नहीं था – इस फिल्म में। इस फिल्म ने बताया है कि एक पिता को अपने सपनों को पूरा करने के लिए किस प्रकार की योजना बनानी चाहिए।
इस फिल्म ने बताया कि ईश्वर सबको मौका देता है, बस उस मौके को लाखों में कोई एक ही पहचान पाता है। इस फिल्म ने बताया है कि मिथक तोड़िये कि जो काम बेटे कर सकते है, वे बेटियां नहीं कर सकती। इस फिल्म ने बताया है कि एक बेहतरीन फिल्मों से भी अच्छी कमाई की जा सकती है। बशर्ते कि बेहतरीन फिल्म, समाज को सुदृढ़ करने, सशक्त करने, संदेश देने के लिए बनाये जाये। इस फिल्म ने बताया है कि राष्ट्रभक्ति क्या है? याद करिये, फिल्म समाप्त हो रहा है, फिल्म अभिनेता आमिर खान कमरे में बंद है, राष्ट्रीय धुन बज रहा है, कानों तक वह धुन पहुंची है, बड़ी शान से खड़ा होकर वे राष्ट्रीय धुन को सम्मान दे रहे है, और उन्हीं के साथ फिल्म देख रहे, सारे लोग उनके साथ खड़े हो जाते है, यहां सारी जातियां व धर्म दोनों समान रूप से राष्ट्रीय धुन के सम्मान में खड़े हो रहे है...
अगर फिल्में ऐसी बनेंगी तो देश बनेगा, समाज बनेगा... खुशी इस बात की है, अब ऐसी फिल्मों के बनने का दौर शुरु हो रहा है। जल्द ही सचिन की “ए बिलियन ड्रीम्स” आयेगी। लोग देखने जायेंगे। चरित्र और संस्कार का सुंदर समन्वय इन फिल्मों में देखने को मिलेगा। अपना देश मजबूत होगा... और क्या चाहिए हमें। आमिर खान और उनकी पूरी टीम, जिन्होंने “दंगल” बनायी, उनकी प्रशंसा होनी चाहिए। इस फिल्म के माध्यम से एक संदेश उन फिल्म निर्माताओं को भी मिला है, जो ये कहते है कि अब अच्छी फिल्में लोग देखना नहीं चाहते है। उनके लिए एक ही जवाब – गर फिल्म अच्छा बनाओगे तो लोग देखेंगे... उसका प्रचार आम जनता स्वयं करेगी... जरा देखो, आमिर खान ने अपनी बहुत सारी फिल्मों को खूब प्रचार – प्रसार किया है, पर “दंगल” का प्रचार तो आम जनता ने खुद ही शुरु कर दिया, जो भी देख रहा है, वो अपने लोगों को कह रहा है कि आप “दंगल” देखिये और अपनी बेटियों से प्यार करिये, साथ ही एक बेहतर पिता भी बनिये, ठीक “दंगल” वाले आमिर खान जैसा...

Monday, January 9, 2017

खादी मेला और वो 4000 रुपये............

खादी मेला समाप्त हो चुका है। कल ही समापन के दिन, मैं और अरुण श्रीवास्तव मेला का परिभ्रमण करने पहुंचा। परिभ्रमण के दौरान पाया कि मेले के अंतिम दिन भारी भीड़ थी। लाखों की संख्या में लोग अपने परिवार के साथ मेले का आनन्द लेने पहुंचे थे। मेरी धर्मपत्नी भी कहीं थी कि खादी मेला मैं भी देखना चाहती हूं, पर समयाभाव के कारण मैं उन्हें मेला नहीं दिखा सका। मेले में खरीदार से लेकर दुकानदार तक प्रसन्न दीखे। अच्छी कारोबार हुई, सुनने को मिला। नोटबंदी का असर इस मेले में न के बराबर दिखा। आयोजकों ने अच्छी व्यवस्था की थी, जिस कारण यहां कहीं कोई दिक्कत किसी को नहीं हुई। इसके लिए सचमुच संजय सेठ की टीम बधाई के पात्र है। बधाई दीपंकर पांडा को भी क्योंकि इनकी भी भूमिका सराहनीय ही रही।
खादी मेला घूम ही रहा था कि एक दृश्य मेरे सामने से घूम गई। यह दृश्य था, जब मैं ईटीवी छोड़ने के बाद मौर्य से जुड़ा था और पांच महीने में ही मौर्य से नाता तोड़कर घर में बैठ गया था। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। उस वक्त छोटा बेटा हिमांशु मारवाड़ी कॉलेज का छात्र था और नाट्य विधा से जुड़ा था। खादी मेले में शतरूपा नाटक करने के लिए दिल्ली से टीम आई थी। शतरूपा नाटक में भाग लेने के लिए स्थानीय कलाकारों को भी शामिल किया गया था, जिसमें गीत तथा नाटक प्रभाग की रांची टीम नें मुख्य भूमिका निभाई थी। शतरूपा नाटक में हिमांशु को दिल्ली से आई टीम ने कहा था कि उसमें उसे कुछ लीड रोल देंगे, पर उसे लीड रोल नहीं मिली। उसे लीड रोल नहीं मिली उसका मूल कारण भ्रष्टाचार था, जिसे लेकर हिमांशु ने प्रतिवाद भी किया था, और उसकी दिलचस्प कहानी उसने हमें बतायी थी। अंततः उसे सामान्य रोल में ही जगह मिली, पर हिमांशु ने सिद्ध किया कि उसे लीड रोल मिले या न मिले, पर वह अपनी भूमिका से नाटक देखनेवालों को अपनी ओर खीचने में जरुर कामयाब होगा।
तभी गांधी के नमक सत्याग्रह के आंदोलन का नाटक का मंचन होना था, हिमांशु को उसमें सामान्य सत्याग्रही का रोल मिला, जो आंदोलन में शामिल था, उसने नेत्रहीन का रोल किया और अपने एक साथी को विकलांग के रुप में चलने को कहा, अंततः लोगों को नेत्रहीन हिमांशु का रोल इतना अच्छा लगा कि नाटक देख रहे मेरे बड़े बेटे सुधांशु ने खादी मेले से ही हमें फोन कर सूचित किया कि पापा जी, हिमांशु तो बहुत अच्छा रोल किया है, दर्शक दीर्घा में लोग उसकी खूब तारीफ कर रहे है। दूसरे दिन अखबारों में उसके फोटो भी छपे, देखकर अतिप्रसन्नता हुई।
इसी बीच कुछ और उसे छोटे रोल मिले। तबियत खराब थी, वह खूले आकाश के नीचे अपने छोटे-छोटे रोल को ईमानदारी से मंचित करने में लगा था। मैं एक बार उसकी नाटक देखने भी गया, उसे छोटे से बौद्धभिक्षु के रोल में देखकर, हमें अच्छा लगा। मैंने कहा था कि रोल कोई भी छोटा नहीं होता, अगर वह ईमानदारी से किया जाय। खादी मेला का समापन हो चुका था, दूसरे दिन उसे चार हजार रुपये नाटक में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए मिले थे। वह चार हजार रुपये लेकर दौड़ता हुआ आया और कहा कि पापा जी ये चार हजार रुपये आपके। वो चार हजार रुपये हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण थे, वो सिर्फ मैं और मेरा बेटा हिमांशु और सुधांशु ही जानता था, दूसरा कोई नहीं...
मोरहाबादी में जब – जब खादी मेला लगता है, मुझे ये परिदृश्य स्वतः नजर आते है, शायद याद दिलाते है, मेरे छोटे से बेटे की उस दृढ़इच्छा शक्ति की, अभिनय के प्रति सम्मान की, साथ ही पितृभक्ति की...

Saturday, January 7, 2017

भला हाथी भी कहीं उड़ता है.......

ये हाथी कभी नहीं उड़ेगा, चाहे धौनी जितना भी उड़ाने का प्रचार क्यों न कर लें... धौनी चाहे जिस भी मिट्टी के बने हो, पर हमारा हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की महक के रुप में जाना जानेवाला झारखण्ड अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं जानता और न ही ऐसे सपने देखता है, जो सपने कभी पूरे ही न हो...
झारखण्ड बढ़ेगा, अवश्य बढ़ेगा पर पंखों वाला हाथी से नहीं, बल्कि झारखण्ड के करोड़ों मेहनतकश-मजदूरों और उनके मजबूत इरादों और बुलंद हौसलों से... न कि परछाइयों के शहरों में रहनेवालों से...
धौनी कल क्रिकेट खेलते थे, बाद में विज्ञापनों से खेलने लगे, एक मोटरसाइकिल का प्रचार करते थे, कहते थे मैं तो दूध पीता हूं, ये तो कुछ भी नहीं पीता, फिर भी दौड़ता रहता है... बाद में हमारे धौनी दारु का भी प्रचार करने लगे, उस दारु का, जिसका प्रचार आज तक क्रिकेट के भगवान माने जानेवाले भारत रत्न सचिन तेंदुलकर ने नहीं किया...
ऐसे धौनी को राज्य सरकार ने मोमेंटम झारखण्ड का ब्रांड एंबेसडर बनाया है, इसका फायदा राज्य सरकार को कितना मिलेगा, ये तो वक्त बतायेगा, पर राज्य को नुकसान होना तय है... हम तो एक ही बात जानते है, कि गांधी ने ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना की थी... बार-बार गांधी की बात करनेवाली सरकार, उनके 150 वीं जयंती पर स्वच्छता अभियान की बात करनेवाली सरकार, उनके मूल वक्तव्य ग्राम स्वराज्य से भटक रही है और जिन विदेशियों को गांधी ने देश से बाहर किया, उन विदेशियों को पुनः भारत में लाने का हर प्रकार का नौटंकी कर रही है... जिसमें केन्द्र से लेकर राज्य सरकार भी शामिल है... संघ जिसकी राजनीतिक इकाई भाजपा है, वह भी इस हथकंडे से तौबा करती है, और ग्राम स्वराज्य-स्वदेशी की परिकल्पना को साकार करने की बात करती है, पर इन सबसे दूर, राज्य और केन्द्र सरकार ने पूंजी निवेश के नये तरीके ईजाद कर स्थिति ऐसी कर दी है जैसे लगता है कि बिना पूंजी निवेश के राज्य व देश आगे बढ़ ही नहीं सकता...
क्या ऐसे हालात में आप धौनी के इस अपील को स्वीकार करेंगे कि - " ये हाथी उड़ेगा, और झारखण्ड इंडिया का नंबर वन इंवेस्टमेंट डेस्टिनेशन बनेगा। अब सवाल ये है क्या आप हमारे साथ होंगे?" मैं तो भाई, साफ-साफ कह देता हूं कि धौनी के इस बयान के साथ मैं तो नहीं हूं, क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि हाथी उड़ता नहीं है...

Friday, January 6, 2017

सभी को मेरा प्रणाम स्वीकार हो..........

4 जनवरी 2017 को मैंने फेसबुक पर अपना स्टेटस डाला -
“आज मेरा सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में अंतिम दिन है...सभी को मेरा प्रणाम स्वीकार हो...”
जिसे हमारे फेसबुक के मित्रों ने जिनकी संख्या 251 है, अब तक लाइक किया है, इनमें आठ दुखी है, जबकि दो परमानन्दित है, कई लोगों ने अपने कमेंट्स में हमसे इस संबंध में सवाल पूछे है, कई ने अपनी भावनाओं को नाना प्रकार से हमारे समक्ष रखा है। कुछ लोगों ने हमारे मोबाइल पर हमसे पूछ डाला कि आखिर ऐसा क्यूं?, आज भी कुछ लोग हमसे मिलने आये, कि आखिर क्यूं?, हमें लगता कि हमें सभी के प्रश्नों का जवाब दे देना चाहिए, इसलिए सर्वप्रथम हम उन सभी महानुभावों का हृदय से आभार प्रकट करते है, जिन्होंने हमसे सवाल किये...
और अब सवाल का जवाब...
उत्तर दीर्घउत्तरीय है, इसलिए ध्यान से पढ़े...
ऐसे तो हमें कोई बांध कर नहीं रख सकता, सिवाय ईश्वर के...
मैं ईश्वर का गुलाम हूं, वो मुझे जहां चाहे, वहां रखे...
ऐसे भी मैं इस दुनिया में उसी के द्वारा भेजा गया हूं, इसलिए हमारा ख्याल उसे ही रखना होगा...
मैं उससे झगड़ भी नहीं सकता कि वो हमें ऐसा क्यों बनाया कि मैं ज्यादा दिनों तक कहीं टिकता ही नहीं...
अगर मैं कहीं ज्यादा टिका हूं, तो वह है ईटीवी जहां करीब पौने नौ साल कार्य किये, वह भी गुंजन सिन्हा जैसे लोगों के कारण, हालांकि उनसे भी हमारी जबर्दस्त मुठभेड़ उस दौरान हुई, और मुठभेड़ कराने में वे लोग उस दिन ज्यादा सक्रिय थे, जिन्हें हमें रांची में दीखने में बहुत ज्यादा कष्ट होता था, हालांकि इसका लाभ उन्होंने उठाया...
इसके पूर्व दैनिक जागरण में धनबाद व मोतिहारी में भी योगदान दिया था, दैनिक जागरण में मात्र डेढ़ साल रहा, वहां हमें पत्रकारिता का गूढ़ रहस्य देखने को मिला, सारी पत्रकारिता संबंधी भ्रांतियां और तथाकथित मूल्य पहली बार वहीं धूल-धूसरित दीखे...
इसके पूर्व अनुमंडलीय संवाददाता के रूप में थोड़े दिन प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, आर्यावर्त, आज और इसके पूर्व आकाशवाणी पटना में आकस्मिक उद्घोषक के रुप में भी योगदान दिया...
इधर ईटीवी छोड़ने के बाद मौर्य टीवी से जुड़ा, जहां मात्र पांच महीने ही रहा, जहां पत्रकारिता जगत के महान विभूतियों की लीलाएं देखी। बाद में न्यूज 11, कशिश, जीटीवी, न्यूज इंडिया से भी जूड़ा और यहां भी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सका।
शायद यहीं कारण रहा कि धनबाद के एक अनन्य मित्र हरि प्रकाश लाटा जी ने लिखा कि “हम सोच रहे थे इस बार तो आपका रिकार्ड टूटेगा। आप यहां टिकेंगे। आपके पैरों के एड़ी के आसपास कोई तिल है क्या? जरा देखिएगा तो। हमारी शुभकामनाएँ। वैसे भी ईश्वर की तो असीम कृपा है आप पर !”
जो लोग मुझे जानते है, सो जानते है, कुछ लोग जो हमें जानने का दिखावा भी करते है, और जब उनके म्यानों में नहीं फिट बैठता हूं तो फिर वो अपने ढंग से हमें एवार्ड दे देते है, मुझे इसकी परवाह भी नहीं होती, क्योंकि मैं जो भी कुछ बोलता हूं, करता हूं...डंके की चोट पर बोलता हूं व करता हूं...
क्योंकि मुझे न तो कल सुख की लालसा थी और न आज ही है...
मुझे अपने ईश्वर पर पूरा भरोसा है, वो मुझे हर अवस्था में जो मुझे चाहिए, इतनी व्यस्तताओं के बावजूद हम तक पहुंचा देता है...
और अब बात आइपीआरडी की...
19 जून 2015 को मैं घर पर बैठा था कि आइपीआरडी के निदेशक अवधेश कुमार पांडेय जी का फोन आया, कि एक किताब तैयार करनी है, राज्य सरकार के लिए। उसमें मैं सहयोग करूं। अवधेश कुमार पांडेय जी हमको पटना से जानते थे, जब मैं वहां अनुमंडलीय संवाददाता के रूप में कार्य करता था। चूंकि मैं घर पर बैठा था, आइपीआरडी आकर उनसे मिला। किताब तैयार हो गयी। इसी बीच उन्हें एक व्यक्ति की तलाश थी, कि जो सरकार के विज्ञापनों और सरकार के कई क्रियाकलापों को जन-जन तक पहुंचाने में संचार के विभिन्न आयामों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें। उसमें मैंने ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाई, पर जैसे-जैसे दिन बीतते गये, मैं कई लोगों को खटकने लगा। कई लोगों ने हमारी झूठी शिकायत मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके आस-पास रहनेवाले महानुभावों को विभिन्न तरीकों से पहुंचाई। उन्होंने हमारे ब्लॉग और फेसबुक में सरकार के विरूद्ध लिखी गई बातों का हवाला दिया। इनमें मुख्य भूमिका आईपीआरडी के असंतुष्ट अधिकारियों की भी थी, जो काम तो कुछ नहीं किया करते पर शिकायत का पुलिंदा लेकर मुख्यमंत्री आवासीय सचिवालय में कार्यरत सीएम के खास लोगों तक जरूर पहुंचाते।
जिसके कारण मुझे 5 जनवरी 2016 को मुख्यमंत्री सचिवालय तलब किया गया। जहां मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी, कि मैं अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता। इसी बीच मैं काम करता रहा, लोगों ने अपनी आदतें नहीं छोड़ी, वे अपना काम करते रहे, और मैं ईमानदारी से जो काम मिलता करता रहा।
आज मुझे गर्व है कि यहां मात्र डेढ़ साल में, ईश्वर ने मुझसे वह काम कराया, जिसका मुझे विश्वास ही नहीं था। ईश्वर ने हमसे बहुत ही शानदार कार्य कराये है, जो झारखण्ड के लिए मील का पत्थर साबित हो रही है... वो क्या है? इसके बारे में मैं कुछ भी लिखना, यहां नहीं चाहता, ये तो वक्त बतायेगा?
इसके लिए मैं आभारी हूं, निदेशक – अवधेश कुमार पांडेय जी का, जिन्होंने मुझसे इतना बढ़िया काम करा लिया।
अंततः चूंकि मुझे अवधेश कुमार पांडेय ने ही आइपीआरडी के लिए नियुक्त किया था। राज्य सरकार ने उनकी जगह अब राजीव लोचन बख्शी को नया निदेशक नियुक्त किया है, ऐसे में मुझे अब यहां रहना उचित नहीं लगता, क्योंकि मुझे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने तो रखा नहीं और नहीं उनके मातहत किसी ने मुझे आईपीआरडी के लिए नियुक्त किया है और नहीं कोई मेरे पास कोई ऐसा पत्र है, जिसके आधार पर मैं ये कह सकूं कि मैं आईपीआरडी का सदस्य हूं। इसलिये नीति कहती है कि अब मुझे यहां नहीं रहना चाहिए, और न ही रहूंगा। अब मैं पूर्णतः स्वतंत्र हूं।
अब मैं खुलकर लिखूंगा, जनहित में लिखूंगा...
किसी की परवाह नहीं...
देखते है, अब ईश्वर, मुझे कहां ले जाता है...
जहां भी ले जायेगा, मुझे उसकी हर आज्ञा मंजूर है, क्योंकि मैं आज जो भी हूं उसी की कृपा से तो हूं...

Saturday, December 31, 2016

नेकी कर दुनिया को दिखा............

पहले हमने पढ़ा था, सुना था, मेरे घर के बुढ़े-बुजूर्ग बताया करते थे...
नेकी कर दरिया में डाल...
इस लोकोक्ति के आधार पर वे कई कहानियां सुनाया करते थे, कहानियां सुनाने के क्रम में यह भी कहा करते थे, कि ईश्वर को आत्मप्रशंसा पसंद नहीं है, पर दुनिया इतनी तेजी से बदली कि अगर स्वयं की आत्मप्रशंसा न करें तो दुनिया जानेगी भी नहीं और न रोजी-रोटी ही मिलेगी...न धंधा चलेगा।
इसलिए अब नई लोकोक्ति पेश है...
नेकी कर दुनिया को दिखा...
जब से निजीकरण और प्राइवेटाइजेशन का जमाना आया, मनुष्य संसाधन के रूप में नजर आया, बायोडाटा की मांग होने लगी, इस बायोडाटा में कैंडिडेट जमकर अपनी प्रशंसा करने लगा, ऐसी प्रशंसा जिसका सत्य से कोई नाता ही न हो, चूंकि दुनिया को दिखाना है, अपनी काबिलियत और शोहरत दिखाना है, तो ऐसा करना ही पड़ेगा...
यहीं नहीं फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सअप ने तो नेकी कर दुनिया को दिखा कि प्रवृत्ति को ऐसा आगे बढ़ाया, जैसे लगा कि किसी ने आग में भर चम्मच घी दे दिया हो...आग और तेज होने लगी...
हमारे कई मित्र ऐसे है कि इसका खूब जमकर सहारा लेने लगे है...
पहले तो चिरकूट नेताओं, फिल्मी नायक-नायिकाओं, बकरों-खरहों-चूहों-कुत्तों, चिलगोजों-चिरकूटों के साथ अपना फोटो खिंचवाकर, सेल्फी लेकर फोटो डाला करते थे, अब तो ये और भी इससे आगे निकल चूके है, अब वे पोस्टर बनवाते है, बैनर बनवाते है और ऐसी-ऐसी हरकते करते है कि हरकते शब्द ही शरमां जाये।
उदाहरण अनेक है...
पहला उदाहरण देखिये, एक सज्जन है, नाम लिखूंगा तो भड़क जायेंगे, उन्हें भड़काना भी नहीं है, सत्ता के करीब है, सत्ता में शामिल बड़े-बड़े लोग उन्हें धन-धान्य से परिपूर्ण कर रहे है। उन्होंने एक बैनर बनवाया और लगे कंबल बांटने। जब ये कंबल बांट रहे थे, तो कुछ लोगों ने उन्हें धर्मपरायण और धार्मिक व उदार व्यक्ति का खिताब दे डाला, ये खिताब दे भी क्यूं नहीं भाई, जिसका जो चेहरा दिखेगा, वहीं तो कहेगा। झट से उनके मातहत काम कर रहे एक कर्मचारी ने तीन-चार सेल्फी ली और झट से फेसबुक पर दे मारा, लगे हाथों लाइक और कमेंट्स और शेयरों की होड़ लग गयी, चूंकि बॉस नाराज न हो, इसका ख्याल रखना था, कुछ लोगों ने वाह-वाह तक कर डाला।
ऐसे मैं बता दूं कि हमने 9 साल पहले कंबल लिया था, एक कंबल तो 16 साल पुराना है, पर अंतिम बार जो 9 साल पहले कंबल खरीदा था, उसके बाद से कंबल खरीदा नहीं हूं। ऐसे भी कंबल चार –पांच महीने ही ओढ़े जाते है, वह भी जाड़े में, पर इधर देख रहा हूं कि कंबल लेनेवाले और देनेवाले दोनों की संख्या बढ़ी है, पता नहीं ये कंबल लेनेवाले कैसे कंबल ओढ़ते है, कि इनकी कंबल एक साल भी नहीं टिक पाती और दूसरे कंबल देनेवाले पता नहीं, इसमें कौन सा धर्म देखते है कि कंबल बांट चलते है, शायद शनि ग्रह शांत करने और स्वयं को उदार-दयालु दिखाने का दूसरा आसान रास्ता इसके सिवा कोई दूसरा नहीं।
नेकी कर दुनिया को दिखा का दूसरा उदाहरण देखिये...
छः-सात महीने पहले की बात है, एक बार एक कार्यक्रम में मुझे शरीक होने का मौका मिला। जनाब जो बहुत ही दयालु किस्म के आदमी स्वयं को घोषित करा चुके थे, उन्होंने उक्त कार्यक्रम में अपने एक ड्राइवर को गाड़ी की चाबी देते हुए ये ऐलान किया कि वे अपने ड्राइवर को आज गाड़ी सौप रहे हैं। मैं बहुत प्रसन्न हुआ, खड़ा होकर ताली बजाने लगा, बहुत अभिभूत हुआ कि जनाब लाखों की गाड़ी अपने ड्राइवर को दे दी, पर पता चला कि वो नई गाड़ी नहीं दे रहे, बल्कि वर्तमान में जो ड्राइवर, उनकी पुरानी गाड़ी चला रहा है, वह भी सड़ी हुई पुरानी गाड़ी, उसी को देने का ऐलान किया है। मैं आश्चर्य में पड़ गया, दुनिया में कैसे-कैसे लोग है?, पर सच्चाई यह है कि वह सड़ी हुई पुरानी गाड़ी भी उस ड्राइवर को अब तक नहीं मिली है, यानी हद हो गयी, नेकी के रास्ते में स्वयं को दिखाने का ये धोखे का प्रचलन हमें अंदर से हिलाकर रख दिया...
और अब आगे देखिये, आजकल देश में बहुत सारी सरकारें है, पंचायत से लेकर राज्य और फिर केन्द्र में, सरकार ही सरकार है, जो कहती है कि वे नेकी का काम करती है, इनलोंगों ने अपनी नेकी का काम का प्रचार-प्रसार करने के लिए अनेक चिलगोजों-चिरकूट टाइप कंपनियों को करोड़ों में हायर किया है, पहले इनका काम राज्य में कार्यरत मशीनरियां किया करती थी, पर इन सरकारों का इन मशीनरियों पर विश्वास ही नहीं रहा, शायद सरकारों को लगता है कि उनके पास जो लोग है, वे सारे निकम्मे है, इसलिए वे अब अपनी नेकी के काम का प्रचार-प्रसार, दिखावा आदि के लिए चिलगोजों-चिरकूट कंपनियों को ये काम दे रखा है, जो इनका बेवजह प्रचार-प्रसार, अपने चिलगोजों-चिरकूटों टाइप के दिमागों से किया करती है, आश्चर्य इस बात की है, इन चिलगोजों-चिरकूट कंपनियों को कुछ नहीं आता, केवल ये गलथेथरी और तूकबंदी किया करती है, पर स्वयं को शूट-बूट-टाई से अंलकृत रखती है, जिससे सरकार में कार्यरत बहुत सारे तथाकथित अक्लमंदों को लगता है कि दुनिया की सारी बुद्धिमानी ऐसे ही लोगों में भरी-पड़ी है...
यानी नेकी कर दुनिया को दिखा की प्रवृत्ति ने घर,परिवार,समाज, देश और विश्व तक को नहीं छोड़ा है। सभी इस प्रवृत्ति में सराबोर है, इससे मुक्ति का रास्ता फिलहाल नहीं दिखता, क्योंकि इसका प्रभाव भी गजब है। हाल देखिये, जो कल तक बाबा थे, अब वणिक हो चुके है। जो संत थे आज जेल की शोभा बढ़ा रहे है। जो नेता थे वे कोर्ट से चुनाव लड़ने के लिए वंचित करार दिये जा चुके है। यानी खोल कर लिख दिया भाई, समझते रहिये...

Wednesday, December 28, 2016

मेरे प्यारे बच्चों...........

मेरे प्यारे बच्चों,
तुम लोगों से मोबाइल पर बातचीत हो जाती है, तो आनन्द आ जाता है। मैं जानता हूं कि तुम विपरीत परिस्थितियों में सीमा पर तैनात हो, फिर भी हमें हंसाने और खुश रखने के लिए हंसकर-मुस्कुराकर बातें करते हो। हम जानते और महसूस करते है कि आनेवाले समय में देश की जो स्थिति है, वो बेहतर नहीं होने जा रही है, क्योंकि इस देश के 98 प्रतिशत नेता अपने देश से प्यार नहीं करते, वे तो जिनकी बातें कर राजनीति करते है, उन्हें भी धोखा देते है और सिर्फ अपनी पत्नी और प्रेमिकाओं के प्यार में डूबे होते है। ऐसे में, देश का क्या हाल होगा?, हमें समझना होगा। हम अपने प्यारे देश को इन चिरकूट नेताओं और उनके घटियास्तर के बेटे-बेटियों और उनकी पत्नियों और प्रेमिकाओं के हवाले नहीं छोड़ सकते।
मैं जानता हूं कि तुमलोग छुट्टियों के लिए संघर्ष करते हो, पर छुट्टियां नहीं मिलती, गर छुट्टियां मिलती भी है तो समय पर नहीं मिलती। कहने को सरकारें बहुत कुछ कहती है और चिरकूट टाइप के नेता कहा करते है कि सीमा पर कार्य कर रहे जवानों के लिए हम बहुत कुछ कर रहे है, पर सच्चाई हमसे नहीं छुपी है, फिर भी तुमलोग अपने देश के प्रति और अपने कार्य के प्रति ईमानदार हो, ये देखकर हमें गर्व होता है।
तुम तो जानते हो और देखे भी होगे कि यहां के लोग भी महान है, वे शहीद हो गये जवानों के बेजान शरीरों पर फूल और मालाएँ डालने के लिए भीड़ इकट्ठी कर लेते है, पर जीवित जवानों (जो सीमा पर से लौटकर अपने घर-परिवार से मिलने आ रहे होते है) उन्हें अपनी सीटों पर बैठने तक को नहीं कहते और न ही बैठने देते है, सीट रहने पर भी कई लोगों को पैर-पसार कर अनारक्षित सीटों पर हमने सोते देखा है। मैंने अपनी इन्हीं आंखों से देखा है कि कई जवान ट्रेनों में जैसे-तैसे नीचे सोकर-बैठकर पशुओं की तरह अपने घर-परिवार से मिलने जाते है। ये सूरत कभी बदलनेवाली नहीं, चाहे सरकार किसी की भी आ जाय, ये तो चरित्र और संस्कार से जुड़ा मसला है, जिसकी दवा किसी के पास नहीं।
मैं तो तुम्हें कल भी कहता था, आज भी कह रहा हूं...
योग का अर्थ है – आत्मा का परमात्मा से मिलन।
योग 4 प्रकार का होता है – कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और हठयोग।
दुनिया का सबसे बड़ा योग कर्मयोग है। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की प्रधानता और उसके गूढ़ रहस्य के बारे में बताया है। समय मिले तो श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ लेना। गोस्वामी तुलसीदास ने भी श्रीरामचरितमानस में लिखा है...
कर्म प्रधान विस्व करि राखा। जो जस करहिं तस फल चाखा।।
हम जो भी आज है, वो कर्म के कारण है, आगे हम जो बनेंगे, उसमें भी कर्म की ही प्रधानता रहेगी, आज जो तुम्हें मिला है, या जो तुम्हें प्राप्त हो रहा है, उसमें तुम कहीं नहीं हो, वो सब ईश्वर कर रहा है और करा रहा है...
बस तुम्हें करना क्या है? कि स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर, कर्म करते जाना है, फल की चिंता नहीं करनी है...फल तो तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। इसके लिए उदाहरण कई है, पर मैं अपना उदाहरण तुम्हारे समक्ष रखता हूं, क्योंकि तुम मेरे बेटे हो, तुमने हमें नजदीक से देखा है, मैं तुम्हारे सामने हूं, मेरा कर्म तुम्हारे सामने है, मैं आज कहा हूं, कल कहां था, और कल कहां रहूंगा, उसका सूक्ष्म विवेचना कर लो।
एक बात और...
हम इस दुनिया में क्यों आये है?
इसे भी जानो...
क्या हम आइएएस, आइपीएस, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, अधिकारी-कर्मचारी, चिकित्सक आदि बनने आये है? उत्तर होगा – नहीं।
तो हम दुनिया में आये है किसलिये...
क्या हम भोजन करने, मल-मूत्र परित्याग करने, बच्चे पैदा करने आये है?
अगर हम ऐसा करने आये है तो ऐसा तो पशु भी करते है।
ऐसे हालात में हम पशु से कैसे भिन्न हुए?
हमें यह मालूम होना चाहिए कि हम पशु नहीं, मनुष्य है और मनुष्य का जन्म प्रारब्ध, प्रार्थना और प्रयास के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। वर्तमान में प्रारब्ध पर तुम्हारा अधिकार नहीं। आज का कर्म, कल प्रारब्ध में बदल सकता है, तुम्हारा वर्तमान में अधिकार सिर्फ प्रार्थना और प्रयास पर है, प्रतिदिन प्रार्थना करो और जो काम मिले, उसमें ईमानदारी बरतते हुए कार्य करो। मैं जानता हूं कि तुम अपने कार्यों में ईमानदारी बरतते हो, सेवा कार्य में कोई भी ढिलाई तुम बर्दाश्त नहीं करते, फिर भी पिता हूं, बताना चाहता हूं, जब तक जीवित रहूंगा, बताता रहूंगा। पिता का यह धर्म भी है। प्रार्थना के विषय में महात्मा गांधी का उल्लेख मैं करना चाहूंगा। उन्होंने कहा था कि मैने ऐसी कोई प्रार्थना नहीं कि, जिस प्रार्थना को ईश्वर ने सुना नहीं हो। कमाल है महात्मा गांधी किस प्रकार की प्रार्थना करते थे कि ईश्वर ने उनकी सारी प्रार्थना को सुना। ये चिंतन का विषय है। आखिर महात्मा गांधी ने क्या कर लिया था? कि ईश्वर उनकी हर बातों को मान लेते थे। उसका सुन्दर उदाहरण है। महात्मा गांधी का सत्य से जुड़ाव। जिस दिन उन्होंने स्वयं को सत्य से जोड़ लिया, वे असाधारण हो गये। सत्य क्या है? इसका सुंदर विश्लेषण तैत्तरीयोपनिषद् में है, पर मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि सत्य ही ईश्वर है। ईश्वर को खोजना, बहुत आसान है, जब तुम सत्य पर होते हो तो जान लो कि ईश्वर के सन्निकट होते हो।
मैं जिस अवस्था में हूं, वहां तुम विश्वास नहीं करोगे, प्रतिदिन ईश्वर से मुलाकात होती है, मैं उन्हें महसूस करता हूं, मेरा सारा कार्य आसान होता चला जा रहा है। इसलिए मैं तुम सब को आशीर्वाद प्रदान कर रहा हूं, मस्ती में रहो, देश की सेवा करो, आनन्दित रहो, आनन्द न तो सरकार देती है और न अधिकारी। आनन्द तो सिर्फ ईश्वर देता है। वो कहीं भी किसी रूप में दे सकता है। मैने तो कई लोगों को भौतिक सुखों में घिरे रहने के बावजूद बिलखते देखा है, और कई को भौतिक सुखों के अभाव में भी परम आनन्द की प्राप्ति में स्वयं को आनन्दित होते हुए देखा है...
सच पूछो, तो तुमसब हमारे लिए ईश्वर का वरदान हो...
आनन्द लूटो, परम आनन्द की ओर बढ़ो...
जो हमने सिखाया है, उस मार्ग पर अडिग रहना...
मत झूकना, असत्य के आगे...
सत्य पर रहना, देश तुम्हारा, हम तुम्हारे, डर किस बात की...
वेद कहता है...
ऐ मन तू मत डर, जैसे सूर्य और चंद्र नहीं डरा करते...
ऐ मन तू मत डर, जैसे दिन और रात नहीं डरा करते...
आज कुछ ज्यादा लिख दिया हूं...वार्ता के क्रम में...
क्या करें? तुमलोग पास में रहते हो...तो खूब बाते होती है, और जब दूर हो तो फेसबुक में ही आराम से लिख देता हूं...पढ़ लो, और हमें आनन्द दे दो...
अरे अब तो मुस्कुराओं, दांत दिखाओ, देखो मैं पास में ही खड़ा हूं और तुम्हें देख रहा हूं...

Monday, December 26, 2016

2016 याद आओगे नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के रूप में..........

2016 भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शानदार कीर्तियों के लिये विशेष रूप से जाना जायेगा। एक ने नोटबंदी कर पूरे देश में कालाधन रखनेवालों की धज्जियां उड़ा दी, तो दूसरे ने अपने राज्य में शराबबंदी कर लाखों परिवारों के घर में खुशिंया बिखेर दी। दोनों एक दूसरे के घूर विरोधी पर दोनों में एक समानता, कि देश को कुछ देना है, राज्य को कुछ देना है। कहा जाता है कि ईश्वर ने सब को कुछ करने का जज्बा दिया है, पर लाखों-करोड़ों में कोई एक होता है, जो उन जज्बा को मूर्त्तरुप में देने में कामयाब होता है। मौका तो देश की जनता ने सोनिया-राहुल को भी दिया और बिहार में लालू यादव को दिया पर इन सब ने अपने परिवारों को ही देश मान लिया, पर इसके विपरीत नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार ने देश की जनता और राज्य की जनता को ही अपना परिवार मानकर, ऐसे कार्य किये, जिस कार्य को देख पूरी मानव जाति आश्चर्यचकित है।
जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी की घोषणा की थी, तब कई लोगों ने उनके इस निर्णय की यह कहकर आलोचना की थी कि ये संभव नहीं है, क्योंकि पूर्व में भी कई राज्यों ने शराबबंदी की, पर वहां ये सफल नहीं हो सका, इस बात में सच्चाई है, आज भी कई राज्यों में शराबबंदी है, पर वहां भी शराब धड़ल्ले से बिक रहे है, यहां तक कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश के राज्य में भी। एक हमारे परम मित्र हाल ही में चकिया (मुजफ्फरपुर) गये, और वहां के दृश्य का जो उन्होंने आंखों देखा हाल सुनाया, वो सुनकर मैं हतप्रभ हो गया। मैं जहां रहता हूं यानी दानापुर, वहां भी देखा कि कई लोग शराब पीकर मस्त नजर आये, पर जो हाल शराबबंदी के पूर्व में देखा था, वैसा नहीं दीख रहा है। मेरा मानना है कि अगर आप किसी भी चीज में 100 में 70 या 80 प्रतिशत सफलता अर्जित कर लेते हो, तो ये मान लेना चाहिए कि सफलता मिली है, क्योंकि शत प्रतिशत तो कहीं भी कुछ नहीं होता।
वहीं हाल नोटबंदी में भी, जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी अभियान चलाया, कई लोगों की दुकानें बंद हो गयी। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो इसके विरोध का राष्ट्रीय नेतृत्व कर डाला, पर जनता ने उनका कितना सहयोग किया, वो स्वयं जानती है, उनका गुस्सा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर क्यों है? वह भी हम जानते है कि क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने उनके क्षेत्र में उनकी नींद उड़ा दी है। ऐसे भी उनकी सत्ता को कहीं से खतरा है, तो वह भाजपा से ही है, इसलिए वे अपने घुर-विरोधी वामपंथियों से भी नोटबंदी के खिलाफ हाथ मिलाया, पर स्थिति क्या है? वह अच्छी तरह जानती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस नोटबंदी का समर्थन पूरे देश की जनता ने किया है, जनता को लगता है कि इस नोटबंदी से देश का भला होगा। इस नोटबंदी का समर्थन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया है, यानी जो भी लोग है, जो जानते है कि काला धन से देश के विकास और सुरक्षा को खतरा है, वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इस मुद्दे पर समर्थन कर रहे है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो साफ कर दिया है कि वे काला धन चाहे नोट के रूप में हो, या सोने के रूप में या किसी भी बेनामी संपत्ति के रूप में, वे किसी को भी बख्शने नहीं जा रहे है। वे तो यह भी कहते है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन्होंने सत्ता पायी और भ्रष्टाचार को वे जड़ से उखाड़ फेंकेंगे, हांलांकि सोनिया-राहुल-लालू-ममता एंड कंपनी के लोग, जिन्होंने भ्रष्टाचार का रिकार्ड तक बना डाला है, वे इस अभियान की हवा निकालने में लगे है, पर हमें नहीं लगता कि वे इस अभियान की हवा निकाल पायेंगे, क्योंकि जब जनता साथ है, तो किसी की हिम्मत नहीं कि सत्य की हवा निकाल दें।
ये सही है, कि इस नोटबंदी अभियान से गरीबों को दिक्कतें हुई है, मैं तो कहता हूं कि गरीब दिक्कत के लिए ही तो पैदा हुआ है, उसी की दिक्कत तथा उसी की सहनशीलता से ही तो देश आगे बढ़ा है। भला कोई अमीर बताये कि सीमा पर किस अमीर या नेता का बच्चा अपना छाती खोलकर दुश्मन की गोलियों का सामना कर रहा है, अरे कोई अमीर या कोई नेता ही बता दें कि किसका बच्चा एनसीसी की परेड में भाग लेता है, ज्यादातर एनसीसी में तो गरीब का ही बच्चा भाग लेता है। गरीबों की दुहाई देनेवाले, गरीबों का ही पैसा और उसके हक को अपने तिजोरी में भर लिये, वह भी कभी उन्हें दलित बताकर, तो कभी पिछड़ा बताकर, कभी अल्पसंख्यक बताकर, और आज रोना- रो रहे है कि नोटबंदी से गरीबों को दिक्कते हो रही है, अरे जब गरीबों को कोई दिक्कत नहीं तो ये अमीर या नेता क्यों रोना रो रहे है?, हम नहीं जानते क्या? या जनता नहीं जानती, जनता सब जानती है।
2016 में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वयं द्वारा ऐसी लकीर खींच दी है कि इस लकीर को छोटा करना किसी भी भारतीय नेता के वश की बात नहीं, क्योंकि ऐसी लकीर वहीं खींच पाते है, जिनके पास चरित्र होता है और ये चरित्र किसी दुकान पर नहीं बिकती, ये तो जन्मजात होता है, जो माता-पिता के द्वारा पुष्पित-विकसित होता है। सचमुच 2016 तुम जा रहे हो, पर तुम याद आओगे, नरेन्द्र मोदी और नीतीश के कीर्तियों के रूप में...

Tuesday, December 13, 2016

नोटबंदी से पत्रकारिता जगत में हाहाकार...

जी हां, नोटबंदी से पत्रकारिता जगत में हाहाकार है। संपादक से लेकर पत्रकारिता जगत में चपरासी तक कार्य करनेवालों का जीना मुहाल हो गया है। अपने आकाओं, राजनीतिज्ञों, आइएएस, आइपीएस, थानेदारों, सरकारी जन वितरण प्रणाली दुकानों से कमीशन लेनेवालों के घर में कमीशन के पैसे नहीं पहुंच रहे है। जिसके कारण इनके चेहरों से लाली समाप्त हो गयी, चूंकि डायरेक्ट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने अखबारों के माध्यम से ये गाली नहीं दे सकते, इसलिए इन्होंने इनडायरेक्ट माध्यम को चूना है। वे अपने विशेष पृष्ठों पर ऐसे-ऐसे लोगों को दिखा रहे है, जिनका इस नोटबंदी से कोई लेना – देना नहीं और न ही उनके कारोबार पर कोई असर ही पड़ रहा है, क्योंकि मैं भी भारत के रांची में ही रहता हूं और कोई टाटा-बिड़ला या अडानी-अंबानी के परिवार का सदस्य नहीं हूं, जैसे सामान्य लोग जीते है, उसी तरह मैं भी जीता हूं। मेन रोड स्थित फुटपाथ की दुकान हो या अपर बाजार की कपड़े की दुकान या पंडितजी से पतरा दिखाना हो, या नाई से बाल ही क्यूं न कटवाना हो, या जूता-पालिस ही क्यूं न कराना हो। एक वाक्य में कहें तो जूता सिलाई से लेकर चंडी पाठ तक इसी मेन रोड में होता है, कहीं हाहाकार नहीं हैं, लेकिन कुछ लोगों यानी पत्रकारों को पेट में भयंकर दर्द हो रहा है कि भाई नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी करके उनके पेट पर लात मारा है, क्योंकि कमीशन बंद हो चुकी है, जो इन्हें कमीशन देते थे, रुपयों में, जब उनकी सिट्ठी-पिट्ठी गुम हो गयी है, तो बेचारे को प्रतिदिन का पांच सौ और एक हजरियां कौन देगा...
जब इनके विशेष पृष्ठों से नरेन्द्र मोदी को गरियाने का काम समाप्त हो जाता है, तो वे फेसबुक का सहारा लेते हैं, और जी-भरकर नरेन्द्र मोदी को गरियाते है, तरह-तरह के नरेन्द्र पाठ करते है। एक सज्जन जो एनजीओ भी चलाते है, कभी संपादक भी रहा करते थे, वे नरेन्द्र मोदी को गरियाते – गरियाते अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी सुनाने लगते है। एक तो अखबार नहीं आंदोलन – पंचायती वाले बाबा दांत निपोरते हुए फोटो प्रोफाइल रखे हुए है, वे तो सुबह उठते और रात में सोने के पहले जब तक फेसबुक पर नरेन्द्र मोदी को गरिया नहीं ले, उनका खाना ही नहीं पचता। इसी अखबार में युवा पत्रकारों की भी टोली है, जो नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी अभियान को समर्थन करनेवालों को भक्त कहकर गरियाते है, जबकि वे स्वयं चिरकुटानंद के सहोदर भाई है।
हम भी अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अनुरोध करेंगे कि इन कमीशन खानेवाले पत्रकारों और उन्हें गरियानेवाले इन पत्रकाररूपी बहुरूपियों पर वे थोड़ी कृपा करें, ताकि उनका कमीशन का धंधा बेरोकटोक चलता रहे, लेकिन फिर बात यहीं आती है कि नरेन्द्र मोदी रहे धाकड़ बैट्समैन हमें नहीं लगता कि उन्होंने जो नोटबंदी का शतक बनाने का जो बीड़ा उठाया है, उससे वे पीछे हटेंगे।
इसलिए कमीशन खानेवाले पत्रकारों और एनजीओ चलानेवाले महानुभावों से सादर अनुरोध है कि वे फिलहाल बाजार और आम जनता की ऐसी छवि प्रस्तुत न करें, बल्कि अपना चेहरा जो कमीशन के नहीं मिलने कारण बर्बाद होता दीख रहा है, उसे दिखाने की कोशिश करें, ताकि लोगों को पता चलें कि इस कमीशन के धंधे में कितने संपादक और कितने पत्रकार अब तक मालामाल हो गये...

Saturday, December 10, 2016

“लेकिन जो पापी न हो वो, पहला पत्थर मारे”

हमें हंसी आती है, जब चोर और डाकू ये कहें कि चोरी करना बहुत बुरी बात है, डकैती करने से देश और समाज का नुकसान होता है...
हमें हंसी आती है, जब चरित्रहीन लोग, सभी से आह्वान करते है कि सभी को चरित्रवान होना चाहिए...
ये मैं इसलिए लिख रहा हूं कि आजकल पत्रकारिता की आड़ में, स्वयं को समाज में गलत ढंग से प्रतिष्ठित करनेवाले और जनता की पैसों से ऐश करनेवाले आज देश को आह्वान कर रहे है कि सूचना के अधिकार के दायरे में लाया जाये राजनीतिक दलों को...
मैं कहता हूं कि ऐसा आह्वान करनेवाले पहले स्वयं चरित्रवान बनकर, स्वयं को प्रतिष्ठित करें और उसके बाद ऐसा आह्वान करें तो उसका असर भी दिखेगा, नहीं तो वे जनता को जो मूर्ख समझने की कोशिश कर रहे है, वे भूल कर रहे है... हां इस प्रकार के आयोजन कर खुद को तसल्ली देने और बड़ा बनने का ऐहसास कराने का ढोंग करना हो तो चल सकता है...
आजकल मैं देख रहा हूं कि कुछ लोग एनजीओ खोलकर, अपनी चालाकी को महिमामंडित करने की कोशिश कर रहे है...
यानी सेमिनार-संगोष्ठियों के नाम पर होटल बुक करो-कराओ, एनजीओ के नाम पर फंडिग करो, अखबार और चैनल में न्यूज छपवाओ और प्रसारित करवाओ और जिनको कोई काम नहीं है, उनको ऐसे कामों से जोड़कर बतकुचन और झलकुटन कराओ...
और लो काम हो गया...
अरे कौन नहीं जानता कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की कृपा पाकर कौन व्यक्ति सूचना आयुक्त बना...
अरे कौन नहीं जानता कि पूर्व मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की कृपा पाकर आज कौन व्यक्ति सूचना आयुक्त बना है...
अरे कौन नहीं जानता कि पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के शासन काल में कौन उनका सलाहकार सूचना आयुक्त बनने जा रहा था, जिसकी बैंड प्रभात खबर के तत्कालीन प्रधान संपादक एवं वर्तमान मे जदयू के वरिष्ठ नेता और सांसद हरिवंश ने बहुत अच्छी तरह बजा दी थी, हालांकि सांसद हरिवंश महोदय ने भी अखबारों में खुब चरित्र की बातें कर, बाद में नीतीश भक्ति में ऐसे लीन हुए कि नीतीश भक्ति में लीन होने के कारण, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें प्रसाद के रूप में राज्यसभा का सीट प्रदान किया...
कमाल है, खूब दिये जा रहे है, राजनीतिक दलों पर अंगूलियां उठा रहे है...
अरे सबसे पहले स्वयं सुधरो तब दूसरे को सुधारो...
वो फिल्म “रोटी” के गाने का वो अंतरा नहीं सुना क्या...
“पहले अपना मन साफ करो रे, फिर औरों का इंसाफ करो”
“लेकिन जो पापी न हो वो, पहला पत्थर मारे”

Thursday, December 8, 2016

प्रधानमंत्री के निर्णयों का बेवजह विरोध सहीं नहीं.........

हाहाहाहाहाहा...
सावन का महीना था...
बादल बरस रहे थे...
तभी बिजली गिरी और एक का घर ढह गया, एक व्यक्ति मर गया...तभी किसी ने चिल्लाया कि हमारा प्रकृति या भगवान से अनुरोध है कि पानी बरसाना बंद करें, क्योंकि जब भी बारिश होती है, बिजली कड़कती है, किसी का मकान ढह जाता है, कोई व्यक्ति मर जाता है, इसलिए पानी बरसना बंद हो जाना चाहिए...
हाहाहाहाहाहा...
गंगा बहती रहती है, उसमें कई लोग डूब कर मर जाते है, तभी एक ने चिल्लाया, ये गंगा क्यों बहती है?, लोग इसमें डूब कर मर जाते है, सरकार को चाहिए कि गंगा को बहने पर रोक लगा दें...
हाहाहाहाहाहाहा...
एक बार, एक पेड़ एक इंसान पर गिर गया, इंसान मर गया...तभी एक ने चिल्लाया ये पेड़ पूरी तरह से काट देने चाहिए क्योंकि बड़े - बड़े पेड़ कहीं भी गिर जाते है, जिससे जन-धन की हानि होती है...
ठीक उसी प्रकार से, जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया है, तभी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस अभियान की हवा निकालने के लिए देश के मूर्धन्य नेताओं और उनके समर्थकों की फौज बेसिरपैर की बातें करने लगे है। भारत में तो देखता हूं कि एक संप्रदाय ऐसा है कि उसे नरेन्द्र मोदी की हर बात में ही गड़बड़ी लगती है, चाहे वो देशहित में ही क्यों न हो? वो नरेन्द्र मोदी की हर बात की काट निकालने को तैयार रहता है, जबकि लोकतंत्र में हर बात को कसौटी पर खड़ा रखकर बाते करनी चाहिए, पर क्या करें? हमें नरेन्द्र मोदी को गाली देनी है तो गाली देंगे। फेसबुक पर ऐसे लोगों की एक बड़ी जमात है, जो नोटबंदी की हवा निकालने के लिए बेसिरपैर की बात करते है, जबकि वहीं लोगों को देखता हूं कि भाजपा नेताओं के आगे गणेश परिक्रमा भी करते नजर आते है। उनके इस चरित्र को देख हम भी आश्चर्य करते है कि ऐसा संभव कैसे है?, पर क्या करें?, ऐसा मैं देख रहा हूं।
ठीक इसी प्रकार जदयू के वरिष्ठ नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नोटबंदी का समर्थन किया पर उन्हीं के पार्टी के कुछ लोगों, खासकर काला धन रखनेवालों की टीम नरेन्द्र मोदी के इस अभियान की हवा निकालने में लगी है, यहीं नहीं उन पत्रकारों की भी नींद हराम हो गयी है, जो निरंतर पेड न्यूज में दिलचस्पी रखते हुए ब्लैक मनी इकट्ठा करते थे, इनकी भी नींद उड़ गयी है, वे भी अनाप-शनाप बोलकर नरेन्द्र मोदी को गरिया रहे है। इन सारे लोगों के लिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीबाल भगवान हो गये है, और आज के हालात में नीतीश कुमार की आलोचना करने से भी नहीं चूक रहे...
आजकल ये भी देख रहा हूं कि जो लोग नरेन्द्र मोदी की बातों का समर्थन करते है, उन्हें ये मोदी विरोधी भक्त कहकर गरियाते है, पर जब इन मोदी विरोधियों को जब कोई सटीक जवाब देता है, तो उनकी घिग्घी बंद हो जाती है।
मैं तो देख रहा हूं कि स्थिति ठीक उसी प्रकार की है, जब कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कम्प्यूटर क्रांति का श्रीगणेश किया था, तब उनका भी विरोध इसी प्रकार हुआ था।
मैं कहता हूं कि डिजिटल होने में जाता क्या है? हम पैसे कहां से लाते है, और कहां खर्च करते है?, इसकी जानकारी सरकार को क्यों नहीं होनी चाहिए?, हम जितना कमाते है, उतनी ही ईमानदारी से टैक्स क्यूं नहीं चुकाना चाहिए? केवल आयकर के डर से, ये सारी नौटंकियां और मोदी का विरोध कभी सहीं नहीं ठहराया जा सकता। देश को ईमानदार बनाना है, तो ऐसे एक्शन बहुत पहले लिये जाने चाहिए थे, पर देर से ही सही, किसी ने उठाया तो उसका समर्थन भी करना चाहिए।
ऐसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 50 दिन मांगा, 50 दिन देने में जाता क्या है? इतना सहा, थोड़ा और सहें, गलत होंगे तो उनका भी विरोध किया जायेगा, ऐसा थोड़े ही है कि यहां राजतंत्र है, गलत करेंगे, सत्ता से हटायेंगे और फिर एक नया जनादेश देंगे, पर थोड़ा देखे तो कि इस नोटबंदी का क्या असर होने जा रहा है, बेवजह का विरोध किसी भी प्रकार से सहीं नहीं ठहराया जा सकता...