Wednesday, May 8, 2013

वाह री कर्नाटक की जनता, तुम्हारा भी जवाब नहीं..............

सबसे सुंदर, सबसे प्यारा
मेरा देश, मेरा देश
भ्रष्टाचारी यहां पनपते
देशद्रोही यहीं पे बढ़ते
अपनी जमीन पर, देश के नेता
दूसरे देश से कब्जा करवाते
जब मीडिया, अरे शोर मचाती
तब चीन के आगे, नाक रगड़ते
सबसे सुंदर, सबसे प्यारा
मेरा देश, मेरा देश
यहां की जनता
मस्त हैं रहती
मुंहमांगी रकम से, वोट बेचती
भ्रष्टाचारियों को खूब जीताती
भ्रष्ट पार्टियों को बहुमत देती
कहती लूटो, मेरे नेता
जमकर शोषित कर लो नेता
कर्नाटक क्या, दिल्ली क्या
सब जगह, तुम  बढ़ते जाओ
अपने देश को रौंद रौद कर
अपने महल बनाते जाओ
लूट लूट कर अपने पैसे
विदेशी बैंकों में भरते जाओ
जब तक जिंदा रहो, लूटो तुम
तुम्हें मदद हम करते रहेंगे
वोटों से और दिल देकर
तुम्हारा स्वागत करते रहेंगे
मेरा एक ही सपना भैया
मेरे दादा, कभी गुलाम थे
मैं स्वतंत्र, क्यू अरे कहाया
मैं परतंत्र होना चाहता हूं
कैसे सपना  पूरा होगा
जब तुम, नीचे से उपर तक
भ्रष्ट न होगे, भ्रष्ट न होगे
इसी हेतु ईश्वरीय प्रार्थना
सब नेता अरे भ्रष्ट हो जाये
नेता क्या
डाक्टर, इंजीनियर
यहीं क्यूं
शिक्षक, छात्र भी 
भ्रष्ट हो जाये, भ्रष्ट हो जाये
ताकि हम भारतवासी
दिल खोल कहे,
संपूर्ण विश्व से
देखो हमने रिकार्ड बनाया
विश्व का नं. एक हैं देश 
भारत देश भारत देश
भ्रष्टाचारियों का हैं देश
भारत देश, भारत देश
बधाई हो कांग्रेस पार्टी को। कर्नाटक में वो सरकार बनाने जा रही हैं। बधाई कर्नाटक की जनता को, कि उसने क्या जनादेश दिया हैं। जातियता में बहकर, सारे के सारे भ्रष्टाचारियों को जीताया हैं। ऐसे भी कर्नाटक की जनता, अन्य प्रदेशों से अलग थोड़े ही हैं। भारतवंशीय हैं, इसलिए भारतवंशियों का खून तो इनमें भी होगा। इसलिए दिल खोलकर, चीन के आगे नाक रगड़नेवाली, सीबीआई को अपने हाथों नचाकर, विदेशों में अपने पैसे समायोजित करानेवाली पार्टी में अपना विश्वास व्यक्त किया। अब मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये देश जरुर परतंत्र होगा। अरे परतंत्र होगा क्या, परतंत्र तो हैं ही। जो देश अपनी सीमा के अंदर 20 दिनों तक दूसरे देश की सेना का स्वागत करने के लिए पलक पावड़े बिछाये, उसे देश की औकात क्या। इस देश में कभी किसी मां के कोख से सुना हैं भगत सिंह पैदा हुआ करते थे। अब तो इस देश में येदियुरप्पा, राहुल, प्रियंका, मनमोहन, पवन  कुमार बंसल, ए राजा, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, अरे कितनो का नाम लिखूं, ये पैदा ले रहे हैं। ये देश को कहां ले जा रहे हैं, ये किसी से छुपा नहीं हैं। बार -बार हमारे मित्र कहते हैं कि ये देश बहुत तरक्की करेगा, मैं बार - बार कहता हूं कि ये देश गर तरक्की करेगा, तो फिर चीन के आगे नाक कौन रगड़ेगा, अमरीका का पांव कौन पखारेगा। कम से कम इन देशों में गुलामों की नौकरी करनेवाला एक वर्ग भी तो चाहिए। ऐसे में ये काम करने के लिेए भारतीयों जैसा दूसरा, पूरे विश्व में फिलहाल कोई देश नहीं दीखता। इसलिए गर्व से बोलो हम भारतीय हैं।
हम भ्रष्टाचारियों को वोट देते हैं।
हम भ्रष्टाचारियों में विश्वास व्यक्त करते हैं।
जो देश हमे आंख दिखाता हैं, उसके आगे हम नाक रगडते हैं।
हम अपना जमीर बेचकर, जयचंद और मानसिंह बनने को लालायित रहते हैं।
हम भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद को मूरख और राहुल तथा प्रियंका में आदर्श ढुंढते हैं।
जय हो भारत की..........................जय हो कर्नाटक की जनता की।
जिसने भ्रष्टाचारियों को वोट देकर, उसमें विश्वास व्यक्त कर भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ाया। 

Sunday, May 5, 2013

क्यों न इस मीडिया कप का नाम गुंडा कप रख दिया जाय..........................

..................और एक बार फिर पत्रकारिता की आड़ में वो सब हुआ। जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। पत्रकारों ने वो कार्य किया, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम है। वो भी अपने संपादक के नेतृत्व में, गुंडागर्दी की। अंपायरों की धुनाई की। अंपायरों को भद्दी - भद्दी गालियां दी। अंपायरों को धमकियां दे दी। वो भी सिर्फ एक मैच जीतने के लिए। कहां जाता हैं कि क्रिकेट संभ्रांतों का खेल हैं, पर जिस प्रकार से इस क्षेत्र में येन केन प्रकारेन केवल जीत का रसास्वादन करनेवाले लोग शामिल हो रहे हैं। मैं कह सकता हूं कि ये अब गुंडों का खेल हो गया हैं। यानी अब आप जब भी क्रिकेट खेलने जाइये तो गुंडे और असामाजिक तत्वों को अपने साथ अवश्य रखे, अच्छा रहेगा कि क्रिकेटर के रुप में हाथ - पांव से मजबूत गूंडों को ही क्रिकेटर बनाइये। इससे फायदा ये रहेगा कि गर आप हार गये तो इन गुंडों से असली काम लेते हुए, आप अपनी टीम को जीत दिलवा सकते हैं।
मैं ये बाते आज खुश होकर नहीं लिख रहा। दरअसल रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन ने स्व. शशिकांत पाठक मेमोरियल क्रिकेट मीडिया कप का आयोजन किया हैं। जिसमें पत्रकारों में क्रिकेट के प्रति उऩकी सोच को रेखांकित करने, खेल भावना को पुष्ट करने का संकल्प निहित हैं, पर जिस प्रकार से इस मीडिया कप में कुछ अखबारों की टीम शामिल हो रही हैं, और सिर्फ जीत का स्वाद चखने के लिए, मैदान में उतर रही हैं, उससे यहीं लगता हैं कि शायद ही ये मैच खेल भावना को पुष्ट कर रहा हैं। 
कुछ दिन पहले प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक ने कशिश और प्रभात खबर के बीच चल रही क्रिकेट मैच के दौरान, मैदान में जाकर अंपायर को धमकाया था और आज रही सही कसर पूरी कर दी, दैनिक भास्कर ने। दैनिक भास्कर के लोगों ने अपने संपादक के नेतृत्व में वो हरकतें की, जिसकी जितनी भर्त्सना की जाय कम हैं। मैच कोई जीते, कोई हारे। कहां जाता हैं कि क्रिकेट नहीं हारना चाहिए, पर यहां क्रिकेट हारा। आइये हम आपको बता देते है कि क्या हुआ। दरअसल हेहल के ओटीसी ग्राउंड में कशिश और दैनिक भास्कर के बीच मैच था। कशिश की टीम पहले खेलते हुए 20 ओवरों में 6 विकेट खोकर 120 रन बनाये। जवाब में दैनिक भास्कर की टीम 20 ओवर में 120 रन बनाकर आल आउट हो गयी। नियम के मुताबिक मुकाबला बराबर रहा। मैच का परिणाम सुनिश्चित करने के लिए, नियम के मुताबिक अंपायरों ने एक - एक ओवर दोनों टीम से खेलने को कहा। दैनिक भास्कर की टीम पहले खेलते हुए एक ओवर में सात रन बनाये, जवाब में कशिश की टीम को उतरना ही था कि दैनिक भास्कर की टीम अंपायरों से उलझ गयी। भद्दी - भद्दी गालियां, अपमानजनक शब्दों का प्रयोग, धक्का - मुक्की ये अंपायरों के साथ करने लगे। इनकी हरकतें ऐसी थी कि वहां मैच देख रहे लोग भी भौचक्के रह गये। वहां बच्चे भी थे, जो इनकी हरकतों को देख रहे थे। ये वे लोग थे, जो नित्य प्रतिदिन देश व समाज को देवदर्शन और चरित्र का पाठ कराते हैं, पर खुद आज वे वो कार्य कर रहे थे, वो भी अंपायरों के साथ, जिसे देख एक सामान्य आदमी शर्मिंदा हो जाये, पर इन्हें शर्म नहीं आ रही थी। जमकर तमाशा किया। वो हर हाल में जीतना चाहते थे, पर अंपायरों का कहना था नियमानुसार ही जीत - हार का फैसला होगा। अंपायरों ने जब देखा कि दैनिक भास्कर, खेलने को तैयार नहीं हैं, तो उसने कशिश को जीत दे दी, पर दैनिक भास्कर के लोगों को गुस्सा इतना था कि वो कुछ भी सुनने और मानने को तैयार नहीं थे। अंपायर के इस फैसले से वे और आग बबुला हो गये। फिर अंत में फैसला ये हुआ कि मामला रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन के पास जायेगा और रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन फैसला करेगी कि कौन जीता और कौन हारा।
नियम तो यहीं हैं कि अंपायर का डिसीजन अंतिम होता हैं। नियम तो ये हैं कि गर आप खेलते नहीं हैं तो दूसरी टीम को जीत करार देने का अंपायर को हक हैं, पर आप नियम का पालन नहीं करेंगे और न किसी और को करने देंगे। हमेशा जीत का ही स्वाद चखना चाहेंगे, तो ये तो साफ-साफ गुंडागर्दी हैं। इसलिए हम तो चाहेंगे कि इस मीडिया कप का नाम बदलकर गुंडा कप रख दिया जाये। जो जितना बड़ा गुंडा, जिसकी जितनी बड़ी गुंडागर्दी, उसका कप पर कब्जा। बताइयें कैसी रही..................................

Saturday, May 4, 2013

बेचारा बंसल मामा, रेलमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देगा......

रेलमत्री पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे। कांग्रेस भी कह चुकी हैं कि पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे। भला बंसल इस्तीफा क्यों दे, इस्तीफा तो वो देता हैं, जिसके पास जमीर होती हैं। अब कांग्रेसियों के पास जमीर तो हैं नहीं, तो भला रेलमंत्री अपने पद से इस्तीफा क्यों दे। इस्तीफा तो दिया था, हमारे लाल बहादुर शास्त्री ने, जब उनके कार्यकाल में एक रेल दुर्घटना हो गयी थी। हम आपको बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री इस घटना के लिए जिम्मेवार नहीं थे, फिर भी नैतिकता के आधार पर कि उनके कार्यकाल के दौरान इतनी बड़ी दुर्घटना हुई थी उन्होंने रेलमंत्रालय संभालने से ही इनकार कर दिया था।
आज पवन कुमार बंसल को देखिये। इसके भांजे विजय कुमार सिंगला को सीबीआई ने 90 लाख रुपये घूस लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया। यह रकम विजय को उन्हें बतौर रिश्वत दो दिन पहले ही रेलवे बोर्ड के सदस्य बनाये गये महेश कुमार ने भिजवाई थी। पूरी डील दो करोड़ की थी और फिर भी बेशर्मी से रेलमंत्री पवन कुमार बंसल कहता है कि वो इस्तीफा नहीं देगा। कांग्रेस भी पवन कुमार बंसल के बचाव में निर्लज्जता के साथ खड़ी हो गयी हैं, ऐसे भी निर्लज्ज को लज्जा कहा आती हैं। कांग्रेस अच्छी तरह भारतीय जनता की नब्ज टटोल चुकी हैं, वो जानती हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं बनता, इस देश में भारत की सीमा चीन छोटा क्यूं न कर दें, ये मुद्दा नहीं बनता। जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी, वो उतना बड़ा नेता, इसलिए भ्रष्टाचार में लिप्त रहो, चीन से अपने देश की सीमा छोटी कराते रहो और फिर निर्लज्जता के साथी तीसरे टर्म के लिेए वोट मांगने को तैयार रहो। 
जनता के पास विकल्प तो हैं ही नहीं, वो क्या करेगी, अंततः कांग्रेस के साथ ही खड़ी होगी। गर किसी कारण से बहुमत नहीं भी आया तो निर्लजज्ता की श्रेणी में खड़े होने के लिए लालायित नीतीश एक न एक दिन, उनके साथ खड़े हो ही जायेंगे। बिहार में लालू और रामविलास, यूपी में मुलायम और मायावती  तो पहले से ही सोनिया नाम केवलम् का मंत्र जाप कर रहे हैं, दक्षिण में करुणानिधि और बची खुची वामपंथी पार्टियां, ये क्या करेंगी, अतंतः उन्हीं के शरण में आयेगी। देश भाड़ में जाय, हमने थोड़ी ही ठीका ले रखा हैं, आराम से लूटेंगे, विदेश में पैसे रखेंगे और फिर पूरे परिवार के साथ विदेश में कहीं बस जायेंगे। ये देश कोई रहने का हैं। देश तो इटली हैं, जहां की सोनिया माता हैं, जिनकी कृपा से राहुल और प्रियंका जी हैं। देश तो अमरीका, इंगलैंड और स्विटजरलैंड हैं, उनकी सरकारों के जूतों पर अपना नाक रगड़कर, वहां का नागरिकता प्राप्त कर लेंगे, यानी जब तक जिंदा रहेंगे, मस्ती में रहकर, पूरा जीवन गुजार देंगे।
इसलिए पवन कुमार बंसल, उसी श्रेणी के नेता हैं। सर्वदा सोनिया-राहुल और प्रियंका में अपना सर्वस्व लूटाने, चाटुकारिता करने, चरणवंदना करने, गणेश परिक्रमा करने में बड़ी ही श्रद्धा दिखाते हैं। जिसके एवज में वरदान स्वरुप रेल मंत्रालय उन्हें संभालने को मिला। आपको याद होगा, जब वे पहली बार रेलमंत्री बने थे, तो अपने भाषण में सोनिया जी की बड़ी ही श्रद्धा से नाम लिया था, राजीव गांधी का बड़ा ही नाम लिया था। उन्हें दुसरा कोई नाम याद ही नहीं था, क्योंकि जब सोनिया और राहुल जैसे भगवन् की उनके उपर कृपा हैं, तो जरुरत क्या हैं, अन्य का नाम लेने की। धन्य हैं, आज के नेता, आज के रेलमंत्री पवन कुमार बंसल जो रेल मंत्री के पद पर रहते हुए, अपने भांजे से सुंदर - सुंदर कार्य कराते हुए, भ्रष्टाचार का नया रिकार्ड बनाते हैं, ऐसे ही नेताओं से तो भारत की सुंदर तस्वीर बनती हैं। हम चाहेंगे कि देश में एक निर्लज्जता का भी एवार्ड देने की परंपरा की शुरुआत हो, ताकि ऐसे निर्लज्जों को पुरस्कृत किया जा सके, क्योंकि इन्होंने निर्लज्जता का रिकार्ड बना रखा हैं।

Thursday, May 2, 2013

सरबजीत की बहन दलबीर की ललकार के बावजूद भारतीय जगेंगे, मनमोहन और सोनिया की जमीर जगेगी, इसकी संभावना हमें दूर - दूर तक नहीं दीखती........

भारतीय बेटी और बहन - दलबीर कौर ने आज मीडिया के समक्ष जो बाते कही, वो दिल को दहलानेवाला हैं। अपने भाई सरबजीत की पाकिस्तान में की गयी हत्या के बाद जो दलबीर ने कहा, वो प्रमुख वाक्यांश इस प्रकार हैं...................
पाक में चुनाव के चलते सरबजीत की हत्या।
भारतीय होने की वजह से सरबजीत का कत्ल।
लाहौर के जिन्ना अस्पताल की घटना - सरबजीत का हाल पूछने पर डाक्टर हंसते थे।
सरबजीत की बहन ने कहा - अंसार बर्नी, पाकिस्तान का बड़ा मानवाधिकार कार्यकर्ता, जिसने कहा 25 करोड़ दो, सरबजीत लो।
चुनाव के लिए जरदारी ने मरवाया।
पाक को पता था सरबजीत जिंदा नहीं हैं।
सरबजीत देश के लिए शहीद हुआ।
पाक मे हमारे साथ सही बर्ताव नहीं।
सही कोशिश होती तो सरबजीत जिंदा रहता।
पाक ने भारत की पीठ पर छुरा घोपा।
अब पाक को बर्दाश्त करने का वक्त नहीं।
बेईमान हैं पाक, कायर हैं पाक।
पाक को सारी दुनिया को जवाब देना होगा।
और अब दुनिया का सबसे घटिया मीडिया बीबीसी ने क्या लिखा, उसे भी जानिये - बीबीसी ने जो समाचार बनायी है। उसमें उसने सरबजीत को भारतीय जासूस बताया हैं। पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर बीबीसी ने बता दिया कि वो भी भारत और भारतीयों के प्रति क्या रुख रखता हैं, यानी उसने भी भारत के साथ पत्रकारिता के नाम पर गद्दारी की सारी सीमा रेखा लांघ दी। ऐसे भी बीबीसी कभी भी भारत और भारत के प्रति संवेदना नहीं दिखायी, इसलिए इस गद्दार बीबीसी से भारत प्रेम की संभावना तलाशना मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। पता नहीं, कैसे भारतीयों का एक वर्ग - बीबीसी से प्रेम रखता हैं और उससे आजीविका चलाता हैं। मुझे तो बीबीसी न कल अच्छा लगता था और ऩ आज ही अच्छा लगा, क्योंकि इस बीबीसी ने भारत के प्रति आज भी आग उगल कर करोड़ों भारतीयों के छाती पर गहरे जख्म दिये हैं। 
पाकिस्तान और चीन से भारतीयों के प्रति प्रेम की संभानाएं तलाशना भी कायरता हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ( सोनिया गांधी के इशारे पर ठुमके लगानेवाले प्रधानमंत्री ), या अन्य मंत्रालय संभाल रहे मंत्रियों का समूह जो सोनिया के इशारे पर ठुमके लगाते हैं, उन्हें सरबजीत की हत्या से क्या लेना - देना, एक बार फिर घड़ियाली आंसू बहायेंगे। दलबीर को झूठे दिलासे दिलायेंगे और आगे  बढ़ जायेंगे। सरबजीत की हत्या के बाद भी शायद भारतीयों के आंख खुले। क्योंकि मैं जानता हूं कि ये भारतीय कुछ दिनों तक पाकिस्तान को भला - बुरा कहेंगे और फिर पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने, पाकिस्तान के साथ संगीत का कार्यक्रम शेयर करने और पाकिस्तानियों को भारत में बुलाकर उसका स्वागत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इसके बदले पाकिस्तान उसके बदले में हर जगह, हर मोर्चे पर हमें नीचा दिखायेगा, वो हमारे जवान का सरकलम करके, हमारी गैरत को ललकारेगा और हम अपनी सेनाओं को सरहद तक ले जाकर, फिर अपने अपने बैरकों में वापस ले आयेंगे। 
हद तो तब हो गयी कि चीन हमारी सीमा में 20 किलोमीटर अंदर घूस आया हैं और हमारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ( सोनिया गांधी के इशारे पर ठुमके लगानेवाला प्रधानमंत्री ) कहता हैं कि इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए। हां प्रधानमंत्री जी, जरुरत क्या हैं तूल देने का। आपका जमीन तो गया नहीं हैं, आप तो आराम से सोनिया के इशारे पर ठुमके लगाते हुए प्रधानमंत्री कहलायेंगे और फिर दूसरे देश जाकर आराम फरमायेंगे। आपको क्या पता कि देश की मिट्टी क्या होती हैं। देश के लिेए मरना क्या होता हैं। देश को अपना मानना क्या होता हैं। आप मस्ती मारिये, और भारत के सम्मान को चीन और पाकिस्तान के पैरों तले रौंदवाते जाइये। ऐसे भी भारत की जनता को क्या चाहिए, आप और आपकी पार्टी को अच्छी तरह से मालूम हैं। पर ये जान लीजिये कि जिस दिन भारत की जनता देशभक्ति के पागलपन से लवरेज हुई तो फिर आप लोग कहां होंगे, शायद आपको पता नहीं। फिलहाल सभी अपने - अपने में मस्त हैं। आप भी मस्त रहिए। इतनी गद्दारी के बावजूद, चीन द्वारा 20 किलोमीटर जमीन ताजा - ताजा हड़पने के बावजूद आपके लिए एक अच्छी खबर कि आप कर्नाटक में वापस आ रहे हैं, और ये सारी घटनाएं सिर्फ भारत में ही दीखती हैं, क्योंकि देश की जमीन गवां देने वाली सरकार की वापसी सिर्फ भारत में ही होती हैं, दूसरे देशों में नहीं...........।

Sunday, April 28, 2013

फील्ड में जाकर क्रिकेट अंपायर को अपने पक्ष में फैसले देने के लिए धमकी देना गुंडागर्दी कहलाता है - विजय पाठक जी......

रांची जिला  क्रिकेट एसोसिएशन के तत्वावधान में शशिकांत पाठक मेमोरियल मीडिया कप क्रिकेट चल रहा हैं, जिसमें मीडिया में शामिल विभिन्न चैनल व अखबार के लोग एक दूसरे से भीड़ रहे हैं और क्रिकेट की शालीनता व एकसूत्र में बंधने की परंपरा को आत्मसात कर रहे हैं, पर इसी क्रिकेट में, मीडिया में ही कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्हें किसी भी सूरत में हार पसंद नहीं हैं, वे इसके लिए अंपायर को भला - बुरा कहने से नहीं चुकते। उनका मानना हैं कि वे सिर्फ और सिर्फ जीतने के लिए ही बने हैं, भला कोई उन्हें हरा दे, ये उन्हें मंजूर नहीं। आखिर जब ऐसी सोच किसी के मन में बन जाये, तो समझ लीजिये वो कितना नीचे तक गिर सकता हैं। हम आपको बता दें कि मुझे कभी भी खेल में दिलचस्पी नहीं रही, कभी - कभार क्रिकेट जब टीवी पर देखता हूं तो थोड़ा समय काट लेता हूं पर क्रिकेट या अन्य खेल मेरा जायका बदल दें, ऐसा नहीं हैं। हम बात कर रहे हैं रांची में चल रहे रांची जिला  क्रिकेट एसोसिएशन के तत्वावधान में शशिकांत पाठक मेमोरियल मीडिया कप क्रिकेट की। आज का मैच प्रभात खबर और कशिश चैनल के बीच था। मैच रांची के सेटेलाइट कालोनी स्थित मैदान में चल रहा था। पहले खेलते हुए कशिश की टीम 79 रन बनाकर ऑल आउट हो गयी थी। इसके बाद प्रभात खबर की टीम बैटिंग के लिए उतरी। ये क्या 38 रन में ही प्रभात खबर टीम के चार विकेट उखड़ गये। फिर क्या था, प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक, सीधे फील्ड पहुंचे और उलझ गये - अंपायर से। लगे भला बुरा उसे कहने। बेचारे को ऐसा धमकियाया, कि अंपायर के लगे हाथ -पांव फूलने, और अँपायर के धमकाने का असर ऐसा हुआ कि प्रभात खबर जो हार के कगार पर थी, पांच विकेट से जीत गयी।
मैं पूछता हूं कि क्या प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक को फील्ड में जाकर अंपायर को धमकी देना उचित था। जो संपादक मैच के अंपायर को धमकी देकर अपने पक्ष में मैच करवा लें, उसे क्या कहेंगे - क्रिकेटर या गुंडा। क्या ऐसे लोग संपादक बनने के लायक हैं। जब ऐसे लोग के मन पहले से ही ये बात घर कर गयी हो, कि उन्हें हर हाल में मैच जीतना हैं, तो फिर इस प्रकार के आयोजन का क्या मतलब। सीधे वाकओवर खुद से लेकर, कप पर कब्जा क्यूं नहीं जमा लेते। जरुरत क्या हैं - जोर आजमाइश की। बाजार में तो बहुत सारे कप और ट्राफी बिकते हैं, खरीद लीजिये, जो मन चाहे, खुदवा लीजिये और लोगों को दिखाइये कि हम बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। आज जैसी हरकत, विजय पाठक ने सेटेलाइट मैदान में की हैं, उससे हर क्रिकेटर का सर शर्म से झूक जाता हैं। मैं स्व. शशिकांत पाठक जी को अच्छी तरह जानता हूं कि वो क्या थे। मैं तो कहूंगा कि जो मैच उनके नाम पर हो रहा हैं, उनके नाम को इस मीडिया कप से हटा लेना चाहिए, क्योंकि उनकी आत्मा भी विजय पाठक की इस हरकत से, शर्मसार हो गयी होगी, क्योंकि क्रिकेट हर हाल में खेल -भावना के तहत प्यार और भाईचारगी सीखाता हैं - न कि गुंडागर्दी।
एक बात और, कुछ लोगों को लगता हैं कि वो जो कुछ कर लेंगे, उसमें जनता की भागीदारी रहेगी, जनता उनके साथ रहेगी, तो ये उनकी बड़ी भूल है, अब जनता बहुत अच्छी तरह से इन रंगे सियारों को देख रही हैं। समय आने दीजिये, अपना निर्णय सुनायेगी। शीर्ष से अर्श पर पहुंचते देर नहीं लगेगी। इसलिए अभी भी वक्त हैं, गुंडागर्दी की जगह, ईमानदारी से कदम बढ़ाइये। मैं बार - बार कह रहा हूं कि लिखने से अच्छा हैं कि कर के दिखाइये, पर यहां तो रोज देवदर्शन अखबार में कराये जाते हैं, पर सच्चाई में इन संपादकों की हरकतें कुछ और ही होती हैं, जैसा कि आज सेटेलाइट मैदान में मैंने एक संपादक की हरकतों को देखा, जो एक अंपायर को धमकिया रहा था।

Friday, April 26, 2013

धिक्कार हैं, ऐसे पत्रकारों व छात्र संगठनों से जूड़े मच्छड़ नेताओं को जिन्होंने पत्रकारिता को कर्मनाशा बना दिया...........

रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग का बवाल फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा। पत्रकारिता विभाग के पूर्व निदेशक सुशील अंकन को अभी भी लगता हैं कि तथाकथित छात्र संगठनों व विभिन्न समाचार पत्रों एवं चैनलों के मच्छड़ और चिरकुट नेताओं व पत्रकारों  द्वारा पत्रकारिता विभाग में निरंतर बवाल कराते रहने से वे पुनः निदेशक पद पर स्थापित हो जायेंगे। आश्चर्य इस बात की भी हैं कि पूर्व में, जिस व्यक्ति को मैं इतना सम्मान देता था, जो सम्मान के लायक ही नहीं हैं, हमसे इतनी बड़ी भूल कैसे हो गयी। आम तौर पर देखा यहीं जाता हैं कि शैक्षिक संगठनों में जब किसी को पद से हटाया जाता हैं वो व्यक्ति वहां से बोरिया बिस्तर समेट कर अपने नये संस्थान में मनोयोग से कार्य करनें में जूट जाता हैं, पर यहां ऐसा देखने को नहीं मिल रहा। फिलहाल पूर्व निदेशक एड़ी चोटी एक किये हुए हैं, पत्रकारिता विभाग में निदेशक पद पर रहते हुए जिन छात्रों ने उनसे थोड़ी बहुत शिक्षा - दीक्षा ली, उससे वे गुरुदक्षिणा के रुप में निरंतर आंदोलन करने, विभाग में तालाबंदी कराने का संकल्प करा चुके हैं, इसलिए फिलहाल पत्रकारिता विभाग में तालाबंदी हैं, ये ताला कब टूटेगा, पढ़ाई कब जारी होगी, इसका सही उत्तर - पूर्व निदेशक सुशील अंकन ही बेहतर ढंग से दे सकते हैं।
बहुत सारे ऐसे सज्जन हैं - जो इन्हें बेहतर इंसान बताते हैं, मैं भी उन्हें बेहतर इँसान मानता हूं, पर कोई इंसान पद पाकर कैसे पागल हो जाता हैं, उसका सुंदर उदाहरण मैं अपनी आंखों से देख रहा हूं। पहली बार, जब पत्रकारिता विभाग में, वीसी ने इनके खिलाफ कौसिंल की मीटिंग बुलवायी तो इन्होंने मीटिंग में शामिल होना उचित नहीं समझा, जब मैंने उनसे बातचीत करनी चाही तो कहा कि वे बात करने की स्थिति में नहीं हैं, जबकि वहां गुंडागर्दी कर रहे अवांछनीय तत्व, जो कौंसिल मीटिंग के दिन इनके दिशा निर्देश पर तालाबंदी कर रहे थे, उत्पात मचा रहे थे, उनसे बातचीत करने में, इन्हें कोई दिक्कत नहीं आ रही थी। हमारे पास विजुयल हैं, उस दिन की इनकी हरकतें कैमरे में मेरे पास कैद हैं।
अब जरा देखिये, इनकी सुंदर कृति, मैं इनकी सुंदर कृति पर प्रकाश डाल रहा हूं................
क. इन्हीं की देख रेख में एक शिक्षिका जो एक ही समय में झारखंड से अन्यत्र शिक्षा भी ग्रहण कर रही थी और यहां शिक्षिका के पद पर भी आरुढ़ थी, भला एक ही व्यक्ति एक ही समय में, दो जगहों पर कैसे मिल सकता हैं, पर ये कार्य कर, इन्होंने विश्व रिकार्ड तोड़ दिया, फिलहाल किसी ने आरटीआई के तहत सवाल किये, तो वो शिक्षिका, स्वयं को इस संस्थान से अलग कर ली।
ख. आज भी बहुत सारे ऐसे पत्रकार हैं, इस संस्थान में पढ़ाई कर रहे हैं, जो एक ही समय में दो - दो जगहों पर मिलते हैं, यानी यहां नियमित छात्र भी हैं और विभिन्न अखबारों में उसी समय आपको कार्य करते मिल जायेंगे। ऐसा कमाल, सिर्फ और सिर्फ यहीं कर सकते हैं, मैं इनकी इस चतुराई के लिए भी नमन करता हूं।
ग. एक और कमाल, एक अखबार का संपादक, जो यहां का छात्र हैं, वो ज्यादातर पढाई से गायब रहता हैं, वो रांची में रहता ही नहीं हैं। नियम हैं कि एटेंडेंस 75 प्रतिशत होना अनिवार्य हैं, पर वो आता ही नहीं, फिर भी बिना एटेंडेंस पूरा किये, उसे परीक्षा देने की अनुमति दे दी जाती हैं, वो पढाई भी जारी रखे हुए हैं। इस कार्य के लिए भी मैं, ऐसे निदेशक को नमन करता हूं।
घ. यहां बहुत सारे ऐसे चैनल व अखबारों के छात्र भी पढ़ाई कर रहे हैं, जो इनके निर्देश पर कभी छात्र तो कभी पत्रकार बनकर, इनकी दिशा-निर्देश पर आंदोलन भी करते हैँ और कैमरा चमकाते हैं, यानी एक ही समय में छात्र भी और पत्रकार भी, धन्य हैं, ऐसे निदेशक जो इस प्रकार का दुकान चलाते हैं, इस कार्य के लिए भी, मैं इन्हें नमन करता हूं।
ऐसे तो भ्रष्टाचार के कई किस्से हैं, इनके। पर छात्र संगठनों से जूड़े मच्छड़ व चिरकुट नेताओं व पत्रकारों को पूर्व निदेशक में केवल गुण ही गुण दिखाई पड़ते है, इसलिए आंदोलनरत हैं। खूलेआम धमकी देते हैं कि गर निदेशक के पद पर सुशील अंकन की पुनःवापसी नहीं हुई, तालाबंदी जारी रखेंगे, आंदोलन करेंगे............
कमाल हैं
क. देश के जम्मूकश्मीर प्रांत के लद्दाख में चीनी सैनिक दस किलोमीटर अंदर तक घूस आकर, हमारे पुरुषार्थ को ललकारा हैं, पर इन मच्छड़ व चिरकुट नेताओं व पत्रकारों का खुन नहीं खौलता, वे इस बात को लेकर आंदोलन नहीं करते..........................
ख. रांची में वहशियों और जानवरों ने हमारी गुड़ियां बिटियां को जीना दूभर कर दिया, दुष्कर्म के आधा दर्जन से भी ज्यादा समाचार एक दिन में प्रकाशित और प्रसारित हो रहे हैं, पर  इन मच्छड़ व चिरकुट नेताओं व पत्रकारों का खुन नहीं खौलता, वे इस बात को लेकर आंदोलन नहीं करते..............
पर एक भ्रष्ट निदेशक को जिसे कौंसिल ने मीटिंग कर, आरोप सिद्ध करते हुए, उसके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई करने की मांग कर दी, तो ये आंदोलन पर उतारु हैं। धिक्कार हैं, ऐसे पत्रकारों व छात्र संगठनों से जूड़े मच्छड़ नेताओं को जिन्होंने पत्रकारिता को कर्मनाशा बना दिया....................
कमाल इस बात की भी हैं, सारे के सारे छात्र संगठन, इस पूरे प्रकरण पर दोहरे मापदंड अपना रहे हैं, क्या इससे पता नहीं चलता कि वर्तमान में, इस देश में ऐसे नक्कारा युवाओं की फौज आ गयी है, जिसे देश के सम्मान से ज्यादा, एक भ्रष्टाचारी को बचाने में ज्यादा आनन्द आता हैं, और जहां ऐसे लोग होंगे, उस देश व राज्य का भगवान ही मालिक हैं। ऐसे में चीन ने अभी तो दस किलोमीटर अंदर आकर अपनी चौकी बनायी हैं, घबराइये नहीं कल वो बिहार - झारखंड तक आ जायेगा, और आप पत्रकारिता विभाग में ताला लगाते रहियेगा। अरे शर्म करो, यार...................

Friday, April 19, 2013

ऐसी पत्रकारिता और ऐसी संस्थाओं को हम दूर से ही प्रणाम करते हैं, जो एक इज्जतदार व्यक्ति की इज्जत लूटने में अपनी शान समझता हैं..........................

रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में बावेला मचा है। दो गुट आमने - सामने है। एक गुट का नेतृत्व पत्रकारिता विभाग के निदेशक सुशील अंकन तो दूसरे गुट का नेतृत्व अतिथि शिक्षक इंदुकांत दीक्षित कर रहे है। एक चाहता हैं कि पत्रकारिता विभाग में वहीं हो, जो वो चाहे। दूसरा गुट चाहता हैं कि पत्रकारिता विभाग में वो हो, जो पत्रकारिता का कायदा - कानून चाहे, जिसमें छात्रों का हित छुपा हो। इस पूरे प्रकरण को रांची से प्रकाशित अखबारों ने भी हवा दी है। रांची से प्रकाशित हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया हैं, पर इनके द्वारा प्रकाशित समाचारों से एक पक्ष में कार्य करने की बू आ रही है। इन अखबारों में प्रकाशित खबरों को कोई भी पढ़े तो उसे लगेगा कि इन अखबारों ने समाचार न प्रकाशित कर एक व्यक्ति विशेष के पक्ष में कार्य करने का ही कार्य किया हैं, जो पत्रकारिता की मर्यादा के प्रतिकूल है। इन अखबारों ने तो इस प्रकरण में एक पत्रकार का मान हानि ही कर दिया है। मैं इसके लिेए इंदुकांत दीक्षित को धन्यवाद दूंगा, कि इस विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया।
रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में फिलहाल राजनीति हावी हैं, पत्रकारिता विभाग का सम्मान दांव पर लगा है, पर इसकी किसी को चिंता नहीं। ऐसा नहीं कि इसमें केवल प्रतिष्ठा इंदुकांत दीक्षित की ही जा रही हैं, देखा जाय तो इसमें सुशील अंकन की प्रतिष्ठा भी जा रही हैं, पर हमें लगता हैं कि उन्हें ये मालूम नहीं कि ऐसे माहौल में क्या करना चाहिए। जब इधर बेसिरपैर की बातें, अखबारों में छपने लगी तो मैंने भी इस प्रकरण को नजदीक से देखने की कोशिश की। पत्रकारिता विभाग के छात्रों, वरिष्ठ पत्रकार व अतिथि शिक्षक इंदुकांत दीक्षित और सुशील अंकन से मुलाकात की और इन महानुभावों से मुलाकात करने के बाद, मैने महसुस किया कि ये लड़ाई बेसिरपैर की है, दोनों पक्ष इसे सम्मान से जोड़ कर देख रहे हैं। साथ ही रही - सही कसर रांची से प्रकाशित अखबारों ने निकाल दी। इन्होंने पत्रकारिता के मर्यादाओं को ताड़-ताड़ करते हुए एक व्यक्ति विशेष के पक्ष में इस कदर समाचार प्रकाशित किया, कि इन्हें अखबार कहते हुए भी हमें लज्जा आती है, क्या समाचार एक व्यक्ति विशेष के पक्ष में छापे जाते हैं, क्या जिसके सम्मान से आप खेलने जा रहे हो, आपने उससे पूछा कि उसकी राय क्या है। गर नहीं तो आपको क्या हक हैं, इस संबंध में कुछ भी छापने की।
और अब हम आपको बताते है कि ये राजनीति कहां से शुरु हुई। राजनीति शुरु होती हैं, उस वक्त से, जब छात्रों के एक दल ने पत्रकारिता विभाग में व्याप्त गड़बड़ियों को उचित मंच पर उठाना शुरु किया। जब इनकी बात नहीं सुनी गयी तो छात्रों के एक दल ने कुलपति, रांची विश्वविद्यालय को अपनी 10 सूत्री समस्याओं को लेकर एक पत्र लिखी। वो समस्याएं इस प्रकार हैं--------------
1. सेमेस्टर - 1 में अधिकतर विषयों में व्यवहारिक ज्ञान की जगह नोट्स का वितरण किया गया।
2. प्रोफेशनल विषयों पर पूरे सेमेस्टर -1 में देश के विभिन्न भागों से किसी भी प्रोफेशन्लस पर्सन्स को बुलाकर कक्षाएं नहीं करायी गयी।
3. व्यवहारिक ज्ञान, समसामयिक मुद्दे और करंट विषयों पर चर्चा नहीं के बराबर होती हैं सिर्फ ओर सिर्फ नोट्स दिये जाते हैं।
4. सेमेस्टर - 1 में हमारे चार पेपर्स थे, जिसमें से पेपर - 2 मि. मल्लिक सर के द्वारा लिया गया। इस विषय की पूर्ण कक्षाएं तो हुई परंतु सिलेबस पूरा होने पर मल्लिक सर से चर्चाएं करने का एक भी मौका नहीं मिला।
पेपर - 2 में कुछ हिस्से मि. संतोष सर के द्वारा लिए गये मगर सर सिर्फ नोट्स से पढ़ाते है, उनमे किसी प्रकार का प्रश्न पूछने पर जवाब नहीं मिलता है। पेपर -3  मिस अनुपमा मेम के द्वारा लिया गया जिसमें हमें काफी सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा। पहली तो यह कि इस विषय की विषय-वस्तु सही प्रकार के हमें समझायी नहीं गयी। दूसरी मेम की खुद की पीएचडी की कक्षाएं होने के कारण हमारा सिलेबस पूरा नहीं हो पाया। जिसका नुकसान हमें अपनी परीक्षा में उठाना पड़ा। पेपर - 4 मि. सुधीर सर के द्वारा लिया गया जो कि हमें समझ में आया। पेपर - 1 में मि. इंदुकांत दीक्षित सर के द्वारा ली गयी और इस विषय से हम संपूर्ण संतुष्ट हैं, क्योंकि इस विषय में सर के द्वारा हमारी अच्छी पकड़ बनवायी गयी तथा सर के द्वारा और भी कई व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त हुए। पत्रकारिता का सही ज्ञान और उद्देश्य हमें उनसे ही प्राप्त हुआ, मगर दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से इस बार उन्हें कम कक्षाएं दी गयी हैं।
5. विभाग में आंखन देखी वीडियो मैग्जिन के अलावा पत्रकारिता और जनसंचार के किसी और आयाम जैसे - साक्षात्कार करना, समाचार बनाना, किसी भी घटना की कवरेज करना, समाचार लिखने की कला, अखबारों एवं टीवी न्यूज के प्रोडक्शन के बारे में व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त होने की कोई भी व्यवस्था नहीं होने के कारण हम सभी विद्यार्थियों में भारी निराशा हैं। आंखन देखी का अधिकतर प्रोडक्शन्स निदेशक महोदयजी के घर में ही होता रहा हैं जिससे अधिकतर विद्यार्थियों को लाभ नहीं हो पा रहा हैं।
6. हमारा अनुरोध हैं कि अध्यापकों पर हमें गुप्तढंग से फीडबैक बताने का अवसर दिया जाये।
7. विषय के उचित ज्ञाता अध्यापक ही कक्षा में बुलाया जाये।
8. अध्यापकों को इंटरेक्टिव कक्षा लेने के निर्देश दिये जाये।
9. हम छात्रों को किस अध्यापक से पढ़ने की रुचि हैं, वह जाना जाये।
10. आवश्यक होने पर हमारे अध्यापकों की कक्षा में आप स्वयं भी निरीक्षण करने आये तो हमारी समस्या का अवश्य निदान हो पायेगा।
छात्रों के इन समस्याओं को देखने के बाद अतिथि शिक्षक इंदुकांत दीक्षित ने पत्रकारिता विभाग के स्थायी सलाहकार वरिष्ठ पत्रकार बलबीर दत्त जी को एक पत्र लिखा। इंदुकांत दीक्षित को पत्र को देख बलबीर दत्त जी ने निदेशक पत्रकारिता विभाग को दो बार पत्र भेजी, जिसमें एक बैठक आयोजित कर, इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करने की बात कहीं गयी, पर निदेशक पत्रकारिता विभाग को बलबीर दत्त की ये बातें अच्छी नहीं लगी। मैंने जब इस संबंध में पत्रकारिता विभाग के निदेशक सुशील अंकन से बात की तब उनका कहना था कि बलबीर दत्त जी सिर्फ परामर्श दे सकते हैं, आदेश नहीं। वे उनकी बातों को मानने को बाध्य नहीं हैं। इधर बातें बढ़ती गयी, बाते इतनी बढ़ गयी कि आनन - फानन में, रांची विश्वविद्यालय के कुलपति ने 15 अप्रैल को पत्रकारिता विभाग की बेहतर संचालन के लिए 12 लोगों की एक कमेटी बना डाली और इसकी पहली मीटिंग 20 अप्रैल 2013 को आयोजित कर दी। जिसे सुशील अंकन और उनके चाहनेवाले मीडिया में कार्य कर रहे अन्य पत्रकारों को अच्छी नहीं लगी। अब सभी ने मौका ढूंढना शुरु किया। मौका भी जल्द मिल गया। जब पत्रकारिता विभाग में दो दिन पहले एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ और इस कार्यक्रम का जबर्दस्त फायदा उठाया - इंदुकांत दीक्षित के विरोधियों ने। ऐसा फायदा उठाया कि पूछिये मत। आनन - फानन में निदेशक ने कई निर्णय ले लिये। तत्काल प्रभाव से इंदुकांत दीक्षित को कक्षा लेने से वंचित कर दिया। जिस छात्र ने पत्रकारिता विभाग हो रहे गलत कार्य को लेकर कड़ा रुख अपनाया, उसे भी दंडित करने का कार्य शुरु कर दिया गया और इन सारी बातों को हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर से जूड़े पत्रकारों ने अपना हित साधने के लिए अनाप - शनाप खबर छापनी शुरु कर दी और एक व्यक्ति की इज्जत लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब 20 अप्रैल को क्या निर्णय कुलपति लेते हैं, सभी का ध्यान उसी ओर हैं। कुलपति के पास सवाल भी बहुत हैं...........
क. क्या सत्य की विजय होगी।
ख. क्या कुलपति दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में छपी बातों पर विश्वास करेंगे या इसकी सत्यता का जांच करायेंगे।
ग. क्या उन छात्रों को न्याय मिलेगा, जिसकी वे आंदोलन कर रहे हैं।
घ. क्या अयोग्य शिक्षक जो फिलहाल पत्रकारिता विभाग में कार्य कर रहे हैं, वे पढ़ाते रहेंगे या योग्य शिक्षक भी पत्रकारिता विभाग में दीखेंगे। 
ये कुछ सवाल अभी से मन-मस्तिष्क में मंडरा रहे हैं। अब इन प्रश्नों का हल कल निकल पाता हैं या नहीं। सभी का ध्यान अभी कुलपति की ओर हैं। अब जबकि दोनों पक्ष आमने -सामने हैं। हम अब भी चाहेंगे कि छात्रों के हित में सुखद निर्णय सुनने को मिले, जिससे छात्रों का भविष्य प्रभावित न हो और पत्रकारिता विभाग की मर्यादा भी बची रहे।

Thursday, April 18, 2013

क्या हुआ था - 11 अप्रैल को, प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक जी को गुस्सा क्यूं आता हैं......................

15 अप्रैल को मैं पटना में था...........। मेरे अग्रज तुल्य एक वरिष्ठ पत्रकार का सुबह-सुबह फोन आया, कि मेरे बारे में रांची से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक श्री विजय पाठक जी ने अपने फेसबुक पर डायरेक्ट तो नहीं पर इंडायरेक्ट में बहुत कुछ लिखा हैं। उन्होंने हमें ( कृष्ण बिहारी मिश्र को) गुंडा करार दिया हैं, क्या लिखा हैं फेसबुक पर जरा देखिये.........................
प्रभात खबर के संपादक श्री विजय पाठक के अनुसार, जो उन्होंने फेसबुक पर लिखा............ 
एक पत्रकार से सामान्य शिष्टाचार की तो उम्मीद तो करनी ही चाहिए. पर मेरी आंखों के सामने 11 अप्रैल को एक चैनल के रिपोर्टर ने जो हरकत की, उससे मेरे कुछ मित्रों की इस धारणा की पुष्टि होती इस पेशे में गुंडों (माफ़ करियेगा) की संख्या कम नहीं? 
bhaiya ye post hai...
Chandan Kumar ye v to bataiye ki kya hua tha...?
11 April at 21:40 · Like
Vijay Pathak Jaroor Bataunga Chandan.
11 April at 21:41 · Like · 1
Chandan Kumar waiting....?
11 April at 21:41 · Like
Rita Das nice pic bhaia...ranchi mein garmi adhik hai kya??
11 April at 21:43 · Like
Vijay Deo Jha such things are bound to happen if we don't take timely action against a system cropping in where a journalist considers himself as authority
11 April at 21:48 · Like · 1
Nitesh Kumar Gupta 200% sahi bhaiya, or aise he kuch reporter aapke press me v hai, sorry
11 April at 21:54 · Like
Manohar Lal isliye katju ji keh rahe hain ki media is full of mediocre journalists...
11 April at 21:55 · Like · 1
Vijay Kumar Singh समाज का जो स्वरुप तैयार हो रहा है.। उसमें आज शालनता से ज्यादा उग्रता
दिखाई दे रही है.। 20 वर्षो के पत्रकारिता के जीवन काल में कम से कम मै तो यह महसुस करता हुं.। आज नये पीढ के जो लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे है.। उनको लगता है कि मैने एक तोप के समान कलम रुपी हथियार पकड ली है.। अब सबको उडाते जाना है.। सृजन की जगह लोग विध्वंश की भुमिका में रहना पसंद कर रहे है.। समय के थपेडे जब अच्छी तरह पड जायेगी, तब सब सीख जायेगें।
11 April at 22:07 · Like · 3
Manoj Pathak ऐसे लोग पान की दुकान पर खड़े होकर भ्रष्टाचार मिटने का दावा तो जरुर करेंगे..पर जब अख़बार में लिखने या भिजुअल दिखाने की बात आएगी तो ये पिछड़ जायेंगे...माफ़ करेंगे !!! वैसे इसके लिए केवल पत्रकार ही दोषी नहीं है...प्रबंधन भी कम जिम्मेवार नहीं.. 11 April at 22:15 · Like · 4
Umesh Singh सबके सब दादागिरी पे उतार आते है .हाथ मे माइक लेकर अपने आप को गवर्नर से उपर समझते है .सब बिना हेल्मेट के टू व्हेल्लेर चलते है और पोलीस को धमकाते है............
11 April at 22:17 · Like · 4
Vijay Kumar Singh भाई मनोज पाठक जी प्रबंधन से जुडे लोग कि मात्र एक जबाबदेही रह गई है पैसा जुटाना.। आप तो जानते ही हो, जिसने पैसे को अपना लक्ष्य बना लिया हो.। उसके लिए फ़िर कोई चीज मायेने नही रखती.। ऐसी हालत में उनके लिए कुछ भी बोलना, मतलब बेवजह सिर दर्द मोल लेना।
11 April at 22:21 · Edited · Like · 1
Kumar Arpan Sir jo prepisition ban raha hai exactly vyakt karne ka woh alag hai . Justify aakhir kaise hoga ...Ye to press hi samjhega aur aane wale samay me batayega ki justify kaise hoga ..
11 April at 22:40 via mobile · Like · 2
Ranjan Singh Yahi nahi bhaiya aise logo ki sankhya adhik hai, jo wakai me patrakar hai hi nahi, junoon ka yah pesha awaidh kamaai ka dhandha ban chuka hai, paise k liye ye na shirf apna kaam bechte hai, imaan bechne ki aadat par chuki hai,
11 April at 23:15 · Like · 2
मतिकांत सिंह शेखावत भैया घटना के बारे में पता नहीं, लेकिन जहां तक बात है शिष्टता की, तो यह संस्कार मां-बाप से आते हैं। विश्वास के साथ कह सकता हूं कि उसका जिसकी चर्चा आपने की है, सामाजकरण ठीक ढंग से नहीं हुआ। वह अपने पारिवारिक जीवन में भी अशिष्ट होगा।
11 April at 23:26 · Like · 3
Nilu Srivastava Jo bhi hai wo...use uski aukat bataiye.
Friday at 00:11 via mobile · Like · 2
Saikat Chaterjee bhaiya app karyakramo me nahi jate isliye itni der lagi ise samjhne me
Friday at 08:21 · Like
Vinay K Pathak पत्रकारिता में अशिष्ट लोगों की संख्या न तो आज कम है और न ही आज से दस पंद्रह साल पहले कम थी...और ऐसा न सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है...बल्कि प्रिंट में भी है...ये बात किसी से छिपी नहीं है...इसलिए इसे एक चैनल वाले की अशिष्टता कहना ठीक नहीं है..वैसे भी गिरावट हर पेशे में आई है...फिर पत्रकारिता करने वाले ही दूध के धुले कैसे हो सकते हैं...हां ऐसे लोगों का नाम बताकर उन्हें बेनकाब करने की कोशिश जरूर करनी चाहिए...ताकि बाकी लोगों को भी उनकी सचाई का पता चल सके
Friday at 08:44 · Like · 3
Vaibhav Mani Tripathi असल समस्या यहाँ इस बात कि नहीं है कोई पत्रकार अशिष्ट हो गया ... समस्या है कि करिअर को बूस्ट् करने कि चाहत, चैनल प्रबंधन के समक्ष खुद को अधिक आक्रामक दिखाने कि खब्त और मन के किसी कोने में इस बात का दंभ कि साहब हम आने वाले दिनों में पुण्यप्रसून वाजपेयी, रजत शर्मा, कारन थापर कि पंक्ति में शामिल कर लिए जायेंगे क्यूंकि हम भी कैमरे के सामने दबंग दीखते हैं (ये अलहदा तथ्य है कि उनके जैसे कितने संघर्ष या अध्ययन इन सज्जन द्वारा किये गए हो! इसका पता किसी को नहीं ...) लॉर्ड एक्टन का एक कथन है कि जितनी आपकी शक्ति उतना ही भ्रष्ट होने कि संभावना...और जरुरी नहीं कि यह भ्रष्टाचार आर्थिक हो ....ये भ्रष्टाचार सांस्कृतिक और संस्कारिक है !!!
Friday at 09:40 · Like · 2
Manoj Singh avi chunav ka mahaul hai na sir. tb, aisa hona lazmi hai. naye hi kyun kai baristh patrkaron ko v hmne sahay , munda, mahto, soren samet anya parivaron ke darwajon mei nange nachte hue dekha hai. tb hamara khun khaulta hai dekhkar. lekin .. lekin ho jaata hai. bhagwan sadbudhi de vaise patrakar bhaiyon ko jo samaj ke karndhan mane jate hain aur khud ko samajhte hai. vah re patrkar . . . . bhai
Friday at 11:46 via mobile · Like · 1
Aman Kumar आप शायद जिस रिपोर्टर की बात कर रहे हैं..उसका इतिहास है कि वह भष्मासुर की तरह उन्ही लोगों को परेशानी में डालता है जो भी उसकी मदद करता है।
Friday at 11:51 · Like · 1
Neeraj Amitabh bhaiya anchal me to aur halat khrab hai, Patrakaron ki harkat dekh kar sharm aati hai.
Friday at 13:10 · Like · 1
Satya Prakash Prasad ye baat ho sahi hai sir pr jabtak media me bhai bhatiwaj chalega tab tak yahi hoga
Friday at 14:58 · Like · 1
Arbind Mishra yese logon ke karan hi patrkarita par se logon ka vishwash uthne lag gya hai. bahut dukhad ghatna hai sir.
Friday at 16:01 via mobile · Like · 1
Jaideep Deogharia If i am not wrong the journalist in discussion is not a new-age (young journalist) so it would be better if people dont accuse the generatio. Mera sabhi senior journalists se anurodh hai ki mutual contribution se fund karke hi ek quaterly meeting and introspection ki vyavastha karein. Jo naye ya purane patrakar hain unke samajik vyavahaar ki vivechna ka koi manch toh ho.
Friday at 16:11 · Like · 1
Jayanti Kumari कल मेरी एक पत्रकार मित्र बता रही थीं कि एक बिल्डर के चैनल का कोई टुटपुंजिया पत्रकारिता के नाम पर खुजली करने के लिए सूचना भवन पहुंचा था। कल ही फेलोशिप अवार्ड को लेकर पत्रकारों की मेंटर्स के साथ बैठक थी। खुजली वाले साहब ने अपने चरित्र के अनुसार अभद्रता के साथ अपनी परवरिश का परिचय दिया है। बेचारे की कुंठा लगती है। वैसे भी कहा जाता है कि असफल व्यक्ति दूसरों की सफलता के कारण कुंठित होता है, जिसका परिणाम अंततः असभ्यता के रूप में सामने आता है। आपके मित्र इन्हें गुंडा कहते होंगे, मेरी नज़रों में ऐसे लोग टुटपुंजिये हैं। Friday at 17:27 · Like · 3
Akash Singh सर जब मीडिया का स्तर ही गिर गया हो .......... काबिल लोग नौकरी के लिए चप्पलें घीस रहें हो और रोड छाप मीडिया में आकर माइक, कैमरा और कलम पकड़ लें तो इससे ज्यादा उनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है ......
Friday at 20:37 · Like · 1
Pradeep Kumar Singh विजय भैया, आपकी टिप्पणी चिंतनीय है। ऐसे लोगों को बेनकाब करना चाहिए। कांके के मानसिक अस्पताल में इलाज का खर्च हमलोग चंदा कर जुटा लेंगे।
Friday at 21:11 · Like · 4
Pradeep Kumar Singh विजय भैया, गुस्ताखी माफ, एक और इलाज है। कान के नीचे मिलकर संयुक्त रूप से बजाइए। दिमाग-अक्ल ठिकाने आ जाएगा।
Friday at 21:17 · Like · 4
Sunil Kedia pahle berojgar log insurence me aate the ab ptrakarita naya kam mila hai main aise aise log ko ptrakar ya uske aage beuro chief ke roop me janta hoon jo sirf peet
ptrakarita kar ya logo ko nicha dikha kar apni kuntha ko sant karte hai unki najar me sare paise wale chor aour galat kam kar paisa kamate hain apni nakami ko dusare ke samman ko thesh pahucha kar santustha hote hain.
Saturday at 09:29 · Like · 1
Sanjay Choudhary Khusi hoti hai jab bade bhaiya kisi galati ka ehsas karate hain. ham sabhi ko milkar is samasya se nibatna hoga.
Saturday at 13:22 · Like · 1
Jha Neeraj esiliye to ptrakar ka satkar aur chamatkar dono khatam ho gaya.
Yesterday at 11:10 · Like · 1
Zafar Hussain aese logon ne hi patrakarita ko badnaam kiya hai.
19 hours ago · Like
G.s.Ojha पत्रकार पत्रकार ही रहे सूचना आयुक्त या प्रेस एडवाइजर न बने । जनता का एक्सप्रेशन का अधिकार है उसके आप सिपाही मात्र है मालिक ना बने । हमलोग सब जानते हैं इसी लिए सिर्फ पत्रकार हैं। नेता अफसर बिज़नसमैन दलाल सब एक समान । न कोल् ब्लाक , न ठेक्का पट्टा । जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ 14 hours ago · Like
कमाल हैं 
उन्होंने खुद लिखा तो लिखा, अपने चाहनेवालों से भी मेरे खिलाफ दिल खोलकर गालियां लिखवायी............जरा देखिये एक लड़की जयंती कुमारी क्या लिखी हैं........
कभी मेरे साथ काम कर चुके, मेरे से जुनियर रह चुके अमन कुमार तो मुझे भस्मासुर तक बता दिये हैं, ये वहीं अमन कुमार हैं, जिनकी यशकीर्ति भड़ास4मीडिया.कॉम ने बहुत पहले इश्क कमीना के नाम से सारे लोगों के समक्ष रख चुकी हैं,यानी चलनी दूसे सूप के जिन्हें बहत्तर छेद और एक मित्र ने तो विजय पाठक जी को सलाह दे डाली कि वे मुझे कांके के मानसिक आरोग्य अस्पताल तक पहुंचा दें और इससे भी मन नहीं भरा तो वे मुझे कान के नीचे कुछ लगाने की बात कह रहे हैं, 
अब बात सामान्य लोगों और असामान्य लोगों से................
क्या जिस भाषा का प्रयोग विजय पाठक जी और उनके चाहनेवालों ने मेरे खिलाफ किया, क्या वो भाषा एक पत्रकार की हो सकती हैं। विजय पाठक जी ने तो ये बताया ही नहीं कि 11 अप्रैल को क्या हुआ था। असल में उन्हें ये बताना चाहिए था कि 11 अप्रैल को क्या हुआ था। गर वो बताते तब पता चलता कि असली गुंडा कौन हैं......................हालांकि जिन भाषा का प्रयोग विजय पाठक जी ने हमारे बारे में किया हैं, उन भाषा का प्रयोग मैं उनके लिए नहीं कर सकता, क्योंकि कल तक मैं उन्हें भैया कहकर बुलाता था और आज मैं उऩके लिए आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग करुं, ये मेरे माता - पिता ने नहीं सिखाया, क्योंकि बड़ा भाई, बड़ा भाई होता है...........आज किसी बात को लेकर वो नाराज हैं तो कल वे प्रसन्न भी हो सकते हैं, इसलिए गालियां और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग उनके लिए मैं करुं, कम से कम इस जन्म में तो मुझसे नहीं हो सकता............................
अब हम आपको बताते हैं कि 11 अप्रैल को क्या हुआ था........................
11 अप्रैल को रांची स्थित सूचना भवन के जनसंपर्क विभाग कार्यालय में 76 लोगों के बीच पत्रकारिता के क्षेत्र में फैलोशिप के लिए 38 लाख रुपये निर्धारित किये गये, जिसकी अग्रिम राशि 15-15 हजार रुपये चेक के माध्यम से प्रत्येक को दिये जा रहे थे। जिसकी जानकारी सिर्फ फैलोशिप दिलाने के लिए बनी टीम, उसमे शामिल जनसंपर्क अधिकारियों और अग्रिम राशि लेने और देनेवालों की थी, बाकी को इसकी सूचना नहीं दी गयी थी, यानी गुपचुप तरीके से इस कार्य का निपटारा होना था, जबकि पिछले साल इसी प्रकार के कार्यक्रम के लिए, बीएनआर होटल बुक किये गये थे, खूब प्रचार प्रसार किया गया था, जिस दिन कार्यक्रम हुए थे, उसके एक दिन पहले से लेकर एक दिन बाद तक कार्यक्रम की सभी समाचार पत्रों व इलेक्ट्रानिक मीडिया में जगह मिली थी, जबकि इस बार ऐसा देखने को नहीं मिला। हमारा सवाल य़हीं था - कि आखिर जब एक छोटी राशि इसी प्रकार के कार्यक्रम के लिए पिछले साल दी गयी तो इसका खूब प्रचार - प्रसार हुआ, इस बार तो बड़ी राशि हैं, ऐसे में, गुपचुप तरीके से ये कार्यक्रम क्यों आयोजित किया गया, इस प्रश्न का उत्तर न तो फैलोशिप टीम में शामिल सदस्य दे रहे थे और न ही वे अधिकारी जो जनसंपर्क विभाग से जूड़े थे। 
मेरा दूसरा सवाल था - कि आखिर सवालों से ये लोग क्यों बच रहे हैं, कभी उपर और कभी नीचे ये लोग क्यों भाग रहे थे। ये कार्यक्रम जनसंपर्क विभाग के कार्यालय में जब होना ही था तो आखिर इस कार्यक्रम को स्थगित कर, सीधे-सीधे सभी लोगों को ये क्यूं कह दिया गया कि वे चुपके से पन्द्रह-पन्द्रह हजार रुपये की चेक लेकर चलते बने..................
मेरा तीसरा सवाल एक ही व्यक्ति दो - दो जगह बैठकर, अपने चाहनेवालों पर इतनी कृपा क्यूं लूटा रहा हैं, क्या फैलोशिप ऐसे ली और दी जाती हैं....................
मैरा चौथा सवाल था कि फैलोशिप देना था वर्किंग जर्नलिस्टों को, तो फिर गैर पत्रकारों पर ये कृपा क्यूं लूटा दी गयी......................
मेरे मित्रों, इन सवालों का जवाब कोई नहीं दे रहा था, सभी भाग रहे थे, जो जहां था, वो कन्नी काट रहा था, मैं पूछ रहा हूं, जब आप सत्य हो, अखबार को आंदोलन बनाने की बात करते हो, तो आप क्यों भाग रहे हो.................
पर इन महानुभावों ने मेरे बातों का जवाव तो नहीं दिया, विजय पाठक जी ने उलटे मेरी शिकायत मेरे चैनल मालिक से कर दी। इस शिकायत में उन्होने क्या कहा, मैं नहीं जानता ये मेरे चैनल मालिक और विजय पाठक जी ही बता सकते हैं..............सवाल उठता हैं कि विजय पाठक जी को मेरे चैनल मालिक से शिकायत करने की आवश्यकता क्यूं पड़ गयी। मैं कोई भी समाचार करुंगा तो क्या विजय जी से पूछ कर करुंगा............
विजय जी ने जो अपने फेसबुक पर लिखा हैं, और कमेंटस मंगवाई हैं, मैं उऩसे आग्रह करुंगा कि वे अपने अखबार में इस प्रकरण को सच्चाई से स्थान क्यूं नहीं दे देते, अपनी भड़ास के लिए फेसबुक को क्यूं चुना, जबकि वे एक अखबार के संपादक हैं....................
आखिर वे सूचना भवन से मेरे खिलाफ अनाप-शनाप बकते हुए, गुस्से से क्यूं लाल-पीले होते हुए भागे, जबकि हिन्दुस्तान के चंदन मिश्र ने मुझसे खुलकर बातचीत की, मैंने उनका पक्ष भी रखा....................
अब सवाल सीधे विजय जी से.........................
क. क्या किसी को गुंडा कहना, आपके मुंह से शोभा देता हैं................
ख. क्या आपके द्वारा चैनल मालिक से रिपोर्टर की शिकायत करना शोभा देता हैं, क्या मैंने आपकी शिकायत किसी से की, गर कोई प्रमाण हैं तो बताये...........
ग. क्या मेरे चैनल अथवा मुझे समाचार संकलित करने के लिए आपका आदेश लेना होगा..............
घ. क्या आपने सूचना भवन में मेरे उपर टीका टिप्पणी नहीं की थी, और उस टीका टिप्पणी पर मैने आपके साथ कोई अभद्र व्यवहार किया था क्या..........
ड. आपकी गर कोई मुझसे शिकायत थी तो आपने डायरेक्ट मुझसे क्यों नहीं बातचीत की, क्या मैं आपकी बातों का अवहेलना कर देता, इसकी आशंका आपको थी क्या................
च. चलिए, जब आपने फेसबुक पर मुझे गुंडा करार दे ही दिया, और आपके मित्रों ने आपको सलाह दे ही डाली, तो उन सलाहों पर आप कब अमल कर रहे हैं............
छ.ईश्वर से डरिये, स्वयंभू मत बनिये, मैं क्या हूं, मुझे बताने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि मेरा साथ ईश्वर हमेशा रहता हैं, वो बताता रहता हैं कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए...............
ज. आप मेरे बारे में कुछ भी लिखिये, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं आपके खिलाफ कोई भी गंदी भाषा का प्रयोग नहीं करुंगा और न ही मेरे मित्र ऐसा करेंगे, क्योंकि मैंने श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ी हैं, जिसमें कर्मफल सिद्धांत की बात कही गयी हैं, यानी कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान, जैसा कर्म करेगा, वैसा फल देगा भगवान..................
झ. आप कोई पहले व्यक्ति नहीं, जिन्होंने मुझे गाली दी हैं, आप जैसे कई लोगों ने हमें गालियां दी हैं, मैं तो बचपन से ही गालिंया सुनता आया हूं, क्योंकि जिन्हें मेरी बाते अच्छी नहीं लगती, वे मुझे गालियां देकर ही मुझे सुशोभित करते हैं, क्योंकि उनके पास दुसरी वस्तु देने की कोई चीज भी नहीं होती, ऐसे भी आप जहां कार्य करते हैं, वहां मेरे बहुत सारे मित्र हैं, उनसे पूछ लीजियेगा, मैं किसी का कुछ नहीं लेता, गर कुछ नहीं लेता, तो फिर आपकी गालियां कहा पर पड़ी हैं, आप खुद चिंतन करिये.................
अरे मैं तो कबीर की फिलौसिफी पर चलता हूं..................
यानी
मन लागा, मेरा यार फकीरी में, जो सुख पाउं राम भजन में
वो सुख नाही अमीरी में, भला-बुरा सब का सुन लीजै
कर गुजरान, गरीबी में, मन लागा मेरा यार फकीरी में..........................

Friday, April 12, 2013

भाकपा माले का 9 वां राष्ट्रीय महाधिवेशन रांची में संपन्न.....

भाकपा माले का 9वां राष्ट्रीय महाधिवेशन रांची के जिला स्कूल में संपन्न हो गया। राष्ट्रीय महाधिवेशन रांची में होने से इस पार्टी को और नजदीक से देखने का मौका मिला। ऐसे तो इस पार्टी को जानने के लिए मुझे ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत भी नहीं, क्योंकि इस पार्टी के एकमात्र विधायक दिवंगत महेन्द्र प्रसाद सिंह के सत्चरित्र को मैंने नजदीक से देखा हैं, पता नहीं ऐसे - ऐसे सत्चरित्र और भ्रष्टाचार से आजीवन लड़नेवाले लोगों की हत्या क्यूं कर दी जाती हैं। देश के कोने कोने से आये माले के कार्यकर्ता और उसके नेता देश के अन्य दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं से अलग दीखे। माले का अधिवेशन 2 से 6 तक चलना था,  फिर 7 को सांस्कृतिक कार्यक्रम और 8 अप्रैल के आमसभा से होकर उसे गुजरना था, पर रांची में हो रहे नगर निकाय चुनाव और 6-7 अप्रैल के माओवादियों को बिहार-झारखंड बंद का इस पर असर दिखा। आनन -फानन में पूरे कार्यक्रम 7 को ही समाप्त करना पड़ा। 7 अप्रैल को झारखंड के विधानसभा मैदान में आयोजित रैली से कार्यक्रम का समापन हुआ। बहुत समय से मेरे मन में ये उथल -पुथल हो रहा था कि क्या भाकपा माले भी वहीं हैं, जैसा कि अन्य दल हैं, पर जिस प्रकार से देश के कोने - कोने से माले कार्यकर्ता आये, जिस प्रकार इन्होने मर्यादाओं में रहकर, रांची की जनता का दिल जीता, वो सचमुच प्रशंसनीय हैं।
हमें अच्छी तरह मालूम हैं, जब माले के कार्यकर्ता ने हमें पार्टी मुख्यालय बुलाया, तब वहां उत्तरप्रदेश, बंगाल और बिहार से आये कलाकार, अपनी कूचियों से कलाकृति बनाकर रंग भर रहे थे, साथ ही देश की अर्थव्यवस्था, नेताओं, कारपोरेट जगत और पत्रकारों की मिलीभगत से लूट रही जनता का चित्र उकेर रहे थे, उनके चित्र को देखकर ऐसा लगा कि गर मैं चित्रकार होता तो मैं भी इसी प्रकार का आज के परिप्रेक्ष्य में चित्र बना रहा होता, पर मैं चित्रकार तो हूं नहीं, पत्रकार हूं। इसमें कोई दो मत नहीं कि इस देश को तथाकथित नेताओं, पत्रकारों और पूंजीपतियों ने अपने हित साधने के लिए, यहां की जनता को सूली पर लटकाने का मन बना लिया हैं, कई तो लटक लिये हैं, और कई लटकने को विवश हैं। ऐसे हालत में जनता को एक सूत्र में पिरोने और एकमात्र विकल्प जनसंघर्ष ही हैं, ये वर्तमान में ज्यादा आवश्यक हैं, पर माले के महाधिवेशन की शुरुआत में देश के सारे के सारे वामपंथियों की एकजूटता हमें खली, वो इसलिए क्योंकि मंच पर उपस्थित इन नेताओं और पार्टियों को देश की जनता देख चुकी हैं। उसके उदाहरण भी कई हैं, जिसे यहां देना जरुरी हैं। जरा बंगाल में शासन करनेवाली माकपा को देखिये, सिंगुर में इसके द्वारा किये गये कारनामे बताते हैं कि ये कारपोरेट जगत का कितना ख्याल रखती है। जब देश में अमरीका परस्त नीतियों को संसद से पास कराने की बात हो रही थी, जब देश के संसद में सरकार बचाने के लिए नोटों के बंडल रखे जा रहे थे, तब उस समय वामपंथी लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी की क्या भूमिका थी, कैसे एक माकपा सांसद माकपा के विचारधाराओं की तिलांजलि दे, हज की यात्रा पर चला गया और कैसे मंच पर आसीन कई नेता जो अमरीका के खिलाफ खूब आग उगलते हैं, पर भारत को चारों तरफ से घेर रहा चीन, तिब्बत को निगलनेवाला चीन, भारत के जम्मूकश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के कई भूभागों को हड़प चुका चीन, उसे साम्राज्यवादी नहीं दिखाई देता। हमें लगता है कि कुछ चीजों को हटा दे तो ये माले का महाधिवेशन एक इतिहास बनाया हैं, पर कुछ ऐसी चीजें भी दे गया, जिससे एक बड़ा प्रश्न चिह्न भी रख गया हैं। आखिर जनता वामपंथियों पर क्यों विश्वास करें। अमरीकी सामान भारतीय बाजार में आये तो गलत और चीनी सामग्रियां भारतीय बाजार पर छा जाये, तो गलत नहीं। क्या ये वामपथी धाराएं देशहित में हैं। एक बात और महाधिवेशन के पहले दिन गदर आंदोलन के नेताओं व कार्यकर्ताओं को श्रद्धांजलि दी जा रही थी, उस दौरान हिंदुत्व को कटघरे में रख दिया गया पर इस्लाम को छोड़ दिया, आखिर क्यों................। ये समझ से परे हैं। हालांकि इसकी जरुरत ही नही थी, बेवजह किसी को नीचा दिखाना, उसके प्रचार के सिवा और कुछ नहीं, और ये माले का महाधिवेशन जहां जिसकी जरुरत नहीं, उसे प्रचार दे गया................................।

Sunday, March 31, 2013

हनुमान मंदिरों का शहर - रांची......................

मेरा रांची से 28 सालों का रिश्ता है। इस दौरान रांची में, मैंने बहुत कुछ देखा और महसूस किया। सर्वाधिक अचरज में डाला - रांची के लोगों का हनुमान प्रेम। ये हनुमान प्रेम ही हैं कि रांची में यत्र-तत्र-सर्वत्र हनुमान ही  हनुमान दीखते है। कोई ऐसा इलाका नहीं, जहां हनुमान विद्यमान न हो। ऐसे कहा भी गया हैं कि हनुमान, इस कलियुग के एकमात्र जीवित देवता हैं, जो सरल, सहज व सहृदय हैं, भक्तों की जल्द सुनते हैं और हर प्रकार के कष्टों से मुक्त कर देते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि रांचीवासियों को संकटमुक्त करने के उद्देश्य से, रांचीवासियों ने इन्हें यत्र-तत्र-सर्वत्र स्थापित कर दिया हैं और लगे हाथों हनुमानजी ने भी, रांचीवासियों की सुरक्षा का भार संभाल लिया हैं। आखिर कहां- कहां हनुमानजी हैं, सबसे पहले हम इसकी चर्चा करते हैं।
प्रारंभ रांची जंक्शन से - गर आप झारखंड अथवा रांची के बाहर के निवासी हैं तो आप सबसे पहले रांची जंक्शन आये। आप देखेंगे कि स्टेशन से बाहर निकलते ही उत्तर की ओर, संकटमोचन हनुमान मंदिर दीखेगा, जिसे टेम्पूचालकों, रिक्शाचालकों और स्थानीय लोगों ने स्थापित किया हैं। रांची जंक्शन के सौंदर्यीकरण के दौरान इस मंदिर को स्थानांतरित करने का प्रयास करने की कोशिश की गयी, फिर क्या था, लोग उबल पड़े। खूब भजन-कीर्तन होने लगी। विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जूड़े लोग आ खड़े हुए और सौंदर्यीकरण का काम ठप पड़ गया। अंततः फैसला हुआ कि हनुमान मंदिर को छूए बिना सौंदर्यीकरण का कार्य शुरु हो, और हनुमान जी तब से लेकर आज तक गदा पकड़े और संजीवनी उठाये जमे हुए हैं। रांची जंक्शन के दक्षिण ओर गर आप जाये तो इसके दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में भी हनुमान जी दीखेंगे। ये हनुमान इस प्रकार से आपको मिलेंगे, जैसे लगता हैं कि हनुमान जी, पूरे रांची जंक्शन की सुरक्षा में लग गये हो। रांची जंक्शन से जैसे आप ओभरब्रिज की ओर चलेंगे तो पटेल चौक पर भी हनुमान मंदिर दीखेगा। शायद यहां के हनुमान जी लोहरदगा-रांची रेलवे लाइन, सरकारी बस स्टैंड और इसके आसपास स्थिति विभिन्न लग्जरी होटलों की सुरक्षा में लग गये हो, यहीं नहीं इसी चौक से शुरु होती हैं रांची-पटना मुख्यमार्ग तो इसकी भी सुरक्षा, हनुमान जी ही किया करते हैं। इससे थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो मिलेगा ओभरब्रिज और ठीक इसके नीचे आपको हनुमान मंदिर मिलेगा, जहां हनुमान जी आपको करताल बजाते मिलेंगे। शायद ये हनुमान जी करताल बजाते हुए, ये कह रहे हो कि रांची में रामजी की कृपा से सब कुछ ठीक-ठाक हैं और यहीं से पश्चिम की ओर बढ़ेंगे तो कडरु ओभरब्रिज मिेलेगा, उसके नीचे भी हनुमानजी मिलेंगे, यहीं नहीं यहीं से थोड़ा दूर हटकर, अरगोड़ा रेलवे स्टेशन जानेवाली मार्ग पर भी  हनुमान जी हाथ में गदा हिलाते हुए मिल जायेंगे। दूसरी ओर सुजाता चौक अथवा लाला लाजपत राय चौक पर भी हनुमान जी की मंदिर आपको देखने को मिलेंगी। अलबर्ट एक्का चौक की ओर गर आप बढ़े विभिन्न प्रमुख बैंकों, गुरुद्वारों और होटलों के ठीक पास एक मल्लाह टोली हैं, जहा आपको हनुमानजी वीरासन में बैठें मिलेंगे और ठीक इसके आगे मिलेंगे डेली मार्केट के पास हनुमान जी, अपने पांवों से अहिरावण को दबाये, अपने कंधों पर राम और लक्ष्मण को उठाये। इस मंदिर को भव्यता प्रदान करने के लिए भक्तों की बड़ी टोली लगी हैं, निरंतर यहां कुछ न कुछ निर्माण चलता रहता हैं। 
हनुमान जी का सिक्का यहां कैसे चलता हैं, उसका परिदृश्य देखिये। जब अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने मुख्यमंत्री आवास में भी हनुमान मंदिर का निर्माण करा दिया। अब जब राज्य के मुख्यमंत्री, हनुमान के शरण में हो, तो आप समझ सकते हैं कि यहां हनुमान जी कैसे राजकाज में दखल देते हुए सुरक्षा का भार उठाये हुए हैं। मुख्यमंत्री आवास हो या राजभवन या स्पीकर आवास या पुलिस आवास, इन सभी आवासों से निकलनेवाले महानुभावों की सुरक्षा का भार भी हनुमान जी ने उठा रखा हैं। वे इसके लिए रातू रोड चौक पर उपस्थित होकर, सभी को सुगमता और सुरक्षा प्रदान करते हैं। कहा भी गया हैं कि जो हनुमान की शरण में गया, उसके सारे ग्रह-गोचर ठीक, क्योंकि हनुमान हैं ही ऐसे।
गोस्वामी तुलसीदास को जब कष्ट हुआ तो वे हनुमानजी की शरण में ही गये और लिख डाली - हनुमान चालीसा। ये हनुमान चालीसा इतनी लोकप्रिय हो गयी, कि पूरे देश में बिना सूचना एवं प्रौद्योगिकी के ही घर - घर पहुंच गयी। धन्य हैं हनुमान जी..................
कहा भी जाता हैं....................
संकट कटैं मिटै सब पीड़ा,
जो सुमिरै हनुमत बल-बीरा
जै जै हनुमान गोसाईं
कृपा करहुं गुरदेव की नाईँ
जो सत बार पाठ कर कोई
छुटिहिं बंदि महासुख होई
जब हनुमान चालीसा पढ़ने से महासुख हो सकता हैं तो भला हनुमानजी के दर्शन करने से क्या होता होगा, समझा जा सकता हैं, इसलिए, रांचीवासी फिलहाल हनुमान की शरण में हैं और हनुमानजी सभी का कल्याण करने के लिए, सुरक्षा प्रदान करने के लिए पूरे रांची के मुह्ल्लों, चौक-चौराहों में विद्यमान हैं। हमें लगता हैं कि इतने हनुमानजी तो किसी तीर्थस्थल पर भी नहीं होंगे, जितने हमारे रांची में। अब तो हमारी हनुमानजी से यहीं प्रार्थना हैं कि जैसे, उन्होंने सभी के सुरक्षा का भार उठा रखा हैं, थोडा़ हमारे उपर भी कृपा बनाये रखे...............

Wednesday, March 27, 2013

जब आप होली के मूलस्वरुप को अर्थात् कृष्ण को अपनायेंगे, तब न तो रंग और न ही गुलाल की आवश्यकता पड़ेगी........

सारा भारतवर्ष होली के रंग में रंगने को तैयार हैं। कई होली के रंग में रंग चुके हैं तो कई इसके लिए तैयारी कर रहे हैं। वो इंतजार कर रहे हैं, एक निश्चित समय का। जब वो होली के आनन्द में डूबकी लगायेंगे। पर सच्चाई ये हैं कि होली वहीं मनाता हैं जो कृष्ण के समीप हैं, जो कृष्ण के समीप ही नहीं, वो होली का आनन्द क्या लेगा। आज तो सारा भारतवर्ष जलसंकट से जूझ रहा हैं, कई लोग तिलक होली खेलने की वकालत कर रहे हैं और पानी बचाने का इसे एकमात्र उपाय बता रहे हैं, तो कई ने होली नहीं खेलने का फैसला किया हैं। होली नहीं खेलने का तर्क भी, उन्होंने बहुत अच्छा ढूंढ निकाला हैं। उनका कहना है कि होली में पानी बेतहाशा खर्च होता हैं, नष्ट होता हैं। इसलिए वो होली नहीं खेलेंगे। जबकि सच्चाई ये हैं कि होली के समय ऐसा तर्क देनेवाले अन्य दिनों में जल संरक्षण पर ध्यान ही नहीं देते। कभी - कभी मैं सोचता हूं कि
क्या होली, एक दूसरे को रंग लगाने का नाम हैं
क्या होली, एक दूसरे के गालों पर गुलाल मलने का नाम हैं
क्या होली, एक दूसरे को तंग करने या एक दूसरे को देख लेने का नाम हैं
उत्तर हैं - नहीं।
होली तो इन सबसे अलग प्रभु के हृदय में स्थान पाने का नाम हैं। होली तो उन सबको गले लगाने का नाम हैं, जो किन्हीं कारणों से हमसे बहुत अलग हैं, जो समाज के मुख्यधारा से कटे हैं, जिन्होंने संसार के प्रमुख उपभोग करनेवाली वस्तुओं का सेवन तक नहीं किया। उन्हें अपने घर बुलाकर, स्वयं से अहंकार को दूर कर, प्रभु का हो जाने का नाम हैं। जब - जब होली आती हैं, लोग प्रह्लाद और होलिका की कथा को याद करते हैं, पर भूल जाते हैं कि प्रह्लाद और होलिका दोनों एक प्रतीक हैं। प्रह्लाद धर्म का तो होलिका अधर्म की प्रतीक हैं। आश्चर्य इस बात की भी कि प्रह्लाद और होलिका एक परिवार से हैं। होलिका प्रह्लाद की बुआ हैं। वो प्रह्लाद को मार डालना चाहती हैं, फिर भी प्रह्लाद बच कर निकल जाता हैं। प्रह्लाद का बचकर निकलना, होलिका का जल जाना- क्या संदेश देता हैं। संदेश वहीं हैं। धर्म हमेशा विजयी होता हैं, अधर्म सदैव हारता हैं। ये कथा बड़े ही सरल शब्दों में ये भी संदेश देती हैं कि अधर्म से आपको घर में भी जूझना पडे़गा, ये आपके उपर निर्भर करता हैं कि आप अधर्म से कैसे लड़ते हैं, उस पर कैसे विजय प्राप्त करते हैं या अधर्म के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। वो कहते हैं न कि जीने के दो मार्ग हैं, एक धर्म का और दूसरा अधर्म का। ये आपके उपर निर्भर करता हैं कि आप किस मार्ग को अपनाते हैं। आप होली के दिन रंग-गुलाल लगाये अथवा नहीं लगाये पर जब आप समाज के मुख्यधारा से कटे लोगों को हृदय लगाते हैं तो होली को बहुत फर्क पड़ता हैं। वो फर्क ये हैं कि इससे समाज बनता हैं, देश बनता हैं और होली के एकात्मता, मानवीय मूल्यों और धर्म के मूलस्वरुप की पहचान हो जाती है......................
जायसी हो या रसखान या रहीम, सभी ने कृष्ण को पहचाना और वे आजीवन होली के रंग में डूबे रहे
याद करिये रहीम मानवीय मूल्य रुपी रंग को कैसे परिभाषित करते हैं............
जे गरीब पर हित करे. ते रहीम बड़ लोग
कहां सुदामा बापूरो, कृष्ण मिताई जोग
मीरा तो कृष्ण के सांवले सलोने रुप पर इतनी बलिहारी होती हैं, वो कृष्णरुपी भक्ति रंग में ऐसे डूबी कि वो बार - बार यहीं कहती रही
श्याम पिया, मोरी रंग दे चुनरियां...........यहीं नहीं वो तो इससे भी अलग कह डालती हैं, वो क्या, जरा मीरा के शब्दों में सुनिये
अपने ही रंग में, अपने ही रंग में, रंग दे चुनरिया, श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया................
हमें लगता हैं कि कृष्णरुपी भक्तिरंग, धर्म स्वरुपी विलक्षणरंग में जो रंग जाता हैं, उस पर कोई अन्य रंग चढ़ ही नहीं सकता और जिस पर अन्य रंग नहीं चढ़ता, वो कृष्ण का हो जाता हैं, तो हम क्यों नहीं कृष्ण के आचरण को अपनाते हुए, धर्म को धारण करते हुए, इस होली को मनाये। हमें नहीं लगता कि इस प्रकार की होली खेलने में, रंग और गुलाल की भी आवश्यकता पडे़गी और फिर कोई कह नही पायेगा कि वो जल संरक्षण के लिए, इस बार तिलक होली खेलेगा या होली नहीं खेलेगा। जरुरत हैं, होली के मूलस्वरुप को समझने की, जो हम भूलते जा रहे हैं...........................

होली तो प्यार बांटने का नाम हैं..........................

फिर होली आ गयी। लोग फिर रंग-गुलाल अपने घरों में लायेंगे। एक दूसरे को लगायेंगे। होली हैं....कहकर शोर मचायेंगे। पुए-पकवान खायेंगे। आजकल तो एक नया फैशन भी चला हैं। कई घरों में मुर्गे-मुर्गियां हलाक होंगे। बकरें भी काट दियें जायेंगे, लोग होली हैं..........कहकर इठलायेंगे, बलखायेंगे और लीजिये मन गयी होली...................। क्या सचमुच होली इसी का नाम हैं। बचपन से लेकर आजतक होली के इस रंग ने मेरे मन को व्यथित किया हैं जिसे मैंने कभी स्वीकार ही नहीं किया। क्योंकि भारतीय वांगमय तो सदियों से यहीं कहता आया हैं...........................
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होली तो प्यार बांटने का नाम हैं
होली तो एक दूसरे को गले लगाने का नाम हैं
होली तो स्वीकार्यता का दूसरा नाम हैं
होली तो एक दूसरे में समा जाने का नाम हैं
पर शायद ही ऐसे भाव अब होली के दौरान, देखने को मिलते हो। एक दिन, एक बच्चे ने मेरे पास आकर कहा - भैया, हम होली खेलेंगे। मैंने कहा - हां हां, खेलो होली। वो अपने दोनों नन्हीं-नन्ही हाथों में लाल रंग लगाकर आया और मेरे गालों पर लगाकर, खिलखिलाकर होली हैं-होली हैं, कहता हुआ भाग खड़ा हुआ। मैं कुर्सी से उठा और अचानक आइने के पास पहुंच अपने चेहरे को देखा, तो मुस्कुराएं बिना नहीं रह सका। बच्चे की छोटी छोटी अंगूलियों और हथेलियों से चेहरे पर लगे रंगों के भाव कुछ कह रहे थे।
वाराणसी के विद्वान प्रो. सुधाकर दीक्षित आजकल एक - दो वर्षो से रांची में रह रहे हैं। उनसे कुछ दिन पहले होली क्यों विषय पर लंबी बातचीत की। बातचीत के दौरान, उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारतीय पर्व त्योहार ऐसे ही नये मनाये जाते। ये पर्व त्यौहार केवल खाने-पीने तक ही सिमटे नहीं रहते, बल्कि ये एक सुंदर संदेश भी देते हैं। ये कहकर कि इन संदेशों को आत्मसात करोगे तभी आप पर्व - त्यौहारों के परम आनन्द कौ प्राप्त कर सकते हो, अन्यथा भौतिक आनन्द को ही गर आनन्द आप समझते हो तो फिर कोई बात ही नहीं।
भारतीय वांग्मय कहता हैं कि होली, वहीं मनाता हैं, जो अपने से दीन-हीन अवस्था में रह रहे, अपने समाज के लोगों को आज के दिन आत्मसात करता हैं। जो समाज व देश के प्रति प्रेम का रंग अपने हृदय में भरता हैं। जिसके हृदय में लेशमात्र भी कटुता का भाव प्रकृति व सत्य के प्रति नहीं रहता। जरा हिरण्यकशिपु को देखिये वो सत्य के प्रतीक प्रह्लाद को मिटा देना चाहता हैं। वो इसके लिए अपनी बहन होलिका का सहारा भी लेता हैं। इसी दौरान होलिका जलकर मर भी जाती हैं, फिर भी उसका दंभ नहीं मिटता, पर प्रह्लाद तो प्रह्लाद हैं, उसके कण-कण में आह्लाद हैं, भला, उसके आह्लाद को कौन मिटा सकता हैं। सत्य अंततः जीतता हैं, क्या इस सत्यरुपी रंग को असत्य कभी मिटा सकता हैं। उत्तर होगा - नहीं। तब ऐसे हालात में असत्य को धारण कर, राक्षसी प्रवृत्तियां अपना कर लोग किस प्रकार का आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं।
एक उदाहरण, जो फिलहाल होली के दौरान ही दीख रहा हैं। मार्च का महीना हैं। संभवतः 31 मार्च को क्लोजिंग डेट भी होता हैं। मैंने कई लोगों को देखा हैं, अभी से ही दिमाग लगा रहे हैं कि इस बार आयकर के रुप में उनके कमाई की राशि नहीं कटे। असत्य का सहारा भी उन्होंने जमकर लिया हैं। संभव हैं, ये पकड़े भी नहीं जायेंगे, पर हृदय के किसी कोने में बैठा परमेश्वर अथवा सत्य, उसे इस गलत कार्यों के लिए, क्षमा करेगा या वो इस गलत कार्यों में संलिप्तता होने के बावजूद आनन्द की प्राप्ति कर पायेंगे। उत्तर होगा - नहीं। क्योंकि आनन्द तो सिर्फ सत्य के पास होता हैं। असत्य को आनन्द कहां। जो देश के लिए अपनी आय की राशि का एक हिस्सा ईमानदारी से नहीं दे सकता। वो देश के लिए तन और मन को कैसे उत्सर्ग करेगा। जो ऐसा नहीं कर पायेगा। वो होली कैसे मनायेगा। होली तो मनाया कबीर ने, ये कहकर..............
मन लागा मेरा यार फकीरी में,
जो सुख पाउं राम भजन में,
वो सुख नाहीं अमीरी में,
भला बुरा सबका सुन लीजै
कर गुजरान,गरीबी में
मन लागा, मेरा यार फकीरी में..................
अर्थात, जो सत्य को धारण करेगा, उसे ही सुख प्राप्त होगा, उसे ही राम मिलेंगे, असत्य को प्राप्त कर न तो राम मिलेंगे और न ही कोई परम आनन्द को प्राप्त कर पायेगा। परम आनन्द को प्राप्त करने का नाम ही होली हैं। स्वयं को परमात्मा के अधीन कर, सत्य का आश्रय ले, सब को परम आनन्द देने का नाम ही होली हैं................................

Tuesday, March 26, 2013

आजसू की महिला पंचायत यानी पैसा फेंको, तमाशा देखो......

24 मार्च को झारखंड के मोराबादी मैदान में आजसू ने महिला पंचायत बुलाई। इस महिला पंचायत को आर्गेनाइज करने में आजसू ने करोड़ो रुपये फूंक डाले। कुछ को एक दिन की मजदूरी का लालच देकर, कुछ को ये सपने दिखाकर कि उन्हें विधानसभा का टिकट दिया जायेगा, आजसू ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। लाखों तो नहीं पर हजारों की संख्या में महिलाएं, इस महिला पंचायत में दिखी। कहीं पत्रकार नाराज न हो, अखबार व मीडिया नाराज न हो, इसके लिए जमकर इन पर भी धन लूटाये गये। महिला पंचायत के एक दिन पहले व बाद में भी अखबारों को मुंहमांगी रकम अदा की गयी। इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी विज्ञापन दिये गये ताकि वे अपनी बात न रखकर, आजसू और सुदेश की जय जयकार के लिए ही मुंह खोले। हुआ भी ठीक ऐसा ही। भला रुपये लेकर, कोई गद्दारी कैसे कर सकता हैं। इसलिए जमकर सभी ने जय जयकार की। हालांकि इसका कितना फायदा मिलेगा, फिलहाल कुछ कहां नहीं जा सकता।
हुआ ऐसा हैं कि मीडिया के कुछ धुरंधरों ने आजसू और सुदेश को सब्जबाग दिखाये हैं ये कहकर की आनेवाले समय में जब कभी विधानसभा चुनाव होंगे तो आजसू की सीटें बढ़ सकती हैं। फिर क्या, इस सब्जबाग को जमीन पर उतारने के लिए आजसू ने कमर कस ली और हो गये शुरु। हर जिले में एक पंचायत बुलायी गयी। आजसू के नेताओं व कार्यकर्ताओं को कह दिया गया कि वे जमकर पैसे बटोरे और पंचायत पर खर्च करें, मीडिया के कबूतरों पर भी पैसे खर्च करें, गर वो एक शराब की बोतले मांगते हैं तो उन्हें दो नहीं बल्कि शराब से नहला दिया जाय, खूब पैसे दिये जाये उन्हें ताकि वे सोते - जागते, सिर्फ और सिर्फ आजसू और सुदेश के ही गुण गायें। आजसू के इस कार्यप्रणाली का फायदा भी मिला हैं, जब पैसों के बल पर, उसने हटिया सीट जीत ली। अब तो सुनने में ये भी आ रहा हैं कि एक मीडियाकर्मी को आजसू ने चुनाव लडा़ने की ठानी हैं, और इस एवज में उक्त मीडियाकर्मी ने एक रिपोर्टर को आजसू के साथ लगा दिया हैं कि वो जमकर उक्त रिपोर्टर को जैसे पाये, वैसे यूज करें। खूब जमकर आजसू के विजूयल, टिकटैक और समाचार भी दिखाये जा रहे हैं।
कमाल हैं, जो पार्टी भ्रष्ट आचरण अपनाकर सत्ता हासिल करने की ठानी हो, उससे सदाचार की बातें करना, क्या मूर्खता को सिद्ध करने के बराबर नहीं। हमें तो इस पार्टी के नाम से ही हंसी आती हैं, नाम हैं - आजसू यानी आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन, पर सच्चाई ये हैं कि इसके जितने भी विधायक हैं वे स्टूडेंट्स हैं ही नहीं, विशुद्ध राजनीतिबाज हैं, जो हमेशा सत्ता से चिपककर, सत्ता की राशि, अपने हित में डकार जाते हैं, ये वहीं पार्टी हैं जो बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन और मधु कोड़ा के साथ भी सत्तासुख भोगी। ये सत्ता के बिना एक पल रह ही नहीं सकती, और ये झारखंड को महान बनाने की बात करती हैं। हां भाई आजकल ऐसे ही लोग तो देश व समाज का निर्माण करते हैं, क्योंकि आजकल इनकी संख्या बहुतायत हैं और लोकतंत्र में वहीं आगे बढ़ता हैं, जिनकी संख्या सर्वाधिक हैं. तो चलो भ्रष्ट आचरण अपनाकर, खूब पैसे लूटाकर, आम जनता को दिग्भ्रमित करें और वोट लेकर, सत्ता का परम सुख प्राप्त करें, क्योंकि जब मीडिया सत्ता में आने के पहले ही, उनकी आरती उतार रही हैं तो सत्ता आने के बाद तो उनके आगे साष्टांग दंडवत् करेगी।

Sunday, March 24, 2013

यहां तो नेता, मंत्री, पत्रकार, ब्यूरोक्रेट्स और पुलिस सभी खतरनाक जानवर की श्रेणी में हैं..............................

कभी - कभी भारतीय राजनीतिज्ञों को दिव्य ज्ञान हो जाता हैं और वो इस दिव्य ज्ञान के सहारे एक से एक बयान दे देते हैं। इन बयान देनेवालों की सर्वाधिक संख्या गर किसी पार्टी में हैं तो वो हैं - कांग्रेस पार्टी। झारखंड के राज्यपाल सैय्यद अहमद को तो दुनिया के सारे सद्गुण सोनिया गांधी में ही दिखाई पड़ते हैं। दिखाई पड़े भी क्यों नहीं, क्योंकि सोनिया की कृपा से ही तो वे झारखंड में राष्ट्रपति शासन का मजा ले रहे हैं। इसलिए अपने भाषण में गाहे-बगाहे, सोनिया जी की जय-जयकार करते रहते हैं। इधर झारखंड में सर्वाधिक समय देनेवाले और दिलचस्पी रखनेवाले जयराम रमेश ने कुछ ऐसा बयान दे दिया कि यहां के सारे के सारे ब्यूरोक्रेट ही अचंभित हैं। वो भी इसलिए कि इन ब्यूरोक्रेट्स से क्या गलती हो गयी कि जयराम रमेश ने ऐसा बयान दे डाला। झारखंड के ब्यूरोक्रेट्स तो हरदम, केन्द्र सरकार में शामिल नेताओं व मंत्रियों के आगे नतमस्तक रहते हैं, जो वे काम कहते हैं चाहे उससे झारखंड का कबाडा़ ही क्यों न निकल जाये। वो काम करने में विश्वास रखते हैं। जरा देखिये, जयराम रमेश ने क्या बयान दिया हैं। इन्होंने शनिवार को रांची में एक निजी अस्पताल के कार्यक्रम में अधिकारियों की तुलना खतरनाक जानवर से कर दी। इसके पहले भी जयराम ऐसे-ऐसे बयान दिये हैं, जिससे कांग्रेस के लोग कभी अचंभित हो गये थे। जब उन्होंने यह कह दिया था कि देश में मंदिरों से ज्यादा महत्वपूर्ण शौचालय  हैं।
सवाल उठता हैं जयराम रमेश जी के इस बयान पर हम आश्चर्य करे या उनकी मूर्खता पर हम सवाल उठाये। जयराम रमेश ने जो आज उदारतापूर्वक ये बयान दिया। क्या उन्हें ये नहीं पता कि जिन अधिकारियों की तुलना वे खतरनाक जानवर से कर रहे हैं। उन्हें खतरनाक जानवर, इन्हीं के पार्टी के महानुभावों के कुकृत्यों ने बनाया हैं। जब देश की सेवा का दंभ भरनेवाले, घोटालों का कीर्तिमान बनाने का प्रयत्न करेंगे तो ये बेचारे अधिकारी क्या करेंगे, ये भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर, समय की रफ्तार को देखते हुए काम करेंगे। नहीं तो होगा वहीं, मंत्री-नेता मालामाल और ये बेचारे फिसड्डी हो जायेंगे। इसलिए ये अधिकारी मौके का नजाकत समझते हुए, नेताओं के साथ, उनके विचारों के साथ तालमेल बिठाते हुए बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। मैं तो रांची में रहकर कई नेताओं और अधिकारियों को देखा हुं जो सचमुच खतरनाक जानवरों जैसा कुकृत्य कर रहे है। कानून की धज्जियां उड़ाते हुए, इतना धन इकट्टा कर लिया हैं कि अब इन्हें कोई चुनौती देने की ताकत भी नहीं रख सकता। यहीं नहीं राजधानी बनने के बाद रांची में गर सर्वाधिक अपार्टमेंट्स बने हैं या उन अपार्टमेंट्स में सर्वाधिक फ्लैट्स पर कब्जा किसी का जमा हैं तो ये चाहे तो नेता हैं, या मंत्री हैं, या अधिकारी हैं, या पत्रकार। आम जनता यहां कहां हैं। आम जनता तो आज भी राजभवन के समक्ष प्रदर्शन करती हैं कि उनका पैसा कई लोगों ने सब्जबाग दिखाकर लूट लिये हैं, पर  होता क्या हैं। सच्चाई तो ये हैं कि नेताओं, अधिकारियों और पत्रकारों की टीम ने मिलकर ऐसी लूट मचा रखी हैं कि पूछिये मत। एक उदाहरण देखिये। रांची में संजीवनी बिल्डकॉन ने गोरखधंधा चलाया। पुलिस और ब्यूरोक्रेट्स, नेताओं और मंत्रियों साथ ही साथ राजधानी के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ मिलकर गोरखधंधा चलाया। आम जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर वो चलता बना, आखिर वो किसके बल पर किया। कौन लोग उससे उपकृत होते थे. क्या किसी को पता नहीं। हद तो तब हो गयी, जब इस संस्था के मालिक को झारखंड रत्न भी प्रदान कर दिया गया। जहां ऐसे ऐसे घटिया सोच वाले, खतरनाक जानवर सम्मिलित होकर झारखंड को लूट रहे हो, वहां केवल ब्यूरोक्रेट्स को खतरनाक कहना तो सरासर गलत हैं। जयराम रमेश को उदारतापूर्वक ये बयान देना चाहिए था कि झारखंड में ब्यूरोक्रेट्स, नेता, मंत्री, पुलिस और पत्रकार सभी खतरनाक जानवर हैं और इसे बचाने के लिए जयराम रमेश अथवा कांग्रेसियों को जरा भी दुख करने की जरुरत नहीं हैं, क्योंकि उनके इस नकली दुख व्यक्त करने की कला, जनता जानती हैं, बस समय का इंतजार करिये, जनता उठेगी और सब को उचित समय पर जवाब देगी.......................................

Sunday, March 17, 2013

ये भीख मांगने का नया तरीका हैं, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश का..................................

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने, देश के अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भीख मांगने की नयी तरकीब दिखायी हैं, पर देश के अन्य अविकसित राज्यों के मुख्यमंत्री दिल्ली में इस प्रकार की अधिकार रैली कर, भीख मांगना शुरु करेंगे, ऐसा हमें संदेह हैं। भाजपा की वैशाखी पर बिहार का सत्तासुख भोग रहे नीतीश को, भाजपा के ही कई नेता अच्छे नहीं लगते हैं। वे समय - समय पर अपनी गीदड़-भभकी से भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को उनकी औकात बताते रहते हैं, पर वे जानते हैं कि बिना भाजपा की वैशाखी पर टिके वे बिहार में एक दिन भी सत्ता में नहीं रह सकते, इसलिए समय - समय पर भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के आगे झूकने का नौटंकी खूब किया करते हैं। 
हम आपको बता दें कि किसी भी रैली में भीड़ कैसे जुटती हैं या जुटायी जाती हैं, सब को पता हैं। कोई भी काम करनेवाला व्यक्ति जो काम करता हैं, वो अपने काम को नष्ट कर, किसी नेता का भाषण सुनने नहीं जायेगा, क्योंकि वो जानता हैं कि आज का नेता लाल बहादुर शास्त्री या महात्मा गांधी नहीं हैं। बिहार में इस तरह की रैली करने में माहिर लालू यादव, बहुत अच्छी तरह बता सकते हैं कि दिल्ली में हुई नीतीश की रैली में कौन - कौन से हथकंडे अपनाये गये हैं, गर लालू को मौका मिले तो वे नीतीश की अधिकार रैली से भी बड़ी रैली, दिल्ली में कर सबको आश्चर्यचकित कर सकते हैं, क्योंकि लालू ने सत्ता रहते, पटना में कभी रैली की ही नहीं, वे तो रैला किया करते थे।
बिहार की शान और बिहारियों के सम्मान करने की बात करनेवाले नीतीश ये भूल जाते हैं कि अधिकार रैली कर, केन्द्र पर दबाव बनाना, बार - बार पिछड़ों की रट लगाकर भाजपा को आंख दिखाना भी भीख मांगने की शैली हैं। नीतीश को ये भी जान लेना चाहिए कि बिहार से ज्यादा तरक्की सिक्किम और गोवा जैसे प्रांत कर रहे हैं, उन प्रांतों ने कभी भी केन्द्र को आंख नहीं दिखाया और न ही अधिकार रैली करके भीख मांगने में विश्वास किया।
रही बात बिहारियों के सम्मान की या अपमान की तो उन्हें मालूम होना चाहिए कि अब आतंकी गतिविधियों में लिप्त बिहारी भी खूब दिखाई पड़ रहे हैं। दिल्ली में जो महिला के साथ रेप की घटना हुई तो उसमें एक बिहारी भी था। जब ऐसी - ऐसी घटनाओं में बिहारियों की संलिप्तता होगी तो फिर बिहार को सम्मान कहां से मिलेगा। आज भी गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली या अन्य विकसित अथवा अविकसित प्रांतों में जो बिहारी मिल रहे हैं, जो वहां रहकर अपने बिहार में रह रहे परिवारों को भरण पोषण कर रहे हैं, वो बताता हैं कि बिहारी कितने गैरत वाले हैं। कभी - कभी बिहारियों के खिलाफ विभिन्न प्रांतों में जो गुस्सा दिखता हैं, उसका मूल कारण हैं कि वहां के लोगों को लगता हैं कि ये बिहारी, उनका हक छीन रहे हैं। जब बिहार के राजनीतिज्ञ व सत्ता में शामिल लोग, अपने ही प्रांत के लोगों के साथ कभी दलित तो कभी महादलित, पिछड़ा तो कभी अंत्यत पिछड़ा के नाम पर भेदभाव बरतते हो तो वो प्रांत क्या खाक तरक्की करेगा।
जदयू में तो एक नेता हैं - नरेन्द्र सिंह, उसे तो बात करने की तमीज ही नहीं मालूम। विभिन्न चैनलों में उसके जो भाषण व बाइट दिखाई पड़ते हैं, उससे साफ पता लग जाता हैं कि बिहार में नेताओं की क्या सोच हैं। जदयू के ही  नेता हैं - अनंत सिंह, सुनील पांडे, शिवानंद तिवारी। जिनकी हरकतों से पूरे राज्य की तस्वीर साफ हो जाती हैं। ऐसे - ऐसे नेताओं व मंत्रियों से ये बिहार की सम्मान बढ़ने और बढ़ाने की बात करते हैं। ये वहीं मुख्यमंत्री नीतीश हैं जो लड़कियों के सीने से काले दुपट्टे तक उतरवा लिये, जो महिला शिक्षकों के साथ बदतमीजी में सबसे आगे रहे और बिहार के सम्मान की बात करते हैं।
जिन्होंने दलितों में भी एक और महादलित बना डाला, यानी नरकों में ठेला ठेली की बात करनेवाले को बिहार के विकास की चिंता हैं। जिसने पत्रकारों को अपने पैसों से, विज्ञापन से खरीदकर, नचनियां बना डाला। वे बिहार और बिहारियों की बात करते हैं, इन्हें शर्म भी नहीं आती। जो फूट डालों शासन करो की आधारशिला रखकर, पूरे बिहार के लोगों को बेवकूफ बना डाला। वे बिहार की चिंता करते हैं। जरा पूछिये नीतीश से जब वे रेलमंत्री थे, केन्द्र में बड़े मंत्री थे, गुजरात दंगा, उसी समय हुआ था। उस वक्त वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विषवमन क्यों नहीं करते थे, उस वक्त उन्हें मुस्लिम प्रेम क्यूं नहीं जगा था। उन्होंने राम विलास पासवान की तरह केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र क्यो नहीं दिया और आज मुस्लिम प्रेम का ढोंग  इस प्रकार रचते हैं कि पूछिये मत। सचमुच इसने जो बिहार का अपमान किया, आज तक किसी ने नहीं की। अरे इसने तो हद कर दी, महाराष्ट्र जाकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे के इशारों पर ताता थैया  किया, पर शर्म नहीं आती। शर्म आयेगा कैसे, जमीर हो, तब न.............................

Friday, March 15, 2013

देश गलत हाथों में तो नहीं..................................

पाकिस्तान कश्मीर पर अपना दावा ठोकता है................
पाकिस्तान कश्मीर के एक तिहाई भाग पर अवैध रुप से कब्जा जमा रखा है....................
पाकिस्तान कश्मीर को लेकर, कई युद्ध हमसे लड़ चुका हैं और इसके लिए वो असंख्य युद्ध लड़ने का, समय - समय पर संकल्प भी लेता रहता है.................
पाकिस्तान ने कभी भी हमसे दोस्ती नहीं निभाई, बल्कि शत्रुता उसके रोम रोम में भरा पड़ा है...............
पाकिस्तान ने हमारे संसद पर हमला बोला...............
पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध के दौरान हमारे पांच सौ से अधिक जवानों को मौत के घाट उतार डाला.........
पाकिस्तान और उसका आईएसआई भारत के विभिन्न महत्वपूर्ण शहरों में आतंकी विस्फोट करके, हमसे करीब पच्चीस - तीस वर्षों से परोक्ष युद्ध लड़ रहा हैं..................
उसने भारत में एक नया संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन बना डाला हैं, जिसको लेकर वो पूरे देश में भारत के खिलाफ ऐसा नफरत पैदा कर रहा हैं कि इससे बचना भारत के लिए मुश्किल की घड़ी हैं..............
हाल ही में कई साल पहले इनके आकाओं ने दस आतंकियों की खेप मुंबई में भेजी, जिन्होंने मुंबई में ऐसा कोहराम मचाया कि उस आतंक के सदमे से अभी तक देश निकल नहीं पाया...................
हाल ही में इसके आतंकी संगठनों ने कश्मीर में हमारे एक जवान का सिर काटकर ले गये.................
हाल ही में कश्मीर के सीआरपीएफ के कैंप पर इन्होंने आतंकी हमले कर कई जवानों को मार डाला...........
और 
अब एक नयी आंतकी घटना, पाकिस्तानी संसद ने अफजल की फांसी पर भारत के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया.....................
ऐसे तो जितने आतंकी घटनाएं पाकिस्तान ने भारत में कराये हैं, उसका लेखा जोखा ठीक से लिया जाये तो अब तक लाखों भारतीयों की इन आंतकी घटनाओं में जान जा चुकी हैं, पर हमारे देश के पालिटिशियनों को देखिये..............
खासकर कांग्रेसियों को, जिनके दिल में भारत, भारतीय सैनिकों और भारतीय नागरिकों के लिए जरा भी रहम नहीं हैं, वे क्या करते हैं। ये जानते हुए कि पाकिस्तान हमारे सैनिक का सर काट कर ले गया है उस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ का जयपुर में शानदार स्वागत करते है, उनके साथ भोज करते है। इससे बड़ी शर्मनाक घटना भी कोई हो सकती हैं क्या.......................
हमें तो इनकी देशभक्ति पर ही प्रश्नचिह्न लगता हैं..............
इन पालिटिशियनों को देखिये, जब इनके खानदान के किसी भी व्यक्ति का जब कोई आतंकी संगठन अपहरण कर लेता हैं, तो वे अपने परिवार के सदस्य को बचाने के लिए ये पालिटिशियन कुख्यात आतंकियों को छोड़ देते हैं ( याद करिये वी पी सिंह के शासनकाल में मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद को छुड़ाने के लिेए कई आंतकी छोड़ दिये गये थे).......................
जिस देश में नेताओं का ऐसा चरित्र हो, उस देश का भी कोई सम्मान होता हैं या कोई अन्य देश सम्मान करता है क्या........उत्तर होगा - कभी नहीं.
अब एक नयी घटना देखिये...................
भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोप में भारत के जेल में बंद दो इतालवी नागरिकों को छोड़ दिया गया। ये दोनों नागरिक जैसे ही इटली पहुंचे, वहां की सरकार ने भारत को दो टुक जवाब दिया कि वो अपने इन दो इतालवी नागरिकों को भारत के हाथों नहीं सौंपेगा, गर भारत को लगता हैं कि ये दोषी हैं तो वो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाये। 
इसके बाद क्या हुआ, वहीं जो होता हैं, हमारे देश की सरकार, सांप के बिल में घूस जाने के बाद, बिल के उपर लाठी पटकने लगी..................
आश्चर्य तो इस बात की हैं कि जब इटली प्रकरण पर कई चैनलों ने कांग्रेसी नेताओं को बहस के लिए अपने यहां बुलाया तो इन्होंने आने से इनकार कर दिया। ये घटना क्या बताती हैं। हमें लगता हैं कि ज्यादा बताने की जरुरत नहीं। इनका भारत प्रेम साफ झलक जाता हैं........................
अब बात आती हैं, जिस देश में सरकार में ऐसे लोग शामिल हो, जो अपने देश के प्रति वफादार न होकर, अपने परिवार और ऐसे लोगों के प्रति वफादार हो, जिनका दिल भारत के लिए धडकता ही न हो, तो क्या ऐसे लोगों के हाथों में भारत सुरक्षित हैं या यूं ही भारत, पाकिस्तान और अन्य भारत विरोधी देशों के हाथों अपमानित होता रहेगा...................
ये भारत से प्यार करनेवाले नागरिकों के सामने यक्ष प्रश्न हैं कि क्या भारत को घटिया स्तर के नेताओं, अपनी जमीर बेचनेवाले नेताओं के हाथों सौपकर निश्चिंत हो जायेंगे..................
जरा सोचिये................
क्योंकि फिलहाल देश गलत हाथों में है........................

Sunday, March 10, 2013

झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष के लिए भाजपा में घमासान......................................

देश के हर समस्याओं के समाधान का दावा करनेवाली भाजपा, एक प्रदेश अध्यक्ष चुनने में नाकामयाब हैं। झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर घमासान हैं। प्रदेश अध्यक्ष बनने की लाईन में रघुवर दास, रवीन्द्र राय, सुनील सिंह, यदुनाथ पांडेय आदि नेताओं की लंबी लाइन हैं, पर राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सूझ ही नहीं रहा कि वे झारखंड की कमान किसके हाथों में सौंपे। इधर झारखंड में भाजपा के स्वंयभू नेता अर्जुन मुंडा परेशान हैं, वो चाहते हैं कि प्रदेश में ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बने, जो उनके इशारों पर नाचे, जैसा कि अभी दिनेशांनद गोस्वामी कर रहे हैं। इसलिए वे रवीन्द्र राय को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। उनको लगता हैं कि रवीन्द्र राय, जो उनके कहने पर प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे, वे आजन्म उनके प्रति वफादार रहेंगे, जैसा कि पूर्व में बाबू लाल मरांडी के प्रति अपनी वफादारी, उन्होंने दिखायी थी, पर स्थिति ऐसी हैं कि अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रवीन्द्र राय के नाम उछलवाने के बावजूद, अर्जुन मुंडा को सफलता नहीं मिल रही। ऐसी स्थिति में, अर्जुन मुंडा ने एक सुनियोजित साजिश के तहत भाजपा विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा देने की घोषणा करवा दी। ये जानते हुए कि ऐसी घोषणा के कोई मायने नहीं, क्योंकि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हैं। ऐसे में आप किसी दल के विधायक दल के नेता रहे अथवा नहीं रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। 
अर्जुन मुंडा भाजपा के तेज व चालाक नेता हैं। किसको कैसे पटाना हैं और कैसे किनारे लगाना हैं, वे इसमें माहिर हैं। जो लोग अर्जुन मुंडा को जानते हैं, वे ये भी जानते हैं कि ये वे ही अर्जुन मुंडा हैं, जो एक समय बाबू लाल मरांडी की गणेश परिक्रमा किया करते थे, और उन्हीं की कृपा से वे मुख्यमंत्री भी बने और जैसे ही ये मुख्यमंत्री बने, उन्होंने बाबू लाल मरांडी को ऐसा परेशान किया कि बाबू लाल ने सदा के लिए भाजपा ही छोड़ दी और ये खंड खंड हो रही भाजपा के अखंड नेता बनकर उभरे। इन्होंने कभी भी देश हित अथवा दल हित में इस्तीफा देने की पेशकश नहीं की, पर जैसे ही प्रदेश अध्यक्ष की बात आयी और उनकी बातों को नजरंदाज करने की कोशिश की गयी। उन्होंने इस्तीफे का दांव खेला, ताकि लोगों को लगे कि ये व्यक्ति भाजपा का महान कार्यकर्ता हैं, पर चाल तो चाल होती हैं, सभी इस चाल को समझ गये हैं। यानी बात वहीं हैं वो बात हैं कि ये एक बूंद खून बहाकर, शहीद होने की श्रेणी में खड़ा होना चाहते हैं।
सच्चाई ये हैं कि इसी प्रकार की घटिया स्तर की राजनीति के कारण भाजपा पूरी तरह से नष्ट होती जा रही हैं। कोई भी भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बने या खुद अर्जुन मुंडा ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष क्यों न बन जाये, भाजपा पुनः राज्य में प्रतिष्ठित हो जायेगी, ऐसा अब नहीं लगता, क्योंकि पूरे प्रदेश में भाजपा में फिसड्डी नेताओं का आधिपत्य हो गया हैं, जो न चरित्रवान हैं और न ही दल के प्रति समर्पित। ये भी वहीं करते हैं, जैसा कि अन्य दलों के कार्यकर्ता और नेता। जब सभी वहीं करते हैं और भाजपा भी वहीं कर रही हैं तो ऐसे में लोग भाजपा के साथ क्यों चले। सवाल यहीं बार - बार झारखंड की जनता के मन में घर कर रहा हैं और गर यहीं चलता रहा तो भाजपा के लाश पर चढ़कर अन्य पार्टियां यहां शासन करने लगे तो इस बात को लेकर किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।

Tuesday, March 5, 2013

सोनिया जैसी क्यूं बने राज्यपाल महोदय, देश में अन्य वीरांगनाओं की कमी हैं क्या....................................

झारखंड के राज्यपाल डा. सैय्यद अहमद ने राज्य की महिलाओं से अपील की हैं कि वो इंदिरा गांधी, लक्ष्मीबाई या सोनिया गांधी जैसी बनकर देश का विकास करें। इंदिरा गांधी बनना, लक्ष्मीबाई बनना तो हमें समझ में आता हैं, पर सोनिया बनना और उसका विकास से जुड़ जाना हमें समझ में नहीं आया। खासकर तब, जब इस महिला ने भारत के प्रधानमंत्री को नाइटवाच मैन बना दिया हो, जो प्रधानमंत्री अपने ढंग से सोच नहीं सकता और न ही कोई फैसला ले सकता हो, जिस महिला ने रेलमंत्री पवन कुमार बंसल को जी हूजुरी करना सिखाया हो। मैं उस पवन कुमार बंसल की बात कर रहा हूं, जिसने इस बार रेलवे बजट के दौरान राजीव गांधी को इसलिए याद किया, कि उन्होंने बंसल को राजनीति के क्षेत्र में कहां से कहां पहुंचा दिया, जिसने सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र से उपर जाने की कोशिश तक नहीं की हो, उस सोनिया को इंदिरा और लक्ष्मीबाई की श्रेणी में ला खड़ा करना - बुद्धिमानी हैं या चाटुकारिता। हमें लगता हैं कि ये बताने या समझाने की जरुरत नहीं। ऐसे भी सामान्य व्यक्ति, जिसकी कोई औकात नहीं हो, और उसे किसी की कृपा से, कोई बड़ी जगह मिल जाती हैं तो उसे उस व्यक्ति को याद करना मजबूरी होती हैं, जब तक वह जिंदा रहता हैं, अथवा जिसकी कृपा से वह बार -बार उपकृत होता रहता हैं। सोनिया ने देश को कहां पहुंचा दिया वो तो इस साल का प्रस्तुत बजट ही साफ - साफ बता देता हैं। 
इधर झारखंड के राज्यपाल द्वारा विभिन्न चैनलों को दिये गये विज्ञापन भी बहुत कुछ कह देते हैं कि यहां किसका शासन हैं। आप इस विज्ञापन को साफ - साफ देखे, जिसमें एक उद्घाटन के दौरान राज्यपाल सैय्यद अहमद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व रांची के सांसद सुबोधकांत सहाय के साथ दीख रहे हैं। ये तस्वीर ही साफ साफ बयां करती हैं कि यहां राष्ट्रपति शासन कम और कांग्रेस का शासन ज्यादा हैं। जो अभी कुछ महीनों तक चलेगा और फिर इसी आधार पर विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए वोट भी मांगे जायेंगे। ये कहकर कि देखिये हमने राष्ट्रपति शासन के दौरान - कैसे झारखंड की कायाकल्प कर दी। हालांकि कायाकल्प हुआ या झारखंड और नीचे चला गया, इसका आकलन करना अभी ठीक नहीं हैं। अभी तो एक महीने ही हुए हैं और इस एक महीने के दौरान, ट्रेन का हाईजेक होना, चतरा में सांप्रदायिक दंगा का होना और रांची में एक व्यापारी का अपहरण कर हत्या कर देने की घटना बहुत कुछ बता देती हैं कि राज्य में किस प्रकार से शासन चल रहा हैं।
देश का दुर्भाग्य हैं कि इधर जितने भी राज्यपाल हो रहे हैं, चाहे वे किसी भी प्रदेश के क्यूं न हो। वे संवैधानिक कम, पर किसी पार्टी के प्रति और उससे भी बढ़कर उसके सुप्रीमो के प्रति ज्यादा वफादार होने का सबूत देने के लिए मौके तलाशते रहते हैं, हो सकता हैं कि कुछ लोग, एक अखबार में छपे, राज्यपाल के इस बयान को बतौर सोनिया तक भी अब तक भेज दिये हो, कि मैडम देखिये - झारखंड के महामहिम, आपको कितना सम्मान देते हैं, आप तो लक्ष्मीबाई और इंदिराजी की श्रेणी में आ गयी। मैंडम आप धन्य हैं और धन्य हैं झारखंड के राज्यपाल, जिनकी इतनी सुंदर सोच हैं। ऐसे ही कांग्रेसियों से देश व राज्य का भला होगा, दूसरे से नहीं।