Tuesday, November 9, 2010

दस वर्ष झारखंड निर्माण के...

झारखंड बने दस वर्ष हो गये, पर ये प्रांत जितना भ्रष्टाचार के लिए जाना गया, उतना किसी भी चीज के लिए नहीं। भ्रष्टाचार और झारखंड एक दूसरे के गर पर्याय हैं तो ये कहना अतिश्योक्ति भी नहीं होगी। झारखंड अलग राज्य के निर्माण की लड़ाई की बात हो या झारखंड के विकास की बात, सभी स्तर पर यहां के राजनीतिज्ञों ने अपने आचरण में गिरावट ही दिखायी, आचरण में शुद्धता तो कहीं दिखी ही नहीं। जिसका खामियाजा आज भी झारखंड भुगत रहा है। गर हम झारखंड निर्माण से पूर्व की बात करें तो पता चलता हैं कि झारखंड अलग राज्य के निर्माण की लड़ाई लड़नेवाले ज्यादातर नेता पदलोलुपता में आकर अपने जीवन भर की पूंजी व आंदोलन को कांग्रेस पार्टी के हाथों गिरवी रखा, या अपने पार्टी का विलय ही करा दिया, नतीजा न तो खुद रहे और न ही झारखंड आंदोलन की साख ही बची। ज्यादातर झारखंडी नेता व कार्यकर्ता एक नारा लगाते हैं कि कैसे लिया झारखंड, लड़ के लिए झारखंड। पर सच्चाई क्या हैं, जो लोग झारखंड के निर्माण के साक्षी है, जानते हैं। सच्चाई यहीं हैं कि -- भाजपा बिहार के कुछ पार्टस को अलग कर वनांचल प्रांत बनाने की मांग पर अडिग थी, ( जबकि झामुमो जैसी अनेक झारखंडी पार्टियां बंगाल, उड़ीसा और मध्यप्रदेश के कुछ पार्टस को भी इसमें मिलाकर झारखंड बनाने की मांग करती थी, जो संभव ही नहीं था) सन् 2000 में बिहार में राजद को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, जो कि झारखंड के निर्माण का कड़ा विरोध कर रही थी। लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के आरोप में इतने घिरे थे, कि किसी भी हालत में वे बिहार का शासन छोड़ना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने भी हामी भर दी और संयोग ऐसा हुआ कि झारखंड बन गया। इसे कोई जबर्दस्ती झूठलाने की कोशिश करें तो अलग बात हैं, और जब झारखंड बना तो क्या हुआ, स्थिति ऐसी हैं कि कोई भी झारखंडी खुद को झारखंडी कहलाने में गर्व महसूस नहीं करता। झारखंड एकमात्र प्रांत है – जहां निर्माण से लेकर आज तक, जितने भी मुख्यमंत्री हुए, सब के सब आदिवासी, जिनके बारे में कहा जाता हैं कि आदिवासी सरल, सहज और दिल के साफ होते हैं, पर इन मुख्यमंत्रियों के क्रियाकलापों पर नजर डाले, तो ये आदिवासियों को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे, और लोगों की आदिवासियों के बारे में जो धारणाएं हैं, वो बदलती नजर आयेगी। सर्वप्रथम बिहार से अलग होने के बाद बने नवोदित झारखंड के मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की बात करें। इसमें कोई दो मत नहीं कि इस शख्स से राज्य को बेहतर दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, आधारभूत संरचनाओं को ठीक करने में समय लगाया, उर्जा, सड़क और शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर, राज्य ही नहीं पूरे देश में नाम कमाया और देश में सबसे अच्छा काम करनेवाले तीसरे मुख्यमंत्री के रुप में लोकप्रिय हो गये। राज्य में जितनी योजनाएं हैं, उन्हीं के समय की हैं, जिसे लेकर, लोग अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, चाहे वो बालिकाओं को स्कूल से जोड़ने के लिए साईकिल देने की बात हो, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना हो, या आदिवासियों के बेहतर विकास की बात हो, इन्हीं के समय में पूरे राज्य में सीबीएसई पैटर्न पर माध्यमिक शिक्षा को लागू किया गया, पर जदयू के उस समय के भ्रष्ट मंत्रियों ने इनकी एक न चलने दी और उर्जा तथा खनन मामलों में इन नेताओं ने बाबूलाल को ऐसी पटखनी दी, कि बेचारे कहीं के नहीं रहे, जिस अर्जुन को वे भरत मानकर अपना उतराधिकारी बना रहे थे, वो अर्जुन ही बाद में ऐसी पट्टी पढ़ाई की बेचारे भाजपा से अलग होकर आज खुद की नयीं पार्टी बना कर भाजपा के जड़े में मट्ठा डालकर भाजपा को समूल नष्ट करने पर तूले हैं, पर इसमें वे कितना सफल होंगे, समय बतायेगा, पर सच्चाई ये ही हैं कि यहीं से भ्रष्टाचार के वटवृक्ष का बीज झारखंड की राजधानी रांची में बोया गया, जो इस दस साल में एक विशाल वृक्ष बनकर सभी भ्रष्टाचारियों को आश्रय दे रहा हैं।
हम कहां की बात करें, कौन ऐसा क्षेत्र हैं, जहां भ्रष्टाचार नहीं हैं। सीबीआई की तो ज्यादातर कार्य झारखंड में ही हैं, लगता हैं कि सीबीआई का निर्माण हमारे पूर्व के राजनीतिज्ञों ने झारखंड को देखते हुए ही किया था। जरा देखिये लालू के चारा घोटाला की बात हो या मधु कोड़ा से जुड़ा मामला सभी का केन्द्र बिन्दु झारखंड ही हैं। पर इनकी बात करने के पूर्व हम झारखंड के विधानसभा की बात कर लें तो ज्यादा बेहतर होगा। यहां अब तक जितने भी विधानसभाध्यक्ष हुए, अपने ढंग से नियुक्तियां की, और यहां पर नियुक्ति घोटाला हो गया, कौन सा मापदंड रखा गया, कैसे बहाली हुई, इस पर गर बात करें तो रामचरितमानस से भी बड़ा महाकाव्य तैयार हो जायेगा। आश्चर्य इस बात की हैं कि इसे लेकर किसी भी विधानसभाध्यक्ष ने अपनी गलती नहीं मानी हैं और न ही शर्मिदंगी दिखायी।
जरा इस विवरणिका को देखिये तो पता लग जायेगा कि अपने यहां विधायकों और दूसरे जगहों के विधायकों की संख्या कितनी और इसे देखते हुए स्टाफों की संख्या कितनी हैं और उस पर राशि कितनी खर्च हुई हैं -----------------------
राज्य-------विधायकों की संख्या----स्टाफ------वार्षिक खर्च करोड़ रुपये में
छत्तीसगढ़ -------91------------255 -----5.60
उत्तराखंड -------70 ------------190 -----4.25
बिहार --------243-------------630 -----7.25
झारखंड---------81 ------------960 ----16.81
कमाल इस बात की हैं कि विधानसभा को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता हैं और इस मंदिर में आवश्यकता से अधिक अयोग्य लोगों की बहाली, वो भी अपने चहेतों को नौकरी दिलाकर विधानसभाध्यक्षों ने कर दी, क्या ये शर्मनाक नहीं।
कमाल हैं दस साल बने हो गये, झारखंड के इसी बीच सात सरकारें आयी और चली गयी, दो – दो बार राष्ट्रपति शासन लगा, आठवी सरकार भी कैसे बनी, इसको लेकर तरह तरह की अटकलें लगायी गयी हैं, कहनेवाले तो कह भी चुके हैं कि इस सरकार को बनाने में कारपोरेट जगत के लोगों ने रुचि ली हैं, जिसके एवज में इस सरकार ने उन्हें उपकृत करने की योजना पर काम भी शुरु कर दिया हैं। कमाल इस बात की भी कि राज्य को बने दस साल हुए और इससे ज्यादा बार विकास आयुक्त बदले जा चुके हैं, छह – छह बार पुलिस महानिदेशक और महाधिवक्ता का बदलाव हो चुका हैं, औसतन हर दस बाहर महीने में सचिवों का तबादला हो जाता हैं। भ्रष्टाचार का आलम तो ये हैं कि यहां स्थानांतरण उद्योग भी चलता हैं, और वसूली भी की जाती है।
भ्रष्टाचार का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता हैं कि इस राज्य का अपना विधानसभा भवन नहीं, सचिवालय नहीं, जबकि इन्हीं पर करीब दो सौ करोड़ रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं। राष्ट्रीय खेल अब तक नहीं हो पाये है। इन मंत्रियों और अधिकारियों की करतूतों को देखिये अपने चहेतों को किस प्रकार झारखंड लोक सेवा आयोग के माध्यम सें शानदार नौकरियां दिलवा दी, ये अलग बात हैं कि पूरे मामले की जांच हो रही हैं, और कुछ लोग इस मामले में जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं। यहीं नहीं शायद देश का ये पहला राज्य हैं जहां पर भ्रष्टाचार मामले में ही एक निर्दलीय व्यक्ति जो मुख्यमंत्री बना, अपने रिकार्ड भ्रष्टाचार के कारण, रांची और दिल्ली की जेलों में रहकर झारखंड की मान को गिरवी रख दिया है। यहीं नहीं इनके शासनकाल में ही मंत्री रहे, कई मंत्रियों पर सीबीआई की पकड़ हैं और ये भी फिलहाल विभिन्न जेलों में बंद रहकर अपनी जिंदगी को नारकीय बना रखा हैं। आश्चर्य इस बात की भी हैं कि भ्रष्टाचार के आरोप में बंद इन मंत्रियों और नेताओं के रिश्तेदारों को उनके दैनिक जीवन में कोई दिक्कत नहीं आ रही, बल्कि वे इसका फायदा भी उठा रहे हैं और विधानसभा तक पहुंच जा रहे हैं, यहीं नहीं जेल में रहकर ये लोकसभा के चुनाव तक जीते हैं, ऐसे में यहां की जनता की सोच पर स्वतः प्रश्न चिह्न लग जाता हैं कि क्या वो भ्रष्टाचार को सदाचार की ताबीज मान चुकी हैं, गर नहीं मानती तो भ्रष्टाचार मामलों में बंद ये नेता और उनके रिश्तेदार चुनाव में तो कम से कम नहीं ही जीतते, पर इनकी जीत बताती हैं कि जनता के सोच में भी बदलाव आया हैं और यहां की जनता फिलहाल भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा नहीं मानती, तभी तो सभी मस्त हैं नहीं तो भ्रष्टाचार पर आज तक अंकुश क्यों नहीं लगा, ये तो और पनपता जा रहा हैं, भस्मासुर की तरह।

Sunday, October 31, 2010

अंगरेजी देवी मईया...?


भारत में एक से एक लोग हैं, जिनकी प्रशंसा करें या आलोचना करें, समझ ही नहीं आता। जिन अंग्रेजों की भाषा अंगरेजी हैं, वे भी इस भाषा को मां मानने को तैयार कभी नहीं होंगे, पर भारत की एक दलित आबादी को कहा गया है कि वो अंगरेजी को देवी मईया माने, और अपना सारा ध्यान इस अंगरेजी पर ही लगाये, तभी उसका कल्याण होगा, और बाकी जातियां उनके आगे पानी भरती नजर आयेंगी। जिस व्यक्ति ने अंगरेजी देवी मईया के नाम पर मंदिर बनाने की ठानी है। उसके इस पर अपनी सोच है और इसे आप मना भी नहीं कर सकते, क्योंकि वो मानेंगे ही नहीं। उन्होंने सोच लिया है कि बस अंगरेजी को देवी मईया मान लिया और बस ये मईया उन्हें हाथ पकड़ कर वो सब कर डालेगी, जिसकी उन्हें तलाश हैं, पर उन्हें ये मालूम नहीं कि इस देश में मूर्तियों की भरमार है। यहां तो जिंदा व्यक्तियों ने भी अपनी मूर्तियां स्थापित कर अपनी पूजा करवाने की ठानी है, कहीं कहीं तो भारत में ऐसे ऐसे दीवाने हैं कि फिल्मी हीरो हीरोईनों की मंदिर बना रखी हैं, खुद रांची में ही महेन्द्र सिंह धौनी के नाम पर मंदिर बनाने की कुछ लोगों ने सोची है। क्या मंदिर बना देने से बौद्धिक विकास होता हैं, अथवा धन या शक्ति प्राप्त हो जाती है, क्या।
इस देश में सदियों से ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा होती रही है, पर सच्चाई ये हैं कि असली ज्ञान जिसके बदौलत सारी दूनिया अमरीका व ब्रिटेन के आगे पानी भरती नजर आयी, वो पश्चिमी देशों के पास हैं। भारत में धन की देवी लक्ष्मी की पूजा होती हैं, पर दरिद्रता सर्वाधिक भारत के हिस्से में ही हैं, ये ही नहीं आश्विन माह में शक्ति की देवी की धूम पूरे भारत में रहती हैं, पर असली शक्ति सिमट के अमरीका के हाथों में चली गयी और इधर कुछ चीन की ओर सिमटती नजर आ रही हैं, जिसके आगे उसके आस पास के देश, उसकी मनमानी सहने को बाध्य है, और यहीं चीन हमेशा से भारत को अपनी दादागिरी की पाठ पढ़ाता रहता है।
कमाल है जब एक ओर देश में शैक्षिक क्रांति चल रही है, पूरा विश्व शैक्षिक क्रांति की वजह से सिमटता जा रहा हैं, वहा शैक्षिक क्रांति में न बहकर दलितों को कहा जा रहा हैं कि वे अंगरेजी को देवी मईया माने और उसकी पूजा करें, क्या इससे दलितों के जीवन स्तर में सुधार हो जायेगा क्या। इससे तो वे और नीचे जायेंगे। क्योंकि किसी भी प्रतिमा की पूजा करने से व्यक्ति खुद प्रतिमा बन जाता है, जरुरत हैं, मंदिर में उसके नाम पर प्रतिमा न बनाकर दलितों में ये बात पूख्ता करने की, कि आज अंग्रेजी जरुरी हैं, और बिना इसे पढ़े न तो वे खुद का और न अपने समाज को भला कर सकते हैं। इसलिए अंग्रेजी पढ़े पर अपना स्वाभिमान न भूले। भारत को नहीं भूले। क्योंकि भारत हैं तो वे हैं, और उन पर ज्यादा जिम्मा हैं, भारत के बारे में सोचने की, क्योंकि उनकी कौम ने सदियों से सहा हैं, भारत को दिया हैं, पर लिया नहीं हैं।
भारत में एक पत्रिका निकलती है – सरिता। उसमें बार बार एक विज्ञापन निकलता था कि हिन्दी गंवारों और जाहिलों की भाषा है, ये विज्ञापन उन लोगों के उपर करारा तमाचा होता था, जो हिन्दी भाषी होते हुए भी, गाहे बगाहे अंग्रेजी में अपनी भावनाएं प्रदर्शित कर रहे होते हैं। पूर्व में इस प्रकार के विज्ञापन पर हमें आपत्ति भी होती थी, पर सच्चाई यहीं हैं कि सचमुच आज हिन्दी गंवारों और जाहिलों की भाषा हो गयी है। उसके कई प्रमाण है।
जरा भारतीय प्रधानमंत्रियों की लिस्ट पर ध्यान दें। हमने देखा हैं कि इस देश में जो भी कोई प्रधानमंत्री बना, चाहे वह हिन्दीभाषी हो अथवा अहिन्दीभाषी सभी ने 15 अगस्त को लालकिले के प्राचीर से हिन्दी में भाषण दिया पर जैसे ही वह लोकसभा व राज्यसभा अथवा अन्य कार्यक्रमों में भाग लिया, उसकी जूबानें स्वतः अंग्रेजी में बात करने लगी। उसका एक – दो उदाहरण हम आपको बता देना चाहते है। जैसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, जब जनता पार्टी के शासनकाल में विदेश मंत्री बने, तब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में सर्वप्रथम हिन्दी में भाषण देकर सबको अचंभित कर दिया था, पर जैसे ही वे प्रधानमंत्री बने, मैंने देखा कि दिल्ली में आयोजित फिक्की के कार्यक्रम में अंग्रेजी में अपना स्पीच देना उन्होंने शान समझा। यहीं नहीं कर्णाटक के कन्नड़भाषी मुख्यमंत्री एच डी देवगौड़ा जो बाद में प्रधानमंत्री भी बने, बड़ी जल्दी हिन्दी सीख ली और उन्होंने लालकिले के प्राचीर से हिन्दी में भाषण दिया पर जैसे ही लोकसभा और अन्य जगहों की बात आयी तो वे अंग्रेजी में शुरु हो गये। ये तो राजनीति की बात हैं, अब भारतीय फिल्म कलाकारों को लीजिये, ये हिन्दी फिल्मों में काम करते हैं, इनकी दाल रोटी हिन्दी फिल्मों से चलती हैं, पर जब ये प्रीमियर शो अथवा प्रेस कांफ्रेस कर रहे होते हैं तो जरा देखिये इनकी जूबां अंग्रेजी उगल रही होती हैं। ऐसे में कितने फिल्मी स्टारों को नाम गिनाउं, सभी एक ही हैं। आगे क्रिकेटरों के साथ भी ये ही बात लागू होती हैं।
यहीं नहीं पूरा देश फिलहाल अंग्रेजी भाषा और उसकी संस्कृति का गुलाम हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता, ऐसे में दलितों को ये उपदेश देना कि वे ऐसा न करें, वैसा न करें, ये तो बात वहीं हो गयी कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे। दलितों को अंग्रेजी पढ़ना चाहिए और खूब पढ़ना चाहिए, क्योंकि केवल उन्होंने ही हिन्दी के विकास का ठेका नहीं ले रखा हैं, पर गलती ये वे कर रहे कि वे अंग्रेजी को देवी मईया का रुप बनाकर, अपने दलितों को फिर प्राचीनता में ढकेल रहे हैं, जो आनेवाले समय के लिए दलितों को बहुत पीछे धकेल देगी। क्योंकि किसी को चिढ़ाकर आप न तो आगे बढ़ सकते हैं और न आनन्द की प्राप्ति कर सकते हैं, बस आप मंदिर को बनाने और बचाने में ही लग जायेंगे।
इस देश के हालात देखिये, शायद ही कोई गांव होगा, जहां अंग्रेजी स्कूल नहीं होंगे। अब सरकारी स्कूलों में पढ़ते कौन हैं। जो टीचर यहां पढ़ा रहा होता हैं और अपना परिवार चला रहा होता हैं, वो भी अपने बच्चों को किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा रहा होता हैं। आज तक मैंने किसी प्रशासनिक अधिकारी व नेताओं के बेटे – बेटियों को सरकारी स्कूलों में पढ़ते नहीं देखा, यहीं नहीं जिसके पास थोड़े से भी पैसे आ गये हैं, वो भी सरकारी स्कलों को दूर से प्रणाम कर, अपने बच्चों को वहां पढ़ा रहा होता हैं, जहां टूटी फूटी अंग्रेजी ही क्यूं न चलती हो, वो अंग्रेजी पढ़ाना ज्यादा जरुरी समझता है। पूरे देश में स्पोकेन इंग्लिश की दुकाने खूली हैं, कहीं भी जहां अहिन्दी भाषी क्षेत्र हमें बताईये, जहां स्पोकेन हिन्दी की दुकाने खुली हो।
सभी अंग्रेजी के चक्कर में भारतीयता का श्राद्ध करने पर तूले है। सच्चाई यहीं हैं, पर जब ये ही भारतीय किसी कारण से विदेश चले जा रहे हैं, तो उन्हें भारत याद आ रहा होता हैं, अपनी संस्कृति याद आ रही होती हैं, अपनी भाषा याद आ रही होती हैं, क्यूं ऐसा होता हैं, शायद भारतीयों को भारत में रहकर समझ में नहीं आती। आजकल तो अंग्रेजी स्कूलों में पढ़नेवाले भारतीय बच्चे बड़ी शान से एक कविता दुहराते है -------------
"टम टमा टम टम
टमाटर खाये हम
अंग्रेज का बच्चा क्या जाने
अंग्रेजी जाने हम"
ऐसे हालत में हमारे देश के कर्णधारों, राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों, कलाकारों, खिलाड़ियों आदि लोगों ने भारत को किस दिशा में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, समझ में नहीं आ रहा। यकीं मानिये, जैसे ही आप विदेशी भाषा की ओर आकृष्ट होते हैं, आपकी संस्कृति पहले प्रभावित होती हैं, और जब संस्कृति प्रभावित होती हैं, तो आप स्वतः नष्ट हो जाते हैं और जब आप स्वतः नष्ट हो जायेंगे तो यहां कौन राज कर रहा होगा, किसकी सत्ता होगी, गर आप बुद्धिमान हैं तो समझेंगे, नहीं तो आपकी स्थिति वहीं होगी। जैसा कि सुभाषित कहता हैं...............
येषां न विद्या, न तपो, न दानं, न ज्ञानशीलं, न गुणो न धर्मः ।
ते मृत्युलोका, भूविभारभूता, मनुष्यरुपेण मृगाश्चरन्ति ।।
अर्थात् जिसके पास न तो विद्या है, न तपस्या करने की और न दान करने की क्षमता है, जिसके पास न तो आंतरिक ज्ञान और न मर्यादा है, न गुण हैं और न ही धर्म पर चलने की ताकत है। वे इस धरती पर मनुष्यरुप में मृग के समान विचरण करनेवाले है, इससे अधिक कुछ नहीं।

Friday, October 29, 2010

बिहार विधानसभा चुनाव में विकास नहीं, जातीयता हावी…।


संदर्भ विधानसभा चुनाव 2010...!


जैसे जैसे बिहार का चुनाव अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा हैं, वैसे वैसे लालू और नीतीश की सरकार बनानेवालों की दिलों की धड़कन बढ़ती जा रही हैं। हालांकि कमोवेश सभी ने ये माना है कि बिहार में एनडीए यानी नीतीश की सरकार बननी तय है और इसके लिए उन्होंने कई कारण गिनाये है। पटना से प्रकाशित कई समाचार पत्रों तथा दिल्ली से बिहार प्रवास पर गये कई पत्रकारों ने भी इसकी पुष्टि कर दी है। साथ ही कई समाचार चैनलों ने चुनाव विश्लेषन के माध्यम से ये बताने की कोशिश की है कि नीतीश को एक बार फिर बिहार की जनता सिरमौर बनाना चाहती है।
पर अब तक बिहार में तीन चरण के चुनाव संपन्न हो चुके है। और इन क्षेत्रों से जो चुनाव परिणाम आ रहे है वे न तो नीतीश को खुश करनेवाले हैं और न लालू को दुखी करनेवाले है। हां इतना तय है कि कांटे का मुकाबला है। जब पूर्णिया में चुनाव संपन्न हुआ तब हमने वहां के जमीन से जूड़े पत्रकारों से बातचीत की, तब उनका कहना था कि मतदान के पूर्व नीतीश के पक्ष में एक लहर सी देखी गयी थी, ज्यादातर मतदाता विकास को प्राथमिकता देते हुए नीतीश को एक बार फिर सत्ता सौंपने की बात कह रहे थे, पर जैसे ही मतदान का दिन आया, ये मतदाता जातियों और संप्रदायों में विभक्त होते नजर आये, और उन्होंने वोट उसी को दिया, जो उनकी जाति और संप्रदाय को रास आया, यानी यादव और मुस्लिम ने एनडीए को नकार दिया।
यहीं बात रक्सौल के हमारे पत्रकार मित्र ने बतायी। यानी जाति और संप्रदाय से अभी तक बिहार के मतदाता उपर नहीं उठ पाये है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर ठीक ही कहा करते थे, कि भला बिहार में विकास से कहीं वोट मिलते है, वोट मिलने के दूसरे कारण होते है, गर वर्तमान की देखे तो आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू ने अपने प्रदेश में विकास की गंगा बहायी थी। पर आंध्र प्रदेश की जनता ने क्या किया, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। ऐसे भी लोग कहते है और बताते है कि जो लोग अच्छा काम करते हैं, उनका अंत बड़ा दुखद होता है। जैसे महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश स्वतंत्र हुआ। महात्मा गांधी ने इसकी कीमत भी नहीं वसूली, जबकि कई नेताओं ने आजादी के बाद इसकी कीमत वसूली, पर गांधी को मिला क्या, गोली। इसी प्रकार ईसा मसीह को लोगों ने सूली पर लटका दिया। ऐसे कई प्रमाण मौजूद है। जो बताते है कि सत्य के मार्ग पर चलने पर कठिनाईयां ही कठिनाईयां हैं। गर आप सत्य और सेवा की मार्ग पर चलने का प्रण लिया हैं तो स्वर्ग की कामना ही बंद कर दीजिये, पर इसका मतलब ये भी नहीं की हम अच्छा काम करना बंद कर दे।
बिहार के साथ विडम्बना रही हैं कि जब कभी वहां शक्तिशाली नेता उभरा तो उसने राज्य के समग्र विकास पर ध्यान कम और अपने परिवार को सशक्त बनाने, उसके लिए सात पुश्तों तक किसी चीज की कमी न हो, इसका जुगाड़ बिठाने में ज्यादा ध्यान दिया। यहीं नहीं गांधी और लोकनायक के नाम पर राजनीति करनेवालों ने समय आने पर अपनी पत्नी तक को सत्ता सौंप दिया और अब बेटे को आगे कर वे राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें फिलहाल नीतीश को छोड़, रामविलास और लालू ने बड़ी तेजी से कदम बढ़ायी है। रामविलास जी के तो क्या कहने, ये तो भाजपा को सांप्रदायिक बोलते अघाते नहीं, और कभी भाजपा के ही गोद में बैठ कर सत्ता का सुख भी लिये थे, शायद ये भूल गये है। ये वहीं नेता है जो बिहार चुनाव के पहले राज्य में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश करने का ड्रामा करते थे, पर आज उपमुख्यमंत्री अपने परिवार से बनाना चाहते हैं। अब बात उठती हैं कि जो व्यक्ति उपमुख्यमंत्री का पद एक मुस्लिम को नहीं दे सकता, वो व्यक्ति राज्य का बागडोर मुस्लिम को कैसे सौंप सकता है। इनके इस ड्रामे से तो लगता हैं कि जब इनकी बहुमत आयेगी, जो कभी संभव नहीं हैं, तो ये खुद ही मुख्यमंत्री बनने के लिए कदम बढ़ा देंगे।
ये हैं हमारे बिहार के कुछ नेताओं का वर्तमान चरित्र, जो बिहार को बुलंदियों तक ले जाने की बात करते है। ये जयप्रकाश आंदोलन के समय संपूर्ण क्रांति की बात करते थे, पर आज अपने परिवारों को सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर ले जाने के लिए क्रांति की बात करते हैं, क्या ऐसे लोगों के सत्ता में आने से बिहार आगे बढ़ पायेगा, निर्णय तो जनता को लेना हैं और जनता ने क्या निर्णय लिया ये तो चुनाव परिणाम आयेगा, तभी पता चलेगा। फिर भी आशा रखनी चाहिए कि आने वाले बचे हुए विधानसभा सीटों की जनता एक बेहतर सरकार बनाने के पक्ष में मतदान कर, बिहार को आगे बढ़ाने में विशेष रुचि दिखायेगी।

Tuesday, October 26, 2010

और जुबान फिसली.......................!

संदर्भ बिहार विधानसभा चुनाव 2010...
बिहार विधानसभा चुनाव का अंतिम चरण जैसे जैसे नजदीक आता जा रहा है। नेताओं की जुबां फिसलती जा रही है। खासकर जदयू के नेता अति उत्साहित है, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि बस विधानसभा चुनाव मात्र औपचारिकता मात्र है। जनता तो पहले से ही दुबारा नीतीश को सत्ता में बैठाने को बेकरार है। पर उन्हें नहीं मालूम कि, सब कुछ ठीक रहने के बावजूद जब भोजन में नमक बेमन से पड़ जाये तो भोजन खानेलायक नहीं रह जाता। इसलिए जदयू और भाजपा को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ज्यादातर चुनावी सर्वेक्षण और पत्रकारों के कलम उन्हीं की जय बोल रहे हैं, पर इसमें सच्चाई क्या हैं ये तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा।
रही बात जुबान फिसलने की, ये कोई नयी बात नहीं हैं, जब आदमी अतिउत्साहित अथवा अति निराश हो जाता है तो उसके मुख से ऐसी भाषाएं या शब्द निकल ही जाते है जो उनके विरोधियों समेत सज्जनों को अच्छी नहीं लगती। राजद के नेता लालू प्रसाद यादव हो या रावड़ी देवी अथवा फिलहाल दूसरे पार्टी में चले गये इन्हीं के रिश्तेदार, सभी जुबान फिसलने के लिए जाने जाते हैं, कुछ के तो केस जुबान फिसलने के कारण ही अभी न्यायालय की शोभा बढ़ा रहे है। अभी जदयू और एनडीए के बड़े नेता शरद यादव सुर्खियों में है – उन्होंने एक चुनावी सभा में राहुल को गंगा नदी में फेंक देने की बात कह डाली। जबकि रांची में भाजपा नेता हरेन्द्र प्रताप कहते हैं कि यूपीए के नेता जिस प्रकार से एनडीए के खिलाफ विषवमन कर रहे है, ऐसे में कोई भी होगा, उग्र हो ही जायेगा।
सचमुच किसी भी बड़े अथवा छोटे नेता व कार्यकर्ता को इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना लोकतंत्र में गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य ही कहा जायेगा और इस प्रकार की भाषा प्रयोग करनेवाले की कड़ी आलोचना होनी ही चाहिए। पर शरद यादव ने बहुत जल्द ही इस प्रकार के बयान से अपने आपको अलग कर लिया, इसके लिए उन्हें साधुवाद। पर कुछ बात कांग्रेसियों से भी, जो इस मुददे को हवा देते हुए, बात चुनाव आयोग तक ले जाने की बात करते हैं, क्या वे बता सकते हैं कि उन्हीं के राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना राष्ट्रद्रोही संगठन सिमी से कर डाली अथवा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के जो बयान आरएसएस पर आये हैं, उसे क्या कहा जायेगा, क्या आरएसएस के खिलाफ उनके दिये गये बयान गैरजिम्मेदाराना नहीं। खासकर उस आरएसएस पर जिसके बारे में खुद उन्हीं के पार्टी के बड़े दिवंगत नेता प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री और महात्मा गांधी तक प्रशंसा कर चुके है। आगे चलकर बाबा साहेब अम्बेडकर, पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन, लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी आरएसएस के कार्यों की भूरिभूरि प्रशंसा की है। "पूर्व राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन ने तो आरएसएस के बारे में कहा था कि आरएसएस पर मुसलमानों के प्रति हिंसा और घृणा फैलाने के आरोप सर्वथा झूठे हैं। मुसलमानों को आरएसएस से परस्पर प्रेम सहयोग और संगठन की शिक्षा लेनी चाहिए।" क्या राहुल बता सकते हैं कि संघ से घनिष्ठ संबंध और प्रचारक तक रह चुके पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी क्या सिमी से जूड़े है। जिस संगठन के बारे में राहुल ने बचकाना बयान दे डाला और जब इन कांग्रेसी नेताओं के पास आरएसएस के खिलाफ ठोस सबूत है तो फिर ये कर क्या रहे हैं, उनकी सरकार है, जल्द से ठोस निर्णय ले, देश से बड़ा कोई संगठन नहीं होता, पर गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य देकर देश की जनता के समक्ष बार बार आरएसएस के खिलाफ बयान देना और उसकी तुलना राष्ट्रद्रोहियों से कर देना, क्या शर्मनाक नहीं।
सच्चाई तो ये हैं कि वर्तमान में किसी भी पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं के जुबान पर कंट्रोल नहीं है, जिसे देखिये बक बक कर रहा है, और पतली गली से निकल जा रहा है, बाद में अपनी बयान पर चिंतन भी नहीं करता, कि उसने जो आज भाषण अथवा बयान दिया, वो सही है अथवा गलत। क्या ऐसे में लोकतंत्र मजबूत होगा। क्या इन्हें ये दोहा पढ़ने की जरुरत नहीं --------
बोली एक अमोल है, जो कोई बोले जानी।
हिये तराजू तौलि के तब मुख बाहर आनी।।

सुभाषित तो कहता है --------
वचने किम दरिद्रता ---- अर्थात् बोलने में दरिद्रता कैसी। आखिर ये नेता कब अपनी वाणी पर नियंत्रण रखेंगे।

Friday, October 22, 2010

एक कौआ था...!


जब मैं दूसरी कक्षा में था – तब एक छोटी सी कहानी पढ़ी थी। एक कौआ था। उसे मोर का एक पंख मिला। उसने उस पंख को अपने पूंछ में लगा लिया और ये कहकर इठलाने लगा कि वो अब मोर है। फिर क्या था – वो मोर के झूंड में पहुंचकर मोर जैसी हरकतें करने लगा और कहने लगा कि वो भी मोर है, मोर है। तब उन मोर के झूंडों में से एक मोर बोला कि कही मोर के पंख लगा लेने से कोई मोर हो जाता हैं क्या। तुम तो कौए हो और कौए ही रहोगे, इस प्रकार उस मोर के पंख लगाये कौए की, उस झुंड में हंसाई होने लगी। अपनी हंसाई होता देख, वह कौआ फिर कौए की झूंड में गया. तभी सारे कौए ने कहा कि तुम कौए कैसे हो सकते हो, तुम तो मोर का पंख लगा लिये हो, तुम तो मोर हो, और फिर उसे कौए के झूंड में भी हंसी का पात्र बनना पड़ा। अपनी इस प्रकार की हंसाई होता देख और दोनों जगहों पर अपमान का बोध होता देख, वह कौआ अंत में स्वयं अपने पूंछ से मोर का पंख निकाल फेंका और कांव कांव करने लगा। कहने लगा कि वो कौआ हैं – कांव कांव कांव कांव...............................। ये बचपन में पढ़ी हुई छोटी सी कहानी सीख देती हैं कि हम क्या हैं, इसका हमेशा भान रहना चाहिए, नहीं तो हम हर जगह हंसी के पात्र बनेंगे और कहीं के नहीं रह पायेंगे। आज जो देश और देश के नागरिकों की स्थिति हैं, ठीक उस कौवे की तरह है जो अपने पूंछ में मोर का पंख लगाकर ये भान कर बैठा हैं कि वो मोर हैं, जबकि सच्चाई कुछ और ही है।
भारत कभी भी भोगवादी संस्कृति में नहीं रहा, पर आजकल यहां के लोग पश्चिमी सभ्यता का इस प्रकार अनुकरण करने लगे है कि अब तो इनके आगे पश्चिम भी फेल होता जा रहा है। जो भारतीय आध्यात्मिक संत हैं – वे भी धन लोलुपता और कामलोलुपता में इस प्रकार से लिप्त होते जा रहे हैं कि इन्हें देख कर लगता ही नहीं कि ये उस देश के आध्यात्मिक संत हैं, जहां नानक, तुकाराम, नामदेव, ज्ञानेश्वर, रविदास, शंकराचार्य आदि जैसे महान संत पैदा लिये थे और जिन्होंने अपने सुकर्मों से देश और समाज को नयी दिशा दी थी। यहीं हाल आज के साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की है, जो सिर्फ और सिर्फ पैसों के लिए साहित्य सृजन और झूठी एनजीओ चलाकर स्वयं को समाजसेवी बता कर ये सामाजिक कार्यकर्ता देश और समाज को ठगने का काम कर रहे है। राजनीतिज्ञों की तो बात ही निराली हैं, ये कभी गांधी, जयप्रकाश आदि बनेंगे, ये तो इन्हें देखकर लगता ही नहीं क्योंकि ये पैसों के आगे अपने शरीर को इतना झूका लिये हैं कि इनकी शरीर को ठीक करने की कोशिश हुई तो केवल कोशिश मात्र सुनते ही, ये बिलबिलाकर दम तोड़ देंगे।
पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां जीवन का आदर्श सुनिश्चित कर दिया गया है, जबकि अन्य देशों में ऐसा है ही नहीं। और देशों में सिर्फ भोगवादी संस्कृतियां ही हैं, यानी जन्म ले लिया, और पशुओं की तरह, खाओ पियो, ऐश करो मौज करो और मर जाओ। पर अपने देश में जीवन का आदर्श – परमेश्वर का धाम बताया गया है। यहां तो कहां गया हैं कि जीवेद शरदः शतम्। यानी सौ वर्ष तक जियो, कैसे जियो, उसकी भी विवेचना की गयी है। यानी सौ को चार भागों में बांटो। पच्चीस वर्ष – ब्रह्चर्य पालन यानी सारी भौतिक सुख सुविधाओं का त्याग, छब्बीस से पचास वर्ष – प्रकृति द्वारा दी गयी सारी भौतिक सुख सुविधाओं का पान। इक्यावन से पचहतर वर्ष – जिन सुख सुविधाओं का आपने पान किया, अब उसका धीरे धीरे परित्याग करने की कोशिश, तथा आनेवाले पीढ़ियों के लिए कुछ करने की कोशिश, और छिहतर से सौ वर्ष – पूर्णतः प्रत्येक वस्तुओं का त्याग और निरंतर भगवद् भक्ति। कुछ तो कहते है कि कौन जानता हैं कि जीवन कब खत्म हो जाये, इसलिए निरंतर प्रभु से ये कामना कि वो उस पर कृपा बनाये रखे और हमेशा एक अच्छा काम स्वयं द्वारा कराता चला जाये ताकि उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाये, पर आज के भारत को देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि समाज के विभिन्न वर्गों का कोई भी व्यक्ति ये भाव रखकर अपना जीवन शुरु कर रहा हैं और खत्म कर रहा हैं।
इधर आज के अखबारों को देखकर, गजब निराशा हुई हैं कोई बाबा रामदेव हैं, जो योग सीखाते हैं, चूर्ण चटनी का अच्छा कारोबार भी उन्होंने फैलाया हैं, काफी नाम भी कमाया है और अब वे राजनीतिक दुकान खोलने की भी सोच रहे हैं, उन्हें लगता है कि योग और चूर्ण चटनी के कारोबार से राजनीतिक दुकान का कारोबार कुछ ज्यादा ही मनोहारी और सर्वस्व सुख प्राप्त करने का अमोघ अस्त्र हैं। गर ऐसा होता हैं तो ये देश के पहले स्वयंभू संत होंगे जो देश के पूर्व के संतों को त्याग की मूल भावना और धर्म को मटियामेट करेंगे, ऐसे भी कलयुग चल रहा हैं, यहां तो अब वो सब होगा, जिसकी परिकल्पना किसी ने नही की। क्योंकि अब तो धर्म की भी व्याख्या, लोग अपने अपने ढंग से करने लगे हैं, यानी जितने लोग, उतने धर्म, जबकि धर्म क्या हैं, रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदासजी साफ कह देते है...

"दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान
तुलसी दया न छोड़िये, जब तक घट में प्राण"


कमाल की बात हैं, भारत में सभी आदर्शवादिता को छोड़, येन केन प्रकारेन पैसे कमाने के लिए, लंपट विद्या की ओर आकर्षित हो रहे हैं, और वे सब कर रहे हैं, जिसकी आशा तक नहीं की जानी चाहिए, फिर भी हमे आशा हैं कि 21 वीं सदी हमारा हैं, एक दिन ऐसा होगा कि सभी भारतीय रंग में रगेंगे और भारतीय संस्कृति को अपनाकर, इस मूल मंत्र को साकार करेंगे, जो भारतीय वांगमय में और इसकी हवाओं में सदियों से गूंज रहा हैं...

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्रानि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत्।।

Monday, October 11, 2010

अयोध्या मुद्दा और तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकारों का विधवा प्रलाप...!

हुत पहले मैंने एक फिल्म देखी थी, उस फिल्म का नाम मैं भूल रहा हूं। उसमें कादर खान बोलते है कि देखो गर नेताजी ट्रेन से जाये तो ये छापो कि एक तरफ जनता बाढ़ से तबाह हो रही है और नेताजी के पास सब कुछ होने के बावजूद देर से मटरगश्ती करते हुए, ट्रेन से बाढ़ प्रभावित इलाकों में पहुंच रहे है, और जब हेलीकॉप्टर से पहुंचे तो ये छापो कि जनता बाढ़ से मर रही है और नेता जी हेलीकॉप्टर पर चढ़कर आनन्द प्राप्त कर रहे है। ठीक यहीं हाल हैं आज के तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकारों का। जब से इलाहाबाद कोर्ट ने विवादित स्थल को रामजन्मभूमिस्थल माना हैं, तब से इन तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकारों को ऐसा पेट में दर्द हुआ हैं कि उनका ये पेट दर्द खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। ये रोज अपनी लेखिनी और टीवी पर आनेवाले बेकार बहसों में शामिल होकर विधवा प्रलाप कर रहे है। यहीं नहीं कल तक ये ही न्यायालय की सम्मान की बात करनेवाले, उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह द्वारा न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करा पाने पर उनकी बखिया उधरनेवाले, भाजपा, विहिप, बजरंगदल और आरएसएस को उनकी गतिविधियों के लिए बारबार कड़ी आलोचना करनेवाले अब अदालत के ही खिलाफ विषवमन करने लगे है। ये बार – बार कह रहे है कि आखिर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐसा क्यूं निर्णय दिया। क्या जब रामलला वहां विराजमान नहीं होते, बाबरी मस्जिद नहीं तोड़ी जाती, तो क्या न्यायालय ऐसा ही फैसला सुनाती। वो भी तब जब दोनों वर्गों के कट्टरपंथियों की बोलती बंद है। न तो भाजपा, विहिप, बजरंगदल और आरएसएस इस मुद्दे पर कुछ ऐसी टिप्पणी कर रहे हैं, जिससे सामाजिक समरसता प्रभावित हो, और न ही बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी। पर अब सामाजिक समरसता में कैसे जहर घूले, कैसे एक बार फिर हिन्दू मुस्लिम आपस में लड़ कट कर मरें ताकि सामाजिक समरसता का ढिंढोरा पीट कर, हम अपने आप को सेक्यूलर पत्रकार कह सके। इसकी तैयारी अब जोर शोर से हो रही है, रोज कुछ न कुछ ये अपने आपको सेक्यूलर पत्रकार कहनेवाले अखबारों में लिखकर न्यायालय को ही कटघरे में करने का काम कर रहे है। ये वे पत्रकार हैं जो लाखों – करोड़ों में खेलते हैं। जो कांग्रेस और वामपंथी दलों के इशारे पर नाचते हैं। ये वे पत्रकार हैं, जो एनजीओ अथवा सामाजिक संस्थान चलाकर, अपने राजनीतिक आकाओं से उपकृत होते है। अपने राजनीतिक आकाओं के प्रतिद्वंदियों को धूल चटाने के लिए गाहे बगाहे लिखते रहते हैं। इनकी सामाजिकता व राष्ट्रीयता में कोई रुचि नहीं होती, ये महानगरों और विदेशों में अपनी तूती कैसे बजती रहे, इनके संस्थानों में कैसे बड़ी संख्या में रुपये और डॉलरों की बरसात होती रहे, इसकी चिंता रहती हैं। ऐसे लोग इन दिनों बहुत बेचैन हैं, क्योंकि जो ये न्यायालय से सुनना चाहते थे, वो वे नहीं सुन पाये, इसलिए ये अपने आकाओं के इशारे पर विधवा प्रलाप कर रहे हैं, पर इनकी विधवा प्रलाप भी नहीं सुनी जा रही। बेचारे क्या करें।
इसलिए इन्होंने सहारा लिया हैं क्षेत्रीय स्तरों पर छपनेवाले अखबारों का, ताकि महानगरों में न सहीं, छोटे छोटे नगरों में ही उनकी बात लोग पढ़ सकें और देश व समाज एक बार फिर सांप्रदायिकता की आग में झूलस जाये।
कमाल हैं, 30 सितम्बर को रामजन्मभूमि पर आये फैसले पर जब दो समुदाय, एक दूसरे के निकट आ रहे हैं और सामाजिकता व राष्ट्रीयता को मजबूती दे रहे हैं तो ये तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकार इस शांति को वे आनेवाले तूफान के पूर्व की शांति बता रहे हैं, लानत हैं ऐसे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकारों पर। कमाल ये भी हैं एक एक कर दिन बीतते जा रहे हैं, पर इनकी अयोध्या पर लेखिनी थम नहीं रही, चलती ही जा रही हैं, जैसे देश में लगता हैं कि अब अयोध्या छोड़कर कुछ दूसरा न लिखने को हैं और न बोलने को। ये वे ही लोग हैं जो चिल्ला चिल्लाकर कहा करते थे कि भाजपा राम के नाम पर वोट मांगती हैं, भाजपा सांप्रदायिक हैं, पर अब कौन सांप्रदायिक हैं, कौन बाबर बाबर चिल्ला रहा हैं, ये तो जगजाहिर हैं, किसे बाबर से अत्यधिक अनुराग हो गया हैं, कौन न्यायालय के खिलाफ लिख रहा हैं, ये सब जान रहे हैं, ये तो वहीं बात हुई, कि हमारे पक्ष में फैसले आये तो वाह वाह और दूसरे के पक्ष में फैसले आये तो हो गये तबाह, करने लगे मनमानी। यानी कड़वा कड़वा थू थू और मीठा मीठा चप – चप। जबकि यह फैसला न तो किसी के पक्ष में गया हैं और न ही विपक्ष में। ऐसे भी जब हम न्यायालय की सम्मान की बात करने को कहते है तो क्या ये ही संवाद इन तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकारों पर लागू नहीं होता, जो बेवजह विधवा प्रलाप कर, देश और समाज दोनों को तोड़ने पर लगे है।

Monday, October 4, 2010

अयोध्या से दिल्ली तक...!

संपूर्ण विश्व के देशों में अयोध्या से दिल्ली तक की चर्चा हैं। चर्चा इस बात की है आखिर भारत जैसा देश अयोध्या जैसे मसले पर कैसे शांत रहा और कल तक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा कॉमनवेल्थ गेम्स आज कैसे अपने शानदार आयोजन के लिए पूरे विश्व से बधाई संदेश प्राप्त कर रहा हैं, जबकि कॉमनवेल्थ गेम्स व अयोध्या मुद्दे को लेकर हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान भी खूब शेखी बघार चुका हैं।
अयोध्या --- नाम लेते ही, 6 नवम्बर 1992 का चित्र उभरता है, जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर डाला, और भगवान श्रीराम की बालस्वरुप जिसे रामलला कहते हैं, उनकी प्रतिमा विध्वंस हुए जगह पर आनन फानन में एक टेंट बनाकर प्रतिस्थापित कर डाली। इसे लेकर पूरे देश में कई जगहों पर दंगे हुए, भारत की छवि को गहरा धक्का लगा, ऐसे भी ये कोई पहली घटना नहीं थी, राम और अयोध्या के नाम पर कई बार ऐसी हिंसक घटनाएं हुई हैं, पर जब 30 सितम्बर को अयोध्या का अदालती फैसला आया, तब देश में एक खून का कतरा भी नहीं बहा, इस पर सभी आश्चर्यचकित हैं, केवल भारत के ही लोग नहीं, बल्कि विश्व के सभी देश के लोग व मीडिया जगत भी, कि आखिर भारत आज शांत क्यों हैं। वो भारत जो हर छोटे-बड़े मुद्दे पर एक दूसरे से भिड़ जाता हैं, आज क्यों नहीं भिड़ा।
तभी ऐसे हाल में हमारे देश के ऋषि मनीषियों की याद बरबस आ जाती हैं कि जब बिगड़ने के समय आते हैं तो हालात बिगड़ने के हो जाते हैं और जब संवरने के दिन आते हैं तो हालात संवरने से हो जाते हैं। मैं देख रहा हूं कि भारत के कई संतों ने 19 वीं शताब्दी के दौरान विश्व के कई देशों में प्रवास के दौरान कहां था कि 21 वीं सदी भारत का हैं, और आज 21 वीं सदी के दस साल गुजरने को तैयार हैं, और जो लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं, उससे हमें एहसास हो रहा हैं कि सचमुच 21 वीं सदी भारत का हैं और ये इतिहास शायद अयोध्या के द्वारा ही लिखा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
ज्यादातर तथाकथित बुद्धिजीवी राम को काल्पनिक मानते हैं, कुछ तो राम के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं कि राम का जन्म कभी हुआ ही नहीं था, पर ऐसा कहनेवाले भूल जाते हैं कि राम भारत के प्राण हैं, आत्मा हैं, राम के बिना भारत की परिकल्पना नहीं की जा सकती, और राम के आधार को किसी भी प्रकार से चुनौती नहीं दी जा सकती। ऐसे भी बिना राम की कृपा के भारत अपनी खोयी प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं कर सकता। राम को हिन्दू और मुसलमान में बांटना भी मूर्खता हैं। राम तो सभी के हैं, उन पर एकाधिकार कैसे हो सकता हैं। राम की शान में तो कई मुस्लिम कवियों और बुद्धिजीवियों ने भी बहुत कुछ लिखे हैं। सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा लिखनेवाले अल्लामा इकबाल ने तो राम को इमामे हिन्द तक कह डाला। क्या कोई बता सकता हैं कि इमामे-हिन्द का मतलब क्या होता हैं।
गर सच पूछा जाये तो राम के नाम पर झगड़े आज तक भारत में नहीं हुए, भारत में जब भी झगड़े हुए तो राजनीति के चलते, राजनीतिबाजों के चलते, और ये राजनीतिबाज सभी दलों में हैं, सभी अपने अपने ढंग से राम को देखते हैं और इसी दौरान वे सब कुछ कर डालने की कोशिश करते हैं, जिसमें गांधी के राम दम तोड़ रहे होते हैं। गांधी के राम की गर आप परिकल्पना करें तो साफ पता लग जायेगा कि वे किस राम को पसंद करते है। गर गांधी राम राज्य की परिकल्पना अथवा सुराज की परिकल्पना करते थे, तो गांधी के राम किस आदर्शवादिता पर खड़े उतरते थे। ये उनसे पूछिये, जिस राजनीतिबाजों के बयान, बेडरुम के चादर की तरह, राम के नाम पर बदलते रहते हैं।
अयोध्या में जब फैसले आ रहे थे, तब कई मीडियाकर्मियों ने अखबारों में लिखा और कई इलेक्ट्रानिक मीडिया के दोस्तों ने दिखाया कि आज के भारत का युवा राम में कम, मंदिर – मस्जिद विवाद में ध्यान कम, और अपने कैरियर, पावर और अपनी आर्थिक शक्ति मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान दे रहा हैं, इसलिए अयोध्या में राम मंदिर बने अथवा न बनें इस पर वो ध्यान नहीं देता। जबकि सच्चाई ये हैं कि इस प्रकार के युवाओं की तादाद स्वतंत्रता आंदोलन में भी थी, जिसे आजादी के आंदोलन में दिलचस्पी कम और अन्य कामों में दिलचस्पी ज्यादा थी। ऐसे लोगों के तादाद हर युग में होते हैं जिन्हें देश से कम और अपने आप में ज्यादा दिलचस्पी होती हैं, पर जो राष्ट्र की चिंता करते हैं उनकी तादाद सदियों से बहुत ही कम होती हैं। आज के युवा जिन्हें राष्ट्र में दिलचस्पी हैं, वे अयोध्या के राम मंदिर को मंदिर मस्जिद के रुप में नहीं लेते, वे राष्ट्र के स्वाभिमान से इसे जोड़ते हैं, बात आज राम मंदिर के निर्माण की नहीं, मुद्दा इस बात का हैं कि भारत राम के नाम से जाना जायेगा या विदेशी आक्रांता बाबर के नाम से। अब तो अदालत ने भी मान लिया है कि विवादित स्थल रामजन्मभूमि स्थल हैं, जहां बाबर ने मंदिर की जगह मस्जिद बना दी। तो क्या उस विदेशी आक्रांता द्वारा निर्मित मस्जिद को इसलिए छाती से लगाकर रखा जाय कि उसने हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचायी या स्वतंत्रता के बाद उस काम को करें, जिससे हमारे पूर्वज गौरवान्वित हो। क्या ये सहीं नहीं कि स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर का हमारे सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उद्धार करवाया था, क्यों उद्धार कराया था, इसकी जानकारी क्या किसी के पास हैं गर नहीं हैं, तो क्या ये जानने की कोशिश की।
हमें अच्छी तरह पता हैं कि देश का कोई सच्चा मुसलमान, रामजन्मभूमिस्थल पर मंदिर निर्माण हो, इसका विरोध नहीं करता, विरोध तो वो करते हैं, जिनकी राजनीति की दाल नहीं गलती, जैसे देखिये, कल तक हर छोटे छोटे मुद्दे पर अदालत का सम्मान करनेवाले, राजनीतिबाज और उनके समर्थक कैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आये फैसले को राजनीति के चश्मे से देख कर बयान दे रहे हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को गलत ठहरा रहे हैं, चुनौती दे रहे हैं और एक बार फिर वे उस वर्ग को बरगलाने का काम कर रहे हैं जो अब रामजन्मभूमि पर अलग राय रख रहा हैं। ये वे लोग हैं, जिन्हें लग रहा हैं कि इस प्रकार के फैसले से उनकी राजनीति बर्बाद हो जायेगी, इसलिए वोट और राजनीतिक समर्थन पाने के लिए वे हर प्रकार का बयान दे रहे हैं, जिसकी खुलकर आलोचना होनी चाहिए, पर खुशी इस बात की हैं कि कई मुस्लिम संगठनों ने ही उन राजनीतिबाजों के बयान की हवा निकाल दी। कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी संगठनों ने तो अब इस मुददे को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती न दी जाय, इसकी अपील भी की हैं, साथ ही कई मुस्लिम संगठनों ने रामजन्मभूमि स्थल पर मंदिर बनाने की पहल भी की हैं, जो ये बताने के लिए काफी है कि भारत अब किस ओर चल पड़ा हैं।
जान लीजिये, ये भारत अब पूरी तरह से परिपक्व हो गया है. भारत की जनता पूरी तरह से परिपक्व हो गयी हैं। वो दिन अब दूर नहीं कि ये मुसलमान, हिन्दूओं के साथ मिलकर विवादितस्थल जो अब विवादित नहीं रही हैं, एक साथ मिलकर राममंदिर का निर्माण करेंगे और दूनियां को दिखायेंगे कि भारत अब वो राम के नाम पर लड़ने भिड़नेवाला भारत नहीं, बल्कि राम के नाम पर एक साथ चलनेवाला भारत हैं, वो अब मीडिया और राजनीतिबाजों के चिकनीचुपड़ी बातों में न आकर भारत की एकता अखंडता को मजबूत करनेवाले मार्ग को प्रशस्त करनेवाला भारत हैं। अब इसे कोई छू नहीं सकता, बस उसका लक्ष्य सामने हैं, अपने देश को सर्वोच्च शिखर पर ले जाने का.............................। उसका उदाहरण भी साफ साफ दिखाई पड़ रहा हैं, क्योंकि इसी 21 वीं शताब्दी में भारत पर राम की कृपा स्पष्ट रुप से नजर आयी। जब पूरा विश्व आर्थिक मंदी से जूझ रहा था, जहां विकसित राष्ट्र के बैंकों का समूह औंधे मूंह गिर रहा था, वहीं भारत पर इसका प्रभाव न के बराबर था। भारत आर्थिक रुप से मजबूती से खड़ा रहा। 2007 में महात्मा गांधी जिनकी प्रार्थना ही राम से शुरु हुआ करती थी, उनके जन्मदिवस पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित कर भारत को प्रतिष्ठा दी। विश्व के कई देशों में भारतीय आर्थिक रुप से मजबूत होकर, भारत का लोहा मनवा रहे हैं, कई देशों में तो भारतीयों का प्रत्यक्ष रुप से शासन चल रहा हैं तो कहीं अप्रत्यक्ष रुप से। कई देशों में तो भारतीय मूल के लोगों ने अपनी प्रतिभा से सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया हैं, तभी तो अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी सभी से भारतीयों से सीख लेने की अपील तक कर डाली और अब दिल्ली की बात कामनवेल्थ गेम्स जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा था, आज वो पूरे विश्व में शानदार आयोजन के लिए तालियां बटोर रहा हैं, ये हैं राम के देश का कमाल, ये राम की कृपा। बस इसे आध्यात्मिकता की नजरों से देखिये, भारत त्यागभूमि हैं भोगभूमि नहीं।

अरे ये तो चीन व पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं........!

पाकिस्तान तो अपने जन्म से ही कश्मीर पर अपना हक जताता रहा है, वहीं चीन ये मानने को तैयार ही नहीं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इधर इस साल से वो कश्मीरियों के लिए अलग प्रकार के वीसा जारी कर अपना इरादा भी जाहिर कर दिया है और चीन के इस हरकत को हवा दी है, भारत में ही रह रहे वो लोग जो अपने आपको बुद्धिजीवी मानते हैं, जो अपने आप को वामपंथ की मुख्यधारा में रहने की बात करते हैं, जो खाते पीते भारतीय भूभाग पर हैं पर दिलों दिमाग से चीन व पाकिस्तान के ज्यादा निकट हैं। आश्चर्य है कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उस हर प्रकार की राष्ट्रविरोधी हरकतें करते हैं, जिससे भारत की संप्रभुता को चोट पहुंचती है, पर भारत सरकार इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती।
हाल ही में अखबारों और मीडिया के माध्यम से एक बयान पढ़ने और सुनने को मिला कि अपने बयानों से हमेशा चर्चा में रहनेवाली एक महिला बूकर पुरस्कार विजेता अरुंधती राय मानती है कि कश्मीर भारत का कभी अभिन्न अंग नहीं रहा, ठीक इसी प्रकार लादेन की भाषा में नक्सली नेता किशन का कहना था कि कश्मीर को आजाद कर दिया जाय, साथ ही गर वहां भारतीय सेना कश्मीर में कुछ करती है तो वह ऐसे मुद्दे पर नक्सली, मुसलमानों का साथ देंगे, अरे तुम किसी का साथ दो, देश को और देशभक्तों को क्या फर्क पड़ता हैं, वो तुम जिसके लिए लड़ने की बात करते हो, उसका तुम कितना भला कर रहे हो, वो तो भारत की आत्मा और भारतीय जनता खूब जान रही हैं।
कमाल है ये अरुंधती राय और किशन जैसे नक्सली को, जब कश्मीर में हिंदूओं का कत्लेआम होता हैं, जब इस्लाम के नाम पर सिक्खों को धमकी दी जाती हैं कि वे इस्लाम कबूल करें तो ये दोनों उस वक्त वामपंथी किताबों में उलझे रहते हैं, लेकिन जैसे ही इस्लाम, पाकिस्तान और चीन की बात आती हैं तो ये दरवे से निकल कर पाकिस्तान और चीन जैसे देशों तथा इस्लाम के साथ होने की बात करते हैं।
ये नक्सली क्या कर रहे हैं, इससे देश रोज दो चार हो रहा हैं। खूलकर नक्सलियों और उनके गतिविधियों को समर्थन करनेवाली अरुंधती राय को जब ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस उड़ायी जाती है और निर्दोष रेलयात्रियों की लाशों से पुरा इलाका पट जाता हैं तो उसमें उन्हें इंसानियत नष्ट होता नहीं दीखता। जब आतंकी पूरे कश्मीर से हिंदूओं को एक कर निकाल बाहर कर रहे होते हैं तो इनकी छाती नहीं पसीजती, पर जब देश के स्वाभिमान की रक्षा, एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय सेना अपनी जान गवां रही होती हैं और देशद्रोहियों व आतंकियों को उनकी औकात बताती हैं, तो इनकी छाती फटने लगती हैं, इनकी क्यों छाती फटती हैं, भारतीय जनता अब खूब जान रही हैं।
सदियों से शांति व प्रेम का संदेश देनेवाले भारत में ये लोग बंदूक की गोली से शांति व प्रेम फैलाना चाहते हैं। इनका मानना हैं कि बंदूक की निकली गोली से ही शांति और विकास का द्वार खुलता हैं, क्योंकि ये जिनके आदर्शों पर चलने की बात करते हैं, इनके आका कभी भारत से जुड़े ही नहीं, और न ही उनकी भारतीय आदर्शों में दिलचस्पी थी, ये तो मार काट की ही भाषा समझते थे और है, और जो उनकी ये भाषा नहीं समझता या उनके विचारों को नहीं मानता, उसे सदा के लिए मौत की नींद सुला देते ताकि इनके खिलाफ दूसरा कोई विचार जन्म ही न ले। गर किसी को लगता हैं कि ये लिखे हुए शब्द गलत हैं तो चीन के थ्येन मन चौक की घटना याद कर लें।
इस अरुंधती और किशन को कश्मीर पर बोलना बहुत अच्छा लगता हैं और जो चीन तिब्बत पर बल पूर्वक कब्जा कर बैठा हैं, जहां के लाखों तिब्बती दूसरे देशों में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उनके पक्ष में बोलने में इनका गला सूखता हैं कारण कि उन्हें अपने आका चीन के खिलाफ बोलने में शर्म महसूस होती हैं, वहां उन्हें चीन की ये गंदी हरकतें बहुत अच्छी लगती है, क्यों आप खूद समझिये। हर बात को समझाने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं, बल्कि इनकी हरकतों, इनके विचारों, जहां ये बोलते हैं, केवल उस पर ध्यान दीजिए।
मेरा रांची से 25 सालों का संबंध रहा है, पर मैने निकट से देखा हैं कि जितने भी जनवादी कार्यक्रम होते हैं, या इस प्रकार के वामपंथी चिंतक, देशतोड़क बयान देनेवाले लोग आते हैं, उनके कार्यक्रम इसाई मिशनरी इलाकों में ही होते हैं, मिशनरी प्रेक्षागृहों में ही होती हैं, आज तक इनके कार्यक्रम मैंने सार्वजनिक जगहों पर होते नहीं देखा। ये धर्म को अफीम मानते हैं, पर सच्चाई ये हैं कि हिंदू धर्म के खिलाफ बोलने, उनके खिलाफ गाली देने में ये शान समझते हैं और चूंकि इस प्रकार के गाली देनेवाले शब्द, देश तोड़क बयान सिर्फ मिशनरीज इलाकों में आराम से बोले जा सकते हैं, कार्यक्रम आयोजित होते हैं। एक बार मैंने इन्हीं मुददों पर एक वामपंथी नेता से पूछा कि आखिर इस प्रकार के आयोजन मिशनरीज इलाकों अथवा मिशनरीज संगठनों के बीच क्यों, अन्य जगहों पर क्यों नहीं, तब इनका कहना था कि ऐसा संभव ही नहीं। आज भी नक्सल प्रभावित इलाकों में मिशनरीज धर्म प्रचार कर आदिवासियों का बलात् धर्म परिवर्तन कर रहे हैं और उनके मूल धर्म और मूल पहचान से अलग कर रहे हैं, किसके इशारे पर ये सब हो रहा हैं। शायद इसका जवाब भी अरुंधती और किशन के पास नहीं होगा। क्या कारण हैं कि विदेशों में लोग भारतीय धर्म के प्रति सहानुभूति रखते हैं पर अपने देश में केवल पेट के लिए लोग धर्म परिवर्तन कर ले रहे हैं।
आजकल इन्हें बहुत अच्छा बहाना मिल गया हैं नक्सलियों को समर्थन देने का कि केन्द्र और राज्य सरकार खनन के नाम पर, कल-कारखाने लगाने के नाम पर पूंजीपतियों को जमीन देने के लिए, जमीन हड़पने के लिए एमओयू कर रही हैं, ग्रीन हंट चला रही हैं। मैं भी मानता हूं कि इसमें कुछ सच्चाई हैं पर ये कौन सी बात हो गयी कि आप इसकी आड़ में देश को तोड़ने पर आमदा हो जाओ, कह दो कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है। ये बोलने का अधिकार किसने आपको दे दिया, आखिर चीन और पाकिस्तान के साथ आपको इतनी हमदर्दी हैं तो फिर भारत में रहने का क्या मतलब हैं, इसे भी तो यहां की जनता को बताओ पर आप ऐसा करोगे, हमें नहीं लगता, क्योंकि आप क्या हो, आज जनता जान चुकी हैं।

Sunday, September 19, 2010

इसमें कौन सी नयी बात है...!


अर्जुन मुंडा की नयी सरकार पर आरोप है कि इस सरकार को व्यवसायियों ने अपने फायदे के लिए बनायी है और ये सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायेगी। इस तरह का आरोप तो विधानसभा में ही संभवतः झारखंड विकास मोर्चा विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने लगाया था, जब अर्जुन मुंडा सदन में विश्वास मत प्राप्त कर रहे थे, लेकिन हम आपको बता देना चाहते हैं कि इस तरह की बातें झारखंड का बच्चा बच्चा जानता हैं, कोई इसमें नयी बात नहीं है।
पहली बात, क्या ये पहली बार हुआ हैं कि सरकार बनाने अथवा बचाने के लिए किसी राजनेता द्वारा व्यवसायियों से सहयोग लिया गया हो, ये तो हमेशा से होता रहा हैं और होता रहेगा, क्योंकि हमारे यहां राजनीति अब साधुओं अर्थात् सज्जनों की जमात नहीं करती, ये विशुद्ध राजनीतिबाज हैं जो विपरीत आचरण कर सत्ता हासिल कर स्वयं और अपने अनुयायियों को अनुप्राणित करते रहते हैं, इसके उदाहरण केवल अर्जुन मुंडा नहीं बल्कि कई राजनीतिज्ञ हैं, जिसकी एक लंबी लिस्ट हैं, जिसमें भारत के सभी राजनीतिक दल शामिल हैं।
कल एक राष्ट्रीय चैनल और आज उस राष्ट्रीय चैनल का हवाला देकर रांची से प्रकाशित कई समाचार पत्रों ने इस समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया हैं, ऐसा लगता हैं कि व्यवसायियों से सहयोग लेकर, अर्जुन मुंडा ने अपराध कर डाला हैं। लेकिन अर्जुन ने अपराध किया अथवा नहीं किया, इसका निर्णय कौन करेगा, अखबारवाले और मीडिया के लोग या समय आने पर झारखंड की जनता।
कल तक तो ये ही अखबार व मीडिया वाले अर्जुन की जयजयकार कर रहे थे, अचानक ये सुर कैसे बदल गया। कमाल की बात हैं अजय संचेती भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं, उन्हें आज भाजपा नेता कम और व्यवसायी ज्यादा बताया जाने लगा हैं। लगे हाथों भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रघुवर जो ज्यादातर विवादास्पद मुद्दों पर नो कमेंटस और मीडिया पर आंख भौं तान के निकल जाते हैं उनके मुख से ये कहलवाते हुए दिखाया गया, कि सबसे पहले अजय संचेती का उनके पास फोन आया था कि वे विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दें, बाद में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी का। हो सकता हैं कि रघुवर दास ने खुद को ये संवाद कहने के लिए ड्रामा भी कराये हो, क्योंकि राजनीति में साम दाम दंड भेद सब चलता हैं, ऐसे भी रघुवर दास मन ही मन अर्जुन से खार खाये हुए हैं और फिलहाल झारखंड में रघुवर दास नेतृत्व कर रहे है, केन्द्र के उन विक्षुब्ध नेताओं का जिन्हें फिलहाल गडकरी और अर्जुन मुंडा पसंद नहीं हैं, जो नहीं चाहते कि अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री हो, क्योंकि उनके पसंद का मुख्यमंत्री कोई दूसरा है, जिनकी पकड़ राष्ट्रीय चैनलों में भी मजबूत हैं। वो जो चाहे दिखवा सकते हैं और जो चाहे करवा सकते हैं। लेकिन इसका परिणाम क्या निकलेगा, शायद दो बंदरों और बिल्ली वाली कहानी भाजपा के ये विक्षुब्ध नेता नहीं जानते।
दूसरी बात कल एक राष्ट्रीय चैनल ने दिखाया और आज कुछ अखबारों ने फोटो छापा हैं कि जिन व्यवसायियों ने सरकार बनाने में प्रमुख निभायी, वे शपथ ग्रहण समारोह में अगली पंक्ति में बैठे थे, क्या कोई बता सकता हैं कि किसी के शपथ ग्रहण समारोह में अगली पँक्ति पर कौन बैठता हैं। अगली पंक्ति पर तो वहीं वैठेगा, जो धनवाला अथवा रसूखवाला हो, कोई रिक्शावाले या भिखमंगों को तो कोई बैठायेगा नहीं। मैं मीडियाकर्मियों से ही पूछता हूं कि गर मीडिया से ही किसी को इस दौरान बैठाना रहता तो इस शपथ ग्रहण समारोह में, अग्रिम पंक्ति में चरित्रवान पत्रकार बैठते क्या, कि यहां भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिकों और प्रबंधकों का कब्जा रहता। कोई बता सकता कि आज पत्रकारिता के नाम पर जो राज्यसभा में जा रहे हैं, वे कौन लोग हैं..........................। वे वहीं लोग हैं, जो किसी न किसी प्रकार से विभिन्न राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के टॉप के नेताओं को अपने कलम अथवा कैमरा के माध्यम से उपकृत करते रहते हैं और समय आने पर ब्याज के साथ, वो सब वसूल लेते हैं, जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। क्या ये सही नहीं कि मीडिया में, जो रसूखवाले थे, वे भी अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री पद पर बैठा देखना चाहते थे, मैंने तो अपनी आंखों से देखा कि शपथग्रहण समारोह के दिन ज्यादातर चैनलों के प्रतिनिधि और उनके आका मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के चरणों में बलिहारी जा रहे थे, क्यों बलिहारी जा रहे थे, वे वे ही मीडिया के लोग बेहतर बता सकते हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को बाजार बना दिया है। रही बात झारखंड की तो यहां के विधायकों का इतिहास रहा हैं कोई नयी बात नहीं हैं. चाहे नरसिंह राव सरकार बचाने का मामला हो या परिमल नथवानी या के डी सिंह को राज्यसभा पहुंचाने की बात, ये तो खुलकर, डंके की चोट पर वो सब काम करने को तैयार रहते हैं, जो दूसरे लोग छुप कर करते हैं। और जब अर्जुन मुंडा ने व्यवसायियों के सहयोग से सरकार बना ही ली है तो उस पर छीटाकशी कौन करेगा। वे लोग, चलनी दूसे सूप के जिन्हें बहत्तर छेद। मीडिया पहले अपने गिरेबां में झाक कर देखे और झाविमो के बाबू लाल मरांडी जैसे नेता भी। जिन्होंने इस प्रकरण पर बखूबी बयान दे डाला। क्या बाबू लाल मरांडी बता सकते हैं कि इसी विधानसभा चुनाव में उनके द्वारा उपयोग किये गये उड़नखटोले के पैसे कहां से आये, फिल्म अभिनेत्रियों को कैसे चुनावी सभा में ले जाया गया, विधानसभा चुनाव में मीडिया पर पैसा कैसे पानी की तरह बहाया गया, कूटे में महाधिवेशन के दौरान करोड़ों रुपये कैसे खर्च हो गये, आखिर ये बिना व्यवसायियों के सहयोग से हो गया क्या। गर व्यवसायियों के सहयोग से नहीं हुआ तो जनता को बतायें कि अचानक कहां से उन्हें अलादीन का चिराग प्राप्त हो गया ।

Saturday, September 11, 2010

बधाई महामहिम फारुक साहब को…।


मैं अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में ढूंढ रहा हूं, एम ओ एच फारुक साहब को, पर वो मिल नहीं रहे, कल तक उनके नाम स्थानीय अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सुर्खियों में रहता था, पर अब वो दिखाई नहीं दे रहा। लोग कहते हैं कि ये देश ऐसा हैं कि यहां उगते सूर्य को ही नमस्कार किया जाता हैं, पर शायद लोग भूल रहे हैं कि ये देश ऐसा भी हैं कि डूबते सूर्य को सर्वप्रथम अर्घ्य देने के बाद ही अपना व्रत प्रारंभ करता हैं, गर किसी को ध्यान नहीं हो, तो जरा कार्तिक शुक्ल रविषष्ठी व्रत जिसे छठ भी कहते हैं, उस ओर अपना ध्यान ले जाये।
चारों ओर जयजयकार हो रही अर्जुन मुंडा की। होनी भी चाहिए क्योंकि इस अर्जुन ने अपने तरकस से निकाल धनुष पर संधान कर ऐसी तीर छोड़ी हैं कि इस तीर से कई दिग्गज घायल हो गये, खुद जिस गुरु शिबू सोरेन ने राजनीतिक शिक्षा दी, वे खुद ही फिलहाल असहाय की स्थिति में हैं, जिस बाबु लाल मरांडी ने अर्जुन को पहली बार सत्ता सौंपी थी, वे सत्ता की चाहत में इधर से उधर भटक रहे हैं, पार्टी बना ली, फिर भी मुख्यमंत्री का पद नहीं मिला, पर जिसने कुछ भी नहीं किया, वो आज सत्ता के शीर्षस्थान पर हैं, कैसे। इस पर विचार करना चाहिए। विचार करना चाहिए, सत्ता की चाहत में बैठे, उन राजनीतिज्ञों को जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने की इच्छा रखते हैं। हम बता देना चाहते हैं कि सत्ता की राजनीति में मुख्यमंत्री पद की लालसा रखना कोई गलत बात नहीं, पर उसके लिए तिकड़म करना गंदी बात हैं। हालांकि बिना तिकड़म के राजनीति में कोई बात बनती ही नहीं। ऐसे भी साम दाम दंड भेद ये शब्द राजनीति के कोख से ही निकले हैं। चलिए झारखंड का बेटा अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बन गया । ये आज का अर्जुन हैं, ये न तो तीर चलाता हैं और न धनुष रखता हैं, पर हां, गोल्फ खेलता हैं, जबकि दोनों में लक्ष्य का निर्धारण और उसे पाना महत्वपूर्ण होता हैं। चुनाव के परिणाम आने के बाद मात्र नौ महीने में इतनी आसानी से अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री इस बार बन जायेंगे, इसका अंदाजा किसी को नहीं था। ऐसे भी इतिहास गवाह हैं कि इस अर्जुन को, सत्ता में आने के लिए कई बार संघर्ष भी करना पड़ा हैं, कभी राज्यपाल की भूमिका ने सत्ता से दूर इसे रखा तो कभी अपनों ने ऐसी तिकड़म लगायी कि इन्हें सत्ता मिलने में देर हो गयी, पर इस बार अर्जुन ने ऐसी जुगत लगायी, मीडिया और कारपोरेट जगत को ऐसा क्लच में लिया कि चारो ओर सिर्फ अर्जुन ही अर्जुन दिखाई पड़ने लगा, फिर क्या था, उधर भाजपा आलाकमान ने भी हरी झंडी दिखा दी, नतीजा सबके सामने हैं।
पर एक बात मैं कहे और लिखे बिना रुक नहीं सकता, जरा सोचिये कि आज एम ओ एच फारुक की जगह सैय्यद सिब्ते रजी या अन्य राज्यपाल होते तो क्या होता किसी ने इस बात का अंदाजा भी लगाया हैं। लोग को छोड़िये सत्ता किसी को मिले अथवा सत्ता न मिले उससे आम जनता की कोई दिलचस्पी नहीं होती पर मीडिया ने क्या किया, मीडिया ने उस शख्स को बधाई दी, अथवा दो शब्दों की उदारता दिखायी जिसने सचमुच में लोकतंत्र की मर्यादा रखी, खासकर ऐसे वक्त में जब चारों ओर लोकतंत्र का चीरहरण हो रहा है। बधाई झारखंड के राज्यपाल एम ओ एच फारुक को, जिन्होंने आज की राजनीति में, एक नया आयाम लिखा हैं, उन्होंने राजनीतिक परिपक्वता ही नहीं बल्कि शुचिता एवं शुद्धता की नयी परिभाषा लिखी हैं। याद करिये, जब इस राज्य में राज्यपाल सैय्यद सिब्ते रजी थे, उन्होंने क्या किया था, ये जानते हुए भी कि अर्जुन को बहुमत हैं, उन्होंने सत्ता से दूर रखकर उस वक्त शिबू को मुख्यमंत्री बनाने का न्यौता दे डाला था, पर एम ओ एच फारुक साहब को देखिये, जैसे ही अर्जुन मुंडा ने बहुमत जुटाई, बहुमत को राज्यपाल के समक्ष रखा। एम ओ एच फारुक ने तुरंत निर्णय लिया, राष्ट्रपति शासन हटवाने के लिए गृहमंत्री को अनुशंसा किया, ये ही नहीं जो उन्होंने राज्यहित में कुछ निर्णय ले रखे थे, उन्हें रोका, और नये सरकार पर फैसले छोड़ दिये। जल्द ही अर्जुन मुंडा को सत्ता भी सौंप दी। आज के युग में ऐसी मिसाल कहां मिलती हैं। बधाई हो एम ओ एच फारुक साहब। आपने एक नयी मिसाल कायम की हैं। राजनीति करनेवालों और राजनीति में रुचि रखनेवालों को आपने एक सबक दी हैं, आशा की जानी चाहिए कि लोग आपसे सबक सीखेंगे, हालांकि ये सच हैं कि मीडिया और कारपोरेट जगत जो अर्जुन मुंडा को सत्ता सौंपने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहा था, आपके इस उदार चरित पर ध्यान देना उचित नहीं समझा, पर झारखंड में इमानदारी से राजनीति करनेवालों को आपका ध्यान हमेशा रहेगा।
आज के युग में सत्ता किसे अच्छी नहीं लगती, आप भी औरों की तरह तिकड़म लगा सकते थे, और कुछ दिन झेल सकते थे, विधानसभा को भंग करने की सिफारिश कर सकते थे, क्योंकि झारखंड विकास मोर्चा के कई नेता तो कह ही रहे थे, कि विधानसभा भंग कर दी जाये, पर आपने ऐसा नहीं किया, विधानसभा को निलंबित ही रहने दिया पर जैसे ही अर्जुन ने बहुमत का जुगाड़ किया आपने बिना किसी इफ-बट के वो फैसले लिये, जिस फैसले की आशा तो इतनी आसानी से न तो भाजपा को थी और न तो अर्जुन मुंडा को, मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मैं पत्रकार हुं और मुझे इसका अच्छी तरह अनुमान हैं। पर यहां की मीडिया जो अर्जुन के बयार में आपके इस उदार चरित को भूल गयी, एक शब्द भी आपके बारे में लिखना उचित नहीं समझा। ये देख व जानकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, फिर भी, आपको मेरी ओर से महामहिम फारुक साहब आपको कोटिशः बधाई। आशा हैं आप अपनी इस प्रकार की उदारता से राजनीति में और भी मिसाल कायम करते रहेंगे। ऐसे भी आपने बहुत कम ही समय में, जो राष्ट्रपति शासन के दौरान जो झारखंड हित में निर्णय लिये हैं, उसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। सूखा झेल रहे, झारखंड और भ्रष्टाचार को रोकने में जो आपने मह्तवपूर्ण फैसले लिए, उसका पालन आनेवाली सरकार करेंगी, इसका मुझे उतना भरोसा नहीं और न ही आम जनता को हैं।

Sunday, September 5, 2010

शिक्षक दिवस पर विशेष

गुरु क्या, ये तो शिक्षक के भी लायक नहीं...!

एक पत्रकार मित्र ने आज शिक्षक दिवस पर कुछ पंक्तियां मुझसे पूछी, संभवतः वे शिक्षक दिवस पर कुछ स्पेशल रिपोर्ट बनाना चाहते थे। गुरु और गोविंद में कौन बड़ा हैं, इससे संबंधित कुछ पंक्तियां वे मुझसे चाहते थे। शिक्षक दिवस के दौरान ऐसे भी भारत में ये पंक्तियां खूब चलती हैं --------
गुरु गोविंद दोउं खड़ें, काको लागू पायं।
बलिहारी गुरु आपनो, जो गोविंद दियो बतायं।।

और इस पंक्ति के बहाने आज के शिक्षक को गुरु बताकर, ईश्वर से भी, उन्हें श्रेष्ठ बताने की कोशिश की जाती हैं। जबकि आज के शिक्षक कभी गुरु हो ही नहीं सकते। क्योंकि कल के गुरु और आज के शिक्षक में आकाश जमीन का अंतर हैं। कल का गुरु शिक्षक नहीं था, वो मानव संसाधन के अंतर्गत न कभी काम किया था और न ही करने का कभी संकल्प किया था, पर आज का शिक्षक मानव संसाधन बन गया हैं, और एक संसाधन का क्या हश्र होता हैं, वो कल के गुरु का भान करनेवाला आज का शिक्षक खूब समझता हैं।
संस्कृत में एक श्लोक हैं -----------
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

हालांकि इस श्लोक का भी आज के शिक्षक अपने ढंग से भावार्थ बताते हैं, जबकि मेरे अनुसार, गुरु को ब्रह्मा के सदृश होना चाहिए, जो अपने शिष्य का निर्माण करें, गुरु को विष्णु होना चाहिए, जो उसके चरित्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाये, गुरु को शंकर होना चाहिए, जो उसके सभी बुराईयों को शमन कर दें, ऐसे गुरु ही साक्षात् परब्रह्म के समान होते हैं, जो ऐसे हैं, उन्हें नमस्कार हैं, पर ऐसे गुरु आज कितने हैं।
जरा कल के गुरु की एक कहानी सुनाता हूं
महर्षि धौम्य अपने शिष्य आरुणि को कहते हैं कि हे आरुणि। बारिश होनेवाली हैं, इसलिए तुम जाओ खेत में, वहां मेड़ बनाकर, खेत में जानेवाले पानी को रोकने का प्रयास करों ताकि खेत में लगी फसल बर्बाद न हो, महर्षि धौम्य के आदेश को सुनकर आरुणि खेत की ओर चल पड़ता हैं, भारी बारिश होती हैं, पर मिट्टी के मेड़ पानी में बह जा रहे हैं, अंतः में कोई विकल्प न देख आरुणि खुद को मेड़ बना कर लेट जाता है। रात बीत रही हैं, इधर महर्षि धौम्य अपने शिष्य आरुणि को आश्रम में न आया देख, विचलित हो रहे हैं, जैसे ही सुबह होती हैं, वे खेत की ओर अपने अन्य शिष्यों के साथ चल पड़ते हैं। देखते हैं कि आरुणि ने गुरु के वचन का पालन करने के लिए स्वयं को ही मेड़ बना डाला है,
आरुणि की इस दशा को देख, महर्षि धौम्य भाव विह्ववल हो रहे हैं, और अपने प्रिय शिष्य को उसी अवस्था में गले लगा लेते हैं, कहां हैं, ऐसे शिक्षक, जो इस आदर्श को अपना सकें, और उन्हें हम गुरु कह सकें।
जरा एक और कथा सुनिये --------------
रावण की सेना और उसके गुप्तचर भारत के सभी स्थानों को एक एक कर अपने गिरफ्त में ले रहे हैं। इधर गुरु विश्वामित्र को चिंता हो रही हैं, कि गर ऐसा ही चलता रहा तो भारत की दशा अत्यंत दयनीय हो जायेगी, अपने अंदर प्राप्त ज्ञान किसे दें, जिससे भारत की रक्षा हो सकें। वे अयोध्या का रुख करते हैं। अयोध्यापति दशरथ के पुत्र राम लक्ष्मण को अपनी विद्या के लिये योग्य मानकर उन्हें अपने साथ लेकर निकल पड़ते हैं, रास्ते में ही, राम लक्ष्मण की योग्यता की परीक्षा लेते हैं, जब ताड़का मार्ग में ही आ खड़ी होती हैं। दोनों परीक्षा में पास और फिर राम लक्ष्मण को उन्होंने सारी अपनी विद्याएं दे दी और राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया। बाद में गौतम नारी अहल्या का उद्धार कराया, राम का योग्य कन्या सीता के साथ विवाह भी संपन्न कराया और फिर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होकर नये भारत के निर्माण के लिए निकल पड़ें, और यहीं योग्य राम आगे चलकर क्या किया, आगे की कथा सभी जानते हैं, इसलिए यहां इससे अधिक बातें लिखना उचित नहीं। जरा अब बताईयें कि आज कितने शिक्षक ऐसे हैं जो विश्वामित्र और महर्षि धौम्य की सोच रखते हैं। जब ऐसी सोच इनकी हैं ही नहीं, तो फिर हम इन्हें गुरु क्यों कहें।
अरे ये तो शिक्षक हैं। इनका आज का चरित्र देखिये।
क. पैसे लेकर शिक्षा बांटते हैं। ये तो प्राईवेट फर्मों में पढ़ाते हैं, और आज कोई दूसरे फर्म, उन्हें ज्यादा पैसे देने की बात करें, तो बेस्ट आपर्चूयनिटी का बहाना बनाकर, आराम से अपने वर्तमान शिष्यों को श्रद्धांजलि देकर निकल पड़ते हैं, अपनी मस्ती और भौतिक आनन्द की खोज में।
ख. जिन सरकारी स्कूलों में ये पढ़ाते हैं, उन सरकारी स्कूलों में खूद अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते क्योंकि वे जानते हैं कि सरकारी स्कूलों की क्या स्थिति हैं, इसलिए वे इन्हीं सरकारी स्कूलों से खुद तो बंपर स्केल उठाते हैं, पर अपनी संतानों को इन स्कूलों से दूर रखते हैं, क्योंकि वे खुद कर्तव्यनिष्ठ होकर नहीं पढ़ाते, ये अलग बात हैं कि इन सरकारी स्कूलों में जैसे तैसे पढ़ रहे वंचितों के बच्चे अपनी तकदीर खुद संवार लेते हैं।
ग. आज का शिक्षक खुद को कांट्रेक्ट में बांध दिया हैं, ठेके पर नियुक्त होता हैं, पारा टीचर बनकर गौरवान्वित महसूस करता हैं, खुद कहता हैं कि वो पारा टीचर हैं, और जब उन्हें खुद की मानदेय कम लगती हैं तो सड़कों पर उतर जाता हैं, यहीं नहीं वो कहता हैं कि उसका नियमितिकरण कर दिया जाय, यानी जिन स्कूलों में शिक्षक नियुक्त हुए, जिन प्रक्रियाओँ के द्वारा। भले ही उन प्रक्रियाओं से, ये पारा टीचर की नियुक्ति न हुआ हो, पर सारा सुख, उन्हीं की तरह लेने की बात करता हैं, यानी शार्ट कट फार्मूला, से बंपर स्केल पाना चाहता हैं।
घ. चाहे बंपर स्केल पाने वाले नियमित शिक्षक हो या पारा टीचर। सहीं बात तो ये हैं कि ये कभी भी दिल लगाकर अपने कर्तव्य पथ पर नहीं हैं, गर ये आज कर्तव्यपथ पर होते, तो फिर ये नये – नये निजी विद्यालय खुलते ही नहीं, गर खुलते भी तो इनके आगे टिकते ही नहीं। हमें याद हैं कि एक समय था, जब जिला स्कूलों में नामांकन कराने के लिए बड़े बड़े लोगों की पैरवी होती थी, आज तो इन जिला स्कूलों में कोई अपने बच्चों को पढ़ाना ही नहीं चाहता, खुद वे टीचर भी नहीं पढ़ाना चाहते, जो यहां नियुक्त हैं। ऐसे में ये मानव संसाधन बन गये शिक्षक, देश व समाज का कितना भला कर रहे हैं, ये तो खुद ही वे जाने।
ड. यहीं नहीं इतनी गिरी हुई व्यवस्था में, इन्हीं शिक्षक बने गुरुओं को शिक्षा जगत का उच्च सम्मान सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का मेडल भी मिल जाता हैं, ये मेडल अथवा पदक कैसे और क्यूं मिलते हैं, इसकी भी गर जांच हो जाये, तो एक पदक घोटाला भी सामने आ जायेगा। जिन शिक्षकों को इस प्रकार के पदक मिलते हैं, जरा उनसे पूछिये कि आपने अपने जीवन में कितने राम, लक्ष्मण, कितने आरुणि, कितने भगत सिंह, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, लोकनायक जयप्रकाश नारायण आदि महापुरुष पैदा किये, तो पता लग जायेगा कि स्थिति क्या हैं। पर एक परंपरा हैं, पदक देनी हैं, इसलिए सभी प्रांतों में बैठे राज्य व केन्द्र के शिक्षाधिकारियों की टीम से मंगवा लिया जाता हैं कि किस शिक्षक को पदक देनी हैं, इसलिए ये शिक्षाधिकारी अपने ठकुरसोहाती विधा को अपनाते हुए, ऐसे ऐसे शिक्षकों का नाम भेज देते हैं, पदक के लिए, कि हमे हंसी आती हैं।
अंततः हमे याद हैं कि राजश्री प्रोडक्शनंस प्राईवेट लिमिटेड वालों ने बहुत पहले एक दोस्ती पिक्चर बनायी थी, जिसमें शिक्षक के कर्तव्य बोध का सफल चित्रण हुआ था। केन्द्र व राज्य सरकार और शिक्षक दिवस पर नाना प्रकार के कार्यक्रमों को आयोजित करनेवाले महानुभावों को चाहिए कि वो फिल्म दोस्ती की एक – एक सीडी इन शिक्षकों को उपलब्ध करायें, और ये शिक्षक उस फिल्म को आद्योपांत देखे, और सोचे कि क्या उनका वो चरित्र हैं जो दोस्ती फिल्म में शिक्षक, प्राचार्य और लिपिक का हैं। गर नहीं तो धिक्कार हैं, क्योंकि शिक्षक महोदय, आपका कुछ नहीं जा रहा हैं, देश मिट्टी में मिल रहा हैं, क्योंकि आप राष्ट्र निर्माता हो, गर राष्ट्र निर्माता ही अपने कर्तव्य बोध से भटक जायेगा तो देश गर्त में जायेगा ही, इसलिए वक्त हैं, देश को गर्त में जाने से बचा लो।

Sunday, August 29, 2010

इस देश का तो भगवान ही मालिक हैं...!


जब मैं स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रहा था, तब मेरे शिक्षक ने बताया था कि अंग्रेज जब भारत में शासन करते थे, तो वे यहां के बेशकीमती सामान अपने देश ले जाया करते थे, साथ ही वे यहां के लघु व कुटीर उद्योगों को नष्ट कर, अपने देश की निर्मित सामग्रियां भारत लाकर बेच दिया करते थे। यहीं नहीं वे यहां की खनिज संपदा को इँग्लैंड ले जाते और इन खनिजों से बनी सामग्रियों को फिर भारत लाकर उंचे दामों पर बेचते, इससे इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था और मजबूत होती जाती, पर भारत और निर्धन होता चला जा रहा था, अंग्रेजों की चिंता अपने देश को येन केन प्रकारेन आगे बढ़ाने की होती जिसको लेकर 15 अगस्त 1947 के पूर्व हमारे देश के नेताओं ने अंग्रेजों से लोहा लिया और देश को स्वतंत्र कराया ताकि भारत स्वयं की नीतियों पर चलकर देश को आत्मनिर्भर और संस्कारित बनवायें। पर........................! आज भारत स्वतंत्र हैं, भारत को आत्मनिर्भर बनाना और संस्कारवान बनाने का जिन पर जिम्मा हैं, वे कर क्या रहे हैं….? इन्होंने अपनी और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक करने का जिम्मा उठा लिया हैं, और निर्धन देशवासियों को दिया हैं सिर्फ और सिर्फ स्वयं का संपोषित जायकेदार भाषण, और इनके भाषणों का जायकेदार ढंग से छापने और दिखाने का जिम्मा ले रखा हैं, देश के तथाकथित पत्रकारों ने।
हाल ही में एक मेरे पत्रकार मित्र ने देश के एक युवा होनहार नेता संभवतः राहुल गांधी का एक बयान पढ़कर मुझे सुनाया, शायद राहुल गांधी उड़ीसा के लांजीगढ़ में भाषण देते हुए कहा था कि देश में दो तरह के लोग बसते हैं एक जिनके पास सब कुछ हैं और एक वे जिनके पास कुछ भी नहीं। वे यानी कि राहुल गांधी ऐसे ही लोगों का जवाब बनना चाहते हैं जिनके पास कुछ भी नहीं, ताकि दिल्ली में बैठी सरकार, उनकी बात सुन सकें, पर राहुल गांधी को कौन बताये कि खुद राहुल जैसे लोग ही अपनी आमदनी मात्र पांच साल में 414 प्रतिशत बढ़ाकर देश को गर्त में ढकेल देने की मुख्य भूमिका अदा कर रहे होते हैं। क्या राहुल देश के गरीबों को बता सकते हैं कि उन्होंने मात्र पांच साल में अपनी आमदनी 414 प्रतिशत कैसे बढ़ा ली…? गर वे अपनी आमदनी मात्र पांच साल में 414 प्रतिशत बढ़ा सकते हैं तो ये ही पद्धति उन गरीबों को भी क्यों नहीं बता देते ताकि वे भी अपनी आमदनी मात्र पांच साल में 414 प्रतिशत बढ़ा लें ताकि किसी राहुल गांधी को उनकी आवाज बनने की आवश्यकता ही न पड़े। वे खुद ही स्वावलंबी बन जाये, पर राहुल जैसे लोगों को इन्हें स्वावलंबी बनाने से क्या मतलब, इन्हें तो अपना जायकेदार भाषण सुनाने से मतलब हैं ताकि उन्हें अखबारों और अन्य मीडियाकर्मियों से वाहवाही मिल जाये और अपनी छवि धीरे धीरे निखारने का वक्त। शायद राहुल गांधी जैसे नेता जानते हैं कि इस देश के गरीबों और दो जून की रोटी खोजनेवालों की पेट तो यहां सिर्फ राहुल के भाषण सुनकर ही भर जाती हैं और बाकी जो बचता हैं वो दूसरे दिन अखबारों अथवा टीवी पर चलनेवाले उनके फूटेज देखकर प्राप्त हो जाता हैं। ऐसे भी यहां के लोगों को स्वावलंबी बनने का समय कहां हैं, गर ये स्वावलंबी अथवा जिस प्रकार से राहुल गांधी जैसे नेता 414 प्रतिशत आमदनी मात्र पांच साल में कर लेते हैं, वो धंधा ये भी शुरु कर दें तो फिर राहुल की भाषण सुनने में दिलचस्पी कौन लेगा।
जरा देखिये, हमारे देश के नेताओं की हरकतें। दिल्ली में इन्हीं की सरकार हैं, जिसके मंत्री कहते है कि वे अनाज सड़ा देंगे पर गरीबों को निवाला नहीं देंगे। ये इन्हीं की सरकार हैं, जिनके मंत्री पी चिदम्बरम को भगवा कलर में आतंक दिखायी पड़ता हैं, शायद राहुल और उनके चाहनेवाले अथवा उनके पदचिन्हों पर चलने की कसम खानेवालों को ये पता नहीं कि जिस भगवा आंतक की बात कर रहे हैं, वो भगवा हमारे देश के तिरंगा में भी दिखायी पड़ता हैं, जो शौर्य व वीरता का प्रतीक हैं, जिस पर कई गीतकारों ने गीत लिखे हैं, एक गीत तो आज भी भारतीय युवाओं में वीरता की लहर दौड़ा देता हैं, जिसके बोल हैं – मेरा रंग दे वसंती चोला, मेरा रंग दे। ये वासंती रंग भी भगवा का ही प्रतीक हैं क्या कहेंगे। क्या अब रंग भी आंतक से जोड़ा जायेगा। ये हैं कांग्रेसी और इनकी सोच, जिनकी सोच पर हमें तरस आता हैं और ये देश निर्माण की बात करते हैं।
कमाल हैं अपनी आमदनी को बेतहाशा ढंग से बढ़ाने में केवल राहुल गांधी ही नहीं, बल्कि देश के अन्य नेता भी शामिल हैं। ये कांग्रेस, भाजपा, राजद तथा सभी दलों में हैं, जो देश को ताक पर रखकर वो सब कुछ प्राप्त कर लेना चाहते हैं, जो अन्य देशों के नेता, नहीं करते। जो इसी देश में राज करनेवाले अंग्रेजों ने नहीं किया, अंग्रेज ने भले ही भारत को बर्बाद किया पर वे भी अपने देश ब्रिटेन के हित में ही काम करते थे, पर आज तो देश स्वतंत्र हैं फिर हमारे देश के नेताओं का वो त्याग कहा गया, जो आजादी से पहले और आजादी के बाद कुछ वर्षों तक यहां के नेताओं में दिखाई पड़ा करता था। जरा देखिये कितनी निर्लज्जता से इन्होंने अपने वेतन बेसिक 192000 से 600000, दैनिक भत्ता 1000 से 2000, संसदीय क्षेत्र भत्ता 240000 से 540000, कार्यालय भत्ता 240000 से 540000, हवाई यात्रा भत्ता साल में 34 के जगह 50, टेलीफोन 150000 कॉल से 200000 कॉल और पेंशन 8000 से 20000 रुपये प्रतिमाह बढ़ा ली.
ये ही नहीं हमारे देश के किसानों मजदूरों को अपने खेत के उपकरण लेने के लिए बैंक से जो ऋण लेने पड़ते हैं, उसमें उन्हें ब्याज देनी पड़ती हैं पर ये नेता जब बैंक से 400000 रुपये तक ऋण लेंगे तो इन्हें ब्याज देने की जरुरत ही नहीं। क्योंकि ये देश के नेता हैं, सांसद हैं, इनका जीवन हमारे जीवन से अलग हैं, इन्हें भगवान ने भारत में इसलिये भेजा हैं ताकि ये भारतीय जनता की मेहनत का सही सही उपयोग कर सकें और अपने परिवार को परम सुख का आनन्द जीवन भर देते रहे, कमाल हैं, मेरे देश के नेताओं की सोच।
यहीं नहीं जरा इस ओर भी नजर डालिये -----------------
आम जनता चाय पी रही हैं पांच रुपये कप, और ये अपने कैंटीन में पीते हैं एक रुपये कप, भारत की गरीब जनता दो जून की रोटी कमाने में अपना जीवन बर्बाद कर ले रही हैं, महंगाई ने लोगों का जीवन दूभर कर दिया हैं पर जरा देखिये ये माल भोग खा रहे हैं कैसे जरा देखिये – इनकी कैंटीन के हाल और इनके मौज –
चाय – एक रुपये
सूप – साढ़े पांच रुपये
दाल – डेढ़ रुपये
दही चावल – ग्यारह रुपये
वेज पुलाव – आठ रुपये
फिश करी – तेरह रुपये
फिश कर्ड – सत्रह रुपये
चिकन – साढ़े चौबीस रुपये
चपाती – एक रुपये
चावल – दो रुपये
डोसा – चार रुपये
खीर – साढ़े पांच रुपये
थाली – साढ़े बारह रुपये
नान वेज – बाईस रुपये
बिरयानी – साढ़े बीस रुपये, यानी माल महराज के मिर्जा खेले होली। जनता के पैसे -- मौज कर रहे हैं ये नेता, और जनता मरे तो नेता क्या करें, वो तो बनी हैं ही मरने के लिए। गर संसदीय इतिहास उलट कर देखे तो अपने देश में सात प्रतिशत ही सांसद ऐसे हैं जो बहस में हिस्सा लेते हैं। 18 फीसदी तो आजतक संसद में सवाल किया ही नहीं, जबकि 14 लाख रुपये संसद की हर घंटे की कार्यवाही पर खर्च हो जाती हैं। कमाल का हैं ये अपना देश और कमाल के है ये नेता और कमाल की हैं यहां की जनता जो सब कुछ सहे जा रही हैं, कुछ बोलने को तैयार ही नहीं और जब चुनाव आती हैं तो फिर वो ही करती हैं, जो नेता चाहते है। यानी ये जनता कब जगेगी, कुछ कहां नहीं जा सकता। इस देश का तो भगवान ही मालिक हैं।

Tuesday, August 24, 2010

क्या हैं रक्षाबंधन.......?

रक्षाबंधन पर विशेष ------------------
रक्षाबंधन की व्यापकता तो इसके शब्दों में हैं, पर कुछ इतिहासकारों और फिल्मकारों ने इसकी व्यापकता को इतना सीमित कर दिया हैं कि ये सिर्फ भाई और बहनों का त्यौहार बन कर रह गया हैं, क्या सचमुच ये त्योहार भाई बहन का हैं या इसका संबंध मानवीय मूल्यों और राष्ट्र की रक्षा से हैं। आईये हम इसी पर आज चर्चा करते हैं ----------------------
सर्वप्रथम रक्षाबंधन की जो धार्मिक कथा हैं वो इस प्रकार हैं -----------------
भविष्य पुराण में एक प्रसंग हैं एक बार देवताओं और राक्षसों में भयंकर युद्ध हुआ, लगातार बारह वर्षों तक युद्ध करते करते देवताओं के हालत पस्त हो गये, कोई विकल्प न मिलता देख, देवताओं के गुरु वृहस्पति ने देवराज इन्द्र को अपना विचार दिया कि वे युद्ध को रोक दें, पर इन्द्राणी ने कहा कि देवगुरु देवताओं को युद्ध रोकने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि आज श्रावण पूर्णिमा हैं, इसलिए वो इस दिन देवराज इन्द्र को रक्षा सूत्र बांधेगी, जिसके प्रभाव से देवता अवश्य जीतेंगे, और देवलोक की रक्षा हो सकेगी। इस प्रकार देवराज इन्द्र की जीत हुई और देवलोक राक्षसों से सुरक्षित हो गया। ये कथा बताती हैं कि रक्षाबंधन किस भाव और किस रिश्तों का प्रतीक हैं। न तो इन्द्राणी देवराज इन्द्र की बहन थी और न देवराज इन्द्र, इन्द्राणी के भाई तो फिर इसका मकसद क्या था, मकसद केवल एक था देवलोक की रक्षा।
अब उस मंत्र की ओर ध्यान दें, जिस मंत्र को ब्राह्मण समुदाय अपने यजमानों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधते हुए कहते हैं।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

जिस रक्षा सूत्र से दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने राक्षसराज महाबलशाली बली की सुरक्षा प्रदान की थी, वहीं रक्षा आज तुम्हारे कलाई पर बांधा जा रहा हैं, ये रक्षासूत्र उसी भांति तुम्हारी रक्षा करें। ये मंत्र भी ये बताने के लिए काफी हैं कि ये पर्व किसका हैं, और किस भाव का प्रतीक हैं।
अब वैदिक मंत्र की ओर ध्यान दें, ये भी वहीं कह रहा हैं जो कि पूर्व के श्लोक का भावार्थ हैं -----------------------
ऊं जा बध्नन् दाक्षायणा हिरण्यंशतानीकाय सुमनस्यमानाः।
तन्म आ बध्नामि शतशारदायायुष्मांजरिदष्टर्यथासम्।।

कमाल हैं, इस महान पर्व को केवल भाई बहनों तक सीमित कर देना, इस पर्व की महानता को लघुता में प्रकट करने के समान हैं। जरा खुद बताईये जिस देश में दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती की पूजा शक्ति, धन और विद्या की प्राप्ति के लिए की जाती हो, वो स्त्री वर्ग अपनी रक्षा के लिए पुरुषों से रक्षा की कल्पना कैसे कर सकती हैं। जरा सोचिये, जिस देश में सावित्री अपने पति सत्यवान की प्राण रक्षा के लिए यम से लड़कर अपने पति के प्राण को वापस ले आती हो, उसे भला रक्षा की क्या जरुरत, जिस देश में सीता, रावण की बनी अशोकवाटिका में रहकर अपने सम्मान की रक्षा स्वयं कर लेती हो, जिस देश में अनुसूया अपने सतीत्व के बल पर भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बालक बना देती हो, जिस देश में महान वीरांगना लक्ष्मीबाई अकेले अंग्रेजों के दांत खट्टे कर देती हो, भला उस वर्ग को कैसे कोई रक्षा करने का वचन दे सकता हैं, वो तो खुद बलशाली हैं, वो तो केवल हमारे मस्तक पर तिलक लगा दें और शुभाशीष दे दें तो हमारी रक्षा हो जायेगी, हम उसकी रक्षा क्या करें, अतः जरुरत हैं, रक्षाबंधन की महत्ता को समझने की।
आज देश की जो स्थिति हैं, वह अंदर और बाहर दोनों से शक्तिहीन और श्रीहीन होता चला जा रहा हैं, देश के राजनीतिज्ञ इन सबसे अलग अपनी और अपने परिवार की भलाई से कुछ अलग सोचने नहीं हो, ऐसी स्थिति में इस रक्षाबंधन के पर्व की महत्ता और बढ़ जाती हैं, कि देश की रक्षा और संप्रभुता की रक्षा कैसे की जाय, एक तरफ चीन हमारी सीमाओं को छोटा करने में लगा हैं, दूसरी ओर पाकिस्तान और जिसे हमने स्वतंत्र कराया बांगलादेश, वो हमे नीचा दिखाने पर तुला है, ऐसे हालत में हम केवल इस पर्व को भाई बहन का पर्व बनाकर, और फिल्मी गीतों में ढालकर भूला दें, तो ये मूर्खता के सिवा कुछ नहीं, हमारे वेद और उपनिषद यहीं बताते हैं कि रक्षा बंधन का पर्व ये सीख देता हैं कि सोचो कि तुम अपने देश और समाज की रक्षा कैसे करोगे, आज की मौजूदा हालात में, चिंतन करों, देश तुम्हारा, समाज तुम्हारा, और तुम फिल्मी लटकों – झटकों में पड़ें हो ऐसे में ये राम और कृष्ण की भूमि का क्या होगा। क्या तुम्हें देवराज इन्द्र और दैत्यगुरु शुक्राचार्य की कथा नहीं मालूम। गर नहीं मालूम हैं तो अपने पूर्वजों की कथाओं को आज के दिन सुनों।
आज भी धार्मिक कार्यक्रमों में रक्षासूत्र बांधने का प्रचलन हैं, उसका मूल मकसद होता हैं कि आप धर्मानुसार आचरण करते हुए स्वयं की रक्षा करों, क्योंकि
वेद और उपनिषद कहते हैं कि --------------
धर्मों रक्षति रक्षितः अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता हैं, धर्म उसकी रक्षा करता हैं, इससे ज्यादा कुछ जानने की आवश्यकता नहीं। धर्म भी व्यापक हैं, उसे समुदाय में मत तौलिये। धर्म एक ही हैं, सत्य आचरण। कहा भी गया हैं – सत्य धारयति धर्मः।

Monday, August 23, 2010

खबरदार झारखंडियों, यहां सिर्फ मेरी मर्जी चलेगी।


अब घर में आपकी बीबी की नहीं, आपकी चलेगी मर्जी। इस विज्ञापन पर हमारे आसपास रहनेवाली कई गृहलक्ष्मियों ने आपत्ति जतायी थी कि भाई साहब, घर में बीबी की मर्जी नहीं चले, आफिस में बॉस की मर्जी नहीं चले, स्कूलों में प्रिंसिपल की मर्जी नहीं चले, राजनीतिक दलों में उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष की मर्जी नहीं चले, देश में प्रधानमंत्री और प्रदेश में मुख्यमंत्री की मर्जी नहीं चले, तो फिर मर्जी चलेगी किसकी…..???
हमारे अगल बगल में रहनेवाले सज्जनवृंद की पत्नियों ने तो अपने पति महोदयों से यहां तक कह दिया कि गर हमारे घर में अपनी मर्जी थोपनेवालों की अखबार आ गयी, तो पति महोदय समझ लीजिए, घर में क्या होगा, क्योंकि आज तक घर में पत्नी की ही मर्जी चली हैं, क्योंकि धर्मशास्त्रों में भी पत्नियों को ही गृहलक्ष्मी कहा गया है, न कि पति को गृहलक्ष्मा। ऐसे भी जो चीजें जहां सुंदर लगती हैं, वहीं ठीक हैं, ज्यादा काबिल बनने के लिए, अपनी मर्जी थोपना कहीं से ठीक नहीं।
क्योंकि काजल जब आंखों में लगे तभी उसे काजल कहते हैं गर वो गालों पर लग जाये तो उसे कालिख ही कहेंगे। पिछले कई महीनों से राजधानी रांची में एक अखबार समूह के विज्ञापनों ने तहलका मचा रखा था, और इस तहलके में बस मर्जी ही मर्जी दिखाई पड़ रही थी, पर असली मर्जी तो 22 अगस्त को दिखाई पड़ गयी, जब रांची के ज्यादातर अखबार हॉकर, अपनी मर्जी थोपनेवालों के शिकार बन गये, आज 23 अगस्त को रांची से प्रकाशित प्रभात खबर, हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण ने इस समाचार को प्रथम पृष्ठ पर इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया हैं, जिसे पढ़कर निराशा हुई, क्या अब अखबार गुंडों, अपराधियों और बाहुबलियों के रहमोकरम पर चलेंगे, जब ये अखबार समूह के लोग हॉकरों को पीट सकते हैं तो इसकी क्या गारंटी कि कल पाठकों की पिटाई न कर दें, ये कहकर कि आपको ये ही अखबार पढ़ना हैं, नहीं पढ़ोगे तो देख लो, जैसे हॉकरों की पिटाई कर दी है, उसी तरह तुम्हारी भी पिटाई कर देंगे, और इसकी व्यवस्था भी कर देंगे, हर गलियों और चौराहों पर असामाजिक तत्वों को खड़ा कर देंगे, कहेंगे कि देखों कौन – कौन घर हमारे अखबार की जगह दूसरे अखबार ले रहा हैं, और जहां देखे कि किसी ने दूसरी अखबार ली, तब ऐसे हालत में शुरु कर दी उसकी पिटाई, जैसा कि चुनावों में विपक्षी पार्टियां अपने प्रतिद्वंदियों को सबक सिखाने के लिए, उनके वोटरों की पिटाई करवा देती हैं। ऐसा में इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि आज ही के अखबार में संभवतः एक अखबार ने एक फोटो दी हैं, जिसमें पुलिस और हॉकरों की पिटाई करते अपराधियों की जुगलबंदी तक दिखा दी हैं। क्या पुलिस का काम एक अखबार के पक्ष में काम करना हैं या दोषियों को दंड देना या अपराधियों के चंगुल से निरीह जनता को बचाना। गर पुलिस ऐसा नहीं करती तो ऐसे पुलिस को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए, ऐसे भी यहां की जनता झारखंड पुलिस पर कितना विश्वास करती हैं, ये तो यहां की तीन करोड़ जनता बेहतर जानती हैं।
कमाल हैं, इन अखबार समूहों तथा अन्य देश के बड़े बड़े तथाकथित घरानों में काम करनेवाले बड़े बड़े ओहदों पर बैठे लोगों की गर बात करें तो इनके जूबां से देश, समाज, मानव निर्माण की ऐसी बड़ी बड़ी बातें टपकती हैं कि पूछिये मत, जैसे लगता हैं कि बस इनकी आने भर की देर हैं, पूरे प्रदेश का कायाकल्प हो जायेगा। अब झारखंड में भ्रष्टाचार नहीं रहेगा, सभी को भरपेट खाना मिलेगा, कोई समस्या ही नहीं रहेगी, पर सच्चाई इसके उलट ही होता हैं, ये लोग क्यों झारखंड प्रदेश में आ रहे हैं यहां के बुद्धिजीवी और यहां की निरीह जनता खूब समझती हैं, लेकिन क्या करें, वो अपना जूबां बंद रखना चाहती हैं क्योंकि अपराधियों और असामाजिक तत्वों की आड़ में पत्रकारिता का कारोबार चलानेवालों से सामाजिक मर्यादा और मानवीय मूल्यों की अपेक्षा रखना ही मूर्खता हैं।

Sunday, August 22, 2010

इस हमाम में सभी नंगे हैं, जनता भ्रमित न हो, सतर्क रहे...!

संस्कृत में एक श्लोक हैं ---------
शायद देश के नेता व पत्रकार इस श्लोक को नहीं पढ़े होंगे
अधमा: धनम् इच्छन्ति,
धनं मानम् च मध्यमाः।
उतमा: मानम् इच्छन्ति,
मानो हि महतां धनम्।।
अर्थ -- जो दुष्ट होता हैं वो सिर्फ धन की कामना करता हैं, जो मध्यम वर्गीय लोग हैं वे धन और मान दोनों की इच्छा रखते हैं, पर जो सर्वोत्तम व्यक्ति हैं वो धन की कामना नहीं, बल्कि सिर्फ सम्मान की इच्छा रखता हैं, क्योंकि उसके लिये सम्मान ही सर्वोत्तम धन हैं।
क्या कोई बता सकता हैं कि इस देश में जन्मे महात्मा गांधी का स्वनिर्मित घर कहां हैं, कुछ लोग उनके पैतृक निवास जो पोरबंदर में हैं, उसे बतायेंगे, पर सच्चाई ये हैं कि जो दूसरे का घर निर्माण करने में, देश का घर निर्माण करने में लगा हो, भला उसे अपने घर बनाने की फुर्सत कहां हैं। यहीं सवाल भाजपाईयों से क्या वे बता सकते हैं कि एकात्ममानववाद के प्रणेता दीन दयाल उपाध्याय के मरने के समय उनके पास कितना धन था और यहीं सवाल समाजवादी नेताओं से कि वे बताये कि राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के यहीं आदर्श थे क्या?
और यहीं सवाल आज के देश की राजधानी में बैठे व अन्य जगहों पर स्थापित पत्रकारों से क्या वे बता सकते हैं कि इसी देश में गणेश शंकर विद्यार्थी और पड़ारकर ने जन्म लिया, उन्होंने धन के लिए पत्रकारिता की या मान के लिए।
देश की जनता महंगाई से त्रस्त हैं, देश में कहीं अकाल हैं तो कहीं बादल फटने से ऐसी तबाही की पूछिये मत, पर संसद में बैठनेवाले ज्यादातर नेता, जो अपने को जनता का प्रतिनिधि कहते हैं, वे अपने वेतन को लेकर चिंतित हैं, हालांकि उन्हें वेतन की जरुरत ही नहीं क्योंकि उनको वेतन से ज्यादा इतनी भारी भड़कम राशि उनके पूंजीपति साथियों से चंदे और अन्य रुपों में इतनी आसानी से मिल जाती हैं, जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती, जिसकी जानकारी आम तौर पर जनता को हैं, पर ये अलग हैं कि इस बात को आजकल मीडिया ने जबर्दस्त रुप से उछाला हैं, ये वे मीडिया के लोग हैं, जिनकी भूख ये नेता शांत करते हैं, पेड न्यूज के रुप में, तथा मुंहमांगी मुराद पुरी करके। कैसे करते हैं इस बात की ज्यादा जानकारी लेनी हो तो हरिशंकर परसाई की भेड़ और भेड़िये पढ़िये। जिन लोगों को मीडिया की इस खबर से नेताओं को गाली देने का मन कर रहा होगा, वो जनता ये भी जान ले कि मीडिया में भी बहुत सारे ऐसे पत्रकार मिलेंगे, जो पहले से ही इन नेताओं के आगे जमीर बेच चुके हैं, और वे भी इसी प्रकार से बेतहाशा रकम कमाकर परम सुख का आनन्द ले रहे हैं, ये अलग बात हैं कि इनकी बात जनता के सामने नहीं आती और आयेगी भी कैसे, क्योंकि दिखलाना और बताना इन्हें ही हैं, ये वहीं दिखलायेंगे और बतायेंगे, जो इनके हित में हो। कैसे पत्रकार या मीडिया प्रबंधन के लोग नेताओं से उपकृत होकर राज्यसभा में पहुंच रहे हैं, परम सुख का आनन्द ले रहे हैं, जनता सब जानती हैं, इसलिए इस प्रकार की खबरों से वो उद्वेलित नहीं होती, जितना की 1977 और 1977 के पहले तक उद्वेलित होती थी, क्योंकि जनता जानती हैं कि इस हमाम में सभी नंगे हैं, बस आज मन आ गया वे नेताओं को अपमानित करनेवाले शब्द लेकर आ गये हैं, और जब नेताओं की बारी आयेगी तो वे पत्रकारों को भी जो करना होगा, साम दाम दंड भेद करके समझा देंगे, पत्रकार चूंकि बुद्धिजीवी होते हैं, जल्द ही समझ जायेंगे, गर नहीं समझेंगे तो प्रबंधन और उनके मालिक तो, उनके हाथ में हैं ही। अब जरा लालू प्रसाद को देख लीजिये, ये तो आज के नेता थोड़े ही हैं, ये अपने बयानों और अन्य कारनामों से काफी लोकप्रिय रहे हैं, ऐसे में नेताओं के वेतन की बात में कैसे चुप रहेंगे, इसलिए शुरु हो गये और चूंकि इसमें सभी सांसदों को फायदा हैं, इसलिए क्या वामपंथ और क्या दक्षिणपंथ और क्या कांग्रेसी सभी – मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा गीत सस्वर गाने में लगे हैं, इसलिए इस पर कुछ भी बोलना या लिखना, हमे लगता है कि बेकार हैं। नेताओं को वेतन की भूख जगी हैं। इस भूख में सभी सांसद और विधायक शामिल हैं, ये अलग बात हैं कि इस मुद्दे पर खुलकर वे लालू की भाषा नहीं बोल रहे पर चुपके – चुपके वे लालू के सुर में सुर अवश्य मिला रहे हैं, याद करिये जो काम इस साल बजट सत्र के दौरान झारखंड विधानसभा में राजद के देवघर विधायक सुरेश पासवान ने किया, वहीं काम इन्हीं की पार्टी के सुप्रीमो लालू यादव ने संसद में किया, इनका कहना हैं कि सांसदों का वेतन बहुत ही कम हैं, वे जनसेवक हैं, इसलिए फिलहाल जो वेतन उन्हें मिल रहा हैं, वो बहुत ही कम हैं, इसे 16 हजार से बढ़ाकर 80,001 रुपये कर देना चाहिए, इनका ये भी कहना हैं कि उन्हें सचिव स्तर के अधिकारी से भी बढ़ा हुआ वेतन चाहिए क्योंकि जो सांसद होता हैं वो प्रोटोकाल के अनुसार इससे भी बड़ा होता हैं। जबकि लोकतंत्र में जनता का मत ही देखा जाता हैं, सांसदों के वेतन बढ़ाने के मुद्दे पर गर आम जनता की राय ली जाये तो 90 प्रतिशत से भी ज्यादा जनता, सांसदों के वेतन बढ़ाये जाने के खिलाफ हैं, पर इन नेताओं को जनता की बात कानों तक नहीं पहुंच रही और वेतन बढ़ाने के मुद्दे पर फिलहाल वे सब एक हैं।
एक ईमानदार भारतीय नागरिक राजकीय अथवा केन्द्रीय सेवा में काम करते करते अपना जीवन बिता देता हैं पर उसकी आमदनी पांच सालों में तीन सौ प्रतिशत नहीं बढ़ती, पर हमारे देश के नेता मात्र पांच सालों में ही अपनी आमदनी तीन सौ प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा लेते हैं, वो भी महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, सरदार वल्लभ भाई पटेल, पं. दीन दयाल उपाध्याय, राम मनोहर लोहिया तथा जयप्रकाश नारायण के अनुयायी होने का दंभ भरनेवाले नेता। कांग्रेस जो बापू का नाम लेते नहीं अघाती, सबसे पहले उनके नेता के आदर्शों को देखे ---2004 में कांग्रेसी सांसदों की वस्तुस्थिति या आमदनी -----------------
राहुल गांधी --- 4,527,880 रुपये
कमल नाथ --- 51,839,379 रुपये
सचिन पायलट --- 2,51,19000 रुपये
मणि शंकर अय्यर --- 19,391,699 रुपये
और इन्हीं सांसदों की आमदनी अप्रत्याशित रुप से मात्र पांच सालों यानी 2009 में इतनी बढ़ गयी कि पूछिये मत --------------
राहुल गांधी --- 23,274,706 रुपये यानी 414 प्रतिशत
कमल नाथ --- 141,770,037 रुपये यानी 173 प्रतिशत
सचिन पायलट --- 46,489,558 रुपये यानी 1746 प्रतिशत
मणि शंकर अय्यर --- 72,014,689 रुपये यानी 271 प्रतिशत बढ़ गयी
अब जरा अपने को समाजवादी, एकात्ममानववादी तथा किसानों व मजदूरों के हितैषी कहनेवाले दीनदयाल उपाध्याय, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण के सिद्धांतों पर चलने का दंभ भरनेवाले नेताओं के आमदनी पर एक नजर डालिये ---------------------------
2004 में इनकी आमदनी
लाल कृष्ण आडवाणी --- 13,042,443 रुपये
लालू प्रसाद यादव --- 86,69,342 रुपये
अखिलेश यादव --- 23,142,705 रुपये
अजीत सिंह ---- 13,423,683 रुपये
राम विलास पासवान ---- 8,332,433 रुपये
और इन्हीं सांसदों की 2009 की स्थिति देखिये ------------
लाल कृष्ण आडवाणी --- 35,543,172 रुपये यानी 172 प्रतिशत
लालू प्रसाद यादव --- 3,17,0269 रुपये यानी 266 प्रतिशत
अखिलेश यादव --- 48,582,202 रुपये यानी 110 प्रतिशत
अजीत सिंह ---- 58,232,462 रुपये यानी 334 प्रतिशत
राम विलास पासवान ----11,838,791 रुपये यानी 42 प्रतिशत बढ़ गयी।
कमाल हैं अभी तक ये 16 हजार मासिक वेतन उठा रहे थे, ये जनप्रतिनिधि हैं, इनका कोई दूसरा काम भी नहीं हैं, तो ये नेता बताये कि इतने रुपये कहां से इनके पास आ गये, कैसे इनकी आमदनी तीन सौ प्रतिशत से ज्यादा केवल पांच वर्षों में बढ़ गयी, क्या इन्हें कुबेर का खजाना मिल गया, अथवा अलादीन का चिराग। गर अलादीन का चिराग अथवा कुबेर का खजाना इन्हें राजनीति के द्वारा मिल जाता हैं तो इसका फायदा आम जनता को क्यों नहीं मिल जाता। आम जनता भी तो अलादीन के चिराग या कुबेर के खजाने से कुछ प्राप्त करें। इस देश की विडम्बना हैं कि आजादी के तुरंत बाद महात्मा गांधी और पटेल जैसे नेता ज्यादा दिनों तक नहीं रहे, जो रहे भी उनकी इन नेताओं ने कुछ मानी नहीं, उनके आदर्शों पर चलने से इनकार कर दिया। ऐसे में हरिशंकर परसाई की कहानी भेड़ और भेड़िये के तर्ज पर चल रही इस व्यवस्था पर अब ज्यादा कुछ कहना नहीं हैं, क्योंकि जनता अंग्रेजों के समय भी मर रही थी, आज भी मर रही हैं, उसके पास कोई विकल्प ही नहीं हैं क्योंकि नेता तो पैदा हुए ही हैं, सुख भोगने के लिए और आम जनता पैदा ही ली हैं, रोटी की तलाश में दर दर भटकने के लिए।

Sunday, August 15, 2010

आप माने या न माने, पर ये सच हैं --------------------------



आप माने या न माने, पर ये सच हैं ----------
आजादी के पहले --------
. भारत परतंत्र था पर भारतीय मन से परतंत्र नहीं थे, उनकी सोच परतंत्र नहीं थी, अपनी आध्यात्मिक और राष्ट्रवाद की परिकल्पनाओं से यहां के लोग ओतप्रोत थे, अंग्रेजी सत्ता को इसका आभास था, तभी लार्ड मैकाले ने इस देश की सार्वभौमिकता और यहां के लोगों की मानसिकता को तोड़ने के लिए ऐसी शिक्षा पद्धति निकाली कि यहां के लोग अंदर से टूट जाये और अंग्रेजी मानसिकता को श्रेष्ठ समझ, अपनी संस्कृति से नफरत करने लगे, फिर भी अंग्रेज भारतीयों को मन से गुलाम बनाने में असफल रहे।
. पूरा देश चरित्रवान था, खासकर भारतीय राजनीतिज्ञों का जीवन आदर्शों से भरा रहता था, लोग उनकी बातों को ध्यान से सुनते और अपनाने की कोशिश करते।
. यहां की युवा पीढ़ी भी, देश को नयी दिशा दे रही थी, साथ ही अपने चरित्र पर ध्यान देती थी, अपने देश के पूर्वजों के सम्मान पर कोई आंच नहीं आये, इसका ध्यान रहता था, इनके लिए एक ही लक्ष्य था देश के लिए जीना और देश के लिए मरना।
. सभी का एक ही लक्ष्य था, कि भारत स्वतंत्र हो।
. भारत अखंड था, आज का पाकिस्तान, बांगलादेश, चीन द्वारा बलपूर्वक और धूर्ततापूर्ण तरीके से भारत की हड़पी गयी जमीन, सभी भारत के नक्शे में नजर आते थे, भारत का मानचित्र भव्य दीखा करता था।
. भारतीय गरीब थे, पर भारत के उपर कर्ज नहीं था।
. परतंत्र होने के बावजूद, देश की आध्यात्मिक शक्ति का लोहा विदेशी माना करते थे, जैसे स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो धर्म सम्मेलन में भारतीय धर्म का पताका फहराया, और बताया कि भारत क्या हैं।
. देश का ग्राम और कुटीर उद्योग बहुत ही मजबूत था, अंग्रेजों द्वारा इस उद्योग को सर्वनाश के कगार पर लाने के बावजूद स्वदेशी आंदोलन ने इनको नयी दिशा दी थी।
आजादी के बाद --------------------
. भारत स्वतंत्र हुआ, पर लार्ड मैकाले की जीत भी हुई, कांग्रेस ने सत्ता संभाला और मैकाले की शिक्षा पद्धति को जन जन तक पहुंचाने की कोशिश शुरु हुई, देश में जो काम अंग्रेज नहीं कर सके, वो काम यहां की कांग्रेसी सरकार ने शुरु किया, लोग भारत और भारतीय संस्कृति से दूर होते चले गये और भारतीय मन पूरी तरह से परतंत्र हो गया।
. परतंत्र भारत में जहां सभी चरित्रवान थे, आजादी के बाद चरित्रवानों का टोटा पड़ गया, आप किसी भी क्षेत्र में जाये चरित्रहीनों की संख्या सर्वाधिक हैं, ज्यादातर लोग भ्रष्टाचार में डूबे हैं, और अपने हिस्से का भारत लूट लेना चाहते हैं, जो नहीं लूट रहे, उन्हें मूर्ख समझा जाता हैं।
. आज की युवा पीढ़ी, अब देश और समाज तथा परिवार के लिए भी नहीं सोचती, उसे सिर्फ अपने लिए धन कमाना और ऐश करने से मतलब हैं, इनके लिए देश व समाज कोई मायने नहीं रखता, इनके लिए तो परिवार भी कोई मायने नहीं रखता, सेल्फमेड जिंदगी जीने में ये ज्यादा आनन्द अनुभव करते हैं।
. आज भारत को कहां ले जाना हैं, कोई लक्ष्य ही नहीं हैं, भारत को कैसा और क्या बनाना हैं, इस पर किसी का ध्यान नहीं, सभी नौकरी कर रहे हैं चाहे वो राजा हो या प्रजा। नौकरी करने के क्रम में, सभी अपने बेटे-बेटियों के लिए, मरते दम तक कुछ ऐसा कर देना चाहते हैं, ताकि सात पुश्त तक गर नौकरी न भी मिले तो ये आराम से जिंदगी गुजार सकें। उसका अनेक उदाहरण हैं, सुबह होते ही, भारत की अखबारें ऐसी खबरों से पटी होती हैं। आज के नेता तो अपनी पत्नी और बच्चों के सिवा दूसरा कुछ सोचते नहीं, आज किसी पार्टी में कल किसी और पार्टी में, सुबह का नाश्ता किसी और पार्टी में दोपहर का भोजन किसी और पार्टी में, ये इनका चरित्र हो गया हैं, ऐसे में समझा जा सकता हैं कि ये देश के प्रति कितने वफादार हैं, अब तो शायद ही कोई ऐसा नेता हैं जो किसी भ्रष्टाचार के दलदल में न फंसा हो, ज्यादातर इस भ्रष्टाचाररुपी गंगोत्री में डूबकी लगा चूके हैं और कुछ लगाने के चक्कर में हैं।
. आज भारत खंडित हैं, आजादी के समय ही भारत दो टुकड़ें में बंट गया था, बाद में चीन और पाकिस्तान ने भी भारत के हजारों वर्ग किलोमीटर भूभाग पर कब्जा कर बैठा. पर किसी की हिम्मत नहीं कि इन हजारों वर्ग किलोमीटर हड़पी गयी जमीन को पुनः भारत में मिला लें।
. बहुत सारे भारतीय अब अमीर बन गये हैं, पर भारत के उपर विदेशियों का इतना कर्ज हैं कि भारत सरकार को बजट का बहुतेरे हिस्सा तो ब्याज देने में खत्म हो जाता हैं।
. स्वतंत्र होने के बाद देश का मान हर क्षेत्र में घटा हैं, हम विश्व कप फुटबाल में भाग लेने के लायक नहीं हैं, हमारे खिलाड़ी किसी भी खेल में गर कुछ जीतते हैं तो ये सरकार की देन नहीं, बल्कि उनकी अपनी मेहनत का फल होता हैं, जिस बांगलादेश को हमने आजाद कराया, वो हमारे लिए काल बन गया हैं, उसके आतंकवादी पूरे देश में फैलकर भारत के अमन चैन के लिए खतरा बन गये हैं, पूर्वोत्तर भारत तो बांगलादेशियों से पट गया हैं, और ये अब उत्तर की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं, और हमारी सरकार वोट बैंक की खातिर, आंख मूंद कर बैठी हैं, एक तो अपनी जनसंख्या और उपर से बांगलादेश की जनसंख्या का दबाव पूरे देश के लिए सरदर्द बन गयी हैं, पर इस पर भी यहां के नेता राजनीति करने से बाज नहीं आते, जबकि दूसरे देश में, ऐसा हैं ही नहीं, गर वहां पता लग जाये कि विदेशियों की बड़ी फौज उनके देश में आ गयी हैं, तो उसके साथ उनके द्वारा ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाती हैं कि बाद में उस देश में आने पर, वहां की जनता दस बार सोचने पर मजबूर हो जाती हैं।
. देश का लघु और कुटीर उद्योग पूरी तरह से बर्बाद हो चुका हैं, इसके जगह पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना कब्जा जमा लिया हैं और देश की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से गिरवी हो गयी हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि देश आजादी के बाद बहुत तरक्की किया हैं, मैं बता दूं कि गर ये देश स्वतंत्र नहीं होता, अंग्रेजों के अधीन रहता तब भी तरक्की करता, क्योंकि तरक्की किसी समय का मोहताज नहीं होता। क्या अंग्रेजों के समय डाक व्यवस्था, रेल परिवहन, दूरभाष, आदि जमीन पर नहीं उतरे थे क्या, क्या ये विकास नहीं था, विकास का मतलब कम्प्यूटर क्रांति, सूचना क्रांति होती हैं क्या, विकास का मतलब होता हैं, आंतरिक सोच और सम्मान के साथ बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक भारतीयों को बेहतर जिंदगी प्रदान करना, पर ये क्या आजादी के बाद संभव हुआ हैं।
क्या ये सही नहीं कि देश पर कारपोरेट जगत ने कब्जा जमा लिया हैं, और हमारे नेता इन कारपोरेट जगत की कठपुतली बन कर भरतनाट्यम कर रहे हैं, जमकर लूट मचा रखी हैं, एक बार विधायक अथवा सांसद बने नहीं कि जिंदगी की सारी सुख अपने कदमों पर लाकर खड़ा कर देने की चाहत, इन्होंने बढ़ा रखी हैं। क्या ये सही नहीं हैं कि एक तरफ गरीब जनता चालीस रुपये किलो चावल खरीदने पर मजबूर हैं, पर हमारे नेता संसद भवन और विधानसभा की कैंटिनों में भारतीयो के खून पसीने की कमाई को मुफ्त में उड़ाते चले जा रहे हैं। जरा खुद देखिये आजादी के पहले के नेताओं की जिंदगी और आजादी के बाद के नेताओं की जिंदगी पता लग जायेगा कि इनकी सोच क्या हैं और ये देश को किस दिशा में ले जा रहे हैं।
आज चीन पूरे देश के लिए खतरा बनता जा रहा हैं, वो पूरे भूभाग को घेर रखा हैं, पर हमारे नेता को इसकी कोई चिंता नहीं।
इन सारी सच्चाईयों के बावजूद भी, भारी गड़बड़ियों के बावजूद भी गर्व कीजिये, क्योंकि आज भारतीय स्वतंत्रता दिवस का 64 वां दिवस हैं। इन बातों पर, पर याद रखिये, इसमें हमारे नेताओं का हाथ नहीं, बल्कि उन भारतीयों को हाथ हैं, जो तन मन धन से अभी भी देश को एक नयी पहचान दिलाना चाहते हैं ------------------------
आजादी के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारतीय चरित्र को सम्मान दिया, महात्मा गांधी के जन्म दिन को अतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित किया।
आजादी के बाद भारत ने चार युद्ध झेले और इन चारों युद्धों में भारतीय सेना ने भारत की लाज रखी, देश के सम्मान पर आंच आने नहीं दिया।
भारतीय किसानों ने कृषि में भारत को आत्मनिर्भर बनाया।
भारतीयों वैज्ञानिकों की नयी पीढ़ी ने संचार क्रांति और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारत को नयी पहचान दिलायी।
विश्व का सर्वश्रेष्ठ और महान लोकतंत्र जहां एक वोट से सरकार गिर जाती हैं, फिर जनता ही चूनती हैं, लेकिन पड़ोसी देश पाकिस्तान में जनता सरकार बनाती हैं, पर जनता सरकार गिराती नहीं, वहां इसका जिम्मा सेना संभालती हैं।
पूरे विश्व में भारतीय प्रतिभाओं की धाक, अमरीका, इँगलैंड और कई देशों में भारतीयों ने भारत का मान बढ़ाया।
देश के संतों ने विदेशों में जाकर भारतीय धर्म और संस्कृति का ऐसा पताका फहराया कि आज विदेशियों में भारतीय धर्म के प्रति आदर और सम्मान बढ़ता जा रहा हैं, हरे राम हरे कृष्ण आंदोलन के प्रणेता अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ के संस्थापक भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी, भारतीय योग को विदेशों में फैलानेवाले स्वामी योगानंद जी जैसे संत इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

स्वतंत्रता के मायने...


भारतीय स्वतंत्रता दिवस की धूम हैं, पर स्वतंत्रता के क्या मायने हैं, शायद हम आज तक सीख नहीं पाये हैं और न ही सीखने की कोशिश की। हमारी केन्द्र और राज्य की सरकार का भी ध्यान इस ओर नहीं गया। जो काम अंग्रेज अपनी शासन के दौरान नहीं कर सकें, आजादी के बाद उन अंग्रेजों के सपनों को हमने अपने हाथों से पूरा करने का, ऐसा लगता हैं कि हमने मन बना लिया हैं। हमें आज की परिस्थितियों को देख लगता हैं कि गर अंग्रेज नहीं होते, तो हम शायद सभ्य भी नहीं बन पाते, क्योंकि आज भारतीयों में होड़ लगी हैं कि कौन सर्वाधिक भोगवादी प्रवृत्तियों को अपनाने में सबसे आगे हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन के समय हमारे नेता व जनता दोनों इस बातों को लेकर सजग थे कि वे किसी भी हालात में विदेशी वस्तुओं को स्वीकार नहीं करेंगे, पर आज क्या हैं, खुद सरकार ही भारत को विदेशी वस्तुओं का बाजार बना दी हैं और जनता इसमें डूबकी लगाते जा रही हैं, आज हमारा पड़ोसी चीन, पूरे भारत में अपनी वस्तुओं को ठेल रखा हैं, इन घटिया चीनी वस्तुओं को भारतीय खरीद कर स्वयं को धन्य धन्य कर रहे हैं, और भारतीय लघु उद्योग दम तोड़ता चला जा रहा हैं। शायद आज की पीढ़ी को पता नहीं या बताने की कोशिश नहीं की गयी कि आखिर पूर्व में अंग्रेजों ने भारत को अपना उपनिवेश क्यों बनाया।
इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति होने के बाद अंग्रेजों को एक बाजार की जरुरत थी, जहां वे अपने सामानों को आराम से बेच सकें, और इसके लिए जरुरत थी, दूसरे देशों को अपने हाथों में लेने की, हमारी अंदरुनी कमजोरी, अलगाववाद की प्रवृत्ति का उन्होंने फायदा उठाया और एक एक कर रियासतों को उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया, पर जैसे ही हमारे नेताओं को इसका आभास हुआ, उन्होंने जनता तक अपनी बात पहुंचायी और देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन उसके बाद की स्थिति क्या हैं। जिस गांधी ने ग्राम स्वराज्य की बात कहीं थी, लघु कुटीर उद्योग के माध्यम से देश को नयी दिशा देने की बात कहीं थी, एक बहुत बड़ी जनसंख्या को इसके द्वारा ही रोजगार देकर आत्मनिर्भर बनाया जा सकता था। आजादी के बाद महात्मा गांधी के इन सपनों को खुद कांग्रेस ने ही हत्या कर दी और भारत को पश्चिमी ढर्रें पर ले चलने की ठान ली। उसके क्या परिणाम हुए, जरा खुद देखिये भारत की क्या स्थिति हैं, दस प्रतिशत लोग अमीर बन गये और 90 प्रतिशत लोग इन दस प्रतिशत लोगों के आगे हाथ फैलाकर भीख मांगने को विवश हैं।
देश की संसद पर करोड़पतियों और कारपोरेट जगत् के लोगों ने कब्जा जमा लिया हैं, जो विदेशियों के आगे कठपुतली बने हुए हैं। चीन हमारे हजारों वर्ग मील भू –भाग को कब्जा जमा कर बैठा हैं, बांगलादेश जिसे हमने ही पैदा किया, उसके आतंकी हमारे देश के सभी भागों में तरह तरह के हथकंडे अपनाकर हमे तबाह कर रहे हैं, बर्मा, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका जैसे देश हमारी बात मानने को तैयार नहीं है, बल्कि चीन से इनकी दोस्ती कुछ ज्यादा ही कारगर हो रही हैं, पाकिस्तान की तो बात ही छोड़ दीजिये, इनकी तो पैदाइश ही भारत की छाती पर मूंग दलने के लिए हुई हैं, इसलिए इनसे दोस्ती की बात ही बेमानी हैं, या सुधरेंगे, कहना मुश्किल हैं।
पूरा देश भ्रष्टाचारियों के कब्जे में हैं, खेत-खलिहानों, कल – कारखानों में काम करनेवाले खेतिहर मजदूरों की फटेहाल जिंदगी पर किसी का ध्यान नहीं हैं, पर अपना पेट भरने के लिए सांसदों और विधायकों की टोली पांच गुणा से भी अधिक वेतन बढ़ाने को तैयार हैं। देश की जनता पर इसका अतिरिक्त बोझ बढ़ता हैं तो इनकी बला से। लोकतंत्र के चौथा स्तंभ कहेजाने वाले मीडिया का भी बूरा हाल हैं, वे राजनीतिज्ञों के चंवर डूलाने और उनकी चाटुकारिता में लगे हैं. ऐसे में देश का क्या हाल होगा, समझा जा सकता हैं।
देश की स्थिति ये हैं कि चुनाव के वक्त अपनी आर्थिक स्थिति को दर्शानेवाले व्यक्ति ये कहता हैं कि उसके पास मात्र 15 लाख की चल अचल संपत्ति हैं, विधायक बनते ही, बंदर की तरह उछलकूद मचाते हुए, जब मंत्री बन जाता हैं तो इसी दौरान अपनी बेटी की शादी में केवल सजावट में चार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर बैठता हैं, आखिर ये सब कैसे हो जाता हैं। कोई व्यक्ति विधायक और सांसद बनते ही, इतना धनाढ्य कैसे हो जाता हैं क्या उसे कूबेर के घर नौकरी लग जाती हैं अथवा उसे अलादीन का चिराग मिल जाता हैं। सच्चाई ये हैं कि जब कोई व्यक्ति अपना चरित्र ही बेच दें तो उसे क्या कहेंगे। इन्हें गांधी और शास्त्री बनना नहीं हैं, इन्हें तो पेटू बनना हैं, इसलिए पेटू बनते जा रहे हैं और अपने पेट में देश की करोड़ों जनता का धन जमा करते जा रहे हैं पर शायद इन्हें नहीं पता कि कबीर ने इन्हीं जैसे लोगों के बारे में लिखा हैं कि -------
निर्बल को न सताईये, जाकी मोटी हाय
मरे मृग के छाल से लौह भस्म हो जाय।।
पर मैं सोचता हूं कि शायद अब कबीर की ये पंक्ति भी फेल हो जा रही हैं क्योंकि आजादी के पूर्व में किसी अंग्रेज को न्यायालय के द्वारा सजा मिली हो, हमने नहीं देखा और न सुना। जिस अंग्रेज जनरल डायर ने सन् 1919 में जालियावाला बाग हत्याकांड कराया, वो अंग्रेज को भी सजा नहीं मिली, ये अलग बात हैं कि उसे उसकी सजा देश के एक युवा उधम सिंह ने इंग्लैंड जाकर, दी। पर क्या कोई बता सकता है कि आजादी के बाद किस न्यायालय ने यहां के किसी भी राजनीतिज्ञ को सजा दी, हो और वो सजा मुकर्रर हो जाने के बाद किसी राजनीतिज्ञ ने अपनी पूरा सजा जेल में काटी हो। अरे जनाब, यहां तो न्यायालय भी उसे सजा देती हैं जिनकी कहीं कोई औकात नहीं हैं। ऐसे भी गोस्वामी तुलसीदास ने भी श्रीरामचरितमानस में एक तरह से कह ही दिया हैं कि ---
समरथ के नहि दोषु गोसाई
सामर्थ्यवानों के दोष नहीं देखे जाते, शायद इसी ढरें पर अपना देश चल रहा हैं, और अपने ऋषियों और मणीषियों को मानमर्दन कर गौरवान्वित हो रहा हैं। हम अब ज्यादा कुछ नहीं कहेंगें। हाल ही में चीन ने अपने यहां ओलपिंक कराया और दक्षिण अफ्रीका ने अपने यहां फुटबाल मैच कराये, दोनों ने अपने देश का मान बढ़ाया, अपने यहां राष्ट्रमंडल खेल होनेवाले हैं, और अपने देश का सम्मान किस प्रकार यहां के राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकार, दूसरे देशों के सामने उछाल रहे हैं, इस खेल में किस प्रकार भ्रष्टाचार का बोलबाला हैं, कैसे भारत की नाक कट रही हैं, शायद हम भारतीयों को नहीं हैं, शायद हमने स्वीकार कर लिया हैं कि हमारी नियति ही यहीं हैं, कि हम नहीं सुधरेंगे। पूर्व में जो हजारों वर्षों तक गुलाम रहने की प्रवृत्ति हमारी हैं, उससे कभी छुटकारा नहीं पायेंगे, क्योंकि हमारी जिंदगी क्या हैं, जब तक रहो मस्ती में रहो, खाओ-पीओ मौज करों, मरने के बाद कोई देखने थोड़े ही आ रहा हैं, मूर्ख हैं वे जो देश और समाज के लिए सोचते हैं, हमारी तो पैदाईश सिर्फ राजभोगने के लिए हुई हैं, चाहे गुलामी का मार्ग ही क्यों न हो।

Monday, August 9, 2010

लो आया मौसम दल बदलने का......................... !


बिहार विधान सभा के चुनाव की विधिवत् घोषणा अब तक नहीं हुई, लेकिन विभिन्न पार्टियों के नेता अब दल बदलने को लेकर उत्सुक हैं, कोई दल बदल चुका हैं, कोई दल बदलने की तैयारी में हैं और इस दल बदल के चक्कर में इन दलबदलू नेताओं ने सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया हैं, बड़बोलेपन के चक्कर और जातीय दंभ में स्वयं की जाति को इन्होंने उस पादान पर लाकर खड़ा कर दिया हैं कि जैसे इनकी ही जातियों के लिए सिर्फ और सिर्फ बिहार बना हैं, बाकी जातियां इनके चरणवंदन और चरणधूलि पाने के लिए हैं। ये स्थिति एक पार्टी की नहीं, बल्कि कमोबेश सभी पार्टियों की हैं। तीन चार साल पहले की बात हैं। जब मैं धनबाद में था, तो एक बिहार के ही बड़बोले नेता आनन्द मोहन ने एक संवाददाता के प्रश्न के जवाब में कहा था कि जब पत्रकार अपने बेहतर कैरियर के लिए, संस्थान बदल देते हैं तो उनके जैसा नेता, बेहतर कैरियर के लिए पार्टी अथवा दल क्यों नहीं बदले। ऐसे हैं हमारे बिहार के नेता। ऐसी हैं इनकी सोच। इसलिए प्रभुनाथ सिंह जैसे नेता, नीतीश का दामन छोड़, लालू का दामन पकड़ लें और कहें कि हे लालू जी आप ही मेरे कैरियर निर्माता हो, मेरी कैरियर पर ध्यान दो। लालू भी – प्रभुनाथ को कहें, कि एवमस्तु तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी, तो क्या गलत हैं।
पर प्रभुनाथ सिंह का ये कहना कि उनके आने से बिहार में एक नया समीकरण बनेगा, पीएमआरवाई का, तो ये उन्हें कहने की इजाजत किसने दे दी। पीएमआरवाई का मतलब – कोई बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री रोजगार योजना नहीं समझ लें। प्रभुनाथ सिंह के शब्दों में पी का मतलब पिछड़ा, एम का मतलब मुस्लिम, आर का मतलब उनकी जाति राजपूत, जिससे वे आते हैं और वाई का मतलब यादव। क्या इन्हीं पीएमआरवाई से वे बिहार विधान सभा में स्थिति मजबूत कर लेंगे। क्या जिन अक्षरों का इन्होंने उपयोग किया हैं, वो पिछले लोकसभा और पांच साल पहले के विधानसभा चुनाव में किसी दूसरे जगह छिटक गये थे क्या।
क्या इन जातियों का प्रभुनाथ सिंह जैसे लोगों ने ठेका ले रखा हैं और मान लिया कि इन जातियों और समुदाय का ठेका ले रखा हैं तो भी बाकी जातियां और समुदाय, इनके आगे पानी भरेंगे क्या। लालू और पासवान जैसे नेताओं से बिहार में एकता की बातें करना ही बेमानी हैं, लोग ठीक ही कहते हैं कि इस देश व राज्य को गर किसी ने बर्बाद किया हैं तो वे राजनीतिज्ञ हैं जो विशुद्ध रुप से राजनीतिबाज बनकर पूरे देश व राज्य में रहनेवाले, विभिन्न समुदायों को इतने टुकड़ों में बांट देना चाहते हैं कि देश व राज्य बर्बाद हो जाये और इनकी राजनीतिक कैरियर हमेशा हिट रहे, ताकि ये आराम से अपना और अपने आनेवाले पीढ़ियों का उद्धार कर सकें, लेकिन ये नहीं जानते कि अंधकार का साम्राज्य ज्यादा दिनों तक नहीं होता। मैं लालू प्रसाद से पूछना चाहता हूं कि जिस जय प्रकाश आंदोलन के वे प्रोडक्ट हैं, वे जयप्रकाश संपूर्ण क्रांति की बात किया करते थे, क्या प्रभुनाथ सिंह जैसे नेताओं के बयान से और उनकी पार्टी में ऐसे नेताओं के आने से संपूर्ण क्रांति हो जायेगी क्या। ऐसे भी लालू प्रसाद का पूरा कैरियर देखा जाये तो ये भी माई समीकरण की बात कुछ ज्यादा ही करते थे, ऐसे में गर प्रभुनाथ ने उसमें पीआर मिला दिया तो क्या हुआ, लालू प्रसाद को तो इससे और मजबूती ही मिलेगी, वे समझ रहे होंगे कि अब बिहार विधानसभा में उनकी वापसी तय हैं, लेकिन वे भूल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में भी कमोबेश जाति की राजनीति करनेवाले बिहार के सारे के सारे नेता उनकी तरफ हो गये थे पर परिणाम कुछ दुसरा ही आया।
रही बात नीतीश की, तो ये भी कोई दुध के धूले नहीं हैं। थोड़ा बहुत अंहकार इनमें भी आ गया हैं, ये समझ रहे है कि बस अगली पारी भी इन्हीं की होगी, और इसी चक्कर में वे बहुत सारे ऐसे भी गलत निर्णय कर रहे हैं, जिनका खामियाजा वे भुगतेंगे ही। इनके पार्टी में भी बहुत सारे दुसरे दलों के नेता आने के चक्कर में हैं और कुछ इनकी पार्टी से जाने के चक्कर में हैं, क्योंकि जब जब चुनाव आते हैं तो बिहार क्या पूरे देश में ऐसे दृश्य दिखाई पड़ जाते हैं, पर इसके कारण बिहार की मर्यादाएं और सामाजिक माहौल न बिगड़ जाये, इसका ध्यान यहां के राजनीतिज्ञों को रखनी चाहिए, क्योंकि जो काम राजठाकरे महाराष्ट्र में कर रहे हैं, वो ही काम ये कमोबेश बिहार में कर रहे हैं, चाहे वो लालू हो या प्रभुनाथ या कोई अन्य। अंतर ये हैं कि राज ठाकरे अपनी राजनीति चमकाने के लिए, मराठी और गैर मराठी विवाद उछाल रहे हैं और बिहार के नेता पीएमआरवाई बनाम गैर पीएमआरवाई का मुद्दा उठा रहे हैं। दोनों में कोई अंतर नहीं हैं, बस समझ की फेर हैं, सभी देश को बर्बाद करने में तुले हैं. जरुरत हैं बिहार में रह रहे उन युवाओं को, आगे बढ़ने की जो बिहार को एक नयी दिशा देना चाहते हैं, वे आगे बढ़े और इस चुनाव में जन जन तक जाकर बतायें कि वे वोट किसी को भी दें, पर दे जरुर, पर ध्यान रहे कि बिहार की मर्यादा और सामाजिक माहौल न बिगड़ने पाये, क्योंकि बिहार के नेताओं ने अपनी घटिया स्तर की राजनीति शुरु कर दी हैं, मैं देख रहा हूं वे सब कुछ करने पर आमदा हैं – हो सकता हैं कि वे अपराधियों तक का शरण लें और कहें कि ये ही बिहार को नयी दिशा देंगे, इसलिए पीएमआरवाई के तहत इन्हें ही वोट दें। इसलिए बिहार के युवाओं का जगना बहुत जरुरी हैं।