Tuesday, June 19, 2012

जय जगन्नाथ.........

भारत धर्मभूमि, कर्मभूमि व त्यागभूमि हैं। इस देश के सभी प्रांतों के एक प्रधान देवता हैं। जो इन प्रांतों में प्राचीन काल से पूजित व वंदित रहे हैं। यहीं उन क्षेत्रों के भरण पोषण से लेकर आध्यात्मिक सुख भी प्रदान करते हैं। जैसे -- झारखंड में बाबा वैद्यनाथ, बंगाल में माता काली की प्रधानता हैं, ठीक उसी प्रकार उत्कल प्रदेश यानी उड़ीसा प्रांत के प्रधान देवता भगवान जगन्नाथ हैं। शंख व श्रीक्षेत्र से जाना जानेवाला ये पुरी क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा व बड़े भाई बलभद्र के साथ विराजते हैं और जैसे ही आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि आती हैं वे विशेष रथों में आरुढ़ होकर आम जन को अभिलषित व मुक्ति प्रदान करने हेतु अपने गर्भ गृह से निकल पड़ते हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में आज भी लोग ये कहते नहीं भूलते ----------------उड़ीसा जगन्नाथपुरी में भले विराजो जी, भले विराजो जी साधो भले विराजो जी, उड़ीसा जगन्नाथ पुरी में भले विरोजो जी...........। इनकी महिमा जिसने भी गायी, वो धन्य हो गया। जो भगवान जगन्नाथ को मानते हैं, उनका मानना हैं कि भगवान जगन्नाथ राधा और कृष्ण की युगलमूर्ति हैं और इन्हीं से सारे जगत् की उत्पत्ति हुई। भगवान जगन्नाथ क्या नहीं हैं। वे तो सामान्य जन के देवता हैं। वे तो सामान्य जन के कल्याण के लिए गर्भगृह से बाहर निकलकर, सामान्य जन के दुख दर्द में शामिल होते हैं, यहीं नहीं स्वयं दर्शन देकर सरल सहज और सहृदय होने का सभी में भाव भी भरते हैं। शायद यहीं कारण हैं कि स्कंदपुराण तो साफ कहता हैं कि जो भी प्राणी भगवान जगन्नाथ के प्रति समर्पित हैं, या जो उनके नाम का सदैव संकीर्तन करते हैं या उनके रथों को खीचते हैं या जिस ओर उनकी रथयात्रा चल रही हैं, उसमें भाग लेते हैं या उनके दर्शन करते हैं, भगवान जगन्नाथ उनकी सारी कष्ट हर लेते हैं और उसे अंत में मोक्ष भी प्रदान कर देते हैं। भगवान जगन्नाथ की पुरी में निकलनेवाली रथयात्रा में तीन रथ प्रमुख होते हैं -- पहला रथ को तालध्वज रथ कहते हैं जिसमें बलभद्र, दूसरे रथ को पद्मध्वज कहते हैं, जिन पर बहन सुभद्रा और उसके पाद गरुड़ ध्वज होता हैं, जिस पर भगवान जगन्नाथ विराजते हैं। हालांकि कई प्रांतों में एक ही रथ पर सभी विराजते हैं और रथयात्रा का आनन्द लेते हुए लोग, भगवान के श्रीचरणों में स्वयं को समर्पित कर देते हैं। मूलतः रथयात्रा में भाव की ही प्रधानता हैं...........। ठीक उसी प्रकार जैसे कि गोस्वामी तुलसीदास, श्रीरामचरितमानस में कहते हैं कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभू मूरति दीखै तिन तैसी। रथयात्रा की एक अद्भुत कथा हैं..........कहते हैं कि एक बार भगवान कृष्ण रुक्मिणी के साथ शयनगृह में शयन कर रहे थे तभी उनके मुख से राधे राधे के स्वर निकल पड़े। ये बात रुक्मिणी ने अन्य पटरानियों को सुनाया। रुक्मिणी ने यहां तक कह डाला कि प्रभु आज भी राधे को नहीं भूले हैं, वह भी तब, जबकि रुक्मिणी समेत कई पटरानियों ने प्रभु की खूब सेवा की। ये बात कि प्रभु के मुख से राधे - राधे क्यूं निकले। माता रोहिणी के पास सभी इस रहस्य को जानने पहुंची। इधर रोहिणी ने कथा सुनाना प्रारंभ किया पर कथा प्रारंभ करने के पहले सुभद्रा को पहरे पर लगा दिया गया कि सुभद्रा किसी को कथा पूर्ण होने के पूर्व आने न दे। इधर जब कथा प्रारंभ हुई तभी बलभद्र और कृष्ण उस स्थान पर आ गये। इधर माता रोहिणी रुक्मिणी समेत अन्य पटरानियों को भगवान कृष्ण के अद्भुत प्रेमलीलाओं और रहस्यों को सुनाना प्रारंभ किया। रोहिणी के उक्त कथासार को सुनते हुए भगवान कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा इस प्रकार से भावविह्वल हो गये कि उनका शरीर दिखाई ही नहीं पड़ रहा था, यहां तक कि सुदर्शन चक्र की भी हालत वैसी ही हो गयी, पर जैसे ही उक्त समय नारद वहां पहुंचे, सभी पूर्वावस्था में आ गये। भगवान के इस अद्भुत रुप को केवल नारद ने देखा और उन्होंने इस सुंदर स्वरुप और छवि को अपने आंखों में बसा लिया। साथ ही ये सुंदर स्वरुप सभी के लिए सुलभ हो, उन्होंने भगवान से प्रार्थना की. भगवान ने नारद की ये बातें भी मान ली। तभी से भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बलभद्र पुरी में विराजकर सब को धन्य - धन्य कर रहे हैं और ये कथा युगों - युगों से चली आ रही हैं। यहीं कारण हैं कि इस रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ सुभद्रा होती हैं, जो नगर परिभ्रमण करने के लिए निकलती हैं। रथयात्रा भारतीय संस्कृति की प्राण हैं। पूरे भारतवर्ष में आषाढ़ शुक्लपक्ष द्वितीया तिथि को रथयात्रा का आयोजन होता हैं, अब तो विदेशों में भी रथयात्रा खूब धूमधाम से मनायी जाने लगी हैं। खासकर अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ से जूड़े लोग इस रथयात्रा को भव्यता से मनाते हैं, इनकी रथयात्रा का विशेष आकर्षण भी होता हैं।
झारखंड की राजधानी रांची समेत सरायकेला - खरसावां में भी रथयात्रा धूमधाम से मनाया जाता हैं। खासकर रांची स्थित जगन्नाथपुर मंदिर की रथयात्रा का कुछ खास विशेष महत्व हैं। पिछले सवा तीन सौ सालों से विराज रहे भगवान जगन्नाथ और उनकी रथयात्रा के समय यहां का दृश्य देखनेलायक होता हैं। जब लाखों लोग इस मंदिर के चारों ओर इकट्ठे होकर जय जगन्नाथ बोल उठते हैं, और भावपूर्ण हृदय से भगवान जगन्नाथ की रथ को खीचकर मौसीबाड़ी लाते हैं। करीब दस दिनों तक यहां इस दौरान मेला भी चलता रहता हैं, जिसमें दैनिक जीवनोपयोगी सामग्रियां मिलती रहती हैं। सचमुच भगवान जगन्नाथ का जो भी हुआ, भगवान जगन्नाथ उसके हो गये। रांची के जगन्नाथपुर मंदिर के बारे में कहा जाता हैं कि आज से करीब सवा तीन सौ साल पहले यहां एक ठाकुर एनीनाथ शाहदेव राजा हुए, जिनके स्वपन में बार बार भगवान जगन्नाथ की छवि दिखाई दी। उन्होंने इस स्वपन को बार - बार देखे जाने पर यहां भगवान जगन्नाथ को स्थापित करने का निश्चय किया। फिर उन्होंने पुरी से भगवान जगन्नाथ के विग्रहों को लाकर यहां विधि विधान से स्थापित कराया और आज रांचीवासियों को खुशी हैं कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए उन्हें अब ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ता, भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र यहां भी सुलभ हो गये और रथयात्रा की विधा यहां भी चल पड़ी। जय जगन्नाथ...........................

नक्षत्रों की दृष्टिकोण में मानसून

पूरे देश में मानसून की चर्चा हैं, वैज्ञानिकों ने पूर्व में घोषणा की थी कि मानसून समय पर आयेगा, पर सच्चाई ये हैं कि मौनसून केरल में सामान्य तौर पर समय से आया जरुर पर दगा भी दे गया। आज चारों ओर हाहाकार मचा हैं। खासकर रांची के आकाश में बादलों का झूंड आते जरुर हैं पर बरसते नहीं, आखिर क्यों। इधर भारतीय पंचागों और विद्वानों की मानें तो उनका कहना हैं कि इस बार मानसून उतना अच्छा नहीं रहेगा, जितना कि पिछले साल था। पिछले साल ज्यादातर वर्षा के नक्षत्र सुवृष्टि योग लेकर आये थे। इसलिए पिछले साल ये भी देखने को मिला कि इन नक्षत्रों में जमकर बारिश हुई और फसल भी अच्छी हुई, पर इस साल बात ही कुछ और हैं। भारतीय विद्वानों का समूह जो नक्षत्रों की भाषा समझता और जानता है, उसका मानना हैं कि इस बार नक्षत्र चमत्कार नहीं दिखायेंगे, क्योंकि इस बार सृवृष्टि का योग हैं ही नहीं। ज्यादातर नक्षत्रों में स्वल्पवृष्टि, खंडवृष्टि या सामान्यवृष्टि का योग हैं। ऐसे में इस बार वर्षा पिछले वर्ष की तुलना में सामान्य होगी न कि शानदार...................................

क. आद्रा -- 22 जून को प्रातः 5.29 से प्रारंभ -------- स्वल्पवृष्टि योग
ख. पुनर्वसु -- 6 जुलाई को दिन 07.04 से प्रारंभ -- खंडवृष्टि योग
ग. पुष्य --- 20 जुलाई को दिन 8.30 से प्रारंभ ----- अल्पवृष्टि योग
घ. आश्लेषा – 3 अगस्त को दिन 8.52 से प्रारंभ --- खंडवृष्टि योग
ङ. मघा – 17 अगस्त को दिन 7.39 से प्रारंभ ---- स्वल्पवृष्टि योग
च. पूर्वाफाल्गुन --- 30 अगस्त की रात 4.20 से प्रारंभ – सामान्यवृष्टि योग
छ. उत्तराफाल्गुन – 13 सितम्बर को रात 10.30 से प्रारंभ – खंडवृष्टि योग
ज. ह्स्त – 27 सितम्बर को दिन 1.53 से प्रारंभ – सामान्यवृष्टि योग
झ. चित्रा --- 10 अक्टूबर को रात्रि 2.23 से प्रारंभ – सामान्यवृष्टि योग

यानी हस्त जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में हथिया नक्षत्र कहते हैं, इसबार इस नक्षत्र में भारी बारिश या सामान्य बारिश की अपेक्षा कम बारिश होने की संभावना हैं, जबकि लोग बताते है कि हथिया की बारिश में तबाही हो जाया करती थी। इसी प्रकार उत्तरा नक्षत्र को कनवा नक्षत्र कहकर भी लोग संबोधित करते है। हमारे जनकवियों ने भी बारिश के बारे में खुलकर विचार दिया हैं और उनके विचार आज भी प्रासंगिक है.........................घाघा कवि को ले लीजिए, उन्होंने कहा हैं कि
रेवती रवे मृगशिरा तपे कछु दिन आदरा जाये
कहे घाघा जिन से श्वान भात न खाये
यानी जिस कालखंड में रेवती रव गया और मृगशिरा नक्षत्र तप गया समझ लीजिये आदरा ऐसा झमझमाएगा और फसल इतनी अच्छी होगी कि कौआ भी अघा जायेगा। ये है हमारी संस्कृति और मानसून की सांकेतिक दृष्टिकोण और हमारे पूर्वजों की भाषा. पर इस बार न तो आद्रा झमझमाने का
संकेत दे रहा हैं और न अन्य नक्षत्र ही कोई ऐसा संकेत दे रहे हैं, जो ये बता सकें कि इस बार नक्षत्र
पिछले साल की तरह शानदार बारिश कराकर भारतीयों को वारा न्यारा करेंगे।

दो सूटकेस बनाम 20 ट्रक...............

ज से ठीक पांच साल पहले, जब राष्ट्रपति के पद पर आसीन ए पी जे अब्दुल कलाम, राष्ट्रपति पद से विदा हो रहे थे, तब रांची से प्रकाशित प्रभात खबर में एक खबर छपी कि कलाम दो सूटकेस लेकर विदा होंगे, राष्ट्रपति भवन से। मैंने इस खबर को अपने दोनों बच्चों सुधांशु और हिमांशु को पढ़ाया। इस खबर से बच्चे इतने प्रभावित हुए कि, इन बच्चों ने उस खबर को प्रभात खबर से काटकर, नित्यदिन पठनीय दुर्गासप्तशती में संभालकर रख दिया। जब भी मैं या मेरे बच्चे दुर्गा सप्तशती पढ़ते अनायास अखबार का वो टुकड़ा मेरे और मेरे बच्चों के सामने से गुजर जाता.....। प्रेरणा देता कि जीने का मकसद क्या होना चाहिए.........। आज एक बार फिर वो पन्ना मेरे हाथों में हैं और बच्चों के साथ साथ, कलाम की वो सादगी हमें याद दिला गया कि जीने के मकसद क्या हैं......। एक कलाम हैं जो अपने साथ दो सूटकेस में ही जिंदगी को बांध कर एक बहुत सुंदर संदेश आम जनमानस को दे जाते हैं और एक राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी को देखिये..............।

खबर आयी हैं कि प्रतिभा पाटिल जी का सामान 20 ट्रकों में लादकर, महाराष्ट्र के तीन जगहों पर भेजा जायेगा और इस काम में राष्ट्रपति भवन के एक शीर्ष अधिकारी को लगाया गया हैं, जिसमें कुल 30 दिन लगेंगे। यहीं नहीं खबर ये भी हैं कि प्रतिभा पाटिल को पुणे के खड़की में सेना की जमीन पर बन रहे एक बंगले में रहना था, ये बंगला 2,61.00 वर्ग फुट जमीन पर बन रहा था, पर विवाद उठ जाने के कारण, अब वो वहां नहीं रहेंगी। नियमों के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति को 4500 वर्ग फुट का सरकारी बंगला या 2000 वर्ग फुट का सरकार द्वारा किराये पर लिया गया बंगला ही आवंटित किया जा सकता हैं।
कमाल देखिये -- कहां पूर्व राष्ट्रपति कलाम की सोच और कहां प्रतिभा पाटिल।
राष्ट्रपति पद पर रहते हुए एपीजे अब्दुल कलाम ने देशवासियों को संबोधन में तोहफे न लेने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि यह सांप को छूने और बदले में जहर हासिल करने के समान हैं। उन्होंने कहा था कि उपहार खतरनाक होते हैं और उनके पीछे कोई न कोई निहितार्थ होता हैं, पर मैं पूछता हूं कि आज के युग में ऐसी सोचवाले कितने लोग हैं, गर नहीं हैं, तो ऐसे व्यक्ति को पुनः राष्ट्रपति के पद पर बैठाने में सभी राजनीतिक दलों को क्या आपत्ति हैं।

बार-बार मुस्लिम प्रेम की बात करनेवाले, मुस्लिमों के आरक्षण की बात करनेवाले, सच्चर कमिटी की बातों को अक्षरशः लागू करनेवाले घड़ियाली आंसू बहानेवाले राजनीतिक दलों को, एपीजे अब्दुल कलाम में मुस्लिम क्यों नहीं दीखता। बार -बार ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण का विरोध करनेवाले लालू, मुलायम, शरद जैसे घटियास्तर के नेताओं को आज कलाम क्यों पसंद नहीं। आज कलाम के लिए ममता बनर्जी ही क्यों आगे आ रही हैं, ये अलग बात हैं कि ममता बनर्जी की राजनीति करने की सोच हमें भी पंसद नहीं, पर मुलायम जैसे घटियास्तर के नेताओं से पूछिये कि ममता के संग संयुक्त प्रेस कांफ्रेस करने के बाद, फिर कांग्रेस की गोद में बैठकर प्रणव मुखर्जी के पक्ष में बयान कैसे दे डाला। सच्चाई यहीं हैं कि समाजवाद के नाम पर सबसे ज्यादा समाज का गलाघोंटा इन्हीं घटियास्तर के नेताओं ने। एक और समाजवादी को ले लीजिए जो बिहार में सुशासन बाबू के नाम से जाना जाता हैं यानी नीतीश कुमार। उसका बयान मैने आज ही चैनलों पर देखा। उसका कहना था कि अभी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर एनडीए में चर्चाएं चल रही हैं, इसलिए वे अभी इस मुद्दे पर वे सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कह सकते। गर वे ऐसा नहीं कह सकते तो फिर मेंढ़क की तरह दलबदल में उस्ताद, उन्हीं के पार्टी के शिवानंद तिवारी ने प्रणव के पक्ष में पार्टी की ओर से कैसे बयान दे डाला। जबकि कलाम और कलाम की सोच को बिहार में जगाने की बात सर्वाधिक कोई करता हैं तो ये जदयू के लोग ही हैं और कलाम को सर्वोच्च सम्मान देने की बात आती हैं तो यहीं रोड़ा अटकाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वो कहावत हैं न बेशर्मों को शर्म कहां.....। पर सज्जनवृंद को ये भी जान लेना चाहिए कि बेशर्मों की जब लिस्ट बनाये तो ऐसे - ऐसे बेशर्म कहीं छूट न जाये। इसका ध्यान अवश्य रखे।

आज मैंने अखबार पढ़ा हैं- जिसमें कलाम साहब ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया हैं। उन्होंने एक तरह से ठीक ही किया। उनकी सोच, भले इस पर कुछ भी हो, पर हम जरुर कहेंगे कि देश में इन घटियास्तरों के सांसदों और विधायकों के मतों द्वारा सर्वोच्च स्थान पर जाना भी एक उपहार ही हैं, इसलिए कलाम साहब आपने अपनी ही बातों को अक्षरशः साबित कर दिया...........। मैं ईश्वर से प्रार्थना करुंगा कि भारत की माताएं आप ही जैसा लाल पैदा करें, जो देश व समाज के लिए गौरव हो.................।

Monday, June 11, 2012

जो बिकते हैं, उन्हें ही खरीदा जाता हैं.............

जो बिकते हैं, उन्हें ही खरीदा जाता हैं, जो बिकते नहीं, उन्हें खरीदने की किसी की औकात नहीं। जब जनता बिकने पर आ जाये, तो समझ लीजिए -- देश व लोकतंत्र को बड़ा खतरा हैं और ऐसे देश को कोई भी किसी भी कीमत पर खरीद कर, उस देश और उस देश की जनता की औकात बता सकता हैं। कमाल हैं -- सत्तालोलुपता, स्वोपकार की भावना और घटियास्तर की मनोवृत्ति ने समाज और देश को इतना नीचे ले आया हैं कि चाह कर भी ये देश व समाज आगे निकल ही नहीं सकता। मैं उस समाज और घर में पैदा लिया हूं - जहां एक चावल को मींजकर, पता लगा लिया जाता हैं कि चावल पका अथवा या नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार हटिया विधानसभा का उपचुनाव हो रहा हैं और जिस कदर विभिन्न दलों के प्रत्याशियों ने पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की यहां बोली लगायी हैं और इस बोली के अनुरुप, हटिया के मतदाता और कार्यकर्ता बिकते दीखे गये, रांची के पत्रकारों पर बिकने का तमगा लगा, उससे साफ पता चलता हैं कि यहां का परिणाम क्या आयेगा और इससे देश व लोकतंत्र को कितना खतरा उत्पन्न हो गया हैं।
फिलहाल जो सज्जनवृंद देश व समाज को नयी दिशा देना चाहते हैं और जिनका लोकतंत्र में विश्वास हैं, जो विधानसभा और लोकसभा का चुनाव सत्यनिष्ठा से लड़ना चाहते हैं, उनके लिए ये मतदाता रेट सूची नीचे दिया जा रहा हैं, कृपया देख लें, ताकि उन्हें पता लग जाये कि यहां चुनाव लड़ना एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति के लिए कितना मुश्किल सा हो गया हैं, और इसका श्रेय जाता हैं, उन धनाढ्यों को जिन्होंने चुनाव लड़कर, मतदान को भी बाजार बना दिया। बाजार क्या होता हैं, उसमें कैसे - कैसे लोग बिजनेस करते हैं, हमें लगता हैं कि ये बताने की जरुरत नहीं।
फिलहाल -- मतदाता रेट सूची पर ध्यान दें..................।
मतदाता रेट सूची
1. मतदाताओं के घर पर पर्चा या पोस्टल साटने का रेट.....100 रुपये।
2. मतदाताओं के घर पर झंडा लगाने का रेट..................200 रुपये।
3. मतदाताओं के घर के ओटे से नुक्कड़ सभा करने का रेट.300 रुपये।
4. मतदाताओं के घऱ के किसी सदस्य को कार्यकर्ता
नियुक्त करने का रेट.....................400 रुपये / प्रतिदिन। मुर्गा -मांस, चावल रोटी और शराब का प्रबंध प्रतिदिन करना होगा, अलग से।
5. मतदाताओं के घर के सभी सदस्यों के वोट प्राप्त करने का रेट... 1000 रुपये / प्रति मतदाता की दर से।
कमाल हैं, पूर्व में पत्रकारों पर पेड न्यूज को लेकर, संवाददाताओं और समाचार पत्रों पर आरोप लगते रहे थे, और ये आरोप सही भी हैं, पर जब मतदाताओं ने भी इस आर्थिक युग में अपनी रेट तय कर दी, तब तो लगता हैं कि इस देश का भगवान ही मालिक हैं।
ऐसा क्यूं हुआ, क्यूं हो रहा हैं। इसका भी मतदाताओं ने जवाब ढूंढ लिया हैं। वे साफ कहते हैं कि ये प्रत्याशी देश व समाज के लिए चुनाव तो लड़ नहीं रहे। ये लड़ रहे हैं, अपनी पत्नी, अपने बेटे- बेटियों और मित्रों के लिए तो ऐसे में भला हम इनसे देश व समाज के प्रति निष्ठा रखने का विश्वास इन पर क्यों करें। ये आज दिखाई पड़ रहे हैं तो चलो, इनसे जितना बन सकें, निकाल लो। भला कल क्या होगा, इसकी चिंता हम क्यों करें और ऐसे भी देश व समाज की चिंता सिर्फ हम गरीब क्यों करें, इन्हें क्यों नहीं करना चाहिए। देश पर खतरा हो तो बलिदान दें हमारे बेटे और मजे लूटे ये। गर दुख ही करना हैं तो सभी करेंगे और हम भी अपने हक का देश लूट रहे हैं, इसमें गलत क्या हैं।
बात भी ठीक हैं। जरा हटिया के स्कूलों में देखिये -- एनसीसी में किसका बच्चा हैं। सब उन्हीं का बच्चा हैं, जो मैला ढोते हैं, जिनका बाप गली मोहल्लों में टायर पंक्चर ठीक कर रहा होता हैं, जो सिलाई करके अपने परिवार को चला रहा होता हैं। जिसके परिवार का सदस्य या बेटा, उसके घर से कोसो दूर सीमा पर देश की रक्षा करने के लिए डटा हैं, जो रोज खेती मजदूरी करके पेट पालता हैं। क्या एनसीसी और देश की रक्षा करने के लिए इन्हीं गरीबों के बच्चे मिले हैं और संभ्रांतों - धनाढंयों के बच्चे एनसीसी में क्यों नहीं हैं या उनके बच्चे देश की सीमा पर क्यों नहीं दिखाई पड़ते। इसका जवाब तो न तो सरकार के पास हैं और न बुद्धिजीवियों के पास। अपने देश में जाति - वर्ग संघर्ष के नाम पर क्या हो रहा हैं। सभी जातियों में अमीर और गरीब की ऐसी खाई बन गयी हैं कि अमीर, गरीब को देख ही नहीं रहा तो भला चुनाव के माहौल में गरीब, अमीरों के चोचलेबाजी -- देश और समाज के बारे में क्यों सोचे। इसलिए उसने भी मतदाता रेट खोल लिये। इसमें गलत क्या हैं।
हमारे देश के महापुरुषों ने जो लोकतंत्र की कल्पना की थी। जिस देश का सपना संजोया था। वो क्या यहीं था क्या। जहां पर आज के नेताओं ने लाकर हमें छोड़ दिया हैं। आज जितने भी घोटाले हुए, उसकी जांच का परिणाम क्या हुआ। नतीजा सिफर। आजादी के बाद किसी भी घोटालेबाज नेताओं को न्यायालय द्वारा सजा मिली, उत्तर होगा नहीं, तो फिर हम गरीब ही देश की सेवा के लिए बने हैं क्या। जरा समाजवादियों की परिकल्पना देखिये -- एक अपने देश में पार्टी हैं - समाजवादी पार्टी। खूब राममनोहर लोहिया का नाम लेती हैं। जब आपातकाल की घोषणा हुई थी देश में। तो इस पार्टी के लोगों ने 1977 में नारा दिया था -- इंदिरा गांधी के खिलाफ कि वो चाहती हैं परिवार राज, हम चाहते हैं आम जनता की राज। जरा पूछो। उस समाजवादी पार्टी के मुलायम से कि तुम बताओ, तुम संसद में हो, बेटा को मुख्यमंत्री बना दिये हो, बहु को क्न्नोज से जीता कर सांसद बना दिया। ये कैसा समाजवाद हैं। उन कांग्रेसियों, भाजपाईयों और बसपाईयों से पूछो कि तुम्हारी क्या मजबूरी थी कि तुमने एक कैंडिडेट भी मुलायम के बहु के खिलाफ नहीं दिया। पर सवाल पूछने और जवाब देने का फूर्सत किसे हैं, सभी लूट रहे हैं, तो मतदाताओं ने भी करवट ली हैं कि हम भी क्यों नहीं अपना रेट तय करें। शायद ये रेट देश के सभी भागों में धीरे - धीरे अपना जलवा बिखेरेगा और सही मायनों में एक बार फिर परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़कर, अपनी पूर्व की श्रेणी में आ खड़ा होगा। ऐसे भी हमारे बाप दादाओं ने गुलामी देखी हैं, हमने गुलामी देखी ही नहीं, हमें भी तो गुलामी देखने का उतना ही अधिकार हैं। जब हमारे नेता व मतदाता दोनों लूटनेवाली स्थिति में आ जायेंगे तो फिर क्या होगा............। सबको मालूम हैं...................।

Sunday, May 13, 2012

देश तरक्की कर रहा हैं, हम इँडियन किसी से कम नहीं...............................


मैं 45 का हो गया हूं, और मेरा मानना हैं कि जो इन वर्षों में मैंने देखा। देखकर यहीं महसूस कर रहा हूं कि देश वाकई तरक्की कर रहा है। कई प्रमाण हैं मेरे पास, इसे साबित करने के लिए। ये अलग बात हैं कि आप मेरे इन सबूतों पर विश्वास करें या न करें, पर इतना जरुर कहना चाहता हूं कि आकाशवाणी पटना में जब मैं आकस्मिक उद्घषोक के रुप में कार्य करता था, तब उसके मुख्यद्वार पर महात्मा गांधी के कथन उद्धृत थे, जिसे मैं बराबर पढ़ा करता था -- वो ये था गांधी के शब्दों में कि - "मैं चाहता हूं कि मेरे घर की खिड़कियां और दरवाजे सदा के लिए खुले रहे ताकि दूसरे स्थानों की आबोहवा व उनकी संस्कृति बेरोक टोक आया जाया करें, पर मैं ये नहीं चाहूंगा कि उनके इस संस्कृति के आने जाने के कारण, अपने ही देश की संस्कृति को खतरा उत्पन्न हो जाय।" ये कथन गांधी के थे, आज गांधी जीवित नहीं हैं और न उनको याद करनेवाले जीवित हैं। हाड़-मांस के पुतलों की यहां संख्या इतनी हो गयी हैं कि इसकी संख्या एक अरब को पार कर गयी हैं। जो लोग गांधी को ढोते हैं, उन कांग्रंसियों को भी अब गांधी और गांधी के राम से एलर्जी हो गयी हैं, क्योंकि वो जानती हैं कि न तो गांधी और न गांधी के राम, उन्हें वोट दिला सकते हैं। ऐसे में गांधी के इस कथन से उन्हें क्या लेना देना। ये आलेख लिखने के बक्त एक और शख्स की अनायास याद आ गयी। नाम हैं उसका मैकाले। जिसने भारतीय शिक्षा पद्धति की नींव रखी और जिसने डेढ़ सौ वर्ष पहले कहा था, उसे खुद भारतीयों ने चरितार्थ किया। आज तो भारत के गलियों में बच्चा - बच्चा एक डायलाग बोलता हैं। उसके बोल हैं --- टम टमा टम टम, टमाटर खाये हम। अंग्रेज का बच्चा क्या जाने, अंग्रेजी जाने हम। ये बोल बताते हैं कि देश कितनी तरक्की किया हैं। इस देश में अंग्रेजी दिवस नहीं मनाया जाता, पर इस देश में अंग्रेजी बोलना व पढ़ना शान समझी जाती हैं। इस देश में हिंदी दिवस मनाया जाता हैं, पर हिंदी पढ़ने, लिखने व बोलने में मंत्री से लेकर संतरी तक को झिझक और शर्म महसूस होती हैं, स्थिति ऐसी हैं कि अब हिंदी के इस देश में शुद्ध हिंदी बोलनेवालों की संख्या विलुप्त होती जा रही हैं। भारत का एक राज्य नागालैंड की तो भाषा ही अंग्रेजी हो गयी हैं। आईये हम आपको बता देते हैं कि मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में क्या कहा था --- LORD MACAULAY ADDRESS TO THE BRITISH PARLIAMENT, 2 FEBRUARY, 1835 "I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.
" मैकाले ने कहा था -- कि मैंने भारत के कोने कोने की यात्रा की, लेकिन इस यात्रा के दौरान मुझे न तो कोई भिखारी दिखा और न ही चोर। इस देश में मैने उच्च नैतिक मूल्यों और आदर्शों को देखा। जो वहां के निवासियों में कूट कूट कर भरा था। ऐसे देश को हम तभी जीत पायेंगे जब उसकी रीढ़ मानी जानेवाली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में बदलाव करेंगे। इसलिए मैं इस बात का सुझाव देता हूं कि उस देश की पुरानी और प्राचीन शिक्षा पद्धति को बदलने की कोशिश की जाये। उनकी संस्कृति में परिवर्तन कर हम उनको जीत सकते हैं। इसलिए हमारी कोशिश विदेशी और अंग्रेजी को बढ़ावा देने की हैं। ताकि उनको लगे, कि ये सब उनकी संस्कृति से बेहतर हैं। इन कदमों के उठाये जाने के बाद ही हमारा उस देश पर पूरा प्रभुत्व हो सकता हैं, अन्यथा नहीं।"
कमाल हैं आज हम दावे के साथ कह सकते हैं कि जिस मैकाले ने ब्रिटिश सत्ता के भारत में काबिज रहने तक अपनी परिकल्पनाओं को साकार होते हुए नहीं देखा, आज वो साकार ही नहीं, बल्कि पूरा देश अंग्रेजी और अंग्रेजमय हो जाना चाहता हैं। भारत और भारतीयता तो कहीं दिखती नहीं, सिर्फ इंडिया दिखता हैं। आनेवाले समय में आर्यावर्त, जंबूद्वीप, भरतखंड, हिंदुस्तान की तरह लोग भारत कहना भूल जायेंगे और अंग्रेजों का नाम दिया इंडिया ही देश का असली नाम माना जायेगा। उदाहरणस्वरुप देश के विभिन्न राष्ट्रीय अथवा प्रादेशिक निजी चैनलों के नाम देखिये -- ज्यादातर इंडिया व इंडिया के केन्द्र में हैं, भारत और हिंद तो दीखता ही नहीं। मेरा एक मित्र अमरीका में रहता हैं, उसकी पत्नी अमरीकन मूल की हैं। एक बार उनसे बातचीत हुई थी -- वो भारत को बहुत प्यार करती हैं। कहती है कि उनकी दादी कहा करती थी कि इंडियन बहुत अच्छे होते हैं, वे एक ही पत्नी पर अपना पूरा जीवन समाप्त कर देते हैं, पर अमरीका व पश्चिम देशों में तो लड़कियों की शादी ना हुई, तलाक का सिलसिला शुरु हो जाता हैं। इसलिए वो शादी एक भारतीय से की और उसे खुशी हैं कि वो भारतीय पति आज भी उससे उतना ही प्यार करता हैं, जितना की पन्द्रह - सोलह साल पहले किया करता था। बच्चे भी दो हैं और सब खुशी से रह रहे हैं कोई दिक्कत नहीं। पर क्या -- सचमुच भारत में ऐसा हैं, या केवल अब ये गलतफहमी लोग पाल रहे हैं..............................। आप इसे स्वीकार करिये, भारत, आज इंडिया हैं। वो इंडिया जो न तो पूरी तरह अंग्रेज बन सका और न ही पूरी तरह भारतीय। बीच में यहां की अरबों आबादी पेंडूलम की तरह लटक रही हैं। पूर्व में जिस किसी देश पर आक्रमण होता था तो उस आक्रमण में अपनी संस्कृति को थोपने की आदत कुछ ज्यादा ही दिखती थी। भारत में जितने भी विदेशी आक्रमणकारी आये, उनके मूल में धर्म प्रचार और यहां की शैक्षिक संस्थाओं व संस्कृतियों को मटियामेट करना और अपने को मजबूत स्थिति में रखना ही मूल मकसद हुआ करता था। नालंदा के अवशेष खंडहर और सोमनाथ मंदिर को लूटा जाना - इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। कल के भारत और आज की इंडिया ने् कई आक्रमणकारियों व विदेशी शासकों को अपनी मिट्टी पर राज करते देखा हैं पर भारतीयों के दिलों पर राज करना इनके बूते के बाहर थी तभी मैकाले ने अपनी व्यथा ब्रिटिश संसद में रखी थी, पर आज की क्या स्थिति हैं, क्या आज कोई विदेशी यहां आकर, अपनी व्यथा, अपने देश में कर सकता हैं। उत्तर होगा -- नहीं। क्योंकि आज वो देख रहा हैं कि जो उसके यहां होता हैं वो ही इंडिया में हो रहा हैं तो किसका भारत और कैसा भारत। ये तो इंडिया हैं इंडिया। आज पूरा इंडिया अपना नया साल पहली जनवरी को मनाता हैं, उसे पता ही नहीं कि भारतीय संविधान ने उसके लिए एक अपना संवत् चुना हैं जिसे शक संवत् कहा जाता हैं और इसके भारतीय महीने जनवरी फरवरी से अलग हैं। प्रगति का सबसे पहला सोपान तो यहीं हैं कि आज कोई भी भारतीय को अपना पहला महीना, अपना पहला संवत तक याद नहीं। भारत सरकार कहती हैं कि राष्ट्रीय खेल हॉकी हैं पर सच्चाई ये हैं कि किसी भी भारतीय से आप पूछे हांकी के बारे में, तो वो हॉकी का एबीसीडी भी नहीं बता पायेगा और जब क्रिकेट की बात करें तो लीजिए, आपको उस पर एक थीसिस लिख देगा। ये बाते बता रही हैं कि देश कितनी तेजी से प्रगति कर रहा हैं, प्रगति ऐसी कि देश की सरकार चाह भी लें कि वो कुछ नया करेगी, यहां की जनता, उससे भी आगे बढ़कर, तेजी दिखा देगी। प्रगति के कुछ उदाहरण देखिये, खासकर आजादी के बाद ..........................

1. आजादी के पूर्व तक यहां के लोग मां को मैया अथवा मां कहकर पुकारते थे, पर आज वो ही मां मम्मी से होते हुए माम तक पहुंच गयी हैं, वो ही हाल पिताजी जो बाबुजी कहलाया करते थे अब पापा होते हुए, डैडी से डेड हो चुके हैं।

2. पहले घर में जब किसी का जन्मोत्सव मनाया जाता था, तो घर में सत्यनारायण की पूजा हुआ करती थी, गर ये भी नहीं हुआ तो जिसका जन्मदिन होता था, वो मंदिर जरुर जाता, तिलक जरुर लगाता और घर आकर घर में बने विशेष पकवानों का मजा लेता, घर में सभी लोग उसकी बलइयां लेते, बड़े बुजुर्ग आशीर्वाद देकर, उसे धन्य धन्य कर देते, पर अब यहां ऐसा नहीं दिखता। अब तो हर घर में केक आते हैं, मोमबत्तियां आती हैं, मोमबत्तियां जलाकर उसे फूंका जाता हैं और ताली बजाकर हैप्पी बर्थ डे टू यू का प्रचलन शुरु हो गया। सचमुच अंग्रेज नहीं होते तो ये बेचारे इंडियन अपने बच्चों का जन्मदिन भी नहीं मना पाते. मैं तो इसके लिए अंग्रेजों को बधाई दूंगा कि उन्होंने इँडियन को जन्मदिन मनाना सिखाया।

3. पहले ज्यादा भारतीय धोती पहना करते थे और माथे पर टोपी, जबकि महिला साड़िय़ों का उपभोग करती थी, पर अंग्रेजों ने भारतीयों को कपड़ा पहनाना सिखाया, आज सभी भारतीय धोती की जगह फुलपैंट पहनते हैं, जिससे उनके पांव जाड़ों के दिनों में ठंड से बच जाती हैं तथा टोपी से जो उनका लुक खराब लगता था, अब टोपी छोड़ देने से उनका लुक स्मार्ट हो गया हैं. अब तो महिलाएं साड़ियां नहीं पहनना चाहती, क्योंकि साड़ी में वो सैक्सी नहीं दिखती, टॉप जीन्स में सैक्सी दिखती हैं, इसलिए उन्हें ये पहनावा ज्यादा रुचिकर लग रहा हैं। ऐसे भी आज की महिलाओं और पुरुषों को सैक्सी दिखना, कुछ ज्यादा ही भा रहा हैं।

4. अब भारतीयों के घरों में रोटी - सब्जी या दाल चावल नहीं दिखाई देता। अब तो इसके जगह पर पिज्जा, चाउमिन, बल्गर और पता नहीं क्या क्या भोज्य पदार्थ दिखाई देने लगे हैं।

5. अब शादियों की सालगिरह भी, अंग्रेज के बच्चों के बर्थडे की तरह मनायी जाने लगी हैं। शादी का सालगिरह मनाने का प्रचलन इतना बढ़ा हैं कि होटलों व रेस्तराओं की बल्ले बल्ले हो गयी हैं। जिनकी शादी का सालगिरह होता हैं वे पति पत्नी अपने पूर्व के प्रेमी व प्रेमिकाओं को इस अवसर पर बुलाना नहीं भूलते ताकि वे अपने प्यार के उन पलों को सबके सामने शेयर कर सके। ऐसा कहना और सुनना आजकल शान समझा जाता हैं क्योंकि किसका पति कितना हैंडसम और किसकी पत्नी पहले कितनी सेक्सी थी, वो सबसे ज्यादा उसके चाहनेवालों की संख्या पर निर्भर करती हैं और ये संख्या दिखाने का सबसे सुंदर मौका होता हैं। शादी का सालगिरह मनाना। धन्य हैं अंग्रेज, जिन्होंने भारतीयों को शादी की सालगिरह का महत्व समझाया।

6. अब तो मेरे देश में विवाहित महिलाएं सिंदुर नहीं लगाती। सिंदुर लगाना, पुरातनपंथी होने का नमूना माना जाता हैं। शादी के बाद सिंदुर न लगाकर विधवाओं की तरह रहना अब शान समझा जा रहा हैं। प्रगतिशील महिलाओं की माने तो सिंदुर लगाकर महिलाएं खुद को विवाहित होने का सबूत देती हैं ऐसा पुरुष क्यों नहीं करते. भाई इनकी बातों में दम हैं। ऐसा पुरुषों के लिए कुछ न कुछ जरुर होना चाहिए, पर हमको इससे क्या मतलब, हम तो प्रगति की बात कर रहे हैं, आजकल हमारे देश की महिला व पुरुष बिना विवाह के ही आपस में पति - पत्नी की तरह रह रहे हैं और उन्हें सामाजिक मान्यता भी मिल रही हैं। गर इस दौरान इनके द्वारा बच्चे पैदा हो जाते हैं तो बच्चे को अधिकार भी हैं कि वे इन्हें अपना मम्मी या डैडी माने अथवा नहीं, या वे उन्हें माने जहां इनके इन मम्मी डैडियों ने इन्हें अपने चैन का नासूर समझकर किसी अनाथालय को दे दिया और उसके बदले में नोटों के बंडल अनाथालयों को भेज दिये।

7. पूर्व में भारतीयों को खाना खाना नहीं आता था, अंग्रेजों ने इन्हें खाना खाने के तरीके सिखाये। पहले भारतीय अपना भोजन, अपने हाथों से खाया करते थे, पर अंग्र ये छुरी और कांटों का प्रयोग कर रहे हैं, ये प्रगति का सबसे सुंदर उदाहरण हैं। आज भारत के सभी होटलों व रेस्तरों में कांटा और छुरी की भरमार हैं। कांटा और छुरी के फायदे भी अनेक हैं, जब खाना खाने के दौरान बक-झक हुई किसी से, तो आप कांटा छुरी का बेहतर इस्तेमाल भी कर सकते हैं, गर आपके पास कोई दुसरा हथियार नहीं हो।

8. पहले जो सिनेमा बनते थे वो भारतीय मूल्यों को रेखांकित करते थे। फिल्मों में भाई - बहन, मां - बाप, पति - पत्नी, भाई - भाई, घर-परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य का बोध छुपा करता था, पर अब ऐसा देखने को नहीं मिलता, अब इन सारे रिश्तों की जगह केवल लड़के - लड़कियों के प्रेम व सेक्स ने ले ली हैं, ऐसे भी जरुरी हैं कि प्रेम व सेक्स कैसे किये जाये, क्योंकि इसके बिना लेडिज और जेन्टलमैन का किरदार ठीक नहीं बन पड़ता। यहीं कारण हैं कि आज नेताओं से लेकर अन्य लोगों के जुबां पर भाईयों और बहनों की जगह लेडिज एंड जेन्टलमैन ने ले लिया हैं।

9. हमारे देश में शिक्षा में भी आमूल चुल परिवर्तन हुए हैं। धर्म - निरपेक्षता की आड़ में केन्द्र व राज्य सरकारों ने रामायण और महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों की धज्जियां उड़ा दी हैं। इनका मानना हैं कि इससे देश में सांप्रदायिकता बढ़ती हैं. इसलिए ऐसी - ऐसी चीजें पढ़ाई जा रही हैं, जिससे बच्चा केवल पैसे जमा करने की मशीन बनकर देश व समाज को अपने हाथों से बर्बाद कर सकें, और इनकी बानगी देखने को भी मिल रही हैं। आईएएस और आईपीएस की फौजों ने महानगरों में अपने लिये राजसी ठाठ-बाट के सामान इकट्ठे करने में लगे हैं, देश और समाज इनके ठेंगे पर हैं, ये जमकर भारतीयों के पैसे का सही इस्तेमाल कर रहे हैं। स्थल अध्ययन के नाम पर विदेश यात्रा करते हैं और अपनी पत्नियों के साथ, कभी - कभी ठेके पर पत्नी लेकर रंगरेलियां मनाते पकड़े जा रहे हैं, यहीं हाल हमारे प्रबुद्ध नेताओं का हैं, ये भी इसी प्रकार का कार्य कर रहे हैं।

10. देश में नेताओं की फौज इक्ट्ठी हो गयी हैं। चाहे समाजवादी हो, या दक्षिणपंथी या वामपंथी. सभी का एक ही स्वर -- मिले सुर मेरा तुम्हारा और सुर बने हमारा हैं। कल तक नहीं चलेगा परिवार का राज अलापने वाले, अपने बहु-बेटियों और बेटे दामादों को टिकट बांट कर धन्य धन्य हो रहे हैं।

11. कल तक नेता सरकारी अस्पतालों में अपना इलाज कराते थे, अब वे सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना अपनी बेईज्जती समझते हैं, इसलिए ये फाइव स्टार वाली सुविधावाली अस्पतालों में इलाज कराकर, इसके पैसे भी आम जनता से वसूलकर, भरते हैं, ये कहकर कि वे जनप्रतिनिधि हैं और आम जनता आज भी खैराती अस्पतालों में इलाज कर सीधे स्वर्गगमन कर रही हैं।

12. 15 अगस्त 1947 में जो भारत का मानचित्र था, वो अब सिकुडता नजर आ रहा हैं। चीन 1962 में भारत का एक बड़ा हिस्सा कब्जे में कर रखा हैं, जबकि अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम पर उसकी नजर टेढी हैं सो अलग। यहीं नहीं आज भी चीन के विमान और उसके सैनिक अरुणाचल प्रदेश के कई भागों को धीरे - धीरे अपने में मिलाते जा रहे हैं। इससे बड़ी देश के प्रगति का सूचक और क्या हो सकता हैं।

13. देश की संसद और राज्य की विधानसभाओं में स्पेशल कैंटीन चलती हैं, जो यहां के नेताओं और उनके चमचो को बहुत ही सस्ते दरों पर खाद्यान्न मुहैया कराती हैं, जबकि आम जनता आज भी मंहगाई से त्रस्त हैं।

14. देश के नेताओं व राजनीतिज्ञों ने शिक्षा की दो धाराएं निकाली हैं। यहां की जनता के लिए घिसी पिटी विश्वविद्यालयीय शिक्षा दे रखी हैं, जबकि अपने खानदान के बच्चों के लिए विदेश में शिक्षा दिलाने की योजना चला रखी हैं, आज भी देश के सभी बडे़ नेताओं व बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के बेटे उच्च शिक्षा के लिए भारत की बजाय विदेश की शरण लेते हैं।

15. देश के सभी प्रमुख अखबारों के अपनी वेबसाइट अश्लील चित्रों से भरी पड़ी रहती हैं, आप इन वेबसाइटों को देखकर देश की प्रगति का आइना देख सकते हैं। यहीं नहीं इन अखबारों में सेक्स और लव के चटखारे इतने अटेपटे हैं कि आपको ब्लू फिल्मों की कैसेट देखने की आवश्यकता ही नहीं पडे़गी।

16. जिस देश में कभी नानक, एकनाथ, नामदेव, नरसिह मेहता, तुलसी, कबीर, मीरा की तूती बोलती थी, आज उस देश में कृपा बरसानेवाले बाबाओं की बाढ़ आ गयी हैं. संतों की जगह रामदेव, निर्मलबाबा, आसाराम जैसे ठगों ने ले ली हैं, जो सपने दिखाकर लोगों को मूढ़ बनाने में विशेष रुचि रखते हैं।

17. इस देश में पहले श्रीरामचरितमानस की चौपाईयां घर - घर में गूंजती थी। कहा जाता था -- प्रातःकाल उठि के रघुनाथा, मात-पिता गुरु नावहि माथा। उस देश में अब मदर्स डे, फादर्स डे मनाया जाने लगा हैं, और इसके माध्यम से बताया जाता हैं कि मां और पिता क्या होते हैं।

18. जिस देश में हर महीने कोई न कोई पर्व व त्योहार हुआ करते थे, अब यहां केवल पर्व के नाम पर होली और दीवाली ही दिखाई पड़ती हैं, जबकि एक नया पर्व इस देश में अब दिखाई देने लगा हैं। जो अब हर साल 14 फरवरी को मनाया जाता हैं। इस पर्व को वैलेंन्टाईन डे कहा जाता हैं। इस पर्व के दिन हर लड़का एक लड़की को लेकर या हर लड़की एक लड़के को लेकर या लड़का - लड़का में या लड़की - लड़की से प्रेम करती हैं और इस प्रेम का लब्बो लुआब ये होता हैं कि अश्ललीलता व प्रेम की फुहड़ता चरम पर होती हैं।

19. हमारे देश में हर साल एक न एक घोटाले का पर्दाफाश होता हैं। कई घोटाले जैसे चारा घोटाला, ताबूत घोटाला, टूजी घोटाला इत्यादि। हर घोटाला खासमखास होता हैं। प्रत्यके घोटाले एक दूसरे घोटाले को मुहं चिढ़ा होता हैं कि देखों में तुमसे भी बड़ा हू। इन घोटालो में शामिल नेताओं को सजा भी नहीं होती, ये आराम से कुछ दिन ट्रायल के दौरान जेल में होते हैं, पर अंत में ससम्मान बरी भी हो जाते हैं। ये घोटालेबाज कुछ घटियास्तर के सफेदपोश पत्रकारों के साथ मिलकर नये चैनल खोलकर, अपने संत होने का एक झूठा आचरण भी पेश करते हैं, जिससे सामान्य जनता दिग्भ्रमित होती जाती हैं।

20. देश में रहनेवाले इंडियन जो यहां सरकारी सेवाओं में काम कर रहे होते हैं या जो खेती वाड़ी कर अपना जीवन यापन करते हैं, उनके धन यहां अंकगणितीय प्रणाली से बढ़ रहे हैं, पर नेताओं व आईएएस व आईपीएस अधिकारियों के धन ज्यामितीय प्रणाली से बढ़ रहे हैं।

21. अब अपने देश में कुछ - कुछ राज्यसभा की सीटे एक तरह से आरक्षित सी हो गयी हैं। जहां एक खानदान के लोग या मीडिया से जूड़े लोग पिछले पच्चीस छब्बीस वर्षों से काबिज हैं और उनका ये कब्जा आजीवन रहेगा। आज नेता का बेटा नेता ही होता हैं और उसे ही देश की बागडोर मिलेगी, ऐसा गुप्त एजेंडा को इस सफाई से यहां पेश किया जाता हैं कि जनता सदा मूर्ख बनी रहती हैं।

22. देश की भाषा, राजभाषा हिन्दी मानी गयी हैं, पर सच्चाई ये हैं कि हिंदी अंग्रेजी की दासी के सिवा कुछ नहीं। लोकसभा से लेकर राज्यसभा, विधानसभा से लेकर विधानपरिषद् तक अंग्रेजी की सल्तनत चलती हैं। हिंदी में संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देनेवाले अटलबिहारी वाजपेयी भी जब प्रधानमत्री बने तो कई जगहों पर अंग्रेजी में संवाद करना, इन्होंने शान समझा। वो कहा जाता हैं न कि हिंदी गंवारों और जाहिलों की भाषा हैं, जबकि फादर कामिल बुल्के के अनुसार - "संस्कृत महारानी, हिंदी बहुरानी और अंग्रेजी नौकरानी हैं।"

23. देश के संसद के 60 साल हो गये पर सच्चाई ये हैं कि जैसे जैसे संसद अपनी वर्षगांठ मनाता गया, वैसे वैसे ये संसद अपनी गरिमा भी खोता चला गया। केन्द्र की कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदों को घूस देकर अपनी सरकार बचायी। एक बार तो ऐसा हुआ कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने दुबारा अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदो को खरीदने की कोशिश की और वे पैसे साफ देखे गये कि कैसे सदन में रखे गये। पूरा देश देखा इस दृश्य को। जिस चैनल के पास इस दृश्य को दिखाने का जिम्मा था, उसने कांग्रेस के आला नेताओं के हाथों अपनी जमीर बेच दी, अपनी आत्मा बेच दी। यानी यहां के राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार अपनी जमीर बेचने में किसी भी अन्य देश के पत्रकारों से काफी आगे निकल चुके हैं। कितने प्वाइँट लिखूं, जितना भी लिंखूंगा कम ही होगा, बस अब आप इतना जरुर जान लीजिए कि देश काफी प्रगति कर चुका हैं............बस एक दौड़ और लगानी हैं यानी अपने सर्ट और पैंट और छोटे करने हैं...........यकीन मानिये हम अमरीकी और ब्रिटेन को मात दे देंगे। तब और गर्व से कह सकेंगे कि हम इंडियन किसी से कम नहीं.....................................।

Friday, April 13, 2012

वाह री मीडिया.......................

कल तक निर्मल बाबा को इसी मीडिया ने सर आंखों पर बिठाया और आज यहीं मीडिया उनकी खिल्ली उड़ाने में लग गयी। खिल्ली ऐसे उड़ा रही हैं, जैसे लगता हैं कि इस मीडिया को निर्मल बाबा की तरह ब्रह्मज्ञान अथवा परमज्ञान प्राप्त हो गया हो। निर्मलबाबा के बारे में जिनको थोड़ी सी भी जानकारी हैं वे बेझिझक कहते हैं कि निर्मल बाबा मीडिया की नाजायज देन हैं। इसी मीडिया ने अपने सिर्फ चंद रुपयों की लालच के खातिर अपना स्लॉट बेचा और बाबा थोड़े ही दिन में सात समंदर पार पहुंच गये। लोकप्रियता ऐसी की, आज ये मीडिया लाख उसकी आलोचना कर दें, धज्जियां उड़ा दें, पर निर्मल बाबा के भक्तों पर उसका कोई असर नहीं दीख रहा। अब तो निर्मल बाबा के भक्त इन्हें ही देख लेने की योजना बना रहे हैं, कुछ तो अदालत तक की देख लेने की बात कह रहे हैं। ये कैसी विडम्बना हैं............................
हम आपको बता दें कि जिस देश में, अकर्मण्यवादियों, बाह्यडबंरों पर रिझनेवालों तथा चमत्कार को माननेवालों की जनसंख्या रहती हैं, वहां निर्मलबाबा, रामदेवबाबा और न जाने कितने झोलझाल बाबाओं की सियासत चल पड़ती हैं, जिसके कारण पूरा देश बर्बादी के कगार पर आ खड़ा होता हैं। कल यानी गुरुवार देर रात तक एक राष्ट्रीय चैनल ने अपने आपको निर्मल बाबा से अलग करने की बेवकूफी भरी हरकत की। उसने भी निर्मल बाबा की तरह उटपुटांग हरकते अपने चैनल के माध्यम से करने की कोशिश की, पर खुद ये नहीं बताया कि.....................
क. आखिर वो 12 मई से निर्मल बाबा के इस विज्ञापन को बंद करने का क्यों ऐलान किया, तत्काल प्रभाव से उसने ये विज्ञापन क्यों नहीं बंद किया।
ख. जिस निर्मल बाबा की हरकतों को वो दिखाया करता था, उसे आज वो विज्ञापन कह रहा हैं, उसे ये परमज्ञान पहले क्यों नहीं प्राप्त हुआ।
ग. आखिर उसके इस निर्मल बाबा के हरकतों के प्रसारण करने से जो लाखों जनता की बुद्धि भ्रष्ट हुई, उसके लिए वह अपनी जिम्मेवारी क्यों नहीं लेता।
घ. आखिर उसकी इन हरकतों से जो आनेवाली पीढ़ी प्रभावित हुई, मूर्खता और अकर्मण्यता की शिकार हुई, उसके लिए वो पूरे देश से क्षमा क्यों नहीं मांगता।
ड. इस चैनल ने कल इतनी बड़ी बड़ी गलतियां और झूठ बोले, जिसे देख कर कोई भी सभ्य समाज का बुद्धिजीवी खुद शर्मसार हो जायेगा, और कहेगा कि ये भी टीआरपी का ही चक्कर हैं, यानी येन केन प्रकारेण, चाहे निर्मल बाबा से पैसे लेकर, उसकी बातें चैनल में प्रसारित करों अथवा उसकी आलोचना, टीआरपी तो आ ही रही हैं, क्योकि व्यवसाय में मुनाफा तब भी होगा और रही बात जनता की, तो उसने ठेका थोड़े ही ले रखा है। भाड़ में जाये, जनता हम अपनी दुकान चालू रखे और दुकान में तो गड़बड़ियां चलती ही हैं, उदाहरणस्वरुप जब आप एक किलो सरसो तेल के बदले नौ सौ ग्राम तेल पैक कर दे।
इधर रांची में भी सभी प्रिंट मीडिया को परमज्ञान प्राप्त हो गया हैं। दिये जा रहे हैं -- निर्मल बाबा के खिलाफ, पर रामदेवबाबा के खिलाफ लिखने में इन्हें सांप सूंघ जाता हैं। हालांकि दोनों का काम वहीं हैं। एक बेतुकी बातें करके पैसे ऐंठ रहा हैं तो दूसरा सपने दिखाकर पैसे ऐठ रहा हैं और खुद शून्य से शिखर पर पहुंच चुका हैं। आजकल निर्मल बाबा पर लिखनेवालों की बाढ़ भी आ गयी हैं। हम तो इंदर सिंह नामधारी को बधाई देंगे कि वे अपने साले को बधाई दें कि उनके कारण, उनका नाम भी आज चर्चाओं में हैं। साले के नाम व कारनामों से विख्यात होनेवाले शायद ये पहले राजनीतिज्ञ होंगे। जो बिना पैसे दिये ही, सभी चैनलों और अखबारों में धूम मचा रहे हैं। इंदर सिंह नामधारी को भी याद होगा कि यहीं अखबार वाले जब वे चुनाव लड़ रहे थे, तो उनसे पैसे के लिए देह छिल दिये थे, कि गर वे पैसे नहीं देंगे विज्ञापन के लिए, तो उनका निगेटिव प्रचार होगा। पैसे देंगे तो बस उनकी जय जयकार होगी और इससे वे चुनावी वैतरणी लोकसभा की पार कर जायेंगे। ये अलग बात हैं कि उस दिन प्रिंट मीडिया की इस ब्लैकमेलिंग के शिकार, वे बन पाये थे या नहीं। ये नामधारी ही बेहतर बता सकते हैं, पर फिर भी, आज वे बिना पैसों के सुर्खियां बटोर रहे हैं। मैं तो उन्हें दिल से बधाई देता हैं। आज रांची के सारे अखबार कोई पहले तो कोई बाद में निर्मल बाबा के खिलाफ लिखे जा रहा हैं, पर उन अखबारों से पूछिये कि रामदेव के बारे में क्या ख्याल हैं------------------------------
जरा रांची के अखबारों से पूछिये -----------------
क. कल तक योग के नाम कपालभांति करानेवाले बाबा रामदेव, योग के बाद चूर्ण, चटनी और च्यवनप्राश और अब किराना का दुकान नहीं खोल रखा हैं। क्या संत का काम किराना दुकान खोलना हैं। क्या देश में रामदेव को छोड़कर कोई पूर्व के ऐसे संत हैं जिसने किराना का दुकान खोल कर टाटा और अंबानी के कगार पर आ खड़ा हुआ हो। संत तो कबीर थे कहां करते थे -- मन लागा मेरा यार फकीरी में। संत तो गांधी थे, जिन्हें जैसे ही भारत की वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ, लंगोटी धारण कर ली, मृत्युपर्यंत लंगोटी धारण किये रहे, धन से कोई लगाव नहीं था। संत तो धनबाद के ए के राय हैं, जो तीन - तीन बार विधायक और तीन - तीन बार सांसद रहे, पर कभी भी वेतन तो दूर पेंशन तक नहीं लिया।
ख. क्या ये सही नहीं हैं कि रामदेव ने रांची में आज से छह - सात साल पहले ऐलान किया था कि भारत आगामी पांच सालों में महाशक्ति बन जायेगा। एक अखबार ने इसे सुर्खियां बनाया था, वो भी प्रथम पृष्ठ पर। क्या भारत महाशक्ति बन गया। नहीं बना तो ऐसी वाणी संत के हो ही नहीं सकते। क्योंकि संत जो बोलता हैं, वहीं होता हैं। मन, वचन और कर्म से संत एक होते हैं।
ग. देश में रामदेव ऐसे पहले संत हैं, जो पुलिस के डर से लड़कियों/ स्त्रियों की पोशाक पहनकर भाग निकले। यानी देश में इन्होंने संतों को कायरों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। पर यहां के अखबार रामदेव की पोल नहीं खोलते..................। शायद उन्हें रामदेव में देश का भविष्य दिखाई पड़ता हैं।
ऐसे तो देश में कई ऐसे संत हैं, जो खुद को संत कहते हैं पर उनके बयान और हरकत देखिये तो साफ लगता हैं कि संत का लबादा ओढ़े ये पक्के व्यापारी हैं। जो टाटा, अंबानी और मित्तल जैसे कई व्यवासायिक घरानों को भी मात देने में आगे हैं।
एक संत हैं -- आसाराम बापू भारत में रहते हैं और सामान्य जन को भरी सभा में गाली दे देते हैं और खुद को आध्यात्मिक संत कहलाने में गर्व महसूस करते हैं।
एक संत हैं - श्रीश्री रविशंकर भारत में ही रहते हैं और उन्हें सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे नक्सली हो गये प्रतीत होते हैं। पर देश व मेरे प्रदेश की मीडिया को इसकी जानकारी होते हुए भी इनके खिलाफ बोलने व लिखने में परहेज होता हैं। शायद उन्हें पता हैं कि चूहे और बिल्ली की कहानी। और अंत में उस कहानी का सारांश कि आखिर बिल्ली की गले में घंटी कौन बांधे...................।

Wednesday, April 4, 2012

खुद को पत्रकार कहते हैं..........................

1. आप आठ घंटे से अधिक पत्रकारिता को देना ही नहीं चाहते, और खुद को पत्रकार कहते हैं। सच्चाई ये हैं कि आप आठ घंटे भी पत्रकारिता को दे दें, तो आपके जीवन और समाज दोनों में क्रांति हो जाये।
2. जैसे ही आपका आठ घंटा पूरा होता हैं, आपकी बॉडी और आत्मा काम करना बंद कर देती हैं, थोड़ा सा ज्यादा समय काम क्या कर लिया, दूसरे दिन आप काम करने के लायक ही नहीं रहते, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
3. आप पत्रकारिता को ग्लैमर समझते हैं, और इसके सिवा कुछ भी नहीं, जब पत्रकारिता को ग्लैमर समझ लिया, उसी दिन आप पत्रकारिता के लिए मृतप्रायः हो गये, आपको समझ लेना चाहिए।
4. आपको अपने परिक्षेत्र की जानकारी ही नहीं रहती, कि आपके परिक्षेत्र में क्या घटनाएं घट रही हैं या घटी थी या घटेगी, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
5. आपको स्वयं पर इतना गुमान होता हैं कि जैसे दुनिया की सारी विद्या आपकी आत्मा और शरीर में समा चुकी हैं, और इसलिए आप अपने से वरीय महानुभावों की सुनते ही नहीं। जिसके कारण आप स्वयं शुन्य में विचरित करते रहते हैं, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
6. समाज के सबसे निम्नवर्ग पर आपकी दया ही नहीं रहती और समाज के उच्च वर्ग व हाई सोसाईटी की दया आप पर बनी रहे, साथ ही उनके द्वारा सदैव उपकृत रहने की इच्छा पालते हैं, इसके लिए आप अपनी पूरी जिंदगी गुजार देते हैं, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
7. अपनी जिंदगी में कोई ऐसी खबर नहीं की, जिसका प्रभाव समाज और देश पर पड़ा हो, और खुद को पत्रकार कहते हैं।
8. जहां आप काम करते हैं, वहां आपको मेहनताना दिया जाता हैं, उसके बावजूद भी नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और पूंजीपतियों से धन लेकर, खुद को प्रतिष्ठित कराने का ढोंग रचते हैं और खुद को पत्रकार कहते हैं।
9. अपने चाहनेवालों और धन लेकर कोई भी काम कराने की इच्छा पालकर, गलत धंधों में लगे रहते हैं और खुद को पत्रकार कहते हैं।
10. जिन्होंने ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता का पत्रकारिता में रिकार्ड बनाया और जिंदगी गुजार दी, उनका आप इज्जत नहीं करते और उन्हें भी अपने जैसा समझते हैं और खुद को पत्रकार कहते हैं।

Sunday, March 25, 2012

मीडिया से देश को खतरा -------------------------


ये बात जो लोग मीडिया में हैं। उन्हें अटपटा सा लगे, या वो मानने को तैयार न हो, पर सच्चाई यहीं हैं कि आज मीडिया से देश को खतरा उत्पन्न हो गया हैं, ऐसे में जरुरी हैं कि सरकार मीडिया पर लगाम लगाये, उन्हें नियंत्रित करें अथवा कुछ ऐसे उपाय ढूढें ताकि देश व समाज को मीडिया की खतरों से बचाया जाये। मीडिया से देश व समाज को कैसे खतरा उत्पन्न हो गया हैं। उसका एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। जिस पर मीडिया के लोगों को ही खुद आत्ममंथन करने की जरुरत हैं।ज्वलंत उदाहरण -- आज ज्यादातर राष्ट्रीय चैनल, अपनी महत्वाकांक्षा को पाने के लिए, एकमात्र लक्ष्य रुपये कमाने के लिए आधे घंटे का या रुपये पर जितना मन चाहे, उतने घंटे का स्लॉट बेच दे रहे हैं और इन स्लॉटों में क्या होता हैं। आप खुद देखिये। एक ठग आता हैं। अपने को बाबा कहता हैं। और ठग विद्या द्वारा पूरे देश में अपना जादू चलाकर, खुद को प्रतिष्ठित कर लेता हैं। यानी कल तक जिस व्यक्ति को कोई नहीं जानता हैं,वो व्यक्ति पल भर में ही, पूरे देश में इस प्रकार अपनी धर्मसत्ता स्थापित कर लेता हैं कि, इन राष्ट्रीय चैनलों को मुंहमांगी रकम देकर, वो बाबा अपनी जयजयकार करवाता हैं। फिलहाल देश में दो बाबाओं ने ऐसी कमाल दिखायी हैं कि एक बाबा तो बनिये की दुकान से लेकर, चैनल और दवाओं की दुकान तक खोल दी हैं, जबकि दुसरा बाबा अपना थर्ड आई खोलकर, पल भर में अनारक्षित रेलवे टिकट को कन्फर्म तक करा देता हैं, यहीं नहीं खानेवाले बिस्कुट का कारोबार करने वाले व्यक्ति को वो सोने का बिस्कुट का कारोबार तक करनेवाला बनाने का दावा कर देता हैं, यहीं नहीं इस बाबा ने तो हद कर दी हैं.........हर प्रश्न का उटपुटांग जवाब देकर, स्वयं को प्रतिष्ठित कर देता हैं। ऐसे में इन बाबाओं को देख, गोस्वामी तुलसीदास की वो पंक्ति याद आ जाती हैं, वो पंक्ति जो श्रीरामचरितमानस में लिखा हैं -- पंडित वो हि सो गाल बजावा। यानी कलयुग में जो जितना गाल बजायेगा, वो उतना बड़ा ज्ञानी कहलायेगा। एक नहीं कई चैनल हैं -- जो इस प्रकार के गोरखधंधे में शामिल हैं, पर सरकार इन पर कार्रवाई नहीं करती। कमाल हैं इन बाबाओं ने इन चैनलों की टीआरपी भी बढ़ा दी हैं, यानी एक पंथ दो काज। पहला की बाबा से रुपये भी मिल गये और टीआरपी भी मिल गयी। जबकि ये चैनल, रजिस्ट्रेशन कराने के समय़ सिर्फ न्यूज चलाने की बात करते हैं, पर न्यूज के नाम पर ये क्या कर रहे हैं, सभी को पता हैं। आज देश के विभिन्न गांवों और शहरों में देश के महान संत -- कबीर, नानक, रविदास, नामदेव, तुकाराम, तुलसीदास, मीराबाई, नरसीमेहता, सुरदास, रसखान आदि के चित्र नहीं बिकते या इन्हें जाननेवाले लोगों की संख्या नगण्य हैं, पर टीवी वाले ठग बाबा के फोटो खूलेआम बिक रहे हैं, उन्हें लोग जानते हैं। हमारे देश में जितने भी संत हुए, उन्होंने देश को सिर्फ दिया, क्योंकि संत केवल देता हैं, वो देश से लेता नहीं। ठीक उसी प्रकार जैसे गंगा बहती रहती हैं, वो हमेशा उपकार करती हैं, चाहे लोग उसमें मैला बहाये अथवा उससे खुद को तृप्त करने का कार्य करें। ऐसे होते हैं संत। पर आज के संत को देखिये, बाबाओं को देखिये। ये बाबा टेंट - मार्चेंट के कारोबारियों से शादी में लगनेवाले एक कुर्सी पर बैठता हैं, तीन तसिया का जो खेल होता हैं, ठीक उसी प्रकार दस - बीस लोगों को जूगार करता हैं। जो बाबा के ट्रिक के अनुसार सवाल करता हैं और बाबा भी उसी प्रकार ट्रिक के अनुसार जवाब देता हैं, और इसी ट्रिक के जाल में, टीवी देख रहा, आम आदमी फंस जाता हैं, और अपनी जिंदगी के, मेहनत के सारे पैसे, इन ठगों पर लूटा देता हैं, वह भी जयजयकार कर। मैं जहां रहता हूं, वहां एक महिला रहती हैं, वो अपने माता - पिता को कभी सम्मान नहीं देती और न ही पति को सम्मान करती हैं, पर जरा देखिये इन्हें, जैसे ही सुबह होता हैं, ये टीवी खोलकर, उक्त ठग को देखने के लिए, सुनने के लिए दोनों हाथ जोड़कर बैठ जाती हैं। ये तो आजकल टीवी वाले इस ठग की प्रचार प्रसार भी कर रही हैं। एक दिन मेरी पत्नी ने कहा कि टीवी वाले थर्डआई वाले बाबा ने कहा है कि घर में शिवलिंग नहीं रखना चाहिए, जिसे सुनकर सभी टीवी देखनेवाले लोगों ने अपने घर के शिवलिंग मंदिर में रख दिये। मैंने अपनी पत्नी से पूछा - तुम्हारा क्या विचार हैं। उनका कहना था कि जब एकलव्य, द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर, स्वंय को प्रतिष्ठित करा लेता हैं, तो भला मैं, इस एकलव्य की गुणग्राही बातों को त्याग, एक ठग की बात पर क्यूं जाउं। मेरा हृदय प्रसन्न हो गया। चलों कोई तो हैं, जो इन ठगों से खुद को अलग कर रहा हैं, पर ऐसे लोगों की संख्या कितनी हैं। सवाल तो ये हैं......................।यहीं नहीं एक दक्षिण के चैनल से बाबा आते हैं, शनि के नाम पर खूब डराते हैं। पहले वे दिल्ली के राष्ट्रीय चैनलों पर आकर आम जनता को खूब डरा चुके हैं, पर हमारे घर के बच्चे, इनसे नहीं डरते। जैसे ही चैनल पर आते हैं। हमारे बच्चे, हमें बुलायेंगे, बाबा आ गये, देखिये- सुनिये और हंसते हंसते लोट पोट हो जाईये। सचमुच में, ये बाबा के हाव - भाव, फिल्मों में काम करनेवाले हास्य कलाकार, जगदीप, असरानी, धूमल व राजेन्द्रनाथ जैसे लगते हैं, और बात भी वहीं। यानी पूरे देश में आजकल टीवी चैनलों का एक ही कार्यक्रम बन गया हैं। देश व समाज भाड़ में जाये, पैसे कैसे कमाये जाये। ये ध्यान में रखकर स्लॉट बेचो, और अपने देश में धर्म कुछ ज्यादा ही बिकता हैं, और गर हिंन्दु हैं तो कहना ही नहीं, क्योंकि अन्य धर्मों में बाबाओं की उतनी पूछ नहीं, पर हिन्दुओं में बाबाओं की फौज हैं, किसी को पकड़ लो, पैसे ले लो, पूरे देश में बिकवाने का जिम्मा ले लो और शुरु हो जाओ। अभी तो थर्ड आई वाले बाबा खूब दिखाई पड़ रहे हैं, कल फोर्थ आई और फाइव तथा सिक्स आई वाले बाबा भी दिखाई पड़ जाये। तो इसे अतिश्योक्ति न समझेंगे। यहीं नहीं, आजतक हमें ये समझ में नहीं आया कि ये बाबाओं की फौज, शादी करा देती हैं, रेलवे टिकट कन्फर्म करा देती हैं, रोजगार दिला देती हैं, पर एक साधारण आदमी को प्रधानमंत्री क्यों नही बना देती। पूरे देश में जो गरीबी हैं, उसे फूंकमार कर दूर क्यों नहीं कर देती, देश में अशिक्षा जो फैली हैं, उसे फूंकमारकर दूर क्यों नहीं कर देती, या देश में जो भ्रष्टाचार पनपा हैं, उसे दूर क्यों नहीं करती और जब सारे समस्याओं का हल इन बाबाओं के पास हैं और टीवी वाले जो दिखाते हैं, वे टीवी वाले और बाबा इस समस्यारुपी शब्द को ही फूंकमार सदा क लिए क्यों नहीं मिटा देती। और जब ये ऐसा नहीं कर सकते तो समझ लीजिये कि पूरी दाल काली हैं। इसका मतलब हैं कि मीडिया, देश के लिए खतरा बन चुकी हैं और इन खतरों से देश की युवाओं को, दो दो हाथ करने के लिए तैयार रहनी चाहिए।आज से कोई बीस साल पहले, कोई जर्नलिज्म की डिग्री लेने के लिए हाय तौबा नहीं मचती थी, पर आज देश के युवा मीडिया में जाने को कुछ ज्यादा ही आतुर हैं। टीवी के ग्लैमर ने इन्हें मीडिया की ओर ज्यादा झूकाया हैं और जहां ग्लैमर होता हैं, वहां गंदगी होती ही हैं, क्योंकि ये देश व समाज की रक्षा के लिए आये ही नहीं, ये तो आये हैं - ग्लैमर के लिए। तो ग्लैमर आयेगा कहां से। पैसों से। और पैसे आयेंगे कहां से। इन्हीं ठगों से, जिन्हें हम आजकल टीवी वाले बाबा के नाम से जानते हैं। अब तो हम ईश्वर से यहीं प्रार्थना करेंगे, कि हे ईश्वर, अपने देश व समाज को, आसन्न मीडिया के खतरों से बचाओं, नहीं तो देश बनने से रहा। चीन और पाकिस्तान को क्या जरुरत हैं - भारत पर हमले की। भारत को खोखला करने के लिए यहां की मीडिया और ठग बाबाओं की गाढ़ी दोस्ती काफी हैं, इस देश को धूल में मिलाने के लिए, देश के मानमर्दन के लिए।

Tuesday, March 13, 2012

बिना नंबर की गाड़ी पर सवारी करते हैं -- झारखंड के नेता - मंत्री -2

ये तस्वीर हैं – झारखंड विधानसभा की जहां एक विधायक ने बिना नंबर की गाड़ी पर चढ़कर, सदन पहुंचने में अपनी शान समझी। झारखंड विधानसभा में ये आम बात हैं। यहां के नेता, विधायक व मंत्री बड़ी शान से बिना नंबर की गाड़ी की सवारी करते हैं। ये न्यूज हमनें सबसे पहले कशिश चैनल पर 6 मार्च को प्रसारित की थी, जब 5 मार्च को राज्य के उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो बिना नंबर की गाड़ी से विधानसभा पहुंचे थे। हद तो तब हो गयी, जब 12 मार्च को उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत कई मंत्री और विधायक भी बिना नंबर की गाड़ी पर आ गये। ये चित्र उसी परिदृश्य को बयां करती हैं, हालांकि 13 मार्च को इस पर विधानसभा में काफी बावेला मचा। आशा की जाती हैं कि अब माननीय कानून का उल्लंघन नहीं करेंगे..........................................। फिर भी एक सवाल परिवहन विभाग के अधिकारियों और यातायात पुलिस से, जब सामान्य जनता कानून का उल्लंघन करती हैं तो उससे जुर्माना वसूला जाता हैं, इन माननीयों से परिवहन विभाग के अधिकारी और यातायात पुलिस कब जुर्माना वसूलेगी। जनता जानना चाहती हैं, पर इसका जवाब किसी के पास नहीं हैं...........................................


दिनांक - 13 मार्च 2012

Monday, March 12, 2012

बिना नंबर की गाड़ी पर सवारी करते हैं -- झारखंड के नेता - मंत्री


एक गाना हैं -- मैं चाहे ये करु, मैं चाहे वो करु, मेरी मर्जी.....। शायद इस गाने का असर झारखंड के नेताओं और मंत्रियों पर कुछ ज्यादा ही सर चढ़ कर बोल रहा हैं। ये बातें, मैं इसलिए लिख रहा हूं कि आजकल इन नेताओं ने बिना नंबर की गाड़ी पर चढ़ने की ठान ली हैं, और ऐसा ये करते भी हैं। बिना नंबर की गाड़ी पर ये बड़ी शान से सवारी करते हैं और इसी क्रम में बिना नंबर की गाड़ी पर ये विधानसभा तक चले आते हैं। इन्हें ये भी नहीं महसूस होता कि जहां कानून बनता हैं, कम से कम वहां तो कानून का सम्मान करें। यहीं नहीं बिना नंबर की सवारी करनेवाले इन नेताओं को पुलिस सजा भी नहीं देती, बल्कि उनका सम्मान करते हुए, उनकी बिना नंबर की गाड़ी को प्रोटेक्शन देने से भी नहीं चुकती। वो पुलिस जो सामान्य जनता को बेइज्जत करने में फक्र महसूस करती है। आपको याद होगा कि बिना हेलमेट की सवारी करनेवाले युवाओं को रांची पुलिस ने माला पहनाने का काम शुरु किया था, यहीं नहीं एक वरीय पुलिस अधिकारी ने तो अपने पाकेट से एक सौ रुपये निकालकर पर्ची भी कटवाने की दरियादिली दिखाई थी, पर ये दरियादिली कानून तोड़नेवाले नेताओं, मंत्रियों व विधायकों पर क्यों नहीं दीखता। क्या कानून सिर्फ सामान्य जनता को पालन करने के लिए बना हैं। क्या इन नेताओं की बिना नंबर की गाड़ी कानून तोड़कर, झारखंड की शान बढ़ा रही हैं। क्या इन नेताओं की बिना नंबर की गाड़ी से गैरकानूनी कार्य होने का खतरा नहीं हैं। गर हैं तो उन्हें सजा कौन देगा। जब हमने इसी मुद्दे को विधानसभाध्यक्ष के समक्ष उठाया था। तब उन्होंने कहा था कि कानून का पालन सबको करना चाहिए। वे चाहेंगे कि कानून का पालन सभी माननीय विधायक और मंत्री करें और इस मुद्दे को वे विधानसभा में खुद उठायेंगे, पर किसी कारणवश उन्होंने भी नहीं उठाया, पर आशा करेंगे कि वे इस मु्द्दे को विधानसभा में उठायेंगे।
पांच मार्च को जब विधानसभा का बजट सत्र प्रारंभ हुआ तो मैंने देखा कि राज्य के उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो बिना नंबर की गाड़ी पर सदन पहुंचे, पर आज यानी 12 मार्च की जो स्थिति थी, वो और विकट थी। विना नंबर की गाड़ी से विधानसभा पहुंचनेवालों में उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो ही नहीं, बल्कि उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, संसदीय कार्य मंत्री हेमलाल मुर्मु, कृषि मंत्री सत्यानंद झा बाटुल, परिवहन मंत्री चंपई सोरेन, सत्तापक्ष के झामुमो विधायक विष्णु भैया, विधायक बंधु तिर्की, झाविमो विधायक दल के नेता प्रदीप यादव भी शामिल थे। यानी समझा जा सकता हैं कि कानून तोड़ने में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने तेजी दिखाई हैं। आम तौर पर बिना रजिस्ट्रेशन के गाडी़ चलाने पर एमभी एक्ट 192 के तहत कम से कम 2000 रुपये और अधिकतम 5000 रुपये जुर्माना हैं। पर आज तक इन नेताओं व मंत्रियों से किसी ने भी जुर्माने नहीं वसूले। भला मंत्री जी हैं, नेताजी हैं, विधायक जी हैं, इनसे जुर्माना कौन वसूले। झारखंड में मनचाही जगह रहनी हैं तो इनकी आरती उतारनी ही होगी, इनके आगे ता ता थैया करना ही होगा। इसलिए सभी कानून को ठेंगा दिखाकर, अपने ढंग से काम कर रहे हैं, और रही बात जनता की, तो जनता होती ही हैं, कटने के लिए और नेता आनन्द की पराकाष्ठा का परमसुख भोगने के लिए।

Thursday, March 8, 2012

राशिफल -- होलियाना


होली की ढेसारी शुभकानाएँ -----------------

1.मेष -- मेषवालों के लिए खुशखबरी हैं, उनके लिए होली का ये सप्ताह खुशियों से भरा होगा। दही की पोटलियां उनके माथे पर पच पच करने के लिए मचल रही है, यहीं नहीं दोनों हाथों में सालियों द्वारा मिले रसगुल्ले कमाल दिखायेंगे, ये रसगुल्ले स्वतः विस्फोट कर, आपको और आपकी शाली दोनों के गालों को लाल कर देंगे, ठीक उसी तरह जैसे यूपी में समाजवादी पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार अखिलेश यादव के गाल लाल हैं।

2. वृष - शनि की साढ़ेसाती आपको चैन से इस बार रहने नहीं देगी। बेलनयोग कमाल दिखायेगा। आप अपनी पत्नी के बेलन से सावधान रहे, क्योकिं हो सकता हैं कि ये कभी बेलनपात कर, आपकी समस्याओं को और बढ़ा दे। कृपया होली खेलने के पहले आप अपने सर की सुरक्षा अवश्य कर लें। सलाह दी जाती हैं कि होली के दिन आप पत्नी की कोप से बचने के लिए, ओम् पं पत्नये नमः का आठ बार जप करें।

3. मिथुन - आप आज ही से पढ़ना छोड़ दे, क्योकि आप बिना पढ़े ही होली के प्रभाव से पास कर जायेंगे। सलाह -- मूरखों के संग रहकर आप अपना ज्ञान बढ़ाये और इस ज्ञान से अपना और अपने प्रदेश का मान बढ़ाये। होली के दिन करेले का रस व नीम का रस मिलाकर मालपुआ खाये और अपनी साली की तीन बार प्रदक्षिणा करें।

4. कर्क - कर्क वालों के राहु की वक्री गति बम बम करनेवाली हैं। घर में बिना हाथ चलाये मालपूओं की बरसात होनेवाली हैं। पर केतु की मार्गी गति परेशान करेगी, क्योंकि माल महराज की मिर्जा खेले होली वाली कहावत आपके यहां चरितार्थ होनेवाली हैं। आपकी पत्नी, दूसरों के साथ होली खेलने के लिए अभी से मचल रही हैं, उन पर ध्यान दें, नहीं तो आप परेशानी में पड़ सकते हैं।

5. सिंह -- सिंह राशि वाले गजब ढायेंगे। यूपी के मुलायम सिंह की तरह बिना हाथ - पांव चलाये सीएम की कुर्सी तक पहुंच जायेंगे, पर याद रहे कि मायावती की राशि भी सिंह हैं। लेने के देने भी पड़ सकते हैं। इसलिए ज्यादा उंची ख्वाब देखने के पहले मायावती का आठ बार जरुर ध्यान करें। अच्छा रहेगा की हाथी पर बैठ कर होली खेलने के बजाय इस बार टूटी फूटी साईकिल से ही काम चलाये। सलाह -- जिनकी सालियां हैं वे अपनी सालियों को साइकिल पर बिठाकर, शहर की चार चक्कर लगाये, सभी मनोकामनाएं पूर्ण होगी।

6. कन्या - कन्या राशि वाले, इस बार कन्याओं पर विशेष ध्यान दें। हो सके तो कन्याओं पर अपना प्यार लुटाएं। गर कोई कन्या आपके पास आती हैं तो उसे अपने हृदय के सिंहासन पर बिठाकर, हाल चाल पूछे। कन्या के दिल में झांककर अपना पोजीशन सुनिश्चित करें। खुद मालपुआ खाएं, उन्हें खिलाएं। पर याद रखें -- कन्या का भोग लगाया मालपुआ गर खाया तो जीवन धन्य..........नहीं तो गये काम से.

7. तुला -- तुला राशि वाले गये काम से। ठीक वैसे, जैसे राहुल भैया को कोई पूछ नहीं रहा। वैसा हाल होने जा रहा। कोई लड़कियां रंग लगाने को नहीं आयेंगी, रंग के लिए तरस जायेंगे। सलाह -- खुद ही काला रंग ले और अपने मुंह में लगाकर, चार बार -- अमेठी का चक्कर लगाये। अगली इलेक्शन में मनोकामना जरुर पूरी होगी.. तब तक आप ओम् मुलायमाय नमः का जप करते रहे, ऐसे में शादी भी हो जायेगी और सब ठीक हो जायेगा।

8. वृश्चिक -- गर आप लड़की हैं तो सोचना नहीं हैं। लड़का हैं तो बड़ी गड़बड़ी हैं। लड़कियां बिच्छु बन कर लड़कों को डंक मारेगी। सारे अरमान लड़कों के धरे के धरे रह जायेंगे। लड़कियां मस्ती में रहकर फिल्मी गाने गायेंगी -- गाने के बोल होंगे -- लड़की चले जब सड़कों पे आये कयामत लड़कों पे। इसलिए लड़के को सलाह दी जाती हैं कि अपनी गर्लफ्रेंड के चक्कर से अभी दूर रहे। गर होली खेलने के लिए कोई गर्लफ्रेंड बुलाये तो अपना आगे - पीछे जरुर देख लें, क्योंकि जीत तो लड़कियों की ही होगी।

9. धनु -- धनु राशिवालों के लिए फिफ्टी फिफ्टी. पत्नी सर पर गोले दागेगी, बेलन की बरसात करेगी और साली हर प्रकार के सुख देने के लिए तैयार रहेगी। जिनकी साली नहीं हैं, उनके लिए बुरी खबर हो सकती हैं, क्योंकि साली वाले, उनके सामने ही बैठकर प्रेमालाप कर उन्हें जलाने की कोशिश करेंगे। जिनकी शादी नहीं हुई, वो घबराएं नहीं, आस पड़ोंस से आप काम चलाये........पर ध्यान रहे जिनके साथ इस बार आप काम चलायेंगे.. उसी से आप की आंखे भी चार हो जायेगी।

10. मकर -- मकर वाले ध्यान दें। होली की शुरुआत से लेकर बुढ़वा मंगल तक मगरमच्छ की तरह सोने की कोशिश करें। किसी नदी या समुद्र के पास जाकर मगरमच्छ का दर्शन करें और मगर पर बैठकर कम से कम एक किलोमीटर की यात्रा करे.......अगर मगरमच्छ नहीं मिले तो अपनी सास को ही मगरमच्छ समझकर चार बार प्रदक्षिणा करें क्योंकि समय बहुत खराब चल रहा हैं, ठी उसी तरह जैसे सोनिया गांधी का समय खराब चल रहा।

11. कुम्भ -- कुम्भ राशि वाले ध्यान दे। होली की सुबह तीन घड़ों में तीन प्रकार का रंग भरकर, अपनी साली को घटदान करें और फिर उसी घड़ें के रंग से अर्द्धरात्रि में साली और स्वयं होली खेले। हर प्रकार की मनोकामना पूर्ण होगी। पूरा साल बम बम रहेगा..............

12. मीन -- मीन राशि खूब खाये, खूब खिलाएं। भांग की मस्ती में डूबकर, चार हिन्दी फिल्मी नायिकाओं का, खासकर मल्लिका शेरावत और सेलिना जेटली को हृदय में धारण कर विधिवत पूजन करें..........पूजन के बाद.. पास पड़ोंस की भाभियों को जमकर गुलाल लगायें और मालपूएं खाएँ.... पर याद रहे भाभियों को मालपूएं खिलाते समय मालपूएं का रस....अन्यत्र न गिरे.................

Wednesday, March 7, 2012

गुंडों को क्या हैं, हाथी से उतरे, साईकिल पर चढ़ गये ---------------


देश की नजर, 6 मार्च को होनेवाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों पर थी, पर मेरी नजर ज्यादातर उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम पर थी, कि वहां की जनता क्या जनादेश देती हैं। जनता ने जनादेश दे दिया। पिछली बार मायावती की झोली भर दी थी, इस बार मुलायम की झोली भर दी। ऐसी झोली भर दी कि पांच सालों तक कोई किच किच न हो। कोई राजनीतिज्ञ उलाहना न दे कि जनता ने जनादेश तो दिया पर बहुमत नहीं। अब लो दे दिया, काम करो। इसके पहले बहुमत मायावती को दिया, पर मायावती को अपनी मूर्ति और हाथी को सजाने से, वक्त ही नहीं मिला कि वो उत्तर प्रदेश के बारे में सोचे। मायावती तो जानती हैं कि यूपी के दलित, हाथी को छोड़कर, दूसरे पर बटन दबा ही नहीं सकते और रही बात पंडितों और मुस्लिमों की, तो पंडितों को दक्षिणास्वरुप विधानसभा की टिकट और मुस्लिमों को भाजपा का भय दिखाकर, फिर से सत्ता हासिल कर लेंगे, पर ऐसा हो न सका। बसपा का नारा -- चढ़ गुंडे की छाती पर, बटन दबेंगी हाथी पर और ब्राह्मण शंख बजायेगा, हाथी दिल्ली जायेगा। काम नहीं आया और हाथी लखनउ तक, ही सिमट गया। इधर समाजवादी पार्टी की बल्ले बल्ले हैं, जनता ने पूर्ण बहुमत दे दिया। बांछे खिल गयी। बहुमत की बात तो समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने सपने में भी नहीं सोची होगी, पर आज बहुमत हैं। न कांग्रेस को मनाने का झंझट और न निर्दलीयों के आगे घूटने टेकने की जरुरत। बस सब बम - बम हैं। भाई यूपी की जनता ने एक बार भाजपा को भी पूर्ण बहुमत दे दिया था, पर राम मंदिर की आस्था और मंदिर निर्माण की दृढ़संकल्पिता, उसे कहीं की नहीं रखी और भाजपा आज तीसरे नंबर पर आकर अटक गयी। लगता हैं कि भाजपा फिर कभी सत्ता में नहीं आयेगी। लेकिन देश की राजनीति ऐसी हैं कि कब कौन उछलकर मुख्यमंत्री पद पर चला जायेगा या किस की फिर से बहुमत आ जायेगी, कहां नहीं जा सकता। एक समय था कि लोग जनसंघ( अब भाजपा ) और उसके नेताओं के बारे में बोलते थे कि ये पार्टी कभी सत्ता में नहीं आयेगी, पर ये पार्टी देश की बागडोर भी संभाली, कई प्रदेशों में इनकी सरकार हैं, इसलिए इस पर बोलना व लिखना बेकार हैं।
इधर जब जनादेश का परिणाम आ रहा था, तब देश के राष्ट्रीय समाचार पत्रों व राष्ट्रीय चैनलों में कार्यरत कांग्रेस भक्त पत्रकार, जो कल तक यूपी में कांग्रेस की शानदार सफलता का दंभ भरते आ रहे थे। अपना चेहरा छुपाते नजर आये। कुछ ऐसे बेशर्म कांग्रेस भक्त पत्रकार भी थे, जो बेशर्मी की सारी हदें पारकर, अपना चेहरा बार - बार चैनलों पर दिखा रहे थे। खैर कांग्रेस का जो होना था। हो गया। कांग्रेस पार्टी आज भी परिवारों की पार्टी हैं। हाई - फाई पार्टी हैं। जिसमें जनता की भागीदारी कम, नेताओं के खानदानों की भागीदारी ज्यादा होती हैं, और परिणाम सबके सामने हैं।
समाजवादी पार्टी -- नाम कितना सुंदर। समाज की बात करनेवाली यानी सामाजिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, देश व समाज को आगे ले जानेवाली पार्टी। पर क्या लगता हैं कि इस पार्टी से उत्तरप्रदेश का भला होगा। आज तो देश के सभी समाचार पत्रों में बड़े बड़े संपादक, और अन्य स्तंभकार, मुलायम पुत्र अखिलेश की जय जय कर रहे हैं। चाटुकारिता की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। मुलायम को सही युवराज बता रहे हैं। राहुल पर फब्तियां कस रहे हैं। ये लिखनेवाले और बोलनेवाले वो लोग हैं, जो लाखों नहीं, करोड़ों में खेलते हैं। जो यूपी की गांवों और गलियों का इतिहास भूगोल भी नहीं जानते, पर बता रहे हैं कि यूपी को अखिलेश यादव नया मार्ग दिखायेंगे, अब यूपी बहुत आगे निकल जायेगा। सपा दिल्ली में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी। हां हां क्यों नहीं निभायेगी, जनता ने भूमिका निभाने के लिए ही तो जनादेश दिया हैं। पर आज अखिलेश के आगे नतमस्तक होकर, अखिलेश यादव की चरणवंदना करनेवाले ये सारे पत्रकार, जब कांग्रेस दूसरे या तीसरे नंबर पर अथवा अपनी सीटें पूर्व के विधानसभा चुनाव के मुकाबले दुगनी कर लेती तो फिर देखते क्या होता। ये सारे के सारे पत्रकार राहुल शरणं गच्छामि कहकर, राहुल गांधी की चरणवंदना में लगे रहते। हम आपको ये भी बता दें कि भारतीय राजनीति और यहां की जनता कैसे जनादेश देती हैं, वो सबको पता हैं.............कल विदेशियों के हाथ में गर ये सत्ता सौंप दें तो इस पर भी किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि यहां किसे अपने देश और समाज की बढ़ोतरी की चिंता हैं, सभी अपने आप में लगे हैं। समाजवादी पार्टी को ही ले लो। ये समाजवाद की बात करते हैं। इंदिरा गांधी के शासनकाल के समय परिवारवाद की आलोचना करनेवाले इन समाजवादियों से पूछों कि तुम आज क्या कर रहे हो। जरा देखो -- मुलायम सिंह यादव, सांसद हैं अब मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, बेटा अखिलेश यादव खुद सांसद हैं और मुलायम की बहु डिंपल ये भी सांसद बनने जा रही थी, पर जनता ने इन्हें जिताकर नहीं भेजा, गर भेज देती तो ये भी सांसद होती। जिस पार्टी की सोच, अपने परिवार पर आकर सिमट जाती हैं, वो समाजवादी कैसे हो सकता हैं। सवाल ये हैं।
सवाल ये भी हैं -- कि जिस पार्टी ने अभी सत्ता संभाला नहीं हैं। अभी तक अपना नेता चुना नहीं हैं। ये अलग बात हैं कि मुलायम ही मुख्यमंत्री होंगे और इनके बाद इनके बेटे, कांग्रेस की तरह अपनी पार्टी का झंडा ढोयेंगे, यूपी संभालेंगे। जब चुनाव परिणाम आते ही इनके गुड़ों ने अपनी औकात दिखानी शुरु कर दी तो आनेवाले समय में क्या होगा। क्या लोगों को मालूम नहीं कि गुंडों का क्या हैं, हाथी से उतरे और साईकिल पर चढ गये। समाजवादी पार्टी के लोगों ने क्या गुंडागर्दी दिखायी हैं जरा देखिये --- सपा के बहुमत की खबर आते ही यूपी के दस शहरों में सपा के गुंडों ने बवाल काटे। यूपी के संभल में सपा प्रत्याशी की जीत पर जीत में बौराएं गुंडों ने गोलियां चलायी, एक बच्चे की मौत हो गयी। झांसी में सपाईयों ने पत्रकारों को बाथरुम में बंद कर घंटों बंधक बनाये रखा। मेरठ, फैजाबाद, आगरा, संभल में स्थिति ऐसी हो गयी कि आंसूगैस के गोले छोड़ने पड़े। ये तो शुरुआत हैं, अभी पांच साल बाकी हैं। आप मानकर चलिये, कि सपा के राज में क्या होने जा रहा हैं............। पर इसके बावजूद हम चाहेंगे कि यूपी, अन्य विकसित हो रहे प्रदेशों की तरह विकसित हो, लेकिन ऐसा नयी सरकार कर पायेगी, क्योंकि गुंडे साइकिल पर बैठकर अभी से ही इतनी तेजी दिखा दी कि सारे सपने ही टूटते नजर आ रहे हैं। हां एक खुशखबरी हैं -- कांग्रेस व सपा भक्त पत्रकारों के लिए, कि वे मुलायम और अखिलेश का चरणवंदना कर अपनी किस्मत आजमायेंगे और अपने हिस्से का यूपी लूटकर, मुलायम और मुलायम के परिवार की तरह समाजवाद का असली चरित्र पत्रकारिता में दिखायेंगे।

Tuesday, February 21, 2012

वो करें तो साला कैरेक्टर ढीला हैं.............


कुछ दिन पहले, रांची से प्रकाशित एक तथाकथित अपने आपको देशभक्त, समाज को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत कहनेवाले एक अखबार के संपादक ने मुखपृष्ठ पर संपादकीय लिखा। वो संपादकीय केन्द्रित था -- कर्नाटक विधानसभा में अश्लील फिल्म देख रहे मंत्रियों तथा देश में फैल रहे भ्रष्टाचार और चरित्रहीनता पर। इस संपादकीय को देख ऐसा लगता हैं, जैसे कि संपादकीय लिखनेवाले व्यक्ति ने देश और समाज को अपने विचारों और लेखों तथा कार्यों से देश व समाज को नयी दिशा दी हैं। जबकि सच्चाई क्या हैं, जो भी व्यक्ति उक्त अखबार और उसके वेबसाईट को देखेगा तो शर्मसार हो जायेगा, साथ ही उसकी संपादकीय और बगुला भगत वाली कृत्यों से स्वयं को ठगा महसूस करेगा। जरा उसके संपादकीय को देखिये और उसके संस्थानों के कृत्यों को देखिये। आप समझ जायेंगे। मैं क्या कहना चाहता हूं। कमाल हैं। आप अखबारों में लिखते क्यों हो, उत्तर होगा - पढ़ने के लिए और वेबसाईट पर जो भी कुछ डालते हो, वो किसलिये। उत्तर हैं देखने और समझने के लिए। सबसे पहले इसी अखबार को देखिए। इसकी एक वेबसाईट हैं। जब आप इस वेवसाईट को खोलेंगे, तो इतनी गंदी- गंदी अश्लील चित्र मिलेंगी जो अश्लील फिल्मों को मात दें देगी। इस वेबसाईट में विभिन्न फिल्मों से जूड़ी अश्लील फिल्मों के कटिंग व्यापक रुप सें मिलेंगे। कई समाचार भी मिलेंगे जो सेक्स और सिर्फ सेक्स से ही जूड़ी रहती हैं। कई विदेशी मॉडलों और अभिनेत्रियों की नग्न तस्वीरे बहुतायत मिलेंगी। सेक्स और अश्लील समाचारों की तो ऐसी कड़िया इसमें हैं, कि पूछिये मत। यानी जो खुद गंदगी में भटकते हैं, उन्हें चिंता खाये जा रही हैं, देश और समाज की। पतित होते राजनीतिज्ञों और अधिकारियों की। सच्चाई ये हैं कि देश में जितने भी अखबार व मीडिया हाउस है, उसमें हाथों में लेकर गिनने के लिए एक ही दो लोग बचे हैं. जिन्हें हम चरित्रवान कह सकते हैं। सच्चाई ये हैं कि इन अखबारों और मीडिया हाउस की संपूर्णता से तकनीकी जांच करा ली जाये तो पता चलेगा कि राजनीतिज्ञों व अधिकारियों से ज्यादा अश्लील फिल्म और अश्लील खबरों को पढ़ने के शौकीन यहीं लोग हैं, जो अखबारों और मीडिया से जूड़े हैं। यानी चलनी दूसे सूप के जिन्हें बहत्तर छेद, ये करे तो रासलीला और दूसरा करें तो करेक्टर ढीला..............। पूरे देश के मीडिया हाउस में यहीं सब चल रहा हैं। देश में चरित्रवान पत्रकार, इस प्रकार से विलुप्त हो गये, जैसे देश के अभयारण्यों से चीता......। याद करिये एक समय था, जब चरित्रवान पत्रकारों की एक पौध हुआ करती थी, जब वे लिखते थे, तो इसका प्रभाव भी दिखता था। सरकार पर भी और जनता पर भी। आज देखिये ये घटियास्तर के लोग लिखते हैं पर उसका प्रभाव न के बराबर पड़ता हैं। क्यों, इस पर मंथन इन्हें खुद करना चाहिए। यहीं नहीं मैं कहता हूं कि देश में जितनें भी मीडिया हाउस हैं और जिनकी वेबसाईट हैं, सभी का एकमात्र काम यहीं रह गया हैं। भारतीय और विदेशी महिलाओं के अर्द्धनग्न तस्वीरें लोड करना और सेक्स से संबंधी समाचारों को प्रमुखता देना। ऐसे में कर्नाटक विधानसभा में मंत्रियों पर टिप्पणी करनेवाले या संपादकीय लिखनेवालों को क्या ये अधिकार हैं, कि उनके उपर कटाक्ष करें। अच्छा ये होता कि ये खुद अपना घर साफ सुथरा रखे ताकि उनके और उनके कार्यों से लोगों को सीख मिलती, ये क्या कि खुद करें तो रासलीला और दूसरा करें तो करेक्टर ढीला। ऐसे मैं एक बात में कह देना चाहता हूं कि देश में कहीं भी चरित्रहीनता की बातें आती हैं, उससे हर भारतीयों की सर शर्म से झूक जाती हैं, कारण कुछ भी हो, चाहे वो पत्रकार के कुकृत्य हो या राजनीतिज्ञों के कुकृत्य........................

Sunday, January 22, 2012

जो समाज और जहां की सरकार नपुंसक हो जाती हैं, वहां नरपिशाच राज करते हैं................


जब जीने की तमन्ना, मौत पर हावी हो जाती हैं। जब लोग मौत को गले लगाने को छोड़ जीने की आरजू पाल लेते हैं। जहां लोग साहस छोड़ कायराना हरकतों को तरजीह देते हैं। वहां नरपिशाचों की चल पड़ती हैं। आज झारखंड की राजधानी की सारी अखबारें गढ़वा के भंडरिया में नरपिशाचों (नक्सलियों) द्वारा की गयी, वहशियाना जूल्मों से अटी पटी हैं। ये नरपिशाच (नक्सली) समझते हैं कि विदेशियों के इशारे पर, चल रही उऩकी नीतियों और हरकतों से देश व समाज पर कब्जा कर लेंगे. तो मैं फिर वहीं कहूंगा कि ये उनकी सबसे बड़ी भूल हैं। वे कभी कामयाब नहीं हो सकते हैं, क्योंकि ये चीन नहीं, भारत हैं। यहां कभी वो ही ही नहीं सकता, जो इस देश की मिट्टी में रचा बसा नहीं हैं। जो कहते हैं कि बंदूक की नलियों से सत्ता हासिल होती हैं, शांति पनपता हैं, वे भूल रहे हैं, कि बंदूक सिर्फ मौत दे सकती हैं, जिंदगी नहीं और जो जिंदगी देगा ही नहीं, वो देश व समाज को नयीं दिशा क्या देगा। नरपिशाचों (नक्सलियों) को समर्थन देनेवाले कह सकते हैं कि मैंने नक्सलियों को नरपिशाच क्यों कहा। उनके लिए जवाब यहीं हैं कि गढ़वा में जिस प्रकार से वहां के थाना प्रभारी और ड्राईवर को जिंदा जलाया गया, जैप के जवानों के सर पर गोलियां दागी गयी और राज्य के अन्य इलाकों में जिस प्रकार से ये ग्रामीणों का गला रेंतते हैं, ऐसे में जो भी व्यक्ति, जिसका मानवता में विश्वास हैं, वे नक्सलियों को कभी नक्सली कह ही नहीं सकते। इनके लिए तो नये शब्दों की इजाद करनी होगी, पर मैं इनके लिए पुराने शब्दों में से ही, एक शब्द चुना हैं -- नरपिशाच। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हम भारत में रहते हैं। ये गांधी का देश, राम का देश हैं। लोहिया, जयप्रकाश, महान क्रांतिकारी भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद का देश हैं। जिसे कुछ पथभ्रष्ट राजनीतिज्ञ, पथभ्रष्ट नक्सली समर्थक पत्रकार, पथभ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी, पथभ्रष्ट असामाजिक तत्व जिनकी पैठ, आज हर विभागों में हो गयी हैं। वे इस देश को इऩ नरपिशाचों के हाथ में सौप कर अपने पड़ोसी देश, जो भारत का सबसे बड़ा दुश्मन हैं, उसके हाथों की कठपुतलियां बना देना चाहते हैं।

सर्वप्रथम, इन नरपिशाचों की यहां तू ती क्यों बोलती हैं, इस पर विचार करें --------
क. क्योंकि इनके समर्थन में समाज के तथाकथित अपने आपको प्रगतिशील कहलानेवाले अरुंद्धति राय, अग्निवेश जैसे अतिप्रबुद्ध वर्गों की टोली हैं, जो समय समय पर यहां आकर, विभिन्न गोष्ठियां आयोजित कर इनके समर्थन में बहुत कुछ बोलकर, इनका सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाते रहते हैं।
ख. इन नरपिशाचों के समर्थन में बड़े वामपथी पत्रकारों की टोली भी हैं, जो इनका समर्थन करती रहती हैं और समय समय पर दिशा निर्देश करती रहती हैं।
ग. आदिवासी इलाकों में आदिवासियों को उनके मूल धर्म से हटाकर, पथभ्रष्ट करानेवाली अनेक संस्थाएं यहां चल रही हैं, जो चाहती हैं कि यहां इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का बोलबाला रहें ताकि उनके इस आतंक का फायदा उठाकर वे धर्मांतरण का कार्य आसानी से कर सकें। इसी मूल उद्देश्यों को लेकर ये संस्थाएं इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का खुलकर समर्थन करती हैं। आप देंखेंगे कि इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का समर्थन करनेवाली गोष्ठियां, इन्हीं संस्थाओं में आयोजित होती हैं।
घ. झारखंड की सभी राजनीतिक पार्टियां और इसमें शामिल राजनीतिज्ञ प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रुप से इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को आर्थिक मदद करती रहती हैं और समय - समय पर इन्हें अपना भाई - बंधु कहकर इनका मनोबल बढ़ाती रहती हैं। साथ ही ये राजनीतिज्ञ दल जब विकास संबंधी बजट बनाते हैं तो ये ध्यान रखते हैं कि इस बजट का एक हिस्सा, उन्हें इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को भी देना हैं, इसलिए उनका हिस्सा का ये खास ध्यान रखते हैं, और ये राशियां बिना किसी मेहनत के उन नरपिशाचों (नक्सलियों) तक आराम से पहुंचती हैं।
ड. राजनीतिज्ञों की इसी उदारता का ये नरपिशाच विशेष ध्यान रखते हैं और इनके इशारों पर कभी कभी विभिन्न घटनाओं को अंजाम भी देते हैं, जैसे कभी - कभी ये नरपिशाच (नक्सली) चुनाव के समय, बूथ मैनेजमेंट का भी काम कर देते हैं और समय - समय पर किसी व्यक्ति अथवा किसी पिकेट को उड़ाने से भी बाज नहीं आते।
च. यहां खुफिया विभाग पूरी तरह फेल हैं। खुफिया विभाग के अधिकारी तो पत्रकारों की गणेश परिक्रमा करते रहते हैं और जो पत्रकार उन्हें बता देते हैं, उसी पर उनको गुमान हो जाता हैं। सच्चाई ये हैं कि खुफिया विभाग के किसी वरीय अधिकारी या कनीय अधिकारी अथवा कर्मचारी को ताकत नहीं कि वो इन नरपिशाचों (नक्सलियों) के बारे में सही सहीं जानकारी इक्ट्ठी कर लें। पुलिस की तो बात ही दूर हैं। खुफिया विभाग दुरुस्त रहती तो गढ़वा कांड जैसे कांड बार - बार हमें देखने व सुनने को नहीं मिलते। यहीं नहीं यहां के सारे के सारे वरीय पुलिस अधिकारी, राजनीतिज्ञों से सांठ गांठ कर आराम की जगहों पर रहना चाहते हैं, कोई नरपिशाचों (नक्सलियों) को चुनौती देना नहीं चाहता। उनसे लडऩा नहीं चाहता। क्यों - क्योंकि वो जानता हैं कि इन नरपिशाचों (नक्सलियों) पर उनके राजनीतिज्ञ और अन्य वरीय पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों का वरद् हस्त प्राप्त हैं। इसलिए वो सामंजस्य बनाने पर ज्यादा ध्यान देता हैं। और भूले भटके जब कभी ये पुलिस अधिकारी इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को पकड़ लेते हैं तो ये इन नरपिशाचों के प्रति आदरसूचक शब्द का प्रयोग करते हैं, जैसे लगता हैं कि उसने देश व समाज को नयीं दिशा देने के लिए अवतरित हुआ हैं।
अर्थात् गर आप चाहे कि इस प्रांत से इन नरपिशाचों को निकाल कर फेंक दें. नहीं फेंक सकते, क्योंकि हर डाल पर उल्लू बैठा हैं, अंजामें गुलिस्तां क्या होगा।

नरपिशाचों (नक्सलियों) के उद्देश्य -------
जब कभी ये नरपिशाच (नक्सली) अथवा इनके समर्थक मिल जायेंगे तो ये कहेंगे कि वे व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका मूल उद्देश्य भ्रष्टाचार मुक्त समता मूलक समाज बनाना हैं पर सच्चाई ये हैं कि ये शत प्रतिशत एक पड़ोसी देश के इशारों पर काम कर रहे हैं, इनके मधुर संबंध तो कहा जाता हैं कि पाकिस्तान के आईएसआई से भी हैं, जो देश में आतंक फैलाकर भारत को विनाश के कगार पर ला खड़ा करना चाहता हैं। ये व्यवस्था परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरी तरह से भारत को एक साम्राज्यवादी पड़ोसी देश का गुलाम बना देना और उसके एवज में अपना ऐशो आराम चाहते हैं ताकि वे अपनी मनमर्जी से मार काट मचा सकें। ये भारत में लोकतंत्र नहीं बल्कि चीन का शासन चाहते हैं, जहां किसी को बोलने की इजाजत ही नहीं।
ये नरपिशाच गांव के भोले भाले ग्रामीणों और वहां के युवाओं के हाथों में तो एके 47 थमा देना चाहते हैं पर अपने पारिवारिक सदस्यों को देश के महानगरों में या विदेशो में पढ़ने अथवा जीवन यापन के लिए भेजते हैं। गांव की लड़कियों और महिलाओं की क्या स्थिति हैं, जहां इनका दबदबा चलता हैं। ये यहां लिखने की जरुरत नहीं, बस एक बार इन गांवों में केवल घूम लेने की जरुरत हैं, पता लग जायेगा। गर आपसे इनकी दुश्मनी हो गयी तो बस आपको पुलिस का मुखबिर बताकर गला काट देंगे। गर आप इनके प्रभावित क्षेत्रों में घूमने निकलेंगे तो आपको इसकी इजाजत नहीं होगी, गर आपने इनकी इजाजत के बिना घूमा या किसी से बातचीत की, तो आपकी खैर नहीं, आपको अपने जान से हाथ धोना पड़ेगा। पूरी तरह से तालिबानी हुकुमत हैं यहां।
इन नरपिशाचों (नक्सलियों) की यहां क्यों चल पड़ी --------
क. इसलिए चल पड़ी, क्योंकि गांवों में संभ्रांत और सज्जन लोगों ने अपनी भूमिका सीमित कर दी और विकासात्मक कार्यों और सामाजिक कार्यों में अपनी निष्क्रियता शुरु कर दी। नतीजा समाज के भ्रष्ट और असामाजिक तत्व सक्रिय हो गये।
ख. भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पत्रकारों तथा भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों के तिकड़ियों ने गांव की सामाजिक संरचनाओं को बिगाड़ना शुरु कर दिया, और गांव के प्रत्येक घर में एक दूसरे के खिलाफ ऐसी विषवमन कर दी कि गांव के लोग आपस में ही लड़ने शुरु कर दिये और इऩ भ्रष्ट तिकड़ियों की चल पड़ी। जब नरपिशाचों (नक्सलियों) का ऐसे में इऩ गांवों में आगमन हुआ तो उन्होंने इस विधि को अपने ढंग से लेना शुरु किया, नतीजा सामने हैं।

भविष्य ---------
भारत का भविष्य सुखद हैं। हिंसा से कभी भी, इस देश में क्रांति नहीं आयी हैं। जिस देश में हिंसा से क्रांति हुई हैं और व्यवस्था परिवर्तन होता दिखा तो वहां व्यवस्था चिरस्थायी नहीं रही। भारत एक महान देश हैं और ऐसे देश में इन नरपिशाचों की नहीं चलेगी। आप मानकर चलिये, क्योंकि जब देश में पंजाब और असम से आतंक खत्म हो गया। कश्मीर में अलगाववादियों और देशद्रोहियों की नहीं चल पायी तो फिर नरपिशाचों (नक्सलियों) की भी यहां नही चलेगी। आप मानकर चलिये। चाहे इनका नेटवर्क आपके घर में भी क्यों न पहुंच गया हो, इनका नेटवर्क काम नहीं करेगा, क्योंकि हर घर में राम और गांधी बसते हैं। यानी सत्य और अहिंसा बसती हैं।
एक बात और कुछ लोग कहते हैं कि नक्सली गतिविधियां इसलिए बढ़ी, क्योंकि गांवों में विकास कार्य नहीं हुए। ये कहनेवाले को मैं बता देना चाहता हूं कि गरीबी और निरक्षरता -- हिंसा नहीं सिखाती। गर ऐसा होता तो इस देश की जो दशा हैं, ऐसे में हर घर में नक्सली होता, नरपिशाच होते। पर ऐसा हैं नहीं। हमारे देश में तो कई संत मुफलिसी में गुजार दिये। कबीर की वो पंक्ति नहीं पढ़ी क्या -------- मन लागा, मेरा यार फकीरी में.......................।

Thursday, January 5, 2012

श्रीश्री परमहंस योगानंद जी का जन्मोत्सव रांची के योगदा आश्रम में..............

पूर्व जन्म का सुकर्म कहे या वर्तमान का प्रयास। हमें पता नहीं, पर इतना जरुर कहुंगा कि आज उस वक्त बहुत आनन्द और शांति की प्राप्ति हुई, जब मैं आज योगदा आश्रम पहुंचा। कल ही मेरे छोटे बेटे हिमांशु ने कहा था कि पापा जी 5 जनवरी को स्वामी योगानन्द जी का जन्मोत्सव हैं, क्या आप आश्रम चलेंगे, इच्छा थी चलने की पर बोल नहीं पाया था। आज सुबह में हिमांशु ने स्वामी योगानंद जी के बारे में अखबार में कुछ पढ़ने की कोशिश की, पर उसे निराशा हाथ लगी, क्योंकि स्वामी योगानंद जी के बारे में किसी अखबार ने कुछ विशेष डालने की कोशिश नहीं की थी। मेरे यहां प्रभात खबर आता हैं, पर उसमें भी सिर्फ सूचना ही थी, स्वामी योगानंद जी के बारे में कुछ नहीं था। मेरा रांची से संपर्क 5 जून 1985 को पहली बार हुआ था, मेरी पत्नी पहली बार योगदा आश्रम लायी थी, कब लायी थी, मुझे पता नहीं। पर जब वो यहां लायी थी तब उतना प्रेम का ज्वार इस आश्रम के लिए नहीं था, पर जैसे जैसे रांची से मेरा संपर्क बढ़ता गया, पता नहीं क्यों और कैसे योगदा आश्रम में मेरी दिलचस्पी बढ़ती गयी। योगदा आश्रम और उसकी आबोहवा ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैं अपने दोनों बच्चों का नामांकन ही योगदा सत्संग विद्यालय में करा दिया। मेरे दोनों बच्चे योगदा सत्संग से ही मैट्रिक की परीक्षा पास की हैं। बड़े बेटे सुधांशु ने 2004 का दयामाता गोल्ड मेडल एवार्ड भी जीता हैं। जब मेरा छोटा बेटा हिमांशु सातंवी में पढ़ रहा था तब मुझे पता चला था कि योगदा आश्रम में छठी कक्षा के बच्चों के लिए एक विशेष साधना शिविर लग रही हैं। मैंने योगदा आश्रम के साधकों और योगदा सत्संग के प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र से बड़ा अनुरोध किया था कि वे हिमांशु को थोड़ा इस साधना शिविर में जगह दें। शिविर छठी कक्षा के लिए थी, पर मेरे अनुरोध को स्वीकार कर लिया गया। उस साधना शिविर से लौटने के बाद मैंने अपने बेटे हिमांशु में काफी परिवर्तन देखा जो आज भी मुझे प्रभावित करती हैं। पत्रकार के रुप में पत्रकारिता कार्य हेतु कई बार मुझे इस आश्रम में जाने का मौका मिला, पत्रकारिता की, पर योगदा आश्रम के अनुभव, को शब्दों में अभिव्यक्त करने की मुझमे क्षमता नहीं। जब भी गया, स्वामी योगानंद जी के चित्र और उनकी दिव्य आंखों को मैं देखता ही रह जाता हूं, जैसे लगता हैं कि वे मुझसे कुछ कह रहे हो। एक बार फिर, आज उस आश्रम में जाने का मौका मिला - दोनों बच्चे मेरे साथ थे। बड़ा आनन्द आया, क्योंकि आश्रम के एक एक स्थान को मनःस्पर्श करने की ठानी थी, इच्छा पूरी हो गयी। लगा कि मैंने कुछ पाया हैं। सचमुच 5 जनवरी 1893 को जब स्वामी योगानंद धरती पर अवतरित हुए होंगे तो वो दिन कैसा रहा होगा। वो लोग कितने धन्य होंगे, जिन्हें स्वामी योगानंद जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ होगा। ऐसे तो सम्पूर्ण रांची 5 जनवरी को इस आश्रम में सिमटती नजर आती हैं, सभी स्वामी योगानंद जी के चित्र के आगे नमन कर रहे होते हैं, उसके पश्चात प्रसाद ग्रहण कर, स्वयं को तृप्त करते हैं। मैं चाहुंगा कि स्वामी योगानंद जी की कृपा सब पर बनी रहें ताकि लोग एक दूसरे से प्रेम करना सीखें ताकि भगवद् कृपा सब पर सदैव बनी रहे। स्वामी योगानंद जी को मेरे समस्त परिवार की ओर से शत शत नमन...........................