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Tuesday, February 28, 2017

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास में क्या अंतर हैं...........

बच्चों,
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास में क्या अंतर है? वर्णन करें।
उत्तर – बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास में निम्नलिखित अंतर है...
1. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी बुद्धिमता और कार्यकुशलता के आधार पर बिहार के मुख्यमंत्री बने, जबकि रघुवर दास भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कृपा पर झारखण्ड के मुख्यमंत्री बने है।
2. बिहार के मुख्यमंत्री शराब बिक्री पर प्रतिबंध लगाते है, जबकि झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास शराब पिलाकर जनता को काल के गाल में समाने का प्रबंध करते है।
3. बिहार के मुख्यमंत्री सुशासन बाबू के नाम से जाने जाते है, जबकि झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास, शाहरुख खान के नाम से जाने जाते है।
4. बिहार के मुख्यमंत्री गुरु गोविंद सिंह महाराज की 350वीं जयंती को इस प्रकार से मनाते है कि सारा विश्व उनका मुरीद हो जाता है, जबकि झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास मोमेंटम झारखण्ड कराते है जो रांची में ही रहकर सिमट जाता है, यहां तक कि देश के ही बहुत बड़े उद्योगपति इनके कार्यक्रम से दूरी बना लेते है।
5. बिहार के मुख्यमंत्री के कार्यों से वहां के आईएएस की हालत पस्त रहती है, जबकि झारखण्ड के आईएएस के कार्यों से झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की हालत पस्त रहती है।
6. बिहार में तीन दलों की सरकार होने के बावजूद वहां नीतीश कुमार की तू-ती बोलती है, जबकि झारखण्ड में पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद यहां रघुवर सरकार की नहीं, बल्कि कनफूंकवों की चलती है।
7. बिहार में लड़कियों-महिलाओं का सम्मान सुरक्षित है, पर झारखण्ड में स्वयं मुख्यमंत्री रघुवर दास द्वारा चलाये जा रहे मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में महिलाएं सुरक्षित नहीं, और जब ये महिलाएं मुख्यमंत्री तक अपना आवाज बुलंद करती है, तो उनकी आवाज को सख्ती से दबा दिया जाता है।
8. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यक्रम में वहां कोई आईएएस अधिकारी भाषण नहीं देता, झारखण्ड में मुख्यमंत्री रघुवर दास इनका मनोबल बढ़ाते है, ताकि आनेवाले समय में ये अधिकारी लोकसभा या विधानसभा का चुनाव लड़ सके।
9. बिहार का सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग से निकला विज्ञापन राज्य का मान बढ़ाता है, जबकि झारखण्ड का सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग अपने ही विज्ञापन में राज्य को बंगाल की खाड़ी में फेंक देता है, राज्यपाल का सम्मान नहीं करता और अपने पुरुष मंत्री को स्त्री मंत्री के रुप में पेश करता है।
10.  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का वक्तव्य लेने के लिए, सुनने के लिए मीडिया तरसती है, जबकि झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का वक्तव्य मजाक का पात्र बन जाता है, उदाहरण अनेक है – फिलहाल फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने ही इनकी हवा निकाल दी है।

Friday, January 27, 2017

धिक्कार रांची की मीडिया और मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र को ...............

धिक्कार...
रांची की मीडिया को जिन्होंने रांची की बेटियों की आवाज सुनने से इनकार कर दिया...
धिक्कार उस सरकार को जिसे पता ही नहीं कि उनकी बेटियों के संग उन्हीं के नाक के नीचे क्या हो रहा है...
रांची स्थित सूचना भवन में चल रहे मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिलाकर्मियों ने राज्य महिला आयोग को पत्र लिखा है कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत वरीय अधिकारियों एवं नियोक्ता के द्वारा उनके साथ बराबर दुर्व्यवहार किया जाता है, अपमानित किया जाता है... इन महिलाकर्मियों ने उक्त पत्र की प्रतिलिपि राष्ट्रीय महिला आयोग नई दिल्ली, प्रधानमंत्री भारत सरकार, मुख्यमंत्री झारखण्ड, राज्यपाल झारखण्ड, मुख्य न्यायाधीश झारखण्ड, मंत्री महिला एवं बाल विकास, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव और सचिव को भी भेजा है... इन महिलाकर्मियों ने अपने पत्र में लिखा है कि...
क. मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र के वरीय अधिकारियों और नियोक्ता का व्यवहार अपने महिला संवादकर्मियों के प्रति बेहद आपत्तिजनक और अशोभनीय होता है।
ख. यहां कार्यरत वरीय अधिकारियों के करतूतों से अखबार के पन्ने रंगे हुए है, पर इन वरीय अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, उदाहरणस्वरुप रांची के सुखदेवनगर थाने में इसी मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत एक महिलाकर्मी द्वारा दर्ज करायी गयी वह प्राथमिकी है, जिसकी सुनवाई भी नहीं हुई और मामले को रफा-दफा करते हुए जिस लड़की ने एफआईआर दर्ज कराया था, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
ग. जब भी कोई महिलाकर्मी बाथ रुम जाती है, तो उसका पीछा किया जाता है, उनके साथ ऐसी हरकतें की जाती है, जिसका उल्लेख वो इस पत्र में नहीं कर सकती।
घ. यहां के नियोक्ता द्वारा बराबर सामूहिक स्तर पर महिला संवादकर्मियों को अपमानित व प्रताड़ित किया जाता है।
ड. एक ही कार्य के लिए नियुक्त कई महिला संवाद कर्मियों को चेहरे देखकर वेतन का भुगतान किया जाता है, जिसमें किसी को पांच तो किसी को दस हजार वेतन भुगतान किया जाता है।
च. दो वर्ष हो गये पर किसी को भी नियुक्ति पत्र नहीं दी गयी।
छ. हाल ही में एक सप्ताह पूर्व बिना किसी सूचना के संवादकर्मियों का परीक्षा लिया गया, क्या बतायेंगे कि नियोक्ता ने यह परीक्षा किसके कहने पर और क्यों ली?
ज. भारत सरकार का आदेश है, जहां बड़ी संख्या में लड़कियों या महिलाओं का समूह कार्य करता है, वहां आंतरिक शिकायत समिति का होना जरुरी है, जिसका अध्यक्ष वहां कार्यरत वरीय महिलाकर्मी को बनाये जाने का प्रावधान है, पर आज तक सूचना भवन में मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में जहां बड़ी संख्या में लड़कियां कार्य करती है, वहां आंतरिक शिकायत समिति का गठन क्यों नहीं हुआ? ऐसे में लड़कियां किससे शिकायत करेंगी?
और अब सवाल सीधे मुख्यमंत्री रघुवर दास से...
मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, क्या आपको याद है कि जब ३ मई २०१६ को रांची के सूचना भवन में जब मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की पहली वर्षगांठ मनायी जा रही थी, तब जिन लड़कियों ने आपको मिठाई खिलाई थी, जिन्हें आपने शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया था, वह मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में आपके इस सम्मान देने के बाद एक महीने भी क्यों नहीं टिक पाई?
क्या आपको याद है कि आपके सचिव सुनील कुमार बर्णवाल ने यहीं पर कार्यरत प्रियंका पल्लवी के बारे में उस दिन आपके समक्ष क्या कहा था? मैं बता देता हूं, उन्होंने कहा था कि ये लड़की बहुत अच्छा काम कर रही है, फिर भी ऐसा क्या हुआ कि उस प्रियंका पल्लवी को एक महीने के अंदर ही बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया गया। हमारे पास एक से एक प्रमाण है, जो बताने के लिए काफी है कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, पर आपके अधिकारी इन सारी हरकतों से आंखें मूंदे है, मैं पूछता हूं, आखिर क्यों?
मेरे पास कई प्रमाण है, आइये दिखाता हूं मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की हरकतें। आप कहते कि ७० प्रतिशत शिकायतों का निष्पादन हो गया, यह सफेद झूठ के सिवा दूसरा कुछ भी नहीं... आकड़ें बिठाकर, दिखाने में आप जो आगे निकलने की कोशिश कर रहे है, वो सहीं नहीं है, सच्चाई कुछ और ही है, ये आंकड़े कैसे बैठाये जा रहे है, वो हम जानते है... अगर ये लड़कियां कह रही है कि आंतरिक शिकायत समिति का गठन अब तक क्यों नहीं की गयी तो गलत क्या है? फिर भी आप कहेंगे कि आंतरिक शिकायत समिति का गठन किया गया है, तो मैं आपसे पूछता हूं कि उस महिला का नाम बताइये जो इसका अध्यक्ष बनी और अगर अध्यक्ष बनी है तो कब बनाई गयी?
यहीं नहीं आप जो श्रम कानूनों के सरलीकरण का ढिंढोरा पीटते है कि यहां श्रम सुधारों में झारखण्ड विश्व बैंक के मानकों के आधार पर प्रथम स्थान पर है तो आप ही बताइये कि आप ही के देखरेख में चलनेवाले मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिला संवादकर्मियों को अब तक नियुक्ति पत्र क्यों नहीं मिला?
एक तरह से देखा जाये तो इसके लिए आप भी दोषी है... ये अलग बात है कि आपके खिलाफ कोई नहीं बोलता और वह भी सिर्फ इसलिए कि जो लोग गलत कर रहे है, वे आपसे अनुप्राणित है, अनुप्राणित होनेवाले वे सारे लोग है जो किसी न किसी रुप से आपसे कुछ न कुछ प्राप्त कर रहे है, चाहे प्रत्यक्ष रुप से या अप्रत्यक्ष रुप से। जरा देखिये, यहां के मीडिया को चाहे वह प्रिट हो या इलेक्ट्रानिक मीड़िया, सभी इस समाचार को खा-पका गये, क्योंकि मामला मुख्यमंत्री से जुड़ा है, क्योंकि मामला विज्ञापन से जुड़ा है, क्योंकि मामला मुख्यमंत्री से पत्रकारों के मधुर संबंधों का है... और ये हरकतें राज्य के लिए शर्मनाक है... अरे जब बेटियां मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में अपमानित महसूस कर रही है तो अन्य जगहों पर इन बेटियों का क्या होता होगा, समझने की जरुरत है, अरे जब मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिलाओं-बेटियों को सम्मान नहीं, तो हम ये कैसे समझ लें कि बुटी में जिस लड़की की दुष्कर्म के बाद नृशंस हत्या हुई, उसके अपराधियों को पकड़ने में रांची पुलिस सफल हो जायेगी। अरे ये तो सीबीआई को जैसे ही मामला दिया गया, उसी दिन पता चल गया कि यहां की सरकार कैसे और किस प्रकार शासन कर रही है? फिर भी, इतना होने के बावजूद, उन दो लड़कियों को सलाम, जिसने मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में हो रहे गड़बड़ियों पर समाज का ध्यान आकृष्ट कराया और अपनी बातें हर जगह पहुंचाने की कोशिश की... ये अलग बात है कि रांची से प्रकाशित करीब सारे अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इनकी आवाज अनसुनी कर दी... इन लड़कियों की आवाज को वे जगह देंगे भी कैसे, जो स्वयं भ्रष्टाचार की गंगोत्री में स्नान कर रहे है, वे क्या किसी की मदद करेंगे?

Monday, July 27, 2015

सरकार कायर है, पर जनता नहीं.........

सरकार कायर है, पर जनता नहीं.........
जनता ऐसे अखबारों/चैनलों का बहिष्कार करें, ऐसे पत्रकारों का बहिष्कार करें.............
• जिन्हें नेताओं में खुदा दीखता हो(आजकल रांची से प्रकाशित एक अखबार को नीतीश कुमार में खुदा दीख रहा है)........
• जो झूठी खबरें बार-बार प्रकाशित करता हो(एक अखबार ने छाप दिया कि राज्यपाल की गाड़ी बीस मिनट तक खड़ी रही, गाड़ी में पेट्रोल नहीं रहने के कारण)........
• जो विज्ञापन के लिए सामाजिक ताना-बाना को तोड़ता हो, और बिल्डरों-गुंडों को, अपने अखबारों में, देश के दिवंगत महान नेताओं की तरह पेश करता हो.......
• जो बिल्डरों से अपने कार्यक्रम को संपन्न कराने के लिए मुंहमांगी रकम वसूलता हो, और वह बिल्डर झारखंड की आम जनता के पैसे को चकमा देकर लूट लेता हो.........
• जो अपने मातहत कार्य करनेवाले, कर्मचारियों और पत्रकारों को सही समय पर तो दूर, उन्हें उचित पारिश्रमिक नहीं देते हो, जिस पारिश्रमिक के बारे में केन्द्र सरकार या राज्य सरकार ने एक मानदंड स्थापित किया हो..........
देश आपका, प्रदेश आपका। जिम्मेवारी आपकी भी बनती है। क्या प्रतिदिन, आप चार-पांच रुपये में अखबार, सिर्फ इसलिए खरीदते हैं कि वे जो मन करें, छाप दें और आप उसे पढ़ने के लिए मजबूर हो। आप चैनल वालों को हर महीने दो सौ से तीन सौ रुपये इसलिए देते हैं कि वे जो मन करें वो दिखाएँ और आपके परिवार, समाज और देश का माहौल खराब कर दें। नहीं न, तो फिर आज ही इनके खिलाफ कमर कसिए और हल्ला बोलिए, पर गांधीवादी तरीके से..........

Sunday, March 24, 2013

यहां तो नेता, मंत्री, पत्रकार, ब्यूरोक्रेट्स और पुलिस सभी खतरनाक जानवर की श्रेणी में हैं..............................

कभी - कभी भारतीय राजनीतिज्ञों को दिव्य ज्ञान हो जाता हैं और वो इस दिव्य ज्ञान के सहारे एक से एक बयान दे देते हैं। इन बयान देनेवालों की सर्वाधिक संख्या गर किसी पार्टी में हैं तो वो हैं - कांग्रेस पार्टी। झारखंड के राज्यपाल सैय्यद अहमद को तो दुनिया के सारे सद्गुण सोनिया गांधी में ही दिखाई पड़ते हैं। दिखाई पड़े भी क्यों नहीं, क्योंकि सोनिया की कृपा से ही तो वे झारखंड में राष्ट्रपति शासन का मजा ले रहे हैं। इसलिए अपने भाषण में गाहे-बगाहे, सोनिया जी की जय-जयकार करते रहते हैं। इधर झारखंड में सर्वाधिक समय देनेवाले और दिलचस्पी रखनेवाले जयराम रमेश ने कुछ ऐसा बयान दे दिया कि यहां के सारे के सारे ब्यूरोक्रेट ही अचंभित हैं। वो भी इसलिए कि इन ब्यूरोक्रेट्स से क्या गलती हो गयी कि जयराम रमेश ने ऐसा बयान दे डाला। झारखंड के ब्यूरोक्रेट्स तो हरदम, केन्द्र सरकार में शामिल नेताओं व मंत्रियों के आगे नतमस्तक रहते हैं, जो वे काम कहते हैं चाहे उससे झारखंड का कबाडा़ ही क्यों न निकल जाये। वो काम करने में विश्वास रखते हैं। जरा देखिये, जयराम रमेश ने क्या बयान दिया हैं। इन्होंने शनिवार को रांची में एक निजी अस्पताल के कार्यक्रम में अधिकारियों की तुलना खतरनाक जानवर से कर दी। इसके पहले भी जयराम ऐसे-ऐसे बयान दिये हैं, जिससे कांग्रेस के लोग कभी अचंभित हो गये थे। जब उन्होंने यह कह दिया था कि देश में मंदिरों से ज्यादा महत्वपूर्ण शौचालय  हैं।
सवाल उठता हैं जयराम रमेश जी के इस बयान पर हम आश्चर्य करे या उनकी मूर्खता पर हम सवाल उठाये। जयराम रमेश ने जो आज उदारतापूर्वक ये बयान दिया। क्या उन्हें ये नहीं पता कि जिन अधिकारियों की तुलना वे खतरनाक जानवर से कर रहे हैं। उन्हें खतरनाक जानवर, इन्हीं के पार्टी के महानुभावों के कुकृत्यों ने बनाया हैं। जब देश की सेवा का दंभ भरनेवाले, घोटालों का कीर्तिमान बनाने का प्रयत्न करेंगे तो ये बेचारे अधिकारी क्या करेंगे, ये भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर, समय की रफ्तार को देखते हुए काम करेंगे। नहीं तो होगा वहीं, मंत्री-नेता मालामाल और ये बेचारे फिसड्डी हो जायेंगे। इसलिए ये अधिकारी मौके का नजाकत समझते हुए, नेताओं के साथ, उनके विचारों के साथ तालमेल बिठाते हुए बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। मैं तो रांची में रहकर कई नेताओं और अधिकारियों को देखा हुं जो सचमुच खतरनाक जानवरों जैसा कुकृत्य कर रहे है। कानून की धज्जियां उड़ाते हुए, इतना धन इकट्टा कर लिया हैं कि अब इन्हें कोई चुनौती देने की ताकत भी नहीं रख सकता। यहीं नहीं राजधानी बनने के बाद रांची में गर सर्वाधिक अपार्टमेंट्स बने हैं या उन अपार्टमेंट्स में सर्वाधिक फ्लैट्स पर कब्जा किसी का जमा हैं तो ये चाहे तो नेता हैं, या मंत्री हैं, या अधिकारी हैं, या पत्रकार। आम जनता यहां कहां हैं। आम जनता तो आज भी राजभवन के समक्ष प्रदर्शन करती हैं कि उनका पैसा कई लोगों ने सब्जबाग दिखाकर लूट लिये हैं, पर  होता क्या हैं। सच्चाई तो ये हैं कि नेताओं, अधिकारियों और पत्रकारों की टीम ने मिलकर ऐसी लूट मचा रखी हैं कि पूछिये मत। एक उदाहरण देखिये। रांची में संजीवनी बिल्डकॉन ने गोरखधंधा चलाया। पुलिस और ब्यूरोक्रेट्स, नेताओं और मंत्रियों साथ ही साथ राजधानी के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ मिलकर गोरखधंधा चलाया। आम जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर वो चलता बना, आखिर वो किसके बल पर किया। कौन लोग उससे उपकृत होते थे. क्या किसी को पता नहीं। हद तो तब हो गयी, जब इस संस्था के मालिक को झारखंड रत्न भी प्रदान कर दिया गया। जहां ऐसे ऐसे घटिया सोच वाले, खतरनाक जानवर सम्मिलित होकर झारखंड को लूट रहे हो, वहां केवल ब्यूरोक्रेट्स को खतरनाक कहना तो सरासर गलत हैं। जयराम रमेश को उदारतापूर्वक ये बयान देना चाहिए था कि झारखंड में ब्यूरोक्रेट्स, नेता, मंत्री, पुलिस और पत्रकार सभी खतरनाक जानवर हैं और इसे बचाने के लिए जयराम रमेश अथवा कांग्रेसियों को जरा भी दुख करने की जरुरत नहीं हैं, क्योंकि उनके इस नकली दुख व्यक्त करने की कला, जनता जानती हैं, बस समय का इंतजार करिये, जनता उठेगी और सब को उचित समय पर जवाब देगी.......................................

Tuesday, March 5, 2013

सोनिया जैसी क्यूं बने राज्यपाल महोदय, देश में अन्य वीरांगनाओं की कमी हैं क्या....................................

झारखंड के राज्यपाल डा. सैय्यद अहमद ने राज्य की महिलाओं से अपील की हैं कि वो इंदिरा गांधी, लक्ष्मीबाई या सोनिया गांधी जैसी बनकर देश का विकास करें। इंदिरा गांधी बनना, लक्ष्मीबाई बनना तो हमें समझ में आता हैं, पर सोनिया बनना और उसका विकास से जुड़ जाना हमें समझ में नहीं आया। खासकर तब, जब इस महिला ने भारत के प्रधानमंत्री को नाइटवाच मैन बना दिया हो, जो प्रधानमंत्री अपने ढंग से सोच नहीं सकता और न ही कोई फैसला ले सकता हो, जिस महिला ने रेलमंत्री पवन कुमार बंसल को जी हूजुरी करना सिखाया हो। मैं उस पवन कुमार बंसल की बात कर रहा हूं, जिसने इस बार रेलवे बजट के दौरान राजीव गांधी को इसलिए याद किया, कि उन्होंने बंसल को राजनीति के क्षेत्र में कहां से कहां पहुंचा दिया, जिसने सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र से उपर जाने की कोशिश तक नहीं की हो, उस सोनिया को इंदिरा और लक्ष्मीबाई की श्रेणी में ला खड़ा करना - बुद्धिमानी हैं या चाटुकारिता। हमें लगता हैं कि ये बताने या समझाने की जरुरत नहीं। ऐसे भी सामान्य व्यक्ति, जिसकी कोई औकात नहीं हो, और उसे किसी की कृपा से, कोई बड़ी जगह मिल जाती हैं तो उसे उस व्यक्ति को याद करना मजबूरी होती हैं, जब तक वह जिंदा रहता हैं, अथवा जिसकी कृपा से वह बार -बार उपकृत होता रहता हैं। सोनिया ने देश को कहां पहुंचा दिया वो तो इस साल का प्रस्तुत बजट ही साफ - साफ बता देता हैं। 
इधर झारखंड के राज्यपाल द्वारा विभिन्न चैनलों को दिये गये विज्ञापन भी बहुत कुछ कह देते हैं कि यहां किसका शासन हैं। आप इस विज्ञापन को साफ - साफ देखे, जिसमें एक उद्घाटन के दौरान राज्यपाल सैय्यद अहमद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व रांची के सांसद सुबोधकांत सहाय के साथ दीख रहे हैं। ये तस्वीर ही साफ साफ बयां करती हैं कि यहां राष्ट्रपति शासन कम और कांग्रेस का शासन ज्यादा हैं। जो अभी कुछ महीनों तक चलेगा और फिर इसी आधार पर विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए वोट भी मांगे जायेंगे। ये कहकर कि देखिये हमने राष्ट्रपति शासन के दौरान - कैसे झारखंड की कायाकल्प कर दी। हालांकि कायाकल्प हुआ या झारखंड और नीचे चला गया, इसका आकलन करना अभी ठीक नहीं हैं। अभी तो एक महीने ही हुए हैं और इस एक महीने के दौरान, ट्रेन का हाईजेक होना, चतरा में सांप्रदायिक दंगा का होना और रांची में एक व्यापारी का अपहरण कर हत्या कर देने की घटना बहुत कुछ बता देती हैं कि राज्य में किस प्रकार से शासन चल रहा हैं।
देश का दुर्भाग्य हैं कि इधर जितने भी राज्यपाल हो रहे हैं, चाहे वे किसी भी प्रदेश के क्यूं न हो। वे संवैधानिक कम, पर किसी पार्टी के प्रति और उससे भी बढ़कर उसके सुप्रीमो के प्रति ज्यादा वफादार होने का सबूत देने के लिए मौके तलाशते रहते हैं, हो सकता हैं कि कुछ लोग, एक अखबार में छपे, राज्यपाल के इस बयान को बतौर सोनिया तक भी अब तक भेज दिये हो, कि मैडम देखिये - झारखंड के महामहिम, आपको कितना सम्मान देते हैं, आप तो लक्ष्मीबाई और इंदिराजी की श्रेणी में आ गयी। मैंडम आप धन्य हैं और धन्य हैं झारखंड के राज्यपाल, जिनकी इतनी सुंदर सोच हैं। ऐसे ही कांग्रेसियों से देश व राज्य का भला होगा, दूसरे से नहीं।
 

Monday, November 14, 2011

झारखंड निर्माण के 11 वर्ष -------------------

15 नवम्बर 2000 बिहार के कुछ जिलों को मिलाकर एक नया झारखंड प्रांत उदय ले रहा था। झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री के रुप में बाबू लाल मरांडी ने शपथ ली थी, प्रथम राज्यपाल बनने का सौभाग्य प्रभात कुमार को मिला था, जबकि विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष बनने जा रहे थे - इंदर सिंह नामधारी। नया प्रांत, नये सपनों के साथ जन्म ले रहा था। इसके पूर्व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजद के नेता लालू प्रसाद यादव ने ताल ठोक दी थी कि झारखंड उनके लाश पर बनेगा, पर उनके रहते झारखंड बन चुका था। जब झारखंड जन्म ले रहा था, तो वे रांची में भी थे, पर उनका जादू धीरे धीरे इस इलाके में विलुप्त हो रहा था, या हम कह सकते हैं कि उनका सितारा बुलंदियों से नीचे की ओर सरकना शुरु हुआ था जो आज भी सरकता ही जा रहा हैं। लालू और उऩके जैसे कई नेता ये भी कहते थे कि गर झारखंड बन गया तो बिहार में लालू, बालू और आलू ही दिखाई पड़ेंगे। सच्चाई ये भी हैं कि जब तक मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी रहे, लगता था कि ये कथन सच हो जायेगा, पर जैसे ही उनकी तख्ता, उनसे खार खाये जदयू के नेताओं ने पलटी, झारखंड फिर ठीक से खड़ा नहीं हो सका। जबकि इसके विपरीत बिहार नीतीश कुमार के नेतृत्व में प्रगति के शिखर की ओर बढ़ रहा हैं, ऐसा इसलिए लिखना पड़ रहा हैं कि कुछ पत्र पत्रिकाओं ने नीतीश की कार्य कुशलताओं की प्रशंसा की हैं, लेकिन हमसे गर पूछे तो मुझे नीतीश न कल अच्छे लगे थे और न ही आज। ये अहंकारी पुरुष हैं, ये अलग बात हैं कि इनका कुछ काम ठीक दीखता हैं, पर इनके शासनकाल में भी लॉ एंड आर्डर की वहीं स्थिति हैं जो लालू के काल में थी। अरे जो व्यक्ति बिहार के लोकपर्व छठ पर घाटों की स्थिति नहीं सुधार सकता, जिसके शासनकाल में 24 से अधिक घाटों पर व्रत करने पर प्रतिबंध लगा दिये जाते हो, वो गर कहें कि हम विकास की रास्ते पर हैं, तो बड़ा आश्चर्य लगता हैं। फिर भी जब सब कह रहे हैं, ठीक हैं, तो चलों हम भी कह देते हैं, ठीक हैं, ऐसा कहना वैचारिक दृष्टिकोण से नीतीश के आगे आत्मसमर्पण कर देना होगा, फिर भी बिहार झारखंड के मुकाबले अच्छी स्थिति में हैं, ये मानने में हमें गुरेज नहीं।
हमें याद हैं, जब बिहार से झारखंड अलग हो रहा था, तब उस वक्त मैं पटना स्थित दैनिक जागरण कार्यालय में कार्यरत था और मुझे मोतिहारी की जिम्मेदारी सौपी जा रही थी। उस दिन मुझे झारखंड की राजधानी रांची से निकलनेवाली प्रभात खबर समाचार पत्र खूब याद आयी। वो इसलिए कि प्रभात खबर, अपने समाचार पत्र में कुछ पृष्ठ तो झारखंड के नाम से ही निकालता था। उस वक्त जब कई समाचार पत्र जो रांची से ही प्रकाशित होते थे, झारखंड लिखने से ही परहेज करते थे, पर आज झारखंड शब्द को लिखकर गौरवान्वित हो रहे थे। जिस दिन झारखंड बना, उस दिन तो इस समाचार पत्र ने ऐसे विशेषांक निकाले, जो संग्रहणीय़ थे, पर चूंकि मैं रांची में नहीं था, वो संस्करण मुझे मिले नहीं, जो मेरे मित्र व परिजन रांची में थे, उन्हें कहां था कि वो संजो कर रखे, पर देर से आने का कारण रहा या मित्रों की याददाश्त की कमी, वो संजो कर नहीं रख सकें, पर वो विशेषांक आज तक मुझे नहीं मिले, फिर भी जो लेखकों व अन्य पत्रकारों से जो मुझे संस्मरण मिले, वो बताते कि इस समाचार पत्र ने कितनी मेहनत की थी।
झारखंड बनने के बाद, इस प्रांत में विकास के रास्ते खुले थे, जिस बिहार प्रांत में सड़कें कागजों में ही बन जाती थी, यहां सडकें दिखाई देने लगी। पुल पुलियों को ठीक कराया जाने लगा। स्कूलों में कल्याण विभाग सक्रिय दिखा। लड़कियां सायकिलों पर स्कूल जाने लगी थी। आदिवासी बहुल इलाकों में आदिवासियों के कल्याण के लिए कई कार्यक्रम शुरु किये जाने लगे थे। सरकारी स्कूलों मे बिहार पैटर्न को छोड़ सीबीएसई पैटर्न लागू कर दिया गया। बच्चों को मुफ्त में किताबे मिलने लगी। शिक्षा का स्तर सुधार होता दिखा। जहां बिजली दिखाई नहीं पड़ती थी वो बिजली अब यहां दिखाई पड़ने लगी। उद्योग धंधे खुलने शुरु हुए। कई परियोजनाओं को मूर्तरुप दिया जाने लगा। निजी कंपनियों के साथ एमओयू होने लगे, हालांकि इन एमओयू का विरोध भी हुआ। लेकिन बाबू लाल मरांडी के शासनकाल में उठी डोमिसाईल की आग ने झारखंड की प्रतिष्ठा में वो आग लगायी कि इस आग से आज भी झारखंड झूलस रहा हैं, हालांकि इस डोमिसाईल की आग को मीडिया ने भी हवा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक समाचार पत्र और कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इस प्रकार से इस आंदोलन को हवा दी, जैसे लगा की इस आग से कभी झारखंड उबर नहीं पायेगा, पर खुशी इस बात की हैं कि डोमिसाईल की आग, अब वैसी नहीं, फिर भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रुप में ये जिंदा हैं, और इसका भय झारखंड में बाहर से आकर बसे पुराने व नये लोगों में स्पष्ट दीखता हैं।
बिहार और झारखंड अलग - अलग हैं। आज बिहार प्रगति की ओर हैं पर झारखंड प्रगति से कोसो दूर हैं। उसके कारण स्पष्ट हैं। बिहार में एक नेतृत्व और उसकी सोच साफ दिखाई पड़ती हैं, पर यहां नेतृत्व की कमी और उसकी स्पष्टता साफ दिखाई नहीं देती। बाबू लाल मरांडी के समय लगता था कि एक सोच हैं, स्पष्टता हैं, पर उसके बाद सभी में नेतृत्व करने की क्षमता और स्पष्टता का अभाव दिखता हैं। झारखंड निर्माण के बाद, आज तक झारखंड को अपना विधानसभा, अपना सचिवालय नहीं मिला और न इसे बनाने की जरुरत समझी गयी। खेल के क्षेत्र में ये प्रदेश एक मिसाल कायम कर सकता हैं, हम ये भी कह सकते है कि ये स्टेट स्पोर्टस स्टेट बनने की क्षमता रखता हैं, पर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, राष्ट्रीय खेल का समय तो यहां इस प्रकार से बार बार बदले गये कि इस प्रदेश की प्रतिष्ठा दांव पर लगती चली गयी, ऐसे देखा जाय तो खेल में बिहार झारखंड के आगे कहीं टिकता नजर नहीं आता। नया राज्य बनने के बाद राजधानी रांची को जिस प्रकार नये ढंग से बसाने की बात होनी चाहिए थी, उस पर तो आज तक कोई सुनने को तैयार नहीं, आज भी रांची की सभी सड़कों पर सड़क जाम की स्थिति सामान्य सी घटना होती हैं, यहां एक व्यक्ति को एक किलोमीटर की यात्रा संपन्न करने में एक घंटे लग जाते हैं। ये केवल राजधानी की स्थिति नहीं बल्कि झारखंड के सभी नगरों की हैं। विस्थापन, पलायन और गरीबी इस झारखंड की सबसे बड़ी समस्या हैं पर आजतक किसी ने भी इन समस्याओं को झारखंड से त्राण दिलाने की युक्ति नही निकाली।
नक्सल और झारखंड तो जैसे लगता हैं कि एक दूसरे के लिए ही बने हैं और इस नक्सल की समस्याओं को बढा़ने में, खाद और बीज का काम करते हैं यहां के राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकारी। राजनीतिज्ञ तो विधानसभा में कुछ और सड़कों पर नक्सलियों के लिए कुछ और बयान देते हैं। उसका मूल कारण हैं कि वो जानते हैं कि नक्सलवाद यहां की मिट्टी में किस प्रकार जड़ समा चुका हैं। कुछ तो मानते हैं कि नक्सलवाद की समस्या, यहां से कभी खत्म ही नहीं होगी, पर मैं ऐसा नहीं मानता। गर राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों में इमानदारी के गुण आ जाये, विकास के रास्ते पर कदम बढ़ा दे, नक्सलियों के साथ कठोरता से पेश आये तो ये नक्सली किस चूहे के बिल में होंगे, पता ही नहीं चलेगा। जब पंजाब से आतंकवाद समाप्त हो सकता हैं। असम समस्या को काबू में किया जा सकता हैं, तो ऩक्सलवाद किस चिड़िया का नाम हैं। सच्चाई ये हैं कि नक्सलवाद बढ़ाने में यहां के राजनीतिज्ञों के दोहरे चरित्र ने ही मुख्य भूमिका निभायी हैं। जब विकास के नाम पर लूट होगी, राजनीतिज्ञ दस पुश्तों के लिए, धन इकट्ठा करने में लगायेंगे, तो फिर नक्सलवाद कैसे नहीं बढ़ेगा। यहां भ्रष्टाचार का आलम ये हैं कि यहां एक पूर्व मुख्यमंत्री और उनके शासनकाल के कई मंत्री होटवार जेल में कैदी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं, ये झारखंड के ऐसे बदनूमा दाग हैं, जो फिलहाल कहीं से भी धूलते नजर नहीं आते। जब - जब भ्रष्टाचार की बात आती हैं - झारखंड सूर्खियों में ही रहता हैं, चाहे वो नरसिंहराव सरकार बचाने की बात हो अथवा झारखंड प्रांत बनने के बाद एक से बढ़कर एक किये गये घोटाले की बात ही क्यों न हो।
आज यहां जो सरकार चल रही हैं - गठबंधन की। वो क्या हैं। वो भी भ्रष्टाचार की ही देन हैं। जो एक दूसरे को फूंटी आंख देखना नहीं पसंद करते, वो सरकार चला रहे हैं। क्यूं चला रहे हैं. क्या किसी को पता नहीं। खुद यहां के मुख्यमंत्री दिल्ली और विदेश की यात्राओं की झड़ी लगा दी हैं। बगल में बिहार हैं, वहां के मुख्यमंत्री तो लगता हैं कि इतनी दिल्ली यात्रा भी नहीं की होगी, जितना की यहां के मुख्यमंत्री ने एक साल में विदेश की यात्रा कर ली हैं। इसी से पता लग जाता हैं कि कौन अपने प्रांत के लिए क्या कर रहा हैं। यहीं नहीं जरा इस एक साल में देखिये -- एक ओर बिहार में सेवा का अधिकार लागू हो चुका हैं, वहीं झारखंड में सरकार ने घोषणा तो कर दी पर ये सेवा का अधिकार कब लागू होगा, इसका अभी सगुन ही देखा जा रहा हैं, ऐसे में हमें नहीं लगता कि इस 11 वें साल को पूरा कर लेने के बाद भी झारखंड में कोई नयी चीज देखने को मिलेगी, फिर भी निराशावादी से आशावादी होना अच्छा हैं। आशा करेंगे कि क्रिकेट में जैसे धौनी, सौरभ और अब वरुण ने झारखंड में आशा का संचार पैदा किया हैं। राजनीति व प्रशासनिक क्षेत्र में भी कुछ नये चेहरे दिखेंगे जो झारखंड को नयी बुलंदियों तक पहुंचायेंगे, फिलहाल जो पुराने चेहरे हैं, उनसे आशा करना बेमानी होगी, क्योंकि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता हैं। अतीत तो भ्रष्टाचार में गोता लगाता हुआ दिखा हैं, यहीं कारण हैं कि वर्तमान में कुछ हैं ही नहीं, पर देखे आगे क्या होता हैं..............

Saturday, September 11, 2010

बधाई महामहिम फारुक साहब को…।


मैं अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में ढूंढ रहा हूं, एम ओ एच फारुक साहब को, पर वो मिल नहीं रहे, कल तक उनके नाम स्थानीय अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सुर्खियों में रहता था, पर अब वो दिखाई नहीं दे रहा। लोग कहते हैं कि ये देश ऐसा हैं कि यहां उगते सूर्य को ही नमस्कार किया जाता हैं, पर शायद लोग भूल रहे हैं कि ये देश ऐसा भी हैं कि डूबते सूर्य को सर्वप्रथम अर्घ्य देने के बाद ही अपना व्रत प्रारंभ करता हैं, गर किसी को ध्यान नहीं हो, तो जरा कार्तिक शुक्ल रविषष्ठी व्रत जिसे छठ भी कहते हैं, उस ओर अपना ध्यान ले जाये।
चारों ओर जयजयकार हो रही अर्जुन मुंडा की। होनी भी चाहिए क्योंकि इस अर्जुन ने अपने तरकस से निकाल धनुष पर संधान कर ऐसी तीर छोड़ी हैं कि इस तीर से कई दिग्गज घायल हो गये, खुद जिस गुरु शिबू सोरेन ने राजनीतिक शिक्षा दी, वे खुद ही फिलहाल असहाय की स्थिति में हैं, जिस बाबु लाल मरांडी ने अर्जुन को पहली बार सत्ता सौंपी थी, वे सत्ता की चाहत में इधर से उधर भटक रहे हैं, पार्टी बना ली, फिर भी मुख्यमंत्री का पद नहीं मिला, पर जिसने कुछ भी नहीं किया, वो आज सत्ता के शीर्षस्थान पर हैं, कैसे। इस पर विचार करना चाहिए। विचार करना चाहिए, सत्ता की चाहत में बैठे, उन राजनीतिज्ञों को जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने की इच्छा रखते हैं। हम बता देना चाहते हैं कि सत्ता की राजनीति में मुख्यमंत्री पद की लालसा रखना कोई गलत बात नहीं, पर उसके लिए तिकड़म करना गंदी बात हैं। हालांकि बिना तिकड़म के राजनीति में कोई बात बनती ही नहीं। ऐसे भी साम दाम दंड भेद ये शब्द राजनीति के कोख से ही निकले हैं। चलिए झारखंड का बेटा अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बन गया । ये आज का अर्जुन हैं, ये न तो तीर चलाता हैं और न धनुष रखता हैं, पर हां, गोल्फ खेलता हैं, जबकि दोनों में लक्ष्य का निर्धारण और उसे पाना महत्वपूर्ण होता हैं। चुनाव के परिणाम आने के बाद मात्र नौ महीने में इतनी आसानी से अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री इस बार बन जायेंगे, इसका अंदाजा किसी को नहीं था। ऐसे भी इतिहास गवाह हैं कि इस अर्जुन को, सत्ता में आने के लिए कई बार संघर्ष भी करना पड़ा हैं, कभी राज्यपाल की भूमिका ने सत्ता से दूर इसे रखा तो कभी अपनों ने ऐसी तिकड़म लगायी कि इन्हें सत्ता मिलने में देर हो गयी, पर इस बार अर्जुन ने ऐसी जुगत लगायी, मीडिया और कारपोरेट जगत को ऐसा क्लच में लिया कि चारो ओर सिर्फ अर्जुन ही अर्जुन दिखाई पड़ने लगा, फिर क्या था, उधर भाजपा आलाकमान ने भी हरी झंडी दिखा दी, नतीजा सबके सामने हैं।
पर एक बात मैं कहे और लिखे बिना रुक नहीं सकता, जरा सोचिये कि आज एम ओ एच फारुक की जगह सैय्यद सिब्ते रजी या अन्य राज्यपाल होते तो क्या होता किसी ने इस बात का अंदाजा भी लगाया हैं। लोग को छोड़िये सत्ता किसी को मिले अथवा सत्ता न मिले उससे आम जनता की कोई दिलचस्पी नहीं होती पर मीडिया ने क्या किया, मीडिया ने उस शख्स को बधाई दी, अथवा दो शब्दों की उदारता दिखायी जिसने सचमुच में लोकतंत्र की मर्यादा रखी, खासकर ऐसे वक्त में जब चारों ओर लोकतंत्र का चीरहरण हो रहा है। बधाई झारखंड के राज्यपाल एम ओ एच फारुक को, जिन्होंने आज की राजनीति में, एक नया आयाम लिखा हैं, उन्होंने राजनीतिक परिपक्वता ही नहीं बल्कि शुचिता एवं शुद्धता की नयी परिभाषा लिखी हैं। याद करिये, जब इस राज्य में राज्यपाल सैय्यद सिब्ते रजी थे, उन्होंने क्या किया था, ये जानते हुए भी कि अर्जुन को बहुमत हैं, उन्होंने सत्ता से दूर रखकर उस वक्त शिबू को मुख्यमंत्री बनाने का न्यौता दे डाला था, पर एम ओ एच फारुक साहब को देखिये, जैसे ही अर्जुन मुंडा ने बहुमत जुटाई, बहुमत को राज्यपाल के समक्ष रखा। एम ओ एच फारुक ने तुरंत निर्णय लिया, राष्ट्रपति शासन हटवाने के लिए गृहमंत्री को अनुशंसा किया, ये ही नहीं जो उन्होंने राज्यहित में कुछ निर्णय ले रखे थे, उन्हें रोका, और नये सरकार पर फैसले छोड़ दिये। जल्द ही अर्जुन मुंडा को सत्ता भी सौंप दी। आज के युग में ऐसी मिसाल कहां मिलती हैं। बधाई हो एम ओ एच फारुक साहब। आपने एक नयी मिसाल कायम की हैं। राजनीति करनेवालों और राजनीति में रुचि रखनेवालों को आपने एक सबक दी हैं, आशा की जानी चाहिए कि लोग आपसे सबक सीखेंगे, हालांकि ये सच हैं कि मीडिया और कारपोरेट जगत जो अर्जुन मुंडा को सत्ता सौंपने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहा था, आपके इस उदार चरित पर ध्यान देना उचित नहीं समझा, पर झारखंड में इमानदारी से राजनीति करनेवालों को आपका ध्यान हमेशा रहेगा।
आज के युग में सत्ता किसे अच्छी नहीं लगती, आप भी औरों की तरह तिकड़म लगा सकते थे, और कुछ दिन झेल सकते थे, विधानसभा को भंग करने की सिफारिश कर सकते थे, क्योंकि झारखंड विकास मोर्चा के कई नेता तो कह ही रहे थे, कि विधानसभा भंग कर दी जाये, पर आपने ऐसा नहीं किया, विधानसभा को निलंबित ही रहने दिया पर जैसे ही अर्जुन ने बहुमत का जुगाड़ किया आपने बिना किसी इफ-बट के वो फैसले लिये, जिस फैसले की आशा तो इतनी आसानी से न तो भाजपा को थी और न तो अर्जुन मुंडा को, मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मैं पत्रकार हुं और मुझे इसका अच्छी तरह अनुमान हैं। पर यहां की मीडिया जो अर्जुन के बयार में आपके इस उदार चरित को भूल गयी, एक शब्द भी आपके बारे में लिखना उचित नहीं समझा। ये देख व जानकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, फिर भी, आपको मेरी ओर से महामहिम फारुक साहब आपको कोटिशः बधाई। आशा हैं आप अपनी इस प्रकार की उदारता से राजनीति में और भी मिसाल कायम करते रहेंगे। ऐसे भी आपने बहुत कम ही समय में, जो राष्ट्रपति शासन के दौरान जो झारखंड हित में निर्णय लिये हैं, उसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। सूखा झेल रहे, झारखंड और भ्रष्टाचार को रोकने में जो आपने मह्तवपूर्ण फैसले लिए, उसका पालन आनेवाली सरकार करेंगी, इसका मुझे उतना भरोसा नहीं और न ही आम जनता को हैं।