Sunday, April 30, 2017

सुकमा का दर्द...........

पिछले कुछ दिनों से सुकमा चर्चा में है। सुकमा में नरपिशाच रुपी नक्सलियों ने पच्चीस सीआरपीएफ के जवानों की नृशंस हत्या कर दी। इसके पूर्व में भी इन नरपिशाचों ने 12 जवानों की हत्या कर दी थी। इन शहीद हुए जवानों के परिवारों के दर्द पर मरहम लगाने के लिए सुप्रसिद्ध अभिनेता अक्षय कुमार और सुप्रसिद्ध क्रिकेटर गौतम गंभीर ने कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाये है, जबकि अन्य धन्नासेठों के लिए सुकमा जैसी घटनाएं कोई महत्वपूर्ण नहीं रखती, वे आज भी अपने धनों की सुरक्षा के लिए तथा अपने नालायक बेटे-बेटियों के लिए धनसंग्रह पर ज्यादा ध्यान दे रहे है।
इधर कश्मीर में आतंकियों और इधर देश के अंदर नक्सली रुपी नरपिशाचों से लड़ने में देश का जवान शहीद हो रहा है और दूसरी ओर इन आतंकियों और नक्सली रुपी नरपिशाचों की सुरक्षा में स्वयं को बुद्धिजीवी कहनेवाला साम्यवादियों का दल इन नरपिशाचों के पक्ष में आकर खड़ा हो गया है। एक वायर रुपी पोर्टल में कुछ अनिल सिन्हा जैसे लोग सवाल उठा रहे है कि भाई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सड़क बनाने की क्या जरुरत है? वह भी तब, जब आदिवासी चाहते ही नहीं कि उनके इलाके में सड़क बने।
ये वहीं लोग है, जो आदिवासी बहुल इलाकों में जब नक्सलियों का दल स्कूल भवनों को उड़ा देता है, तो बहुत ही प्रसन्न होते है, क्योंकि इन स्कूल भवनों के उड़ने से उन साम्यवादी बुद्धिजीवियों या पत्रकारों के बेटे-बेटियों का भविष्य नहीं प्रभावित होता, क्योंकि इनके बेटे-बेटियां तो देश के विभिन्न महानगरों में चलनेवाले प्रतिष्ठित स्कूलों की शोभा बन रहे होते है।
इन दिनों जब से नक्सलियों और आतंकियों के बीच गुप्त समझौते हुए है, नक्सलियों और आतंकियों ने अपना काम और तेजी से बढ़ा दिया है। आंतकियों ने कश्मीर में सेना पर आक्रमण प्रारंभ किये है तो आतंकियों को नैतिक रुप से समर्थन देने के लिए नक्सली रुपी नरपिशाचों ने देश के अंदर तबाही मचाना प्रारंभ कर दिया है।
जैसे...
• कश्मीर में सेना पर आक्रमण करने के लिए, उन पर हमले करने के लिए, उनकी हौसलों को पस्त करने के लिए पत्थरबाजों और पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों ने हाथ मिलाकर सेना और अर्द्ध सैनिक बलों को अपना निशाना प्रारंभ किया है तो नक्सलियों ने देश के अंदर सेना और अर्द्धसैनिक बलों पर हमले करने शुरु कर दिये है ताकि देश पूर्णतः खंडित हो जाये।
• जैसे कश्मीर में सेना और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें जनता की नजरों में गिराया जाता है, ठीक उसी प्रकार ये नरपिशाच रुपी नक्सली देश में रह रहे भोलेभाले आदिवासियों को इनके प्रति नफरत करने का पाठ पढ़ाते है और इसमें इनका मनोबल बढ़ा रहे होते है, वे लोग जो देश के महानगरों में, छोटे-छोटे शहरों में रहकर वैचारिक खाद देकर उन्हें पुष्ट करते है। इसके लिए इन बुद्धिजीवियों और चैनल में कार्य करनेवाले पत्रकारों को मुंहमांगी रकम विदेशों में रहनेवाले भारतविरोधी तत्वों से प्राप्त होते है, इनकी फंडिग इतनी मजबूत होती है कि पूछिये मत, पर दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए ये फटे पुराने थैले और कपडों का इस्तेमाल करते है, ताकि लोग इन्हें गरीबों का हमदर्द समझ सकें।
• ये आतंकवादी और नरपिशाच रुपी नक्सली हिन्दूओं को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझते है, तथा धर्मांतरण के लिए ईसाई मिशनरियों और अन्य भारत विरोधी धार्मिक संगठनों के लिए भी काम करते है। ऐसा वे इसलिए करते है क्योंकि इनका मानना है कि जब तक हिन्दू बहुसंख्यक रहेंगे, भारत को तोड़ना मुश्किल रहेगा।
• कई साम्यवादी विचारधारा के लोग जो पूर्ण रुप से गुंडे होते है, ये पूरे देश को एक न मानकर कई देशों का समूह मानने का प्रचार करते हुए विदेशियों के आगे खिलौने बने हुए है तथा लोगों में भारत और भारतीय संस्कृति के खिलाफ विषवमन करने का प्रयास करते है।
• भारत में कई ऐसे चैनल है, जो पूर्ण रुपेण भारत विरोध के लिए काम करते है और समय-समय पर धर्मनिरपेक्षता की आड़ में भारत की अस्मिता पर गंभीर चोट करते है।
नक्सलीरुपी नरपिशाचों के बढ़ने के कारण और उसका निदान....
• भारत में नेता का बेटा नेता बनता है, अधिकारी का बेटा अधिकारी बनता है, फिल्मी हीरो का बेटा फिल्मी हीरो बनता है, कोई देश का जवान या अर्द्सैनिक बलों में शामिल होना नहीं चाहता, क्योंकि वो जानता है कि इसमें जो भी जाता है, मरने के लिए जाता है, हाल ही में पूर्व में जदयू में शामिल नेता जो आज भाजपा में चला गया, उसका तो बयान ही ऐसा था, पर देखिये थेथरई, राजनीतिज्ञों के, जबकि दूसरे देशों में ऐसा नहीं है। जब तक इस देश में इस प्रकार की मनोवृत्ति रहेगी, इस देश से न तो आतंकवाद खत्म होगा और न ही नरपिशाचों का समूह नक्सली।
• इस देश में देशभक्तों की संख्या कम है, ज्यादातर देशद्रोही है, ये भारतीय परंपरा है, ये कभी खत्म नहीं होगा। भगत सिंह को मरवानेवाला शोभा सिंह, महाराणा प्रताप के समय़ पैदा लेनेवाला मानसिंह, पृथ्वीराज चौहान के समय रहनेवाला जयचंद, महारानी लक्ष्मीबाई को मदद न कर अंग्रेजों के तलवे चाटनेवाला सिंधिया परिवार। ये उदाहरण है, जो बताते है कि भारतीय गद्दार होते है, उन्हें देशभक्ति के नाम पर दूसरे देशों के गद्दारों के तलवे चाटने में ज्यादा आनन्द आता है।
• भारत के राष्ट्रपिता है महात्मा गांधी, पर आप किसी भी साम्यवादी विचारधारावाली पार्टियों के कार्यालय में जाइये, आपको गांधी का चित्र नहीं मिलेगा, पर लेनिन, मार्क्स, स्टालिन, माओ के चित्र और उनकी प्रतिदिन पूजा होते आपको बराबर दीख जाया करेगा।
• भारत में सेना में या अर्द्ध सैनिक बलों में वहीं लोग शामिल होते है, जो सुलेशन से चमड़े साटने का काम करते है, जो खेतों-खलिहानों में काम करते है, जो फटेहाल है, जो कम पढ़े-लिखे है, जो गरीबी में ही जीते रहते है, कोई भी धनी-मानी व्यक्ति का परिवार देश के लिए मरना नहीं चाहता, उसका मानना है कि वो देश को मिट्टी में मिलाने के लिए पैदा हुआ है।
• हमारे देश में जो भी नेता है वह कड़ी निन्दा करने के लिए पैदा होता है, जब वह विपक्ष में होता है तो बड़ी-बड़ी ज्ञान की बातें करता है और जब सत्ता में होता है तो उसकी सारी ज्ञान चरने के लिए चली जाती है।
• हमारे देश में जो जवान देश के लिए शहीद होता है, जो वैज्ञानिक देश की सुरक्षा में, जो जासूस देश के लिए अपना प्राणोत्सर्ग करता है, उनके परिवारों के लिए, यह देश कुछ भी नहीं करता, पर जरा नेताओं को देखिये, एक बार विधायक या सांसद बन गये, उसके बाद विधायक या सांसद रहे या न रहे, जब तक जिंदा है, तब तक पेंशन लेंगे और मर गये तो उनकी बीवी और परिवार पेंशन का आनन्द लेंगे, पर अर्द्ध सैनिक बलों के जवान अगर देश के लिए मर भी जाये तो उनके परिवारों को सामान्य जिंदगी जीने के लिए तरस जायेंगे, उन्हें ये सरकार पेंशन तक नहीं देती। थूकता हूं, ऐसी सरकार पर, जो अपने देश के जवानों के परिवारों का सम्मान नहीं करना जानती।
कुल मिलाकर देखे तो फिलहाल अपना देश हिजड़ों का देश बनने में ज्यादा रुचि दिखा रहा है, अब फिल्में भी बनती है तो हिजड़े बनने का उपदेश दे रही होती है, यानी जवान हो जाओ, लड़की पटाओ, ऐश करो, बच्चे पैदा करो और फिर मर जाओ यानी जिंदगी मिलेगी न दुबारा के तर्ज पर खाओ, पीओ, ऐश करो। जो देश इस तर्ज पर चल रहा होता, वह कभी खड़ा नहीं होता, वहां आतंकियों और नरपिशाचों की ही चल रही होती है, यह देश तो आतंकियों और नरपिशाच रुपी नक्सलियों का आश्रयस्थली बन चुका है, जरा देखिये अपने आस-पास के ही देशों को जो कैसे जी रहे है? अरे ज्यादा दूर मत जाइये, छोटा सा देश भूटान और बड़ा सा देश चीन। आपके बगल में ही है, कैसे आगे बढ़ रहा है? और कैसे स्वयं को मजबूत कर रहा है? आप ही का माल, आप ही को दूसरे रुप में पेश कर रहा है और अपनी आर्थिक और सामरिक शक्ति को मजबूत कर रहा है और आप हिजड़े बनकर उसके आगे नाचने को विवश हो रहे है। शर्म आती है ऐसा परिदृश्य देखकर कि हम किस देश में रह रहे है?

Saturday, April 29, 2017

क्या है अक्षय तृतीया...........

अमिता पिछले पन्द्रह दिनो से अपने पति राज से झगड़ रही है कि पिछले साल जिस प्रकार से राज ने अक्षय तृतीया के दिन धोखा दिया था, वह इस बार धोखा नहीं देगा। इस साल अक्षय तृतीया के दिन सोने के कंठहार वह लेकर रहेगी, क्योंकि पिछले दिनों एक पंडित जी ने कहा था कि अक्षय तृतीया के दिन सोने का कोई न कोई आभूषण अवश्य खरीदना चाहिए, क्योंकि सोना कभी क्षय नहीं होता, उससे लाभ ही लाभ होता है, घर में सुख-शांति आती है, समृद्धि आती है। बेचारा राज, उसे पिछले साल की तरह इस साल भी आमदनी में कुछ खास वृद्धि नहीं हुई, पर पत्नी ने ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया है कि उसके हालत पस्त है। अमिता और राज की तरह ऐसे कई घर और परिवार है, जो अक्षय तृतीया के नये मिजाज से अपने घर को तबाह करने में लग गये है।
उसका कारण है कि इन दिनों नये ढंग के पंडितों, नये ढंग के अखबारों-चैनलों और नये ढंग के व्यापारियों ने जन्म ले लिया हैं। इन तीनों ने मिलकर इस प्रकार से अक्षय तृतीया की ब्रांडिंग कर दी है, कि आम आदमी इस पर्व के चक्कर में अपनी खुशियां बड़े-बड़े धन्ना सेठों के यहां गिरवी रखने को मजबूर हैं।
पंडितों (पंडित का मतलब जाति नहीं समझ लीजियेगा, अगर आप इसे जाति से तौलेंगे तो धोखे में पड़ जायेंगे, आजकल हर जातियों में नये – नये पंडित जन्म ले लिये है, जो गांवों-शहरों में जन्मकुंडली देखने का दुकान खोल लिये है, मैं उनकी बात कर रहा हूं) को देखिये तो वे बेसिर-पैर की बातें वैदिक मंत्रों से जोड़कर आम-आदमी को मूर्ख बना रहे है, जबकि उन वैदिक मंत्रों का उससे कोई लेना – देना नहीं होता।
दूसरी ओर अखबार और चैनलवाले बड़े-बड़े व्यापारियों, जिनकी दुकानें, व्यापारिक प्रतिष्ठानें शहरों में चल रही है, उनसे विज्ञापन इस प्रकार वसूलते है, वह भी उनके गर्दन पर छुरी रखकर, कि अगर वे विज्ञापन नहीं देंगे तो वे आयकर विभाग से उसकी शिकायत करके, उसकी सारी दुकानदारी मटियामेट कर देंगे और इस प्रकार व्यापारियों और मीडिया के लोगों का मधुर संबंध बनता है, भर-भर पेज विज्ञापन मुक्त कंठ से ये व्यापारी वर्ग अखबारों को उपलब्ध कराते है और इस प्रकार झूठ का व्यापार जमकर एक दिन चलता है, जिसका नाम है – अक्षय तृतीया।
मैं पूछता हूं कि आम जनता पूछे, उन ढोंगी पंडितों, अखबारवालों और व्यापारियों से कि वे बतायें कि...
• किस सनातन-वैदिक ग्रंथों में लिखा है कि हमारे भगवान राम सीता के संग, भगवान शिव पार्वती के संग, भगवान विष्णु लक्ष्मी के संग या कोई भी देवता अपनी-अपनी पत्नी के संग, किसी व्यापारी के यहां जाकर अक्षय तृतीया के दिन स्वर्णाभूषण या अन्य वस्तूएं खरीदी थी?
• अक्षय का अर्थ क्या होता है?
• दुनिया में वह कौन ऐसा चीज है, जो अक्षय है, जिसकी प्राप्ति के बिना जीवन सफल नहीं हो सकता, आगे नहीं बढ़ सकता?
• अक्षय तृतीया के दिन किस चीज को प्राप्त करने से जीवन सुलभ हो जाता है?
• आखिर अक्षय तृतीया के दिन सोने-चांदी या अन्य सुख-सुविधाओं के सामान क्यों नहीं खरीदने चाहिए?
इन सारे प्रश्नों का उत्तर आपको कोई ढोंगी पंडित, कोई अखबार या कोई व्यापारियों का समूह नहीं देगा, क्योंकि ये सभी व्यापार के नाम पर यहां की जनता को बेवकूफ बना रहे है और अपना उल्लू सीधा करते है।
और
अब हम आपको सारे प्रश्नों का जवाब दे देते है...
• हमारे भगवान कभी भी विलासिता संबंधी वस्तुओं को खरीदने की सलाह नहीं देते, उनका केवल यहीं कहना होता है कि आप उन्हें स्मरण करें, जीवन सफल हो जायेगा।
• अक्षय का अर्थ होता है, जिसका कभी क्षय नहीं हो।
• दुनिया में जितनी वस्तूएं हैं, सभी क्षय होनेवाली है। उनका नाश तय है, इसलिए ये अक्षय हो ही नहीं सकती, इसलिए इन चीजों को खरीदना नहीं चाहिए, लेकिन दुनिया में एक चीज है, जिसका कभी क्षय नहीं होता, वह है प्रभुकृपा अथवा अपने से बड़ों का आशीर्वाद। यह ऐसी वस्तु है, जिसका कभी क्षय नहीं हो सकता, इसलिए हमें प्रभुकृपा और आशीर्वाद की ललक को जागृत करना चाहिए।
• जो भी व्यक्ति प्रभुकृपा और अपने से बडों का आशीर्वाद को त्याग कर भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए दिमाग लगाता है, वह उसी तरह नष्ट हो जाता है, जैसे भौतिक वस्तूएँ।
और अंत में,
इन ढोंगियों से पूछिये कि बताओं, राम, कृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, कबीर, तुलसी, सूरदास, मीराबाई, लक्ष्मीबाई, सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी महान विभूतियां किस साल अक्षय तृतीया के दिन भौतिक वस्तूओं की प्राप्ति के लिए, सुख-सुविधा की प्राप्ति के लिए अक्षय तृतीया तुम्हारे कथनानुसार मनाया था और जब उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो हमें आप ऐसा करने को प्रेरित क्यों कर रहे हो? आओ देश बनाएं, न कि स्वयं रसातल में चले जाये और ढोंगियों का बराबर शिकार बनते रहे।

Wednesday, April 26, 2017

देश के मूर्धन्य पत्रकारों और चैनलों का महापाप.............

देश के मूर्धन्य पत्रकारों और चैनलों का महापाप...
दिल्ली नगर निगम चुनाव को देश का चुनाव बना दिया...
ये आज के पत्रकार है, ये नगर निगम की चुनाव को देश का चुनाव बना देते है, लोगों की मजबूरियां है, उनके पास कोई विकल्प नहीं है, इसलिए मजबूरी में दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम को देखने के मजबूर है। दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम का कोई असर, देश के दूसरे इलाकों में नहीं पड़ने जा रहा, पर देश के मूर्धन्य पत्रकार विभिन्न चैनलों पर स्वयं और देश की जनता के दिमाग का दही बनाने में लगे हुए है, इसमें उन्हें बहुत आनन्द भी आ रहा है।
आज किसी भी चैनल ने अपने मर्यादा का ख्याल नहीं रखा, चाहे वह कोई चैनल हो, सभी पागलों की तरह एमसीडी-एमसीडी का रट लगा रहे है, ठीक उसी प्रकार जैसे देश में लोकसभा के चुनाव परिणाम आ रहे होते हैं। देश की जनता को भी देखिये, वे कर ही क्या सकते हैं? मजबूरी में देखने को मजबूर है, वे झेल रहे है, इन चैनलों के महापाप को।
आखिर दिल्ली नगर निगम को इतना माइलेज ये चैनलवाले क्यों दे रहे है? इसके लिए भी कोई सर्वाधिक दोषी है तो वह है यहां के राजनीतिबाज। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दिल्ली नगर निगम के चुनाव में दिलचस्पी लेना, आप के अरविन्द केजरीवाल का तो जवाब ही नहीं, उन्हें लगता है कि भगवान ने फुर्सत में बनाया है, कांग्रेस तो एक तरह से खत्म ही हो गयी और भाजपा ने जिस प्रकार से कांग्रेसियों और अन्य दलों के घटियास्तर के नेताओं का आयात करना प्रारंभ किया है, यकीन मानिये कांग्रेस को तो यहां की जनता ने 60 साल झेला, इन्हें पांच साल भी झेल पायेगी, कहना मुश्किल है। कमाल की बात है कि भाजपा जिन पार्टियों अथवा नेताओं को गाली दे रही होती है, वहीं पार्टी अथवा उसके नेता के लोग जब भाजपा का दामन थाम लेते है, तो वह पवित्र हो जाता है, पता नहीं भाजपा के पास कौन से नदी का पवित्र जल है, जिससे सभी का पाप धूल जाता है। उदाहरण के लिए झारखण्ड के बाघमारा विधानसभा सीट से जीता ढुलू महतो और हाल ही में दिल्ली में लवली नामक नेता जो कल तक कांग्रेस का झंडा ढोता था और आज भाजपाई बन गया। ज्यादा दूर मत जाइये, दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी को देखिये जो कल तक अटल बिहारी वाजपेयी को गरियाता था, गोरखपुर लोकसभा सीट से योगी के खिलाफ समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और आज भाजपा में जाकर, हर प्रकार के आनन्द को प्राप्त कर रहा है यानी पग-पग पर अपना जमीर बेचनेवाला, ऐसे नेता देश के भाग्य विधाता बन रहे और पत्रकारों का समूह ऐसे नेताओं के आधार पर समाचार की प्राथमिकता तय कर रहे है।
देश के हालात ऐसे है, कि पूछिये मत...
• हमारा पड़ोसी पाकिस्तान हमेशा हमें गरिया रहा है।
• चीन अरुणाचल प्रदेश को लेकर आंखे तरेर रहा है।
• नक्सली गुंडों का समूह हमारी आंतरिक व्यवस्था को चोट पहुंचा कर पूरे देश की आंतरिक व्यवस्था को बर्बाद कर, विदेशी ताकतों के हाथों को मजबूत कर रहा है।
• पूंजीपतियों का समूह केवल अपना लाभ देख रहा है और देश के आर्थिक हालात पर चोट पहुंचा रहा है।
• देश के संतों को उद्योगपति बनने का सनक सवार हो रहा है, और पत्रकारों का समूह ऐसे संतों की आरती उतार रहा है, उन पर पुस्तक लिख रहा है।
जरा सोचिये, ऐसे हालात में इस देश की हालात क्या होगी?  गुंडे पत्रकार बनेंगे, गुंडे नेता बनेंगे तो यहीं होगा, हमें बेवजह के नगर – निगम चुनाव परिणाम जबर्दस्ती देखने होंगे। आज तो देश के सारे चैनल यहीं कर रहे, कोई इससे अलग नहीं दीख रहा। हम ऐसी व्यवस्था और ऐसे चैनलों और ऐसे पत्रकारों की कड़ी भर्त्सना करते है।

Sunday, April 23, 2017

पैसा फेको, तमाशा देखो..................

याद करिये, फिल्म “दुश्मन” का वह गीत जिसमें  सुप्रसिद्ध अभिनेत्री मुमताज बाइसकोप लेकर गांवों में भटकती है और बच्चों का मनोरंजन करती है, साथ ही गा रही होती है “देखो, देखो, बाइसकोप देखो, दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, घोड़े पे बांका सवार देखो, देखो ये देखो ताजमहल, घर बैठे सारा संसार देखो, पैसा फेको तमाशा देखो...”
ठीक इसी तर्ज पर झारखण्ड के मुख्यमंत्री तथा विभिन्न विभागों के मंत्रियों और अधिकारियों ने पुरस्कार लेना प्रारंभ कर दिया है, वे पुरस्कार देनेवाले कंपनियों, अखबारों, चैनलों और आयोजनकर्ताओं को विज्ञापन के नाम पर मुंहमांगी रकम उपलब्ध करा देते है और उसके बदले एक कागज और पीतल का टुकड़ा इन्हें सम्मान के नाम पर थमा दिया जाता है और फिर इसे सामान्य जनता को दिखाते फिरते है कि उन्होंने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया, जबकि सच्चाई कुछ दूसरी होती है।
इस प्रथा की शुरुआत तब से हुई, जब झारखण्ड बना। झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ने जब सत्ता संभाली तो उन्हें भी कुछ अच्छा बनने का शौक चढ़ा। इसके लिए उनके आसपास के लोगों ने व्यवस्था शुरु की, इंडिया टूडे ग्रुप से संबंध ठीक-ठाक किया गया, जम कर उन्हें पैसे उपलब्ध कराये गये और देखते ही देखते इंडिया टूडे ग्रुप ने उन्हें भारत का तीसरा सर्वाधिक लोकप्रिय मुख्यमंत्री घोषित कर दिया,  जबकि उसी समय डोमिसाइल आंदोलन ने इन्हें पूरे देश का सर्वाधिक अलोकप्रिय मुख्यमंत्री बना चुका था, स्थिति ऐसी बनी कि जो उस वक्त फिसले फिर कभी सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर नहीं पहुंच सके, जिन्हें उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुना, यानी हमारा इशारा अर्जुन मुंडा की ओर है, उन्होंने भी इनकी वो हालत कर दी कि ये कहीं के नहीं रहे, स्थिति आज भी वहीं है, इन्हीं की मदद से, इन्हीं की पार्टी के टिकट पर कुछ लोग चुनाव जीते और चुनाव जीतने के कुछ ही दिनों बाद वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास के गोद में जाकर बैठ गये।
इधर मैं देख रहा हूं कि रघुवर दास स्वयं को सर्वाधिक बेहतर घोषित करने के चक्कर में वहीं काम कर रहे है, जो पूर्व के मुख्यमंत्रियों ने किया है। जैसे याद करिये कुछ महीने पहले जीटीवी ने रांची में एक होटल में एक कार्यक्रम आयोजित किया और इसका पैसा भी राज्य सरकार से ही लिया और इसके बदले में मुख्यमंत्री रघुवर दास को एक सम्मान का टुकड़ा थमा दिया, यानी रघुवर भी खुश और माल लेकर जीटीवी भी खुश।
हाल ही में हैदराबाद में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, आयोजनकर्ताओं ने एक स्टाल लगाने के लिए जोर डाला और पैसे मांगे। मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र हैदराबाद पहुंचा और उसे भी पुरस्कृत कर दिया गया।
अभी – अभी पता चला है कि इंडिया टूडे ग्रुप ने राज्य के पर्यटन मंत्री अमर कुमार बाउरी को सम्मानित किया। उसके फोटो आइपीआरडी ने जारी किये, अखबारों में छपा। यह भी पैसे के लेन-देन पर ही आधारित है, नहीं तो जिसके लिए उन्हें एवार्ड मिला, जाकर उस स्थान को देख लीजिये, पता लग जायेगा।
इधर रांची में कुकुरमुत्ते की तरह इस प्रकार के सम्मान प्रदान करनेवालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है, और ऐसे कार्यक्रमों में वे लोग भी शामिल हो रहे है, जिन्हें इससे भी बड़ा सम्मान मिल चुका है, पर चूंकि सम्मान और प्रतिष्ठा के लालचियों को इससे क्या मतलब? उन्हें तो सम्मान चाहिए, कागज और पीतल के टुकड़े में सम्मान नजर आता है, इसलिए वे यहां भी आ धमकते है।
इस प्रकार के आयोजन करने में अखबारों और चैनलवाले आगे है, जबकि इन्हीं के तर्ज पर अब न्यूज एजेंसी में काम करनेवाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है, एक ने तो अपने पिता को ही सम्मान दिलाने के लिए भ्रष्टाचार में लिप्त एक कोयला व्यवसायी से पैसे लिये, सम्मान कार्यक्रम आयोजित कराया और ले-दे संस्कृति के आधार पर वह स्वयं भी दूसरे जगह सम्मानित हो रहा है और बदले में जो उन्हें दूसरे जगह सम्मान दे रहा है, उसे अपने यहां बुलाकर उसे सम्मान कर रहा है। ये है, झारखण्ड का हाल।
आज ही देखिए, इस ले – दे संस्कृति का क्या हाल है? सम्मान पुरस्कार की क्या स्थिति है?  एक फिल्म “अजब सिंह की गजब कहानी” के निदेशक है ऋषि प्रकाश मिश्र। उनसे स्टार देनेवालों ने पैसे की मांग कर दी, जिसका विरोध उन्होंने अपने फेसबुक वॉल के माध्यम से कर दिया है, यानी सम्मान-पुरस्कार के नाम पर अर्थ संचय करनेवालों ने देश और समाज को किस स्तर पर पहुंचा दिया, आप समझ सकते है। किसी ने ठीक ही कहा है कि जब तक लालचियों का समूह जिंदा है, ठगों की दुनिया आबाद होती रहेगी।

Friday, April 21, 2017

लीजिये, अब दीजिये जवाब मुख्यमंत्री रघुवर दास जी.......

ये तो होना ही था, मुख्यमंत्री रघुवर दास के बयान ने बवाल कर दिया है। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के कई नेता ही नहीं, बल्कि भाजपा को सहयोग कर रही आजसू पार्टी ने भी मुख्यमंत्री रघुवर दास के उस बयान की कड़ी आलोचना की है, जिसमें उन्होंने नेता विरोधी दल को डकैत व लूटेरा बताया था, तथा शिबू सोरेन पर कड़ी टिप्पणी की थी।
झामुमो के वरिष्ठ नेता स्टीफन मरांडी ने ठीक ही कहा है कि अगर बाप बुड्ढा हो जाय तो क्या उसे गड्ढे में फेंक देना चाहिए, मुख्यमंत्री रघुवर दास जवाब दें।
झामुमो के ही वरिष्ठ नेता चंपई सोरेन ने भाजपा के नेताओं और विधायकों से पूछा है कि वे कब तक ऐसे मुख्यमंत्री रघुवर दास को ढोते रहेंगे, जो कभी अपने मतलब के लिए स्वयं को शिबू सोरेन का असली बेटा बताता है, कभी उनके पांव छूता है और कभी उन्हें उखाड़ फेंकने की बात कहता है।
झामुमो नेताओं ने यह भी कहा है कि अगर विधानसभा में सीएम ने इस वक्तव्य को लेकर माफी नहीं मांगी तो वे 27 को सदन चलने नहीं देंगे। इधर आजसू के प्रवक्ता देवशरण भगत ने तो मुख्यमंत्री रघुवर दास से ही पूछ डाला कि अगर हेमंत लूटेरे हैं तो सरकार उन पर कार्रवाई क्यों नहीं करती?
पूरे मामले पर सरकार की घिग्घी बंध गई है, भाजपा नेताओं को न बोलते बन रहा है और न ही सरकार में शामिल लोग ही कुछ बोल पा रहे है, सचमुच मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपनी ही भाषा से पार्टी और सरकार दोनों को असमंजस में डाल दिया है, आगे – आगे देखिये क्या होता है?  हमें नहीं लगता कि झामुमो इस मुद्दे को फिलहाल छोड़ना चाहेगा, वह भी तब, जब लिट्टीपाड़ा उप चुनाव में जनता ने ताल ठोक कर झामुमो प्रत्याशी साइमन मरांडी के सिर पर जीत का सेहरा बांधा है।
मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, हो गया बंटाधार, भाजपा और सरकार का। आप विकास का राग अलापते रहिये, आपने तो कार्यकर्ताओं को भी कहीं का नहीं छोड़ा, वे फिलहाल रक्षात्मक मोड में चले गये है, आक्रामक होंगे तो उन्हें ही दिक्कत होगी, क्योंकि रहना है उन्हें, उन्हीं के साथ, जिनके बारे में आप कुछ ज्यादा ही उतावले होकर बयान दे रहे हैं...

प्रभात खबर के कारनामे..............

हम 100 प्रतिशत आश्वस्त है कि कल रांची के एसडीओ भोर सिंह यादव ने जरुर प्रभात खबर के किसी पत्रकार या वहां कार्यरत किसी खास व्यक्ति के दुखती रग पर हाथ रख दिया होगा, उसकी बात नहीं मानी होगी, जिसको लेकर प्रभात खबर ने अपना पृष्ठ संख्या 2, रांची के एसडीओ भोर सिंह यादव के खिलाफ रंग दिया।
मामला क्या है? इसे जानिये...
रांची एसडीओ ने कल सुबह करीब पौने 6 बजे यातायात जांच अभियान प्रारंभ किया, जिसमें करीब 150 से ज्यादा लोग यातायात नियमों का उल्लंघन करते हुए पकड़े गये। प्रभात खबर के अनुसार और पकड़े गये लोगों के अनुसार इतनी सुबह यातायात जांच अभियान नहीं चलाना चाहिए। अरे भाई तो तुम्ही बताओ, कब चलाना चाहिए? और कैसे चलाना चाहिए? क्या रांची एसडीओ को यातायात नियम तोड़नेवालों से पूछकर यातायात जांच अभियान चलाना चाहिए कि आप कब घर से निकल रहे है? कब यातायात नियम तोड़ रहे होंगे? ताकि हम आपके इस नियम तोड़ने के क्रम में आपका बाधक नहीं बने।
प्रभात खबर ये बताये कि जो उसने “पीड़ा एक आम आदमी की” के नाम से जो कुछ भी लिखा है। उस आम आदमी का नाम क्यों नहीं लिखा? जबकि वह पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री और झारखण्ड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का ध्यान आकृष्ट करा रहा है। इसका मतलब क्या है? इतनी मूर्ख तो रांची की जनता नहीं।
क्या प्रभात खबर इन सवालों का जवाब दे सकता है?
• क्या दुर्घटना समय देखकर होती है?
• क्या वाहन चालकों को यातायात नियमों को तोड़ने के लिए एक खास समय प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराना चाहिए?
• गलत करनेवालों को तो गलत का परिणाम तो स्वयं ही भुगतना होगा, इसके लिए कोई विशेष सहायता देने का प्रावधान कानून में उल्लिखित है क्या?
ढाई घंटे के बाद जुर्माने की रसीद काटी गयी तो इसके लिए भी दोषी वे लोग है, जो यातायात नियमों का उल्लंघन करते है, ऐसी घटना गर होने लगे तो फिर कोई यातायात नियमों को तोड़ने के पूर्व दस बार सोचेगा कि इसके परिणाम क्या हो सकते है, कम से कम रांची एसडीओ ने किसी के साथ गलत तो नहीं किया। यहां पर ऐसे कोई भी अच्छा काम करिये, यहां तो बदनाम करनेवाले लोगों को एक मौका चाहिए, जैसा मौका प्रभात खबर को आज मिल गया।
बधाई, रांची के एसडीओ भोर सिंह यादव को, जिन्होंने अपने विवेकपूर्ण कार्यों से स्थिति पर नियंत्रण किया और लोगों को एक संदेश भी दिया कि उनका जीवन कितना महत्वपूर्ण है, उनके परिवारों के लिए...

मुख्यमंत्री की भाषा...................

अगर ये मुख्यमंत्री की भाषा है...
तो माफ करें, राज्य की हर जनता को ऐसी भाषा पर गहरी आपत्ति होनी चाहिए...
मुख्यमंत्री रघुवर दास जी अपनी भाषा को संयंमित रखिये, नहीं तो बाद में आपको ही बहुत दिक्कत हो जायेगी। अपने से बड़ों और विपक्ष का आदर करना आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि आप सत्ता के सर्वोच्च पायदान पर खड़े हैं। आपकी भाषा से ही राज्य की जनता का मान बढ़ेगा और मान घटेगा भी।
आपने कल शिकारीपाड़ा में जिस प्रकार से संबोधन के क्रम में झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन और विरोधी दल के नेता हेमंत सोरेन के खिलाफ आग उगला, वह सहीं नहीं हैं। आपका यह कहना कि कब तक ढोओगे शिबू सोरेन को, दर्शाता है कि लिट्टीपाड़ा की हार, आपको अंदर से बेचैन कर दी है, आप ठीक से कई दिनों तक सोये नहीं है, रह-रह कर लिट्टीपाड़ा की हार आपको टीस दे रही है। आप इससे उबरिये, क्योंकि आप मुख्यमंत्री है।
आप ये गांठ बांध लीजिये कि शिबू सोरेन झारखण्ड आंदोलन की उपज है, उन्हें दिशोम गुरु कहा जाता है, झारखण्ड के कई इलाकों में मैंने स्वयं देखा है कि उन्हें भगवान की तरह पूजा जाता है, और ये सब ऐसे ही नहीं है, उन्होंने झारखण्ड को दिया है, आज भी उनकी सादगी, हर झारखण्डी को भा जाता है। ये अलग बात है कि पुत्र-परिवार मोह में, वे भी स्वयं को उबार नहीं पाये। रही बात कि उन्होंने रिश्वत लेकर सरकार बचायी, पर आप ये क्यों भूल जाते है कि आपकी पार्टी में भी एक राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके एक व्यक्ति ने नोट गिने थे, जिसे पूरा देश टीवी पर देखा था। आज सच्चाई यह है कि कोई भी राजनेता दूध का धुला नहीं है।
आज जिस झारखण्ड के आप मुख्यमंत्री है, वह शिबू सोरेन का ही देन है, आपकी पार्टी तो वनांचल का सपना देख रही थी। आप ये भी नहीं भूले कि कभी आप उनके नेतृत्व में उप मुख्यमंत्री बन कर राज्य की जनता को सेवा दी है, अगर आप से यहीं कोई सवाल पूछे कि जो शिबू सोरेन के बारे में आपने कल बातें कहीं, आपका ये ज्ञान 2010 में कहां चला गया था? जब आप विधानसभा में उनके बगल में उपमुख्यमंत्री के रुप में बैठा करते थे, यानी साथ में है तो ठीक और विरोध में हो गये तो गलत। कड़वा-कड़वा थू-थू और मीठा-मीठा चप-चप।
दूसरी ओर नेता विरोधी दल हेमंत सोरेन को लूटेरा और डकैत कहना क्या सहीं है? आपने अपने विरोधियों को डकैत और लूटेरा कहना कब से सीख लिया? कौन सीखा रहा है आपको? अपने विरोधियों के लिए इस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल करने के लिए, ये तो गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य है।  मैंने नेता विरोधी दल के रुप में संसद में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज को भी देखा है, साथ ही प्रधानमंत्री के रुप में अटल बिहारी वाजपेयी को भी देखा है, पर आज तक अपने विरोधियों के लिए आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग करते, मैंने भाजपा के इन महान नेताओं को नहीं देखा।
आप ये न भूलें कि आप भाजपा जैसी पार्टी के नेता है, झारखण्ड जैसे राज्य के मुख्यमंत्री है, जहां की भाषा में मिठास है, जहां की बोली में मिसरी घुली हुई है, कृपया अपने इस प्रकार के वक्तव्य से स्वयं को छोटा न करें और भाजपा के खिलाफ एक बड़ी फौज खड़ी करने की कोशिश न करें, क्योंकि लोकतंत्र में जनता सभी नेताओं और पार्टियों को देख रही होती है, अगर शिबू सोरेन और उनके बेटे हेमंत ने गलत की है, तो आज उनकी स्थिति क्या है? वे सत्ता से बाहर है।
वक्त आने पर लोकतंत्र में जनता स्वयं ही निर्णय कर देती है, आप इसकी चिंता क्यों कर रहे है? आप चिंता करना छोड़िये। जिस प्रकार की भाषा आपने शिकारीपाड़ा में प्रयोग किया है, अगर ऐसी भाषा का प्रयोग आपने एकाध जगह और कर दिया, तो समझ लीजिये, आपने झामुमो को जीवनदान दे दिया। ऐसे भी आप जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर रहे है, आपके आस-पास रहनेवाले लोग भी उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करने लगे है। जो किसी भी प्रकार से सहीं नहीं है। सत्ता का दंभ बहुत को नीचे ले जाता है। ढाई साल पूरे होने को है, ढाई साल और खत्म होने में कितने समय लगेंगे। फिलहाल जो स्थिति है, उसे जानने की कोशिश करें। हेमंत धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहे है और आपकी स्थिति डगमगा रही है, शायद आपको नहीं पता।

Saturday, April 15, 2017

ऐसे-ऐसे लोग बनेंगे..............

ऐसे-ऐसे लोग बनेंगे मुख्यमंत्री के प्रेस एडवाइजर, तो झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का बेड़ागर्क होना तय है...
जी हां, झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के प्रेस एडवाइजर है Yogesh Kislay, ये मुख्यमंत्री को क्या सलाह देते होंगे?, पत्रकारों के साथ कैसा इनका संबंध होगा? उसकी बानगी देखिये...
कल १४ अप्रैल था, यानी बाबा साहेब भीम राव अँबेडकर का जन्मदिन। सारा देश अपने – अपने ढंग से इस महापुरुष का जन्मदिन मना रहा था, उनके आगे कृतज्ञता ज्ञापित कर रहा था, पर झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के प्रेस एडवाइजर को इन सबसे अलग हटकर एक ऐसा फोटो हाथ लग गया कि वे इसे अपने फेसबुक वॉल पर डाल दिये और यह भी लिखा कि “आरक्षण का कमाल। भीमराव अंबेडकर जयंती पर नेताजी को माल्यार्पण। बिहार से आई तस्वीर” जिसे लगे हाथों Satya Prakash Prasad  ने मुद्दा बनाया और इसकी गंभीरता को बहस का विषय बनाया। जो जरुरी था। बहस आज भी चल रही है। इस बहस में कुछ लोग अच्छी बातें भी कर रहे है, जिससे सामाजिक समरसता को बल मिल रहा है, वहीं इस पर कुछ लोग ऐसे भी है जो बाल का खाल निकाल कर पूरे समाज को कैसे आग में झोंक दिया जाय? इसका भी उपाय ढूंढ रहे है, जैसे सत्य प्रकाश प्रसाद के पोस्ट पर  Vishnu Rajgadiya की टिप्पणी देखिये – जिसमें उन्होंने लिखा है कि “इससे यह भी समझ लें कि सवर्ण मानसिकता के निशाने पर सिर्फ अल्पसंख्यक ही नहीं, दलित-पिछड़े और आदिवासी भी हैं।” यानी इस व्यक्ति के अंदर सवर्णों के प्रति कितना जहर भरा है, वह इस एक वाक्य से पता चल जाता है। भाई दलितों के उपर अत्याचार हो या किसी और पर, एक पत्रकार की ये भाषा या किसी सम्मानित व्यक्ति कि ये भाषा हो सकती है क्या? अगर कोई सवर्ण समुदाय में जन्म ले लिया तो आप उसके खिलाफ विष वमन करोगे, उसकी मानसिकता पर सवाल खड़ा करोगे, धिक्कार है ऐसी सोच पर और ऐसी मानसिकता पर।
और अब बात... योगेश किसलय से...
अगर किसी ने गलती से भी ऐसा कर दिया तो क्या आप इसे आरक्षण से जोड़ेंगे? क्या आपको पता है कि आप जिस जाति से आते है, वहां भी ऐसे लोगों की भरमार है, गलतियों और मूर्खताओं की जाति या आरक्षण से क्या मतलब? हमने बहुत सारे लोगों को देखा है जो विभिन्न जातियों से आते है, स्वयं को बहुत श्रेष्ठ मानते है, पर कुछ ऐसी गलतियां कर देते है, जिससे उनकी जगहंसाई हो जाती है, इसलिए इस पूरे प्रकरण को आरक्षण से जोड़ना निहायत बेवकूफी है, आपको स्वीकार करना पड़ेगा कि आपसे गलती हुई और अगर गलती हुई है तो उससे भी बड़ी बात, अपनी गलती को स्वीकार कर, क्षमा मांगना है, न कि उस पर धृष्टता के साथ अडिग रहना।
आपकी दूसरी गलती ये फोटो बिहार से आई है, आपको क्या लगता है कि बिहार के लोग ही ऐसा करने में माहिर है, ये मानसिकता भी ठीक नहीं, जबकि आपने एक व्यक्ति विशेष के हवाले से कमेंटस दिया है, जिसमें उस व्यक्ति विशेष ने आपको बताया है कि ये पूरा मामला हरदोई का है, तो अब आप बताये कि हरदोई कहां है?
अपना पक्ष...
गलतियां किसी से भी हो सकती हैं, उसे इस प्रकार से तूल देना, उसे जाति-धर्म से जोड़ना, आरक्षण की बातें करने लगना, इसे लेकर एक समुदाय को कटघरे में खड़ा करना, मूर्खता के सिवा कुछ नहीं, हम सब की जिम्मेवारी है, कि कहीं भी गलत होता है, तो उसका विरोध करें, पर बात का बतंगड़ और सामाजिक विद्वेष न फैलायें, एक बात और यह भी ध्यान रखे कि गलत करनेवाला कौन है? सामान्य व्यक्ति की गलतियों को सुधरने या सुधारने का मौका दीजिये, जबकि असामान्य व्यक्ति के लिए माफी की कोई जगह नहीं, यहां जो गलतियां हमें दीख रही है, वह अज्ञानता है औैर कुछ नहीं...

Friday, April 14, 2017

....... और लिट्टीपाड़ा में भाजपा हार गयी।

ये किसकी हार है? दस लोग दस किस्म की बातें...
कुछ लोग इसे रघुवर सरकार की हार मानते हैं।
कुछ लोग इसे रघुवर दास की व्यक्तिगत हार मानते हैं। कुछ लोग रघुवर सरकार की गलत नीतियों की हार मानते हैं।
कुछ लोग इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हार मानते हैं। कुछ लोग झारखण्ड मुक्ति मोर्चा की परंपरागत सीट मानते हुए भाजपा की हार को अवश्यम्भावी मानते हैं, पर हार के मूल कारण सिर्फ यहीं है, मैं इसे नहीं मानता... लिट्टीपाड़ा में भाजपा की हार के और भी कई कारण है, जिस पर ध्यान देना जरुरी है, और इस हार पर कोई ध्यान दे या न दें, पर रघुवर दास को इस पर ध्यान देना जरुरी है, अगर वे चाहते है कि उनका राजनीतिक कैरियर उज्जवल रहे।
एक बात और, जो हमारे फेसबुक से जुड़े है या जो भले ही न जुड़े हो, पर गाहे-बगाहे हमारे फेसबुक वाल पर आकर नजरे चार करते है, वे अवश्य जानते है कि मैंने 1 अप्रैल को क्या लिखा था... मैंने खोलकर लिख दिया था कि लिट्टीपाड़ा में भाजपा की हार तय, साइमन को जीत की अग्रिम बधाई। ये बाते मैंने ऐसे ही नहीं लिख दी थी, ये मैंने अपने अनुभवों के आधार पर लिखी थी।
जरा रघुवर दास बताये कि
क्या अर्जुन मुंडा चाहेंगे कि हेमलाल मुर्मू लिट्टीपाड़ा सीट से चुनाव जीत जाये और इस जीत का श्रेय रघुवर दास लेकर चले जाये और फिर इस जीत पर रघुवर दास ये कहें कि जो भाजपा में रहते बाबूलाल नहीं कर सकें, अर्जुन मुंडा नहीं कर सकें, वो रघुवर दास ने कर दिया। क्या भाजपा में ही रहकर लुईस मरांडी चाहेंगी कि वो लिट्टीपाड़ा से हेमलाल मुर्मू को जीता कर संताल परगना क्षेत्र में एक नये प्रतिद्वंदी को जन्म दे दें, जो आगे चलकर उनका ही पत्ता काट दें। ये रघुवर दास को स्वयं सोचना होगा।
यहीं नहीं, लिट्टीपाड़ा में भाजपा के हार के और भी कई कारण है...
पहला कारण भाजपा में आत्मघातियों की संख्या का सर्वाधिक होना, जो कहने को तो भाजपा में थे, पर वे दिल से चाहते थे कि यहां से झामुमो जीते और इस हार का ठीकरा वे रघुवर दास के माथे फोड़े और ये कहें कि रघुवर की नीतियों को जनता नकार दी, वे जिस विकास के मुद्दे पर चल रहे है, जनता उनसे इत्तेफाक नहीं रखती, जबकि सच्चाई यह है कि जिस विधानसभा सीट के आज चुनाव परिणाम आये है, वहां की जनता को भी विकास से कोई मतलब नहीं, वह विकास और वोट का मतलब तीर-धनुष से अधिक नहीं जानती। वहां स्थिति ऐसी है कि आप चाहे जो कर लें, वहां जीतेगा भी तीर-धनुष और हारेगा भी तीर-धनुष, क्योंकि वहां की जो सामाजिक स्थिति ऐसी बन चुकी है कि उसे भेद पाना सामान्य सी व्यक्ति की औकात नहीं।
दूसरा कारण रघुवर दास के कनफूंकवों का आंतक है, मुख्यमंत्री रघुवर दास कनफूंकवों से इस प्रकार घिर गये है, जैसे लगता है कि कनफूंकवे उनके सर्वश्रेष्ठ शुभचिन्तक हैं                                                                                                                                                                                       जबकि सच्चाई यह है कि इन कनफूंकवों ने इनकी हर जगह ऐसी जगहंसाई कर दी है कि अब ये चाहकर भी अपनी बेहतरी नहीं कर सकते, मोमेंटम झारखण्ड का आयोजन कर हाथी को उड़वा देना, उन्हीं में से एक है, जिसकी आलोचना झारखण्ड ही नहीं बल्कि दूसरी जगहों के लोगों ने भी की।
तीसरा कारण भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं को सम्मान न देकर, उनकी खिल्ली उड़ाना, मजाक उड़ाना भी है, साथ ही अपने मंत्रियों को नीचा दिखाते हुए नौकरशाहों को तवज्जों देना भी है, आये दिन देखा जा रहा है कि जहां भी मुख्यमंत्री रघुवर दास का कार्यक्रम होता है, यहां की मुख्य सचिव स्वयं को नेता से कम स्वयं को नहीं शो कर रही है, यहीं हाल राज्य के अन्य आईएएस अधिकारियों का है, स्थिति यह हो गयी कि मंत्रियों को, विधायकों को ये अब आईएएस अधिकारी भाव ही नहीं देते, इससे जनता और जनप्रतिनिधियों में सरकार के प्रति गुस्सा पनप रहा है, जो वोट के रुप में सामने आ रहा है। हाल ही में कई कार्यक्रमों में भाजपा विधायकों-मंत्रियों को भाषण देने का मौका ही नहीं मिल रहा और ये सारा मौका मिल जा रहा है, आईएएस अधिकारियों को, जिनका काम भाषण देना कम, और सरकार के कार्यों और विकासात्मक योजनाओं को क्रियान्वयन करना है, पर देखा जा रहा है कि नौकरशाह काम कम और भाषण कुछ ज्यादा देने लगे है, जिसका परिणाम सामने है।
चौथा कारण संघ से सरकार की दूरी। ज्यादातर राज्यों में जहां भाजपा की सरकारें है वहां संघ और सरकार में एक मधुर संबंध है, जिसके द्वारा सरकार अनेक कार्यक्रमों का सृजन कर समाज और राज्य को नई दिशा दे रहीं है, जबकि इसके उलट यहां की सरकार संघ के पदाधिकारियों और उसके अनुषांगिक संगठनों को ही ठेंगा दिखा रही है, जिससे संघ के लोगों ने लिट्टीपाड़ा विधानसभा चुनाव से स्वयं को दूर कर लिया।
पांचवा कारण रघुवर सरकार ऐसे-ऐसे लोगों को आगे बढ़ा रहीं है, जो किसी भी दृष्टिकोण से भाजपा को पसंद नहीं करते, ऐसे लोगों को हर प्रकार से सहयोग कर रही है, उन्हें पुरस्कृत कर रही है, उन्हें खुलकर आर्थिक मदद कर रही है और जो लोग इनके लिये जान देते है, उन्हें ही शोषण कर रही है, आज ही का परिणाम देखिये एक झामुमो के परिवार को रघुवर सरकार ने कई बार पुरस्कृत किया, उसे मोमेंटम झारखण्ड में बुलाकर उसकी आरती उतारी और आज वहीं शख्स रघुवर दास को फेसबुक वॉल पर गाली दे रहा है, पर रघुवर दास को ये मालूम हो तब न...
छठा कारण रघुवर दास की कार्यप्रणाली के खिलाफ बढ़ता असंतोष, जिसकी जानकारी मुख्यमंत्री रघुवर दास को नहीं है, क्योंकि कनफूंकवें उन्हें इस प्रकार से अपहरण कर चुके है, कि उन्हें सही और गलत की जानकारी का ऐहसास नहीं, मैं देख रहा हूं कि जब भी कोई उन्हें सही जानकारी देने की कोशिश करता है, कनफूंकवे उसी व्यक्ति की मुख्यमंत्री के द्वारा मुख्यमंत्री का कान फूंककर, उसकी बांट लगा देते है, जिसका परिणाम सामने है, पहले लोहरदगा, फिर पांकी और अब लिट्टीपाड़ा।
सातवां कारण राज्य में विकास योजनाओं की लूट का बढ़ता प्रचलन- राज्य के आईएएस-आईपीएस अधिकारियों का दल जमकर लूट मचा रहा है और इस लूट में वे अपने घर के बेरोजगार बच्चों को भी शामिल कर रहे है, ठेकेदारों को कहा जा रहा है कि वे अपनी कंपनी में उनके बच्चों के शेयर दें, जिसका लाभ ठेकेदार और वरीय अधिकारी दोनों मिलकर सहजीविता के आधार पर उठा रहे हैं, अगर यहीं सब चलता रहा तो एक दिन झारखण्ड में एक भी विकास योजनाएं जमीन पर नहीं दिखेंगी, जबकि लूटेरों के घर और परिवार मालामाल होकर झारखण्ड से बाहर बस जायेंगे।
अभी भी वक्त है, मुख्यमंत्री रघुवर दास संभल जाये, नहीं तो आनेवाले समय में भाजपा एक भी लोकसभा की सीट नहीं जीत पायेंगी और न विधानसभा में उनका नाम लेनेवाला होगा।
जरा मुख्यमंत्री खुद सोचे, उन्होंने कनफूंकवों के कहने पर सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को एक लाख स्मार्टफोन दिलवा दिये, तो क्या हुआ, वोट मिल गया... जिन आदिम जनजाति के युवाओं को नियुक्ति पत्र मिल चुकी थी, कनफूंकवों के कहने पर फिर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों नियुक्ति पत्र दिलवा दिया, क्या इससे वोट मिल गया... मैं पुछता हूँ कि साहेबगंज में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों इसी समय पुल का शिलान्यास कराने की क्या जरुरत थी, आपने सोचा कि इसका माइलेज मिलेगा और हो गया उलटा... अरे भाई जनता की नब्ज आप नहीं  जानते, इसलिए हम बताते है, कनफूंकवों की मत सुनिये, नौकरशाहों पर लगाम लगाइये, जो लोग योग्य है, उन्हें इज्जत दीजिये, जो गलत कर रहे है, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाइये, अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाइये, अपने परिवार के लोगों पर लगाम लगाईये तथा बेहतर झारखण्ड के निर्माण में प्रमुख भुमिका निभाइये पर आप ये बातें मानेंगे, हमें नहीं लगता, क्योंकि कनफूंकवों से आगे आप निकल ही नहीं पायेंगे।
दूसरी ओर झामुमो के हेमंत सोरेन को हम बधाई जरुर देंगे, क्योंकि जहां एक ओर सत्ता की सारी मशीनिरियां उनकी पार्टी को हराने में लगी थी, हेमंत ने सारी मशीनरियों को धत्ता बताते हुए अपने कार्यकर्ताओं की मदद से भाजपा को उसकी औकात बताई, साइमन को जीत दिलाई, पर साइमन कल क्या करेंगे? खुद साइमन को नहीं पता, इसलिए हेमंत को ज्यादा कूदने की आवश्यकता नहीं, बल्कि वे सामान्य ढंग से इस जीत को ले, ज्यादा न उछले, क्योंकि भाजपा की हार, उसके लोगों ने खुद इस बार मिलकर कराई है...

Thursday, April 13, 2017

यहां मुख्यमंत्री रघुवर दास की प्रशंसा करनी होगी......

मुख्यमंत्री रघुवर दास की भतीजी (मुख्यमंत्री रघुवर दास के भाई मूलचंद की बेटी) का पति फोटो जर्नलिस्ट मदन साहु की पत्नी के साथ हीरे नामक सिक्ख युवक ने छेड़खानी की, जिसकी प्राथमिकी गोलमुरी थाने में दर्ज करा दी गयी, चूंकि मामला मुख्यमंत्री रघुवर दास से जुड़ा था, जिस महिला के साथ छेड़खानी हुई, वो महिला रघुवर दास के भाई मूलचंद की बेटी है। हाई प्रोफाइल मामला देख पुलिस ने दबिश बढ़ाई, और हीरे ने गोलमुरी थाने में स्वयं को आत्मसमर्पण करा दिया।
इसी बीच रघुवर दास के भाई मूलचंद और उनके रिश्तेदारों पर आरोप है कि हीरे की उन सब ने मिलकर हाजत में पिटाई कर दी, जिससे हीरे के पक्ष में सारा सिक्ख समाज आ खड़ा हुआ, तथा मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों पर कार्रवाई करने के लिए हंगामा खड़ा कर दिया, दूसरी ओर रांची आकर सिक्ख समाज के कुछ लोग मुख्यमंत्री रघुवर दास से स्वयं आकर मिले और इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने स्वयं पुलिस को ईमानदारी के साथ तथा बिना किसी पक्षपात के जांच करने और दोषियों को दंडित करने का आदेश दिया। फिर क्या था? इधर मुख्यमंत्री रघुवर दास के रिश्तेदार मुख्यमंत्री रघुवर दास से बिदक गये, उन्हें लगा था कि वे मुख्यमंत्री के रिश्तेदार है, तो इसका उन्हें लाभ मिलेगा, पर ऐसा संभव नहीं हुआ...
दूसरी ओर सिक्ख समाज छेड़खानी करनेवाले युवक हीरे को बचाने मे लगा है...
जमशेदपुर में पत्रकारों का दल किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है कि वह करें तो क्या करें? चूंकि मामला फोटो जर्नलिस्ट की पत्नी के साथ छेड़खानी का भी है, ऐसे में वह फोटो जर्नलिस्ट के साथ खड़ा रहे या मुख्यमंत्री रघुवर दास के पास जाकर छेड़खानी करनेवाले युवक को दंडित करने का अनुरोध करें...
जमशेदपुर में एक पक्ष वह भी है, जो भाजपा से ही जुड़ा है और चाहता है कि इस मुद्दे को सिक्खों की पिटाई से जोड़कर मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके रिश्तेदारों को ऐसा जलील कर दें कि राजनीतिक रुप से रघुवर दास को बौना सिद्ध कर दिया जाये, साथ ही यह दिखाया जाय कि देखो, जमशेदपुर में रघुवर दास के परिवार के लोगों ने क्या उधम मचा रखी है...
हमारा मानना है...
कि ऐसी घटिया सोच, ऐसी राजनीति समाज के लिए खतरनाक है, गलत जिस किसी ने भी किया हो, उसे सजा मिलनी चाहिए...
अगर गलत हीरे ने की, जिसने एक महिला के साथ छेड़खानी की तो उसे सजा मिलनी ही चाहिए, चाहे वह किसी भी समाज से आता हो, छेड़खानी करनेवालों को बचाना, बहुत बड़ा अपराध है...
दूसरी ओर कानून को अपने हाथ में लेनेवालों को भी, दंड मिलना ही चाहिए, क्योंकि सूत्र बताते है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास के भाई मूलचंद और उनके रिश्तेदारों की हरकतें भी पुलिस और स्थानीय समाज के प्रति सहीं नहीं है...
और ऐसे मामलों को राजनीति में उलझाने और उसका राजनीतिक माइलेज लेनेवालों को समाज के सामने नंगा करना चाहिए ताकि लोग जान सकें कि ये कौन लोग है? जो एक महिला के सम्मान को भी राजनीतिक चश्में से देखते है...
सचमुच इस मुद्दे पर जिस प्रकार से मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपनी प्रतिक्रिया दी और स्थानीय पुलिस को जो दिशा-निर्देश दिया, इस मुद्दे पर इनकी सराहना करनी होगी,  स्थानीय पुलिस से भी अनुरोध है कि वे इस मुद्दे को राजनीतिक न बनाकर, इंसानियत के चश्मे से इसे देखे और इस समस्या का शीघ्रातिशीघ्र हल निकालें।

Monday, April 10, 2017

मोदी और नीतीश से अपील..............

मोदी और नीतीश से अपील...
प्रभात खबर को साधुवाद...
सचमुच चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने के अवसर पर प्रभात खबर ने जो दो पृष्ठों का विशेष परिशिष्ट, वह भी मुख्य पृष्ठ पर दिया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है। ऐसे अवसरों पर देश व राज्यों के बच्चों को यह बताना कि आज का दिन कितना महत्वपूर्ण है, इसकी जिम्मेवारी लेना बहुत बड़ी बात है। अच्छा होता कि देश व राज्य के सभी अखबार चंपारण सत्याग्रह के महत्व को समझते, पर ऐसा संभव नहीं हुआ है। हम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी अनुरोध करेंगे कि चूंकि चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का टर्निंग प्वाइंट है, इसलिए इसे सामान्य समझने का भूल न करें और इस समय का देशहित में सही फायदा उठाये, क्योंकि सच्चाई यह है कि चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे हो जाने के बाद भी नई पीढ़ी को यह पता ही नहीं कि चंपारण सत्याग्रह का स्वतंत्रता आंदोलन में क्या भूमिका रही है? जबकि इतिहासकार और स्वतंत्रता सेनानियों का दल स्वीकार करता है कि गांधी को गांधी बनाने में चंपारण की भूमिका प्रमुख रही। यहीं कारण रहा कि सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रिचर्ड एटनबरो ने भी अपनी फिल्म गांधी में इसका खुबसुरती से चित्रण किया है।
अतः भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अनुरोध है कि वे अपने-अपने स्तर पर देश व राज्य के विभिन्न स्कूलों व कॉलेजों में चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने के अवसर पर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी अवश्य दिखाये, हो सके तो एक बार फिर दूरदर्शन पर इस फिल्म को पुनः दिखाया जाय, साथ ही गांधी के जीवनवृत्त, जिसमें चंपारण सत्याग्रह का विशेष जिक्र हो, इसकी एक लघु पत्रिका बनवाकर, जन-जन तक पहुंचाये जाये, ताकि लोग गांधी और चंपारण सत्याग्रह को आज के परिपेक्ष्य में कम से कम भूल न पायें...
यह समय की मांग भी है, क्योंकि वर्तमान में गांधी को भूलना, चंपारण को भूलना देश और बिहार दोनों के लिए आत्मघाती होगा।
#narendramodi #nitishkumar

Sunday, April 9, 2017

फैमिली की बात होती है............

हमारे यहां फैमिली में औरतें भी होती हैं, जिसे मां, मौसी, दीदी, बुआ, चाची, नानी, दादी आदि कहकर पुकारते हैं और जब फैमिली की बात होती हैं तो निःसंदेह हम फैमिली में रह रहे औरतों के विभिन्न रुप जैसे मां, मौसी, दीदी, बुआ, चाची, नानी, दादी यहां तक की पड़ोस की मां-बहनों की भी बातें करते है, साथ ही उन्हें हम उतनी ही इज्जत देते है, जिस सम्मान को पाकर वे अभिभूत हो जाती है, इसलिए विद्या बालन जी आपका ये संवाद कि फैमिली की बात होती है, बिजनेस की बात होती है, लेकिन औरतों की बात कम होती है, इसका हम कड़े शब्दों में प्रतिवाद करते है। प्राचीन इतिहास को उलटे तो हमारे यहां वेश्याओं को भी उतना ही सम्मान मिलता था, जितना एक सामान्य महिला को। आपने आम्रपाली का नाम जरुर सुना होगा, इस पर फिल्म भी बनी है, जरा देख लीजियेगा। पूर्व में एक फिल्म चित्रलेखा भी बनी थी, जरा देखियेगा। आपको समझ में आयेगा।
एक खास इलाके में अथवा एक परिवार में किसी ने महिला की बात नहीं सुनी, इसका मतलब ये नहीं कि पूरा समाज और देश को आप कटघरे में खड़ा कर दें। आश्चर्य है कि सूचना भवन के सभागार में आपने ये संवाद कहा है और आपका किसी ने प्रतिवाद भी नहीं किया होगा और न इस संबंध में किसी पत्रकार ने आपसे सवाल पूछे होंगे। पत्रकारों का सवाल नहीं पूछना और सूचना भवन में इस प्रकार के संवाद बोल जाना, ये भी बताता है कि आप महिलाओं को यहां कितना सम्मान मिलता है।
कल संयोग ही था रांची से प्रकाशित एक अखबार ने राज्य की कई महिलाओं को एक कार्यक्रम आयोजित कर सम्मानित किया, हालांकि मैं इस प्रकार के कार्यक्रम का कटु आलोचक हूं। सम्मान तो वह है, जैसे सुभाषचंद्र बोस और रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने मोहनदास गांधी को दिया था, जिसका प्रभाव ऐसा हुआ कि पूरी दुनिया गांधी को बापू और महात्मा कहकर संबोधित करती है। अखबार द्वारा या किसी संस्थान द्वारा दिया जानेवाला पीतल अथवा कागज का टूकड़ा सम्मान नहीं होता, बल्कि ये विशुद्ध रुप से व्यापार चलाने का अपने सामान की ब्रांडिंग करने का एक माध्यम है, पर अफसोस कि इसमें वे सारे लोग पहुंचते है, जिनसे समाज को आशाएं है, पर ये झूठी शान और सम्मान पाने के लिए इन कार्यक्रमों में पहुंचते है, तालियां बजवाते है, और फिर निकल लेते है। ये हमारे अपने विचार है, हो सकता है कि ये विचार किसी को अच्छे नहीं लगे।
विद्या बालन जी, आप झारखण्ड में हैं। इसी झारखण्ड में कुछ दिन पहले सरहुल मनाया गया, एक नेता अर्जुन मुंडा ने तो अपने घर में सरहुल मिलन समारोह आयोजित कराया और वहां देखा गया कि स्त्रियों और पुरुषों में कोई विभेद ही नहीं था, सभी एक दुसरे का सम्मान कर रहे हैं, नृत्य कर रहे है, संगीत से स्वयं को प्रकृति के साथ जोड़ रहे है। ऐसी जगह, इस प्रकार की छोटी बात, अच्छी नही लगती। यह बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं कि क्योंकि आपही का एक संवाद है, जो टीवी और रेडियों में खुब देखने और सुनने को मिलता है, जहां सोच वहां शौचालय, यानी सोच बदलिये...
मैं कहूंगा कि आप भी सोच बदल ही डालिये। महेश भट्ट के साथ रहकर महेश भट्ट के विचारों से ओतप्रोत न होकर, आप अपनी विचारों को पोषित करिये। राज्य सरकार का क्या है?  उसे तो कनफूंकवों ने अपने ग्रिप में ले लिया है। रघुवर दास को क्या पता कि महेश भट्ट का संघ और भाजपा के प्रति क्या दृष्टिकोण है? महेश भट्ट तो समय-समय पर भाजपा शासित राज्यों को औकात बताते रहते है, अभी हाल ही में टेलीग्राफ में छपे उस खबर को भी देख लीजिये, बस महेश भट्ट को मौका मिलना चाहिए, भाजपा शासित राज्यों को औकात बताने का, औकात बता देंगे।
हम अच्छी तरह जानते है कि बेगम जान जो फिल्म बनी है, वो देश और समाज को नई दिशा देने के लिए नहीं बनी है, ये बनी है विशुद्ध रुप से व्यवसाय के लिए, ये अलग बात है कि इसका फायदा किसको मिलेगा, पर सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खुलकर आप पर राज्य सरकार का कोष लूटा दिया है। आपकी फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया, पर इसका फायदा जनता को मिलेगा क्या? जरा पूछिये रघुवर दास से, कि महेन्द्र सिंह धौनी पर बनी फिल्म भी टैक्स फ्री हुई थी, उसका कितना फायदा आम जनता को मिला। मैं तो स्वयं जब उक्त फिल्म देखने गया, तो मुझे उतने ही पैसे चुकाने पड़े, जितने हमेशा चुकाने पड़ते थे। ये है सरकार और उसकी ढपोरशंखी घोषणाओं का ज्वलंत उदाहरण।
एक बात और कल ही मैंने देखा, कि सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में कार्यरत अधिकारियों का दल इस प्रकार आपके साथ सेल्फी लेकर, फेसबुक पर पोस्ट कर रहा था, जैसे उसे लग रहा था कि उसे भगवान से भेंट हो गई हो, इस भाव से भी समझिये कि यहां औरतों की क्या इज्जत है? जरा आइपीआरडी में कार्यरत उन अधिकारियों से पूछिये तो वे यहीं कहेंगे कि उनका जीवन धन्य हो गया, साक्षात विद्या बालन से उनकी भेंट हो गई और परम सुख को प्राप्त किया, जिस सुख को पाने के लिए ईश्वर भी लालायित रहते है,  हांलाकि आजकल हमारे देश में ये जो सेल्फी लेनेवाली कल्चर इधर विकसित हुई है, इस कल्चर ने अधिकारियों-कर्मचारियों और आम जनता के सम्मान को इस प्रकार नष्ट किया है, कि सेल्फी लेनेवाले को पता ही नहीं चल रहा कि वह जो कार्य कर रहा है, उसकी मर्यादा के अनुरुप है भी या नहीं, पर सेल्फी लेना है तो लेना है, इज्जत तो बाजार में बिकता ही है, बाजार से रुपये किलो खरीद लेंगे।
अंततः आपकी फिल्म बेगम जान खुब चले, लोगों को फिल्म पसंद आये, झारखण्ड आगे बढ़े, देश आगे बढ़े, इन्हीं कामनाओं के साथ, सभी को मेरा प्रणाम...

भाजपाइयों, पहले रघुवर को हटाओ.............

भाजपाइयों, पहले रघुवर को हटाओ फिर केजरीवाल से इस्तीफा मांगों...
सीएम रघुवर दास ने भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना की...
इस साल 30 मार्च को दिल्ली के सभी अखबारों ने उस समाचार को प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से छापा हैं, जिसमें दिल्ली के उप राज्यपाल अनिल बैजल द्वारा बुधवार को आम आदमी पार्टी से 97 करोड़ रुपये की वसूली करने के आदेश दिये है, यह धनराशि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन कर प्रचार पर खर्च की गयी थी। जांच समिति की रिपोर्ट के बाद यह आदेश जारी किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इन विज्ञापनों में आम आदमी पार्टी को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गयी थी। उप राज्यपाल अनिल बैजल ने मुख्य सचिव एम. एम. कुट्टी को आदेश दिया है कि वे इस मामले में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करें और 30 दिनों के अंदर यह वसूली कर लें।
अखबार ने लिखा है कि दिल्ली सरकार विज्ञापन एजेंसियों को करीब 42 करोड़ रुपये की धनराशि जारी भी कर चुकी है। आदेशों के मुताबिक ये विज्ञापन तय मानकों के मुताबिक जारी नहीं किये गये थे। उप राज्यपाल अनिल बैजल ने सचिव सूचना प्रचार निदेशालय को तत्काल नोटिस जारी करने के भी आदेश दिये है। ज्ञातव्य है कि विज्ञापनों के माध्यम से सीएम अरविन्द केजरीवाल के चेहरे का धड़ल्ले से प्रयोग किया गया था। जिसके खिलाफ दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने शिकायत दर्ज करायी थी, जिनमें अरविन्द केजरीवाल सरकार पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करने का आरोप था। इन शिकायतों में स्वयं के प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का भी आरोप शामिल था, साथ ही इन्हें सुप्रीम कोर्ट के 13 मई 2015 के आदेशों का उल्लंघन भी बताया गया था।
ज्ञातव्य है कि इस प्रकरण पर दिल्ली के महालेखाकार ने भी सवाल खड़े किये थे। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली सरकार ने करीब 24 करोड़ रुपये के ऐसे विज्ञापन जारी किये जो नियमानुसार जारी नहीं किये जाने चाहिए थे।
जरा ध्यान दें, क्या कहता है, सुप्रीम कोर्ट...
• नेताओं की तस्वीरें विज्ञापनों में किसी भी स्थिति में प्रयोग नहीं होंगी।
• सिर्फ प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सीजेआई के ही फोटो लगाये जा सकते हैं।
• मृत नेताओं की याद में उनकी तस्वीरों को इस्तेमाल किया जा सकता है।
इधर उप-राज्यपाल अनिल बैजल द्वारा आम आदमी पार्टी से 97 करोड़ रुपये वसूलने के आदेश पर दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि यह खेद का विषय है कि जो व्यक्ति शुचिता की राजनीति का वादा करने सत्ता में आया था। वह सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का दोषी पाया गया है। अरविन्द केजरीवाल की जगह कोई और होता, तो इस पद से अब तक इस्तीफा दे देता।
अब यहीं सवाल मनोज तिवारी और भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं से जो रांची से लेकर दिल्ली तक फैले है, ठीक इसी प्रकार की हरकत झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने की है, आप इन्हें कब हटा रहे हो, हटाने की बात इसलिए हमने की है, चूंकि इनसे इस्तीफा तो विपक्षी मांगेंगे, हटाने का काम तो आप ही का है, क्योंकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जैसा ही अपराध झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी की है।
क्या किया है झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने...
• अपना चेहरा चमकाने के लिए जमकर अब तक करोड़ों खर्च किये, अकेले 100 करोड़ से भी ज्यादा तो केवल मोमेंटम झारखण्ड में सिर्फ दो दिन के कार्यक्रम में फूंक दिये, जबकि सर्वोच्च न्यायालय का सख्त आदेश है कि नेताओं की तस्वीरें विज्ञापनों में किसी भी स्थिति में प्रयोग नहीं होंगी। सिर्फ प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सीजेआई के ही फोटो लगाये जा सकते हैं। मृत नेताओं की याद में उनकी तस्वीरों को इस्तेमाल किया जा सकता है, पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना करते हुए झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जमकर अपना चेहरा चमकाया। मुख्यमंत्री रघुवर दास द्वारा बेहिसाब किये गये इस खर्चें को सीएम रघुवर दास से कैसे वसूला जायेगा?
• ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियों को रांची बुलाया और उन पर जमकर करोड़ों खर्च किये, इनमें कई तो पूर्व में ब्लैक लिस्टेड कंपनियां भी है, जो आज नाम बदलकर यहां काम कर रही है, इन ब्रांडिंग कंपनियों ने जितने भी विज्ञापन निकाले, वो ज्यादातर गड़बड़ थे, ये आज भी गड़बड़ ही कर रहे है, अशुद्धियां इतनी है, कि पूछिये मत, फिर भी रघुवर सरकार, इन पर क्यों प्यार लूटा रही है, आप समझ सकते है, जबकि सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, मुख्यमंत्री रघुवर दास के पास ही है।
• यहीं नहीं ऐसे विज्ञापन भी प्रचारित और प्रसारित किये गये, जिनका आज की तिथि में कोई उपयोग नहीं है, पर अपना चेहरा चमकाने के लिए मुख्यमंत्री रघुवर दास ने ऐसा किया। विज्ञापनों को भी मानक के अनुरुप नहीं रखा गया है।
लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जिन मुद्दों को लेकर अरविन्द केजरीवाल की आज किरकिरी हुई, उसमें मुख्य भूमिका कांग्रेस पार्टी की रही, उसके अजय माकन ने इसकी लड़ाई लड़ी और उनकी जीत हुई पर झारखण्ड की प्रमुख विपक्षी पार्टियां सरकार के इस गलत निर्णयों के विरोध की जगह, उनके आगे ठुमरी गा रही है।
जो दिल्ली के भाजपा नेता अरविन्द केजरीवाल से इसी मुद्दे पर इस्तीफा मांग रहे है, आज यहीं के भाजपा नेता बगले झांक रहे हैं... इस पर किसी को जवाब भी नहीं सूझ रहा...
रही बात, यहां के महालेखाकार की, देखते है कि वे इस प्रकरण पर क्या रोल अदा करते है? पर इतना तय है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना करने में और अपना चेहरा चमकाने में झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास किसी भी प्रकार से अरविन्द केजरीवाल से उन्नीस नहीं, बल्कि बीस है...
#Narendramodi #Amitshah #RSS

Thursday, March 30, 2017

इसलिए वह जाहिल है, हिन्दू है.........

वह होली मनाता है...
वह दीपावली मनाता है...
वह रक्षाबंधन पर्व मनाता है...
वह दुर्गापूजा, रामनवमी, जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि का पर्व मनाता है...
वह भारत में स्थित तीर्थस्थानों का परिभ्रमण करता है...
वह गौ को पूजता है...
वह नदियों को पूजता है...
वह पहाड़ों को पूजता है...
वह पेड़ों को पूजता है...
इसलिए वह जाहिल है, हिन्दू है...
भारत में रह रहे ऐसे बहुसंख्यक हिन्दु समुदाय को – बीबीसी, एनडीटीवी, प्रभात खबर, वामपंथी बुद्धिजीवियों और वामपंथी पत्रकारों, साथ ही यहां धर्मांतरण का खेल कर रही ईसाई मिशनरियों का दल जाहिल और मूर्ख समझता है, इसलिए हिन्दू विरोधी आलेखों एवं समाचार प्रसारण ही इनका मुख्य केन्द्र बिन्दु बनता जा रहा है। ये लोग अन्य धर्मों में व्याप्त अँधविश्वास एवं रुढ़िवाद को अपने यहां चर्चा का केन्द्र बिन्दू नहीं बनाते। उसका मुख्य कारण है -  भारतीयों और हिन्दूओं को पूरे विश्व के सामने आले दर्जें का मूर्ख और जाहिल बताना... ...साथ ही वे ये भी जानते है कि अगर वे हिन्दूओं को छोड़कर अन्य धर्मों के खिलाफ कुछ लिखेंगे या चलायेंगे तो उनकी दुकान बंद होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी, चूंकि हिन्दू सहिष्णु होते है और हिन्दूओं के अंदर ही एक वर्ग ऐसा भी होता है, जो गाली देने से लेकर स्वयं गाली सुनने में भी आनन्द की प्राप्ति करता है, ये चैनल और अखबारवालों ने ऐसे लोगों के संरक्षण में अपना काम करना शुरु कर दिया है।
इन दिनों जब से भाजपा का देश में प्रादुर्भाव हुआ और विभिन्न राज्यों में भाजपा एक सशक्त दल के रुप में उभरी, तब से लेकर आज तक इनके पेट में दर्द इस प्रकार बढ़ा है कि पागलों की तरह ये अकबका रहे है, नाना प्रकार की झूठी-अतार्किक कार्टूनों-समाचारों-फिल्मों का निर्माण कर एक दूसरे के यहां छापने- दिखाने का दौर इनके यहां चल पड़ा है। आजकल तो ये इतने गुस्से में है कि वे भारतीय मतदाताओं को भी उलटा-सीधा बोल रहे है, उन्हें सांप्रदायिक बता रहे है...
भारतीय मतदाताओं को सांप्रदायिकता की तराजू में तौलनेवाले, पैसा और पद को ही एकमात्र अपना जीवन का अंग समझनेवाले इन मूर्खों का दल फिलहाल भारत के सम्मान के साथ खेल रहा है। ये लोग परिचर्चा का विषय कुछ अलग भी रखेंगे, फिर भी ये ले-देकर हिन्दू-भाजपा पर ही आ खड़ें होंगे। जिससे भारतीय जनता में इनके खिलाफ नाराजगी का बोध साफ दिखाई पड़ रहा है, शायद यहीं कारण है कि इनकी घटियास्तर की मनोवृत्ति से आजिज होकर भारत के मतदाता भी जोर-शोर से भाजपा के पक्ष में खड़े हो रहे हैं...
स्थिति ऐसी है कि अब तो जनता भी इनके खिलाफ लोहा ले रही है, पर बेशर्मों को शर्म नहीं। याद करिये नवरात्र का समय भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अमरीका दौरा। एक पत्रकार राजदीप सरदेसाई, अमेरिका में कैसे भारतीयों के खिलाफ अनाप-शनाप बक रहा था, जिससे गुस्से में आकर वहां के अमेरिकन भारतीय मूल के नागरिकों ने मिलकर उसे उसी समय छट्ठी रात का दूध याद दिला दिया। पत्रकारिता का मतलब या आपके पास अवैध ढंग से पैसे आ गये तो इसका मतलब ये नहीं कि आप भारतीयों को गाली दें, आप उन्हें नीच दिखाये, आप नैतिक मूल्यों को जीवन में प्रतिष्ठित करनेवाले भारत के गर्भ से निकली महाकाव्यों-ग्रंथों को गालियों से सीचें। एक बात जान लीजिये, ऐसे भी अब पहलेवाली बात नहीं रही, कि आप जो बोलेंगे और जनता आपके साथ हो लेगी, जनता आप सब को जवाब दे रही है, पर आप सुधरने का नाम नही ले रहे, वो कहते है न कि रस्सी जल गया पर बल नहीं गया...
आप अपना काम करते रहिये, भारतीयों का दल अपनी गति से चलेगा, भारत अपनी गति से चलेगा... क्योंकि भारतीय जानते है कि उन्हें करना क्या है? आपके विधवा प्रलाप का कोई असर इन भारतीयों पर पड़ने नहीं जा रहा...  अब आप स्वयं आकलन करिये कि जाहिल कौन है? जिन्हें आप जाहिल बता रहे है वे या स्वयं आप, समझे बीबीसी, एनडीटीवी, प्रभात खबर, वामपंथी बुद्धिजीवियों और वामपंथी पत्रकारों, साथ ही यहां धर्मांतरण का खेल कर रही ईसाई मिशनरियों...

Monday, March 27, 2017

नकलची राजा सुबल दास की कथा................

बहुत दिनों की बात है, भारत देश में एक भूखण्ड नामक राज्य था। जहां सुबल दास नामक नकलची राजा का शासन चलता था। उसके आस-पास उसे बुद्धिदेनेवाले कनफूंकवों की खुब चलती थी।
कनफूंकवे जानते थे, कि सुबल दास को बुद्धि नहीं है, इसलिए वे उसे ऐसी-ऐसी बुद्धि दिया करते, जिससे उसका सम्मान राज्य की जनता की नजरों में दो कौड़ी से अधिक नहीं थी। भूखण्ड राज्य की प्रजा भी जानती थी कि उसका राजा बेवकूफ व नकलची है, इसलिए उसे वह ज्यादा भाव नहीं देती।
एक दिन नकलची सुबल दास को उनके कनफूंकवों ने बताया कि आप राज्य में योजना बनाओ अभियान की शुरुआत करिये, इससे आपको पब्लिसिटी भी मिल जायेगी, राज्य की जनता का भला भी हो जायेगा और आपकी सर्वत्र जय-जय हो जायेगी। राजा सुबल दास ने ऐसा ही किया, देखते ही देखते उसकी जय-जय होने लगी। इसी बीच कनफूंकवों ने देखा कि सुबल दास उसके ग्रिप में आ गया है, तो कनफूंकवों ने कहा कि महाराज जी, बहुत दूर एक राज्य है, जिसका नाम गुर्रात है, वहां भाइब्रेंट गुर्रात हुआ, जिससे वहां निवेश की ऐसी धारा निकली, कि गुर्रात राज्य बहुत आगे निकल गया, फिर क्या था – राजा सुबल ने ऐलान कराया कि वह भी अपने भूखण्ड प्रदेश में इसी से मिलता-जूलता एक मोमेंटम भूखण्ड करायेगा। इसे कराने के लिए पैसे की कोई चिन्ता नहीं रहेगी, पैसा पानी की तरह वह बहायेगा, अपना चेहरा चमकायेगा।
इधर दूसरे राज्यों में रह रहे कई चेहरा चमकाने वाले ब्रांडिंग कंपनियों को पता चला कि भूखण्ड राज्य के राजा सुबल को अपना चेहरा चमकाने की बीमारी लग गयी, तो वे भी अपने लाव-लश्कर के साथ आ जूटे और जमकर भूखण्ड राज्य का दोहन किया और अंत में अच्छी-खासी राशि लेकर वे अपने प्रदेश को लौट गये।
इसी बीच अपने प्रदेश लौटे, इन कंपनियों को लगा कि सुबल राजा से और पैसे लिये जा सकते है, तो उन्होंने फिर बिल बनाया और कहा कि महाराज आपके भोजन पर करोड़ों खर्च हो गये, उसे भी दिया जाय। सुबल राजा ने कहा – आदेश का पालन हो, और इन सबको मुंहमांगी रकम दी जाये। राजा सुबल दास के आदेश से ये काम भी पूरा हो गया।
दो साल बीतने के बाद पड़ोस के एक प्रदेश में आम चुनाव हुए, वहां भारी मतों से एक सुनाथ नामक संत का शासन आया। सुनाथ ने लड़कियों के सम्मान की रक्षा के लिए एंटी सोमियो नामक अभियान चलाया और कहा जाता है कि सुनाथ जहां से आता था, वहां कई कस्बों और मुहल्लों के नाम भी उसने बदल दिये थे, जिसके कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी। कनफूंकवों ने भूखण्ड राज्य के राजा सुबल दास को बताया कि वह भी सुनाथ की तरह ऐसे ही निर्णय ले लें। फिर क्या था – सुबल राजा ने अपने सिपाहियों को बुलाया और कहा कि उसके राज्य में भी एंटी सोमियो नामक अभियान चलाया जाये और सगर हुटारी शहर को खुशी नगर घोषित किया जाय।
फिर क्या था – राजा सुबल दास के आदेश पर यह भी काम हो गया। सुबल दास के चाहनेवाले अखबारों और चैनलों में सुबल की चर्चाएं होने लगी, फिर भी जो सुनाथ को लोकप्रियता मिल रही थी, वह लोकप्रियता सुबल दास को नहीं मिल रही थी। हार-पछता कर सुबल दास क्या करें?, नकल का कौन सा, ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाएं, इस पर चर्चा करने के लिए उसने पुनः अपने आस-पास के मूर्खों-कनफूंकवों को वह अपने विशेष कक्ष में बुलाया, क्योंकि उसके राज्य में सिट्टीपाड़ा नामक जगह पर उपचुनाव होनेवाला था, जिसमें उसके विरोधियों ने सुबल दास को औकात बताने के लिए हर प्रकार का प्रबंध कर दिया था। इधर उप चुनाव में उसके लोग जीते, इसके लिए सुबल दास को कनफूंकवों ने बताया कि वह अपने राज्य में अल्पसंख्यकों के हितों पर ध्यान दें तथा बहुसंख्यकों पर ध्यान देना बंद करें, जैसे कैबिनेट से अल्पसंख्यक नगर को बसाने का प्रबंध किया जाये, उनके लिए एक विशेष हाउस बनाया जाये। राजा सुबल दास ने ऐसा ही किया, पर भला अल्पसंख्यक सुबल दास को अपना राजा मान लें, ऐसा संभव ही न था। बेचारा सुबल दास, इसी उधेड़-बुन में घुलता जा रहा था।
इधर भूखण्ड राज्य के राजा सुबल दास के विरोधियों का खेमा, खुश था कि सुबल दास के कनफूंकवों की वजह से उन सबकी लोकप्रियता बढ़ रही थी। बिना किसी विरोध या आंदोलन के ही भूखण्ड राज्य की जनता सुबल दास को सबक सिखाने के लिए मन बनाने का संकल्प ले रही थी। जैसे ही सुबल दास को इस बात की जानकारी मिली तो उसने अपने पार्टी के मुख्यालय में अपने मंत्रियों का दरबार लगवाना प्रारंभ करवाया, और ये दरबार लगवाने का भी फायदा सुबल दास को नहीं मिला। सुबल दास के इन हरकतों से राज्य की जनता उसे नकलची, तो कभी उछलने-कूदने वाले फिल्म स्टार का तमगा दे दी, साथ ही आनेवाले तीन साल का इंतजार करने का मन भी बनाली, जैसे ही तीन साल बीता, भूखण्ड राज्य के राजा की सदा के लिए विदाई हो गयी। जिस कारण, वह राजा फिर कभी भूखण्ड राज्य में दिखाई नहीं पड़ा और उसके साथ रहनेवाले कनफूंकवों को भी जनता ने बाहर का रास्ता दिखा दिया।
शिक्षा – क. कनफूंकवों और मूर्खों से हमेशा दूरी बनाये रखनी चाहिए।
ख. नकल, नकल होता है, इसलिए जनता की आवश्यकता के अनुरुप राजा को फैसला लेना चाहिए।
ग. राजा की जो आरती उतारते है, वे राजा को गर्त में धकेल देते है, हमेशा जो सही राह बतायें, चाहे वह कटु क्यों न हो, राजा को उसकी सलाह माननी चाहिए।

Saturday, March 25, 2017

शरद यादव जी, आपकी पार्टी भी कोई दूध की धूली नहीं है...........

23 मार्च 2017
राज्यसभा, नई दिल्ली
जदयू सांसद शरद यादव गरज रहे है...
वे पत्रकारिता जगत में आयी गिरावट, कुरीतियों एवं अखबार-चैनल के मालिकों द्वारा की जा रही गंदी हरकतों और उससे शर्मसार होता लोकतंत्र पर केन्द्र सरकार का ध्यान आकृष्ट करा रहे हैं। विषय गंभीर है, पर राज्यसभा में गिने-चुने सदस्य ही मौजूद है, स्वयं जदयू के कई सांसद राज्यसभा से गायब है। सरकार के नुमाइंदों की संख्या भी कम है। ले-देकर एक केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ही मौजूद है, जो एक तरह से नमूने ही कहे जायेंगे।
जदयू सांसद शरद यादव, बहुत अच्छा बोलते है, इसमें कोई दो मत नहीं, कई बार मैंने उनके लोकसभा और राज्यसभा में वक्तव्यों को सुना है, पर क्या कारण है कि उनकी बात ठीक उसी प्रकार काफूर हो जाती है, जैसे विभिन्न कारखानों के चिमनियों अथवा घरों से निकलनेवाली धुओँ का हवा में विलीन हो जाना।
आखिर जदयू सांसद ने राज्यसभा में क्या कहा, स्वयं देखिये। उन्होंने कहा कि...
• अखबारों - चैनलों के मालिक-प्रबंधक, मजीठिया वेज बोर्ड द्वारा दी गई सुविधाओं से अपने यहां कार्यरत पत्रकारों को वंचित रखते है और अपने यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों को ठेके पर रखते है, जिससे यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों का जीवन प्रभावित हो गया है।
• अखबारों – चैनलों के मालिक-प्रबंधक अपने यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों को दोयम दर्जे का समझते है और उनके साथ न्याय नहीं करते।
• अखबारों – चैनलों के मालिक-प्रबंधक अपने संवाददाताओं-पत्रकारों से वे कार्य कराते है, जिसकी इजाजत इंसानियत भी नहीं देती, ये लोग पेड न्यूज चलाते है, जिससे लोकतंत्र खतरे में है, वे इसके लिए कई उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।
• पूरे देश में पूंजीपतियों का बोलबाला हो गया है, जो अखबारों-चैनलों पर कब्जा कर रखे है, और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, इन चैनलों-अखबारों का इस्तेमाल करते है, ये करोड़ों की जमीन, प्रापर्टी इसके माध्यम से खड़े कर रहे है और इसमें सरकार भी इनका सहयोग करती है।
• यहीं नहीं ये अखबारों-चैनलों के मालिक-प्रबंधक-संपादक, पत्रकारिता का धौंस दिखाकर एमपी भी बन जा रहे है, इसलिए सरकार एक कानून बनाये ताकि पत्रकारिता में शामिल कोई भी पूंजीपति या मालिक एमपी न बन सकें या दूसरा उद्योग न खोल सकें।
मेरा मानना है कि...
जो बातें राज्यसभा में सांसद शरद यादव ने उठायी, उसे किसी भी प्रकार से गलत नहीं कहा जा सकता, पर सवाल स्वयं राज्यसभा में इस मुद्दे को उठानेवाले जदयू सांसद शरद यादव से...
आपकी पार्टी ने भी तो वहीं कुकर्म किये है, जिन कुकर्मों को लेकर आपने सदन का, सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया...
जैसे...
प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को राज्यसभा में भेजना, क्या जदयू द्वारा प्रभात खबर को अपने ग्रिप में लेने का प्रयास नहीं था... क्या हरिवंश ने प्रधान संपादक की आड़ में नीतीश कुमार का महिमा मंडन अपने अखबार में नहीं किया... क्या आप बता सकते है या आपके पास कोई प्रमाण है कि प्रभात खबर ने आपके नेता नीतीश कुमार के खिलाफ एक भी खबर छापी...
क्या ये सही नहीं कि प्रभात खबर में कार्यरत, जिन लोगों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सुविधा प्राप्त करने के लिए, आंदोलन किया, उनके साथ दोयम दर्जें का व्यवहार किया गया, उनकी हालत बद से बदतर कर दी गयी और आप की पार्टी ने ऐसे लोगों को सम्मानित ही नहीं किया, बल्कि राज्यसभा का सदस्य बनवा दिया। वह आदमी आपके ही साथ, संसद में बैठता है, जरा पूछिये, उससे। क्या वह जवाब दे पायेगा।
उत्तर होगा – नहीं। आप ही के ये सांसद कभी अपनी सुविधानुसार पत्रकार तो कभी सांसद बनकर जनता के सामने उपस्थित होते है... ये दोहरा चरित्र क्या बताता है?
दूसरा उदाहरण कशिश टीवी के मालिक-बिल्डर सुनील चौधरी को जदयू का टिकट दिलवाना और उसे बिहार विधानसभा में भेजकर विधायक बनाने का प्रयास क्या बताता है?
कमाल है, शरद यादव जी, आप वहीं कुकर्म करें, तो आनन्द और दूसरा यहीं कुकर्म करें, तो उसे सदन में अपमानित और उसे गलत कहने की परिपाटी आपने कब से सीख लिया। पहले स्वयं में सुधार लाइये, फिर दूसरे पर अंगूली उठाइये। इससे आपके बात की वजन भी बढ़ेगी और आप हंसी के पात्र भी नहीं बनेंगे।
मैं जानता हूं कि भारत में छपनेवाले अखबार हो, या चलनेवाले चैनल। इसके मालिक और यहां काम करनेवाले, उनके इशारों पर चलनेवाले प्रबंधक या संपादक, सभी पेड न्यूज चलाते है और इसमें सरकार भी सहयोग करती है। ये सारे सभी पत्रकारों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते है, उन्हें ठेके पर रखते है और पत्रकार-संवाददाता भी ठेके पर रहने के लिए, गुलामी सहने के लिए व्याकुल रहते है, वे इसके लिए अपनी लज्जा और शर्म को अपने घर की खूंटी पर टांग कर आते है, क्योंकि उनके भी बच्चे है, बीवियां है, बेचारे उनका भरण-पोषण कैसे करेंगे?  इसी क्रम में वे अपना जमीर बेच देते है, घूंट-घूंट कर मरते है। आजकल तो स्थिति ऐसी हो गयी कि अब ये पत्रकार आत्महत्या भी करने लगे है, पर इन प्रबंधकों-मालिकों को शर्म नहीं आती, उन्हें तो सिर्फ अपने कल-कारखानों की ही चिंता होती है ताकि उनका करोड़ों-अरबों का व्यापार प्रभावित न हो, ये इसकी आड़ में करोड़ों-अरबों की जमीन लूट रहे है और इसमें सरकार भी इनकी मदद करती है...
ऐसे में, ये लोकतंत्र जीवित रहेगा, हमें शक लगता है...
चलिए, शरद यादव जी, आप भी दूध के धूले नहीं है, आपकी भी पार्टी इसी रंग में रंगी है, पर आपने इस मुद्दे को राज्यसभा में उठाया। अच्छा लगा। आप इसी तरह इन महत्वपूर्ण मामलों को उठाते रहिये, एक दिन ऐसा जरुर आयेगा कि कोई सरकार इस मामले पर गंभीरता से विचार करेगी और पत्रकारिता की गंगा की धारा जो गंदगियों के कारण अविरल नहीं बह रही, उसमें धार लाने का प्रयास करेगी...
बहुत-बहुत धन्यवाद।

Friday, March 24, 2017

जय गुरु......................

जय गुरु
पहली बार रांची मेरा पदार्पण 4 जून 1985 को हुआ था, क्योंकि 5 जून को मेरी शादी रांची में थी। मेरी पत्नी उस वक्त योगदा सत्संग विद्यालय की नौंवी कक्षा की छात्रा थी, उनके हाथों में कई बार योगी कथामृत मैंने देखा था, पर कभी पढ़ नहीं सका। उसी समय से कभी कभार योगदा सत्संग आश्रम में आना – जाना लगा रहा, कभी योगदा सत्संग द्वारा चलाये जा रहे औषधालय गया तो कभी योगदा सत्संग द्वारा चलाये जा रहे मोतियाबिंद के आपरेशन में शामिल हुआ। हम आपको बता दें, कि छोटी-छोटी बीमारियों को लेकर अपनी पत्नी योगदा सत्संग द्वारा संचालित औषधालयों का लाभ लेने के लिए यदा-कदा जाया करती थी, पर मैं योगदा सत्संग से दिल से कभी नहीं जूड़ सका।
इसी बीच ईटीवी से जुड़ा, तब उस वक्त ईटीवी को देख रहे गुंजन सिन्हा ने हमें ईटीवी रांची में योगदान देने को कहा, और मैं ईटीवी रांची से जूड़ गया। ईटीवी से जुड़ने के दौरान समाचार संकलन के लिए हमें यदा-कदा योगदा सत्संग आश्रम जाना पड़ा। इसी दौरान हमें योगदा सत्संग आश्रम के बारे में जानकारियां मिलनी शुरु हो गयी। कुछ लोग गलत धारणाओँ से जूड़े होने के कारण गलत बताते तो कुछ आध्यात्मिक उत्थान के लिए इसे आवश्यक बताते। रांची आने के बाद हमें अपने दो बच्चों की पढ़ाई के लिए चिंता हुई, उस वक्त रांची में कई कान्वेंन्ट और अंग्रेजी पद्धति के विद्यालय थे, पर मैं इन विद्यालयों में अपने बच्चों को देना नहीं चाहता था, क्योंकि मेरा मानना था कि आप शिक्षित है, पर संस्कारित नहीं है, तो ऐसी शिक्षा आपके जीवन को नरकमय बना देती है। अचानक मैं समाचार संकलन के उद्देश्य से जगन्नाथपुर गया, जहां मेरी नजर सुदुर और रमणीक क्षेत्र एवं एकान्त में बने योगदा सत्संग विद्यालय पर पड़ी, जहां इस विद्यालय के प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र मौजूद थे। मैंने उनसे अपने बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर चर्चा की। उनकी बातें और विद्यालय का परिदृश्य देख, मैंने अपने बच्चों को इसी विद्यालय में नामांकन कराया। बड़ा बच्चा नौवी कक्षा में तो छोटे बच्चे का नामांकन सातवीं कक्षा में हुआ, चूंकि मेरी आर्थिक स्थिति भी ठीक नही थी कि मैं अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में दे सकूं। ऐसे भी ईटीवी की ओर से मुझे उस वक्त छह हजार रुपये मासिक मिला करते थे, जिसमें 2200 रुपये तो किराये में ही चल जाते थे, ऐसे में घर चलाना और बच्चों को पढ़ाना दोनों मुश्किल था, इसलिए मैंने ऐसा स्कूल चुना, जहां कम पैसे में बच्चे संस्कार और शिक्षा दोनों प्राप्त कर लें और इसके लिए योगदा सत्संग स्कूल जैसा विद्यालय मेरी नजर में सर्वश्रेष्ठ मालूम पड़ता था।
सन् 2003 की बात है।
हमें पता चला कि योगदा सत्संग आश्रम में हर वर्ष छठी कक्षा के बच्चों के लिए एक सप्ताह का विशेष शिविर लगाया जाता है। मैंने उसी वक्त प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र से बात की, कि क्या मेरे छोटे बच्चे को उस शिविर में भाग लेने दिया जा सकता है? उनका कहना था कि ऐसा संभव नहीं, चूंकि मेरा बच्चा सातवीं कक्षा का छात्र था। इसी बीच आज स्वामी निष्ठानन्द जी, जो उस वक्त कमल जी के नाम से जाने जाते थे, मुलाकात हुई। मैंने उनसे प्रार्थना की, कि वे मेरे छोटे बच्चे को उस शिविर में रखने की अनुमति दें। उन्होंने कहा कि वे देखते है कि, वे क्या कर सकते है?  इसी बीच कोई सूचना हमें प्राप्त नहीं हुई। गर्मी की छुट्टी थी, बच्चे अपने दादी के पास पटना जाने की जिद कर रहे थे और उनकी जिद के आगे मैं अपने बच्चों को पटना भेज दिया। तभी प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र जी का मेरे पास फोन आया कि मिश्र जी आपके बच्चे को शिविर में जाने की अनुमति मिल गयी है। मुझे खुशी का ठिकाना नहीं रहा, मैंने तुरंत पटना फोन किया कि छोटे वाले बच्चे को पटना-रांची वाली बस पर बिठा दें, हम उसे रांची में ले लेंगे। मेरा छोटा बच्चा रांची आया, शिविर में भाग लिया और उस शिविर में भाग लेने का प्रभाव यह पड़ा कि उसका जीवन ही बदल गया। आज भी योगदा सत्संग आश्रम का प्रभाव उसके दैनिक जीवन पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
हमें खुशी है कि मेरी पत्नी और मेरे दोनों बच्चे योगदा सत्संग विद्यालय से ही अपनी पढ़ाई की शुरुआत की और वे सभी बेहतर है, संस्कारित है, सुशिक्षित है, जीवन के मूल उद्देश्यों को समझते है। मैं मानता हूं कि ये सब पूर्व जन्म के संस्कारों व किये गये कार्यों से ऐसा संभव हुआ है, नहीं तो रांची की जनसंख्या लाखों में हैं, यहां प्रतिदिन लाखों लोग आते है, जाते है, कई लोग और उनके पूर्वज तो वर्षों से यहां रह रहे है, पर उन्हें तो ऐसा सौभाग्य नहीं प्राप्त होता।
गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है...
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
बिना ईश्वरीय कृपा के, संतों से मुलाकात संभव नहीं होती है...
मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर परमहंस योगानंद जी की कृपा नहीं होती तो मेरा परिवार जो आनन्द को प्राप्त कर रहा है, वह आनन्द कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता था। ये सब पूर्व जन्म में किये गये कर्मो का फल है कि हम रांची में है, जहां योगानन्द जी की स्मृतियां हमारा मार्गदर्शन करती है।
एक दृष्टांत...
बात सन् 2014 की। मैं जयपुर में था। भयंकर बीमारी का शिकार हुआ। ऐसा लगा कि अब जीवन का अंत निकट है। मैं 2015 की गुरु पूर्णिमा के दिन सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में कार्यरत उप-निदेशक शालिनी वर्मा के साथ योगदा सत्संग आश्रम पहुंचा (इसका वर्णन मैं पूर्व के आलेखों में कर चुका हूं), उसके बाद से वह बीमारी कहां गयी, मुझे पता ही नहीं चला, आज मैं पूर्णतः स्वस्थ हूं।
और इस घटना के बाद से, योगदा सत्संग आश्रम जाने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ, वो आज भी जारी है। इसी बीच स्वामी योगानन्द के अनन्य भक्त श्यामानन्द झा जी से मुलाकात हुई, उन्होंने हमें आश्रम से जुड़वाने में महत्वपूर्ण मदद की और मैं धीरे- धीरे आश्रम के और निकट होता चला गया।
ऐसे भी, मैं जब भी योगदा सत्संग आश्रम पहुंचा हूं, तो वहां गजब की शांति एवं आध्यात्मिक अनुभूतियों को हमने महसूस किया है। मैंने देखा है कि आश्रम में खड़े वृक्ष और वहां पड़े पत्थरों का समूह भी ईश्वर को भजते नजर आते है। उसका मूल कारण है कि स्वामी योगानन्द जी की इस आश्रम में बिखरी स्मृतियां और यहां उनके गुजरे पल, इस स्थान को ब्रह्म भाव प्रदान कर दिये है, क्योंकि आप जैसे ही इस आश्रम में आयेंगे और यहां से निकलेंगे, आपको स्वयं पता चल जायेगा कि आपने यहां से क्या प्राप्त किया और क्या छोड़ दिया?
इधर कुछ दिनों से योगी कथामृत मैंने पढ़ना शुरु किया है...
इधर मेरे माता-पिता और मेरा बचपन से लेकर शुरु किया गया पाठ, अब विनिद्र संत तक पहुंच गया है, जो धीरे-धीरे मेरे हृदय पटल को और आध्यात्मिकता के प्रति सुदृढ़ कर रहा है...
और अब देखिये, ये हमारा सौभाग्य है कि हम उस वक्त के साक्षी बने, जब योगदा सत्संग सोसाइटी अपना 100 वर्ष पूरा कर रही है। 22 मार्च को स्वामी योगानन्द जी द्वारा स्थापित यह आश्रम उस दिन अपनी दिव्यता का विशेष तौर पर ऐहसास करा रहा था। मेरा  हृदय पुलकित था, आंखे आंसू बहा रही थी और हाथों पर आया मोबाइल फोन उन दिव्यताओं को कैद करने का काम कर रहा था, अगर कोई हमसे उस वक्त पूछता कि स्वर्ग कहां है? तो मैं यहीं कहता कि अगर स्वर्ग की कही परिकल्पना है तो बस यहीं है।
जरा योगी कथामृत देखिये...
गुरु कैसा होना चाहिए?
शिष्य कैसा होना चाहिए?
ईश्वर को जानने और उसे पाने के लिए कैसी प्यास होनी चाहिए?
आध्यात्मिकता की ओर जाने के लिए कैसा दृढ़ विश्वास होना चाहिए?
ईश्वर कहां है?, क्या वह किसी खास जगह पर है?
क्या प्राप्त होने पर, जीवन सरल और सहज हो जाता है?
ऐसे प्रश्नों के उत्तर इतनी सरलता से योगी कथामृत में उपलब्ध है कि पूछिये मत...
योगी कथामृत का एक-एक पृष्ठ बहुमूल्य है, अमृत से युक्त है, हमारे विचार से तो सभी विद्यार्थियों को इसे पढ़ना चाहिए, अगर वे इसे पढ़ते है तो निश्चय ही, उनका जीवन परिवर्तित होगा...
इसमें कोई दो मत नहीं...
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान अतिव्यस्त होने के बावजूद, 7 मार्च को विज्ञान भवन में आयोजित योगदा सत्संग सोसाइटी के 100 साल पूरे होने पर जो भी कुछ कहा, वह बताता है कि भारत क्या है? और भारत की ताकत क्या है?
भारत की ताकत उसकी आध्यात्मिक शक्तियां है। विश्व भारत से उसकी आध्यात्मिकता को जानना, समझना और उसमें डूबना चाहता है। हम आपको बता दें कि धर्म और आध्यात्मिकता दोनों दो चीजें है।
कमाल है योगानन्द जी की आध्यात्मिकता मुक्ति में नहीं, बल्कि अंतर्यात्रा में निहित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक ही कहा कि 65 साल पहले एक शरीर हमारे पास रह गया और सीमित दायरे में बंधी एक आत्मा युगों की आस्था बन कर फैल गयी। 95 फीसदी लोग इस महान योगीजी की आत्मकथा को पढ़ सकते है, किन्तु क्या कारण होगा कि बिना भारत देश और यहां के पहनावे के बारे में जाने विश्व भर के लोग योगी कथामृत को अपनी मातृभाषा में लिखकर जन-जन तक पहुंचाना चाहते है, यह प्रसाद बांटने के समान है, जिसे बांटने में आध्यात्मिक सुख की अनुभूति होती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने ठीक ही कहा कि कभी-कभी हठ योग को बुरा माना जाता है, लेकिन परमहंस योगानन्दजी ने इसकी सकारात्मक व्याख्या की है और क्रिया योग की तरफ प्रेरित किया है, जिसके लिए शरीर बल की नहीं बल्कि आत्मबल की आवश्यकता होती है। परमहंस योगानन्द जूते पहनकर मां भारती का स्मरण करते हुए इस दुनिया से जाना चाहते थे। पश्चिम में योग संदेश देने के लिए निकल पड़े, लेकिन भारत को नहीं भूले।
धन्य है परमहंस योगानन्द जी, जब उन्होंने अपना शरीर छोड़ा, उस दिन भी वे कर्मरत थे। भारत के राजदूत के सम्मान समारोह में व्याख्यान दे रहे थे। कपड़े बदलने में भी समय लगता है, लेकिन वे क्षण भर में चले गये। उन्होंने कहा कि जहां गंगा, जंगल, हिमालय, गुफाएं और मनुष्य भी ईश्वर पाने के स्वपन देखती है। वे धन्य है कि उनके शरीर ने उस मातृभूमि को स्पर्श किया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वे बातें आज भी मेरे कानों में गूंज रही है, जो उन्होंने परमहंस योगानन्द जी के बारे में कहा कि, अगर संस्था का मोह होता तो व्यक्ति के विचार, प्रभाव और समय का इस पर प्रभाव होता, लेकिन जो आंदोलन कालातीत होता है, काल के बंधनों में बंधा नहीं होता, अलग-अलग पीढ़ियां आती है, तो भी व्यवस्थाओं को न कभी टकराव आता है, न कभी दुराव आता है। वे हल्के-फुल्के ढंग से अपने पवित्र कार्य को करते रहते है। परमहंस योगानन्द का बहुत बड़ा योगदान है कि वे ऐसी व्यवस्था देकर गये, जिसमें बंधन नहीं है तो भी जैसे परिवार को कोई संविधान नहीं होता, फिर भी परिवार चलता है।
दुनिया आज अर्थजीवन और तकनीक से प्रभावित है, इसलिए दुनिया में जिसका जो ज्ञान होता है, उसी तराजू से वह विश्व को तौलता भी है। भारत को लोग जीडीपी, रोजगार और बेरोजगारी से तौलते है, पर भारत की सबसे बड़ी ताकत है, उसकी आध्यात्मिकता। भारत का आध्यात्मीकरण ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है और इसमें परमहंस योगानन्द जी की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण रही है।
किसी ने ठीक ही कहा है कि योग एक प्रक्रिया है, इसे समझिये, क्रिया योग के द्वारा आप इसे बेहतर ढंग से समझ सकते है, आप अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। इसी क्रिया योग को लेकर, परमहंस योगानन्द जी जन-जन तक पहुंचे थे, आज योगदा सत्संग सोसाइटी उसी कार्य को कर रही है।
आप यह भी जान लीजिये कि योगी, योगी  होता है, वह युगों-युगों तक रहता है, क्योंकि न तो वो आता है, न ही जाता है, नही मिटता है, और नहीं कोई उसे मिटा सकता है। योग अंतिम नहीं है, बल्कि यह प्रवेश द्वार है, उस परमपिता परमेश्वर तक पहुचंने का...
खुशी इस बात की है कि परमहंस योगानन्द जी द्वारा लगाया गया यह वटवृक्ष 100 साल का हो गया है, निरंतर आगे की ओर बढ़ रहा है तथा लोगों को आध्यात्मिकता से जोड़कर, क्रियायोग के माध्यम से विश्व को भारत की आध्यात्मिकता की शक्ति से ओत-प्रोत कर रहा है।
धन्य है योगदा सत्संग सोसाइटी से जुड़े वे संत, वे संन्यासी जो निरंतर चल रहे इस यज्ञ में स्वयं को समिधा बनाकर आहुति के रुप में स्वयं को प्रस्तुत कर रहे है...
ईश्वर से प्रार्थना भी कि यह पुनीत कार्य, चूंकि उन्हीं के द्वारा चल रहा है, हम जैसे लोगों का भी मार्गदर्शन करें, ताकि हमारा जीवन भी सफल हो सकें, हमारा शरीर धारण करना सचमुच में सार्थक हो सकें...
जय गुरु

Thursday, March 23, 2017

इलाका रघुवर का और नाम योगी का...................

झारखण्ड में इन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चर्चा जोरों पर हैं, लोग उनके बारे में जानना चाहते है, यूपी में वे क्या कर रहे है? कौन सी योजनाओं को जमीन पर उतार रहे है? लोगों की उन्हें जानने की उत्सुकता है। यहीं कारण है कि रांची से प्रकाशित सारे अखबारों में योगी ही योगी छाये हुए है, जबकि इसके विपरीत रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान रांची के ही अखबारों में डूमरी के फूल होते दीख रहे है। ऐसे भी रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान की जो कार्यशैली है या उनके पीछे जो लोग होते है, उनकी हरकते और उनके मुख से निकले बोल बहुत कुछ बता देते है... ...फिर भी रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान झारखण्ड के मुख्यमंत्री के रुप में डटे है। रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान की इस स्थिति को देखते हुए इन पर यह लोकोक्ति फिट बैठती है – अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान।
आश्चर्य इस बात की है कि पिछले महीने झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर अपनी ब्रांडिंग कराने में 100 करोड़ रुपये से भी ज्यादा फूंक डाले, पर निकला क्या?  न तो इनकी ब्रांडिंग ही हो सकी और न ही झारखण्ड को कुछ प्राप्त हुआ। हां इतना जरुर हुआ कि बाहर से इनके कनफूंकवों द्वारा बुलाई गयी ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियां मालामाल जरुर हो गयी, और ये दुआएं भी दी कि ये राज्य हमेशा मूरख बना रहे, ताकि उनकी दुकानें इसी प्रकार चलती रहे, जबकि इसके विपरीत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी किसी भी ब्रांडिंग कंपनी को अपनी ब्रांडिंग के लिए उत्तर प्रदेश नहीं बुलाया पर इनकी ब्रांडिंग स्वयं देश के विभिन्न राज्यों के मीडिया हाउस बहुत ही शिद्दत से कर रही है।
आखिर मीडिया में आदित्यनाथ योगी क्यों छाये हुए है? उसका कारण है...
उन्होंने सत्ता में आते ही, वह काम करना प्रारंभ किया, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
1. सत्ता में आते ही उन्होंने अपने मंत्रियों से 15 दिनों में आय-संपत्ति का ब्यौरा मांग लिया।
2. नेताओं को बेकार की बयानबाजी बंद करने को स्पष्ट रुप से कहा।
3. यूपी के सरकारी दफ्तरों में पान-गुटखा पर बैन लगाकर दूसरे राज्यों के सामने एक नजीर पेश कर दी।
4. एक सप्ताह के अंदर अपने अनुभागों में रखी फाइलों को व्यवस्थित कराना प्रारंभ किया।
5. महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया, पूरे राज्य में एंटी रोमियो स्क्वायड का गठन कराया, ताकि बेटियों के सम्मान पर कोई आंच नहीं आये।
6. गोरक्षा के प्रति विशेष अभियान चलाया, अवैध बूचड़खानों को सील किया गया, उन पर बूलडोजर चलाया गया।
यहीं नहीं पूरे प्रदेश में एक विश्वास पैदा किया, गुंडों-अपराधियों में खौफ पैदा किया कि अब राज्य का निजाम बदल चुका है, गलत करेंगे तो जल्द ही जेल के अंदर होंगे...
इसके विपरीत झारखण्ड में क्या हो रहा है...
1. बेटियां यहां आज भी सुरक्षित नहीं, स्वयं मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की महिला संवादकर्मियों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अपनी शिकायत दर्ज करायी पर इन महिला संवादकर्मियों को उनकी आवाज बंद करा दिया गया। कस्तूरबा बालिका विद्यालय गढ़वा की आदिवासी बालिका गर्भवती हो गयी, इस मामले को भी दबा दिया गया। बूटी मोड़ की जिस लड़की की बलात्कार कर नृशंस हत्या कर दी गयी, उस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया, सीबीआई कहती है कि अभी तक उसे इस संबंध में कोई प्रपत्र प्राप्त ही नहीं हुआ, जबकि इसी मामले में मुख्यमंत्री रघुवर दास का बयान आया था कि इस कांड में सफेदपोश लोग भी शामिल है, जल्द उन्हें पकड़ लिया जायेगा, पर क्या हुआ? कोई अभी तक पकड़ा नहीं जा सका, यानी महिलाएं आज भी असुरक्षित महसूस कर रही है, झारखण्ड में।
2. गो हत्या तो यहां आम बात है, रांची की सड़कों पर बड़ी संख्या में सुबह, दोपहर और शाम को इस धंधे में लगे लोग, गायों को लाते है और कत्लखानों में भेज देते है, आज भी इस राज्य में बड़ी संख्या में अवैध बूचड़खानें चल रहे है, पर रघुवर दास की हिम्मत नहीं कि इन पर बुलडोजर चला दें।
3. सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों का हाल ये है कि उन्हें प्रशासन का डर ही नहीं, जमकर भ्रष्टाचार है, बिना पैसे के कोई काम हो ही नहीं सकता, और यह पैसा नीचे से लेकर उपर तक जाता है, जबकि सत्ता इन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ ही मिला था।
4. कानून – व्यवस्था तो पूर्णतः चौपट है, धनबाद में पूर्व मेयर नीरज सिंह समेत 4 की हत्या तो एक बानगी है।
5. मुख्यमंत्री क्या बोलते है? क्या करते है? भगवान ही मालिक है... ...ज्यादा जानकारी के लिए आज का अखबार पढ़ लीजिये, मुख्यमंत्री का भाषण छपा है, जो एक कार्यक्रम से संबंधित है, चूंकि मुख्यमंत्री रघुवर दास के आस-पास मूर्खों का जाल है, ऐसे भी मुख्यमंत्री रघुवर दास को लगता है कि ये मूर्ख ही सर्वाधिक विद्वान है, जिसका नतीजा सामने है, पूरे राज्य में मुख्यमंत्री रघुवर दास और झारखण्ड के सम्मान का बट्टा लग रहा है, याद करिये इस राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 8 मार्च को एक पीड़ित पिता के साथ कैसा दुर्व्यवहार किया था, जिसके कारण पूरे देश में मुख्यमंत्री रघुवर दास की थू-थू हुई थी, जिसे अखबार और चैनलवालों ने नहीं उठाया, बल्कि सोशल साइट ने इसे मुद्दा बनाया।
तो जहां ऐसे मुख्यमंत्री का राज चल रहा हो, जो कनफूकवों की मदद से चलती हो, उस राज्य के मुख्यमंत्री का क्या हाल होगा? आप समझते रहिये। फिलहाल झारखण्ड में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ छाये हुए है... ...अपने विवादित बयानों से नहीं, बल्कि कार्य शैली से और एक जनाब अपने मुख्यमंत्री रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान है... ...जो अपने ही राज्य में बेगाने हो चले है।
मैं तो कहता हूं कि अभी भी मौका है, मुख्यमंत्री अपनी कार्यशैली में सुधार लाये, नहीं तो पता चलेगा कि 2019 की लोकसभा चुनाव में हर राज्य से, भाजपा सीट ला रही है और झारखण्ड में कांग्रेस तथा झामुमो की लॉटरी निकल गई है...

Tuesday, March 21, 2017

उत्तर प्रदेश की जनता का अपमान बर्दाश्तयोग्य नहींं...........

उत्तर प्रदेश की जनता का अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं हैं...
जी हां, उत्तर प्रदेश की जनता का अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं है, चाहे वह देशी मीडिया हो या विदेशी मीडिया। जब से उत्तर प्रदेश की जनता ने भाजपा को जनादेश दिया है, तथाकथित स्वयं को सेक्युलर कहनेवाले लोग और मीडिया उत्तर प्रदेश की जनता को अपमानित करने का कार्य प्रारंभ कर दिया। वर्षों पहले यहीं जनता बसपा को सत्ता सौंपी, फिर समाजवादी पार्टी को सत्ता सौंपी तो यह सांप्रदायिक नहीं थी, और जैसे ही भाजपा को सत्ता सौंपी तो ये सांप्रदायिकता की जीत हो गयी। कमाल तो यह भी है कि ट्रम्प को माथे पर चढ़ाकर घुमानेवाली अमरीकी जनता के खिलाफ, विदेशी मीडिया के सुर नहीं सुनने को मिलते पर भारत की बात हो तो देखिये, स्वयं भारतीय कहलानेवाले लोग भी विदेशी मीडिया के सुर में सुर मिलाते हुए भारतीय लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते है। इन दिनों देशी - विदेशी मीडिया में उत्तर प्रदेश छाया हुआ है। उन मीडिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खुब आलोचना हो रही है, जबकि उन्हें मालूम होना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी बड़ा सांप्रदायिक क्यों न हो? उसे भारतीय संविधान के अंतर्गत ही भारतीय जनता की सेवा करनी है, ऐसा नही कि वह अपने मन से जो चाहे, जो कर देगा, जैसा कि विदेशों में देखने को मिलता है।
आज अमरीका में भारतीयों की क्या स्थिति है? वहां चून-चून कर भारतीय मारे जा रहे है, आखिर क्यों? ये भारतीय अमरीकियों के शिकार क्यों हो रहे है, जाहिर सी बात है कि इस्लाम के नाम पर, इन भारतीयों को शिकार बनाया जा रहा है, जबकि मरनेवाले भारतीयों में कोई भी इस्लाम को माननेवाला नहीं था।
ये तो वहीं बात हो गयी, चलनी दूसे सुप के जिन्हें बहत्तर छेद। सारी दुनिया अभी सर्वाधिक किसी से डरी हुई है तो वह है इस्लाम, जबकि मैं स्वयं जानता हूं कि इस्लाम एक शांतिप्रिय धर्म है, पर हो क्या रहा है, इस्लाम माननेवालों में कुछ लोगों के अंदर ऐसी कट्टरता आ गयी है कि उन्हें लगता है कि उनके धर्म से बड़ा दूसरा कोई धर्म ही नहीं, इसलिये इस्लाम के आगे किसी अन्य धर्म को रहने की आवश्यकता ही नहीं और इसी कट्टरता की आड़ में खून-खराबा का वह दौड़ चल पड़ा है कि जिससे मानवता ही कांप उठी है।
मैं भारत में ही देख रहा हूं कि इस्लाम माननेवालों में से कुछ मुट्ठी भर लोग भारत में भाजपा के लिए खाद – बीज का काम करते है, ये कौन है?  किसे नहीं पता।आप भारत में रहकर एक धर्म में फल-फूल रही सांप्रदायिकता को बढ़ावा दोगे और दूसरे धर्म को गाली दोगे तो यह नहीं चलेगा। मैं पूछता हूं कि
क. ओवैसी बंधुओं को किसने बढ़ावा दिया? जो धमकी देता है कि नरेन्द्र मोदी को हैदराबाद में घुसने नहीं देंगे, और जब हैदराबाद में नरेन्द्र मोदी घुसे तो उनकी सारी हेकड़ी निकल गयी। आपको याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने के पूर्व नरेन्द्र मोदी हैदराबाद पहुंचे, जहां लोगों ने टिकट खरीदकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण सुना। यहीं नहीं इसी ओवैसी बंधुओं ने भगवान राम और हिन्दुओं के प्रति ऐसी-ऐसी नफरत फैलानेवाली बाते एक सभा में कहीं और उस सभा में मौजूद लोगों ने तालियां बजा-बजाकर उसका उत्साहवर्द्धन किया। क्या कोई बता सकता है कि इसकी निंदा किसने-किसने की?
ख. उत्तर प्रदेश के ही सहारनपुर का एक कांग्रेसी मुस्लिम नेता नरेन्द्र मोदी को कुट्टी-कुट्टी काटकर फेंक देने की बात करता है, कोई बता सकता है कि इसकी निंदा किसने-किसने की?
ग.  हाल ही में बिहार के एक मुस्लिम मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चित्र को जूते से पीटवाता है, वह भी अपने सामने। क्या कोई बता सकता है कि इसकी निंदा किसने-किसने की?
घ. ममता बनर्जी शासित बंगाल के हावड़ा में क्या हुआ? जिस स्कूल में पिछले 70 सालों से सरस्वती पूजा मनाई जा रही थी, वहां इस्लामिक गुंडों के कहने पर सरकार ने सरस्वती पूजा पर रोक लगा दी, हिन्दू छात्राओं पर बंगाल पुलिस ने बल प्रयोग किया।
ऐसे कई प्रमाण है, जो समाज को विघटन के कगार पर ले जा रहे है...
जरा देखिये, ओवैसी को, जो कहता है कि वंदे मातरम हम नहीं बोलेंगे, भारत माता की जय नहीं बोलेंगे, क्योंकि यह संविधान में नहीं लिखा है। उस मूर्ख को कौन बताये कि हर बात संविधान में नहीं लिखी जाती, चूंकि गलत बोलने से आदमी लोकप्रिय हो जाता है, वह ऐसी हरकते कर रहा है...
जरा देखिये इसी मुसलमानों में जावेद अख्तर साहब है, जिन्होंने ओवैसी की तीखी आलोचना ही नहीं की, बल्कि संसद में कड़े शब्दों में उसका प्रतिकार किया। ये होता है – मुसलमान।
यहीं नहीं, मैंने प्रख्यात मुस्लिम नेता मदनी साहब के साक्षात्कार को भी देखा है, जिन्होंने पाकिस्तानी पत्रकार का मुंह ही बंद कर दिया, वह भी यह कहकर, कि वे जाकर सबसे पहले अपने देश में देखकर आये कि वहां अल्पसंख्यकों के क्या हाल है? भारत में मुसलमान उनसे बेहतर स्थिति में है, पर हमारी स्थिति क्या है?
यहां के पत्रकारों और मीडिया के हालात क्या है? ऐसे लोगों को यह मीडिया सम्मान नहीं देती और न ही ऐसे लोगों के बयान को अपने अखबारों और चैनलों में जगह देते है, पर जैसे ही जाहिलों के जमात की ओर से जाहिलों वाली बात आ गयी, तो देखिये इनकी रंगत...
मैं तो दावे के साथ कहता हूं कि इस देश में सर्वाधिक नुकसान गर किसी ने पहुंचाया है तो वह हैं...
क. बीबीसी – इसमें ज्यादातर पत्रकार भारत विरोधी है, जिनकी भारत विरोध से सुबह होती है और भारत विरोध पर ही इनकी रात खत्म होती है।
ख. एनडीटीवी एवं एबीपी न्यूज – एनडीटीवी एवं एबीपी न्यूज को भारत विरोधी बयान के लिए ही जाना जाता है, भारत विरोधी और वामपंथियों की पैरवीकार के रुप में यह चैनल सर्वाधिक लोकप्रिय है, इसके संवाददाताओं की भाषा बेहद घटियास्तर की होती है, ये अपने विरोधियों के लिए गाली का भी प्रयोग करते है, पर इसी में एक एनडीटीवी लखनऊ के कमाल खान भी है, जिनकी भाषा और शब्द और पत्रकारिता की जितनी प्रशंसा की जाय कम है।
रही बात विदेशी मीडिया कि जैसे न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, द न्यूज, रायटर्स, गार्जियन की, तो ये केवल यह बताये कि इसने कभी भी भारत की सकारात्मक तस्वीर दुनिया में पेश की है, उत्तर होगा – नहीं। ये तो हमेशा से ही भारत की गलत छवि प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते है। इन जगहों पर काम करनेवाले भारतीय पत्रकारों को उच्चे वेतनमान पर इसलिये रखा जाता है कि ये पैसे के लालच में भारत विरोधी आलेख प्रस्तुत करें।
हाल ही में चीन की सरकारी मीडिया के माध्यम से एक भारतीय ने चीनी सामानों के विरोध पर एक आलेख प्रस्तुत किया, जिसमें भारतीयों के देशभक्ति पर ही सवाल उठा दिये गये। अब आप इसी से समझ लीजिये कि ऐसा देश और विदेश में क्यों हो रहा है? उसका मूल कारण है कि बहुत दिनों के बाद कोई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रुप में आया है, जो सवर्ण नहीं है, पिछड़ा है, जिसने सभी देशद्रोहियों के नाक में दम कर रखा है, उनका जीना दुश्वार कर दिया है, ऐसे में ये लोग करेंगें क्या? बस दिन रात नरेन्द्र मोदी का विरोध और अब योगी का विरोध...
आप करते रहिये विरोध, भारत की जनता, अपना मताधिकार का प्रयोग करना जानती है, जो गलत करेगा, दंडित करेगी, और जो बेहतर करेगा उसे मौका देगी। आपलोग क्यों विधवाओं की तरह अपना छाती पीट रहे है...

Monday, March 20, 2017

प्यारे बच्चों.....................

प्यारे बच्चों,
आओ, आज मैं तुम्हें बताता हूं कि हमारे पूर्वज कैसे अभावों में भी शानदार ढंग से जीवन व्यतीत करते हुए अपने जीवन को समाज और देश के लिए उत्सर्ग कर देते थे। मैं कहूंगा कि तुम एक बात गिरह पार लो – तुम अपने जीवन में जितना आवश्यकताओं को सीमित करोगे, तुम उतना ही आनन्द प्राप्त करोगे और इसके विपरीत जितना तुम अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाओगे, तुम उतना ही दुख के सागर में डूबते चले जाओगे। कौन व्यक्ति कहां से धन ला रहा है? और कैसे वह अपनी आवश्यकताओं को पूर्ति कर रहा है? – ऐसी सोच सामान्य बुद्धिवाले लोग रखते है, पर जो असामान्य है, वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते। वे तो इस ओर ध्यान देते है कि उन्होंने अपने जीवन में ईमानदारी को वहन किया है या नहीं, जैसे ही उन्हें पता लगता है कि उनके पास आया धन बेईमानी से उन तक पहुंचा है, वे विचलित हो जाते है और उसका वे उपयोग करना भी पाप समझते है, ठीक इसके विपरीत अधम लोगों की प्रवृत्ति कैसी होती है? हमें लगता है तुम्हें बताने की जरुरत नहीं।
कहा भी गया है...
अधमा: धनम् इच्छन्ति, धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा: मानम् इच्छन्ति, मानो हि महतां धनम्।।
अर्थात् जो दुष्ट होते हैं, उन्हें सिर्फ धन की इच्छा होती हैं, जो मध्यमवर्गीय है अर्थात जो न संत है, न अधम है, वे मध्यम मार्ग अपनाते है, उन्हें धन और मान दोनों की आवश्यकता होती है, पर जो संत प्रवृत्ति के लोग है, उनके जीवन में धन की इच्छा कभी नहीं रहती, उनके लिए तो सम्मान से बड़ा कोई धन है ही नहीं।
तुम जहां हो, वहां तुम्हें ये तीन प्रकार के लोग बराबर मिलेंगे, अब तुम्हें ये सोचना है कि तुम किस प्रकार के लोगों का वरण करो? या तुम्हारे मित्र या सखा किस प्रकार के लोग हो? ये निर्णय करने का अधिकार, मैं तुमलोगों पर छोड़ता हूं, मेरा स्वभाव क्या है? ये तुम जानते ही हो।
कुछ लोग कहते है कि जीने के लिए धन की आवश्यकता होती है, पर मैं कहता हूं कि जीने के लिए धन की आवश्यकता होती ही नहीं, और जितनी आवश्यकता होती है, उसका प्रबंध ईश्वर स्वयं कर देता है, ठीक उसी प्रकार जैसे...
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम
दास मलूका कह गये, सब के दाता राम
हमें लगता है कि तुम इस दोहे का अर्थ समझ गये होंगे।
मैं स्वयं 50 वें वर्ष में हूं और जो मैंने तुम्हारे दादा-दादी और अपने गुरुजनों तथा भारत के महान आध्यात्मिक संतों के बताये मार्गों का अनुसरण किया है, उससे साफ पता चलता है कि जीवन में धन उतना महत्वपूर्ण नहीं।
ऐसे भी धन से आप खाट या पलंग खरीद सकते है, पर नींद नहीं। धन से आप स्वादिष्ट व्यजंनों को खरीद सकते है, पर उसका रसास्वादन कर पायेंगे, इसका जवाब खरीदनेवाले के पास भी नहीं होता। आखिर ऐसा क्यों? इस पर चिन्तन की आवश्यकता है।
कुछ लोगों से मैं पूछता हूं कि महात्मा गांधी का घर कहां है? तो वे बताते है कि उनका घर गुजरात के पोरबंदर में हैं, पर उन्हें नहीं मालूम कि जिसे वे महात्मा गांधी का घर बता रहे है, गांधी ने वो घर बनाया ही नहीं, वो तो उनका पैतृक आवास है, गांधी को समय कहां मिला कि वे अपना घर बनायें।
मेरे प्यारे बच्चों,
याद रखों, जो दूसरे का घर बनाता है, वह अपना घर नहीं बना पाता, वो तो दूसरों के घर में ही आनन्द ढूंढ लेता है, तुम इसी बात को सरदार पटेल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, संत रविदासजी, गुरु नानक, स्वामी विवेकानन्द जी की जीवनी से भी जान सकते हो।
आजकल लोगों को मैं देखता हूं कि वे अपने आस-पास रहनेवाले मित्रों व पड़ोसियों के जीवन शैली को देखते हुए, स्वयं की जीवन शैली को प्रभावित करना प्रारंभ कर देते है, यह भी दुख का कारण है।
भाई मान लिया कि किसी के घर में फ्रिज है, तो कोई जरुरी नहीं कि मेरे घर में भी फ्रिज होने चाहिए, गर आवश्यकता है तो खरीदिये पर लोगों को दिखाने के लिए कि मेरे पास भी फ्रिज है, ये गलत है और ये दुख का कारण है...
जरा मुझे ही देख लो, मैंने तो अपने जिंदगी में फ्रिज खरीदी ही नहीं, और न मैं खरीदूंगा, क्योंकि मुझे ये आवश्यक नहीं लगता, आखिर क्यों, मुझे आवश्यक नहीं लगा, जरा ध्यान दो...
फ्रिज करता क्या है?
फ्रिज में सब्जियों को रख देने से सब्जियां ताजी रहती है, मैं कहता हूं कि मैं इतनी सब्जी खरीदू ही क्यों?  जिसके लिए मुझे भंडारण करनी पड़े, रोज बाजार जाउंगा और ताजी सब्जियां लाउँगा।
फ्रिज में पानी ठंडा रहता है, पर मैं दावे के साथ कहता हूं कि इस पानी से प्यास नहीं बुझती, जबकि घड़ा में पानी भी ठंडा और इससे प्यास भी बुझती है।
फ्रिज में पकाये भोजन के शेषांश को सुरक्षित रखा जा सकता हैं, मैं कहता हूं कि मैं इतना भोजन बनाऊं ही क्यों, जिसके लिए हमें सुरक्षित रखने के लिए फ्रिज की आवश्यकता पड़ जाये।
फ्रिज में आइसक्रीम बन जाती है, भाई हम कोई रईस की औलाद तो है नहीं कि हम रोज दस किलो दूध लाये और आइसक्रीम बनाते जाये, हम तो आइसक्रीम खाने के लिए किसी दुकान पर गये और आइसक्रीम खरीदी, खा लिये।
ऐसे भी फ्रिज रखेंगे, 24घंटे बिजली की खपत अलग और बेवजह का बिजली बिल का भुगतान करने का झंझट अलग।
यहीं नहीं, इसके अलावा फ्रिज से पर्यावरण को भी नुकसान, क्लोरोफ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन और ओजोन में छिद्र को बढ़ावा।
यानी कुल मिलाकर हमें नहीं लगता कि हम भारतीयों के लिए ये फ्रिज जरुरी है, पर देखता हूं कि लोग धड़ल्ले से इन फ्रिजों को अपने घर के रसोईघर में रसोईप्रवेश करा रहे है, और मैंने आज तक नहीं लिया।
सच्चाई जानते हो।
कुछ लोगों को देखता हूं कि जब अपने बेटे-बेटियों की शादी करेंगे तो अंधाधुंध खर्च करेंगे, जैसे लगता हो कि वे कितने धन्ना सेठ है, पर हम बता देते है कि ऐसी खर्च से वे अपने बेटे-बेटियों की खुशियां नहीं खरीदते, बल्कि वे स्वयं का नुकसान करते है, समाज और देश का नुकसान करते है, क्योंकि इसी देखा-देखी में लोग अपने घर के सुख को नष्ट कर डालते है। जो धन्ना सेठ है, जिनको ईश्वर ने धन दिया है, उन्हें भी चाहिए कि वे सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखे, पर वे ऐसा करेंगे, हमें नहीं लगता।
अगर ईश्वर ने किसी को धन दिया है तो उन्हें उक्त धन को, उन बेटियों की शादी में खर्च करना चाहिए, जिनकी शादियां धन के अभाव में नहीं हो रही। मैं दावे के साथ कहता हूं कि ऐसा करने से जो उन्हें आनन्द प्राप्त होगा, वह स्वयं की शादी में भी उन्हें नहीं आयी होगी।
कहा भी गया है...
संत प्रवृत्ति के लोगों के पास जो धन आता है, वह लोगों के आनन्द पर खर्च होता है और जब यहीं धन दूष्टों के पास पहुंचता है तो वह लोगों के आनन्द को हर लेता है...
संत प्रवृत्ति के लोगों की संख्या आज भी बहुतायत है, बस उन्हें परखने की जरुरत है...
मैं यह क्यों लिख रहा हूं, तुम सब, ये सब लिखने का मतलब समझ गये होगे...
बस करना यहीं है कि कभी भी अपने मेहनत के पैसे को उन जगहों पर जाया नहीं करना है, जो जरुरी न हो। जहां जरुरी है, वहां उन पैसों को खर्च करिये और जहां जरुरी नहीं है, वहां कुछ भी हो जाय, खर्च नहीं करना है, सदैव समाज और देश के लिए पैसे खर्च होने चाहिए।
भामा शाह को देखो, उनके पास खूब धन था, और उन्होंने अपना सारा धन महाराणा प्रताप के चरणों में रख दिया...
महाराजा रघु के दरबार में छोटा सा कौत्स जाता है, और महाराज रघु, कौत्स के पास अपना सारा धन रख देते है, और कौत्स उतना ही लेता है, जितनी की उसे आवश्यकता है। ये प्रमाण बताने के लिए काफी है कि भारत क्या है? और हमें क्या करना चाहिए...
खुब खुश रहो।
तुम्हारा पिता
कृष्ण बिहारी मिश्र