Tuesday, June 7, 2011

ऐसी हरकतें सिर्फ कांग्रेसी ही कर सकते हैं............

संदर्भ --- बाबा रामदेव प्रकरण
सारा देश जानता हैं कि विदेशों में जो काला धन है, वो काला धन किस पार्टी का है और उस काला धन को संरक्षित करने में कौन सी सरकार ज्यादा दिमाग लगाती है। ऐसे में उस काला धन के खिलाफ जो भी आवाज उठायेगा, उसका हश्र क्या होगा। वो बाबा रामदेव के साथ जो आज आधी रात को कांग्रेसी सरकार ने किया, उससे सभी को सीख लेनी चाहिए। आप गुंडों और अपराधियों के घर के पास जाकर, कहो कि तुम गुंडे और अपराधी हो, ऐसे में वो गुंडा या अपराधी, गांधीवादी तो हैं नहीं कि आपको मिठाई खिलाकर अथवा फूल मालाओं से लादकर विदा करेगा, अरे वो तो वो कुटाई करेगा कि आप जिंदगी भर याद रखेंगे। वहीं कुटाई कांग्रंसियों और उसकी सरकार ने रामदेव के साथ कर दी, तो इसमें आश्चर्य कैसा, ये तो होना ही था, ये तो कांग्रेस का चरित्र ही है। जब भी देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठी, उस भ्रष्टाचार के खिलाफ उठनेवाली आवाज को कांग्रेंसियों ने बखूबी बंद किया। क्योंकि ये सशरीर भ्रष्टाचार रुपी नदीं में प्रतिदिन डुबकी लगाते हैं, नहीं तो जरा इनसे पूछो कि इनके पास जो ज्यामितीय प्रणाली से धन बढ़ते हैं, उसका राज क्या हैं।
कांग्रेसियों के घटियास्तर के चरित्र से देश को कितना नुकसान हो रहा हैं, उससे इन्हें क्या मतलब, ये तो देश भाड़ में जाय, खुद अरबों की संपत्ति इकट्ठा कर परम सुख पाते हुए, इस दुनिया से चल जाना चाहते हैं, ये कहकर की देश की आजादी हमारे लोगों ने लड़कर दिलायी हैं तो इसका फायदा, ब्याज सहित प्राप्त करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जो इसका विरोध करेगा, वो झेलेगा।
बाबा रामदेव पर हमले कराना, बाबा रामदेव के आंदोलन व आमरण अनशन की धार को कुंद करने के लिए जनार्दन व्दिवेदी के प्रेस कांफ्रेस में एक सुनियोजित साजिश के तहत एक व्यक्ति द्वारा जनार्दन पर जूते फेंकने का नाटक करवाना, और इस घटना के लिए भाजपा और आरएसएस को दोषी ठहराना और इसके बाद रामदेव के चल रहे आमरण अनशन से देश और मीडिया का ध्यान बटवाना, इऩका बाये हाथ का खेल है। आजादी के बाद से लेकर, ये तो यहीं सब किये हैं। दिल्ली के मीडिया में, हैं किसी की हिम्मत जो कांग्रेसियों के इस चरित्र को नंगा करके दिखायें, जो उसके खिलाफ बोलेगा, कांग्रेसी साम दाम दंड भेद के द्वारा उसकी बोलती बंद करेंगे। यहीं कारण हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार के नाम पर जितने भी आंदोलन हुए, उसका फलाफल य़े हैं कि मीडिया कांग्रेसी नेताओं के तलवे चाटने में ही ज्यादा रुचि दिखायी, उसका सुंदर उदाहरण लोकनायक जयप्रकाश आंदोलन के बाद की इंदिरा की राजनीति है। मैं ये नहीं कहता कि देश के सभी मीडिया हाउस और पत्रकार कांग्रेसियों के हाथों के कठपुतलियां हैं, पर इतना जरुर कह सकता हूं कि ज्यादातर ऐसे ही हैं।
कांग्रेस में एक नेता है – दिग्विजय सिंह, उसे मध्यप्रदेश की जनता ने जब से मुख्यमंत्री पद से हटाया, वो पागल सा हो गया है। उसका पागलपन इसी से सिद्ध होता है कि वह लादेन के लिए, सम्मानजनक सूचक शब्द का प्रयोग करता हैं, और बाबा रामदेव को महाठग करार देता है। मुख्यमंत्री पद खोने के बाद, उसे आरएसएस और भाजपा के भूत दिन-रात, सुबह-शाम दिखाई पड़ते हैं, उसका वश चले तो ये भी कह दें कि ओसामा बिन लादेन को मारने में भाजपा और आरएसएस का ही हाथ हैं, वो कुछ भी कह सकता हैं और ऐसे पागलों को कभी कभी कांग्रेसी, उनका व्यक्तिगत बयान मानकर पिंड भी छुड़ा लेते हैं, पर जब सोनिया माता पर बन आती है, और सोनिया माता के पक्ष में जब इसका बयान कांग्रेसियों को लगता हैं कि सही है तो इसकी लंगोटी को पकड़ने के लिए, सभी कांग्रेसी राग यमन गाने लगते है। ये हैं कांग्रेसियों का चरित्र। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि देश में लोकतंत्र को गर खतरा है तो इन कांग्रेसियों से। इन्होंने देश का सत्यानाश करने का ठेका ले रखा है और इसके खिलाफ एक जोरदार आंदोलन की जरुरत है और वो आंदोलन एक दिन अवश्य होगा। कांग्रेसियों को हिन्द महासागर में फेंकने के लिए एक और लोकनायक को जन्मलेना होगा।
ऐसे मैं बता दूं कि रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु किये गये आंदोलन अथवा विदेशों में पड़े भारतीयों के कालेधन को भारत लाने की मांग का मैं भी समर्थक हूं, पर उनके आंदोलन की कड़ी आलोचना करने में मैं पीछे नहीं हटता, क्योंकि वे खुद अपने को संत बताते हैं, योगगुरु बताते हैं पर शायद उन्हें पता नहीं कि संतों अथवा योगगुरु का काम, आंदोलन करना नहीं, बल्कि आंदोलन करवाना है। चाणक्य खुद लड़ा नहीं, बल्कि चंद्रगुप्त को पैदा कर वो काम करा लिया, जो वो चाहता था। महर्षि विश्वामित्र चाहते तो, खुद सुबाहु मारीच और ताड़का को मार सकते थे पर उन्होंने ऐसा किया नहीं, बल्कि उन्होंने दशरथ पुत्र राम और लक्ष्मण को इसका श्रेय दिया। पर रामदेव तो संत हैं नहीं कि उन्हें इसका भान हो अथवा कोई उऩ्हें बता दें कि ऐसा करें और वो मान ले। वो तो शत प्रतिशत उदयोगपति और राजनीतिज्ञ है, और जैसा कि एक उदयोगपति अपना उद्योग लगाने के लिए अथवा राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति चमकाने के लिए तेला – बेला करता हैं, वो भी कर रहे हैं, ऐसे भी इसमें गलती क्या हैं, सबको अपने अपने ढंग से जीने का अधिकार हैं, बाबा को सबको मूर्ख बनाने और अपना जय जयकार कराने में मजा आता हैं, और उनके अनुयायियों को भी मूर्ख बनने में परम आनन्द की प्राप्ति होती हैं तो गलत क्या हैं। खैर, हम इस पचड़ें में पड़ना भी नहीं चाहते।
पहले आंदोलन की बात ----------------
क्या ये सही नहीं कि बाबा रामदेव ने दिल्ली प्रशासन से झूठ बोला कि वो दिल्ली के रामलीला मैंदान में योग शिविर लगायेंगे और योग शिविर के नाम पर लगे हाथों सत्याग्रह और आमरण अनशन की धमकी दे डाली। क्या ये रामदेव के दोहरे चरित्र का भान नहीं कराता। जो संत अपने समर्थकों को दिल्ली में बुला लें और चुपके से दिल्ली की केन्द्र सरकार के मंत्रियों के साथ बैठक कर अपने आंदोलन पर डील कर लें, फिर डील तोड़ने का नाटक करें और अपने समर्थकों को फिर आंदोलन के नाम पर भड़काने का काम करें, क्या ये एक संत का चरित्र हो सकता हैं और इस प्रकार के लोगों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन क्या मूर्तरुप ले सकते हैं। उत्तर होगा – कभी नहीं। आप ऐसा कर, भीड़ इक्ट्ठी कर सकते हैं, पर एक सफल आंदोलन नहीं कर सकते, क्योंकि आपके आंदोलन में ही खोट हैं। विदेश में पड़े भारतीयों के काले धन पर चलाये गये बाबा रामदेव के इस आंदोलन से, बाबा रामदेव के असली चरित्र का भान शायद भारतवासियों को हो चुका हैं, और जो कुछ बचा हैं, वो धीरे – धीरे इनके द्वारा कालांतराल में जब कभी आंदोलन चलाया जायेगा, लोग पूरी तरह से जान लेंगे।
कुछ बातें कांग्रेसियों से ----------------
जब बाबा रामदेव का आंदोलन, गलत था। रामदेव और उनके समर्थक गैर कानूनी ढंग से आंदोलन स्थल पर आ डटे, तब उनसे किस आधार पर बात करने की केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने पहल की। क्या ये गलत नहीं था और जब सरकार ने बात कर ली, सारे बात बाबा रामदेव के मान लिये, तो चुपके से आधी रात को जब सारे के सारे सत्याग्रही सोये थे, तो किस पुरुषार्थ को आधार बनाकर, वहां लाठियां चला दी, आंसू गैस के गोले छोड़ दिये, ये तो केन्द्र सरकार को अपनी बात जनता के समक्ष रखनी ही चाहिए, पर कांग्रेसी सरकार ऐसा करेगी, हमें नहीं लगता। क्योंकि महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान आत्माओं के सपनों का गला घोंटनेवाली इस निकम्मी और कायर सरकार से देश की ज्वलंत समस्याओं और विदेश में पड़े भारतीयों के काले धन को, स्वदेश लाने की कल्पना करना बेमानी और मूर्खता है।
भले ही रामदेव में लाखों दुर्गुण हो, पर ईश्वर ने उससे इतना काम जरुर करा लिया हैं कि उसके द्वारा जनता को मैसेज जरुर गया हैं कि जनता जगे। खासकर विदेशों में पड़े भारतीयों के काले धन को लेकर। देश का पैसा, कांग्रेसियों और देश के करोड़ों भारतीयों के सपनों का गला घोटनेवाले कुछ चंद लोगों ने विदेशों में जमा कर रखा है। आज इसकी शुरुआत हुई हैं, ये आंदोलन और भड़केगा, हो सकता हैं कि कुछ वर्षों तक ये आंदोलन ढीला भी पड़ जाये, पर यकीन मानिये कि एक न एक दिन करोंड़ों भारतीयों का सपना पूरा होगा, और विदेशों में पड़ें चंद लोगों के काला धन भारत आयेगा और फिर इससे देश एक नये कीर्तिमान को गढ़ेगा, क्योंकि कोई भी घटना जब घटती हैं तो जब तक उसका परिणाम नहीं आ जाता, वह कालांतराल में विभिन्न रुप लेकर आपके सामने घटती रहती हैं, इसलिए विदेशों में पड़े भारतीयों के काले धन पर अब जनता ने करवट लिया हैं, इसका परिणाम जरुर निकलेगा।
बाबा रामदेव को भी चाहिए कि उनके पास जो अकूत संपति हैं, उस संपत्ति को भी देश के हवाले कर दें, ठीक वैसे ही जैसे कि कई संतों ने देशहित में अपने शरीर तक को त्याग दिया। गर रामदेव को उस संत का भान नहीं तो मैं बता देता हूं, उनका नाम था – दधीचि। वो इसलिये, कि आप खुद धन बनाने के चक्कर में विभिन्न स्थानों पर योगशिविर लगा रहे हो, और दूसरों से कह रहे हों कि विदेशी काला धन स्वदेश आये, ये दोहरा चरित्र है। ये भी चोरों के लक्षण है। क्योंकि कबीर की पंक्ति हैं-------------
साई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय,
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय

पर पता नहीं आपको कितना धन चाहिए, कब आपकी धन कमाने की भूख मिटेगी, कब आप बड़बोले बनने से बचेंगे, हमें इसका कोई प्रत्य़क्ष प्रमाण नहीं दीखता और यहीं संत और असंत के विभेद का बहुत बड़ा कारण हैं।
पहले आप शत प्रतिशत संत बनिये, क्योंकि अभी आप संत नहीं, एक चालाक नागरिक हैं, जो बहुत ही चालाकी से, वो सब कुछ किये जा रहा, जिसका ज्ञान सामान्य जन को नहीं हैं, और जिस दिन ये सामान्य जन आपकी चालाकी को जान जायेगा, आप पूरी तरह से समाप्त हो जायेंगे, फिर आप दिल्ली में मजमा लगाने की कोशिश करेंगे भी तो लोग विश्वास नहीं करेंगे, जैसा कि आज देखने को मिला हैं। धन्यवाद।

Thursday, June 2, 2011

चला रामदेव हीरो बनने..........

पने देश में एक रामदेव है, जिन्हें कई लोग बाबा रामदेव, योगगुरु रामदेव, संत रामदेव और पता नहीं क्या क्या, विभिन्न नामों से पुकारते है। ये स्वयं को क्रांतिदूत कहलाने में भी फक्र महसूस करते है। इन दिनों इनकी खूब चर्चा है और वो चर्चा है – विदेश में जमा भारतीय काले धन को, देश में लाने के नाम पर आंदोलन करने और आगामी 4 जून से देशव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन करने के ऐलान के कारण। इस ऐलान से सुना हैं कि देश की लोकतांत्रिक केन्द्र सरकार के मुखिया भी हिल गये है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें पत्र लिखकर, उनसे आमरण अनशन न करने की अपील की है। रामदेव ने भी, प्रधानमंत्री के इस मार्मिक अपील से वशीभूत होकर, प्रधानमंत्री पद को लोकपाल से मुक्त करने की बात कहीं है।
हम आपको बता दें कि देश में आज तक ऐसा कोई संत नहीं हुआ। जिसने बाबा रामदेव की तरह, प्लानिंग के तहत, ऐसा काम किया हो, जिसे पूरे संत समाज का सर झूक जाये। एक नहीं, अनेक संत, कितने का नाम लूं। गुरुनानक, रविदास, नामदेव, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, अगर नाम जूड़वाने लगे तो दस पेज, ऐसे संतों के नाम लिखवाने में खर्च हो जायेंगे, पर इतना मान लीजिये कि किसी योगी ने, इस प्रकार से भारत के विभिन्न शहरों में जाकर योग के नाम पर दुकानें नहीं खोली और न चलायी, जो इन्होंने किया है और इन दुकानों से इनकी चांदी भी हो रही है। एक तो रांची में ही संत योगानन्द जी का आश्रम है जो बताता हैं कि संत और संत की गरिमा क्या होती है।
आजकल सारे इलेक्ट्रानिक मीडिया और अखबारों में इनका महिमामंडन हो रहा हैं, जाहिर हैं कि इनके महिमामंडन होने से पूरे देश के लोगों की नजरें इन पर आ टिकी है। ( उन इलेक्ट्रानिक मीडिया और अखबारों के द्वारा महिमामंडन हो रहा हैं जो पिछले कई वर्षों से आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित साईबाबा के खिलाफ खूब विषवमन करते थे, अनाप शनाप दिखाया करते थे, पर जैसे ही उनका स्वर्गवास हो गया, उनका यशोगान करना शुरु कर दिया, और लगे हाथों अपनी गलतियां सुधारने लगे, साई बाबा से संबंधित सकारात्मक खबरों को दिखाने लगे। यहीं नहीं ये वे इळेक्ट्रानिक मीडिया, उनकी जय – जयकार कर रहे हैं, जो पैसे लेकर कभी – कभी दो नंबर के संतों को, विज्ञापन के रुप में प्रोजेक्ट कर, उन्हें महान संतों की श्रेणी में लाने का कुत्सित प्रयास करते हैं) खैर, शेर की खाल में जब भेड़िये होंगे तो समाज और देश का क्या होगा, जगजाहिर है।
फिलहाल केन्द्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है और इस सरकार के मुखिया, यूपीए गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा उपकृत और मनोनीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, ये वे ही करते है जो उन्हें कहा जाता है। इसलिए बेचारे के बारे में मैं क्या बोलूं......। फिलहाल इन्हें किसी ने कह दिया होगा कि रामदेव के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से सरकार की सेहत पर असर पड़ेगा, उन्होंने रामदेव के आगे अपनी झोली फैला दी। बेचारे रामदेव कहां चुप रहनेवाले थे, संत हैं और संत तो कुछ न कुछ देते हैं, कह दिया कि प्रधानमंत्री सम्मानित और गरिमा वाला पद हैं, इसलिए इस पद को लोकपाल से मुक्त रखना चाहिए, पर ये भी कह दिया कि वे आमरण अनशन के निर्णय पर अडिग हैं।
ये निर्णय का ऐलान करना उऩ्हें जरुरी भी था क्योंकि सारी मीडिया, वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी बिना विज्ञापन के उनकी जयजयकार करने, उन्हें महानायक बनाने पर तुली हो तो क्यों न इसका पूरा पूरा लाभ उठा लिया जाय, क्योंकि ये ही वो मीडिया हैं, जिसने बिना किसी विज्ञापन के अन्ना हजारे को हीरो बना दिया था और सरकार झूक गयी थी तो वो तो रामदेव है। इस देश में कई भ्रष्टाचार में लिप्त और सरकार को करोड़ों का चूना लगानेवाले उदयोगपति और राजनीतिज्ञ उनके चेले हैं, जिनकी कृपा से उन्होंने खुद इतना धन इकट्ठा कर लिया हैं कि उतनी संपत्ति देश में शायद ही, किसी तथाकथित संत के पास होगी।
हमारे विचार से संत का शाब्दिक अर्थ हैं --- स+अन्त यानि जो समस्याओं का अंत करें, वो संत। जो समस्याओँ को बढ़ा दे। वो संत कैसे हो सकता हैं। भ्रष्टाचार और देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में सत्याग्रह और आमरण अनशन का विशेष महत्व था। अंग्रेजी सरकार, इससे झूकती थी, क्योंकि एक बहुत बड़ा चरित्रवानों का समूह इन आंदोलन के पीछे रहता था, पर आज की जो स्थिति हैं, उसे देखकर हमें हंसी आती है। हमनें बाल्यकाल से लेकर अभी तक कई पुस्तकें पढ़ी हैं, सभी में सत्याग्रह और आमरण अनशन का जिक्र है, गांधी का सत्याग्रह तो अनुरकरणीय है। गांधी ने कह दिया कि फलां तारीख से वे सत्याग्रह पर है और सत्याग्रह शुरु। न किसी पंडाल की जरुरत और न किसी से उनके साथ रहने का आग्रह और न ये ढिंढोरा पिटवाने की जरुरत कि वे आंदोलन पर जा रहे हैं, पर जरा आज देखिये क्या हो रहा है ----------
रामदेव के इस तथाकथित आंदोलन पर नजर डालिये। एक अखबार ने लिखा हैं कि
दिल्ली के रामलीला मैदान में ढाई लाख वर्ग फुट का पंडाल बन रहा हैं, उस पंडाल में मच्छड़ न रहे, इसके लिए फोगिंग मशीन लगायी गयी है। एक लाख आरओ वाटर का इंतजाम किया गया हैं। 1000 शौचालय बनाये जा रहे है। 40 बेड का वातानूकूल आईसीयू, 3000 वर्ग फुट का चार मंच बनाया जा रहा है। इनकी सुरक्षा में 500 दिल्ली पुलिस के जवान लगाये जा रहे हैं। पांच बड़े एलसीडी स्क्रीन लगेंगे। यानी पूरे आंदोलन को हाईटेक करने की कोशिश की जा रही है। यानी भ्रष्टाचार रोकने के लिए, कालेधन को देश लाने के लिए, ये सब किया जा रहा है, वो भी कोई रामदेव के द्वारा।
जब मैं ईटीवी में था। तब धनबाद में मुझे ईटीवी में सेवा देने का मौका मिला। उस दरम्यान, ये रामदेव, धनबाद आये थे। और वहां के चनचनी कालोनी में एक बहुत बड़े धनाढ्य के घर में उनका प्रवास हुआ था। बड़े – बड़े उद्योगपतियों जो पांच लाख रुपये दे सकते थे, आराम से मिलते, उनके आश्रम को पैसे देने के लिए जीजान से जूटते वो भी उनके साथ खूब गप्पे लड़ाते, आनन्दित होते। एक दिन प्रेस काँफ्रेस हुआ था, उसी चनचनी कालोनी में, उसी धनाढ्य के घर में, मैं भी गया था, देखा कि सारे पत्रकार, उनके साथ फोटो खिचाने के लिए बेताब थे, जैसे कि गर उनके साथ फोटों नहीं खिचाया तो जीवन ही बर्बाद हो जायेगा, ऐसी स्थिति थी। पर मैं इन सबसे अलग रहता हूं क्योंकि पता नहीं क्यूं। घर के हालात या माता पिता द्वारा दिया गया संस्कार अथवा वो श्लोक जो बार बार मेरे कान में गूंजते हैं – अधमा धनं इच्छन्ति, धनं मानं च मध्यमा, उत्तमा मानं इच्छन्ति, मानो हि महता धनम्।। रामदेव मुझे प्रभावित नहीं कर सकें। क्योंकि मैंने कई संतों के बारें में पढ़ा हैं, जिन्होंने धन के पीछे, यश के पीछे भागा नहीं, वे तो निरंतर, मानव निर्माण में लगे रहते हैं, क्योंकि मानव निर्माण हो गया तो फिर समाज और देश बनने बनाने में कितना समय लगेगा। पर यहां तो एक संत द्वारा एक ऐसे पेड़ बोने की कोशिश की जा रही हैं, जिससे सदाचार फैले, पर उस सदाचार वृक्ष को रोपने में जड़ में पानी न देकर, उसके शिखाओं पर पानी देने की कोशिश हो रही हैं और इस कोशिश में सभी प्रयास कर रहे हैं। कोई गांव-शहर में जाकर मानव निर्माण का कार्य, संस्कार व चरित्र निर्माण का कार्य नहीं कर रहा। सभी पतली गली से राजनीतिक सफर तैयार करने में लगे हैं, एक देख रहा हैं कि जब योग के झांसे से पूरा देश उसके साथ हो गया और भ्रष्टाचार के नारे सें पूरी दिल्ली हिल गयी तो फिर प्रधानमंत्री का पद कितना दूर हैं। दूसरा देख रहा हैं कि बंदूक की गोली से सत्ता हथियाने में अब ज्यादा दूर हैं कहां, कई बुद्दिजीवी प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से उन्हें समर्थन दे ही रहे हैं तो फिर दिक्कत कहां हैं, इस नाहक कमजोर केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकने में कहां दिक्कत हैं, मौका मिलते ही, उखाड़ फेंकेंगे और भारत के गर्दन को जब चाहे, जब तोड़ मरोड़ देंगे और चीन के हाथों सौंप देंगे। दिक्कत कहां हैं।
कमाल है, जिस सरकार को जनता चुनती है, वो सरकार का मुखिया, एक योग के नाम पर झांसा देनेवाले के आगे झूकता हैं, चार – चार मंत्रियों को दिल्ली एयरपोर्ट भेज देता हैं, जैसे कि किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष, उससे मिलने आ रहा हो। उस प्रधानमंत्री से देश के विकास और सम्मान की आशा की जा सकती हैं। इस देश में लोकतंत्र हैं या तथाकथितयोगतंत्र। हमें तो लगता हैं कि इस देश की कोई मर्यादा ही नहीं और न ही कोई गरिमा है। सभी अपने अपने ढंग से इस देश का सत्यानाश करने में लगे है। भ्रष्टाचार क्या कोई बकरी का बच्चा है, दौड़ा और पकड़ लिया, क्या रामदेव में हैं ताकत कि वे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा दें। अगर नहीं तो इस प्रकार का नाटक क्यो, इससे किसका फायदा होगा और किसका नुकसान। ये तो योग के नाम पर झांसा देनेवाले रामदेव को तब पता चलेगा जब वे मृत्युशैय्या पर पड़ें होंगे, क्योंकि वे सब को धोखा दे सकते हैं, अपनी आत्मा को नहीं।
ऐसे भी इस देश का कौन ऐसा चरित्रवान व्यक्ति होगा, जो विदेशों में पड़े अपने देश के काले धन को लाना नहीं चाहेगा, कौन ऐसा चरित्रवान व्यक्ति होगा जो भ्रष्टाचार मुक्त भारत नहीं चाहेगा, पर इस देश में चरित्रवानों की संख्या कितनी हैं, इनकी संख्या तो देश में विलुप्त होते सिंह की तरह हो गयी हैं, जरुरत हैं, इन चरित्रवानों की संख्या में वृद्धि कराने की, जैसे ही इनकी संख्या बढ़ेगी, भ्रष्टाचार रुपी दावानल खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा, फिर किसी तथाकथित रामदेव को, दिल्ली के रामलीला मैदान में करोड़ों खर्च कर, इस प्रकार की झूठी आंदोलन करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी।

Saturday, May 21, 2011

ऐसे आयोजन से क्या लाभ, जब आप समय का मूल्य न समझे और न अनुशासित हो.....!


16 मई से 20 मई तक राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने रांची के बीएनआर होटल में विभिन्न विभागों पर परिचर्चाएँ करायी, लोगों से सुझाव मांगें कि 12वीं पंचवर्षीय योजनाओं में राज्य की विभिन्न विभागों को योजनाओं को कैसे मूर्तरुप दिया जाय, ताकि झारखंड विकास के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बन जाये। लोगों ने सूझाव भी दिये, लोगों ने इनकी परिचर्चाओं में भाग लिया, मीडिया ने अपनी विशिष्ट भूमिका भी निभायी। सच्चाई ये भी हैं कि मैं खुद चाहता हूं कि ये प्रांत जो विभिन्न प्रकार से कष्टों को झेल रहा हैं, आगे बढ़े, शक्तिमान बने, पर जो स्थितियां हैं, उससे साफ लगता हैं कि इस राज्य को अभी भी दुर्दिन देखने हैं, कयोंकि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता है। अतीत कैसा था, वो आज के वर्तमान को देखकर पता लग रहा है, पर जो आज का वर्तमान है और जिस प्रकार के लोग इस वर्तमान के माध्यम से झारखंड के सुखद भविष्य का सपना संजोये हैं, उससे लगता हैं कि फिलहाल इस प्रांत का भविष्य अंधकारमय है।
किसी भी देश, प्रांत, संस्थान अथवा व्यक्ति के विकास के लिए अनुशासन काफी मायने रखता है, और ये अनुशासन सर्वप्रथम राज्य के प्रमुख व्यक्तियों में देखा जाता हैं कि वो कितना अनुशासित है, क्योंकि जब वो अऩुशासित होगा, तभी उसका देश, प्रांत, संस्थान और वह व्यक्ति विकसित होगा, नहीं तो किसी जिंदगी में वो विकसित नहीं हो सकता और न ही वो देश व प्रांत का कायाकल्प कर सकता हैं, ये छोटी सी बात सभी को समझ में आ जाना चाहिए, क्योंकि ये ध्रुव सत्य है।
कल यानी 20 मई को मुझे सूचना मिली। राज्य के सूचना भवन के माध्यम से कि मुख्यमंत्री आज यानी 21 मई को हटिया डैम का निरीक्षण सुबह 9 बजे करेंगे। आज 21 मई को जब सुबह के दस बजे तब मुझे सुचना मिली की, मुख्यमंत्री 11 बजे हटिया डैम पहुंचेगे, लेकिन जब 1 बज गये तब हमने, मुख्यमंत्री आवास पर फोन लगाया, तब सूचना मिली की मुख्यमंत्री हटिया डैम पहुंचेंगे जरुर, लेकिन अभी विलम्ब हैं, चूकि उन्हें आज जमशेदपुर जाना हैं, इसलिए जमशेदपुर जब जायेंगे तब रास्ते में हटिया डैम भी जायेंगे। ये हैं हमारे राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की सोच। और उनकी समय की पाबंदी तथा अनुशासन। और इधर उऩके समाचार को संकलन करने तथा उनके दर्शन को व्याकुल जनता राहे जोह रही हैं कि मुख्यमंत्री अब आ रहे हैं, तब आ रहे हैं। जहां सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठा व्यक्ति समय और अनुशासन को नहीं समझ पा रहा तो ऐसे में राज्य का विकास कैसे होगा।
विकास कोई निश्चित स्थान नहीं हैं, कि वहां पहुंच गये तो विकास की मंजिल पा ली, ये निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं, इसका लक्ष्य समय समय पर बदलता रहता हैं और यहीं नियति भी हैं पर इतनी छोटी सी बात हमारे देश व प्रांत के भविष्यद्रष्टा को दिखाई नहीं पड़ती। बीएनआर होटल में एक बार हमने जाकर देखने की कोशिश की कि सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं को मूर्तरुप देने के लिए जो बैठक बुलायी हैं, उसकी स्थिति क्या हैं। हमने देखा कि वहां वैसे ही लोग हैं जो पूर्व से ही राज्य की विभिन्न योजनाओं पर कुंडलियां मारकर बैठे हैं, जिन्होंने विभिन्न योजनाओं को सत्यानाश करके रख दिया हैं और इसी में अपना उल्लू भी सीधा कर रहे हैं और भ्रष्टाचार की नयी परिभाषा गढ़कर, इतनी कमायी अवश्य कर ली कि इनके सात पुश्तों तक अब आगे पीछे सोचने की जरुरत ही नहीं।
अरे भाई, शिक्षा में सुधार लाना चाहते हो, तो करना क्या हैं..........
सुधार लाओ, किसने रोक रखा हैं, पर सच्चाई ये हैं कि तुम खुद ही नहीं चाहते कि शिक्षा में सुधार हो, क्योंकि गर शिक्षा में सुधार हो गया तो फिर तुम्हारे बच्चों का क्या होगा। हम कहना क्या चाहते हैं दिमाग पर जोर लगाईये। समझ में आ जायेगा। और जिन्हें नहीं समझ में आ रहा। वो ऐसे समझिये। क्या आपके प्रांत के नेताओं, वरीय अधिकारियों, व्यवसायियों, बड़े-बड़े पूंजीपतियों अथवा जिनके पास थोड़े से भी पैसे हैं, उनके बच्चे क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं अथवा सरकारी अस्पतालों में इनकी इलाज होती हैं। गर नहीं तो फिर ऐसे स्कूल अथवा अस्पताल की आवश्यकता क्यूं। अरे भई जिस दिन से इन नेताओं, वरीय अधिकारियों, व्यवसायियों, बड़े बड़े पूंजीपतियों और मठाधीशों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने और सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने लगेंगे। ये सब खुद ब खुद ठीक हो जायेंगे। मैंने तो देखा कि जो टीचर जिस सरकारी स्कूल से 40-50 हजार का वेतन उठा रहा होता हैं, वो खुद अपने बेटों-बेटियों को उस स्कूल में न पढ़ाकर, निजी स्कूलों में पढ़ा रहा होता हैं. यहीं नहीं यहीं हाल सरकारी अस्पतालों से अपनी जिंदगी बेहतर कर रहे डाक्टरों का हैं।
पूरे देश व पूरे राज्य को चरित्रहीन बना कर रख दिया और अब चले हैं देश व राज्य को बेहतर बनाने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं पर चर्चा कराने के लिए, ये तो वहीं बात हुई। बचपन में तोता रटंत की कथा वाली बात।
गर सचमुच में कोई राज्य को आगे बढ़ाने की बात करता है तो मैं यहीं सुझाव दूंगा कि पहले गांधी की तरह बनने की कोशिश करो। नहीं तो ये झूठी दिलासा देना बंद करों कि तुम झारखंड को आगे बढ़ाना चाहते हो।
गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे तब वे मुंबई में गोपाल कृष्ण गोखले से मिले, उन्होंने गांधी से सिर्फ यहीं कहा कि गांधी जो आप सोच रहे हो, वो भारत नहीं हैं, पहले आप भारत को निकट से देखो, तब पता चलेगा कि भारत क्या हैं और उसके बाद जब लक्ष्य बनाकर चलोगे तो तुम अवश्य कामयाब होंगे। मैं भी यहीं कहता हूं कि यहां के राजनीतिज्ञ पहले झारखंड को नजदीक से देखे, यहां की जनता क्या चाहती हैं, उनके दिलों से पूछे, राजधानी और बड़े शहरों से प्यार जरुर करें पर गांवों में रहनेवाले लोगों को ये महसूस नहीं होने दें कि वे उऩसे दूर हैं नहीं तो स्थिति भयावह हो जायेगी क्योंकि शहर तक आने के लिए गांव को मजबूत होना बहुत ही जरुरी है। सच्चाई यहीं हैं कि यहां ज्यादातर नेता चालाक है, अपनी चालाकी में ये ज्यादा मशगूल है। और वो चालाकी जनता खूब समझती हैं पर ये समझते हैं कि जनता महामूर्ख हैं।
एक मई को यहां के एक नेता ने मोराबादी मैदान में आमरण अनशन का कार्यक्रम रखा, गांधी बनने की कोशिश की, पर सच्चाई ये भी हैं कि इनके आमरण अनशन को तुड़वाने के लिए न तो सरकार आगे आयी और न ही जनता। खुद इन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को मोराबादी बुलवाया, एक भोजपुरी गायक अभिनेता आया, सभी ने गुहार लगायी, कि वे अऩशन तोड़े और उन्होंने अनशन तोड़ दिया। जबकि गांधी ने जब भी अनशन किया और सत्याग्रह की, तब तब वे कामयाब होकर लौटे। ये हैं कल के गाँधी और आज के नेताओं का चरित्र। ऐसे में ये प्रांत झारखंड कैसे आगे बढ़ेगा। मैं तो यहीं कहूंगा कि बस सारे नेता चरित्रवान बन जाये, समय को पहचाने, आदर्शवादिता को अपनाएं, जो कहें वो करें जो करें वो कहें, मन, वचन और कर्म से एक रहे, फिर देखिये कि ये झारखंड कहां जाता हैं, पर बिना चरित्रवान बने, आप चाहेंगे कि देश व समाज को नयीं दिशा दे दें तो ये तो किसी जिंदगी में आप नहीं कर सकतें और न ही आनेवाले समय में आपको लोग याद रखेंगे।

Sunday, May 1, 2011

निर्बल को न सताईये, जाकी मोटी हाय...!


झारखंड में अतिक्रमण की आग में छः लोगों की जान चली गयी। सैकड़ों गरीबों के आशियाने उजाड़ दिये गये। जानें उन लोगों की गयी, आशियाने उनके उजाड़े गये, जो आजीवन कमाई करते करते मर भी जाये, तो भी वे किसी जिंदगी में जमीन खऱीदकर अपना आशियाना नहीं बना सकते। ये दलित और अनुसूचित जन जाति से भी नहीं आते कि सरकार इनके लिए इंदिरा आवास उपलब्ध करा दें। पर इन पर गाज लोकतंत्र के तीन स्तंभ कहे जानेवाले विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी ने मिलकर गिरायी। ये रोते रहे, बिलखते रहे, इनके सपनों का आशिय़ाना ढहता रहा, पर किसी को दया नहीं आयी। वह भी तब, जबकि सभी जानते हैं। तुलसीदास ने कहा हैं कि ------------------
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोड़िये, जब तक घट में प्राण।।

अतिक्रमण हटना चाहिए, मैं भी इसका पक्षधर हूं, पर अतिक्रमण हटाने के नाम पर सिर्फ गरीबों पर बूलडोजर चलाना, इसे कायरता व बुजदिली समझता हूं। जिसने भी गरीबों पर बूलडोजर चलायी हैं, उसे उसके किये की सजा ईश्वर अवश्य देगा, चाहे वो कितना भी बड़ा अथवा सर्वशक्तिमान व्यक्ति क्यूं न हो, जो इस अहं में जी रहा हैं कि उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता. वह भी कबीर की, इस पंक्ति को पढ़ ले, गर वो बाल्यकाल से लेकर वृद्धावस्था तक नहीं पढ़ा हो, पंक्तियां है ------------
निर्बल को न सताईये, जाकी मोटी हाय।
मरे मृग के छाल से, लौह भस्म हो जाय।।

राज्य में अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है, कहा जा रहा है कि न्यायालय के आदेश पर चल रहा है, पर ये अतिक्रमण हटाओ अभियान चल कहा रहा है। वहां चल रहा है – जहां गरीबों का निवासस्थल है। जिनकी फूटपाथ पर जिंदगी चलती है और फूटपाथ पर ही समाप्त हो जाती है, पर जिन अमीरों ने कानून को ठेंगा दिखाकर, फूटपाथ को भी नहीं छोडा, उस पर बुलडोजर क्या, एक सूई भी नहीं चूभोई गयी है। ये है – हमारा देश भारत, उसका एक प्रांत झारखंड और उसकी व्यवस्था।
शायद ऐसी व्यवस्था, इसलिए कि लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों ने रामचरितमानस की चौपाईयों को अक्षरशः कंठस्थ कर, उस पर चलना शुरु कर दिया है – ये कहकर कि ----------------------
समरथ के नहिं दोषु गोसाई
आज हमें हरि शंकर परसाई बरबस याद आ रहे है........। उनकी लिखी कहानी भेड़ और भेड़िये याद आ रही है। हमें लगता है कि अतिक्रमण के नाम पर, अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर जिस प्रकार से गुंडागर्दी चली हैं, मुझे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से विश्वास उठ गया है। पूर्व में, जो घटनाएं घटी, जो मेरे आंखों के सामने नहीं घटी थी, फिर भी इस प्रकार की घटनाएं घटित होती थी, तो मैं समझता था कि देश में कानून का राज है। जो लोग गलत करेंगे, उन्हें आज न कल सजा मिलेगी। पर मैंने जो महसूस किया, उसका लब्बोलुआब ये है कि गरीब तो पैदा ही होते है, अमीरों के द्वारा काट दिये जाने के लिए।
गरीबों को तो जीने का अधिकार ही नहीं है, जीने का अधिकार तो सिर्फ उन्हें है – जो हजारों, लाखों और करोड़ों में खेलते है। जो झारखंड के महानगरों में, टूटे – फूटे प्लास्टिक, मिट्टी और कचरों के घरों में रहकर, इन अमीरों के सुख साधन का सामान जूटाने और उनकी सेवाओं में अपना सम्मान तक गिरवी रख देते है, उन्हें जीने का अधिकार किसने दे दिया। शायद यहीं कारण रहा कि गरीबों के आशियाने ढहते रहे, गरीबों के बेटे पुलिसिया गोली के शिकार होते रहे और लोकतंत्र के तीनों स्तंभ चुपचाप मौन रहकर, इनकी बेबसी पर खुश होते रहे, इन्हें इनके हाल पर दया तक नहीं आयी।
ये खुश होनेवाले वे लोग है --------- जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी ईमानदारी नहीं बरती। जिन्होंने इन्हीं गरीबों के पैसे खाकर, उनकी जिंदगी तबाह कर दी और विभिन्न घोटालों को अंजाम दिया। जिन्होंने अपने लिए बिना किसी नक्शा को पास कराये, बड़े-बड़े आलीशान होटल और अपने मकान बनाये। जिन्होंने बेईमानी के सारे रिकार्ड तोड़ कर अपने परिवार के लिए दुनिया के सारे सुखसाधन अपने लिये जुटा लिये और जूटा रहे है। इन पर किसी की नजर नहीं जाती, क्योंकि ऐसे लोग इन लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में बड़ी संख्या में देखने को मिल जाते है। इसलिए इन पर बुलडोजर चले भी तो कैसे। इधर अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर गरीबों के आशियाने पर बुलडोजर चलते रहे, गरीबों के छातियों पर गोलियां चला दी गयी, पर सरकार बेबस थी। केवल एक राग अलाप रही थी कि न्यायालय का आदेश है ----------- इसलिए वह अतिक्रमण हटाओ अभियान चला रही है। विपक्ष न्यायालय पर तो नहीं, पर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा था कि ये गलती सरकार की है। इस अतिक्रमण हटाओ अभियान से मुक्ति सिर्फ अध्यादेश लाकर ही पायी जा सकती है, पर इनके इस अध्यादेश लाने के चक्कर में कितनी मांओं के गोद सुनी हो गयी, शायद लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों को मालूम नहीं। उन्हें ये भी मालूम नहीं कि अपने आशिय़ाने को ढहने का समाचार मिलते ही, कितनों की दहशत में ही जान निकल गयी, पर लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों को इससे क्या मतलब। मौत तो इस देश में होती ही रहती हैं............................
और अब इस राज्य के तथाकथित गुरुजी यानी बात शिबू सोरेन की ------------------झारखंड के लोग, इन्हें गुरुजी के नाम से जानते है, इन्हें गुरुजी किसने बनाया, हमें नहीं मालूम और न ही हम जानना चाहते है। अचानक पता चला, कि ये जनाब अतिक्रमण हटाओ अभियान और गरीबों पर चल रही बुलडोजर से परेशान है, दुखी है। इन्होंने मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को पत्र लिखा है कि मुख्यमंत्री जल्द इस समस्या का समाधान करें। बेचारे इतने दुखी थे कि इन्होंने संथालपरगना में होनेवाले उदघाटन और शिलान्यास कार्यक्रम से स्वयं को अलग कर दिया। लगा कि सरकार अब गयी और तब गयी, पर जैसा कि गुरुजी का आदत है कि वे क्या बोलते है और क्या करते है उन्हें खुद मालूम नहीं होता। उन्होंने आनन फानन में कोर कमेटी और पता नहीं क्या – क्या झामुमो की बैठक बुला दी और हुआ वहीं यानी ढाक के तीन पात। सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है, वो सरकार और सरकार के मुखिया से नाराज नहीं है। ये बयान दे डाला। जब सरकार अच्छा ही काम कर रही थी तो उन्होंने अर्जुन मुंडा को पत्र ही क्यूं लिखा कि वे सरकार के काम काज से दुखी हैं या संथाल परगना के उद्घाटन और शिलान्यास कार्यक्रम से खुद को अलग क्यूं कर लिया। यानी ये जनता को बेवकूफ समझते है, ये समझते है कि वे गुरु जी है और झारखंड के नागरिक उनके चेले। जैसा कहेंगे वैसा समझ लेंगे, पर उन्हें ये मालूम नहीं कि उनकी इस गंदी राजनीति को जनता बहुत अच्छे ढंग से समझती है। यहां की जनता जानती हैं कि जो नरसिम्हा राव की सरकार, रिश्वत लेकर बचा सकते है, उस पर भरोसा कभी किया ही नहीं जा सकता और न ही जनता गुरुजी पर विश्वास करती है।

Sunday, April 10, 2011

अन्ना, मीडिया और गांधी….!

जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी भी सदाचार अपनाया ही नहीं, उन्हें भ्रष्टाचार की चिंता सताती जा रही हैं। उन्हें देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और उससे प्रभावित होते विकास की तीव्र चिंता हैं। ये वे लोग हैं जो लाखों-करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों – खरबों में खेलते हैं। जिनकी दिन की शुरुआत ही भ्रष्टाचार और दिन की समाप्ति भ्रष्टाचार पर ही खत्म हो जाती हैं। इन्होंने आजकल गांधी नाम जप शुरु कर दिया हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे देश के गांवों – मुहल्लों में हरे राम संकीर्तन चल रहा होता हैं। आज से ठीक पांच दिन पहले अन्ना हजारे ने एक प्लान के तहत दिल्ली में लोकपाल विधेयक और भ्रष्टाचार मुद्दे पर आमरण – अनशन क्या शुरु किया। पूरे देश में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इनकी तुलना गांधी से कर दी। पूरे देश में गांधी और गांधीवाद तथा बाकी बचे तो अन्ना हजारे छाये रहे, लेकिन ये अन्ना खेतों और खलिहानों में नहीं, बल्कि सिर्फ अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही थे, इधर लगातार अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छाये रहने के कारण केन्द्र सरकार सकते में आ गयी, अंततः आनन फानन में अन्ना की सारी बातें केन्द्र द्वारा मान ली गयी । हालांकि जानकार ये भी कहते हैं कि केन्द्र सरकार और उसके समर्थकों ने एक कूटनीति के तहत इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कराये और ठीक एकदिवसीय वर्ल्ड कप के बाद इसे शुरु कराया और आईपीएल शुरु होने के पूर्व ही इस कार्यक्रम को समाप्त करने की योजना को मुर्त रुप दे दिया, क्योंकि ये जानते थे कि मीडिया की भी अपनी मजबूरियां हैं, और इसे आईपीएल शुरु होने के बाद, बड़ा मुद्दा मीडिया नहीं बना सकती। इसलिए देश में बड़े घरानों के सौजन्य से चल रहे प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम कर रहे लाखों का मासिक वेतन उठानेवालों ने अन्ना हजारे के आमरण अनशन को हाईलाईट करना शुरु कर दिया और अन्ना हजारे की तुलना गांधी और उसके कार्यक्रमों की तुलना गांधीवाद से शुरु कर दी, साथ ही देश में एक तरह से ऐलान करा दिया कि अन्ना हजारे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ दूसरी क्रांति शुरु कर दी हैं, लोगों को इनका साथ देने के लिए बिना विज्ञापन राशि लिए, विज्ञापन शुरु कर दी कि लोग समर्थन करे, इस महापुरुष का। जो बूढ़ा होते हुए भी, युवाओं जैसा काम कर रहा है। ये हल्ला और प्रोपेगंडा करनेवाले वे तथाकथित देश के मूर्धन्य पत्रकार थे, जो अपने मुफ्स्सिल संवाददाताओं के अरमानों का गला घोंटकर, उन्हें औने पौने पैसे देकर, खुद लाखों का वेतन उठाते हैं, और ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं। जो अपने अखबारों के प्रचार प्रसार में अरबों खर्च कर देते हैं ये कहकर कि अब घर में आपकी बीबी की नहीं, आपकी चलेगी मर्जी यानी नारी की स्वतंत्रता का हनन करने में भी, जिन्हें शर्म नहीं आती। वे लोग भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए संपादकीय तक लिख डाले थे। जो देश के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार इस प्रकार की हरकतें कर रहे थे, उनकी सोच और उनकी गिरगिट की तरह रंग बदलने की प्रवृति देख, हमें पूर्व के आंदोलन और उसकी वर्तमान अवस्था पर शर्म महसूस हो रही थी। जरा देखिये, अन्ना के आंदोलन का, आज अऩ्ना ने अपना आंदोलन समाप्त कर दिया पर उसके बदले में क्या उसने पाया। सिविल सोसाईटी की ओर से खुद ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य बन गये हैं। जो ड्राफ्टिंग कमेटी बनी हैं, उसके अध्यक्ष शांति भूषण हैं तो बेटे प्रशांत भूषण सदस्य है। इस मुद्दे पर जब किसी ने अऩ्ना से सवाल किया तो अन्ना का कहना था कि दोनों ईमानदार थे, इसलिए उन्हें रखा गया। क्या देश में इन्हीं बाप बेटों में इनको सबसे ज्यादा ईमानदारी दिखी और देश के 121 करोंड़ों में कोई ईमानदार नहीं था। अरे जिसकी बुनियाद ही इतनी छिछोरी हो, तो वो भ्रष्टाचार से कैसे लड़ेगा। अरे गांधी के नाम को बेचकर अपनी दुकान चलानेवालो, जरा सोचों क्या गांधी ने अपने आंदोलन की कभी कीमत वसूली, जैसा कि अन्ना ने वसूला। खूद सदस्य बनकर। क्या गांधी ने कभी भी अपने जीवन में कोई पद पाया। गर नहीं तो फिर गांधी और गांधीवाद के नाम पर इतना नौटंकी क्यों। जो लोग आंदोलन को मूर्तरुप दे रहे थे, जरा पूछिये कि उनकी पृष्ठभूमि क्या रही हैं, जो स्वामी अग्निवेश खुद नक्सलियों के साथ और उसके आंदोलन को प्रत्य़क्ष समर्थन देता हैं, क्या वो स्वामी हो सकता हैं। जो लोग कश्मीर के विघटनकारियों को समर्थन देने में अपनी शान समझते हैं, क्या वे भ्रष्टाचार के खिलाफ और गांधीवाद के समर्थन में कभी भी आगे आ सकते हैं गर नहीं तो फिर गांधी और गांधीवाद के साथ इतनी बड़ी सौदेबाजी क्यों। मैं उनलोगों से पूछना चाहता हूं जिन्होंने इस नौटंकी को गांधीवाद कह डाला। क्या वे बता सकते हैं कि जिस प्रकार गांधी ने भारत में अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका, क्या इस प्रकार की नौटंकी से अब देश में भ्रष्टाचार का खात्मा हो गया या हो जायेगा। अरे जिस देश में पढ़ाई के नाम पर क्लर्क बनाने और पैसे कमाने की मशीन बनाने की ट्रेनिंग शुरु हो गयी हो, वहां अब भगत सिंह और चंद्रशेखर कहां से पैदा होंगे, और जब ये पैदा ही नहीं होंगे तो फिर भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगेगा। इतनी छोटी बात आंदोलनकरनेवाले लोगों को समझ में नहीं आती। गर नहीं समझ में आती तो वे जाने, पर यहां की जनता जानती हैं। इसीलिए देश के अन्य भागों में अन्ना के इस तथाकथित आंदोलन मे वे लोग शरीक हुए, जो किसी न किसी प्रकार से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, जिन्होंने मां भारती को पग-पग पर अपमानित करने का संकल्प कर रखा हैं। खेतों-खलिहानों अथवा विभिन्न कल कारखानों में काम करनेवाले या प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही काम करनेवाले उन पत्रकारों ने इस आंदोलन से अपनी दूरी बना ली थी, जो सच में बिना किसी शोर-शराबे के देश को नयी दिशा देने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं, जो देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए, कानून बनाने की बात नहीं, बल्कि खुद कानून बनने की कोशिश कर रहे हैं।

Thursday, March 31, 2011

क्यों नहीं, क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाय..............!

भारत ने पाकिस्तान को एक बार फिर मोहाली में 29 रनों से हरा दिया। सचमुच एक बार फिर ये बात सिद्ध हो गयी कि पाकिस्तान भारत से खासकर वर्ल्ड कप में हमेशा से हारता रहा हैं और इस बार भी हारेगा। कुछ संयोग भी था कि कुछ कौतुक मोहाली में देखने को मिले, सचिन तेंदुलकर बार- बार आउट होते हुए बचे और उन्होंने 85 रनों का व्यक्तिगत स्कोर खड़ा कर लिया। ये घटनाएं भी बहुत कुछ बता रही थी कि मैच भारत के पक्ष में हैं। खैर ये मेरा विषय भी नहीं हैं, आज के समाचार पत्रों और बीती रात से विभिन्न इलेक्ट्रानिक मीडिया ने धौनी सेना की गुणगान करनी शुरु कर दी हैं और साथ ही ये भी राग अलाप दिया कि भारत ही वर्ल्ड कप जीतेगा, मैं भी भारतीय हूं चाहता हूं कि कप भारत में ही रहे। पर केवल क्रिकेट के ही क्यूं और अन्य खेलों के लिए भी ऐसी भावना क्यूं नहीं। खासकर, हॉकी के लिए, जो कि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हैं। यहीं बात पाकिस्तान के लिए भी क्योंकि हॉकी वहां का भी राष्ट्रीय खेल हैं, पर सच्चाई क्या हैं। सभी को मालूम हैं, दोनों देशों में हॉकी हाशिये पर चला गया हैं। न तो सरकार, न ही अधिकारी, न ही बड़े बड़े पूंजीपति-खेल के आयोजक ही इस खेल में रुचि लेते हैं। पूरे देश में जिस प्रकार से क्रिकेट का जूनून हैं। गांव – शहर, कस्बा मुहल्ला सभी जगह छोटे से लेकर बड़े विकेट और बल्ले की ही बात कर रहे हैं, ऐसे में हमारा अभिमत हैं कि क्यूं नहीं क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाय, क्यूं हम बेवजह उसे राष्ट्रीय खेल मानने को तैयार हैं- जिसपर हम बात करने को अपना समय देने को तैयार नहीं हैं। आखिर हम ऐसा क्यूं कह रहे हैं। उसके पुख्ता प्रमाण हैं। आप उन देशों को लीजिये जहां का राष्ट्रीय खेल फुटबॉल हैं, जरा उन देशों और वहां के निवासियों को देखिये कि वे फुटबॉल को किस प्रकार लेते हैं, पर हमारे देश में राष्ट्रीय खेल हॉकी के प्रति किस प्रकार अनादर का भाव हैं। वो हॉकी खेलनेवाले खिलाड़ियों की मनोदशा देखकर ही पता लग जाता हैं।
जबकि क्रिकेट की बात हो तो पूछिये मत, गांव – महल्ला, नगर –शहर तो दूर हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक इस पर चर्चा करने लगते हैं। दूसरे मित्र व पड़ोसी देश को क्रिकेट का आन्नद लेने के लिए निमंत्रण तक दे देते हैं। क्रिकेट को लेकर भारत और पाकिस्तान में जैसे मारामारी दीख रही होती हैं, वैसी मारामारी अन्य देशों के खिलाफ होनेवाले क्रिकेट मैचों में नहीं होती। आखिर ऐसा जुनून क्यूं हैं, क्यों हमें पाकिस्तान को हराने में परमानन्द की प्राप्ति होती हैं, जबकि ऐसा ही आनन्द फाइनल में जीतने पर देखने को नहीं मिलता। हमें लगता हैं कि ये शोध का विषय हैं, पर जो सामान्य लोग हैं, वे जानते हैं कि आखिर इसका आनन्द का कारण क्या हैं। किस प्रकार हमारे भारत और पाकिस्तान के राजनीतिज्ञों ने अपने-अपने पड़ोसी देशों को लेकर, हमारे मन में विषवमन पैदा किया हैं, जिसका परिणाम भारत और पाकिस्तान के साथ होनेवाले सिर्फ क्रिकेट में दिखायी पड़ता हैं, न कि इन दोनों देशों के साथ होनेवाले किसी अन्य मैचों में।
कमाल हैं, जैसे ही क्वार्टरफाइनल में ये श्योर हो गया कि भारत और पाकिस्तान सेमीफाईनल में भिड़नेवाले हैं, हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी और वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को भारत मैच का आनन्द लेने के लिए आमंत्रित कर दिया। उधर से भी वहीं प्रतिक्रिया हुई, जिसका अंदेशा कि हम आ रहे हैं। क्या बात हैं जो काम और कोई नहीं कर सकता, क्रिकेट ने कर दिया। दोनों देश क्रिकेट देखने ही नहीं, बल्कि बातचीत को भी तैयार हो गये। जनाब गिलानी पाकिस्तान से आये, खाये-पीये, मैच का मजा लिया और गये। ऐसा लगा कि भारत और पाकिस्तान कभी लड़े ही नहीं थे और न ही कभी लड़ेंगे। यानी भारत और पाकिस्तान अब शांति की डगर पर चल पड़े हैं। इधर सोनिया गांधी और और राहुल गांधी भी मैच देखने के मोहाली पहुंचे और बाकी बचे तो अन्य नेता, व फिल्मी अभिनेता- अभिनेत्री व पूंजीपतियों का बड़ा समूह मोहाली पहुंच गया था। क्रिकेट मैच का आनन्द लेने के लिए। उस क्रिकेट का मजा लेने के लिए जो हमारा राष्ट्रीय खेल नहीं हैं, और जिनके पास अपने राष्ट्रीय खेल देखने के लिए समय नहीं होता। जरा पूछिये, अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी से और उन अन्य नेताओं, अभिनेताओं व पूंजीपतियों से कि क्या ऐसी ही कशिश उनके दिलों में राष्ट्रीय़ खेल के प्रति होती हैं। उत्तर होगा – नहीं। जिस देश में सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठनेवालों के दिलों में अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी के प्रति दर्द नहीं उभरता, उस देश में राष्ट्रीय खेल की क्या स्थिति होगी, वो जो हम देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, हमसे बेहतर कौन समझ सकता।
हम झारखंड में हैं, जहां हॉकी जन-जन में रचा बसा हैं, जहां कई पुरुष और महिला खिलाड़ी हॉकी के द्वारा अपने देश का मान बढाया हैं। इस प्रांत में भी एक क्रिकेट के धौनी ने, उन हॉकी खिलाड़ियों की चमक थोड़ी फीकी कर दी हैं जिन्होंने हॉकी में अपना ही नहीं बल्कि इस राज्य और देश का मान बढ़ाया पर आज उनकी क्या स्थिति हैं, झारखंड की जनता से बेहतर और कौन जान सकता हैं। धौनी का तो कहना ही नहीं, उसके पास तो इतने धन आ चुके हैं कि पूछिय़े मत, पर इसी राज्य में हॉकी के बल पर देश व राज्य का मान बढ़ानेवाले लोगों की हालत पस्त हैं, उस पर न तो केन्द्र और न ही राज्य सरकार का ध्यान हैं। ले – देकर बेचारे अपने हालत पर आंसू बहा रहे हैं, पर क्रिकेट के पक्षधरों और उसके झंडाबरदारों ने उनकी सूध तक नहीं ली। वो भी उस राज्य में उस देश में जहां हॉकी राष्ट्रीय खेल हैं।
कल मैंने ये भी देखा कि जैसे ही भारत ने पाकिस्तान पर जीत दर्ज की, सोनिया गांधी और मनमोहन के चेहरे पर खुशी का ठिकाना नहीं था, वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी के चेहरे पर हार का गम साफ दिखाई पड़ रहा था। पूरे देश की तो बात ही अलग थी। क्या दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता और मुंबई की बात करे, सभी खुश, देश ने पाक पर फतह कर लिया। ऐसी खुशी, जिसको अभिव्यक्त करने के लिए शब्द नहीं थे, जब पूरे देश में ऐसा माहौल हो, तो फिर हम तो ये ही कहेंगे कि हे महान देश के महान राजनीतिज्ञों ( दोनों देशों ) आप जल्द ही ये घोषणा कर दो कि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी नहीं, क्रिकेट हैं। क्योंकि तुम घोषणा करों या न करों, आम जनता तो हॉकी को भूलाकर क्रिकेट के रंग में रंग ही चुकी हैं और क्रिकेट को राष्ट्रीयता से जोड़ दी हैं। साथ ही सचिन-धौनी इऩके सरताज हो चुके हैं। तो फिर देर कैसी।

बिहार, मीडिया और बारबालाएं….!

होली बीते कुछ ही दिन बीते हैं, लेकिन होली के दिन और उसके पहले अथवा होली के बाद, जो मीडिया में होली को केन्द्रित बारबालाओं के उपर बिहार से संबंधित समाचार आये। वो चौकानेवाले तो नहीं, पर चिंतन करनेलायक जरुर थे। ज्यादातर मीडिया ने खुलकर दिखायें कि बिहार में होली की संस्कृति को कैसे तारतार कर यहां के अधिकारी बार बालाओं के डांस का आनन्द ले रहे हैं। किसी ने आधे घंटे तो किसी ने इस पर एक घंटे का विशेष चला दिया तो किसी ने अपने फोन नंबर प्रसारित कर दिये कि दर्शक इस पर अपना विचार दे दे। ये वे लोग थे, जो बंद कमरों में वीडियो चलाकर, एडल्ट फिल्में देखने अथवा विभिन्न वेवसाईटों पर एडल्ट साईट देखने पर शर्म महसूस नहीं करते अथवा मुन्नी बदनाम हुई या शीला की जवानी फिल्मों पर डांस करने से ग़ुरेज नहीं करते और ही मुन्नी बदनाम हुई अथवा शीला की जवानी जैसे गाने इन्हें अश्लील लगती हैं, पर जैसे ही कोई लड़कियां अथवा बार बालाएं इन्हीं गीतों पर चौक चौराहों पर डांस कर रही होती हैं तो इन्हें उसमें अश्लीलता, बिहार की संस्कृति पर चोट जैसी चीजें दिखाई पड़ने लगती हैं। कमाल हैबात वहीं हुई, चलनी दूसे सूप के, जिन्हें बहत्तर छेद। यहीं नहीं बिहार के किसी किसी इलाकें में तो कई अधिकारियों ने बिहार दिवस और होली का एकसाथ आनन्द लिया, इन्होंने देखा कि जब बिहार दिवस मनाना ही हैं, नाचगाना करना ही हैं, पैसा सरकारी खर्च होना ही हैं तो फिर क्यूं बहती गंगा में हाथ धो लिया जाय, इसलिए कई लोगों ने अपने कार्यालय में ही बारबालाओं को बुलाकर गीत संगीत का आनन्द लिया, उन पत्रकारों को भी बुलाएं जिनकी इसमें गहरी रुचि हैं, इन पत्रकारों ने भी जमकर रुचि ली और ठुमके लगाये पर ठुमके लगाने के बाद जैसे ही उन्हें पत्रकारिता की याद आयी तो इसे अपने चैनलों तक भेज दिया ताकि इसके आधार पर कुछ कमायी भी हो जाये। इधर डेस्क पर बैठे लोगों ने देखा कि ये तो समाचार हैं, बिकनेवाला आयटम हैं, तो उन्होंने बिहार की संस्कृति और अश्लीलता पर दिखाकर लगे व्याख्यान देने, जिन्हें अश्लील साईट और अश्लील फिल्में देखने का शुरु से ही शौक रहा हैं।
ऐसे तो हमारे देश में इस प्रकार के गीत और संगीत अथवा नृत्य कोई पहली बार नहीं हुए हैं, हमेशा से चलते रहे हैं, जिनकी जो पसंद हैं, उसमें रुचि लेकर वे डूवकी लगाते हैं, पर इन बारबालाओं के माध्यम से पूरे देश के घरों में चुपके से दिखाने का कुकर्म और प्रयास किसने किया ये तो भारत के और बिहार के इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करनेवाले मान्यवर ही बेहतर बता सकते हैं, पर किया क्या जाये। का पर करहू शृंगार, पुरुष मोर आन्हर।
आश्चर्य इस बात की हैकि क्या मुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी में अश्लीलता नहीं हैं, फिल्म खलनायक में चोली के पीछे क्या हैं, क्या ये अश्लील नहीं हैं। होता तो ये हैं कि सदियों से लोग अश्लीलता को अपनी अपनी आंखों से नापते और देखते हैं और उसके बाद व्याख्यान देते हैँ और इसके बाद शुरु होता हैं एक दूसरे को नीचा दिखाने का आरोप प्रत्यारोप। हालांकि इसका असर कुछ होता नहीं हैं। भले ही जहां बार बालाओं के डांस हुए, बिहार सरकार ने उन अधिकारियों पर गाज भी गिराये पर क्या इस प्रकार के गाज गिराने से उन अधिकारियों के चरित्र सुधर जायेंगे।
हुआ तो ये हें कि पूरे देश के गांव शहरों के कुएं और तालाब, नदियों और सागरों में भांग पड़ गयी हैं। सभी इसमें से एक लोटा जल निकालकर स्वयं को तृप्त कर रहे हैं, ऐसे में अश्लीलता पर कोई टिप्पणी करें तो हमें आश्चर्य लगता हैं. भाई, जब महर्षि विश्वामित्र, मेनका के आगे झूक सकते हैं, जब महर्षि पराशर, सत्यवती के रुप लावण्य को देख मोहित हो सकते है तो ये बार बालाएं किस मर्ज की दवा हैं। ये तो सामान्य लोगों को अपने रुप सौंदर्य और लटकोंझटकों से सिर्फ उनके दिलों को मरहम लगा रही होती हैं। अरे याद करियेभोजपुरी गायक बलेसर को, जो कहते हैं -- काशी में माजा, काबा में माजा, ही माजा बरसाने में, अरे तीन बजे आके जगइहे पतरकी सुतल रहब खरियानी में....................
इसी से पता लग जाता हैं कि सामान्य लोगों की पहली पसंद और आखिरी पसंद क्या हैं। कोई भी व्यक्ति आनन्द की खोज में हैं, पर वो आनन्द उसे कहां मिल रहा हैं, किस रुप में मिल रहा हैं, जिसे वो प्राप्त करने की कोशिश कर रहा है, उसे वो लेकर रहेगा, चाहे आप झूठी व्याख्यान देकर स्वयं को स्वामी इलेक्ट्रानिकानंद अथवा प्रिंटानंद की उपाधि से विभूषित होने का मन में ख्याल ही क्यूं रखे.

Wednesday, March 23, 2011

हमारा प्रधानमंत्री और यहां के पत्रकार बड़े होशियार हैं.......!

संदर्भ --- घूस देकर सरकार बचाने का...

चाहे सदन में चर्चा हो या न हो। गर हो भी तो भले ही उसका अर्थ न निकले। पर प्रधानमंत्री मनमोहन जी और यूपीए की नेता सोनिया गांधी को मालूम होना चाहिए कि भारत की जनता इतनी मूर्ख नही, जितना वो समझते हैं। भारत की सौ करोड की आबादी जानती हैं कि जो केन्द्र में सरकार चल रही हैं, वो भ्रष्टाचार को आत्मसात कर ही चल रही हैं, और इसी सरकार ने पिछली बार 14 वी लोकसभा में अपनी कुर्सी को बचाने के लिए, सांसदों को घूस दिये थे। ये अलग बात हैं कि जिनके पास सबूत थे, उन पत्रकारों और नेताओं ने इस सरकार के आगे अपनी जमीर बेच दी थी। प्रधानमंत्री जी का संसद में विकीलीक्स मामले पर विपक्षी नेताओं के प्रश्नों के जवाब के दौरान ये कहना कि इसका कोई सबूत नहीं कि उऩकी पार्टी अथवा सरकार ने घूस देकर, सरकार बचायी थी, इसलिए वे निर्दोष हैं अथवा उनकी पार्टी या सरकार दोषी नहीं हैं, बचकाना बयान हैं। ये तो वहीं बयान हैं जब कोई अपराधी, अपराध तो करता हैं, जिसका ताउम्र उसे एहसास होता भी रहता हैं, पर अपने अपराधिक सबूतों को बड़ी ही सफाई से इस प्रकार गायब कर देता हैं, जिसका पता दूसरों को नहीं लगता। पर इस बार विकीलीक्स द्वारा किया गया खुलासा कि कांग्रेस ने सांसदों को घूस देकर अपनी सरकार बचायी थी, सब कुछ क्लियर कर देता हैं कि इस देश में कैसे – कैसे राजनीतिज्ञ शासन कर रहे हैं और इसका साथ यहां के तथाकथित जमीर बेचने वाले पत्रकार कैसे दे रहे हैं । ऐसे तो सभी जानते हैं कि कांग्रेस और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय हैं। चाहे विदेशों में धन रखने की बात हो या विभिन्न घोटालों को जन्म देना ये कांग्रेसियों का बायें हाथ का खेल हैं। ये अलग बात हैं कि भारत इनके द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार के बावजूद भी सरकता हुआ आगे बढ़ता जा रहा हैं, क्योंकि यहां की आज भी एक बहुत बड़ी आबादी देश को आगे बढ़ाने के लिए अपना खून पसीना बहाती जा रही हैं, ये कहकर कि-----
तेरा वैभव अमर रहे मां,
हम दिन चार रहे ना रहे
इस देश का दुर्भाग्य रहा हैं कि जब से ये देश स्वतंत्र हुआ तब से लेकर आज तक ज्यादातर समय तक कांग्रेसियों का शासन रहा हैं, जिन्होंने शायद संकल्प कर लिया हैं कि वे इस देश का बंटाधार करके रहेंगे। उनके इस संकल्प को पूरा करने में, वे पत्रकार भी शामिल हो गये हैं, जिनका मकसद, समाचारों के माध्यम से पत्रकारिता और देश सेवा न कर ब्लैकमेलिंग करना हैं, पर इन ब्लैकमेलर पत्रकारों को भी कैसे ठीक किया जाता हैं, शायद कांग्रेसियों को बहुत अच्छी तरह पता हैं। इसलिए जिन पत्रकारों अथवा चैनल के पास सासंदों को घूस देनेवाली खबर व उसके पूख्ता सबूत मौजूद थे, उस चैनल और उसके पत्रकारों ने बिना देर किये कांग्रेसियों के चरण पकड़ लिये ये कहकर कि आप हो तो हम हैं, इसलिए आप घबराये नहीं, हम कभी भी उस खबर को अपने चैनल पर नहीं दिखायेंगे, जिसकी वजह से सरकार पर आंच आती हो, आप जो कहेंगे, वहीं करेंगे। इसलिए, उस वक्त, उक्त चैनल ने वो समाचार नहीं दिखायी, जिसको देखने के लिए भारत की जनता बेकरार थी, जिसका कथन था, खबरें किसी भी कीमत पर वो पता नहीं कौन सी कीमत लेकर अपना जमीर बेच चुका था। पर जनता तो जनता हैं वो जान चुकी थी कि दाल में काला हैं, पत्रकारों ने जमीर बेचा हैं, सब जगह थू थू होने लगी, उक्त चैनल ने बहुत दिनों बाद, जब मामला ठंडा पड़ गया, समाचार दिखाई, वो भी जैसे तैसे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, कांग्रेसियों ने पूरे प्रकरण को गड्मगड कर दिया था, वे अपने मकसद में कामयाब हो गये थे, पर कहा जाता हैं न कि सच, सच होता हैं, विकीलीक्स ने रहस्योदघाटन करके बता दिया कि कांग्रेसियों ने घूस देकर, अपनी सरकार बचायी, और केन्द्र की सोनिया मनमोहन की सरकार तो नंगी हुई ही, वे पत्रकार भी नंगे हो गये जिनके पास सत्य था पर वे सत्य दिखाने का साहस नहीं दिखा सकें । जो पत्रकार कहते हैं कि वे खबरें किसी भी कीमत पर जाकर दिखा सकते हैं। वे भी कांग्रेसियों के चरणोदक पीने को बेताब हो जाते हैं, जब कांग्रेसियों की धमक, उन पत्रकारों के कानों तक पहुंच जाती हैं। लेकिन देश के अन्य इमानदार पत्रकारों द्वारा, उन जमीर बेचनेवाले पत्रकारों अथवा चैनलों पर थू थू की जाती है, तब भी ये बेशर्मी से अपने को पाक साफ बताने में लग रहते हैं। जब देश के संसदीय इतिहास में पहली बार, नोटों के बंडलों को भाजपाईयों द्वारा रखा जा रहा था और ये नेता ये कहकर चिल्ला रहे थे कि उन्हें कांग्रेसियों ने खरीदने की कोशिश की, जिसका सबूत देश के एक प्रमुख चैनल और पत्रकार के पास था, उसने किस कारण से अपनी जमीर बेच दी, वे तो वहीं बता सकते हैं, पर देश की जनता जान गयी थी कि यहां नेता व पत्रकार सभी मिले हैं, सभी तरमाल खा रहे हैं, सभी देश को बर्बाद करने में तूले हैं, चारो ओर घोर अंधियारा हैं, कहीं कोई किनारा नहीं हैं, इसलिए जनता सब कुछ जानते हुए भी, एक बार फिर अनिच्छा से विष पीया और कांग्रेस को सत्ता सौंप दी, और इस सता को पाने के बाद कांग्रेसियों ने तो समझ लिया कि भारत की जनता उनके साथ हैं, इसलिए भ्रष्टाचार का कीर्तिमान बनाओ, और देश के दिल्ली में बैठे पत्रकारों को साम दाम दंड भेद के तहत अपने पास मिलाये रखों और देश पर शासन करने का मजा लेते रहो। शर्म हमें आती हैं कि हम उस कालखंड में रह रहे हैं, जहां जमीर बेचनेवाले नेता व पत्रकार देश के शीर्ष स्थानों पर बैठकर, भारत के विकास का बेशर्मी राग, देशवासियों को सुना रहे हैं, ये कितने बेशर्म हैं, इस बात का पता इसी से चल जाता हैं कि देश के संसद में भी बैठकर हसंते हुए, अपनी बेशर्मी का फागुनी राग सुना रहे होते हैं, और इनके फागुनी राग में पत्रकार भी ये कहकर बेशर्म बनते हैं, कि कांग्रेसी और मनमोहन तो आज तक कुछ गलत किया ही नहीं, ये तो विपक्षी दल के नेताओं की आदत हैं, सत्तापक्ष को कठघरे में खड़ा करने की, इसलिए गाहे बगाहे चिल्लाते रहते हैं। इसलिए इन्हें चिल्लाने दीजिये। हम अपना काम करते रहे। यानी की, हम हमेशा जीवित थोड़े ही रहेंगे, जब तक जीयेंगे ऐश करके जीये, देश भाड़ में जाये, जिनको देश के बारे में सोचना हैं, वो सोचे। अपना क्या हैं, खाओ, पीओ, ऐश करो। देश पर चीन हमले की योजना बनाये अथवा पाकिस्तान व बांगलादेश हमारी सरहदों को छोटा करने की कोशिश करें तो उससे हमें क्या। हमने ही ठेका ले रखा हैं, भारत का क्या।

Monday, March 14, 2011

तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा..................!


जी हां। तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा। कुछ ऐसी ही सोच है, झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का। जोड़ – तोड़, सांठ – गांठ, तिकड़मबाजी में महारत हासिल, भाजपा के इस नेता ने झारखंड की सत्ता संभालने के बाद अपनी छवि जनता के बीच ठीक जाये, इसके लिए, इन्होंने अपने आवास पर 12 मार्च 2011 को मीडियाकर्मियों को भोज पर आमंत्रित किया, और उनसे गुफ्तगू की। इस गुफ्तगू में रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के गण्यमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया। सभी पहुंचे भी। क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री ने भोज पर आमंत्रित किया था। ऐसे भी जब दिल्ली में प्रधानमंत्री, दिल्ली के पत्रकारों को अपने आवास पर भोज में आमंत्रित करें तो भला किस पत्रकार की लार नहीं टपकेगी। ठीक उसी प्रकार, मुख्यमंत्री आवास से जैसे ही भोज का आमंत्रण मिला। रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार पहुंच गये। जिनका मुख्य मकसद मुख्यमंत्री की चाटुकारिता करना, उनके सम्मान में स्वयं को समर्पित कर देना और इसके बदले सरकारी विज्ञापन प्राप्त करना, मुंहमांगी उपहार प्राप्त करना, पैरवी कर अपने लोगों को धन्य – धन्य करा देना, होता हैं, पर इसके उलट इस भोज में कुछ ऐसे भी एक दो पत्रकार पहुंचे थे, जिनका इन सबसे कोई भी लेना देना नहीं होता, जब उन्होंने मुख्यमंत्री आवास पर पत्रकारों के हाल देखे तो भौचक्के रह गये, क्योंकि ये वे पत्रकार थे जिनके जेहन में केवल पत्रकारिता और सिर्फ पत्रकारिता ही होती है।
मुख्यमंत्री आवास पर मुख्यमंत्री के साथ पत्रकारों ने चर्चाएं भी की। पत्रकारों ने कुछ मांगे भी मुख्यमंत्री के सामने रखी। मुख्यमंत्री ने भी दिल खोलकर बातें की --- पत्रकारों के हाल, उनके सम्मान, फैलोशिप, जो अच्छे समाचार प्रसारित अथवा प्रकाशित करेगा, उन्हें सरकार सम्मानित करेगी, धन उपलब्ध करायेगी। पता नहीं क्या – क्या बातों का दौर चला। मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचे पत्रकार खुश, क्योंकि अब जो जितनी चाटुकारिता करेगा, उसे उतना ही लाभ मिलेगा। पत्रकारों को खुशी का ठिकाना नहीं था। अब रेवड़ियां केवल एक को नहीं, बल्कि सबको मिलेगी। फिर भी कुछ को चिंता थी कि ये कैसे हो सकता है। जिसे मुख्यमंत्री पहले से ही रेवड़ियां देते आये हैं, क्या इस प्रकार की शुरुआत से उन्हें तकलीफ नहीं होगी। क्योंकि वे तो चाहते ही हैं कि मुख्यमंत्री रेवड़ियां सिर्फ उन्हें ही दे, ऐसे भी मुख्यमंत्री, उन्हें रेवड़ियां देने में सबसे ज्यादा आगे रहते है, क्यूं रहते है, ये तो मुख्यमंत्री ही बेहतर बता सकते है।
मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये भोज में कुछ ऐसे तथाकथित पत्रकार भी पहुंचे थे, जिनका मुख्यमंत्री आवास पर आना जाना बराबर होता हैं, जो इनके सामने साष्टांग दंडवत् किये हुए रहते है और मुख्यमंत्री भी बड़ी उदारता से उन्हें लाखों के विज्ञापन और उपहार देकर, उपकृत करते रहते हैं, यहीं नहीं, मुख्यमंत्री को भी खुद उनके साथ बैठना और बातें करते रहना अच्छा लगता हैं, ऐसे भी अपनी बड़ाई सुनना किसे अच्छा नहीं लगता। जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी बड़ाई सुनने में आनन्द प्राप्त होता है, तो ये तो झारखंड के मुख्यमंत्री है। पर जनता जानती हैं कि दोनों के कामकाज में आकाश जमीन का फर्क हैं। एक ने अपने काम काज से, अखबारों में सुर्खियां बटोरी, आवश्यकतानुसार विज्ञापन दिये, तो दूसरे ने काम काज पर कम और अपनी छवि जनता के बीच बेहतर दिखे, इसके लिए पत्रकारों को विज्ञापन और उपहार के लॉलीपॉप का लालच दिखाया, और पत्रकार भी इस लॉलीपॉप के आगे उछलते कूदते नजर आये।
ऐसे में झारखंड की जनता के पास मरने के सिवा दूसरा क्या रास्ता बचा हैं। जहां का शासक अपनी छवि बेहतर दीखे, उसके लिए पत्रकारों को मुंहमांगी धन व उपहार देकर, उनकी मुंह बंद करना चाहता हैं और पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के आगे अपनी मुंह बंद करने के लिए करवद्ध हो, खड़ा रहता हैं, साष्टांग दंडवत् करता हैं, उस राज्य का भगवान ही मालिक है।
जिस प्रकार से मुख्यमंत्री आवास में पत्रकारों के लिए भोज आयोजित किये जाते है, और जिस प्रकार से पत्रकार उन भोजों पर टूटते हैं, उसे देखकर कोई भी सामान्य व्यक्ति लज्जित हो जाता हैं कि ये आदमी हैं या कुछ और.......!
कभी – कभी तो मैंने खुद देखा हैं कि मुख्यमंत्री आवास अथवा अन्य जगहों पर जिन पत्रकारों को भोज पर आमंत्रित नहीं किया जाता, जो सिर्फ समाचार संकलन के लिए जाते है, वे भी बिना किसी आग्रह के भोजन व उपहार पर टूट पड़ते हैं, जो बताता हैं कि यहां किस प्रकार की पत्रकारिता चल रही है और जब पत्रकार खुद बिकने को तैयार है तो शासक वर्ग को खरीदने में क्या दिक्कत, वो अपना काम कर रहा है।

Sunday, March 6, 2011

आखिर सुमन गुप्ता को जाना ही पड़ा........।

दसवीं का जब छात्र था, तो उस वक्त कहानी संकलन नामक पुस्तक चला करती थी। उसी में मैंने मुंशी प्रेमचंद की लिखित कहानी नमक का दारोगा पढ़ा था, जिसमें एक पिता अपने पुत्र को नौकरी में जाने के पूर्व हिदायत दी कि बेटा मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद हैं, उपरि आमदनी बहता हुआ स्रोत हैं यानी नाना प्रकार से व्यवहारिक जिंदगी अपनाने की बात, अपने बेटे से कहीं, पर बेटा नहीं माना। नमक का दारोगा बना। ईमानदारी से जिंदगी बितानी शुरु कर दी। एक समय ऐसा आया कि धन ने धर्म पर जीत दर्ज कर ली, पर अंततः कहानी के अंत अंत आते आते, धर्म की जीत हो जाती है। यहीं जीत बताती हैं, कि भारत का ध्येय वाक्य सत्यमेव जयते की सर्वदा जय होती है, इसीलिये भय नहीं करें, संघर्ष करें, आगे बढ़ते जाये, और देश व समाज को नयी दिशा दे दे।
सुमन गुप्ता जो पुलिस अधीक्षक के पद पर धनबाद में शोभायमान थी। आज वो वहां नहीं है, उन्हें राज्य सरकार ने रांची वायरलेस के एसपी पद पर स्थानांतरित कर दिया। धनबाद एसपी के रुप में आर के धान को पदभार ग्रहण करने के लिए कहा गया है। हम आपको बता दें कि सुमन गुप्ता जैसी वीरांगनाएं कई कभी कभार ही जन्म लेती है, जबकि आर के धान जैसे लोगों की संख्या झारखंड में बहुत है, आर के धान न कभी, सुमन गुप्ता बन सकते है और न उन्हें बनने की आवश्यकता है। ऐसे तो राज्य सरकार ने पहले ही सुमन गुप्ता को स्थानांतरित करने का फैसला ले लिया था पर पता नहीं क्या उनकी मजबूरी हो गयी, उन्होंने स्थानांतरण के फैसले को स्थगित कर दिया और अब अचानक, इसे इम्पलीमेंट करा दिया। हालांकि सामान्य जनता जानती हैं कि ऐसा क्यूं हुआ हैं, और हमें लिखने में कोई दिक्कत नहीं कि राज्य सरकार ने कुख्यात कोयलामाफियाओं और कोयलांचल के कुख्यात अपराधियों, सत्तापक्ष और संपूर्ण विपक्ष में शामिल भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट वरीय पुलिस पदाधिकारियों व भ्रष्ट पत्रकारों के आगे घूटने टेकते हुए, वो कर दिया, जिसकी आशा सामान्य जनता को पहले से ही थी। सामान्य जनता जानती थी कि जिस प्रकार से सुमन गुप्ता कोयलांचल के कोलमाफियाओं पर एक एक कर हमले करते हुए, उन्हें उनकी औकात बता रही हैं, वो ज्यादा दिनों तक धनबाद नहीं टिकेंगी। और आखिर वहीं हुआ भी, नहीं टिकी। ऐसे भी यहां कोई पुलिस पदाधिकारी वो भ्रष्ट ही क्यूं न हो, ज्यादा दिनों तक नहीं टिकता, क्योंकि राज्य के वरीय पुलिस पदाधिकारी आईपीएस ही नहीं, यहां तक की आईएएस अधिकारी भी, जब झारखंड कैडर चुनते हैं तो उनकी पहली और अंतिम इच्छा होती हैं कि एक बार धनबाद संभाला जाये, क्योंकि धनबाद में वो सब कुछ है, जिसके कारण दुनिया की सारी सुख सुविधाएं, देखते ही देखते, उनके घर में आ जाती है। इसलिए हमारा मानना है कि महत्वपूर्ण ये नहीं कि धनबाद में कौन कितने दिन एसपी के रुप में रहा, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन भी रहा, कैसे रहा। और हमें ये कहने में गुरेज नहीं कि, सुमन गुप्ता का कार्यकाल अद्वितीय रहा है और आज के बाद धनबाद में जो भी एसपी आयेंगे, उन्हें सुमन गुप्ता बनने में, पसीने छूट जायेंगे। धनबाद से सुमन गुप्ता का जाना, भ्रष्ट व्यवस्था के हावी होने और भ्रष्ट अर्जुन मुंडा सरकार का प्रत्यक्ष और सुंदर उदाहरण है। कुख्यात कोयला माफियाओं, कुख्यात अपराधियों, कुख्यात पुलिस पदाधिकारियों की फौज, इस वीरांगना के खिलाफ लगी थी, जिसमें ये एकमात्र महिला अपनी पूरी ताकत लगाकर, भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ रही थी, ठीक उसी प्रकार जब 1857 में सिंधिया परिवार अंग्रेजों से मित्रता करने की संधि कर रहा था, और उसी वक्त लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से चुन चुन कर बदला ले रही थी, संघर्ष कर रही थी। जिस पर सुप्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है –
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया,
ने छोड़ी रजधानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वो तो,
झांसी वाली रानी थी।
मैं भी कहना चाहता हूं, जब सुमन गुप्ता भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिस पदाधिकारियों, कुख्यात कोल माफियाओं, भ्रष्ट पत्रकारों को उनकी औकात बता रही थी, तब अर्जुन मुंडा की सरकार, इन भ्रष्ट लोगों के साथ सुर में सुर मिलाकर ये कह रही थी कि ऐ भ्रष्टाचारियों, चिंता मत करों, मैं हूं न। जल्द ही, उक्त महिला को, मैं वहां से हटाकर, उसे ऐसा शंट करुंगा कि तुम देखते रह जाओगे। और अर्जुन मुंडा की सरकार ने ये करके दिखा दिया। शर्म – शर्म।
इधर सुमन गुप्ता का स्थानांतरण पत्र आया, उधर उक्त महिला ने तनिक देर नहीं की और अपना बोरा बिस्तर बांध लिया, चल दी। इधर आम जनता को पता लगा कि सुमन गुप्ता जा रही हैं, आम जनता की भीड़ उनके आवास पर आ खड़ी हुई, किसी के हाथों में फूल मालाएं थी, तो कोई उनसे ऑटोग्राफ ले रहा था। आश्चर्य कोई पैसा कमाता हैं तो कोई यश। मैंने कोयलांचल में, कई एसपी को आते जाते देखा, पर आज तक किसी एसपी की, ऐसी विदाई नहीं देखी।
सचमुच मह्त्वपूर्ण ये नहीं, कि कौन कितने दिन जिया, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन जिया, कैसे जिया। शेर की तरह या मच्छड़ की तरह। अब धनबाद में शायद ही कोई एसपी के रुप में शेर दिखेगा। शेर लिखने का मतलब, पुरुषार्थ से हैं। सुमन गुप्ता गर चाहती तो वो भी अन्य भ्रष्ट अधिकारियों और समझौतावादी व्यवहार, भ्रष्ट नेताओं की चाटुकारिता कर वो पद पा लेती, जिसकी चाहत यहां के आईएएस व आईपीएस अधिकारियों को होती हैं, पर जो रास्ता उन्होंने अपनाया है, ईश्वर से यहीं प्रार्थना हैं कि उस पर सदैव चलती जाये, क्योंकि ये मार्ग कठिन है, इस राह में नाना प्रकार की परीक्षाएं होती है और उन परीक्षाओं में सफल होना बहुत ही कठिन होता है। क्योंकि आईएएस व आईपीएस बन जाना आसां हो जाता है, पर इस पद को पाकर, एक अच्छा इंसान बनना, पुरुषार्थी इंसान बनना, लक्ष्मीबाई बनना, बहुत मुश्किल होता है। निरंतर संघर्ष करते जाईये, सुमन जी, आप खूब चमकेंगी, क्योंकि ईश्वर आपके साथ है।

Tuesday, March 1, 2011

भारत क्या है .............................................

सदियों से भारत और भारत के बाहर के लोग भारत और उसकी अमूल्य धरोहर यानी इसकी संस्कृति के बारे में जानने की कोशिश करते रहे हैं। इसी क्रम में कुछ जान पायें और कुछ बिना जाने ही स्वर्ग सिधार गये। जिन्होंने जाना, उन्होंने जीने की कला सीख ली और खुद को धन्य करा दिया और जिन्होंने नहीं जाना, वे आज भी आवागमन में लगे हैं। क्या है भारत, क्यों ये आज भी जीवित है जबकि इसी दरम्यान कई देश जीवित हुए और मृत भी हो गये, पर भारत आज भी साकार खड़ा है। इसकी सीमाएं कालांतराल में फैली, सिकुड़ती गयी, पर इसके अस्तित्व पर कभी संकट नहीं आया और न आ पायेगा। शायद इसीलिए सुप्रसिद्ध शायर इकबाल ने आखिर लिख ही डाला कि ...
यूनान मिस्र रोमां, सब मिट गये जहां से,
अब तक मगर है बाकी, नामो निशां हमारा,
कुछ बात हैं कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा हैं, दुश्मन दौरे जहां हमारा......................

कमाल है, विश्व में कौन ऐसा देश है, जिस पर भारत जितने हमले हुए, और फिर इन हमलों से पार पाकर, वो देश फिर शान से खड़ा हो गया हो। इसका मतलब ही है कि भारत, अन्य देशों से कहीं भिन्न है, ये भोगभूमि नहीं, ये त्यागभूमि है। इसका कण-कण धर्म और देवत्व की परिभाषा कहता हैं, जरुरत हैं इसे समझने की। पर आज इसे समझने की फुरसत किसे है, गर नहीं हैं, तो समय का इंतजार करिये, प्रकृति खुद ऐसी लीलाएं करेगी कि आप को समझना आवश्यक पड़ जायेगा।
विष्णु पुराण कहता है………………………………………..
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रश्चैव दक्षिणम्।
वर्षम् तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।

अर्थात् हिमालय के दक्षिण और सागर के उत्तर में जो भूखण्ड है वो भारत के नाम से जाना जानेवाला हैं और उसकी संतान भारती कहलाती है।
भा का अर्थ होता है – प्रकाश, प्रभा, कांति, शोभा और रत का अर्थ है – उसमें रम जानेवाला। यानी प्रकाश की ओर सदैव गमन करनेवाले देश का नाम भारत है। कैसा प्रकाश तो उसका सीधा अर्थ है – ज्ञान का प्रकाश। सर्वप्रथम ज्ञानोदय यहीं हुआ, सभ्यता यहीं आयी और फिर इस ज्ञान के प्रकाश के आधार पर सारा विश्व आलोकित हुआ। सारा विश्व भी अब मान चुका है कि विश्व की पहली पुस्तक ऋग्वेद है और इससे ज्यादा वर्तमान में प्रमाणिक आधार दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
भारत और भारत का धर्म………………………………………………..
बार-बार धर्म को लोग, अपने अपने चश्मे से देखते हैं, कोई कहता है – हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, सिक्ख धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और पता नहीं कितने सारे धर्म आज विश्व में पैदा हो चुके हैं, जो अनगिनत हैं, हम कह सकते हैं कि जितने लोग, उतने धर्म। पर धर्म क्या है, उसका शाश्वत स्वरुप क्या है, उसका आधार क्या है, शायद ही इन धर्मों की वकालत अथवा इस पर गर्व करनेवालों को मालूम हो, पर सही में धर्म की व्याख्या बहुत पहले स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में कर दी थी – ये कहकर कि गर पूरे विश्व से हिन्दू धर्म समाप्त हो जाये और उसके जगह पर इस्लाम धर्म का बोलबाला अथवा ईसाई या अन्य किसी भी प्रकार के धर्मों का बोलबाला हो जाये तो उसके धर्म ध्वज अथवा उसके उपदेशों में क्या लिखा होगा – ये लिखा होगा कि झूठ बोलो, अमर्यादित आचरण करों, सज्जनों को दुख पहुंचाओं, नहीं तो फिर क्या लिखा होगा – यहीं न, कि सच बोलो, अमर्यादित आचरण न करों, सज्जनों को आनन्द पहुंचाओ, यहीं तो धर्म है। भारत तो सदियों से यहीं कहता आया है। यहीं धर्म का मूल स्वरुप हैं, आधार है। ऐसे भी धर्म शब्द की उत्पति ही संस्कृत के धृ धातु से हुई है। धृ का अर्थ है – धारण करना। क्या धारण करना तो सत्य धारयति धर्मः अर्थात् सत्य को धारण करना ही धर्म है। धर्म शाश्वत है यह प्रकृति के अधीन है। प्रकृति स्वयं सत्य आचरण करा लेती है कोई इसके विपरीत चल ही नहीं सकता। गर चलेगा तो प्रकृति उसे दंड देगी, ये पूर्णतः सत्य है। ठीक उसी प्रकार कि गर्मी के दिनों में कोई कंबल नहीं ओढ़ सकता, कंबल तभी ओढ़ेगा जब जाड़े का मौसम आयेगा। ये धर्म का सार है। किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा चलाया गया पंथ या मत – कदापि धर्म का स्वरुप नहीं ले सकता। क्योंकि धर्म उक्त व्यक्ति के पूर्व में नहीं रहने के बावजूद भी था और उक्त व्यक्ति के नहीं रहने पर भी रहेगा। वह मृत नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति के पंथ अथवा मत को माननेवाले पंथी अथवा मतावलंबी हो सकते है। धर्मावलंबी नहीं, धर्मावलंबी तभी होंगे जब वो प्रकृति के अनुरुप चलेंगे, भारत और भारत की वैदिक परंपराएं अथवा उपनिषद् यहीं कहती है, गर आप इसे नकारेंगे तो भला, वेदों अथवा उपनिषदों को क्या होनेवाला है, ठीक उसी प्रकार गर कोई आकाश पर थूकने का प्रयास करें तो क्या होगा, उत्तर उस व्यक्ति को खुद ही पता हैं, इस पर विवेचना की आवश्यकता नहीं।
भारत भोगभूमि नहीं, त्यागभूमि है........................................
ज्यादातर लोग आज पश्चिमी सभ्यता व संस्कृति से अनुप्राणित हो रहे है, उन्हें लगता हैं कि उनका जीवन पश्चिम की तरह सुखों का उपभोग करने के लिए हुआ हैं, इसलिए जमकर प्रकृति का दोहन करों, आनन्द पाओं और दुनिया से विदा हो जाओ, पर भारत के इतिहास को देखें तो यहां वहीं व्यक्ति जीवित रहा, जिसने त्याग को अपनाया, बाकी सभी मृतात्माओं की श्रेणी में आ गये। ये क्रम सदियों से चलता आ रहा है और चलता रहेगा, कोई इसे काटना भी चाहे तो नहीं काट पायेगा। कितने प्रमाण दूं।
जरा गोस्वामीतुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस अथवा वाल्मीकि रामायण का पृष्ठ उल्टे. प्रसंग अयोध्याकांड का है। राजा दशरथ अति प्रसन्न है। वे अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते है। सारी तैयारियां हो चुकी हैं, पर ऐन मौके पर कैकेयी, महाराज दशरथ से दो वर मांगती हैं, जिसमें राम को वनवास और भरत को राज्याभिषेक की मांग शामिल है। दशरथ किंकर्तव्यविमूढ़ है। क्या करें क्या न करें। पर श्रीराम मर्यादा का पालन करते हुए पुरुषार्थ के प्रथम सोपान त्याग को अपनाते हैं, धर्म की रक्षा करते हुए, पिता और रघुकुल की रीति प्रभावित न हो, वे वनगमन को स्वीकार करते हुए, जंगल की ओर निकल पड़ते है। राम चाहते तो आजकल की पीढ़ियों के अनुसार वे अपने पिता दशरथ से कह सकते थे कि पिताजी आपने माता कैकेयी को वर दिया था, मैंने नहीं, रघुकुल के नियमानुसार अयोध्या का राजा ज्येष्ठ पुत्र ही होता है, ऐसे में, मैं ही अयोध्या का असली उत्तराधिकारी हूं और मैं ही राजा बनुंगा। अब आप बताईये, जब श्रीराम इस प्रकार की मांग दशरथ के पास रखते तो वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते। उत्तर होगा – नहीं। तो ये है धर्म और ये है भारत। श्रीराम ने पिता के वचन को साकार करने के लिए, सारे सुखों का त्याग कर दिया, यहीं नहीं इसके बाद सीता और लक्ष्मण ने श्रीराम के लिए, महलों के सुख का परित्याग कर दिया। और अब आगे, श्रीराम के भाई भरत को पता चलता है कि उनकी माता कैकेयी, उनके लिए राज्याभिषेक और श्रीराम के लिए वनगमन की मांग कर दी है, तो वे अपनी माता कैकेयी तक का परित्याग करते हुए, अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम को वन से लौटाने के लिए, जंगल की ओर चल पड़ते है, यहीं नहीं 14 वर्षों तक अयोध्या में रहते हुए, भरत ने सारे सुखों का त्याग कर दिया और वनवासियों की तरह रहे, ये है त्याग की परिभाषा यानी भारत की परिभाषा का सुंदर उदाहरण।
एक और प्रसंग पर ध्यान दें...................................................
प्रसंग श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धाकांड का है
बालि श्रीराम के बाण से घायल है। घायल बालि ने कहा –
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि व्याध की नाई।।
मैं वैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा।।

श्रीराम ने कहा.......................
अनुज बधु भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।

यहां भी धर्म की व्याख्या हो गयी, गर आप चौपाईयों पर ध्यान दें तो भारत और भारत के धर्म की परिभाषा स्वतः प्राप्त हो जाती है।
ये तो भारत के महाकाव्यों में से एक की बात कही, हो सकता है कि कई मित्र इन उदाहरणों को धार्मिक कथा कहकर, इसे प्रमाण मानने से इनकार कर दें। उनके लिए भी भारत के कई उदाहरण जो समसामयिक है। मेरे पास मौजूद है।
जरा ध्यान दे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का काल खंड महात्मा गांधी, दक्षिण अफ्रीका से भारत आते है, भारत आते ही स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई जारी करने की घोषणा करते है। तभी उनकी मुलाकात गोपाल कृष्ण गोखले से होती है, गोपाल कृष्ण गोखले, उन्हें कहते है कि मिस्टर गांधी ( उस वक्त तक गांधी को महात्मा का खिताब, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने नहीं दिया था) जिस भारत की परिकल्पना वे अभी कर रहे है, वैसा भारत अभी नहीं हैं, स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई को ठीक ढंग से चलाने के लिए पहले, उन्हें यानी महात्मा गांधी को, भारत दर्शन का कार्यक्रम बनाना चाहिए, उसके बाद गांधी जी ने भारत दर्शन का कार्यकम बनाया। उसी दौरान, उन्होंने जो भारत की तस्वीर देखी, उनका हृदय विदीर्ण हो उठा। भारत और भारतीयों की दयनीय दशा देख उन्होंने सारे सुखों का त्याग करने का संकल्प लिया और उसके बाद जो उन्होंने सामान्य जन की वेष भूषा अर्थात् लंगोटी पहनी तो उसे आजीवन धारण किये रहे। फिर उन्होंने सामाजिक सुधार आंदोलन के साथ साथ देश की स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी, और उन्होंने खुद अपने आंखों से भारत की स्वतंत्रता को देखा। इसके बदले में, उन्होंने अपने लिए कुछ भी देश से नहीं मांगा, सिर्फ और सिर्फ देश को दिया। त्याग की ऐसी मिसाल किस देश में मिलती है। इसी त्याग के कारण तो गांधी अपनी मृत्यु के साठ साल बीत जाने के बाद भी, जीवित है। यहीं नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने इनके जन्म दिन को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी को लीजिए, इन्होंने इंदिरा गांधी के गर्व को चूर चूर कर दिया। संपूर्ण क्रांति की बात की। 1974 के छात्र आंदोलन और उसके बाद उपजे जनता के क्रोधाग्नि का सही नेतृत्व कर, उन्होंने 1977 में जनता पार्टी की सरकार बना दी, चाहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे, पर उन्होंने सत्ता से दूरी बनाये रखी, और कभी सत्ता की कामना ही नहीं की। मर गये, पर सामान्य जन की तरह जीवन जिया, और इसी जीवन के द्वारा, उन्होंने भारत की अमूल्य संस्कृति को बता दिया की, जीना इसी का नाम है।
भारतीय उपनिषद् तो स्पष्ट कहता है कि
नत्वामहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुर्नभवं।
कामये दुखतप्तानां, प्राणिणां आर्तनाशनम्।।

गर कोई सच्चा भारतीय है, तो वो न तो राज्य की कामना करेगा, न स्वर्ग की कामना करेगा, वो तो बस यहीं चाहेगा की सारे सुखों का त्याग कर, दुखियों और पीड़ितों के शोक को शमन करने के लिए, इस धरा पर बार बार आता रहे।
कौन सच्चा भारतीय अथवा पुरुषार्थ से भरा प्राणी रहा है, उसकी परीक्षा उसके पूरे जीवनकाल खंड के मूल्याकंण से हो जाती हैं कि उस व्यक्ति में कितना पुरुषार्थ रहा, जैसे चाणक्य ने कहा.
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते।
निर्घषणतापछेदनेताडनैः।।
तथा चतुर्भिः पुरुषं परीक्ष्यते।
त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।

जैसे सोने को चार प्रकार से परखा जाता है, घिसकर, तापकर, छेदकर और पीटकर। ठीक उसी प्रकार किसी पुरुष की पुरुषार्थ की परीक्षा, उसके अंदर त्याग, मर्यादा, गुण और कर्म की परीक्षा लेकर की जाती हैं। जो इसमें खड़ा उतरा वो सच्चा भारतीय और भारत माता का लाल, नहीं तो बस उसी प्रकार आये गये, जैसे इस श्लोक का भावार्थ...............................................
येषां न विद्या, न तपो, न दानं, न ज्ञान शीलं, न गुणो न धर्मः
ते मृत्युलोके भूविभारभूता, मनुष्यरुपेणमृगाश्चरन्ति।।

जो आज विज्ञान पर्यावरण की संकट के बारे में आगाह कर रहा है, उस संकट को लाया किसने खुद विज्ञान ने, और ऐसा होगा, इसके बारे में आगाह तो हमारे मणीषियों ने आज से हजारों वर्ष पहले कह दिया था कि एक दिन ऐसा आयेगा कि विज्ञान के नाम पर ही लोग, अपने जीवन के कालखंड को सदा के लिए बुझा देंगे। कमाल है, आज के जैसी टेक्नॉलॉजी तो, उनके पास थी ही नहीं, फिर भी वे कैसे जान गये। वो इसलिए जान गये, क्योंकि उन्होंने परमज्ञान की प्राप्ति के पीछे ही समय गवायां, व्यर्थ के पचड़े में नहीं पड़े, प्रकृति ने जैसा संदेश दिया, उस अनुरुप आचरण करते गये, खुद को बनाया, भारत को बनाया, भारत की संस्कृति को अनुप्राणित किया, अपने इस आचरण को और बेहतर और आनेवाले पीढ़ियों को संदेश देने के लिए उपनिषद और अनेक ग्रंथ उपलब्ध करा दिये, और इसे धर्म का स्वरुप दिया, कि शायद लोग समझेंगे और गर आप आज नहीं समझ रहे, तो उनमें उनका क्या दोष। फिर भी मैं मानता हूं कि आनेवाला समय भारत का हैं, निराशावादी होना, अज्ञानता का परिचायक होता है, जो ज्ञानवान हैं वे आशावादी होते हैं, परिवर्तन चक्र चलता रहता है। भारत का ध्येय वाक्य है – सत्यमेव जयते। एक दिन सत्य की जीत होगी, धर्म का वर्चस्व बढ़ेगा, प्रकृति सभी को आगोश में लेगी, भारत फिर खिल उठेगा, त्याग की भूमि फिर इठलायेगी, चिंता की कोई आवश्यकता नहीं।
अंत में, कबीर की पंक्ति मुझे याद आ रही है, जो उन्होंने बहुत पहले कहा था.......
मन लागा, मेरा यार फकीरी में,
जो सुख पाउं, राम भजन में
वो सुख नाही, अमीरी में,
भला – बुरा, सब का सुन लीजै,
कर गुजरान, गरीबी में,
मन लागा मेरा यार फकीरी में,
आखिर ये तन, खाक मिलेगा,
कहां फिरत मगरुरी में,
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
साहिब मिले, सबूरी में,
मन लागा मेरा यार, फकीरी में....................................................

Monday, February 28, 2011

राष्ट्रीय खेल के शानदार आयोजन पर झारखंड को बधाई..............

झारखंड की आज सभी मुक्तकंठ से प्रशंसा कर रहे हैं, प्रशंसा हो भी क्यूं नहीं। झारखंड ने वो कर दिखाया है, जिसकी आशा किसी को न थी। जब तक राष्ट्रीय खेल शुरु नहीं हो पाया था, राज्य व देश के कई समाचार पत्रों में झारखंड की तीखी आलोचना हो रही थी, कि झारखंड ऐसा प्रांत है, जहां राष्ट्रीय खेल भी यहां की सरकार आयोजन नहीं करा पाती, जो शर्मनाक है, पर आज जब राष्ट्रीय खेल संपन्न हो चुका है, सभी की बोलती बंद है। कमाल की बात ये है कि राष्ट्रीय खेल प्रारंभ से लेकर संपन्न होने तक झारखंड सुर्खियों में रहा है, जिस कारण हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। इस राष्ट्रीय खेल के दौरान जो कौतूक हमने देखे, उसका जिक्र मैं कर देना आवश्यक समझता हूं।
पहली बात कामनवेल्थ गेम्स देश की राजधानी दिल्ली में जब चल रहे थे, तो वहां दर्शकों और खेलप्रेमियों को टोटा नजर आता था। वहीं रांची के खेलगांव में, वलर्ड कप अंतराष्ट्रीय क्रिकेट के समय पर भी, यहां के झारखंडियों ने राष्ट्रीय खेल में दिलचस्पी ली, स्थिति तो ऐसी हो गयी कि एक दिन इतने खेलप्रेमी आ गये कि खेलगांव ही छोटा पड़ गया। खेलप्रेमियों ने खेलगांव में प्रदर्शन किया, हद हो गयी, खेलप्रेमियों के विशाल समूह ने, खेल न देख पाने से आक्रोशित होकर हंगामा तक खड़ा कर दी, पुलिस को लाठी चार्ज तक करनी पड़ गयी। यहीं नहीं इसी राष्ट्रीय खेल के दौरान जब महाराष्ट्र और झारखंड के बीच खेल में दर्शकों ने बेईमानी होती देखी तो उसके भी खिलाफ, यहां के दर्शकों ने अपना गुस्सा उतारा। इससे स्पष्ट है अथवा हम कह सकते हैं कि ऐसा दृश्य भारत के किसी भी प्रांत में अथवा नगर में राष्ट्रीय खेलों के दौरान आज तक देखने को नहीं मिला है। ये घटना इस बात की संकेत है कि यहां के लोग खेल को किस प्रकार से लेते है।
दूसरी बात, इसमें कोई दो मत नहीं कि यहां के अधिकारियों ने दिल से काम किया और अंतर्राष्ट्रीय तरह का स्टेडियम, खड़ा कर दिया। पर ये अंतर्राष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम कितने दिनों तक टिके रहेंगे, ये तो समय बतायेगा। पर जनता जानना चाहती हैं कि इसके अंदर की बात। पूरे राष्ट्रीय खेल पर शुरुआत से लेकर संपन्नता तक, क्या खर्च हुए, कैसे खर्च हुए, इस पूरे प्रकरण पर श्वेत पत्र तो अवश्य जारी होना चाहिए। यहां के नेताओं ने करीब करीब सत्तापक्ष या विपक्ष सभी ने यहां के अधिकारियों को बधाई दी है, पर सच्चाई ये भी हैं कि इन अधिकारियों और सत्तापक्ष व विपक्ष के नेताओं ने जिस प्रकार से उद्घाटन समारोह और समापन समारोह में अपने अपने चहेतो को दिल खोलकर पास दिये, मुफ्तखोरी का मजा लिया तथा जिस प्रकार पुलिसकर्मियों को राष्ट्रीय खेलों के दौरान अपने परिवारों की सेवा में लगा दी। वो दृश्य जनता भूली नहीं है।
राष्ट्रीय खेल को देखते हुए, हमें लगा था कि यहां झारखंड में परिवर्तन दिखेगा, पर हमें परिवर्तन नहीं दिखा। कुड़ें कर्कट आम दिनों की तरह सड़कों पर दीखे, रोड जाम आम दिनों की तरह था, सड़कों पर बने गड्ढे सरकार के चरित्र को दर्शा रहे थे, स्ट्रीट लाईट कहीं जल रही थी तो कहीं बूझी थी। ट्रैफिक लाईट तो कभी काम ही नहीं की और जब काम करनी शुरु की, तब तक राष्ट्रीय खेल अवसान की ओर चल पड़ा था। सड़कों पर चलनेवाले टेम्पूचालकों और बसचालकों ने तो कसम खा ली थी कि वे नहीं सुधरेंगे, इसलिए वे सुधरें नहीं, वे हर उस काम को किये, जिससे यातायात के नियमों के उल्लंघन होते थे, पुलिसकर्मी भी सोच लिये थे कि भला कुत्ते के पूछ भी कहीं सीधे होते हैं, इसलिए उन्होंने इन्हें सीधी करने की कोशिश भी नहीं की। एक पुलिसकर्मी ने कहा कि भला राष्ट्रीय खेल आज हो रहा है, कल खत्म हो जायेगा, उन्हें तो नौकरी यहीं बजानी है, गर किसी टेम्पू अथवा बस के मालिक ने, उसी के बॉस से शिकायत कर दी, तो फिर लेने के देने पड़ जायेंगे, कहीं ऐसी जगह बदली हो गयी तो फिर नक्सली के आगे बैंड कौन बजाये। राष्ट्रीय खेल हो जाना, ये तो होना ही था, ये कौन सी बड़ी बात हैं, जिसके लिए लोग एक दूसरे को श्रेय दे रहे हैं तो दूसरा श्रेय लेने के लिए तिकड़मबाजी कर रहा हैं। सच्चाई ये हैं कि जिस प्रकार से राष्ट्रीय खेल का आयोजन होना चाहिए, जैसी व्यवस्था करनी चाहिए, वैसी हुई ही नहीं।
पहली बार हमने देखा कि राष्ट्रीय खेल से दिल्ली की केन्द्र सरकार, यानी भारत सरकार दूरी बनायी रखी, यहां तक केन्द्रीय खेल मंत्री ने भी इस राष्ट्रीय खेल के आयोजन में आना जरुरी नहीं समझा। कहनेवाले कह सकते हैं कि केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रुप में सुबोध कांत सहाय तो मौजूद ही थे, पर क्या यहां की जनता को नहीं मालूम की रांची संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व सुबोधकांत सहाय करते हैं और वे राष्ट्रीय खेल आयोजन समिति से भी जूड़े है, इसलिए उनका केन्द्र सरकार की ओर से प्रतिनिधित्व करने का सवाल ही नहीं उठता। पूर्व में राज्य सरकार ने राज्य की जनता को भरोसा दिलाया था कि भारत की राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री में से कोई न कोई, राष्ट्रीय खेल के उद्घाटन अथवा समापन समारोह में जरुर पहुंचेगा, पर खेल समाप्त हो गया, इन बड़े – बड़े महानुभावों को छोड़ दीजिये, केन्द्रीय खेल मंत्री ने भी, इसमें अपना योगदान देना उचित नहीं समझा, क्यूं नहीं समझा। ये केन्द्रीय खेल मंत्री ही बता सकते है। पर आम जनता इतना जरुर जानती हैं कि इन सब का न आना खेल की राजनीति का एक अंग है। शायद केन्द्र सरकार के नेताओं व मंत्रियों को यहां के कुछ नेताओं ने फीडबैक दिया होगा कि पूरे इस राष्ट्रीय खेल को राज्य सरकार ने हाईजैक कर लिया है, इसलिए उनका यहां आना ठीक नहीं होगा, जिसकी वजह से केन्द्र के नेताओं अथवा मंत्रियों ने झारखंड में आयोजित राष्ट्रीय खेल से ऐसी दूरी बना ली कि जिसकी जितनी आलोचना की जाये, कम है। हालांकि केन्द्र के नेता अपने बचाव के लिए, अनेक डायलॉग संभाल कर रखे हैं, जिसमें एक संवाद तो सुरेश कलमाडी से जूड़ा है।
मैं बता देना चाहता हूं केन्द्र और राज्य सरकारों को। कि वे कृपया खेल में राजनीति न आने दें, नहीं तो उनका सत्यानाश हो या न हो पर खेल का सत्यानाश अवश्य हो जायेगा।
झारखंड में आयोजित राष्ट्रीय खेल ने एक और वाकया आम जनता के समक्ष पेश किया। जो भारत के राज्य सामाजिक और आर्थिक विकास के पायदान पर पहले और दूसरे स्थान पर हैं, यानी गुजरात और बिहार वे खेलों के मामले में फिसड्डी साबित हुए हैं, जबकि खेलों के मामले में मणिपुर जैसा पिछड़ा राज्य अग्रगणी बन गया। ये बता रहा हैं कि आनेवाले समय में, खासकर खेलों में मणिपुर क्या करने जा रहा है। हमें ये समझ में नहीं आता कि जो राज्य, जैसे गुजरात और बिहार सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में प्रगति कर रहे हैं तो उनका ध्यान खेलों की ओर क्यूं नहीं हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन राज्यों ने पूर्व के समय में प्रचलित कविता को कंठस्थ कर लिया हैं कि
पढ़ोगे लिखोगे, होगे नवाब
खेलोगे कूदोगे, होगे खराब
और इसी आधार पर, वे चलते चले जा रहे हैं। इन राज्यों को सोचना चाहिए कि विकास समग्रता में होनी चाहिए। इस राष्ट्रीय खेल में सर्विसेज के बाद पूरे राज्यों में भारत का पूर्व का छोटा राज्य मणिपुर 48 स्वर्ण, 37 रजत, 33 कांस्य यानी कुल 118 पदक जीतकर प्रथम स्थान पर रहा, जबकि गुजरात एक भी स्वर्ण नहीं जीत सका। गुजरात 3 रजत और 4 कांस्य पदक यानी मात्र सात पदक ही जीते, जबकि बिहार एक स्वर्ण, पांच रजत और 6 कांस्य पदक जीतकर मात्र बारह पदक जीतने में ही सफल रहा। बधाई झारखंड को, इस बात के लिए, जहां कल तक खेल का माहौल नहीं था, सरकार ने खिलाड़ियों को, अपनी ओर से कुछ भी नहीं उपलब्ध कराया था। पर झारखंड की जनता की जोश, उमंग और उत्साह ने खिलाड़ियों का ऐसा उत्साहवर्द्धन किया कि पदक तालिका में झारखंड 33 स्वर्ण, 26 रजत, 37 कांस्य यानी कुल 96 पदक जीतकर पांचवा स्थान प्राप्त किया। बिना किसी सरकारी सहायता के पांचवा स्थान प्राप्त कर लेना कोई सामान्य बात नहीं, इसलिए झारखंड के खिलाडी बधाई के पात्र है।
चलिए राष्ट्रीय खेल, झारखंड में संपन्न हो चुका है। सभी खेल से जूड़े अधिकारी, राज्य सरकार, पुलिसकर्मी और इससे जूड़े सभी अन्य लोग, आराम के मूड में होंगे, पर इतना तो तय हैं कि दक्षिण के एक छोटे से राज्य केरल ने रांची में राष्ट्रीय खेल के दौरान आयोजित समापन समारोह में, अपने प्रांत की एक सांस्कृतिक झलक दिखाकर, यहां के नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों को बता ही दिया कि उनका प्रांत आनेवाले राष्ट्रीय खेल को किस प्रकार ले रहा है और उसकी आयोजन किस प्रकार की है। कम से कम यहां की सरकार को तो इससे सबक लेनी ही चाहिए।
अंत में, एक बात और, यहां के नेता व मंत्री, पता नहीं कब भाषणबाजी करना बंद करेंगे। इनकी आदत होती है. चाहे वो जगह भाषणबाजी की हो अथवा न हो। ये भाषणबाजी करेंगे, जरुर। चाहे दर्शकों को, उनकी भाषणबाजी पसंद आये या नहीं, ये अपनी भाषणबाजी की जन्मघूंटी पिलायेंगे, जरुर। आश्चर्य इस बात की हैं कि जब जनता इनके भाषण को पसंद नहीं कर रही होती, और हूड करती हुई ताली बजाती हैं, तो इन नेताओं को लगता हैं कि जनता उनकी भाषण को पसंद कर रही होती है। राष्ट्रीय खेल के समापन समारोह में इसकी झलक भी मिली, जब एक नेता के भाषण के दौरान, आम जनता ने खुब हुल्लडबाजी की, पर यहां के नेता, इससे सबक लेंगे, हमें नहीं लगता।

Wednesday, February 23, 2011

वाह मुलायम...................!


समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेसनीत गठबंधन सरकार को आगाह किया है कि वे अपनी आदत तत्काल सुधारे और देश की जो स्थिति है, उस पर विचार करते हुए तत्काल प्रभाव से कदम उठाये, क्योंकि चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर, भारत पर हमला करने और भारतीय भूभाग को अपने कब्जे में करने के लिए लालायित है। मुलायम सिंह यादव, राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान अपना पक्ष सदन में रख रहे थे, खुशी इस बात की कि उनके भाषण के दौरान किसी भी पार्टी के लोगों ने हो हंगामा खड़ा नहीं किया, जैसा कि आम तौर पर होता हैं, विभिन्न दलों के छुटभैये सांसद, बेवजह हो हंगामा खड़ा कर, संसद का समय नष्ट कर रहे होते हैं।
आश्चर्य इस बात की है कि मुलायम सिंह यादव ने खुद के पहले दिये गये भाजपा नेता राजनाथ सिहं के भाषण का भी समर्थन किया कि चीन ने अपने लोगों से ऑनलाईन वोटिंग कर, चीनवासियों का मत भी मांगा हैं कि भारत पर हमला किया जाये या नहीं। ऐसे भी चीन की नीतियां रही हैं कि जब कमजोर रहो, तो चुपचाप रहो और बलवान हो जाओ तो दूसरे देश पर हमला कर दो, यहीं नहीं चीन की नीतियां ये भी रही हैं कि सीमा अथवा किसी भी विवाद का हल, शांति से नहीं युद्ध से ही किया जा सकता हैं, जब उनकी नीतियां ही ऐसी है तो फिर उन पर विश्वास कैसे किया जा सकता है। ऐसे भी इन पिछले पांच छह वर्षों में चीन ने जो सीमा पार हरकत की है और भारतीय भूभाग पर कब्जा जमाने का जो पैतरेबाजी की हैं, उसका समाचार विभिन्न इलेक्ट्रानिक चैनलों व प्रिंट मीडिया के माध्यम से देशवासियों के बीच आता रहा है, जिससे भारतीय जनता भी सशंकित हैं कि चीन कल क्या कर बैठे, पर हमारे देश की कांग्रेस सरकार इन सभी मामलों में चुप्पी साधी बैठी हैं, और आराम से टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, आदर्श घोटाला, एस बैंड घोटाला, खाद्यान्न घोटाला करते हुए देश का सम्मान प्रभावित कर रही है। यहीं नहीं जहां अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश विदेशों में गये अपने देश के धन को स्वदेश मंगवा रहे हैं, वहीं अपना देश का प्रधानमंत्री इस मामले पर किंकर्तव्यविमूढ़ है। इस पर अभी तक कोई नीति स्पष्ट नहीं कर पाया है। जहां चीन का प्रधानमंत्री अपने देश में आकर, बड़ी सफाई से अपनी बात कह कर चला जाता है, वहीं अपने देश का प्रधानमंत्री अपनी बात, अपने देश में हीं नहीं रख पाता। कमाल हैं, चीन, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को स्टैप्ल वीजा जारी करता है, वहीं हमारे देश का शासक ये भी नहीं कह पाता कि गर उसने ऐसा करना जारी रखा तो भारत भी तिब्बत के लोगों के लिए स्टैपल वीजा जारी करना शुरु करेगा।
यहीं नहीं हमने खुद देखा कि यहां की वामपंथी पार्टियों के शीर्षस्थ नेताओं ने कैसे चीनी शासक से सम्मानित होने के लिए लालायित दीखे, यहीं नहीं सम्मानित होने में गर्व भी महसूस किया, ये जानते हुए कि चीन की नीतियां भारत के प्रति कभी ठीक नहीं रही, यहीं नहीं अभी भी भारतीय भू भाग के कई हिस्सों पर चीन का अवैध कब्जा हैं, और दूसरी ओर एक बार फिर चीन ने भारत के अन्य भू भाग पर कब्जा जमाने की अनैतिक तैयारी शुरु कर दी है, क्या ऐसे चीनी शासक से सम्मानित होने की लालसा, भारतीय वामपंथी नेताओं के चरित्र पर अंगूली नहीं उठाती।
मुलायम सिंह यादव ने सदन में ठीक ही कहा कि भारत की विदेश नीति तो अमेरिका के हाथों गिरवी रखी है, उन्होंने उदाहरण भी दिये, और वे उदाहरण सत्य भी प्रतीत होते हैं। कहां गयी भारत की विदेश नीति -------------------
जब आस्ट्रेलिया में भारतीय युवकों की पिटाई हो रही थी अथवा भारतीय छात्रों की हत्या की जा रही थी। अमेरिका में जब भारतीय छात्रों के पांवों में रेडियो कॉलर लगाये गये। नेपाल और श्रीलंका जो भारत के साथ कदम से कदम मिला कर चलते थे, वे आज भारत से दूर होते जा रहे हैं। आज कोई भी ऐसा देश नहीं हैं, जो भारत के साथ खड़ा होने की बात करता हो, जबकि पूर्व में भारत के कई पड़ोसी देश ही नहीं बल्कि अन्य दूसरे देश भी भारत के साथ मजबूती से खड़े होते थे।
कमाल हैं, देश का सैन्य प्रमुख खुलकर कह रहा हैं कि चीन के मंसूबे सहीं नहीं हैं पर भारतीय नेता, शांति की बात कहते हुए, आराम फरमा रहे है। गर यहीं हाल रहा, तो देश बचेगा या भी नहीं, ये कांग्रेसी क्यूं नहीं समझते। गर देश रहेगा, तो ये शासन भी कर सकते हैं, गर देश ही नहीं रहेगा, तो फिर शासन कैसे करेंगे, ऐसे में मुलायम का ये कहना कि अभी सरकार नहीं, पहले देश बचाने की बात करें कांग्रेसी, हमें सटीक लगती है। उन्होंने सुप्रसिद्ध समाजवादी नेता व चिंतक राम मनोहर लोहिया का हवाला देते हुए ठीक ही कहा कि इस देश को खतरा पाकिस्तान से उतना नहीं, जितना चीन से हैं, पर हमे लगता हैं कि राम मनोहर लोहिया की बातों को आज तक कांग्रेसियों ने स्वीकार ही नहीं किया।
सदन में कांग्रेसियों का ज्यादातर समय आरएसएस और भाजपाईयों पर हमला बोलने और उन्हें नीचा दिखाने में ही जाता हैं, ऐसा लगता हैं जैसे की देश की जनता, इन कांग्रेसी सांसदों को भाजपाईयों और आरएसएस के लोगों को गाली देने के लिए ही सदन में भेजती हैं। हमें लगता हैं कि गर वे चीन मामले पर इतना सजग होते, तो देश आश्वस्त भी होता कि इन कांग्रेसियों के हाथों देश सुरक्षित हैं, पर हमें नहीं लगता, कि देश इनके हाथों सुरक्षित है, ये तो चीन के हमले होने पर भी ये बयान दे देंगे कि भाजपाईयों और संघ के लोगों ने देश पर हमला बोलवा दिया हैं, जैसा कि इनके नेता दिग्विजय सिंह 26/11 मामले में बोलकर, पाकिस्तान की मदद करने में प्रमुख भूमिका निभायी और देश को ही कटघरे में रख दिया। कमाल हैं – कांग्रेसियों का चरित्र।
यहीं नहीं देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और देश की दुर्दशा पर, टीवी चैनलों के संपादक से बातचीत में हमारे प्रधानमंत्री का ये कहना कि विभिन्न मामलों में, जितना उन्हे दोषी बताया जाता हैं, उतना वे दोषी हैं नहीं, उन्होंने गठबंधन सरकार की मजबूरियां भी बतायी, इसी से साफ पता लगता हैं कि हमारे देश में कैसी मजबूर और कमजोर सरकार चल रही है, और इसे कौन चला रहा है। फिर भी। इस देश में पंचवर्षीय सरकार चलती हैं, आशा तो इन्हीं से हैं। गर देश पर बाहरी व आंतरिक खतरा आया तो इससे निजात दिलाना तो इन्हीं को हैं, आशा रखना होगा कि ये कुछ करेंगे और देश को बाहरी खतरों से बचाने में सक्षम होंगे, पर ये तो वक्त बतायेगा। कि इन्होंने क्या किया। पर मुलायम सिंह यादव जी, आपका जवाब नहीं, खूब बोले, देशहित में बोले। सरकार को जगाने की कोशिश की, गर सरकार जग गयी तो देश का बल्ले बल्ले होना तय है। कोशिश करते रहिये, इन्हें जगाते रहिये। अपना काम जगाते रहने का है, आपने देशहित में जो सदन में बाते रखी, आपको बहुत बहुत बधाई..............

Sunday, February 13, 2011

मौसम झारखंड का...!

झारखंड यानी वनों से आच्छादित प्रदेश...

इन दिनों इस प्रदेश में गजब का दृश्य दिखाई दे रहा हैं, गर आप प्रकृतिप्रेमी हैं तो देर मत करिये और आज ही घने जंगलों की ओर प्रस्थान करें, क्योंकि फिर ये दृश्य आपको देखने के लिए, पूरे एक वर्ष इंतजार करने पड़ेंगे, जब से सभी ऋतुओं ने रितुराज वसंत का पिछले 08 फरवरी को शानदार स्वागत किया, तभी से चुपके से पतझड़ ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। जंगलों से आच्छादित इस प्रदेश में वनों के पुराने और सूखे पत्तों ने चुपके से, डालियों से अलग हो जाना उचित समझा और पेंड़ों से अलग होने लगे, ऐसे में कौन पेड़ पूरी तरह से पत्तियों से विहीन हो गये और किसमें नये नये पत्ते कब आकर लग गये, पता ही नहीं चला, हालांकि किसी किसी वृक्षों में पुराने और सूखे पत्तों का गिरना अथवा अलग होना जारी है, साथ ही उसमें नये पत्तों का विकसित होने का क्रम जारी हैं, इसी क्रम ने पूरे झारखंड की आबोहवा और उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा दिये हैं, गर हमसे कोई पूछे कि रांची अथवा झारखंड घूमने का सबसे सुंदर, समय कौन सा है, तो लगता हैं कि प्रकृति भी ये कह देगी कि बस अभी और अभी, क्योंकि अब वक्त भी नहीं है। इन पत्ती विहीन वृक्षों और नये नये पत्तियों से युक्त हो रहे वृक्षों से सूर्य की किरणों की अठखेलियां करना देखते ही बन रहा हैं, यहीं नहीं इन डालियों से होकर चलनेवाली हवाएं भी बहुत कुछ कह दे रही हैं ----------------- कि क्या तुमने झारखंड में ही रहकर, इस अलौकिक दृश्य को देखा हैं अथवा इस समय को भी आम दिनों की तरह बीता देना है ------------------------------------------
कवियों की कल्पना भी, इस समय अपना मुंह खोल रही हैं, कुछ बोल रही हैं -----
आया मौसम पतझड़ का,
आओ मुझमे खो जाओ,
जीवन के सार तत्व को,
प्रकृति संग तुम पा जाओ,
आना जाना लगा रहता हैं,
ये सूखी पत्तियां कहती हैं,
नव पल्लव को शुभाशीष दें,
खुद आगे बढ़ जाती हैं,
तुम भी नये लोगों को,
ऐसे स्थान देते जाओ,
और, उन्हें आशीष दे,
खुद भी आगे बढ़ते जाओ।



Monday, January 31, 2011

मैला से मैला साफ करने की कोशिश...!


30 जनवरी को महात्मा गांधी के शहादत दिवस पर पूरे देश में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आह्वान पर हजारों लोग, सड़कों पर उतरे। सभाएं की, भ्रष्टाचार से अंत अंत तक लड़ने का संकल्प लिया, भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की बात कहीं। भारत के कई राज्यों की राजधानियों और अन्य महानगरों से निकलनेवाले समाचार पत्रों ने भी, इस कार्यक्रम का भरपूर कवरेज किया और दिया। हालांकि प्रथम दृष्ट्या, इसमें वामपंथ की भी थोड़ी बू आयी, पर जिससे देश बनता हैं, वह कोई भी पंथ हो, हमें ग्राह्य हैं। पर क्या, सचमुच, देश में क्रांति हो गयी, लोग जग गये, अब कभी भ्रष्टाचार यहां देखने को नहीं मिलेगा, सरकार इस आंदोलन से घबरा गयी, सरकार में शामिल लोगों ने भी इस आंदोलन के बयार को भांप कर, अब भ्रष्ट न होने की कमर कस ली। कम से कम हमें तो नहीं लगता और साथ ही देश के करोड़ों लोगों को भी नहीं लगता, क्योंकि अपने देश में इस प्रकार के आंदोलन व प्रदर्शन होते रहते हैं, कैसे होते है, और क्यूं होते हैं, ये भी सबको मालूम हैं।
कमाल हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन हुआ, उसमें वे लोग नेतृत्व कर रहे थे, जो आउट ऑफ डेटेड हैं, जिन्होंने जिंदगी का आधा से ज्यादा मजा ले लिया हैं, और अब उनके पास, आज के डेट में सिवाय उनके अपने नाम चमकाने और अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में आने के सिवा कुछ भी नहीं। क्योंकि भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा हैं, जो कभी खत्म नहीं होगा, और इसमें न तो हड़े लगती हैं और न फिटकिरी, रंग भी चोखा हो जाता हैं, सामान्य जनता की नजरों में ये नायक और नायिका के रुप में आ चुके होते हैं और फिर क्या. फिर चुनाव, चुनाव में पार्टी बनाकर लडेंगे, टिकट देंगे और टिकट लेंगे, और फिर अपनी सल्तनत, यानी भ्रष्टाचार खत्म करने के बजाय, खुद भ्रष्टाचार का हिमायती बन जाना। अब तक हुआ क्या हैं, यहीं तो हुआ हैं। आज जो सत्ता में हैं, या जो सत्ता में नहीं हैं, उन्होंने किसके खिलाफ मोर्चा खोलकर सत्ता हासिल की हैं। वो तो भ्रष्टाचार ही तो हैं।
अब जरा देखिये कौन – कौन लोग, कल के कार्यक्रम में शामिल थे।
स्वामी अग्निवेश, योग गुरु रामदेव, श्रीश्री रविशंकर की संस्था। जरा इन महानुभावों से पूछिये कि आपकी संस्था को पैसे कहां से मिलते हैं, और पैसे देनेवाले कौन हैं। क्या सभी ईमानदार हैं, और ईमानदारी से पैसे कमाकर, उनकी संस्था को पैसे पहुंचाये हैं क्या। क्या इनलोगों ने ईमानदारी से देश की जनता को बताया हैं कि उनके पास कितने पैसे हैं और कहां से आये, किसने दिये हैं। हैं इनमें हिम्मत कि वे देश की जनता के सामने अपनी आय को सार्वजनिक कर सकें। यानी दूसरों से पूछेंगे कि उनके पास पैसे कहां से आये पर अपनी आमदनी और उसके स्रोत नहीं बतायेंगे। यानी खुद मैले और मैला पोछने, उसे साफ करने की बात कहेंगे।
सबसे पहले इन महानुभावों से पूछिये कि भ्रष्टाचार का मतलब भी जानते हैं क्या।
भ्रष्टाचार का अर्थ हैं – आचरण से भ्रष्ट हो जाना। जब आचरण ही भ्रष्ट होगा, तो फिर बचा क्या रह जायेगा।
जरा अग्निवेश को देखिये, ये खुद को स्वामी अग्निवेश कहते हैं, पर माओवादियों के घोर हिमायती हैं, ये उनके लिए और उनकी ओर से सरकार से बात करने की भी इच्छा रखते हैं, जब माओवादियों की हत्या होती हैं तो इनका हृदय व्यथित हो जाता हैं, बयान भी दे देते हैं, पर इन्हीं माओवादियों की गोली से आम जनता की मौत होती हैं, सरकारी सेवा में कार्यरत किसी पुलिसकर्मी की मौत हो जाती हैं तो इनके होंठ सील जाते हैं, और ये अपने को संत कहते हैं। यहीं नहीं जो अरुंधती राय कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानती, उसके संग कार्यक्रम करने में इन्हें बड़ा ही आनन्द आता हैं, और ये महात्मा गांधी की शहादत दिवस के दिन नई दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देते हैं, जिस गांधी ने अंग्रेजों के बंदूक से निकली गोली और भारतीयों के बंदूक से निकली गोली से मरनेवाले लोगों, दोनों को समान बताते हुए अहिंसा को अपनाया। उस गांधी के शहादत दिवस पर दोहरा मापदंड अपनाते हुए भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करना, क्या इन दोहरे चरित्रवालों से देश का भला होगा।
जरा योग गुरु राम देव को देखिये, ये खुद को संत कहते हैं, आज तक देश में ऐसा संत हुआ ही नहीं, जो अपनी सुरक्षा के लिए गुहार लगायी हो, पर ये संत ऐसे हैं, जिन्हें अपनी जान संकट में आने लगी, और लगे बयान देने की, उनकी जान को खतरा हैं, लगे हाथों सरकार ने इनकी जान बचाने के लिए जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करा दी। क्या इस रामदेव को गौतम बुद्घ और अंगूलिमाल की कहानी याद नहीं, जरुर याद होगा, पर इसे गौतम बुद्ध थोड़ी ही बनना हैं, ये तो अंबानी और टाटा को टक्कर देने के लिए पैदा हुए हैं। टक्कर दे रहे हैं और अब तो सत्ता की कुर्सी उन्हें दिखाई देने लगी हैं, जो संत सत्ता की राजनीति करे, भ्रष्ट तरीके से प्राप्त धन को, धर्म के नाम पर प्राप्त कर, अपना आश्रम बनाये, उसे भी अधर्म ही कहा जायेगा और इस प्रकार से प्राप्त धन को भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में रखा जायेगा, इन संतों को मान लेना चाहिए। क्योंकि इस देश में रामदेव से बढ़कर, अनेक संत हुए, जिनके पांव के धूल भी रामदेव नहीं बन पायेंगे, रामदेव को जो बनना था, बन गये, पर याद रखे, वे देश की गरीब और ईमानदार, मेहनतकश किसानों और मजदूरों को धोखा नहीं दे सकते, ये धोखा दे सकते हैं – गलत तरीकों से धन प्राप्त किये, धंधेबाजों, करचोरी करनेवाले पूंजीपतियों को। सामान्य जनता को बाबा रामदेव, श्रीश्रीरविशंकर, और स्वामी अग्निवेश के आंदोलन से क्या मतलब, या रिटायर्ड नौकरशाहों से क्या मतलब। ये रिटायर्ड नौकरशाहों से ही पूछिये कि जब ये नौकरी में थे, तब क्या, इन्होंने ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहण किया, गर नहीं तो आज भ्रष्टाचार के नाम पर घड़ियाली आंसू क्यों.
गर सचमुच में देश में भ्रष्टाचार, से लड़ने के लिए इन्में जज्बा उत्पन्न हो गया हैं। तो कहा जाता हैं कि जब जगे तभी सबेरा। इन सबकों चाहिए कि अपनी पूर्व जिंदगी के किये गये अनैतिक और भ्रष्ट तरीकों को भी सार्वजनिक करें, कि उन्होंने पूर्व में ये ये गलत तरीके अपनाये, भ्रष्टाचार किया, भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहे, अब संकल्प लेता हूं कि आगे ऐसा नहीं करुंगा, ये देश की जनता को वचन देता हूं। तब जाकर विश्वास किया जा सकता हैं, पर अचानक ये देशभक्ति का छलावा, से आम जनता को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता और न ही भ्रष्टाचार पर रोक ही लग सकता हैं, क्योंकि मैले से मैला साफ नहीं होता, बल्कि गंदगी और फैलती हैं।