Friday, August 19, 2016

हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं..................

पटना से प्रकाशित भटियारे अखबारों ने आज भी अपना भटियारापन जारी रखा...
जी हां, पटना से प्रकाशित कुछ भटियारे अखबारों ने आज भी अपना भटियारापन जारी रखा। भटियारेपन का खिताब जीत चुका पटना से प्रकाशित अखबार “हिन्दुस्तान” ने आज मुख पृष्ठ पर हेडिंग दिया...
“प्रशासन ने माना, शराब से ही हुई 17 लोगों की मौत” – यानी “हिन्दुस्तान” अखबार मानता है कि जिन लोगों की मौत हुई वह शराब से नहीं बल्कि उसके कल के कथनानुसार कै-दस्त से ही हुई।
नीतीश को समर्पित परमभक्त अखबार “प्रभात खबर” ने जो कल यह हेडिंग दिया था कि “गोपालगंज में मरनेवालों की संख्या 14 पहुंची, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नहीं मिला अल्कोहल का अंश”। आज हेडिंग दिया है – “गोपालगंज नगर थाने की सभी 15 पुलिसकर्मी निलंबित” और लगे हाथों जमकर नीतीशायन गाया है।
कल तक जो “दैनिक जागरण” अपने हेडिंग के माध्यम से सही समाचार लिखने का प्रयास करते हुए अपनी गरिमा बचाने का प्रयास किया था, आज उसकी हेडिंग देखिये तो पता चलेगा कि उसने आज नीतीशायन की ओर कदम बढ़ाया है।
दैनिक जागरण का आज का हेडिंग है...
“बख्शे नहीं जायेंगे शराब के धंधेबाज
इस्पेक्टर सहित 25 पुलिसकर्मी निलंबित”
दूसरी ओर “दैनिक भास्कर” ने आज एक बार फिर नीतीश की बैंड बजा दी है। हेडिंग दिया है – “तीन और की मौत, इसंपेक्टर समेत 25 पुलिसकर्मी सस्पेंड”
अब अपनी बात...
क्या पत्रकारिता सत्ता में बैठे मठाधीशों की सुरक्षा और उनकी आरती गाने के लिए होती है या जनता की आवाज बनने के लिए?
जनता इन अखबारों के संपादकों-मालिकों से पूछे कि वे अखबार खोलकर सत्ता में बैठे लोगों के तलवे क्यूं चाटते है?, इससे अच्छा है कि वे कोठा खोल लें...
फिलहाल गोपालगंज शराबकांड में जिस प्रकार से पटना से प्रकाशित अखबारों ने पत्रकारिता धर्म का पालन न कर, सत्ता में बैठे लोगों का महिमामंडन करने का कार्य किया है, हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं...

Thursday, August 18, 2016

अखबारों का भटियारापन...............

मौत गरीबों का और पटना से प्रकाशित एक-दो अखबारों को छोड़कर सभी अखबारों ने आज गरीबों के मौत का मजाक उड़ाया हैं और नीतीश भक्ति से स्वयं को अलंकृत कर लिया है। भटियारापन दिखाने में इस बार पटना से प्रकाशित हिन्दुस्तान अखबार ने बाजी मार ली है, इस बार हिन्दुस्तान प्रथम स्थान पर और प्रभात खबर दूसरे स्थान पर है, जबकि दैनिक जागरण ने अपनी गरिमा बचाने में कुछ हद तक सफलता पायी, वहीं दैनिक भास्कर ने सही खबरें प्रकाशित कर गरीबों के मौत पर मरहम और नीतीश को डायरेक्ट चुनौती दे दी है।
जरा खबर क्या है, उसे जानिये – खबर यह है कि जहरीली शराब पीने से गोपालगंज में 15 लोगों की मौत हो गयी, प्रशासन मानने को तैयार ही नहीं कि यह मौत जहरीली शराब पीने से हुई है, जबकि जिनके घर में ये घटना घटी, वे चीख-चीखकर कह रहे हैं कि यह मौत जहरीली शराब के कारण हुई, पर बेशर्म अखबारों को देखिये, क्या हेडिंग बनायी है...
सबसे पहले पटना से प्रकाशित हिन्दुस्तान को देखिये...
हेंडिग बनाई है...
“गोपालगंज में कै दस्त से 14 मरे”
प्रभात खबर को देखिये, ये हेंडिग बनाया है
“गोपालगंज में मरनेवालों की संख्या 14 तक पहुंची”
दैनिक जागरण ने हेडिंग दिया
“जहरीली शराब से 14 मरे”
दैनिक भास्कर ने हेडिंग दिया
“पहले आंखों की रोशनी गई, फिर जान, जहरीली शराब से 15 लोगों की मौत”
ये हैं कुछ अखबारों का दोगला चरित्र और नीतीशायण गाने की प्रतियोगिता...
और अब अपनी बात...
जो लोग हमारे फेसबुक से जुड़े है, और हमारा फेसबुक पढ़ते है। वे जानते होंगे कि मैंने 4 अगस्त 2016 को क्या लिखा था, पर जो नहीं पढ़े है, उनके लिए मैं पुनः उद्धृत कर रहा हूं, वो यह हैं...
“बिहार के बबुआ नीतीश को समर्पित...
ए भाई इ देश में दहेज के खिलाफ कानून बना है...भ्रष्टाचार रोकने के खिलाफ भी कानून बना है...कम उम्र में शादी रोकने का भी कानून बना है...चोरी, बलात्कार, गुंडागर्दी रोकने के लिए भी कानून बना है...लगे हाथों एक और भी कानून बन गया, क्या कहते है दारु पीने से रोकने का कानून...हम सभी का स्वागत करते है...जैसे पहले के कानून का किया...जैसे आज भी दहेज लेते है, भ्रष्टाचार का सारा रिकार्ड अपने नेता जी अपने पास रखते है, कम उम्र में शादी भी करते और करा देते है, चोरी, बलात्कार और गुंडागर्दी तो नेताओं के आभूषण ही है...इसलिए दारु के बारे में क्या कहना हैं, नई - नई दुल्हन बनी है, देखते है आगे कितने लोग इसका घूंघट उठाते है...”
ये लिखने का अभिप्राय यहीं था कि आप कुछ भी कर लो, जो गलत लोग है, जो चरित्रहीन लोग है, वे अपनी कलाबाजी दिखायेंगे ही, उन्होंने अपनी कलाबाजी आज दिखा दी...
पर इससे हुआ क्या?
मरा कौन गरीब, मरा कौन था गरीब और मरेगा कौन गरीब
और इस पर मजा लूटेगा कौन, वहीं हिन्दुस्तान, वहीं प्रभात खबर जो दांत निपोड़ कर फिलहाल नीतीशभक्ति में सर से पांव तक डूबा है...
बेशर्म है ये लोग, पत्रकारिता क्या करेंगे...
ये तो नीतीशायन गायेंगे और गरीबों के शव पर ठुमके लगायेंगे...
हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं...

Thursday, August 11, 2016

संभ्रांत पत्रकार बनकर झारखण्ड को लूटने का सुनहला अवसर हाथ से जाने न दें..........

संभ्रांत पत्रकार बनकर झारखण्ड को लूटने का सुनहला अवसर हाथ से जाने न दें...
कंबल ओढ़कर, घी पीने का सुनहला अवसर झारखण्ड में...
अगर आप किसी न्यूज एजेंसी से जुड़े है, या अन्य मीडिया हाउस से, तो फिर आपकी बल्ले-बल्ले है, यानी दोनों हाथों में लड्डू...
ये आपके हाथों में है...
बस आपको इतना ही करना है...
एक संस्थान खोलिए, या कोई न्यूज पोर्टल खोल लीजिये...
और उसमें अपने पिता को चेयरमेन बना दीजिये...
अपनी पत्नी को संपादक बना दीजिये...
अगर आपका बेटा है तो उससे आप अपने ही पोर्टल पर बेमतलब का कमेंट्स डलवाया कीजिये या कभी – कभी उससे रिपोर्टर्स का काम ले लीजिये ताकि जब बड़ा हो तो उसे आराम से संवाददाता या पत्रकार बनाया जा सके...
कमेंटस दिलवाने में आप अपने मित्रों और परिवारों की भी मदद ले सकते हैं...
और खुद मुख्य संपादक बन जाइये और विज्ञापन प्रबंधक का काम शुरू कर दीजिये...
जैसे ही आप ऐसा करेंगे, विभिन्न दलों के नेता, मंत्री और अधिकारी से आप मुंहमांगी राशि विज्ञापन के रूप में वसूलना शुरू कर देंगे...
यहीं नहीं, अनैतिक कार्यों और इन हरकतों को अपनाते ही आप जल्दी धन-कूबेर बन जायेंगे, वह भी प्रतिष्ठा के साथ...
आपको सहयोग करने के लिए झारखण्ड के श्रम विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, उद्योग विभाग के लोग सदैव आपके साथ है, यहीं नहीं स्वास्थ्य, खेल, पर्यटन आदि विभाग भी आपको इस अनैतिक कार्य में सहयोग देने के लिए तैयार है...
यहीं नहीं झारखण्ड में स्थित सीएमपीडीआई, सीसीएल या प्रमुख भारतीय कंपनियां जैसे- सेल, गेल या कई सासंद मौजूद है ही...
हां एक बात और...
अपने संस्थान या न्यूज पोर्टल के नाम पर समय – समय पर एक स्मारिका निकलवाइये और पूरे स्मारिका में अपने बेटे, अपनी पत्नी और अपने पिता का फोटो भर दीजिये और नैतिकता पर भाषण देने के लिए आजकल गर्दिश में चल रहे किसी भी नेता को बुला लीजिये...फिर क्या सम्मान और पैसे दोनों एक साथ...
यहीं सत्य है,
अगर किसी कारण से ईमानदारी का कीड़ा, आपको काटे हुए है, तो समझ लीजिए, कहीं के न रहियेगा आप, यहां तक कि आप ही से लोग इस बात का प्रमाण मागेंगे कि आप पत्रकार है, इसके क्या प्रमाण है...तो फिर देर किस बात की...
बेशर्मी जिन्दाबाद, लंठई जिन्दाबाद...
नैतिकता का लबादा ओढ़िये और सारे अनैतिक हरकतें अपनाइये...
अनैतिकता के रास्ते, पत्रकारिता के वास्ते...

Friday, August 5, 2016

ले लोट्टा...................

ले लोट्टा, इ त नीतीशवा के दारू कानून के हव्वे निकल गइल भइया...
अरे जादा दिन के बात नइखे, बिहार विधानमंडल में हमार बबुआ नीतीश दारू कानून पेश कइले...
उनकर बुतरूवन बिधयकवन सब खूब दांत निपोरत रहे...
उनकर लटकन पत्तरकार लोग तो झूम झूम के नीतीशायन गावत रहे...
ताड़ी पिये के रिकार्ड तोड़ले लालू भगवान तो नीतीशवा के अपन भक्त बना दिहले,
और कहिले कि कोई यादव और कुरमी भाई अब दारू ना पीहे...
और जो दारू पीहे, तो जइहे काम से...
लेकिन इ का होयल भइया
न दारू कानून पास होते देरी
आउर न उ कानून में छेद होते देरी...
आजे एगो अखबार पटना डेडलाइन से समाचार छपले बा...
समाचार के शीर्षक बा...
पकड़े गये व्यापारियों के ब्लड सैंपल में अल्कोहल नहीं मिला...
इ समाचार में लिखल बा कि
बिहार में शराबबंदी के बाद पटना पुलिस ने होटल पनास से सात व्यापारियों को शराब पीने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा था। फांरेसिक साइंस लेबोरेट्री ने सभी व्यापारियों को क्लीन चीट दे दी।
वाह रे भाई, वाह...
एकरा कहल जाला, कानून तू केतनो बना ल, चलइहे धरती लोक के प्राणिये न...

आउर इ धरतीलोक के प्राणी केतना महान, केतना चरित्रवान होखेला
उ तो लालू भगवान और उनकर बड़ भगत बबुआ नीतीश से ज्यादा कौन जनिहे...
अरे जो दल बदल में माहिर ह,
अरे जो पशु चारा खाए में माहिर ह
और जो काल्हे पशु चारा खाएवाला घोटालेबाज कह कह के, अपना चेहरा चमकवले
और फिर जाके बाद में, ओकरे गोदी में बैठके
आपन दाढ़ी टोवे लगले
उ केतनो कानून बना दी
ओकरा से का होई
हाल ही में एगो केजरिया, खूब ईमानदारी के ढोल पीटले
और आज ओकर सारा ईमानदारी, एक-एक कर काठ के कड़ाही जइसन भो - काटा हो जाता
तो समझ जाइ, कि नीतीशवा के इ दारू कानून के का होई
आज ओकर पहला अध्याय, सामने दिखाई पड़ गइल...
मजा ली बबुआ नीतीश के दारू कानून के...
बबुआ नीतीश के कोई नजर ना लगावे भाई
बड़ काम के हमर बबुआ नीतीश बाड़े...

Monday, August 1, 2016

प्रतिभा सम्मान की आड़ में अखबारों का चलता व्यवसाय...

क. जब ढोंगी बाबाओं के विज्ञापनों को अपने अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित करनेवाला...
ख. जब ढोंगी बाबाओं को अपने यहां बुलाकर उसे महिमामंडित करनेवाला...
ग. जब सेक्स से संबंधी उलुलजुलूल विज्ञापन प्रकाशित करनेवाला...
घ. जब वशीकरण के नाम पर तमाम तरह के अंधविश्वास को आगे बढ़ाने से संबंधित विज्ञापन प्रकाशित करनेवाला...
ङ. जब नेताओं के चरणवंदना कर स्वयं को उपकृत करनेवाला...
च. जब बिल्डरों से आर्थिक मदद लेकर नाना प्रकार के कुकृत्यों को जन्मदेनेवाला...
प्रतिभा सम्मान का आयोजन करने लगे तो समझो दाल में काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। इन दिनों जिसे देखों, प्रतिभा सम्मान आयोजित कर रहा है, और आश्चर्य इस बात की है कि ऐसे आयोजनों में लोग अपने पूरे परिवार के साथ इस प्रकार भाग ले रहे है, जैसे लग रहा हो कि उनके बच्चों को भारत रत्न की उपाधि मिल रही हो। सच्चाई यह है कि इन अखबारों के द्वारा इस प्रकार का आयोजन इसलिए किया जाता है ताकि इसकी आड़ में अखबारों का आर्थिक सुदृढ़ीकरण हो सकें। आप देखेंगे कि इस प्रकार के आयोजन में बड़ी संख्या में प्रायोजक भाग लेते हैं। उसका मूल कारण, बड़े-बड़े अखबारों को अपनी ओर आकर्षित करना है, ताकि उनके द्वारा भविष्य में जब उनकी गलतियां उजागर हो, तो ये अखबार अपनी ओर से मुंह बंद रखे, और ये होता भी है।
प्रतिभा सम्मान समारोह में सहजीविता के आधार पर प्रायोजक, आयोजक और सम्मानप्राप्तकर्ता सभी आनन्दित रहते है, और नुकसान उठाना पड़ता है, समाज को, राज्य को और देश को। नुकसान इसलिए कि, इस प्रकार के आयोजन से न तो बच्चों को लाभ होता है और न उन परिवारों को, जो इसका लाभ उठा रहे होते हैं। अरे इन बच्चों की प्रतिभा का सम्मान उसी दिन हो गया, जब बच्चे मैट्रिक अथवा इंटर की परीक्षा में प्रथम, द्वितीय या तृतीय आ गये।
प्रतिभा का सम्मान, अगर अखबार करने लगे तो फिर वे बच्चे जो इन अखबारों से कभी उपकृत ही नहीं हुए, वे बैठकर आलू छीलेंगे क्या?
अखबार का काम – सिर्फ नैतिकता के आधार पर समाचारों को प्रकाशित करना है, अगर अखबार यहीं काम ईमानदारी से करने लगे तो फिर प्रतिभा सम्मान समारोह की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, पर यहां हो क्या रहा है, जिन्हें जो काम करना है, वे उस काम को छोड़कर, वो सारी काम कर रहे है, जो उन्हें नहीं करना है।
एक महत्वपूर्ण बात, सम्मान को लेकर ही...
आइये महात्मा गांधी से जुड़ी एक कहानी सुनाता हूं। महात्मा गांधी का मूल नाम मोहनदास था, पर मोहनदास कौन है, आज किसी से पूछे, तो कोई नहीं बतायेगा, पर महात्मा गांधी बोले तो सभी बता देंगे कि महात्मा गांधी कौन है या महात्मा गांधी कौन थे...
क्या आप जानते है कि महात्मा गांधी को महात्मा की उपाधि किसने दी थी...
इसका सही उत्तर है – रवीन्द्र नाथ ठाकुर।
क्या आप जानते है कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि किसने दी थी...
इसका सही उत्तर है – सुभाष चंद्र बोस।
यानी सम्मान देनेवाला कौन है, उसकी नीयत क्या है, उसका समाज में क्या भूमिका है, यह भी देखी जाती है, ये नहीं कि किसी ने दे दिया और हमने ले लिया। जहां इस प्रकार की हरकतें चलती हो, उसे पूर्णतः व्यवसाय कहते है, न कि प्रतिभा सम्मान...
जरा कोई बता सकता है क्या कि रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने जब गांधी को महात्मा से नवाजा था या जब सुभाष चंद्र बोस ने गांधी को राष्ट्रपिता कहा था तब इस सम्मान समारोह के प्रायोजक कौन-कौन थे... और इस सम्मान समारोह में ताली पीटने के लिए गांधी के परिवार से कौन – कौन लोग मौजूद थे...
मेरे भाइयों,
अपने बच्चों को इस प्रकार के प्रतिभा सम्मान समारोह से दूर रखो...
उनमें सही मायनों में गांधी, रवीन्द्र और सुभाष जैसा चरित्र डालों...
पढ़ने का मतलब क्या होता है...
पढ़ने का मतलब प्रतिभा सम्मान समारोह में जाकर पीतल के टूकड़ें बंटोरना नहीं होता...
पढ़ने का मतलब, सिर्फ और सिर्फ चरित्र और संस्कार को अपनाना होता है...
झूठी सम्मान के पीछे या उसे प्राप्त करने के लिए बौराना नहीं होता...
अरे सम्मान तो मिलेगा ही, वो तो आपको दौड़कर, आपका हक दिलाकर रहेगा...
पर पहले कुछ करके तो दिखाओ...
अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है, सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दो, और कुछ नहीं...
वह भी कैसे...
केवल प्रबल प्रयास और अथक प्रयास से ज्ञान अर्जित नहीं किया जा सकता...
जरा अपने पूर्वजों की बताई मार्ग का अनुसरण करो...
जानो, ईश्वर किसकी मदद करता है...
उद्यमं, साहसं, धैर्यं, बुद्धि, शक्तिं, पराक्रमं।
षडते यत्र वर्तन्ते, तत्र देव सहाय्यं कृतः।।
जानो,
अभिवादनशीलस्य नित्यंवृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्यवर्दधन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।।
मेरे कहने का मतलब क्या...
एक दृष्टांत तुम्हारे सामने है...
बहुत लोग इंजीनियरिंग और डाक्टरी की पढाई कर रहे है, कुछ लोग कामयाब हो जाते है और कुछ कामयाब नहीं होते, जो कामयाब हो गये उसकी भी क्या गारंटी की वे इंसान ही होंगे और जो कामयाब नहीं हुए, उसकी भी क्या गारंटी की वे इंसान ही होंगे...
अगर तुमने शुरूआत ही गलत कर दी, तो मानकर चलो की अंत भी गलत ही होगा...
क्योंकि जिस घर की नींव ही गलत है, उस गलत नींव पर अच्छे मकान नहीं तैयार होते...
ठीक उसी प्रकार प्रतिभा सम्मान में उपकृत होनेवाले बंधु या परिवार इस प्रकार के सम्मान प्राप्त कर, सोचते है कि वे आगे निकल जायेंगे, तो हमें नहीं लगता कि वे आगे निकल पायेंगे, क्योंकि जो प्रतिभा सम्मान दे रहे है, उनका तो स्वयं ही आधार नहीं है, वे तो इस आड़ में स्वयं को आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा रहे है, वो आपको समृद्धि या सम्मान क्या दिला पायेंगे...
ऐसे आप स्वयं समझदार है, समझते रहिये...

Saturday, June 25, 2016

ये है हमारे नेता, हमारे उद्धारकर्ता, आधुनिक जयचंद.........

ये आधुनिक जयचंद है, जो भारत की इस असफलता पर अट्टहास कर रहे है...
आइये हम आपको एक कहानी सुनाते है। ये कहानी भारत की ही है। जब पृथ्वी राज चौहान ने संयोगिता के साथ विवाह रचाया तो जयचंद ने इसे अपना अपमान समझा। इस अपमान के बदले में उनसे मुहम्मद गोरी का साथ देने का निश्चय किया। पृथ्वी राज चौहान की हार हुई, मुहम्मद गोरी जीत गया, पर ऐसा नहीं कि जयचंद को उससे फायदा हुआ, हुआ यह कि भारत एक बार फिर विदेशियों के हाथों पराजित हुआ, मानमर्दित हुआ।
दूसरी कहानी सुनिये...
महारानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों को धूल चटा रही थी और ग्वालियर नरेश अंग्रेजों के तलवे चाट रहे थे। ज्यादा जानकारी के लिए भारत की ही सुप्रसिद्ध कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ लीजिये –
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी
खुब लड़ी मर्दानी वो तो झांसीवाली रानी थी
जब भगत सिंह भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, सोते हुए भारतीयों को जगाने का काम कर रहे थे तो उस वक्त सुप्रसिद्ध दिवगंत पत्रकार खुशवंत सिंह का पिता शोभा सिंह भगत सिंह को फांसी के तख्ते पर पहुंचाने में मुख्य भूमिका निभा रहा था।
ऐसी एक नहीं, अनेक सच्ची कहानियां है, जो बताती है कि हम भारतीय चाहे शांत हो या गुस्से में हो, वहीं काम करते है, जिससे भारत का नुकसान हो जाय, भारत बर्बाद हो जाये...
ये हमारी फितरत है, हम सुधर नहीं सकते। हम सच्चे देशभक्त नहीं, क्योंकि पूरे विश्व में हम एकलौते देश है, जो आजादी की लड़ाई का भी कीमत वसूलते है, स्वतंत्रता सेनानी का वेतन लेकर, अब तो 1974 के जेपी आंदोलन का भी पैसा वसूल रहे है, जैसे लगता है कि आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे...
मैंने कहा न, ये हमारी फितरत है, हम सुधरेंगे ही नहीं...
हम जानते है कि 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया...हमारे हजारों रणबाकुड़ें मार डाले...हजारों वर्ग किलोमीटर भू-भाग को कब्जा कर लिया...पर आज भी हम उसकी आर्थिक समृद्धि के लिए वे सभी सामान खरीदते है, जो हमारे लिए जरूरी है, और वह चीन, हरदम हमारे सीने पर, तो कभी पीठ पर खंजर भोकता है...
हम हैं भारतीय, जो कभी नहीं सुधरेंगे...
आज ही देखिये,
अखबारों में पढ़ा कि भारत एनएसजी का सदस्य नहीं बना, क्यों नहीं बना तो चीन ने उस पर अड़ंगा लगा दिया...क्या भारत को एनएसजी का सदस्य नहीं बनना चाहिए।
हमारा उत्तर होगा – बनना चाहिए,
क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एनएसजी की सदस्यता के लिए जो प्रयास किये, वो गलत था...
एक दूसरे देश का सामान्य नागरिक भी होगा तो वह यहीं कहेगा कि मोदी का यह प्रयास सही था, पर जरा भारत के विभिन्न दलों में रह रहे जयचंदों को देखिए, बहुत खुश है। अनाप-शनाप बयान दिये जा रहे है। मोदी को कोस रहे है।
जरा केजरीवाल के स्टेटमेंट को देखिये – यह मूर्ख क्या कह रहा है – कह रहा है कि पीएम मोदी विदेश नीति के मोर्चे पर फेल रहे है, उन्हें यह बताना होगा कि वे विदेश यात्राओं में क्या करते रहे।
जरा कांग्रेस को देखिये वो कह रही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को और भारत को तमाशा बना दिया। लालू और नीतीश की तो बात ही छोड़ दीजिये, ये तो नमूने है। इनसे देशप्रेम की आशा करना तो अव्वल दर्जे के मूर्ख होने का प्रमाण पत्र स्वीकार करना है।
ये है हमारे नेता, हमारे उद्धारकर्ता, आधुनिक जयचंद।
अब कांग्रेसियों से कुछ सवाल...
कांग्रेसियों तुम्हे पता है कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्वकाल में कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ में उस वक्त के विपक्ष में रह रहे, जो विपक्ष के नेता भी नहीं थे, अटल बिहारी वाजपेयी ने क्या भूमिका निभाई थी, अगर नहीं पता तो मूर्खों ज्यादा दिन नहीं हुआ, इतिहास पढ़ो...
अरे कमबख्तों, कम से कम देश के मुद्दे पर तो एक हो जाओ...
क्या जयचंद बनने में, ज्यादा जोर लगा रहे हो...
अरे भारतीयों, अब भी चेतो...
अरे सरकार मजबूर है, विपक्ष घटियास्तर का है, पर तुम तो देशभक्त हो...
बहिष्कार करो, चीनी सामानों का...
बहिष्कार करो, चीनी नेताओं का...
बहिष्कार करो, चीनी सोच का, जो वामपंथियों ने भारत में फैला रखा है...
बहिष्कार करो, उन हर नेताओं को जो देश में रहकर विदेशी ताकतों को मजबूत कर रहे है...
उन वीर भारतीयों का हौसला बुलंद करों,
जो विपरीत परिस्थितियों में चीन को नाक में दम कर रखे है...
उन वीर वैज्ञानिकों का हौसला आफजाई करों, जो भारत को शक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे रहे है...
आखिर कब चेतोगे...
तुम्हारे देश के ज्यादातर नेता गद्दार है, ये याद रखो...
ये तुम्हारे बीच, जातिवाद फैलाते है, और इस जातिवाद की आड़ में अपने जोरु, अपने बेटी-बेटे, दामाद-बहु का आंगन क्लियर करते है...
जागो भारतीय जागो, पर तुम जागोगे, इसकी संभावनाएं हमें कम है...
क्योंकि विश्व में एकमात्र भारत ही ऐसा देश है, जो सर्वाधिक गुलामी का दंश झेलने का रिकार्ड अपने पास सुरक्षित रखा है...

Friday, June 17, 2016

जैसा नजरिया, वैसा विकास...

मैं यादव हूं...मुझे लालू-मुलायम में विकास दीखता है...
मैं कुर्मी हूं, मुझे नीतीश में विकास दीखता हैं...
मैं वामपंथी हूं हरदम सीमा पर चीन लतियाता हैं मुझे, फिर भी चीन की स्तुति करने और उसके यहां की बनी सामान खरीदने में मुझे विकास दीखता है...
मैं वामपंथी हूं सिंगूर और नंदीग्राम और फिलहाल कन्नूर में दर्जनों निहत्थे को मौत के घाट उतार देता हूं, उसमें विकास दीखता हैं...
पर और कहीं भी विकास नहीं दीखता...
क्या करुं आदत से लाचार हूं...
हमारे पूर्वज अंग्रेजों के जूते और मुगलों के जूते खाते रहे हैं, इसलिए हमें भी आजकल उनके जूते खाने के लिए बदन कुलकुलाता है इसलिए विकास दीखेगा कैसे...
मैं आज भी जहां हूं चूहों की तरह भारत को कुतर रहा हूं...
विकास दीखेगा कैसे...
विकास तो लालू जी ने दिया कभी अपने जोरु को सीएम बनाकर तो कभी अपने बेटे को डिप्टी सीएम बनाकर, कभी अपनी बेटी को राज्यसभा में पहुंचाकर...
विकास तो हमारे झामुमो नेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने किया,अपनी आदत के अनुसार सबसे छोटे बेटे को भी नेतागिरी की जन्मघूंटी पिलाकर राज्यसभा बेचने की युगत लगा दी...
विकास तो सोनिया ने किया है, जो अपने बेटे राहुल, दामाद राबर्ट और बेटी प्रियंका से आगे सोच ही नहीं रही...
विकास तो मुलायम ने किया, जिसने अपने पूरे खानदान को लोकसभा, राज्यसभा विधानसभा और पूरे यूपी में अपनी जाति के लोगों को हर जगह भर कर रख दिया...
विकास तो नीतीश ने किया, नीतीशभक्ति में लीन एक पत्रकार को राज्यसभा में पहुंचाकर...
विकास तो वृंदा और प्रकाश करायेंगे जिन्होंने कई वर्षों तक बंगाल को ऐसा रौंदा कि पिछले पांच वर्षों से बंगाल की जनता इनकी पार्टी को लतिया रही है, पर शर्म नहीं आ रहा...
विकास तो अरविन्द केजरीवाल करायेंगे, जो हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ ही बोला करते थे और आज जिनके 21 विधायक भ्रष्टाचार का रिकार्ड तोड़ते हुए हुतूतू कर रहे है,
भाई बुरा मत मानियेगा हम भी आपके साथ हैं, जब हल्ला करियेगा कि विकास नहीं हो रहा तो हम भी आपके साथ सुर में सुर मिलायेंगे, और जैसा आपका झंडा होगा, थाम लेंगे, फिलहाल अभी आप हमारा लाल, पीला, हरा और भैस के रंगवाला काला सलाम भी स्वीकार करिये...

Monday, June 6, 2016

भला अनैतिक रूप से अर्जित धन से पोषित बच्चे देश भक्त कैसे होंगे...

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में अधिकांश माता –पिता अनैतिक रूप से धन कमाकर, अपने बच्चों का भरण-पोषण करते है, साथ ही ये आशा भी रखते है कि ये बच्चे बड़े होकर, उनकी सेवा करें और देशभक्त हो। भला अनैतिक रूप से धन कमाकर, उस धन से बच्चों का भरण-पोषण होने से बच्चे नैतिकरुप से कैसे मजबूत होंगे, ये मुझे समझ में नहीं आता। ये तो वहीं बात हुई कि पेड़ बो रहे है बबूल के और आशा रख रहे है कि इस बबूल से आम निकलेंगे।
ऐसे भी हमारा देश काफी प्रगति किया है...
जैसे जिन्हें चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करना है, तो वे धन-पशु बनने में सर्वाधिक समय व्यतीत कर रहे हैं, धन-पशु बनने के लिए जितनी भी कलाएं होनी चाहिए, उन सारे कलाओं में पारंगत हो गये, नतीजा स्वयं देखिये कल तक योगगुरु थे, आज व्यवसायी गुरु हो गये। कल तक उनकी एक झलक पाने के लिए लोग लालायित रहते थे, आज वे स्वयं को मॉडल के रूप में स्थापित कर रहे है, फिर भी उन्हें वो सम्मान नहीं मिल रहा, जिनकी उन्होंने कभी लालसा रखी थी, वे तो इतने गिर गये है कि उन्हें अब राम और रावण में भी फर्क करना नहीं आ रहा...
इसी प्रकार, मैं देखता हूं कि कई ऐसे मंदिर देश में बने है, जो उद्योगपतियों के नाम पर है...कई ऐसे राजनीतिज्ञों को देखता हूं कि अनैतिक रूप से धन कमाकर, अपनी हैसियत दिन दुनी रात चौगुनी करते जा रहे है, और जब रमजान का महीना आयेगा तो ये अपने घरों में सफेद टोपी पहनकर इफ्तार का ऐसा आयोजन करते है, जैसे लगता है कि इन्होंने जिंदगी में कोई दंगा-फसाद या घृणित कार्य ही न किया हो और उससे भी बड़ा आश्चर्य कि ऐसे घटियास्तर के राजनीतिबाजों के इफ्तार में शामिल होने के लिए तथाकथित बड़े-बड़े मौलानाओं की झूंड भी आ खड़ी होती है।
रांची में एक सज्जन है, बहुत बड़े व्यापारी, मीडिया हाउस चलाते है, धन इतना कमाया है कि पूछिये मत, पर पर्यावरण की धज्जियां उड़ाने में, खनिज संपदा को लूटने में, अपने यहां कार्यरत कर्मचारियों का शोषण करने में, सरकार की कर प्रणालियों को चूना लगाने में, सबसे आगे है।
रांची में एक और सज्जन को मैंने देखा है कि वे बराबर नैतिकता की दूहाई देते थे, कोई ऐसा महीना नहीं होगा, जिस महीने में वे छद्म नाम से नैतिकता संबंधी या स्वयं के नाम पर नैतिकता संबंधी आलेख न छापे हो, उनके इस आलेख से कई लोग भ्रमित होकर, उन्हें महान इंसान समझ रखे थे, पर जैसे ही बिहार के एक राजनीतिज्ञ ने उन्हें राज्यसभा का टिकट देने का ऐलान किया, उनकी सारी पत्रकारिता की नैतिकता की गंगोत्री उस बिहार के राजनीतिज्ञ के चरणों में जाकर लोटने लगी।
मैंने कई आइएएस और आइपीएस अधिकारियों को देखा है, जिन्हें देखकर या उनकी स्क्रिप्ट पढ़कर मैं हैरान हो जाता हूं कि ये आदमी आइएएस या आइपीएस कैसे बन गया, तभी मेरे दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि बेटे ये भारत देश है , यहां भाग्य का भी विधान है, ये भाग्य का बहुत ही मजबूत है, पूर्व जन्म में कुछ बेहतर किया है, इसलिए इस जन्म में आइएएस या आइपीएस बन गया है, इसका राजयोग है, जब तक जिंदा रहेगा, लूटेगा, खायेगा, मर जायेगा, इससे देश-सेवा या समाज-सेवा की परिकल्पना भी करना बेमानी है...
ये कुछ दृष्टांत है...
और अब सवाल कि आखिर ये सब लिखने की आवश्यकता क्यों है...
मैंने इसमें राजनीतिज्ञों, पत्रकारों, उद्योगपतियों, अधिकारियों और संतो के कुछ दृष्टांत दिये है, जो बताने के लिए काफी है कि हमारा समाज कितना गिर रहा है, यह भी बताने के लिए काफी है, कि जिनके उपर दारोमदार है, देश को आगे बढ़ाने का, वे कितने गिरे हुए है और जब जिनके कंधों पर जिम्मेदारी है, देश को आगे बढ़ाने का और वे अपने बेटे-बेटियों और अपनी पत्नियों के आगे कुछ सोचे ही नहीं तो समझ लो, देश बदल रहा है, और ये आगे नहीं, पीछे जा रहा है। देश या समाज, वहां रह रहे व्यक्तियों के चरित्र व व्यक्तित्व से जाना जाता है, और ये चरित्र या व्यक्तित्व का झलक मिलता है, वहां कार्य कर रहे अधिकारियों, संतों, पत्रकारों, उदयोगपतियों, राजनीतिज्ञों और वहां रह रही आम जनता से, पर यहां सभी ने सारी मर्यादाएं तोड़कर धन-पशु बनने में ही समय ज्यादा लगा दिया है, ऐसे में इन धन-पशुओं से भारत के निर्माण की बात करना मूर्खता है...
एक बात और जान लीजिये...
भारत बहुमंजिलों इमारतवाली भवनों वाली स्थानों का नाम नहीं...
भारत कल-कारखानोंवाली औद्योगिक स्थलियों का नाम नहीं...
भारत महानगरों में डांसबार या बीयरबार वाली सांस्कृतिक केन्द्रों का नाम नहीं...
भारत महानगरों में अधकचरा ज्ञान बिखरनेवाले पत्रकारों की अशिष्ट मंडलियों का नाम नहीं...
भारत घटियास्तर के राजनीतिज्ञों जो अपनी पत्नी, बेटे और बेटियों में अपना सुख-चैन देखते हैं, उसका नाम नहीं...
भारत उन अधिकारियों वाले देश का नाम नहीं, जो जिंदगी भर जोंक की तरह भारत की जनता का खून चूसकर धन इकट्ठा करते हैं...
भारत उन उदयोगपतियों का नाम नहीं, जो अनैतिक रुप से धन कमाते हैं...
भारत तो त्याग का दूसरा नाम है...
भारत तो मर्यादा का दूसरा नाम है...
भारत तो गुणता का दूसरा नाम है...
भारत तो कर्मयोग को ग्रहण करने का दूसरा नाम है...
पर फिलहाल, भारत में अधिकांश लोग, धन-पशु बनने की कला में माहिर होकर, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ धन-पशु बनने के लिए एक – दूसरे को पछाड़ने में लगे हैं...
जिसमें राजनीतिज्ञों-पत्रकारों-अधिकारियों और सामान्य जन के लोग भी दिल से लगे हुए हैं, यानी कल तक जो भारत जिस चीज के लिए जाना जाता था, आज वहीं चीज यहां ढूंढने को नहीं मिल रही, ये हैं 1947 के बाद हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धि...

Tuesday, May 31, 2016

अर्जुन मुंडा ने शुरू की झारखण्ड में लालू स्टाइल में राजनीति...

झारखण्ड का अर्जुन लालू बनेगा, लालू स्टाइल में राजनीति करेगा और भाजपा को डूबो कर अपने अपमान का बदला लेगा। 29 मई 2016, झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा धनबाद के ब्राह्मण बरारी बस्ती में बांगला व खोरठा भाषा में लालू स्टाइल में भाषण दे रहे थे। जैसे लालू यादव का भाषण ब्राह्मण विरोध पर शुरु होता है और ब्राह्मण विरोध पर ही खत्म होता है, ठीक उसी स्टाइल में वे भाषण दे रहे थे। वे उपस्थित जनता को आह्वान कर रहे थे कि जनता भ्रष्ट अधिकारियों को ओखली में कूटे। वे धनबाद के डीसी कृपानन्द झा और एसएसपी सुरेन्द्र कुमार झा पर खूब बरसे। और तल्ख टिप्पणी करते हुए, सीधे कहा कि ये अधिकारी धनबाद को बिहार का झाझा शहर न बनायें। वे सतीश महतो के निमंत्रण पर जो इस कोयलानगरी में नया – नया आउटसोर्सिग में हाथ आजमा कर बहती गंगा में हाथ धोना चाहता है, उसका राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए यहां पहुंचे थे। अर्जुन मुंडा सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन को इशारों ही इशारों में ये कहना चाहते थे कि यहां के अधिकारी सतीश महतो को हर प्रकार की सहूलियत प्रदान करें, ताकि सतीश अपना दबदबा कायम कर, इस कोयला नगरी में एक आतंक के रूप में उभर सकें, जिसका आर्थिक फायदा अर्जुन मुंडा जैसे नेताओं को भी मिल सकें।
और अब सवाल भाजपा के दिग्गज नेताओं से...
1. अगर अर्जुन मुंडा जैसा व्यक्ति जो राज्य का पूर्व मुख्यमंत्री रह चुका है, वो सार्वजनिक सभा में यह कहता है कि जनता भ्रष्ट अधिकारियों को ओखली में कूटे तो क्या जनता को यह अधिकार नहीं कि वह भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को भी ओखली में कूट दें, जिसके कारण झारखण्ड तबाह और बर्बाद हो गया, या हो रहा है।
2. धनबाद के डीसी कृपानन्द झा और एसएसपी सुरेन्द्र कुमार झा अगर ब्राह्मण समुदाय से है तो उन पर जातिगत टिप्पणी करना कहा तक जायज है, और उन्हें भ्रष्ट बताना कहां से जायज है, क्या अर्जुन मुंडा के पास एक विशेष प्रकार का चश्मा है, जिससे उन्होंने पता लगा लिया कि वे दोनों भ्रष्ट है, और अगर ये दोनों भ्रष्ट है तो उन्हें सजा देने-दिलाने का काम अर्जुन मुंडा का है क्या?
3. कल जब अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री थे, तो यही अधिकारियों का दल इनकी आरती उतारता था तो बहुत अच्छा था और आज जब ये अपना काम करने में लगा हैं और इनकी नहीं सुन रहा तो भ्रष्ट हो गया। ये तो वहीं बात हो गयी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में – कड़वा-कड़वा थू-थू और मीठा-मीठा चप-चप।
4. अपना राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए एक नया भस्मासुर पैदा करने से क्या धनबाद की स्थिति सुधर जायेगी? क्या धनबाद के लोग नहीं जानते है कि ये सतीश महतो कौन है और इसका मकसद क्या है?
और अब अपनी बात...
झारखण्ड की जनता को यह जान लेना चाहिए कि...
झारखण्ड में चाहे बाबू लाल मरांडी हो, या अर्जुन मुंडा या शिबू सोरेन या हेमंत सोरेन या कोई भी नेता – सच्चाई यहीं है कि ये सभी अपना पीए या सलाहकार ब्राह्मण जाति के समुदाय के लोगों को ही रखते है, या रखे हुए है। किसी कारण से अगर वे सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन से नीचे आते है तो वे इनका संरक्षण करने के लिए, हद से गुजर जाते है। ...पर जरा देखिये, सार्वजनिक सभाओं में इनका चरित्र कैसे उजागर होता है? बस मौका मिलना चाहिए, इन्हें ब्राह्मणों को गाली देने का, ये दे चलते है, क्योंकि ये राजनीतिबाज जो ठहरे, राजनीतिबाजी से कैसे स्वयं को अलग कर सकते है? देश – समाज भाड़ में जाये, इससे उन्हें क्या मतलब। उन्हें तो मतलब है किसी ऐसे समुदाय को गाली देने से, जिससे आज की जनता बहुत ही प्रसन्न होती है और वह जाति है –ब्राह्मण, क्यों अर्जुन मुंडा जी।

Saturday, May 28, 2016

2 साल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल के...

अगर एक शब्द में कोई पूछे इस सवाल के जवाब तो मैं यहीं कहूंगा – प्रशंसनीय।
याद करिये, जब नरेन्द्र मोदी ने शासन का बागडोर संभाला था तो देश की क्या स्थिति थी? सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार और पूरे विश्व में भारत की गिरती साख का था और इन दोनों मुद्दों पर नरेन्द्र मोदी ने शानदार तरीके से अपने कर्तव्यों का निर्वहण किया। दो साल हो गये पर विपक्षी दल के किसी भी नेता में ये हिम्मत नहीं कि नरेन्द्र मोदी ही नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किसी भी मंत्री पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा दें, जब इन विपक्षियों को कुछ भी नहीं मिल रहा तो वे ऐसे-ऐसे आरोप लगा रहे है, जिसे देख और पढ़कर सामान्य जनता अपनी हंसी को नहीं रोक पा रही, उन्हीं आरोपों में से एक आरोप है केजरीवाल की पार्टी द्वारा लगाया गया प्रधानमंत्री पर डिग्री संबंधी आरोप है, जिसका कोई भ्रष्टाचार से लेना-देना नहीं, सिवाय रायता फैलाने के। भ्रष्टाचार पर विराम लगाकर और दूसरी ओर संपूर्ण विश्व में भारत की साख को स्थापित कर नरेन्द्र मोदी ने सिद्ध कर दिया कि भारत में फिलहाल उनका कोई विकल्प नहीं। अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात साथ ही पड़ोसी भूटान, नेपाल, चीन, पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका, बांगलादेश जैसे देशों के साथ मधुर संबंध स्थापित कर भारत की शान बढ़ा दी। भारत और बांगलादेश सीमा विवाद का 40 साल पुराना विवाद सदा के लिए समाप्त कराया। जब नेपाल में भूकम्प के रूप में त्रासदी आयी, सबसे पहले भारत नेपाल के साथ खड़ा हुआ, जिसका संपूर्ण विश्व ने तहेदिल से समर्थन और प्रशंसा किया, यहीं नहीं यमन में जब भारतीयों के उपर संकट गहराया, तब भारत का उस वक्त कौन ऐसा देश था, जिसने प्रशंसा नहीं किया, यहां पर तो भारत ने विदेशियों को भी बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कल तक नरेन्द्र मोदी को वीसा नहीं देने की बात करनेवाला अमरीका आज उनके कशीदे पढ़ रहा है, आखिर क्या खास है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में...
नरेन्द्र मोदी की खासियत पर ध्यान दीजिये...
देश में तीन ही शानदार प्रधानमंत्री हुए, जिन पर किसी भी किस्म का दाग नहीं, जो अपनी काबिलियत के आधार पर प्रधानमंत्री बने, न कि किसी की कृपा या कहने पर...
वे पहले प्रधानमंत्री थे – लाल बहादुर शास्त्री, दूसरे अटल बिहारी वाजपेयी और तीसरे नरेन्द्र मोदी।
बाकी जितने लोग हुए, उन्होंने किसी न किसी की कृपा या जोड़-तोड़ का सहारा अवश्य लिया। आज नरेन्द्र मोदी को ही लीजिये, उन्होंने परिवारवाद पर चोट करते हुए, दिखाया कि उनके लिए देश ही सर्वोपरि है, जब से वे सत्ता में आये है, तब से लेकर आज तक उन्होंने कभी भी छुट्टी ही नहीं ली, बहुत ही कम खर्च में वे कई देशों की यात्रा की, साथ ही भारत के संदेश को वहां के जन-जन तक पहुंचाया, ये पहला मौका था कि जब भारत का प्रधानमंत्री, दूसरे देशों में बैठे अपने नागरिकों और वहां की जनता के साथ, उसी धरती पर इस प्रकार संवाद स्थापित कर रहा था, जैसे लगता हो कि वह कोई वहां चुनावी सभा को संबोधित कर रहा हो।
पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ को योग पर झकझोरा और पूरे विश्व ने भारत की देन योग को स्वीकारा, देखते ही देखते संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत के योग को स्वीकृत करते हुए 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रुप में मनाने की घोषणा की। यहीं नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता को जनांदोलन बना दिया, आज पूरा देश स्वच्छता अभियान से जुड़ गया है, कई निजी स्वैच्छिक संस्थाएं और बड़े-बड़े नेता-अभिनेता इस अभियान से जुड़कर देश की दशा – दिशा बदलने के लिए निकल पड़े। देश की बेटियों को मान बढ़ाया, बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ अभियान चलाया, सुकन्या समृद्धि योजना से बालिकाओं के बेहतर भविष्य के लिए कार्यक्रम चलाये। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना चलाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए विशेष योजना चलायी। जन-धन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना चलाकर देश की गरीब जनता को एक नई आर्थिक ताकत दी, वहीं स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, डिजिटल इंडिया आदि चलाकर देश को हर स्तर पर संबल प्रदान करने की सफल कोशिश की। पहली बार बिना किसी भेदभाव के सबको एक साथ ले चलने की बात कही गयी, ये नहीं कि अल्पसंख्यक कहकर उन्हें बहुसंख्यक से अलग करने और दलित-पिछड़े कहकर उन्हें अन्य से भेदभाव करने का बीज रोपा गया। सबका साथ- सबका विकास के नारे के साथ सभी को बराबर का मौका देते हुए, सभी को देश बनाने के लिए उनके मनोबल को बढ़ाया गया, जिससे देश काफी आगे निकलने की कोशिश में है। जरा देखिये जहां पूरा विश्व आर्थिक मंदी का शिकार है, वहीं भारत की आर्थिक विकास दर आज भी 7.57 प्रतिशत है, जो पूरे विश्व को आश्चर्यचकित कर रहा है, ये सब नरेन्द्र मोदी की दूरदर्शिता का कमाल है, ये कमाल है, उस व्यक्ति का जिसकी सोच पूर्णतः देश को समर्पित है, यहीं कारण है कि वर्तमान अमरीकन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इसी सोच पर टिप्पणी की थी कि यह व्यक्ति की पहली और अंतिम सोच भारत की प्रगति है। पर्यटन को उद्योग का दर्जा देना हो, लोगों की क्रय शक्ति बढ़ानी हो, देश की अर्थव्यवस्था को एक मुकाम देना हो, सब में प्रधानमंत्री का विजन क्लियर है। हाल ही में वे 24 अप्रैल को जमशेदपुर आये, मौका था राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के अवसर पर पंचायत प्रतिनिधि सम्मेलन का, उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा था कि वे चाहते है कि गांधी के सपनों का भारत बनाएं, और ये तभी बनेगा जब गांव की पंचायत सशक्त होगी, जब गांव के पंचायत सही निर्णय लेने प्रारंभ करेंगे, वे एक साल में एक योजनाएं बनायेंगे और उसे मूर्तरूप देंगे, इसी से ग्रामोदय होगा और जब ग्रामोदय होगा तो भारत के उदय होने से कोई रोक नहीं सकता। आज का प्रधानमंत्री अपने बेटे या अपनी पत्नी को सुख प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री नहीं बना है, उसकी विजन है, भारत निर्माण की, वह निकल पड़ा है, निर्माण के लिए, भारत बन रहा है, भारत बदल रहा है, आज का युवा भी अपने प्रधानमंत्री के साथ है, तभी तो बेंगलूरु के एक शिक्षण संस्थान में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने वहां उपस्थित युवाओं से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से संबंधित कुछ सवाल पूछे तो उन्हें उनकी आशा के अनुरूप उत्तर नहीं मिले। ये घटना साफ बताती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की युवाओं की सोच बदली है और जब युवा की सोच बदलेगी तो देश का तकदीर जरूर बदलेगा। मेरा भारत बदल रहा है, हमारा भारत बदल रहा है, इसमें कोई मत नहीं कि पहली बार हुआ है कि विश्व में कही भी भारतीय है, आज वह शान से बोल रहा है कि वह भारतीय है, वह जहां भी हैं, उसके दिल में भारत का दिल धड़क रहा है, और ये सब हुआ है मात्र दो वर्षों में, जरा सोचिये दो वर्षों में ये हाल है, तो पांच वर्षों में क्या होगा? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी आप के इस बीते दो साल के लिए आपको दिल से बधाई।

Monday, May 23, 2016

।। अथ चपलकांत कथा ।।

बहुत दिनों की बात है...
जंगलों से आच्छादित एक भूखण्ड प्रदेश था...
जहां चपलकांत नामक एक सियार पत्रकार था...
उसकी धूर्त बातों से अनभिज्ञ जंगलों के अन्य जीव-जंतु उसे महान बुद्धिजीवी समझते और चपलकांत उस भूखण्ड प्रदेश में सारे जीव-जंतुओं को बेवकूफ बनाकर राज किया करता था। उसकी धूर्तता से अनभिज्ञ उसके ज्ञान के कायल सत्तापक्ष और विपक्ष के लोग भी थे। उसकी पत्रकारिता से भय खा कर कई प्रशासनिक अधिकारी उसकी सेवा में लगे रहते, और उसे अपने – अपने विभागों की सुंदर-सुंदर कॉटेजों और अतिथिगृहों में आनन्द की सारी सामग्रियां उपलब्ध किया करते। चपलकांत अपनी प्रिय पत्नी और बच्चों के साथ परम आनन्द की प्राप्ति करता, साथ ही अगर सेवा के दौरान कुछ गड़बड़ियां दीख जाती तो वह पत्रकारिता का धौंस दिखाकर जंगल के छोटे-छोटे कर्मचारियों को अपना भय दिखाना नहीं भूलता...
उसकी इस धौंस और धूर्तता से धीरे-धीरे भूखण्ड प्रदेश के सभी वन्य प्राणी परेशान होने लगे...
पर सत्ता के सर्वोच्च सिंहासनों तक उसकी धौंस और उसकी पत्नी के भी एक न्यूज पोर्टल के संपादक बन जाने से सभी की नींद उड़ गयी थी, कि अब क्या होगा...क्योंकि वह नाना प्रकार के कुटिल हरकतें करता और पुरस्कार के लालचियों और घटियास्तर के भ्रष्ट लोगों को श्रेष्ठनायक का पुरस्कार देकर अपने आपको और मजबूत करता चला जाता...
यहीं नहीं भूखण्ड प्रदेश में कार्यरत सत्तावचन प्रसारित भवन में भी उसकी धमक रहती और वह इसका फायदा उठाने में कोई कोताही नहीं बरतता...
उसकी इस हरकत से धीरे-धीरे उस भूखण्ड प्रदेश की पत्रकारिता की छवि धूमिल होने लगी। भूखण्ड प्रदेश के कई बुद्धिजीवियों ने भूखण्ड प्रदेश में रहनेवाले सभी जीव-जंतुओं को उससे सावधान करने का मन बनाया...
तभी भूखण्ड प्रदेश में चल रहे एक महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान में एक भयंकर ज्ञान-विस्फोट हुआ, जिसमें उसकी हवा निकल गयी, यहीं उसे पहला झटका मिला...फिर भी उसे लगा कि जब वह चपलकांत ही है, तो इस प्रकार की झटकों से उसके सम्मान को कुछ नहीं होता, क्योंकि सारे संसार में उसके जैसे लोग भरे पड़े हैं, ऐसे भी उसका जन्म ही इसी प्रकार की हरकतों को करने के लिए हुआ है...
इसलिए वह हर प्रकार के हथकंडों में निपुण होता जाता...कभी वो गायक बन जाता, तो कभी साहित्यकार, तो कभी प्रोफेसर तो कभी विद्यार्थी, यानी जब जैसा तब तैसा...पत्रकार तो था ही...
इसी चक्कर में उसने सर्वश्रेष्ठ धनपशु बनने का लालसा पा लिया...
इस लालसा को पा लेने के बाद उसे परमज्ञान हुआ कि ये तो भूखण्ड प्रदेश है...
यहां तो सारे के सारे नेता और अधिकारी गधे और मूर्ख है...एक सबसे ज्यादा तेज तो वहीं हैं, जिसकी ज्ञान से भूखण्ड प्रदेश के सारे जीव-जंतु हैरान है...
इसलिए, उसने एक स्वज्ञान आधारित एक स्मारिका निकालने की सोची, जिससे उसे अपार धन हासिल हो...उसने भूखण्ड प्रदेश के सारे नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के आगे नाचना शुरू किया...जिससे उसकी रही-सही इज्जत भी धूल में मिल गयी, साथ ही उसके परम मित्रों में भी जो सम्मान बचा था, वह भी धुल गया...
पर उसकी धन कमाने की लालसा नहीं गयी...
वह धन कमाने के चक्कर में अपने छोटे-छोटे बच्चों को भी तथाकथित धूर्तनिष्ठ पत्रकारिता का चरणामृत चखा दिया...
जिससे बच्चे बड़ी तेजी से उसके कुकृत्यों के शिकार होने लगे...
वो कहावत है न
बाढ़हु पुत पिता के धर्में, खेती उपजे अपना कर्मे
जब पिता के धर्म पर पुत्र आगे बढ़ सकता है, तो पिता के कुकर्म पर बच्चे नीचे जायेंगे ही।
उस चपलकांत सियार के बच्चे सत्यनिष्ठ बनना तो दूर, धूर्तनिष्ठ होने लगे...
पर सर्वश्रेष्ठ धनपशु बनने के चक्कर में चपलकांत सियार नामक पत्रकार इतना खो गया कि उसे पता ही नहीं चला कि उसका सारा तेज धीरे – धीरे कुकर्मों से युक्त होकर धूमिल होता जा रहा है...
एक दिन वह भूखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके मातहत अधिकारियों को अपने ज्ञान का स्वाद चखाने के लिए ताना-बाना बुना, पर उसकी चालाकी को जान लेने के बाद भूखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके मातहत काम करनेवाले अधिकारियों ने उसकी एक न सुनी और उस धनपशु चपलकांत को औकात बता दी और कहा कि वह ज्यादा काबिल न बने, नहीं तो उसे लेने के देने पड़ जायेंगे...
बेचारा चपलकांत, उसकी रही-सही बुद्धि भी खत्म हो गयी...
और शीर्ष पर रहनेवाला चपलकांत धड़ाम से जमीन पर आकर गिर पड़ा...
शिक्षा – क. पत्रकारिता में ईमानदारी अवश्य बरतनी चाहिये...
ख. आपके किये कुकर्म आपको उपर नहीं, बल्कि नीचे ले जाते हैं...
ग. चरित्रवान होना, सारी सफलता की कुंजी है, इससे ईश्वर प्रसन्न होते हैं...

Wednesday, May 18, 2016

हम ऐसी पत्रकारिता की कड़ी भर्त्सना करते हैं.......

30 दिसम्बर 2015
स्थान – सूचना भवन, रांची।
कार्यक्रम – मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’।
एक शिकायत है - लातेहार के बालूमाथ में उत्क्रमित मध्य विद्यालय बरहनियां खांड़ में कार्यरत पारा शिक्षक रमेश पांडेय हमेशा अनुपस्थित रहते है। ये प्रखण्ड स्तर पर दैनिक जागरण के पत्रकार भी है। पत्रकार होने के कारण दबंगई भी दिखाते है, जिनके डर से कोई बोलता नहीं। इनके घर में दो पहिया वाहन है, आर्थिक रुप से संपन्न है। इसके बावजूद बीपीएल की सूची में भी दर्ज है। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जिला के उपायुक्त को जांच का आदेश दिया। जांच में आरोप सही पाया गया और रमेश पांडेय को पारा शिक्षक के पद से निलंबित कर दिया गया।
1 फरवरी 2016
स्थान – सूचना भवन, रांची।
कार्यक्रम – मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’।
आनन्द कुमार की शिकायत थी कि चतरा का उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय टिलरा हेट-आहर पिछले एक साल से बंद है, जिसमें लगभग 50 विद्यार्थी अध्ययनरत थे, विद्यालय के बंद रहने से सारे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो गयी। विद्यालय के प्रधानाध्यापक मालिक बाबू ग्राम टिलरा के जन-वितरण प्रणाली के डीलर और प्रखण्ड स्तर पर एक प्रेस समूह में बतौर संवाददाता कार्य करते है, यहीं नहीं जनाब ठेकेदारी भी करते है। इन्होंने एक और कमाल किया है विद्यालय के भवन निर्माण के लिए वर्ष 2008 में 8 लाख रुपये आये थे, उसे बिना कार्य संपन्न कराये ही निकाल लिया।
जैसे ही मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’ में यह मामला आया, मुख्यमंत्री ने संबंधित जिला शिक्षा अधीक्षक को मामले की जांच करने और इस पर त्वरित कार्रवाई करने का आदेश दिया। पूरे मामले की जांच हुई। आरोप सही पाया गया। मालिक बाबू की सेवा समाप्त कर दी गयी और इनके खिलाफ मयूरहंद थाने में प्राथमिकी भी दर्ज करा दी।
18 मई 2016
रांची से प्रकाशित सारे अखबारों ने मुख्य पृष्ठ पर खबर छापी है कि ताजा टीवी के पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह उर्फ इंद्रदेव यादव की हत्या उग्रवादी संगठन टीपीसी ने करायी है, मामला लेवी से जुड़ा है। चतरा एसपी के बयान से बताया गया है कि पत्रकार इंद्रदेव यादव राजपुर थाना क्षेत्र में डीवीसी के तहत 33 हजार पोल लगाने का ठेका लिया था। वह तीन साल से काम कर रहा था। उग्रवादी संगठन टीपीसी ने सात लाख रुपये लेवी की मांग की। लेवी नहीं देने पर पत्रकार की हत्या 12 मई को 9.30 बजे रात्रि में कर दी गयी।
कुछ अन्य घटनाएं...
जब मैं ईटीवी धनबाद में कार्यरत था, तब उस समय भी दो हृदय विदारक घटनाएं घटी थी, जब एक पत्रकार से ठेकेदार बने व्यक्ति की हत्या कर दी गयी थी और दूसरा मैथन के हिन्दुस्तान संवाददाता पर जानलेवा हमला हुआ था। जिसने जानलेवा हमला किया था, वह हमला का जो कारण बताया था, वह बड़ा ही शर्मनाक था। यहीं नहीं 31 दिसम्बर 2006 को तो धनबाद के ही गांधी सेवा सदन में धनबाद के तथाकथित पत्रकारों का समूह मुर्गा तक कटवा दिया था, शराब की बोतले तक खोल दी थी, सिगरेट तक फूंक डाले गये थे जबकि सबको पता है कि गांधी से संबंधित किसी भी सदन में इस प्रकार की हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाता, फिर भी पत्रकारों ने ऐसी हरकत की। मैंने पत्रकारों के इस हरकतों को अपने ईटीवी पर दिखाया, नतीजा यह हुआ कि धनबाद के सारे मीडिया हाउस में बैठे शीर्षस्थ महानुभावों ने संयुक्त रुप से मेरे खिलाफ मोर्चा खोला और मेरे खिलाफ अनाप – शनाप एक अखबार में छपवाने लगे, उन्हें लगा कि मैं इससे डर जाउंगा, मैंने उनका मुकाबला किया और अपनी उपस्थिति शानदार ढंग से दर्ज करायी।
ये दृष्टांत है – आज के पत्रकारों के। मैं यह नहीं कहता कि झारखण्ड या अन्य जगहों के सारे पत्रकार ऐसे ही है, पर हां, इतना जरूर कहूंगा कि इनकी संख्या बहुतायत है और इनकी हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कुछ लोगों को तो मैं देख रहा हूं, जिनसे ये आशा की जा सकती है कि वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आदर्श स्थापित करेंगे, जिसे देखकर आनेवाली पीढ़ी सीख लेंगी, वे मर्यादा को तोड़ने में ज्यादा रूचि दिखा रहे है। कोई राजनीतिज्ञों की भक्ति में ऐसे लग गया कि उसे राज्यसभा पहुंचने में परम आनन्द की प्राप्ति हो रही है, कोई सूचना आयुक्त बनकर स्वयं को धन्य कर चुका है, कोई बाडीगार्ड लेकर घूम रहा है और शान बघार रहा है, कोई कुकृत्यों से धन इकट्ठा कर रहा है, कोई अपनी पत्नी के नाम पर पोर्टल चला रहा है और नाना प्रकार से धन जुटाने के लिए वह सारी हरकतें कर रहा है, जिसे पत्रकारिता इजाजत नहीं देती। आश्चर्य इस बात की भी है कि ऐसे लोग ही उन लोगों को प्रवचन दे रहे है, जिन्होंने अपनी जिंदगी में खासकर पत्रकारिता के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया है। कमाल है, जो पग-पग पर पत्रकारिता को अपनी जागीर बनाकर, स्वयं के जमीर को बेच डाला, वे पुरस्कृत हो रहे है, और जो किसी के आगे सर नहीं झुकाया, वे उसे कोस रहे है, यह कहकर कि अरे वो गधा है, वो क्या जाने की पत्रकारिता क्या है?
कुछ लोग तो यह भी कहेंगे कि पत्रकार क्या करे बेचारा। उसे तो अखबार वाले और इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले कुछ भी नहीं देते। मैं कहता हूं कि अगर कुछ नहीं देते तो इसका मतलब कि तुम जहां रहते हो, उसका हक छीन लोगे, उस पर दबंगई दिखाओगे। अगर अखबार वाले और इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले तुम्हें कुछ नहीं देते, तो तुम उनके यहां काम क्यों कर रहे हो, आखिर क्या वजह है कि तुम बिना पैसे के काम करने को तैयार हो, और उनकी सेवा को भी तैयार हो। मैं बताता हूं कि आखिर ऐसा तुम क्यों करते हो। वह हैं – झूठी इज्जत और पत्रकारिता की झूठी धौंस का तिलिस्म, जो तुम्हें इनके प्रति खींचता है और तुम जब तक जिंदा रहते हो, इस झूठी शान में अपनी जिंदगी गंवा देते हो, साथ ही अपने परिवार को और आनेवाले पीढ़ी को बर्बाद कर देते हो।
कमाल है, आजकल झारखण्ड में कुकुरमुत्ते की तरह पत्रकारों के हित के लिए लड़नेवाले संगठन भी खड़े हो गये है, जिन्हें कल तक कोई नहीं जानता था, आज लाखों-करोड़ों में खेलने लगे है। रांची, धनबाद, जमशेदपुर, गिरिडीह ही नहीं बल्कि दिल्ली में भी भाषण दे रहे है, किताबे छपवा रहे हैं, मंत्रियों और नेताओं को बुलाकर स्वयं महिमामंडित हो रहे हैं और चिरकूट टाइप के लोग उन्हें वाह-वाह करके आनन्दित हो रहे है। मैं कहता हूं कि अगर यहीं हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं कि जनता इन्हें पटक-पटक कर मारेगी...
कमाल है, आजकल मैं यह भी देख रहा हूं कि ये संगठन सरकार से पत्रकारों के लिए सुविधा मांग रहे हैं, पर जहां ये काम कर रहे होते है, वहां पर उन्हें इज्जत बचाने के लिए कुछ रोटी का प्रबंध हो जाये, कुछ पैसे मिल जाये, वहां आंदोलन करने और कराने में इनकी नानी मर जाती है, क्योंकि वे जानते है कि जैसे ही उन संस्थानों में ये आंदोलन करने जायेंगे, वहां पहले से ही रखे बाउंसर इनका ऐसा इलाज करेंगे कि इनकी सारी नेतागिरी ही तेल लेने चली जायेगी...
अंत में – जो चरित्रवान पत्रकार है, उन्हें कहीं कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत तो उन्हें है, जो नेताओं की चरणवंदना या अधिकारियों की चाटुकारिता करते है, तभी तो इसी रांची के एटीआई में एक कार्यक्रम में एक अधिकारी ने कह डाला था कि आप पत्रकारों और माननीय मुख्यमंत्री के बीच में तो पति-पत्नी का संबंध होता है, पर किसी पत्रकार ने इसकी आलोचना तक नहीं की थी, सभी मन ही मन आनन्दित हो रहे थे, अंत में किसने इस पर प्रतिकार किया, किसने इसकी आलोचना की, वहां जो पत्रकार होंगे, उन्हें जरुर पता होगा। हमें लगता है कि इस पर अब ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं।

Tuesday, May 10, 2016

प्रभात खबर की लीला, प्रभात खबर ही जाने...

7 मई 2016
प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश के प्यारे, अनुज का डॉ. के. के. सिन्हा पर केन्द्रित दो पृष्ठों का आलेख छपा है। इन दो पृष्ठों में डॉ. के के सिन्हा की जमकर आरती उतारी गयी है। उन्हें इस प्रकार से पेश किया गया है, जैसे वे साक्षात् मुक्तिदाता – मोक्षदाता हो। जिनके दर्शन मात्र से सारे रोग भाग खड़े होते है। आलेख की शुरूआत होती है – जब नहीं दिखती कहीं कोई उम्मीद, तब याद आते है डॉ. के के सिन्हा। इस आलेख में क्या खास है, सर्वप्रथम उसे जानिये –
1. डॉ. के के सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को ठीकठाक बताया है, पर झारखण्ड के अन्य 90 प्रतिशत राजनीतिज्ञों को बेवकूफ बताया है।
2. जो लोग डाक्टर को भगवान का दूसरा रूप मानते है, उन्हें डॉ. के के सिन्हा अनपढ़ और बेवकूफ बताता है। वह उन हिन्दुस्तानियों को भी बेवकूफ मानता है, जो पूजा करते है। उसके अनुसार इन हिन्दुस्तानियों के पास दूसरा कोई चारा नहीं है, साधन भी नहीं है, इसलिए वे भगवान के आगे हाथ जोड़ते है, लेकिन वह भगवान को नहीं मानता, इसलिए उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
3. डॉ. के के सिन्हा अपने बयान में भारतीयों को यह भी कहा है कि भारतीय भिखारियों की तरह खाना खाते हैं।
4. वह यह भी कहता है कि जवाहर लाल नेहरू में कुछ कमियां थी, हिन्दुस्तान का बंटवारा नहीं होता, अगर नेहरू प्रधानमंत्री बनने की इच्छा नहीं रखते। वह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दूबे और जगन्नाथ मिश्र के खिलाफ भी अनाप-शनाप बयान दिया है।
और अब अपनी बात...
आम तौर पर इस प्रकार के आलेख तभी छपते है, जब कोई विशेष दिन हो या कोई विशेष क्षण...
आखिर इस प्रकार के किसी व्यक्ति विशेष को महिमामंडित करने के आलेख छापने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी? कुछ न कुछ तो बात जरुर होगी, क्योंकि बिना आवश्यकता के तो प्रभात खबर कुछ छापता ही नहीं और ऐसे भी 7 मई को कोई डाक्टर दिवस या मरीज दिवस तो था ही नहीं, फिर इसकी जरुरत क्यों पड़ गयी? हो सकता है कि प्रभात खबर के किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को के के सिन्हा से दिखाने की जरूरत पड़ गयी हो या हो सकता है कि प्रभात खबर ये देख रहा हो कि के के सिन्हा नामी गिरामी डाक्टर हैं, उनसे ऐसा संबंध बनाया जाय कि आराम से एक फोन घुमाने पर ही उनका नंबर मिल जाये, जैसा कि अनुज ने महिमामंडित करने में लिखा है कि इनका नंबर मिलने में 6-6 महीने लग जाते है।
हो सकता है कि के के सिन्हा के मन में ये बात उठी हो कि भाई अशोक भगत और सिमोन उरांव जैसे लोग पद्मश्री ले रहे है तो भाई हमारे में क्या कमी है?, हमे भी मिल जाये। इसलिए उसने सोची समझी रणनीति के तहत राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री की झूठी तारीफ और बाकी को बेवकूफ बता दिया हो या और कुछ न कुछ अंदर खिचड़ी जरूर पक रहा हो, जहां तक मेरा ध्यान नहीं गया हो...
अब कुछ सवाल प्रभात खबर से...
आप इस प्रकार के आलेख लिखकर क्या साबित करना चाहते हो?
क्या आप बता सकते हो...
कि जनाब के फीस कितने है?
और जितने का वो इलाज करते है, कभी ईमानदारी से उसका आयकर भी चुकाया हैं, हमारे पास तो इतने लोग आये है, इनके पास से इलाज कराकर, कि उनके पैड पर केवल उनके दवा के नाम होते है, पर निबंधन संख्या होता ही नहीं, आखिर बिना निबंधन वाले पैसे कहा जाते है।
इसी रांची में डॉ. एस पी मुखर्जी है, जिनकी फीस मात्र 5 रुपये है, और वहां डॉ. के के सिन्हा से ज्यादा मरीज दर्द लेकर आते है और मुस्कुराते हुए जाते है...
इसी रांची में डॉ. पी आर प्रसाद हुए, जो आज दुनिया में नहीं है, उनकी फीस मात्र 100 रुपये थी और उनके यहां इलाज कराकर बहुत सारे लोग खुश थे। उनके निधन पर बहुत लोगों को दर्द हुआ था, शायद आपको नहीं मालूम...आप जिस प्रकार से इस व्यक्ति को पेश किया उसे हम पत्रकारिता नहीं कहते, क्या कहते है, वो आप खुद ही जान लो...
और ये भी जान लो कि हमारे देश में तो जिसका चल जाता है, तो चल जाता है...
जैसे एक लोकोक्ति है, जो बिहार में खूब चलता है,
वो क्या कहते है...
नामी ..... का, ....बिकाता है
अंततः
हे भगवान, ऐसे कभी डाक्टर मत देना, जिसकी फीस दो हजार हो...
हे भगवान, ऐसे कभी डाक्टर मत बनाना, जो स्वयं को महान और दूसरे को, खासकर सामान्य जन को जाहिल समझता हो...
क्योंकि जो दूसरे को जाहिल समझेगा, वह उसके साथ क्या सलूक करेगा...
आपसे बेहतर कौन जान सकता है...

Friday, April 22, 2016

चैत्र-वैशाखयोः वसन्तः

संस्कृत साहित्य में एक उक्ति है - चैत्र - वैशाखयोः वसन्तः। फिल्म पुकार में सुप्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन ने स्वयं गाया है - तू मैके मत जइयो, मत जइयो मेरी जान....मार्च - अप्रैल में बहार कुछ ऐसे झूम के आये...देख तेरा मलमल का कुर्ता जी मेरा ललचाये...मैके मत जइयो...
अब आप बताइये किसी ने सोचा होगा कि वसन्त में ग्रीष्म का एहसास हो...
किसी ने सोचा होगा कि बहार के मौसम में जब खाने बैठे तो पंखे से निकली हवा आपकी रोटी को ही ऐसा सूखा दें कि आप खा ही न पायें...
भला अभी तो चैत्र खत्म होने जा रहा है...वैशाख आनेवाला है...यानी भारतीय हिन्दी मासों के अनुसार अभी गर्मी आने में एक माह शेष है...पर गर्मी का धमाल जारी है...
वसन्त तो इस बार लोगों ने देखा ही नहीं...
वसन्त में हाहाकार है...कहीं पानी की, तो कही गर्मी से निजात पाने की...
ऐसी हाहाकार में हमें नहीं लगता कि किसी कवि ने इस माह में यह कहकर वसंत को दुलारा होगा कि...
हवा हूं हवा में बसंती हवा हूं
सूनो बात मेरी अनोखी हवा हूं
फिलहाल इस वसंत के महीने में सभी के प्राण पखेरु जवाब दे रहे हैं...मनुष्य तो मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी परेशान हैं...धरती अपने गर्भ में जल को सहेजने के चक्कर में इतनी दूर जल को ले गयी...कि मनुष्य का ये गुमान ही फेल हो गया कि हमारे यहां कुआं हैं, जो सूखती ही नहीं...
सब फेल...
कवि की कविता फेल...
सरकार की नीतियां फेल...
नक्षत्र फेल...
राशि फेल...
बादल तेरी सूरत फेल...
पानी के भंडार भी फेल...
बहारों के मौसम भी फेल...
जीवन के वसंत भी फेल...
सब फेल, सब फेल...
फेल होती इस जिंदगी में...
अब कोयल कह जाती है...
मैं क्या बोलूं मीठी राग में...
कंठ सूख अब जाती हैं...
ऐसा वसंत कभी न देखा...
चैत्र-वैशाख महीने में...
सूख गये ताल-तलैया जल्दी,
मानव के कुकर्मों से...
आओ चेते, बाग लगाएं...
ताल -तलैया रचते जाएं...
पृथ्वी को हरित करें और
जल संरक्षण को कदम बढ़ाएं...

Saturday, April 9, 2016

और रघुवर ऐतिहासिक हो गये.........

हमने बाबू लाल को भी देखा है...
हमने अर्जुन मुंडा को भी देखा है...
हमने मधु कोड़ा को भी देखा और शिबू सोरेन को भी देखा...
देखने के लिए तो हेमंत को भी देख लिये...
सभी ने डोमिसाइल के नाम पर, स्थानीयता के नाम पर बवाल काटे, राजनीति की फसल काटी, पर किसी ने भी इस समस्या का संवैधानिक हल निकालने की ईमानदार कोशिश नहीं की, पर रघुवर दास ने ऐसा कर दिखाया कि सभी राजनीति के इस अखाड़े में चित्त हो गये...
हमने डोमिसाइल के आंदोलन को नजदीक से देखा है...
स्थानीय नीति के नाम पर 2002 में हुए बवाल, सड़कों पर उठती आग की लपटों, धू-धू कर जलती मोटरसाइकिलें और कारें, आंदोलनकारियों और पुलिस की गोलियों से छलनी होती झारखण्ड के नागरिकों की छातियों और लाशों के ढेर पर राजनीति करते, अपना राजनीतिक फसल उगाते राजनीतिज्ञों, अपने टीआरपी के लिए जद्दोजहद करते इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों और कैमरामैनों, मीडिया हाउस में इस आंदोलन को और हवा देने के लिए बन रही रणनीतियों को भी हमने देखा है...
झारखण्ड बने 15 साल हो गये। इस राज्य में अब तक 10 मुख्यमंत्री बने, पर किसी ने इस समस्या का हल निकालने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। एक ने तो इसी पर सत्ता भी संभाली पर सत्ता मिलते ही इस नीति को भूल गये, पर दसवें मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बता दिया कि उनमें हर प्रकार की कूबत है, वे हर समस्या का हल निकालना जानते है, उन्हें पता है कि शासन कैसे चलाया जाता है, नीतियां कैसे बनायी जाती है और उसे कैसे क्रियान्वित की जाती है...
अभी मुख्यमंत्री रघुवर दास के मुख्यमंत्री पद संभाले एक साल ही बीते है और उनके इस सीमित कार्यकाल का लेखा-जोखा देखा जाये, तो ये अब तक बने सारे मुख्यमंत्रियों में बीस साबित हो गये...
आखिर एक साल में इन्होंने क्या – क्या किया...
जरा देखिये...
1. झारखण्ड को अपनी विधानसभा भवन नहीं थी, विधानसभा भवन का निर्माण प्रारंभ करा दिया।
2. झारखण्ड हाई कोर्ट भवन का निर्माण प्रारंभ करा दिया।
3. यहां के पत्रकारों को सम्मान दिया और रांची में प्रेस क्लब का निर्माण शुरु करा दिया।
4. राज्य को उदय योजना में शामिल होनेवाला पहला राज्य बना दिया।
5. आज वर्ल्ड बैंक भारत के अगर किसी राज्य को सर्वाधिक सम्मान दे रहा है, तो वह हैं – झारखण्ड।
6. श्रम सुधार में प्रथम, नीर-निर्मल योजना में प्रथम, आधारभूत संरचनाओं को ठीक करने में पूरे भारत में अग्रणी, व्यापार सुगमता सूचकांक में तीसरा और तेजी से विकास करनेवाले राज्यों में चौथा स्थान...और ये सब हुआ हैं मात्र एक वर्ष में।
7. हजारीबाग के बरही में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की नींव डलवाकर, दूसरी हरित क्रांति का बीज बो दिया।
8. रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि खेल विश्वविद्यालय के साथ – साथ तकनीकी विश्वविद्यालय का शुभारंभ कराया।
9. समाज में कुछ लोगों ने अशांति फैलाने की कोशिश की, वह रांची के दंगा प्रभावित इलाकों में खुद ही कूद पड़ा...
10. किसानों के लिए कृषि सिंगल विंडो प्रारँभ करा दिया।
11. उद्योग जगत को झारखण्ड में आकर्षित करने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम लागू कराया, साथ ही साइन वन कार्यक्रम की शुरुआत करा दी।
12. कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कौंसिल का गठन करा कर कारपोरेट से जुड़े लोगों को उनके दायित्वों के पूर्ति के लिए संवेदनशील बनाया।
13. भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का गठन कर, इसे और सशक्त बनाया।
14. आदिवासियों को वनाधिकार पट्टा दिलाया। आदिम जनजातियों के लिए विशेष बटालियन का गठन कराया।
यानी अगर हम विकास की धारा को गिनाने बैठ जाये तो हम 100 की संख्या पार कर जायेंगे। ऐसी सोच वाला मुख्यमंत्री हमनें झारखण्ड में अब तक नहीं देखी।
सचमुच अगर इरादे व हौसले बुलंद हो तो फिर दिक्कत कहां आती है...
इधर सारे अखबार स्थानीय नीति के समाचार से रंगे है...
मैं जानता हूं कि ये क्यूं रंगे है...
उन्हें पता है कि ये स्थानीय नीति लागू करना बर्रे के छत्ते में हाथ डालने के बराबर है, जिसे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने चुनौती के रुप में स्वीकारा। हम जानते है कि हर अच्छे काम का विरोध होता है, आजकल तो लोकतंत्र में विपक्षी दल का काम ही हो गया है कि खुद बेहतर काम न करो और कोई बेहतर काम करें तो उसके बेहतर काम की प्रशंसा न कर, उसकी आलोचना करना शुरु कर दो, उसके हर अच्छे काम में अड़ंगा लगाओ, क्योंकि खुद तो अच्छा करना है नहीं, अगर दूसरा कोई अच्छा करेगा तो उसका राजनीतिक कद, ऊंचा हो जायेगा और ये आज के विरोधियों को बर्दाश्त नहीं...
जरा अखबार पलटिये...
जो कल तक स्थानीय नीति को लेकर आंदोलन किया करते थे, जिन्होंने इसका राजनीतिक फायदा भी उठाया, जैसे बंधू तिर्की और चमरा लिंडा। आजकल इनके धांसू बयान अखबारों से गायब है। झामुमो ने सरकार द्वारा लागू स्थानीय नीति का विरोध किया है, और विरोध का जिम्मा उठाया है झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने। झाविमो और राजद जैसी पार्टियों ने नपा तुला बयान दिया है। हम आपको बता दें कि बाबू लाल मरांडी के डोमिसाइल नीति के खिलाफ उस वक्त राजद कुछ ज्यादा ही सक्रिय था, पर चूंकि आज वह विपक्ष में है, इसलिए उसके सुर में बदलाव स्वाभाविक है।
सवाल यह है कि डर के कारण, हम अच्छा काम करना बंद कर देंगे?
जनहित में फैसले लेने बंद कर देंगे?
हम इसलिए काम करने बंद कर देंगे कि एक बड़ा वर्ग हमसे असंतुष्ट हो जायेगा?
अगर इस प्रकार की सोच हम रखे तो निश्चित ही पार्टी भले ही आगे निकल जाये या व्यक्ति जरुर आगे निकल जाये, पर अंततः देश व राज्य का नुकसान ही होता है...
पर रघुवर दास ने इन सारे सवालों पर विराम लगाकर स्थानीय नीति को परिभाषित कर दिया, इसके लिए इनकी प्रशंसा होनी ही चाहिए। कितने शर्म की बात है कि छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड ये दोनों राज्य झारखण्ड के समकक्ष ही जन्म लिये थे, इन्होंने स्थानीय नीति जल्द घोषित कर दी, पर झारखण्ड को स्थानीय नीति घोषित करने में पन्द्रह साल लग गये।
हमें आज भी याद है कि 2002 में जो स्थानीय नीति के नाम पर दंगे भड़के और जिसमें 6 लोगों की जाने गई। उसके लिए अगर कोई दोषी है तो वह है
• उस समय की सरकार जिसने इस स्थानीय नीति का ईमानदारी से हल निकालने की कोशिश नहीं की।
• हिंसक आंदोलन कर रहे आंदोलनकारियों पर अंकुश लगाने का काम नहीं किया, बल्कि उसे और हवा दी।
• मीडिया हाउस जिसने अपनी मर्यादा का उल्लघंन किया और डोमिसाइल आंदोलन में एक दूसरे को देख लेने वाले युवाओं को हतोत्साहित करने के बदले प्रोत्साहित किया।
• अगर सूत्रों की मानें तो मिशनरियों की भी भूमिका संदिग्ध थी।
आज रघुवर सरकार ने स्थानीय नीति लागू कर दी है। हो सकता है, (हालांकि इसकी संभावनाएं न के बराबर है) कुछ उपद्रवी इसके नाम पर आंदोलन करें, जरुरत है, ऐसे लोगों से सख्ती से निबटने की, क्योंकि आज झारखण्ड बहुत आगे निकल चुका है, और ये उपद्रवी चाहेंगे कि झारखण्ड पुनः विकास की पटरी से नीचे आ जाये, ताकि रघुवर दास की भी छवि सामान्य मुख्यमंत्री के रुप में जनता के बीच आ जाये।
हम एक बार फिर मुख्यमंत्री रघुवर दास, दबंग मुख्यमंत्री रघुवर दास, बोल्ड डिसीजन लेनेवाले मुख्यमंत्री रघुवर दास की इस बात के लिए सराहना करते है, जिन्होंने स्थानीयता नीति पर बोल्ड स्टेप लिया और अपने घोर विरोधियों को बता दिया कि वे झारखण्ड को विकास के पथ पर ले चलते हुए, अपने राज्य को कहा ले जाना चाहते है...
आखिर क्या है रघुवर की स्थानीय नीति...
आइये इस पर गौर फरमाये...
वे सभी स्थानीय माने जायेंगे, जो इस केटगरी में स्वयं को पायेंगे...
• वैसे सभी लोग, जिनका स्वयं अथवा पूर्वज के नाम से पिछले सर्वे खतियान में नाम दर्ज हो। वैसे मूल निवासी जो भूमिहीन है, उनके संबंध में भी उनकी प्रचलित भाषा, संस्कृति एवं परंपरा के आधार पर ग्राम सभा द्वारा पहचान किये जाने पर स्थानीय की परिभाषा में शामिल हो सकेंगे।
• झारखण्ड के वैसे निवासी जो राज्य में पिछले 30 साल या उससे अधिक समय से निवास कर रहे हों और अचल संपत्ति अर्जित किया हो। ऐसे व्यक्ति स्वयं, उनकी पत्नी और बच्चे इसमें शामिल होंगे।
• राज्य सरकार या राज्य सरकार द्वारा संचालित या मान्यता प्राप्त संस्थानों, निगम आदि में नियुक्त एवं कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी एवं उनकी पत्नी और बच्चे।
• केन्द्र सरकार के वैसे कर्मचारी एवं पदाधिकारी जो झारखण्ड में कार्यरत हो, वे स्वयं, उनकी पत्नी और बच्चे।
• झारखण्ड राज्य में किसी संवैधानिक अथवा विधिक पदों पर नियुक्त व्यक्ति और उनकी पत्नी एवं बच्चे।
• ऐसे व्यक्ति जिनका जन्म झारखण्ड में हुआ हो और जिन्होंने मैट्रिक एवं समकक्ष स्तर की पूरी शिक्षा झारखण्ड में स्थित मान्यता प्राप्त संस्थानों से पूरी की हो, वे स्थानीय होंगे।
कैबिनेट ने इस नीति पर मुहर लगा दी है। अब अधिसूचना जारी होने के साथ ही झारखण्ड में यह कानून लागू हो जायेगा। सचमुच रघुवर दास, आज आप ऐतिहासिक हो गये। आपका हृदय से, फिलहाल इस कार्य के लिए अभिनन्दन।

Tuesday, March 29, 2016

प्रभात खबर में अनाप-शनाप तो छपता ही रहता है.........

रांची से प्रकाशित आज का प्रभात खबर, पृष्ठ संख्या – 16, लीड बॉटम पढ़िये...
विचार – लॉर्ड मेघनाद देसाई बोले, भारत हिंदू देश बने यह सवाल पैदा ही नहीं होता
भारत में चल रहा विचार युद्ध
देश में पंडित जवाहर लाल नेहरु जैसा सेक्यूलर नेता कोई नहीं हुआ। वे पीएम रहते कभी मंदिर नहीं गये। डा. राजेन्द्र प्रसाद पद पर रहते कभी मंदिर नहीं गये।
मेघनाद देसाई के इस आलेख से हमें मेघनाद की विद्वता का भी पता चल गया और उसे लॉर्ड की उपाधि देने वालों की विशाल बुद्धिमत्ता का भी पता चल गया साथ ही प्रभात खबर की मेघनाद भक्ति का भी पता चल गया...
अब मेघनाद और प्रभात खबर को मेरा जवाब...
1. जो नास्तिक होगा, वह मंदिर क्यों जायेगा – हम आपको बता दें कि पंडित जवाहर लाल नेहरु एक नंबर के नास्तिक थे। कहनेवाले तो ये भी कहते है कि जिसे एडविना से मोहब्बत हो, उसे भगवान से प्रेम कहां से होगा...
2. मेघनाद का ये कहना कि डा. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति पद पर रहते कभी मंदिर नहीं गये – ये बेतुका और बेहुदा बकवास है। सारी दुनिया जानती है कि नेहरु ने तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से आग्रह किया था कि वे सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में न जाये, पर डा. राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरु के आग्रह को यह कहकर ठुकरा दिया था कि हम धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के राष्ट्रपति है, न कि नास्तिक राष्ट्र के।
और हां, एक बात और मेघनाद और प्रभात खबर को यह मालूम होना चाहिए कि डा. राजेन्द्र प्रसाद ने ही सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी...
एक बात और...
प्रभात खबर और मेघनाद को यह भी मालूम होना चाहिए कि जिस बोरी में चावल 90 प्रतिशत हो और कंकड़ की मात्रा 10 प्रतिशत हो, तो वह बोरी कंकड़ के रहने के बावजूद ही चावल की बोरी ही कहलायेगी...
दूसरी बात...
भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी है, पर सारा देश क्रिकेट के पीछे दिवाना है, यानी देश का राष्ट्रीय खेल, राष्ट्रीय सम्मान पाने के बावजूद हाशिये पर है, क्योंकि आम जनता उसे अब स्वीकार नहीं कर रही...
इसलिए आप के मानने या न मानने से क्या होता है...
देश आज भी हिंद के नाम से जाना जाता है, कुछ लोग हिंदुस्तान ही कहते है और ऐसे भी महामूर्खों हिंदू कोई धर्म नहीं, ये तो तुमलोगों ने बना दिया।
हमने चारों वेद और उपनिषद् पढ़े हैं, पर कहीं हिंदू शब्द तक का जिक्र नहीं और आप चल दिये, हिंदू और हिंदूत्व पर व्याख्यान देने...
अंत में...
कालांतराल में जिस प्रकार हिन्दूओं की आबादी देश में घट रही है, आनेवाले दिनों में यहीं देश दूसरे धर्मों के नाम से जाना जायेगा और तुम कुछ कर भी नहीं पाओगे...फिलहाल जो तुम अनाप-शनाप छाप रहे हो, तुम्हारा छपनई भी बंद हो जायेगा, पर ये देखने के लिए न तो तुम जिंदा रहोगे और न हम...

Monday, March 21, 2016

रांची के कुछ अखबारों के संपादकों को चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए.................

रांची के कुछ अखबारों के संपादकों को चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए...
BUT
थैंक यू “आजाद सिपाही”
जी हां, रांची के अखबारों के संपादकों को चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए, ऐसा इसलिए कि इन अखबारों ने पाठकों तक सही समाचार नहीं पहुंचाने का संकल्प ले रखा हैं...। ये अखबार गुंडों और अपराधियों की मदद करते हैं। अखबार की आड़ में अपनी संतानों का भविष्य सुरक्षित करते हैं और नेताओं के चरणोदक पीकर, स्वयं को कृतार्थ करते हैं...
आखिर मैंने ऐसा क्यूं कहां...
आइये हम आपको विस्तार पूर्वक बताते हैं...
कल यानी 20 मार्च को चुटिया के महादेव मंडा के पास एक हृदय विदारक घटना घटी। कल बंद समर्थकों ने चंद्रशेखर ठाकुर नामक युवक को जिंदा जलाने का प्रयास किया, पर वह युवक दैव कृपा से बच गया और अपनी जान बचाते हुए, स्वयं चुटिया थाने के ठीक सामने आर पी फार्मा यानी विक्की सिंह के दुकान पर पहुंच गया। जहां विक्की सिंह और उनके भाई जो डाक्टर भी है, उक्त युवक की बिना किसी शुल्क लिये, अपनी सेवा दी और उसकी जान बचाई, पर रांची के किसी अखबार ने आजाद सिपाही को छोड़कर सही खबरे नहीं दी...
आश्चर्य इस बात की है कि आर पी फार्मा के ठीक सामने चुटिया थाना है, पर चुटिया थाने के किसी भी पुलिसकर्मी ने आर पी फार्मा आकर वस्तुस्थिति को जानने की कोशिश नहीं की...। जब इलेक्ट्रानिक मीडियाकर्मियों का दल वहां पहुंचा, तब भुक्तभोगी युवक आर पी फार्मा में इलाजरत था, पर चुटिया पुलिस कहां थी, किसी को पता नहीं था।
इधर, बंद समर्थकों द्वारा चंद्रशेखर ठाकुर को जिंदा जलाने का प्रयास हुआ, उसकी हत्या करने की कोशिश की गयी, पर जरा देखिये, रांची से प्रकाशित निर्लज्ज अखबारों को, क्या छाप रहे है...
सबसे पहले प्रभात खबर को देखिये...
इसने आज के अखबार में पृष्ठ संख्या 4 पर बंद से संबंधित खबरें छापी है...जिसमें लिखा है कि “कहीं से किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं” जरा सोचिये, जहां एक युवक को जिंदा जलाने का प्रयास किया जाता हो, वहां यह अखबार लिख रहा है कि “कहीं से किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं”...इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या हो सकती है...यहीं नहीं इसी पृष्ठ पर यह अखबार लिखता है कि “बंद समर्थकों से धक्का-मुक्की, आग पर गिरा युवक” साथ ही उक्त युवक का वह फोटो भी दे रहा है और गोल मटोल झूठी समाचार छाप कर, इस घटना का इतिश्री कर दिया।
और अब बात हिन्दुस्तान अखबार की...
इस अखबार ने तो झूठ का रिकार्ड ही तोड़ दिया...। पृष्ठ संख्या 5 पर “आगजनी की चपेट में आया युवक” नाम से छपे समाचार में इस अखबार ने सिर्फ झूठ ही लिखा है और झूठ के सिवा कुछ भी नहीं...जरा देखिये क्या लिखा है इसने – कुछ बंद समर्थकों ने ही चंद्रशेखर को बचाया, फिर उसे गुरुनानक अस्पताल भेजा, जबकि सच्चाई यह है कि हिन्दुस्तान अखबार जो खुद उस युवक का फोटो छापा है, वह फोटो विक्की सिंह के दुकान की है, जहां उक्त युवक की इलाज हुई...युवक को न तो बंद समर्थकों ने विक्की सिंह के दुकान पर लाया था और न ही युवक गुरु नानक अस्पताल गया...इस अखबार ने तो बंद समर्थकों को ऐसी आरती उतारी कि पूछिये मत...
अब देखिये दैनिक भास्कर ने क्या लिखा...
दैनिक भास्कर ने पृष्ठ संख्या 3 में इस प्रकार इस खबर को दिया, जैसे लगता है कि ये कोई मामूली घटना हो...। शीर्षक है – बंद समर्थकों ने युवक के साथ मारपीट की।
और दैनिक जागरण
इस अखबार ने पृष्ठ संख्या 2 पर इस खबर को इस प्रकार छापा, जैसे लगता है कि ये कोई घटना ही नहीं, पर इस अखबार को हम एक बात के लिए दाद देंगे कि इसने इस घटना की सच्चाई को कम से कम छूने की कोशिश की...
और आजाद सिपाही
आजाद सिपाही ने तो कमाल ही कर दिया...
पृष्ठ संख्या एक पर सही - सही छाप दिया कि चुटिया के महादेव मंडा में किस प्रकार एक युवक को जलाने की कोशिश की गयी, वह भी बंदी के नाम पर...
और अब बात हेमंत सोरेन की...
हेमंत जी आपको बधाई...आप तो बाहरियों के लिए तीर – धनुष उठाने और डंडा उठाने की बात कह रहे थे। यहां के आदिवासियों और मूलवासियों ने आपसे एक कदम और बढ़ने का संकल्प ले लिया। हाथ में पेट्रोल बम पकड़ लिया है। कल एक युवक को जिंदा जलाने की कोशिश हुई...पर वह संयोग से बच निकला। आनेवाले समय में हो सकता है कि ये घटना की पुनरावृत्ति हो, यह भी हो सकता है कि बार – बार की इस घटना में कोई युवक इस आगजनी का शिकार भी हो जाय...सचमुच आप महान है, क्योंकि आप जैसे नेता ही तो झारखण्ड की शान है...ऐसे ही बयान देते रहिये, ताकि झारखण्ड का नाम रौशन होता रहे...
और वाह रे रांची की पुलिस...
चुटिया थाना की पुलिस तो महान है...। चंद्रशेखर चुटिया थाना के सामने इलाज करा रहा था और चुटिया थाना पुलिस कहां सोई थी, पता ही नहीं चला, जबकि मिनटों में ही इलेक्ट्रानिक मीडिया के संवाददाता आर पी फार्मा, विक्की सिंह के दुकान पर पहुंच गये और अपने कार्य को गति दे दी...। हालांकि कई इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने धर्म का निर्वहन नहीं किया।
बधाई राज्य सरकार को भी...
एक समय था, जब आदिवासी-मूलवासी डोमिसाइल के नाम बंद करते थे, तो एक प्रकार की दहशत हो जाया करती थी, पर अब वो दहशत का माहौल नहीं होता...। पर दहशत का माहौल करने की कोशिश की जा रही है...। हमारा राज्य सरकार से अनुरोध होगा कि वह पुलिस व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करें, नहीं तो स्थिति भयावह करने की पुरजोर कोशिश विपक्षियों द्वारा की जा रही है...। हालांकि गलती करेंगे और करायेंगे विपक्षी, पर ठीकरा फोड़ेंगे सरकार पर...। ये रघुवर सरकार को भूलना नहीं चाहिए।

Saturday, March 12, 2016

वो तीर-धनुष उठायेंगे और हम घर छोड़कर भाग खड़े होंगे............

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के बड़बोले नेता हेमंत सोरेन पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सुप्रीमो राज ठाकरे का गहरा प्रभाव है, जैसे राज ठाकरे समय – समय पर गैर मराठियों को उनकी औकात बताने के लिए नाना प्रकार के चिरकूटई टाइप के बयान देते रहते है, जिनके बयान आते ही, मनसे कार्यकर्ता गैर-मराठियों के खिलाफ मार-धाड़ करने के लिए निकल पड़ते है, ठीक उसी प्रकार हेमंत का बयान आज रांची से निकलनेवाले कमोवेश सभी अखबारों में पढ़ने को मिले। चूंकि हमारे देश के चिरकूट टाइप के बहुत सारे नेताओं को ये गलतफहमी हो गयी है, कि इस प्रकार के बयान देने से लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी हो जाती है, इसलिए वे इस प्रकार का बयान देते रहते है।
अपने डेढ़ साल के मुख्यमंत्रित्व काल में हेमंत सोरेन ने इस प्रकार का बयान देने से खुद को बचा रखा था, शायद इस दौरान उन्हें दिव्य ज्ञान हासिल हो गया था कि मुख्यमंत्री पद पर रहकर ऐसा बयान नहीं दिया जाता। पर आज क्या हो गया...। हम आपको बता दें कि हेमंत को दिमाग देनेवाले बहुत सारे ऐसे लोग है, जिन्हें राजनीति की एबीसीडी नहीं आती...पर वो कहते है न, कभी – कभी मूर्खों और गधों की बातें भी दैवकृपा से सिद्ध हो जाती है...जिस के प्रभाव में आकर नेताओं का एक वर्ग, उन गधों और मूर्खों को दिव्य पुरुष मानकर, उसकी हर बातें इस प्रकार स्वीकार करता है, जैसे लगता है कि भगवान के श्रीमुख से निकली वाणी हो...
हेमंत को मालूम होना चाहिए कि इस प्रकार का बयान उनके भविष्य की राजनीति पर सदा के लिए प्रश्न चिह्न लगा देगा...हेमंत को जो लोग ओवैसी या राज ठाकरे बनने की सलाह दे रहे है...उन्हें नहीं पता कि वे आग से खेल रहे हैं...क्योंकि ये घटियास्तर की सलाह और चिरकूटई टाइप का बयान झारखण्ड को कहीं का नहीं छोड़ेगा...
झारखण्ड के लिए खुशी की बात है, कि इन दिनों पूरे देश में झारखण्ड की एक बेहतर तस्वीर गयी है...और ये झामुमो या हेमंत के चलते नहीं गयी...ये गयी है दीपिका और धौनी जैसे खिलाड़ियों की वजह से...अंशुता और सुमराई जैसे खिलाड़ियों की वजह से...। इनकी पार्टी ने तो झारखण्ड की वो दुर्गति कराई है कि सारा देश जानता है...। शायद हेमंत को पता नहीं कि झारखण्ड की जनता अभी तक भूली नहीं है कि इनकी पार्टी के नेताओं ने किस प्रकार रिश्वत लेकर नरसिंहा राव की सरकार बचाई थी...। जनता ये भी नहीं भूली है कि किस – किस को उनके लोगों ने पैसे लेकर राज्यसभा में पहुंचाया और बाद में वहीं व्यक्ति इनकी पार्टी और झारखण्ड को ठेंगा दिखाया...यानी ये तो वहीं बात हुई जो झारखण्ड को लूटवाया वो खुद को झारखण्ड का हितैषी बता रहा है...ये व्यक्ति जब सरकार में था, सत्ता में था तो डोमिसाइल समस्या हल नहीं किया...डोमिसाइल की फाइल को हाथ तक नहीं लगाया और जैसे ही भाजपा की सत्ता आयी, इसे डोमिसाइल पर प्रवचन करने की बात याद आ गयी...पता नहीं कैसे – कैसे नेता झारखण्ड में आ गये है जो अपनी ही माटी के दुश्मन बन गये....इनकी हरकत देख कर कौए और गीध तक शरमा जाय...।

Tuesday, March 8, 2016

इन महिलाओं को नमन........

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है...
इस दिन पूरे देश में महिलाओं को केन्द्र में रखकर कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं...पर हमारे लिए प्रत्येक दिन महिलाओं का हैं, क्योंकि कौन ऐसा दिन है, जिस दिन महिलाओं ने अपने कर्म से देश और समाज को नई दिशा न दी हों...हम ऐसी महिलाओं के प्रति आभार प्रकट करते है और नमन करते हैं...
1. सुमन गुप्ता – महिला आईपीएस अधिकारी, किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं, झारखण्ड में इन्होंने महिलाओं के सम्मान को आगे बढ़ाया, यहीं नहीं भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के आगे कभी झूकी नहीं, कोई समझौता नहीं किया और अपने कर्मक्षेत्र में आज भी अडिग है...
2. रत्ना पुरकायस्था – आकाशवाणी से अपनी अलग पहचान बनानेवाली और फिलहाल दूरदर्शन केन्द्र पटना से जुड़ी रत्ना पुरकायस्था किसी भी पहचान की मोहताज नहीं, “सबकी दीदी” से मशहूर रत्ना जी, अनेक संघर्षों का सामना की है। हाल ही में जदयू के एक मंत्री ने उनके साथ अशोभनीय व्यवहार किया, धमकी दी, पर वह डरी नहीं, उस आततायी मंत्री का मुकाबला किया और वह अपने कर्तव्य क्षेत्र में आज भी अडिग है...
3. सीता सिन्हा – अवकाश प्राप्त शिक्षिका, उनकी आंखों में हमेशा प्रेम ही छलका। बच्चों को देख, वह भाव विह्वल हो जाती। बच्चों को इस प्रकार पढ़ाती, जैसे लगता कि एक मां अपने बच्चों का पोषण करती हैं। आज भी वह उन पढ़ाये हुए बच्चों को मिलती हैं तो घर ले जाकर, उन्हें बिना खिलाए, जाने नहीं देती...यानी इस प्रकार का प्रेम जैसे लगता हो कि उनका स्वयं का बेटा हो...पता नहीं वो दुनिया में है भी या नहीं, पर मैं उन्हें नहीं भूल सकता...
4. प्रमिला देवी – पटना, सगुना दानापुर में रहती है। एक आदर्श महिला। उनको मैंने आज तक नहीं देखा यह सोचते हुए कि कौन अपना है या कौन पराया...। जो भी मिला, सबको आदर, सबको सम्मान और सबको अपना समझा। किसी का दर्द देख लिया, तो वह बर्दाश्त नहीं कर पायेंगी और उनके पास जो भी कुछ होगा...वह मदद करने के लिए आगे निकल पड़ेंगी...सबका दर्द बांटा...पर इनका दर्द आज तक किसी ने बांटने की कोशिश नहीं की...ईश्वर इनकी बराबर परीक्षा लेता है...और मैं जानता हूं कि ये सारी परीक्षा में उत्तीर्ण होती रहती है...
5. दयामणि बारला – एक आदिवासी महिला, क्रांतिकारी महिला, जिनका जीवन ही संघर्ष के लिए बना है...कोई समझौता नहीं...केवल एक ही लक्ष्य, कहीं भी गरीबों के उपर किसी का जुल्म बढ़ा...ये सदैव आगे रहती है...हालांकि कई लोगों ने इनकी भावनाओं का गलत दोहन किया...पर वह इस पर ध्यान नहीं देती...वो सिर्फ अपने काम पर ध्यान देती है...।
6. रसना मरांडी – धनबाद की आदिवासी छात्रा, एनसीसी कैडेट्स – जिसने भारतीय वायुसेना के एएन32 विमान से हजारों मील दूर आकाश से चार बार छलांग लगायी यानी झारखण्ड की पहली महिला कैडेट, जिसे राज्य सरकार ने आज तक सम्मान नहीं दिया...जब मैं ईटीवी में था, तो इस महान बालिका पर एक समाचार भी बनाया था...उस वक्त के एनसीसी आफिसर कर्नल दीक्षित ने कहा था – मिश्रा जी मिलिये...झारखण्ड की महान आदिवासी बालिका से जिसने भारतीय वायुसेना के एएन32 विमान से अभूतपूर्व कारनामा कर दिखाया...

 7. डा. शिवानी झा - कतरास धनबाद की चर्चित महिला डाक्टर, सेवा भाव इतना कि पूछिये मत...कई बार स्थानीय विधायक द्वारा उन्हें धमकी दी गयी, पर वो अपने सेवा भाव से तनिक भी विचलित नहीं हुई...आज भी इनके यहां वंचितों, उपेक्षितों व आर्थिक रुप से बहुत ही कमजोर गरीब मरीज आते है और ये उन पर समान रुप से प्रेम लुटाती है, सेवा करती है...
8. डा. लीना सिंह - धनबाद में रहती है...एक आदर्श महिला डाक्टर...जिन्हें अपने आदर्शवादिता और भारतीय संस्कृति पर नाज है...ये गर्व से कहती है कि हमें भारतीय होने पर और खासकर भारतीय मूल्यों के साथ जीने में बहुत ही आनन्द आता हैं...साथ ही ये अन्य लोगों से भी अपने भारतीय मूल्यों के साथ जीने का अनुरोध करती है...

Friday, February 26, 2016

क्या आप जानते हैं..............

क्या आप जानते है, कि भारत में कौन सा अखबार या चैनल किस पार्टी या दल का आरती उतारता है/या भोपू है...गर नहीं जानते तो आज ही जानिये...ये देश के लिए और आपके लिए अत्यंत आवश्यक है....
जानिये अपने अखबारों और चैनलों को, वे कितने गिरे हुए हैं और किस पार्टी/दल की भक्ति में लग कर, भारत की एकता व अखंडता को चोट पहुंचा रहे हैं, अपने बच्चों को भी बताइये...क्योंकि ये बच्चे बहुत ही कोमल है, जो आज सीखेंगे, वहीं युवा होकर देश को देंगे...बच्चों पर किसी भी दल के विचार को मत थोपिये, उन्हें जो अच्छा लगे, करने दें, बस उनका मार्गदर्शन करते रहे...उन्हें वामपंथी बनना है, या दक्षिणपंथी बनना है, या विशुद्ध रुप से मानवीय मूल्यों को आत्मसात करना है...उन्हें इसकी खुली छूट दीजिये...हालांकि वामपंथी गुंडों का एक दल नहीं चाहता कि देश में समरसता रहे, इसके लिए हर प्रकार के छल -प्रपंच का वो शुरुआत कर चुका है...उसके बाद भी अब देखिये....
1. हिन्दुस्तान - ये अखबार अपने स्थापना काल से कांग्रेस प्रेम के लिए प्रसिद्ध है, ये आज भी कांग्रेस का गुण गाता है...उदाहरण 25 फरवरी का अखबार देख लीजिये... ज्यादातर अखबार स्मृति ईरानी के धुंआधार भाषण से पटा है, पर ये ज्योतिर्दित्य सिंधिया में देश ढूंढ रहा है...इसके मालिक कई बार कांग्रेस से उपकृत होकर राज्यसभा सदस्य भी बन चुके है...इसलिए कांग्रेस इसकी पहली पसंद और दूसरे में नीतीश और लालू को ये अपना सब कुछ समझता है...
2. प्रभात खबर - ये अखबार जदयू का खास अखबार है... इसे नीतीश कुमार में भगवान नजर आता है...इसका प्रधान संपादक हाल ही में जदयू का सांसद बना है...इसके अखबारों में जदयू के नेताओं व सांसदों के वैचारिक आलेख खुब छपते है, फिलहाल लालू व राहुल भक्ति में आकंठ डूबा है, भाजपा से इसकी नहीं पटती...
3. दैनिक जागरण - विशुद्ध रुप से भाजपाई अखबार है, इसके मालिक भाजपा से उपकृत होकर कभी सांसद भी बन चुके है...ये भाजपा के खिलाफ सुनने को तैयार नहीं, पूर्णतः पत्रकारिता को व्यवसाय मानकर ये चलता है...मिशन इसके लिए कुछ भी नहीं....
4. दैनिक भास्कर - ये अखबार पूर्णतः कांग्रेस और भाजपा का सम्मिश्रण है...समयानुसार कभी मिशन तो कभी व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाता है...इसके लिए अखबार ही सब कुछ है...जनता का मिजाज भांपता है, वहीं दृष्टिकोण अपनाता है...यानी जस जैसा, तस तैसा...हर जगह इसकी पकड़ है, हर वर्ग के नेताओं की यह जय जय करता है, ताकि जब कभी किसी की सत्ता आये तो उसका व्यवसायिक लाभ ये उठा सकें...

5. बीबीसी - इसका सारा समाचार भारत विरोध से शुरु होता है और भारत विरोध पर ही खत्म हो जाता है....
6. द टेलीग्राफ - कट्टर वामपंथ समर्थक...
7. द टाइम्स आफ इंडिया - कांग्रेस और वामपंथ समर्थक....
8. हिन्दुस्तान टाइम्स - कट्टर कांग्रेस समर्थक...
9. हिन्दु - कट्टर भाजपा आलोचक/वामपंथ समर्थक...
7. आनन्द बाजार पत्रिका - कट्टर वामपंथ समर्थक....
8. एनडीटीवी - कट्टर भाजपा आलोचक, इसका वश चले तो भाजपाइयों को देखते ही गोली मार दें...कट्टर वामपंथी....उसका उदाहरण देख लीजिये...24 फरवरी को स्मृति ईरानी संसद में विपक्षी दलों का जवाब दे रही थी...भाजपा के कट्टर विरोधी होने के कारण ये स्मृति ईरानी का लाइभ की जगह इंटरनेशनल एजेंडा दिखा रहा था, जबकि सारे चैनल अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर स्मृति ईरानी का लाइभ दिखा रहे थे...देश में किसानों ने आत्महत्या की...देश में भ्रष्टाचार का कई मुद्दा छाया रहा, जिससे देश के सम्मान में बट्टा लगा...इसे शर्म नहीं आयी...पर जैसे ही एक कन्हैया की गिरफ्तारी हुई...इसने भाजपा विरोध के नाम पर, वामपंथियो के समर्थन के नाम पर अपना मुंह काला करते हुए अपना प्रसारण कुछ समय के लिए ब्लैक कर दिया...इसका एकमात्र सिद्धांत वामपंथ को भारत में स्थापित करना और दिल्ली के लाल किले पर लाल झंडा लहराता हुआ देखना है....
9. आजतक - कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समर्थक....
10. एबीपी - कट्टर कांग्रेसी और वामपंथी समर्थक...
11. आईबीएऩ 7 - भाजपा समर्थक...
12. टाइम्स नाउ - न्यूट्रल....
13. जीटीवी - विशुद्ध भाजपाई....
14. ईटीवी - इन दिनों भाजपा के समर्थन में....
15. इंडिया टीवी - भाजपा समर्थक...
जो देश में रहकर, देश के लिए पत्रकारिता नहीं करता हो...वो ज्यादा देशद्रोही है...जो एक दल के प्रति समर्पित रहता है...वो ज्यादा देशद्रोही है...पत्रकार किसी दल का नहीं होता...अखबार/चैनल किसी दल का नहीं होता...उसे तो पूर्णतः निरपेक्ष होते हुए, सत्य का आश्रय लेना चाहिए...पर यहां तो कोई भाजपाई तो कोई कांग्रेसी तो कोई वामपंथी पायजामा पहन कर दिये जा रहा है....ऐसे लोगों की हम कड़ी भर्त्सना करते हैं.....