Sunday, February 21, 2016

एनडीटीवी ने अपना नकाब उतारा.........

भारतीय संस्कृति में एक वाक्य बार-बार सुनने को मिलता है...
जो होता है, अच्छे के लिए होता है...
जेएनयू की घटना ने भी बहुत सारे लोगों के चेहरे पर से नकाब उठा दिया है...
नकाब उठने के बाद, क्या होता है...आप सभी जानते है , फिर सामने वाले से शर्म और हया सब खत्म...
एनडीटीवी ने स्पष्ट कर दिया कि वह विशुद्ध रुप से वामपंथी है...न तो उसे कांग्रेस से मतलब है और न ही भाजपा या उसके अन्य आनुषांगिक संगठन से...
उसने यह भी दावा ठोक दिया कि जो वामपंथ से टकरायेगा तो फिर एनडीटीवी भी उसे नहीं छोड़ पायेगा...
ऐसे तो सारा बुद्धिजीवी वर्ग जानता था कि ये चैनल वामपंथी चैनल है, पर सामान्य जनता नहीं जानती थी, आज सामान्य जनता जान गयी है...
वो अगर सारे चैनलों की सूची बनायी है कि कौन चैनल किस पार्टी का भोंपू है,तो एनडीटीवी के लिए भी उसने सूची दर्ज कर ली कि ये विशुद्ध वामपंथी चैनल है...
इसका भी मकसद कश्मीर को पाकिस्तान के हाथों सौंप देना, अमरीका को साम्राज्यवादी बताना और चीन को अपना दोस्त बताना, हिन्दूओं को गाली देने का तो उसकी पुरानी आदत है, जरा देखिये एनडीटीवी के संपादक ने क्या शिगुफा छोड़ा है, जिस शिगुफे को आजकल वामपंथी नेता छाती से लगाकर फेसबुक पर शेयर किये जा रहे है...वो है...
एनडीटीवी इंडिया के संपादक ऑनिंद्यो चक्रवर्ती के मुताबिक यह जेएनयू बनाम जनेऊ की लड़ाई है...ये महापंडित ऑनिंद्यो चक्रवर्ती, तोगड़िया टाइप भाषण तो लिख दिया पर उसे पता हैं कि गांव में रहनेवाले उन लाखों गरीबों पर क्या गुजरेगी...जब उसके इस भाषण टाइप का इस्तेमाल करना वामपंथी गुंडे शुरु कर देंगे...
जैसा कि केरल के कन्नूर जिले में हुआ वामपंथी गुंडों ने सुजीत की हत्या उसके माता-पिता के सामने ही निर्ममता से कर दी...
ऐसे हम आपको बता दें कि एनडीटीवी के भी कई संवाददाता और कैमरामैन कोई दुध के धुले नहीं, बल्कि ये भी एक नंबर के बदमाश है...और इसकी जानकारी प्राप्त करनी हो तो हमसे संपर्क करें...हम आपको प्रमाण के साथ बतायेंगे...

Tuesday, February 16, 2016

बाकी सब गधे हैं...........

दुनिया में एक नई जाति व एक नये संप्रदाय का जन्म हुआ है जो खुद को सर्वाधिक एकमात्र बुद्धिमान जाति व संप्रदाय समझता है, जिसे वामपंथी कहते है...इन वामपंथियों के अनुसार दुनिया की सारी बुद्धि उनके गुलाम है...ये कुछ भी कहे,करे...जायज है...इनका विरोध या इनके खिलाफ कुछ भी कहने का किसी को अधिकार नहीं...इनके अनुसार वामपंथी सर्व गुण संपन्न...बाकी सब गधे है...इन्हें हर प्रकार की छूट मिल जानी चाहिए...देश के खिलाफ बोलने की...देश की बखिया उधेड़ देने की...हराम की कमाई और हराम की पढ़ाई करने के छूट की...ताकि ये सब को जी भरकर गरिया सकें...इन वामपंथियों के भजन कीर्तन मंडली में कांग्रेस का पप्पू राहुल, बिहार में गुंडागर्दी-बेहयाई को पुनर्स्थापित करनेवाले नीतीश, देश में एकमात्र ईमानदारी के भूत को अपने शरीर में डालनेवाले केजरीवाल शामिल हैं...अभी - अभी पता चला कि कोई प्रशांत भूषण, देशद्रोह का मुकदमा झेल रहे कन्हैंया का केस लड़ेगा...ये वहीं प्रशांत भूषण है, जो कई बार कश्मीर पर अपने बयानों को लेकर विवादों में रहा है, जो कहता है कि कश्मीर भारत का अंग नहीं हैं, जिसे लेकर उसकी कई बार पिटाई भी हो चुकी है...यानी देश के खिलाफ सारे के सारे घटियास्तर के लोग एक हो गये है...इन्होंने संकल्प कर रखा है कि इसी बहाने हम कश्मीर पाकिस्तान को सौंपेंगे, कश्मीरी अलगाववादी ताकतों और आतंकियों को हर संभव मदद करेंगे और भारतीय सेना का मनोबल तोड़ेंगे, साथ ही आतंकियों का सामना कर रहे कश्मीरी हिन्दूओं को एक - एक कर कश्मीर से निकाल कर रहेंगे...ये हैं हमारा देश...ये हैं हमारे देश के घटियास्तर के नेता...भारत का तो इतिहास ही रहा है कि यहां देश भक्त कम और गद्दारों-देशद्रोहियों की संख्या अत्यधिक रही हैं...तभी तो ये देश हजारों वर्षों तक गुलाम रहा...
जरा झलक देखिये...
1. पृथ्वी राज चौहान जब मुहम्मद गोरी का मुकाबला कर रहा था तो जयचंद, मुहम्मद गोरी का समर्थन कर रहा था...
2. बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए राणा सांगा ने पत्र लिखा था।
3. जब अकबर के खिलाफ महाराणा युद्ध लड़ रहे थे तो मान सिंह अकबर के साथ रिश्तेदारी में जुटा था।
4. जब रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों को धूल चटा रही थी, तब सिंधिया परिवार अंग्रेजों के साथ मित्रता निभा रहा था...तभी तो सुप्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा - अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी, खुब लड़ी मर्दानी वो तो........
5.जब भगत सिंह देश में क्रांति का बीज बो रहे थे, तो उनके खिलाफ अदालत में गवाही देनेवाला शोभा सिंह आ खड़ा हुआ था...
6. जब महात्मा गांधी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ किया, तो वामपंथियों ने महात्मा गांधी का साथ नहीं दिया...
7. इंदिरा गांधी ने जब 1975 में आपातकाल की घोषणा की तब उसके खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश ने आंदोलन चलाया,सारी जनता लोकनायक के साथ थी, पर वामपंथी इंदिरा के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे...
एेसे कई उदाहरण मेरे पास है...जिससे पता चलता है कि हमारे देश में शुरु से ही गद्दारों की फौज चलती रही है...जो देश के लिए मरनेवालों के खिलाफ आंदोलनरत रहती हैं, ज्यादातर मामलों में ये गद्दार कामयाब हो जाते है...जैसा कि उपर के झलकियों से पता लग जाता है...और एक बार जेएनयू के मामले में भी ऐसा ही दीख रहा हैं, अब देखना ये है कि इस बार देशभक्त जीतते हैं या देश के गद्दार...

Thursday, February 11, 2016

पैसे से कलम सधे,पैसा बावन बीर...........

हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
संपूर्ण समाज और व्यवस्था को चौपट करके रख देनेवाला और प्रतिदिन अपने कारगुजारियों से सामाजिक व्यवस्था को चोट पहुंचानेवाला रांची के एक अखबार का संपादक आज विनय महतो प्रकरण पर त्वरित टिप्पणी के नाम पर प्रवचन लिख रहा है...
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
रांची पुलिस लगता है कि मुंबईया फिल्म ज्यादा देखती है, जरा ध्यान दीजिये फिल्म - हेट स्टोरी 3 और फिल्म - दृश्यम्, इन दोनों की कहानियां के कुछ प्रमुख अंश, आपको विनय महतो प्रकरण में भी मिल जायेंगे...
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
विनय महतो प्रकरण में छह दिनों तक अखबारबाजी और चैनलबाजी होती रही, पर इतने महत्वपूर्ण विषय पर न तो भाजपा, न ही कांग्रेस, न ही झामुमो, न ही आजसू, न ही राजद, न ही झाविमो, न ही भाकपा, न ही माकपा, न ही भाकपा माले के किसी बड़े नेता के बयान आये, सभी ने होठ सील रखे थे, हमें लगता है कि इस पर ज्यादा कुछ लिखने की जरुरत नहीं, आप सभी बुद्धिमान है, समझ लीजिये...
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
ध्यान दीजिये, विनय महतो दुनिया से चला गया, पर रांची पुलिस ने ऐसा तरीका निकाला कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। यानी सफायर इंटरनेशनल स्कूल में लग रहे दाग को भी रांची पुलिस ने बचा लिया, जो उसकी प्राथमिकता में थी, जो विनय महतो हत्याकांड प्रकरण में पकड़े गये, जिन पर आरोप है, वे भी जल्दी ही कानूनी पचड़ें से मुक्त हो जायेंगे, क्योंकि हत्याकांड में दो आरोपी नाबालिग है, ऐसे में इन पर जुवेनाइल के तहत मामला चलेगा, जिसमें ज्यादा दिन और कड़ी सजा मिलनी मुश्किल है। शिक्षिका के पति आरिफ पर सबूत मिटाने का आरोप है, जो घटनास्थल पर था ही नहीं, इसी प्रकार का आरोप शिक्षिका नाजिया पर है, यानी हत्या का सीधा मामला नहीं और पूरा परिवार कुछ ही सालों बाद आरोप से मुक्त और लीजिये सारा मामला टायं-टायं फिस्स। सचमुच पैसे में बहुत ताकत होती है...
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
पैसे होने पर नेताओं की बोली बंद हो जाती है, पैसे होने पर पुलिस भी आपके समक्ष रामायण गाती है, पैसे होने पर पत्रकारों की टीम भी विज्ञापन धर्म निभाते हुए, आपकी आरती गाती है...
इसलिए, मैं कहता हूं -
पैसा में गुण बहुत है, सदा कमाओ वीर।
क्योंकि पैसा है तो सब है, खाएं मक्खन वीर।।
पैसा से नेता सधे, पैसे से वर्दी चीर।
पैसे से कलम सधे,पैसा बावन बीर।।

Sunday, January 17, 2016

प्रभात खबर की गलथेथरई.......

अमर शहीद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पवित्र मिट्टी झारखण्ड पहुंच चुकी है। 44 साल बाद अपने वीर सैनिक की मिट्टी को देख सभी अभिभूत है, सभी ने मिलकर स्वागत किया है। राज्य के सारे अखबार (प्रभात खबर को छोड़कर) प्रसन्न है, इस अवसर पर विशेष पृष्ठ दिये है। राज्य सरकार के अधिकारी व राज्य सरकार संतुष्ट है, जिसने अपना पति गवांया, वो बलमदीना खुशी से फूली नहीं समा रही, अलबर्ट एक्का का सारा परिवार आनन्दित है, जो लोग मिट्टी लाने के लिए त्रिपुरा गये थे, उस टीम में शामिल सभी लोगों की आंखे, इस खुशी के पल को देखकर छलक रही हैं पर प्रभात खबर को प्रमाणिक दस्तावेज चाहिए कि ये जो मिट्टी आयी है, उसका क्या सबूत है कि ये मिट्टी अलबर्ट एक्का की ही है...
प्रभात खबर ने टीम में शामिल एक सदस्य से ऐसे – ऐसे सवाल पूछे है, जिसे पढ़कर आपको उस अखबार की घटिया मानसिकता का पता चल जायेगा...
अखबार ने बलमदीना के आंचल में पड़े शहीद की मिट्टी के प्रमाणिक दस्तावेज के बारे में पूछा है...
जबकि सारे लोग जानते है, वो अखबार खुद जानता है कि जहां युद्ध होते है, वहां वीरों के शव को किस प्रकार सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाता है, पर प्रभात खबर को दस्तावेज चाहिए...
जबकि वो अखबार अच्छी तरह जानता है कि ढुलकी गांव के सारे लोग, वो व्यक्ति भुवन दास जिसने वीरों के शव को दफनाया था, कहा है कि यहीं वह जगह हैं, जहां उसने दफनाया था, जहां आज एक मकान बन गया है, जो मकान गोपाल चंद्र दास का है, गोपाल चंद्र दास अपने मकान के आंगन को खुद ही अपने हाथों से खोद डालते है और विन्सेंट एक्का अपनी मां के आंचल में वो पवित्र मिट्टी डाल देता है...इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है...
और जो प्रभात खबर मिट्टी मंगवाया था, वहां से 100 मीटर की दूरी से लाई गयी मिट्टी थी...यानी गलत पर गलत प्रभात खबर किये जा रहा है और ढिठई से खुद को औरो से बेहतर बताने की असफल कोशिश किये जा रहा है। जिसके कारण उसकी लगातार जगहंसाई होती जा रही है...
पर बेशर्म को शर्म कहां...वाली कहावत बार बार उसके साथ चरितार्थ हो रही है...
आज एक बार फिर दैनिक भास्कर ने प्रभात खबर की पत्रकारिता पर ही सवाल उठा दिया है, जो सही भी है...
प्रभात खबर बताये कि क्या एक शहीद की मिट्टी इसी तरह लायी जाती है, जैसा कि उसने लाकर किया...अरे एक सामान्य व्यक्ति की मौत हो जाने पर भी उसके परिवार वाले भी उसके मिट्टी को इस प्रकार नहीं लाते और न ले जाते है, जैसा कि प्रभात खबर ने किया...प्रभात खबर को इस कुकर्म के लिए अविलम्ब सारे झारखण्डवासियों से माफी मांगनी चाहिए...पर वो माफी क्यूं मांगेगा, उसे तो लगता है कि दुनिया की सारी अच्छाइयां उसी में समायी हुई है...
जरा प्रभात खबर से पूछिये कि 3 दिसम्बर को उसी के द्वारा आयोजित रथ को रांची के अलबर्ट एक्का चौक से प्रस्थान करने वक्त उसके कितने लोग मौजूद थे...वो तो पुष्प वृष्टि कराने का निवेदन भी किया था...पर निवेदक की पूरी टीम पुष्पवृष्टि के समय ही गायब थी, जिसका वर्णन में पूर्व के एपिसोड में कर चुका हूं...
चलिए...अब तो जगजाहिर हो चुका है...कि प्रभात खबर क्या है? उसे गलथेथरई करने दीजिये...क्योंकि गलथेथरई में उसे महारत हासिल है...
प्रभात खबर ने ओछेपन में सवाल भी दागे है, वो क्या है, जरा देखिये...
प्रभात खबर के अनुसार...
अनुत्तरित सवाल
रतन तिर्की ने 30 नवंबर को संवाददाता सम्मेलन कर मिट्टी पर सवाल उठाते हुए मिट्टी की जांच की मांग की थी, तो क्या इस बार मिट्टी की जांच कर उसे लाया गया है. क्या यह संभव है कि जमीन से छह-आठ फीट खुदाई कर मिट्टी ली जाये.
अंतत:
प्रभात खबर का मानना है कि ऐसे सवालों का कोई अंत नहीं है. यह पवित्र मिट्टी है. जिसमें अलबर्ट एक्का के परिवार की आस्था हो, जो वे चाहते हैं, वही होना चाहिए, राजनीति नहीं. बेहतर है सब मिट्टी मिला कर उनके गांव में समाधि बने, ताकि परमवीर अलबर्ट एक्का के प्रति श्रद्धा और बढ़े.
प्रभात खबर को हमारा जवाब...
रतन तिर्की ने 30 नवंबर को संवाददाता सम्मेलन कर, प्रभात खबर द्वारा लायी गयी मिट्टी पर सवाल उठाकर, जांच की मांग कर यह पूछने की कोशिश की थी कि आखिर कैसे ये मान लिया जाय कि ये जो मिट्टी लाई गयी है, वो अलबर्ट एक्का की कब्र की है, इसका उत्तर उस वक्त न तो प्रभात खबर के पास था और न ही अन्य के पास...
लेकिन आज जो मिट्टी आयी उसका जवाब सभी के पास है...
वो व्यक्ति जिसने दफनाया यानी भुवन दास साफ बताया कि गोपाल चंद्र दास का जहां मकान बना है, वहीं दफनाया गया और डेढ़ महीने जो पहले मिट्टी लाई गयी थी, वो उस जगह की है ही नहीं...तो फिर ये अनुत्तरित सवाल कैसे रहा...ये तो वहीं बात हुई कि रस्सी जल गई पर बल नहीं गया...
अंततः अरे जब बलमदीना संतुष्ट है, पूरा झारखण्ड संतुष्ट है तो प्रभात खबर के चीखने – चिल्लाने से क्या होगा? उसके चीखने – चिल्लाने से झूठ सच थोड़े ही हो जायेगा...चीखते रहो भाई प्रभात खबर...
इतिहास लिखा गया...
कि 44 साल बाद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की मिट्टी 16 जनवरी 2016 को रांची लाई गयी थी, जिसका सभी ने शानदार स्वागत किया और प्रभात खबर ने परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के मिट्टी लाने के नाम पर डेढ़ माह पहले झारखण्ड की जनता की आंखों में धूल झोकने की कोशिश की थी, जिस पर परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना ने सदा के लिए विराम लगा दिया।
ये घटना उन पत्रकारों और अखबारों के लिए सबक भी है, जो खुद को सर्वश्रेष्ठ बनाने के चक्कर में गलत पर गलत करते चले जाते है...प्रभात खबर को मानना होगा कि उसने अलबर्ट एक्का की मिट्टी लाने के प्रकरण पर अपनी सारी प्रतिष्ठा पूरी तरह से गंवा चुकी है...

Saturday, January 16, 2016

प्रभात खबर की हालत पस्त, बलमदीना का अभुतपूर्व स्वागत अर्थात् अलबर्ट एक्का को हृदय से सम्मान...

आज रांची से प्रकाशित होनेवाले प्रभात खबर को छोड़कर सभी अखबारों ने हृदय को आह्लादित व भावविभोर कर देनेवाली खबर, प्रथम पृष्ठ पर छापी है। खबर है – 44 साल बाद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना, वीर शहीद की मिट्टी ला रही है। रांची के कई सामाजिक संगठनों ने उक्त मिट्टी का तहेदिल से स्वागत करने का फैसला ही नहीं लिया, बल्कि स्वागत करने के लिए निकल पड़े है, भारतीय सेना का तो जवाब ही नहीं, त्रिपुरा में जिस प्रकार से भारतीय सेना ने बलमदीना और उनके साथ गयी टीम का स्वागत किया। वह अदभुत है। बलमदीना का तो त्रिपुरा के मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने जिस प्रकार से स्वागत किया। उस स्वागत के संस्मरण से आज प्रभात खबर को छोड़कर सारे अखबार पटे हुए है, पर प्रभात खबर में इस खबर को वो तवज्जो नहीं मिली है। शायद प्रभात खबर को लगता है कि यह खबर उनके लिए उतनी कोई मायने नहीं रखती। मायने रखेंगी भी कैसे?, क्योंकि उसे लगता है कि गर ये खबर छापेंगे तो उसकी पोल खुल जायेंगी, जबकि सच्चाई ये है कि प्रभात खबर ये खबर छापे या न छापे, उसकी पोल व कलई एक तरह से झारखण्ड की समस्त जनता के सामने खुल गयी है कि वो कैसा अखबार है?
हम आपको बता दें कि जिस प्रकार का घमंड आज प्रभात खबर ने पाल रखा है, ठीक इसी प्रकार का घमंड कभी बिहार से प्रकाशित होनेवाली अखबार आर्यावर्त को भी था, पर आज आर्यावर्त कहां चला गया, सभी को पता है। हम आज दावे के साथ कह सकते है कि जिस प्रकार आर्यावर्त अखबार का सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया, ठीक इसी प्रकार प्रभात खबर का भी सूर्य अब सदा के लिए अस्त होने चला है...
हम इस अवसर पर दैनिक भास्कर अखबार का तहेदिल से स्वागत करना चाहेंगे, जिसने शुरुआत से ही प्रभात खबर की झूठी खबर और उसकी ढोंग का वो आपरेशन किया, जिस आपरेशन से प्रभात खबर की बची-खुची सम्मान भी समाप्त हो गयी। प्रभात खबर ने परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के नाम पर 3 दिसम्बर 2015 को किस प्रकार का ढोंग व पाखंड किया। उस ढोंग व पाखंड को मैंने भी उजागर किया था। इसे आप मेरे ही फेसबुक पर या www.vidrohi24.blogspot.in पर पढ़ या देख सकते है। अब तो एक तरह से स्पष्ट हो गया कि प्रभात खबर ने अमर शहीद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के नाम पर किस प्रकार झारखण्ड के लोगों का भावनात्मक शोषण किया और अमर शहीद का अपमान किया। सवाल एक बार फिर क्या प्रभात खबर को उसके इस हरकत के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए? इस सवाल पर मेरा उत्तर होगा – इसकी सजा, उसे ईश्वर देगा, जो उसकी सजा पर निर्णय कब का सुना चुका है।
हम तहेदिल से मुख्यमंत्री रघुवर दास का भी अभिनन्दन करना चाहेंगे, जिन्होंने प्रभात खबर की बातों में न आकर, बिना देर किये, त्वरित निर्णय लिया और अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना की भावनाओं का कद्र करते हुए, एक टीम गठित कर, वो कर दिखाया कि आज दूध का दूध, पानी का पानी हो गया। ऐसे ही मुख्यमंत्री की झारखण्ड को जरुरत है, जो अखबार के इशारों पर न चलकर, स्वविवेकानुसार निर्णय करता है, यहीं नहीं अमर शहीद के परिवारों का सम्मान ही नहीं, बल्कि उसके आदेश को सर माथे लगाता है...
रघुवर दास जी, सचमुच आप प्रशंसा के पात्र है...
आपने वो कार्य कर दिखाया, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती...
आपने एक अखबार के ढोंग व पाखंड को भी उजागर कर दिया...
सही मायनों में आपने झारखण्ड का सम्मान रखा है...
उन वीर पुत्रों की मां, पत्नियां, बेटे- बेटियां आपको जरुर दुआएं देंगी, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व खो दिया...
या देश के लिए आज भी सर्वस्व खोने को तैयार हैं...

Wednesday, January 13, 2016

ऐसे ही युवा मंत्री की झारखण्ड को जरुरत है......

ऐसे ही युवा मंत्री की झारखण्ड को जरुरत है...
जो इसकी परवाह नहीं करें कि उसका भाषण सुननेवालों की संख्या कितनी है...
या हैं भी या नहीं...
वो डंके की चोट पर अपने इरादे को स्पष्ट रुप से रखे...
और वहीं करें, जिसका संकल्प लेकर वो घर से निकला है...
आज सुबह – सुबह एक अखबार पर नजर पड़ी है, प्रथम पृष्ठ पर राज्य के पर्यटन मंत्री अमर कुमार बाउरी का भाषण देते हुए तस्वीर है, जिसमें दिखाया गया है कि अमर कुमार बाउरी भाषण दे रहे हैं, पर उन्हें सुननेवाला कोई नहीं...
मेरा मानना है,
कि हम भारत में रहते हैं...
भारत के शब्द है ये, जो कहते है कि आप को जो करना है, करो...
क्योंकि सुक्ष्मावस्था में बहुत सारे ऐसे जीव है, जो आपको देख व सुन रहे है...
बधाई अमर कुमार बाउरी जी, आपने वो कर दिखाया, जो बहुत कम ही लोग करते है...
दूसरा नेता रहता या उस अखबार का ही कोई प्रतिनिधि होता तो भाग खड़ा होता...यह कहकर कि यहां तो कोई हैं ही नहीं, तो भाषण किसको सुनाऊँ...
खैर,
इसी घटना को देख व सुनकर मुझे ईटीवी धनबाद याद आ गया...। जब मैं ईटीवी धनबाद कार्यालय में कार्यरत था, तब उसी दौरान ईटीवी हैदराबाद मुख्यालय से एंटी टूबैको कंपेन चलाने को कहा गया। संभवतः जून का महीना था, जिस दिन से एंटी टूबैको कंपेन चलना था, संयोग से ठीक उसके एक दिन पहले विश्व हिन्दू परिषद ने भारत बंद का ऐलान कर दिया। हैदराबाद से फोन आया कि चूंकि विश्व हिन्दू परिषद ने भारत बंद का ऐलान कर दिया है, इसलिए एंटी टूबैको कंपेन दूसरे दिन से चलाया जायेगा। मैंने तुरंत सवाल खड़ा किया कि घर में शादी- विवाह होता, और उसी दिन कोई संगठन बंद का कॉल कर देता तो क्या आनन-फानन में शादी – विवाह का दिन भी बदल जाता क्या? हैदराबाद वालों ने कहा कि आप पूर्व निर्धारित तिथि अनुसार कार्य करें, बाकी जगहों पर एक दिन बाद शुरु होगा और मैंने पूर्व निर्धारित तिथि और समयानुसार कार्यक्रम को संपन्न कराया। कहीं कोई दिक्कत नहीं। जिनको भारत बंद करना था, वे भारत बंद किये और हमें एंटी टूबैको कंपेन चलाना था, मैंने एंटी टूबैको कंपेन चलाया। इसी बीच इस कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए, हमें एक आदमी की तलाश थी, जिसने कभी टूबैको को यूज नहीं किया हो। संयोग से पता चला कि धनबाद रेल मंडल के तत्कालीन मंडल रेल प्रबंधक अम्बरीश कुमार गुप्ता इन सबसे वंचित है। मैने उनसे उद्घाटन के लिए आग्रह किया, मेरे आग्रह को स्वीकार करते हुए, वे ठीक समय पर पहुंचे। उस वक्त भी मेरे उद्घाटन कार्यक्रम के समय एक भी व्यक्ति मौजूद नहीं था, फिर भी चूंकि समय निर्धारित था, मैंने बिना किसी के परवाह किये, कार्यक्रम का उद्घाटन करवाया, क्योंकि मैं जानता था कि समय का क्या महत्व है?
और ऐसे भी, कोई रहे या न रहे...आप जो करने जा रहे है, उसकी धमक जहां तक पहुंचनी है, पहुंचेगी ही, गर आपका चरित्र और लक्ष्य सही है, लीजिये और हम इसमें कामयाब भी हुए।
इस कार्यक्रम को संपन्न कराने में जिन्होंने हमारी दिल से मदद की, उन्हें मैं भूल नहीं सकता। वे थे जगदीश राव, जो आजकल वाराणसी में हैं और दूसरे रहमान भाई जो धनबाद क्रिकेट से जूड़े है...सचमुच आप दोनों एक बार फिर याद आ गये...मैं आप दोनों को भूल नहीं सकता, भाई।

Monday, January 11, 2016

जब भी “हिन्दुस्तान” और “दैनिक जागरण” अखबार......

जब भी “हिन्दुस्तान” और “दैनिक जागरण” अखबार देखता हूं, तो हृदय पुलकित हो जाता है, साथ ही इस अखबार के दिल्ली से लेकर रांची तक के संपादकों को हृदय से आभार व्यक्त करने का दिल करता है...
क्योंकि एकमात्र यहीं दोनों अखबार है, जो युवाओं के लिए प्रेरणापुंज हैं...
युवाओं के लिंग कैसे बढ़े?, उनके लिंग में कैसे जोश आये?, इस पर नाना प्रकार के विज्ञापन ये दोनों अखबार प्रत्येक दिन प्रकाशित करते हैं...
जापानी तेल से लेकर लिंगवर्द्ध यंत्र तक के विज्ञापन इनके पास है...बस इनके अखबार पढ़िये और अपने लिंग में आज ही जोश भरिये या लिंग इतना बड़ा कर लीजिये कि आपको देखकर कोई कहे, वाह क्या इनका लिंग है?
ज्यादा जानकारी के लीजिए आज का ही “दैनिक जागरण” का पृष्ठ संख्या 10 वर्गीकृत और पृष्ठ संख्या 15 पर नजर दौड़ाइये और “हिन्दुस्तान” का वर्गीकृत पृष्ठ संख्या 8 और पृष्ठ संख्या 15 देख लीजिये...गर आपकी सेक्स संबंधी सारी समस्याओँ का समाधान नहीं हो गया तो फिर कहियेगा...हां जब सेक्स संबंधी सारी समस्याएं समाप्त हो जाये तो एक धन्यवाद संबंधित पोस्टकार्ड इन संपादकों को जरुर भेजिये...ताकि वे इस प्रकार का विज्ञापन और दूगुने उत्साह से छाप कर अपने कोषागार को और समृद्ध कर सकें और युवाओं का सही मार्गदर्शन कर सकें...और जिनका इस विज्ञापन से भला नहीं हुआ या जिन्हें लगता है कि इससे समाज व देश को खतरा है, उनका रांची से प्रकाशित होनेवाले सभी अखबारों से कुछ सवाल...
क. आप हमें ये बताएं कि इस प्रकार के विज्ञापन से आप समाज को क्या दे रहे हैं?
ख. क्या आपका सामाजिक दायित्व नहीं बनता?
ग. क्या आप समाज व देश से बड़े हैं?
घ. क्या आपको कोई पैसे देगा और उसके लालच में आप सामाजिक मर्यादा को तार – तार कर देंगे?
ङ. क्या आपको मालूम नहीं कि जब सबेरा होता है तो ये अखबार नन्हें- मुन्नों के हाथों में भी पहुंचते हैं? ऐसे में आप बताएं कि उनके मन पर इस प्रकार के विज्ञापन कैसा प्रभाव डालता होगा?
च. आपसे नम्र निवेदन, शर्म करिये और ऐसे विज्ञापनों से खुद को अलग करिये...क्योंकि ये मत भूलिये कि ये अखबार आपके बच्चों के हाथों में भी होता है। ये समाज व देश आपका भी हैं, इसका नमक खाया है तो इसका कर्ज अदा करिये?
पत्रकारिता देश हित में
लालच में पत्रकारिता नहीं...
देश हमारा, हम देश के
ये नारा कभी भूले नहीं...

Monday, January 4, 2016

वाह रे ढुलू, तेरी तो निकल पड़ी...............

आज रांची से प्रकाशित “प्रभात खबर” ने पृष्ठ संख्या 7 पर “ढुल्लू पर मुकदमा
वापसी के फैसले पर उठे सवाल” नामक शीर्षक से जो आलेख प्रकाशित करते हुए एक विशेष पेज दिया है। उनमें जितने भी सवाल उठाये गये। उन सवालों को मैंने अपने फेसबुक और ब्लॉग के माध्यम से 30 अक्टूबर को ही उठा दिया था, जो आज भी मेरे फेसबुक और ब्लाग www.vidrohi24.blogspot.in पर मौजूद है। मैंने 30 अक्टूबर को लिखा था “कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...
मनमुताबिक मंतव्य लेने के लिए, लोक अभियोजक का तबादला...
प्रभार लेने के पूर्व ही, सरकार के मनमुताबिक रिपोर्ट, धनबाद डीसी को भेजा ए के सिंह-2 ने...”
गर उस आलेख को ध्यान से देखें अथवा पढ़े तो सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा...
चलिये सवाल किसी ने भी उठाया हो, वो सवाल पहले उठाया गया अथवा बाद में...यह महत्वपूर्ण नहीं...
गर सवाल में ताकत है तो उसका जवाब सरकार की ओर से आनी ही चाहिए, क्योंकि सरकार ने कई बार कहा है कि वह भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड बनाना चाहती है...
अब सरकार ही बताये...
कि जो व्यक्ति अथवा विधायक
1. पुलिस की वर्दी फाड़ दे...
2. संभ्रांत नागरिकों को चोर – चुहाड़ बोले...
3. जिसके भय से डीएसपी कांपने लगे...
4. जिसके भय से बीसीसीएल के वरीय अधिकारी इस्तीफा देने की पेशकश करें...
5. जो स्थानीय पुलिस के समानान्तर एक टाइगर सेना बना लें...
6. जो अपने विरोधियों को भगवान के पास भेजने का बयान जारी करें...
और ऐसे लोगों को सरकार बचाने का प्रयास ही नहीं, बल्कि उसे बचा लें तो क्या ऐसे में झारखंड भ्रष्टाचार मुक्त बनेगा...

Wednesday, December 30, 2015

नया वर्ष अब आयेगा.............

नया वर्ष अब आयेगा
मुर्गा खूब कटायेगा...
बकरा पर बन आयेगा
न्यू इयर डे कहलायेगा...
एक दिन के लिए ही सही
सभी मस्त हो जायेगा...
कोई गरीब न रहेगा दुनिया में
सब टन टन हो जायेगा...
कंबल लेनेवाला और
कंबल देनेवाला...
एक ही होटल में बैठकर
साथ ही पैग बनायेगा...
ऐसा दिन देख के लोगों
जी मेरा भर जायेगा...
छोटे – छोटे कपड़ों में
डांस बार सज जायेगा...
एक ही नशा
नये साल का
ऐसा सब पर छा जायेगा...
एक ही रायफल से चलेगी गोली
धायं धायं हो जायेगा...
बुढ़ा-बुढ़िया जो ठंड कांप रहे
उसकी मस्ती चढ़ जायेगी...
होली आने में दो – तीन महीने
आज ही होली हो जायेगी...
कोई न होगा
छोटा बड़ा
सभी होंगे समान...
एक बोतल से दारु गटगट
सुबह होगी या शाम...
ऐसा ही भारत में
नया साल मनता है...
कौन कहता है
भूखा भारत
सभी झूठ कहता है...
अरे देखना है भारत की अमीरी
एक जनवरी को देखो...
सड़क पर ही नंगे हो गये
औरत-मर्द तुम देखो...

Tuesday, December 29, 2015

हेमंत का दिव्यज्ञान........

झारखण्ड का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य, यहां एक से बढ़कर एक नेता है...
जब ये सत्ता में रहते हैं तब इनका दिव्यज्ञान घास चरने चला जाता है और जब विपक्ष में होते है तब इनका दिव्यज्ञान पुनः इनके मनमस्तिष्क में दिव्यता के साथ आ धमकता है...फिर जब ये देना शुरु करते है तो जैसे लगता है कि दुनिया की सारी बुद्धि गर किसी के पास हैं तो इन्हीं के पास है...।
जरा देखिये आज के अखबारों को, हेमंत सोरेन जो शिबू सोरेन के बेटे है, वहीं शिबू सोरेन जिन्होंने घूस लेकर कांग्रेस के नरसिम्हा राव सरकार को जीवनदान दिया था, वहीं शिबू सोरेन जो झारखण्ड बनने के क्रम में पहला मुख्यमंत्री बनने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के चरण स्पर्श किये और गणेश परिक्रमा की थी, वहीं शिबू सोरेन जो कभी भाजपा के वोट से राज्यसभा भी पहुंचे थे, वहीं शिबू सोरेन जो अपने परिवार के सभी सदस्यों को राजनीति के माध्यम से उनका जीवन सफल करने में लगे रहते है, जिनके परिवार के सदस्यों के पीछे सीबीआई हमेशा लगी रहती है, वहीं शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन ने बयान दिया है कि खतियान हो स्थानीयता का आधार। मैं पूछता हूं – भैया हेमंत, जो स्थानीयता पर आज बयान दिये जा रहे हो, इसी प्रकार का बयान तो कभी कांग्रेस की विधायक गीताश्री उरांव ने दिये थे, जब आप मुख्यमंत्री थे। उस वक्त आपने स्थानीयता का मुद्दा क्यों नहीं हल किया? उस वक्त तो सत्ता आपके हाथ में थी...अगर आपकी सरकार इस मुद्दे पर चल भी जाती, फिर भी आप पूर्ण बहुमत में आते...। इसके बावजूद इस स्थानीयता के आग से खेलने की रुचि क्यों नहीं दिखाई? उस वक्त आप के आज का दिव्यज्ञान कहां चला गया था?
हे खतियान भक्त नेता हेमंत जी, आज आप जो अपने प्रिय हिमांशु शेखर चौधरी को झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के सहयोग से सूचना आयुक्त बनाया, क्या आप बता सकते हो कि राज्य के कितने आदिवासी बच्चों का इसी प्रकार आपने कल्याण कराया?, वह भी तब जबकि आप राज्य के मुख्यमंत्री थे। आप बता सकते हैं कि झामुमो के दिग्गज नेता हेमलाल मुरमू और सायमन मरांडी जैसे नेताओं को भाजपा का दामन क्यों पकड़ना पड़ा? आपके पिता और आपकी पार्टी तो के डी सिंह जैसे लोगों को महान बनाती है और कैसे बनाती है?, वो राज्य की जनता से छूपी हैं क्या?
जरा आप अपने पिता शिबू सोरेन से ही पूछिये कि आखिर क्या वजह है कि रघुवर सरकार की वे प्रशंसा करते नहीं थक रहे, आज भी अखबारों में आया कि शिबू ने रघुवर सरकार की प्रशंसा की और आप रघुवर दास की सरकार के खिलाफ दिये जा रहे है...कहीं कोई डीलिंग वाली बात तो नहीं हैं न...गर कोई डीलिंग करनी हैं और डीलिंग की राजनीति कर रहे हैं तो फिर तो बात ही नहीं करनी...क्योंकि झारखंड की राजनीति तो डीलिंग ही प्रधान है...। मैंने तो कई नेताओं और विधायकों को देखा कि वे सदन में और सदन के बाहर बाबू लाल मरांडी की आलोचना करते थे, और जब बाबू लाल मरांडी के मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचते थे, तो डीलिंग करने लगते थे, जिस पर बाबू लाल मरांडी हंस भी दिया करते थे और कहते थे कि यार राजनीति करनी है या झारखंड का विकास करना है... अच्छी तरह पहले सोच लो, तो फिर बात करो...
तो लगे हाथों आप भी बता ही दीजिये... कि स्थानीयता के खतियान वाले बयान से रघुवर सरकार को आप ब्लेकमेल कर रहे है या सचमुच आपको झारखंड के विकास की चिंता है...
हालांकि मैं जानता हूं कि आप को झारखंड के विकास की कितनी चिंता है? असली बात तो यह हैं कि आपको जो चाहिए, वो मिल गया... कम से कम कहने में आता हैं न कि आप राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री है...आपको विकास से क्या मतलब? और रही बात रघुवर दास सरकार के काम-काज की...। तो कम से कम आपकी सरकार से तो यह बेहतर ही काम कर रही है और इसका सर्टिफिकेट आपके पिताश्री शिबू सोरेन एक नहीं, दो बार दे चुके हैं...

यहां तो हर जगह विभीषण ही दिखता है भाई...

जब से रघुवर दास झारखंड के मुख्यमंत्री क्या बने ? भाजपा के वरिष्ठ नेता, स्वयं को भाजपा के थिंक टैंक कहनेवाले, नीतीश भक्त सरयू राय की नींद ही गायब है। कोई ऐसा समय ये नहीं चूकते, जिसमें वे रघुवर सरकार को कटघरे में न रखते हो। अब लीजिये कल की ही बात है। मुख्यमंत्री रघुवर दास अपने आवास में अपना वार्षिक प्रगति रिपोर्ट पेश कर रहे थे और राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय जमशेदपुर में सिसक रहे थे, वे बता रहे थे कि राज्य में अभी तक कुछ नहीं हुआ, ये इस प्रकार बोल रहे थे, जैसे लगता हो कि अगर ये मुख्यमंत्री होते तो राज्य में निश्चय ही राम राज्य आ चुका होता...
भाई मुख्यमंत्री बनने का सपना देखना, कोई गलत बात नहीं, देखना चाहिए...। पर इससे भी अच्छा रहता कि जो आपको काम मिला, उसमें आप कार्य कर सिद्ध करते कि आप सबसे बीस हैं, उन्नीस नहीं। यहां तो काम न धाम और चले बाबाधाम वाली कहावत सिद्ध हो रही है। सरयू राय दिन प्रतिदिन इस बात को लेकर घूलते जा रहे है कि भाई छतीसगढ़ का आदमी झारखंड का मुख्यमंत्री और बिहार से आनेवाले तीव्रबुद्धि का आदमी, क्षत्रियकुलभूषण खाद्य आपूर्ति मंत्री, ये तो बड़े ही शर्म की बात है...
सच पूछिये तो कोई भी व्यक्ति तभी बड़ा बनता है, जब उसे कोई जिम्मेवारी दी जाती है और वो जिम्मेवारी को ईमानदारी पूर्वक निर्वहण करता है, यहां तो जिम्मेवारी का निर्वहण तो दूर, बस एक ही काम करना है, सरकार में रहकर सरकार को ही खोदते रहना है...कि ये नहीं किया, वो नहीं किया...और खुद कुछ नहीं करना है...
सच्चाई यह है कि राज्य में एक समय था कि श्रम मंत्री को कोई जानता नहीं था और न ही इस विभाग में दिलचस्पी लेता था, पर आज देखिये झारखंड का श्रम मंत्रालय का तू-ती बोल रहा है। विश्व बैंक ने संपूर्ण भारत में झारखंड के इस श्रम विभाग को पहले स्थान पर रखा है...बधाई दीजिये श्रम मंत्रालय संभाल रहे नवोदित युवा मंत्री राज पालिवार को जिसने वो कर दिखाया, जो कूबत किसी में नहीं थी...पर जरा सरयू राय के विभाग का हाल देखिये...100 प्रतिशत फिसड्डी। गर आज का प्रमुख अखबार पढ़िये तो पता लग जायेगा कि सरयू राय ने जो विभाग संभाला है, उसकी सही स्थिति क्या है?
मेरा मानना है कि आखिर जो गलत कार्य आप कर रहे हैं, जिसके कारण राज्य सरकार की छवि खराब हो रही है, उसकी जिम्मेवारी मुख्यमंत्री या सरकार पर न देकर खुद इसे स्वीकार करते हुए, सरयू राय को मंत्रिमंडल से अलग हो जाना चाहिए और नीतीश की पार्टी में शामिल होते हुए, जदयू को मजबूत करना चाहिए...क्योंकि ऐसे भी जदयू में बहुत सारे पद झारखंड के लिए खाली है। नीतीश ऐसे भी सरयू राय को बहुत मानते है, प्यार करते है, जरुर ही कृपा लूटायेंगे, ठीक उसी प्रकार जैसे क्षत्रियकुलभूषण, प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश पर लूटाया...तो सरयू देर क्यों कर रहे है... हमें समझ में नहीं आ रहा...यही मौका है मुख्यमंत्री बनने के लिए सही निर्णय लेने का।

Monday, December 28, 2015

कहीं मोदी जी, जवाब कर न लगा दें...........

एक स्कूल में...
मैडम – बच्चों से,
बच्चों बताओं भाजपा व कांग्रेस के शासनकाल में क्या समानता है?
बच्चे – मैडम,
1. कांग्रेस राहुल और राबर्ट वाड्रा के लिए काम करती है और भाजपा अंबानी और अडानी के लिए...
2. कांग्रेस ने भी महंगाई का रिकार्ड बनाया, और भाजपा ने भी रहर दाल और तेल के माध्यम से महंगाई का रिकार्ड बना चुकी है...
3. कांग्रेस के समय भी पाकिस्तान भारत को लतियाता था, उसके वीर बांकुड़ों का सर काट कर ले जाता था फिर भी कांग्रेस के लोग पाकिस्तान की जय-जय करते थे, आज भाजपा के समय भी पाकिस्तान हर बार सीज फायर का उल्लंघन कर भारत को लतियाता है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नवाज शरीफ के मां का चरण छू कर गदगद हो जाते है...
4. कांग्रेस भ्रष्टाचार के कारण ही गयी, भाजपा भी जायेगी, क्योंकि अरुण जेटली जैसे लोगों ने भाजपा को मिट्टी में मिलाने के लिए हर संभव कार्य करना प्रारंभ कर दिया है...
5. कांग्रेस शासनकाल में कांग्रेसी अपने कार्यकर्ताओं को अपने पास फटकने नहीं देते थे और उन्हें गरियाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे तथा अपने चापलूसों और चरणोदक पीनेवालों को धन-धान्य से परिपूर्ण कर देते थे, अब भाजपावाले भी उसी का अनुसरण कर रहे है...
6. और सबसे बड़ी बात कांग्रेस में भी अनुशासनहीनता का रिकार्ड बनानेवालों की कोई कमी नहीं, ठीक उसी प्रकार भाजपा में भी अनुशासनहीनता का रिकार्ड तोड़नेवालों की कोई कमी नहीं...
मैडम – वाह बच्चों, तुमने सही उत्तर दिये...
तुम्हें मिलते है, दस में दस अंक...
मैडम – बच्चों से, एक और सवाल...
क्या अच्छे दिन आ गये?
बच्चे – जी हां...अच्छे दिन आ गये...
भाजपा शासित राज्यों में अंबानी और अडानी के समूह उदयोग लगा रहे है, और उन्हें हर प्रकार की सुविधा मिल रही है और जनसामान्य दो रोटी के लिए तरस रही है...
रेल मंत्री सुरेश प्रभु रेलयात्रियों को सब्जबाग दिखाकर प्रतिदिन लूट रहे हैं कभी सुरक्षा व स्वच्छता के नाम पर तो कभी तत्काल टिकट के दाम बढ़ाकर, यानी जनसामान्य तो अब रेल का नाम सुनते ही डर जाती है, ये कहकर कि पता नहीं कब रेलमंत्री जेबकतरे की तरह आसानी से उनके पाकेट से रुपये निकाल लें और वे देखते रह जाये...
बच्चे – मैडम अब छोड़ दीजिये, और सवाल मत पूछिये, नहीं तो हो सकता है कि जवाब देने पर भी मोदी भाई, सेवा कर के जैसा, जवाब कर न वसूलने लगे...
शिक्षक – हा हा हा हा...................

Monday, December 14, 2015

गुड़ खाये पर गुलगुल्ले से परहेज...........

गुड़ खाये पर गुलगुल्ले से परहेज...
वे गुड़ खुब खाते हैं...
पर गुलगुल्ले से परहेज करते हैं...
खुद के अखबारों में अपना नाम नहीं छपवाते हैं...
नाम क्या पद भी नहीं दिलवाते हैं...
शायद खुद को इससे चरित्रवान शो करते हैं...
पर कभी – कभी...
खुद के ही अखबारों से निकलनेवाले किताबों में...
एडिटर इन चीफ बन धूम मचाते हैं...
टीवी में अपनी सुविधानुसार कभी नेता...
तो कभी पत्रकार बन जाते हैं...
राज्य सरकार की दूरभाष – निर्देशिका में...
अखबार के प्रधान के रुप में दीख जाते हैं...
खुद को जेपी व चंद्रशेखर के चेले के रुप में...
दिखलाने का खुब यत्न करते हैं...
अरे क्या कहूं...
आजकल जनाब...
गुड़ खुब खाते हैं...
पर गुलगुल्ले से परहेज करते हैं...

Friday, December 11, 2015

अरविंद और नरेन्द्र मोदी में बेशर्म कौन............

अरविंद और नरेन्द्र मोदी में बेशर्म कौन ?
हमारे देश में बेशर्मों की कमी नहीं, उन्हीं बेशर्मों में से एक है –अरविंद केजरीवाल। ईमानदारी का ढोल पीटकर, दिल्ली की 70 सीटों में से 67 सीटों पर कब्जा कर लिया और अपने 67 विधायकों का वेतन 400 फीसदी बढ़ा लिया। क्या अरविंद केजरीवाल बता सकता है? कि उसने अपने राज्य के कर्मचारियों और कामगारों को 400 फीसदी वेतन बढ़ायी, जैसा कि खुद के लिए कर लिया...उत्तर होगा नहीं। क्या दिल्ली में आम आदमी की हैसियत बढ़ी? अगर नहीं बढ़ी तो फिर अरविंद केजरीवाल किस हैसियत से अपना और अपने मातहतों विधायकों का जीवन स्तर सुधारने के लिए स्वयं के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि कर ली।
यह है 100 प्रतिशत सत्ता का चरित्र...सत्ता खुद को ईमानदार घोषित करने से मिलती है और जब सत्ता मिल जाये तो अपने परिवारों और अपने शुभचिंतकों का ख्याल रखों, जनता जाये भाड़ में....और मजाक उड़ाओ, उनका जो कभी तुम्हारा मजाक उड़ाया करते थे, ये कहकर कि रह गये न...
ये है हमारे देश के नये – नये नेता अरविंद केजरीवाल, कभी बोलता था कि उसकी पार्टी आम आदमी की पार्टी है, इसलिए पार्टी का नाम रखा – आम आदमी पार्टी। जरा पूछो अरविंद केजरीवाल से कि क्या आम आदमी की सैलरी उतनी है?, जितनी उसकी है...क्योंकि वो तो आम आदमी का नेता है...
जब कथनी और करनी में अंतर होता है, तभी भ्रष्टाचार का जन्म होता है। भ्रष्टाचार केवल धन लोलुपता ही नहीं, भ्रष्टाचार आचरण की मर्यादा को तोड़ना भी है, पर हम ऐसे घटियास्तर के नेताओं से उसकी आचरण की मर्यादा के बारे में भी बात नहीं कर सकते, क्योंकि ज्यादा दिनों की बात नहीं है, वो हाल ही में भ्रष्टाचार शिरोमणि सजायाफ्ता लालू प्रसाद के भी गले मिल चुका है, शायद वो दिखलाना चाहता हो कि लालू तुम क्या जानते हो? भ्रष्टाचार में हम तुम्हारे भी बाप सिद्ध होंगे। सत्ता का स्वाद भी चखेंगे, खूब पैसे भी कमायेंगे, जनता को लूटेंगे भी, फिर आनन्द से उपर भी जायेंगे और बाद में दिल्ली या देश की सड़कों पर अपनी मूर्ति बनवाकर सदा के लिए खुद को पूजवायेंगे भी...
लेकिन इस के विपरीत सत्ता में ही रहकर सत्ता का सुख लेने से वंचित त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को देखिये, इन सबसे अलग उन्हें क्या करना है?, वे करते जा रहे है?
ठीक उसी प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखिये, उनके उपर लगातार छीटाकशीं व हमले जारी हैं, पर इनसे बेफिक्र, वे देश सेवा में लगे है, हालांकि नरेन्द्र मोदी की सत्ता जल्द समाप्त हो, इसके लिए तो कांग्रेस के कई नेता पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ के तलवे तक चाट चूके है, ऐसे –ऐसे बयान दिये है, जिसे पढ़ व सुनकर शर्म महसूस होती है कि ऐसे नेता इस भारत में ही क्यों पैदा होते है?, अन्य जगहों पर क्यों नहीं? कुछ दिनों पूर्व, एक कांग्रेसी ने नेपाल संकट पर जो बयान दिया, उस बयान से एक बात फिर पुष्ट हो गयी कि कांग्रेस सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है, पर फिलहाल उसका वश नहीं चल रहा...
दूसरी ओर जरा अरविंद केजरीवाल का बड़बोलापन देखिये, अपने प्रधानमंत्री का किस प्रकार मजाक उड़ाते है...विधानसभा में अपने मंत्रियों और विधायकों की सैलरी में 400 फीसदी का इजाफा करनेवाले अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर उनकी सैलरी को लेकर उनका मजाक उड़ाया था। कहा था कि ओबामा यदि मोदी से उनकी सैलरी पूछेंगे, तो क्या बतायेंगे कि उन्हें 1.60 लाख रुपये मिलते है। मोदी जी को अपनी सैलरी बढ़ाकर 10 लाख रुपये तक कर लेनी चाहिए...पर शायद अरविंद केजरीवाल और उनके पिछलग्गूओं को पता नहीं कि...
देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा व्यक्तित्व कहीं नहीं...
अरविंद जान लो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में और उनके वेतन के बारे में...
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ज्यादातर सैलरी दान कर देते है।
गुजरात के सीएम थे, तब भी ऐसा ही करते थे।
गुजरात से दिल्ली चले, तो 21 लाख रुपये गुजरात की बेटियों के नाम कर दिया, ताकि वह पढ़े और आगे बढ़े।
इस महीने की तनख्वाह चेन्नई में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए देंगे।
मई में अपने हिस्से की सैलरी नेपाल पीड़ितों के नाम की थी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की टेक होम सैलरी भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी कम है। मनमोहन सिंह की टेक होम सैलरी करीब 48,000 रुपये होती थी।
अब निर्णय जनता करें...
कि बेशर्म और बदतमीज कौन है?
अरविंद केजरीवाल या नरेन्द्र मोदी?

Friday, December 4, 2015

परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना ने प्रभात खबर को धूल चटाया...............

परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना ने प्रभात खबर को धूल चटाया...
इसे कहते है, नहले पे दहला...
प्रभात खबर अखबार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी इतनी भद्द पीटेगी, पर ये तो सत्य है, उसकी भद्द पिटी है, और वह भी अमर शहीद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना एक्का के द्वारा, जब बलमदीना एक्का ने प्रभात खबर के इस नौटंकी पर ही यह कहकर विराम लगा दिया कि ये मिट्टी मेरे शहीद पति की ही है यह मैं कैसे मान लूं। मैं इसे छुऊंगी भी नहीं...
अलबर्ट एक्का के बेटे विनसेंट एक्का का कहना था कि बाबा की मिट्टी आ रही है हमन के जानकारी नखे...
क्या बात है?
हर जगह राजनीतिबाजी...
और इस बार राजनीतिबाजी कर दी, रांची से प्रकाशित प्रभात खबर ने, वह भी परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के नाम पर...
फिलहाल हम आपको बता दें कि सच्चाई यहीं हैं कि बलमदीना एक्का ने प्रभात खबर द्वारा आयोजित और राज्य सरकार द्वारा प्रभात खबर को अप्रत्यक्ष रुप से समर्थित इस कार्यक्रम में लाए गये माटी को अस्वीकार कर दिया और फिलहाल ये माटी गुमला के उपायुक्त के पास रख दी गयी है...
इतना होने के बावजूद भी प्रभात खबर का घमंड टूटा नहीं है...उसने आज भी अपने किये पर पर्दा डालने की झूठी कोशिश की है, जबकि सभी अखबारों ने उसके झूठ की पोल खोलकर रख दी है...
जरा गौर करिये...
रांची से प्रकाशित हिन्दुस्तान ने हेडिंग दी – “कलश लेने से किया इनकार”
दैनिक जागरण ने हेडिंग दी – “समाधि की मिट्टी लेने से परिजनों का इनकार”
दैनिक भास्कर ने लिखा – “ये मिट्टी मेरे शहीद पति की ही है यह मैं कैसे मान लूं। मैं इसे छुऊंगी भी नहीं”
और प्रभात खबर ने लिखा – मुख्यमंत्री ने शहीद अलबर्ट एक्का की पवित्र मिट्टी सौंपी – अरे यार किसको सौपी ये तो बताओ, यानी झूठ पर झूठ...
एक बार फिर प्रभात खबर ने दूसरा झूठ छापा, आज का प्रथम पृष्ठ देखिये –जिसमें लिखा है – अलबर्ट एक्का चौक से सुबह सात बजे उपायुक्त और एसएसपी ने किया सजे रथ को रवाना और इसी का संवाददाता पृष्ठ 11 पर लिखा है कि डीसी और एसएसपी ने सुबह 8 बजे रथ को रवाना किया, वह भी उस हालात में, जबकि प्रभात खबर निवेदक बना हुआ था...ये सारा कार्य उसी के द्वारा चलाया जा रहा था...तब ये हालात है इस अखबार के, खुद को लिखता है, अखबार नहीं आंदोलन...ये कैसा आंदोलन चला रहा है भाई...भगवान ही मालिक है इस अखबार का...खुद निवेदक होता है और जहां से रथ रवाना होता है, जहां रथ की सबसे पहले स्वागत होनी चाहिए, पुष्पवृष्टि करनी चाहिए, वहां से इसकी पूरी टीम ही गायब रहती है...
हे ईश्वर, इस अखबार के प्रधान संपादक, कारपोरेट एडीटर, कार्यकारी संपादक और संपादक को सद्बुद्धि दें, पर उसे सद्बुद्धि मिलेगी कैसे? उसका तो प्रधान संपादक महागठबंधन के नेताओं का पूजा-अर्चना करने में लगा है...

Thursday, December 3, 2015

प्रभात खबर के इस आचरण को देख अलबर्ट एक्का भी शरमा गये होंगे....

आज सुबह आंख खुलते ही, प्रभात खबर अखबार पर नजर पड़ी...
प्रभात खबर ने निवेदन किया था...
“फूल बरसाइए
शहीद अलबर्ट एक्का की समाधि की पवित्र मिट्टी तीन दिसम्बर को रांची से जब जारी गांव (गुमला) की ओर बढ़ेगी, जगह-जगह पर आप कलश पर फूल बरसा कर अपने नायक का सम्मान करें.
निवेदक
प्रभात खबर”
यात्रा का समय भी दिया गया था...
सुबह 7 बजे
अलबर्ट एक्का चौक से प्रस्थान...
पर क्या आप जानते है?
कि जिस प्रभात खबर अखबार ने निवेदन किया था, उसका एक भी आदमी रांची के अलबर्ट एक्का चौक पर मौजूद नहीं था, वह भी तब, जब रांची के अलबर्ट एक्का चौक से रथ प्रस्थान करनेवाला था, यहीं नहीं रथ की अगुवानी करने की दिलचस्पी भी इन प्रभात खबर वालों ने नहीं दिखाई यानी
फूल बरसाने का निवेदन करनेवाला, खुद ही फूल बरसाने से अपने आप को अलग कर लिया था...शायद उसे सुबह में ठंड लगने का खतरा था या देर से उठने की आदत, मुझे समझ नहीं आया...
मैं पूछता हूं, प्रभात खबर के प्रधान संपादक से, कि जहां कारपोरेट एडीटर, कार्यकारी संपादक और संपादक यानी संपादकों की ही लंबी फौज रखने की परंपरा है वहां इनमें से किसी एक संपादक या आपके यहां कार्यरत अन्य लोगों में से किसी एक व्यक्ति को छुट्टी नहीं थी कि वो रांची के अलबर्ट एक्का चौक पर शहीद अलबर्ट एक्का की माटी का सम्मान करें...अरे आप निवेदनकर्ता थे, निवेदक थे, कम से कम इसका तो ख्याल रखना चाहिए था आपको...
आज ही देखिये आपके कार्यकारी संपादक अनुज कुमार सिन्हा ने क्या लिखा है – “छोटी और ओछी राजनीति, आलोचना, नकारात्मकता से समाज का भला नहीं होता. यह शहीद की समाधि की माटी है. इसकी पवित्रता को समझें और नमन करें. कर्म और दायित्व को प्रमुखता दें”
अनुज जी, झारखंड की जनता कर्म और दायित्व को प्रमुखता देने के अपने संकल्प को हृदय से लगाकर रखती है, उसे आपके ज्ञान की जरुरत नहीं...
जरुरत तो आप जैसे प्रभात खबर में कार्य कर रहे उच्च स्थानों पर बैठे लोगों को है, जो शहीद अलबर्ट एक्का चौक की आड़ में प्रभात खबर को चमकाने में लगे है... जो शर्मनाक है...
खुशी इस बात की है कि यहां की जनता जाग चुकी है...शायद यहीं कारण है कि आपके इस निवेदन की कम से कम रांची की जनता ने अनसुनी कर दी...शायद उसे पता था कि जो निवेदन किया है, वो खुद ही नहीं होगा...तो ऐसे जगह जाने से क्या मतलब...अलबर्ट एक्का तो हृदय में रहते है...उन्हें हमेशा नमन है...दुनिया को दिखाने की क्या जरुरत...
शायद यहीं कारण भी रहा कि अलबर्ट एक्का चौक पर जब रथ आया तो उस पर पुष्पांजलि देने के लिए तीन ही हाथ बढ़े, दो आदिवासी महिलाओं के और एक भाजपा नेता प्रेम मित्तल के...चौथा मैं ढूंढता रहा कोई नहीं मिला और खोजा प्रभात खबर के उन कर्णधारों को भी, जो पिछले कुछ दिनों से अलबर्ट एक्का के नाम पर प्रभात खबर – प्रभात खबर का ढिंढोरा पीट रहे थे... पर वे रांची से गायब थे, मैंने पूछा आखिर क्यों...तो एक पत्रकार ने मजाक में कहा कि बड़ा ठंडा है न और अखबार में रात में बहुत काम रहता है...इसलिए रांची में ये महापुरुष नहीं दिखेंगे, ये सभी महापुरुष है, इसलिए जारी गांव में मुख्यमंत्री रघुवर दास के साथ दीखेंगे...क्योंकि कल ही तो मुख्यमंत्री ने कहा था कि पत्रकारिता प्रभात खबर जैसी करनी चाहिए...और फिर वह ठठा कर हंसने लगा...
सचमुच अलबर्ट एक्का के नाम पर जिस प्रकार लोगों का भावनात्मक शोषण प्रभात खबर ने किया है...हमें लगता है कि इसे देख स्वर्ग में बैठे अलबर्ट एक्का भी शरमा गये होंगे...

Wednesday, December 2, 2015

अरे वाह नीतीश भाई......

अरे वाह नीतीश भाई...
बहुत बढ़िया सरकार चला रहे है...
इसी तरह आप सरकार चलाते रहे, तो बिहार सचमुच बहुत आगे निकल जायेगा...
कल पता चला कि आपको सहयोग दे रहा, आपका बड़ा भाई लालू प्रसाद अपनी पत्नी रावड़ी देवी को विधानमंडल दल का नेता बना दिया है और अपने दोनों बेटों को तो पहले ही मंत्रियों की श्रेणी में लाकर खड़ा दिया, जिसकी अवहेलना करने की आप में ताकत ही नहीं थी...
आज पता चला कि अभी तो आपकी सरकार बने दो हफ्ते भी नहीं हुए और अपराधियों ने अब तक पूरे बिहार में आधे दर्जन बैंक लूट लिए...
कल कटिहार में बंगाल से आये एक मक्का व्यापारी को लूट लिया...
शायद ये लूट का क्रम तब तक चलता रहेगा, जब तक आपके जीते हुए विधायक और मंत्रियों का समूह सामाजिक न्याय नहीं ला देता और इसके तहत अपनी गरीबी नहीं समाप्त कर लेता...
यहीं नहीं अपराधियों ने तो जमुई से भगवान महावीर की अतिप्राचीन और बेशकीमती मूर्ति भी लूट ली...
और
बधाई इसके लिए भी आपके एक विधायक के समर्थकों ने तो भागलपुर के जिला मुख्यालय में तैनात डीएसपी को ही गंगा में फेंक देने की कोशिश की
और राजद के एक विधायक ने तो एक पुलिसकर्मी को ही ठिकाने लगाने की बात कर दी...
बस अब क्या...
सामाजिक न्याय आ गया...
प्रभात खबर के प्रधान संपादक और जदयू के सांसद हरिवंश का सपना साकार हो गया...

Friday, November 27, 2015

झारखंडवासियों से अपील...................

न प्रभात खबर अखबार पढ़े और न ही पढ़ाएं...
बच्चों से तो खासकर प्रभात खबर अखबार को दूर रखें, क्योंकि इससे उनका भविष्य खतरे में पड़ सकता है...
क्योंकि
ये अखबार भारत का मानचित्र ही गलत प्रकाशित करता है, कहीं आपका बच्चा इसके द्वारा प्रकाशित मानचित्र को ही सही मान लिया तो समझ लीजिये देश और बच्चा दोनों का नुकसान...
यहीं नहीं, आजकल ये अखबार महागठबंधन के प्रति समर्पित हो गया है...
इसे महागठबंधन की गलतियां नजर नहीं आती, इसे सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में ही गलतियां नजर आती है…
प्रधानमंत्री के खिलाफ विषवमन करनेवाले पत्रकारों की लंबी फौज को ये अपने अखबार में स्थान दे देता है...
क्योंकि इसका प्रधान संपादक हरिवंश जदयू से राज्यसभा का सांसद है, यानी पत्रकारिता के प्रति कम और नीतीश कुमार के प्रति ये ज्यादा वफादार खुद को साबित करने के लिए अनाप – शनाप छापे रहता है...साथ ही महागठबंधन के शीर्षस्थ नेताओं की गलतियों पर पर्दा डालता रहता है...
उदाहरण...
दिनांक 26 नवम्बर को रांची से प्रकाशित व प्रसारित सारे अखबारों को ले लीजिये...
जिसमें सारे अखबारों ने महागठबंधन के नेता राहुल गांधी से संबंधित समाचार को प्रमुखता से स्थान दिया है, जिसमें बेंगलुरु के माउंट कार्मेल कॉलेज में छात्र-छात्राओँ के साथ सवाल – जवाब के बीच राहुल गांधी साफ फंसते नजर आ रहे है, यही नहीं उनकी जमकर किरकिरी भी हुई है...पर प्रभात खबर ने अपने इस खबर को पृष्ठ संख्या 17 पर स्थान दिया, वह भी इस प्रकार दिया है कि जब ज्यादा जोर लगायेंगे तो उस पर आपकी नजर जायेंगी, राहुल गांधी को बचाने का प्रभात खबर ने कम प्रयास नहीं किया, बल्कि एड़ी चोटी लगा दी, पर राहुल गांधी का ऐसा ये समाचार था कि प्रभात खबर के किसी भी व्यक्ति में हिम्मत नहीं थी कि राहुल की वे इज्जत बचा लें...पर क्या करें हरिवंश जदयू के नेता जो ठहरे, महागठबंधन के नेता जो ठहरें...बेचारे ने ईमानदारी से राहुल के सम्मान को बचाने की कोशिश की...
आखिर क्या हुआ...बेंगलुरु में...
राहुल चले थे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्टाइल अपनाने, और यही स्टाइल अपनाना उनको महंगा पड़ गया...वो समझे कि जैसे बिहार के लोग है, उसी प्रकार बेंगलुरू के छात्र होंगे...
निठल्ले और महामूर्ख...
जो कहेंगे, वे हां में हां मिलाते रहेंगे और वे अपना उल्लू सीधा कर लेंगे, पर हुआ ठीक उल्टा...
राहुल ने पूछा – क्या स्वच्छ भारत पर काम हो रहा है?
स्टूडेंट्स – हां
राहुल ने पूछा – क्या मेक इन इँडिया से फायदा हुआ है?
स्टूडेंट्स – हां
राहुल ने पूछा – क्या वाकई ऐसा लगता है?
स्टूडेंट्स – हां
राहुल ने पूछा – क्या यंगस्टर्स को जॉब मिल रहा है?
स्टूडेंट्स – हां
प्रतिक्रियास्वरुप
और भी ऐसे कई सवाल हैं, जो छात्रों ने राहुल से पूछे, जिस पर राहुल की घिग्घी बंध गयी, पर प्रभात खबर में ये सारे के सारे सवाल खोजते रह जाओगे, नहीं मिलेगा। इसके लिए आपको अन्य अखबारों का सहारा लेना पड़ेगा...
ऐसे में हम प्रभात खबर क्यूं ले?, वह भी तब जबकि हमारे पास बहुत सारे विकल्प है, तो ऐसे में उन विकल्पों को क्यों न चुनें?, आखिर महागठबंधन के अखबार को लेने से हमें क्या फायदा?और झारखंड को क्या फायदा?
अखबार वहीं ले, जो मिट्टी से जूड़ा हो, ऐसे भी पटना जब जायेंगे तो प्रभात खबर का ध्येय वाक्य जो रांची में लिखा दिखता है – अखबार नहीं आंदोलन, इस ध्येय वाक्य की बिहार में हवा निकल जाती है और वहां बोलता है ये – बिहार जागे देश आगे, जब बिहार जागे तो देश आगे तो झारखंड जागे तो कौन आगे? इस सवाल का जवाब क्या प्रभात खबर के पास है?

Wednesday, November 25, 2015

आमिर का डर और एनडीटीवी का विधवा प्रलाप...

कल जब मैंने टीवी खोला...
तो टीवी खोलते ही आमिर भक्त, कांग्रेस भक्त और वामपंथ के रास्ते देश को आगे बढ़ाने की बात कहनेवाले चैनल एनडीटीवी पर नजर पड़ी, जहां अशोक पंडित, एंकर अभिज्ञान प्रकाश के ज्ञान की धज्जियां उड़ा रहे थे और अभिज्ञान अपने अधकचरे ज्ञान से खुद को बचाने का असफल प्रयास कर रहा था...
इन दिनों आमिर के उपर टीवी में खुब बहस चल रही है...टीवी का एक तबका आमिर के पक्ष में आ गया तो दूसरा तबका उसके विरोध में...
आमिर के पक्ष में आ गया एनडीटीवी मोदी के विरोध में जमकर अपनी वाणी का सही इस्तेमाल कर रहा है...बिहार के चुनाव में मोदी की हार से प्रसन्न एनडीटीवी ऐसा मौका कभी नहीं छोड़ना चाहता, जिसमें मोदी की बखिया उधेड़ने की बात हो... पर कभी – कभी उलटी दांव भी चल जाती है, जैसा कि कल अशोक पंडित ने एनडीटीवी की अपने वाक्यांशों से वो कर डाली, जो सपने में भी अभिज्ञान ने नहीं सोचा होगा...
और अब बात आमिर की...
आमिर से पूछिये...कि बेटा कभी पाकिस्तान या बांगलादेश गये हो, जहां हिन्दूओं की बेटियों को प्रतिदिन जलालत झेलनी पड़ती है, क्योंकि वे हिंदू है, गर नहीं तो कम से कम वहां की अखबारें तो पढ़ लो, जहां का मुस्लिम समुदाय वहां की हिन्दु बेटियों का अपहरण करता है, फिर उसकी इज्जत लूटता है और फिर उसका धर्मांतरण कराता है और फिर इस्लाम जिंदाबाद का नारा बुलंद करता है...दूसरी बात क्या आमिर बता सकता है कि पाकिस्तान और बांगलादेश में हिंदूओँ की संख्या लगातार घटती क्यों चली गयी, क्या वहां के सारे हिंदू पुरुष नपुंसक थे क्या?
और आजादी के बाद भारत में रह रहे सारे मुसलमान असली मर्द थे क्या? कि वे लगातार अपनी जनसंख्या बढ़ाते चले गये, स्थिति तो ऐसी है कि कालांतराल में भारत में ही हिंदू अल्पसंख्यक हो जायेंगे, कई राज्यों में जैसे जम्मू-कश्मीर या नार्थ-ईस्ट इलाकों में तो हिन्दूओं की हालत दोयम दर्जें की हो गयी है...।
तीसरी बात मैंने इसके पहले जब आमिर की फिल्म पीके आयी थी तो कुछ लिखा था, जो इस फेसबुक में मौजूद है, सभी पढ़े...और पूछे आमिर से कि बेटा क्या जिस धर्म से तुम आते हो?, उसमें सब कुछ क्या सही है? , गर सब कुछ सही नहीं है तो उसके अंदर जो दकियानूसी चीजें है, उस पर तुम्हारी हिम्मत है कि फिल्म बना दो...वो कहेगा, कि नहीं...क्योंकि वो जानता है कि फिर क्या होगा? ...मैं कहता हूं कि जब पहले सहिष्णुता की बात करते हो, तो तुम अपने धर्म में इसे दिखाओ...और तुम्हारी सहिष्णुता उस वक्त कहां चली जाती है, जब धर्म के नाम पर तुम्हारे लोग पूरे विश्व में आंतक मचा रहे होते है, जिससे पूरी दुनिया ही त्रस्त हो गयी...
तुम बोलते हो कि भारत से कहीं और चले जाये...तो तुम्हे रोका किसने है, तुम्हारे पास इतने पैसे है कि तुम पैसे के बल पर कहीं भी चले जाओगे और तुम्हें शरण भी मिल जायेगी, पर हम कहां जायेंगे, बेईमान...मुझे तो यहीं रहना है...क्योंकि तुम्हारे जैसा मैं गद्दार नहीं, कि जिस देश में खाया, कमाया और जब उड़ने की बारी आयी तो देश को गाली देकर चल दिये...
तुम्हारे ही जैसा एक और आदमी था, नाम था – मकबूल फिदा हुसैन, वह हमेशा हिन्दू देवी – देवताओं की अश्लील चित्र बनाता था, पर कभी इस्लाम पर उसका ऐसा चित्र नहीं आया, क्योंकि वह जानता था कि असहिष्णु कौन है...इसलिए वो जी भर कर हिन्दू देवी-देवताओं की गालियां दी और फिर मुस्लिम देश की ओर चल दिया...ठीक उसी प्रकार की हरकत तुमने कर दी...जी भरकर पीके फिल्म में हिन्दू देवी – देवताओं की गाली दी, और अब पूरे देश के हिन्दूओं के गालों पर असहिष्णु का तमाचा जड़ कर विदेश जाने की बात कर दी...।
इस मुददे पर तुम्हारे साथ कांग्रेस और आप के लोग है...ये कितने देश भक्त है...पूरा देश इन्हें जानता है...अभी देश पर जान छिड़कनेवाले दिल्ली की 70 सीटों में से 67 सीटों पर कब्जा जमानेवाले दिल्ली की जनता की फिक्र छोड़ अपने 67 विधायकों को ढाई-ढाई लाख रुपये का मासिक वेतन दिलवाने जा रहे है...और लालू के साथ गले मिलकर भ्रष्टाचार का नया पैतरा कैसे सीखा जाये, इसके लिए लालू को गले लगा रहे है...ऐसे लोग तुम्हारे साथ जरुर होंगे...पर जहां से तुमने कमाना सीखा...हमें खुशी है कि वहां के लोगों ने तुम्हारे उपर थूका है...हो सकता है कि इनकी संख्या तुम्हारी नजरों में कुछ भी नहीं हो...पर आमिर ये जान लो कि देश की आजादी में मुट्ठी भर ही लोग लड़े थे...नहीं तो पूरा देश गर खड़ा हो जाता तो सरकार किस-किसको स्वतंत्रता सेनानी का वेतन देती...स्वतंत्रता सेनानी का वेतन मिलना इस बात का संकेत है कि इस देश में गद्दारों की संख्या सर्वाधिक और देश भक्तों की संख्या का अकाल हमेशा से रहा है...
ऐसे भी, मैं जानता हूं कि तुम क्या हो? ...कल तक कांग्रेस का शासन था...मुंबई-दिल्ली कई राज्यों के प्रमुख शहरों में कत्लेआम हुआ...पूरे देश में सिक्खों का कत्ल राजीव के शासन में हुआ...इंदिरा के मरने के समय... राजीव का बयान आया था कि कोई पेड़ गिरता है तो कंपन होती है, और उसमें कई सिक्ख मारे गये...ये सिक्खों को मारनेवाला कौन था...पूछो अपने कांग्रेसियों से....उस वक्त सहिष्णुता कहां गयी थी...
इधर जब से मोदी आया है...मोदी विरोधियों का एक ही सूत्र रह गया है...मोदी हटाओ, देश की इज्जत चली जाये तो चली जाये, पर मोदी नहीं रहना चाहिए...और एक मोदी है, जो इन सबसे अलग देश की इज्जत और विकास के मुद्दे पर पूरे विश्व में भारत की नई ईमारत तैयार कर रहा है, और जरा इन बेहुदों को देखिये...जो ऐसी जगह रहते है...जहां कोई इनका बाल बांका नहीं कर सकता...पर इन्हें अब भारत में रहना खतरा सा दीख रहा है...इससे बड़ी गद्दारी और क्या हो सकती है? और उससे भी बड़ी गद्दारी तो वे कर रहे है, जो इसके सुर में सुर मिला रहे है...जो इनके सुर में सुर मिला रहे है, वे जान ले कि देश वो नहीं भी रहेंगे तो रहेगा...देश के प्रति ईमानदारी नहीं छोड़े...नहीं तो आनेवाले समय में ये सभी जयचंद ही कहलायेंगे...
आज इस्लाम के नाम पर जो आईएस पूरे विश्व में कोहराम मचा रहा है...उसे पूरी दुनिया देख रही है...रुस, चीन, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीका, यहां तक कई मुस्लिम देश भी, कितने देश का नाम गिनाये, सभी आईएस के खिलाफ लग गये है...इस्लाम से अनजाने भय से लोग इतने डर गये है कि लोग बुर्का और काले रंग को देखकर कांप जा रहे है...और ये कहते है कि भारत में असहिष्णुता बढ़ी है...
हाल ही में एक अखबार में पढ़ा कि ब्रिटेन में 300 प्रतिशत असहिष्णुता बढ़ी है, फिर भी वहां के किसी भी विरोधी दल के नेता ने, अपने देश और सरकार के प्रति घिनौने शब्द का प्रयोग नहीं किया पर जरा इस देश के नये – नये चपड़गंजूओं को देखिये...दिये जा रहे है...
अरे आमिर पूछो तो राहुल गांधी से कि जहां कलबुर्गी की हत्या हुई...वहां किस पार्टी का शासन है? और पुछो जहां दादरी हुआ वहां किस पार्टी का शासन है?
क्या तुम्हें मालूम नहीं कि लॉ एंड आर्डर राज्य के अंतर्गत आता है...तो फिर जिन्होंने इस घटना को अंजाम दिया...उन्हें जेल में डालने का काम किसका है...यानी काम गलत करे तुम्हारे अब्बा और गाली सुने हम वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हो...गर ये कहावत नहीं सुने हो तो ये कहावत जरुर सुने होंगे कि खेत खाये गदहा और मार खाये जुलाहा...
आमिर तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम मकबूल फिदा हुसैन के बताये मार्ग पर चल रहे हो...
तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम ही सिर्फ असली मुसलमान हो और भारत में रह रहे अन्य मुसलमान, मुसलमान नहीं है...
तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम देश के प्रति वफादार नहीं हो...
और तुमने उनके भी चेहरे से पर्दा उठा दिया जो कहते है कि देश उनके लिए सर्वोपरि है...
और एनडीटीवी वाले तुम भी जान लो, ये जो तुम बार – बार पूछते हो न कि हम देशभक्त है या नहीं, इसका सर्टिफिकेट कौन देगा या कौन बांट रहा है...तो मैं तुम्हें बताता हूं...अभिज्ञान और तुम्हारे आका...
ये सर्टिफिकेट तुम्हारे शरीर के अंदर किसी कोने में आत्मा बैठी है, वो देती है, और ये तब सर्टिफिकेट जारी करती है, जब तुम्हारे पास कुछ नहीं होता...तुम तो लाखों – करोड़ों में खेल रहे हो, तुमको देश की क्या चिंता...
चिंता तो उन्हें है, जो खेतों में हल चलाकर जीते है...जिनके बेटे सीमा पर खड़े है...और तुम, तुम क्या जानो देशभक्ति...बस अपनी बीवी और बेटों के पास जाकर कहना कि बेटा घबराना नहीं...रतलाम सीट से भाजपा हार गयी है...हां हां ये मत बताना कि मणिपुर में भाजपा दो विधानसभा सीटें जीतकर खाता खोल दी हैं, नहीं तो तुम्हारा बीवी – बेटा डर जायेगा...समझे लल्ला...

Tuesday, November 24, 2015

लालू-नीतीश भजन..............

(लालू-नीतीश भजन...
इस भजन को सुबह-शाम गाने से भक्त इस लोक में सुख पाकर, अंत में लालू व नीतीश लोक में चला जाता है, जहां उसे परम् आनन्द की प्राप्ति होती है...इस भजन में उन महान संतों के भी नाम है, जिन्होंने लालू व नीतीश भगवान को अपने हृदय में रखकर इस लोक में सुख पा रहे है और परलोक को भी सुधारने में लगे है...बोलिए प्रेम से इस लोक के महाभगवान सामाजिक न्याय के पुरोधा, भक्त वत्सल लालू नीतीश भगवान की जय...)
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्
यादव भजे
लालू नीतीशम्
कुर्मी भी भजे
लालू नीतीशम्
मुसलमां भजे
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
हरिवंश भजे
लालू नीतीशम्
ज्ञानू भी भजे
लालू नीतीशम्
शैबाल भजे
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
माखनचोरम्
यदृश्म् यदृश्म्
चारा चोरम्
पत्नी भक्तम्
बेटा भक्तम्
बेटी भक्तम्
सजायाफ्ता भये
लालू श्रीमन्नम्
सर्व गुण संपन्न
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्.............
प्रभात खबरम्
हृदयम् राखम्
नीतीश गौरवम्
हरदम गायम्
लालू चरणम्
लोटे हरदम्
प्रभात खबरम्
प्रभात खबरम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
शिवानंद प्रियम्
लालू नीतीशम्
पवनम् प्रियम्
लालू नीतीशम्
मनोज प्रियम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
एक तीर भोकम्
दूजे लालटेन धड़म्
तीजे हाथ साफ
हरदम करतम्
ऐसे है, प्रियम्
महागठबंधनम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
जो ले चलम्
बिहार हरदम्
पृष्ठम् पृष्ठम्
पृष्ठम्, पृष्ठम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
जातिवाद बढ़म्
हरदम् हरदम्
यादववाद बढ़म्
हरदम् हरदम्
सबको मार चलम्
धूआधारम्
गाली देत चलम्
धूआधारम्
और बोल चलम्
सामाजिक न्यायम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्

Saturday, November 21, 2015

रघुवर की अयोध्या को सरयू से खतरा....

रघुवर की अयोध्या को सरयू से खतरा...
शत्रुघ्न सिन्हा का रोल झारखंड में सरयू अदा करने को तैयार...
झारखंड भाजपा में विभीषण बनने में सरयू अन्य नेताओं से कहीं आगे...
एक लोकोक्ति है...घर का भेदी लंका ढाहे अर्थात् घर का भेदिया ही लंका को हानि पहुंचाता है। इसको आप ऐसे भी समझिये कि बिना भेदिया के लंका ढायी नहीं जा सकती...पर झारखंड में रावण तो है नहीं, यहां तो रघुवर का दास यानी खुद को हनुमान बतानेवाले रघुवर दास का शासन है, तो फिर रघुवर की अयोध्या को खतरा किससे...। इसको अगर ऐसे समझा जाये कि सरयू में जलस्तर बढ़ेगा तो अयोध्या को बाढ़ का खतरा झेलना पड़ेगा अर्थात् झारखंड के सरयू राय की हृदय वेदना का स्तर अत्यधिक होगा, तो रघुवर दास की मुख्यमंत्री पद को झटका लग सकता है। अब तक देखने में तो यहीं आ रहा है कि रघुवर दास की सरकार में सरयू राय की वेदना का स्तर बहुत अधिक बढ़ रहा है, जो कभी-कभी सरयू के मुख से आक्रोश के रुप में प्रकट होता है और धीरे-धीरे अखबारों व चैनलों की सुर्खियां बन जाता है, जिसे बाद में बहुत ही प्रेम से सरयू राय स्वयं ही अपनी वेदना को दूसरी तरह से शांत करा देते है, ठीक उसी प्रकार जैसे अयोध्या की सरयू में बढ़े जलस्तर को सरयू स्वयं ही शांत करा देती है...
इधर नीतीश के बिहार में पुनः सत्तारुढ़ होने से भले ही नीतीश स्वयं ही उतने प्रसन्न न हो, पर बिहार के भाजपाद्रोही व मुख्यमंत्री बनने का दिवास्वप्न देखने वाले बिहारी बाबू उर्फ बोकरादी बाबू अर्थात् शत्रुघ्न सिन्हा बहुत ही प्रसन्न है। ठीक बिहारी बाबू की तरह ही, झारखंड में भी भाजपा के कई बिहारी बाबू है, जो खुद को बिहारी बाबू यहां कहलाना पसंद नहीं करते, लेकिन हैं खाटी बिहारी पर झारखंड के तकदीर बने हुए है। इन्होंने भी बिहारी बाबू की तरह झारखंड में भाजपा का गड्ढा खोदना शुरु कर दिया है...। सरयू राय बिहारी बाबू का रोल सही-सहीं निभा पायेंगे या नहीं, ये तो वक्त बतायेगा, पर वे उसी राह में है। नीतीश के प्रति उनका उमड़ा प्रेम ऐसे ही नहीं है, उनके मुख से आज तक नीतीश के खिलाफ कुछ भी नहीं निकला है, वे नीतीश भक्ति में हमेशा से लगे रहते है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार विधानसभा चुनाव के क्रम में नीतीश कुमार के खिलाफ कुछ भी बोलते थे, तो सरयू राय का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ गुस्सा उनके चेहरे पर साफ दीख जाया करता था। नीतीश के ताजपोशी में नीतीश का खुद फोन घुमाकर, सरयू को आमंत्रण, इस बात का संकेत और प्रमाण है कि नीतीश ने भाजपा के अंदर रहकर उन विभिषणों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। जिनसे उनकी सत्ता को संजीवनी मिली। ये राजनीति ही है कि यहां कब किसकी कौन आरती उतारने लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता...। इसलिए ईमान की रोटी खानेवालों की संख्या राजनीति व राजनीतिबाजों से इतना नफरत करती है कि पूछिये मत। वो जानवरों पर तो भरोसा कर लेती है, पर राजनीतिज्ञों पर नहीं।
एक बात और। इन दिनों पढ़ने को मिला कि बोकरादी बाबू यानी शत्रुघ्न सिन्हा जो खुद को ट्वीटर के माध्यम से खुद को हाथी भी बोल चुके है। नागपुर गये थे, वे संघ के नेताओं व भाजपा के नेताओं से बातचीत करने के लिए वे उनके दरवाजा भी खटखटाएं पर किसी ने उन्हें भाव भी नहीं दिया...। यहां भी वे बड़बोलेपन में कह दिये कि गर सच कहना बगावत है तो समझो हम बागी है। जैसे लगता है कि दुनिया के सत्यवादी हरिश्चंद्र सिर्फ और सिर्फ बोकरादी बाबू है, दूसरा कोई नहीं...। हमारा सलाह होगा – बोकरादी बाबू को कि आप थोड़ा दरियादिली दिखाइये, सचमुच के हाथी बनिये और हाथी जैसी हरकत दिखाइये...। भाजपा से नाता तोड़िये और सदा के लिए तीर थाम लीजिये और उस तीर से लालटेन के सहारे, उन सब को अपनी बातों से दर्द पहुंचाइये जो आप को दर्द पहुंचाया, आपको मुख्यमंत्री बनने नहीं दिया...। साथ ही नीतीश को कहिये कि देखो, नीतीश भाई हम भाजपा के बिभीषण है, तुम तो अब हमारे लिए राम बन जाओ। ठीक जैसे राम ने विभीषण को गले लगाया और लंकेश बनाया। तुम भले ही मुझे बिहार का किंग न बनाओ पर मेरी बीवी-बच्चों को तो कम से कम विधायक-सांसद व मंत्री तो बना दो। हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि नीतीश, बिहारी बाबू पर कृपा दृष्टि दिखायेंगे, क्योंकि नीतीश तो भक्तवत्सल है। जब वे हरिवंश को सांसद बना सकते है, जब वे रवीश के भाई पर दयालुता दिखा सकते है तो फिर बिहारी बाबू पर क्यों नहीं...। उन्होंने तो बिहार चुनाव में भाजपा में कील ही ठोक दी...।
और इधर देखिये सरयू राय कि, जब से वे झारखंड में रघुवर मंत्रिमंडल में शामिल हुए है। रघुवर दास के नाक में दम कर दिया है। हर एक महीने पर उनका ऐसा बयान आता है, जो राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर देता है। आखिर उनका गुस्सा क्यों प्रकट होता है? उसका साफ संकेत है कि वे अपने मंत्री पद से खुश नहीं है। उन्हें मलाईदार मंत्री पद चाहिए था, पर रघुवर दास ने उन्हें खाद्य आपूर्ति मंत्रालय संभालने को दे दिया। इधर एक साल होने को हुए, पर सच पूछिये तो सरयू राय ने इस मंत्रालय का कबाड़ा बना कर रख दिया है। काम-धाम कुछ नहीं और गिलास तोड़ा आठ आना वाला हिसाब है। आज एक साल होने को आये, राज्य में किसी को नया राशन कार्ड तक नहीं मिला है। गर इक्के-दुक्के को मिले भी तो उसमें इतनी अशुद्धियां है कि पूछिये मत...। अक्टूबर महीना बीत गया, नवम्बर महीना चल रहा है और अभी तक अक्टूबर के अनाज का उठाव तक नहीं हो सका है...। इस माह के करीब 52 हजार टन चावल व गेहूं का उठाव करने में राज्य का खाद्य आपूर्ति विभाग असफल रहा है। इसके उठाव के लिए भारतीय खाद्य निगम के कार्यकारी निदेशक कोलकाता से समय विस्तार की सहमति ली गयी जिसकी तय तिथि 20 नवम्बर को समाप्त हो गयी, यानी न काम करेंगे और न करने देंगे, पर बयानबाजी कर भाजपा और मुख्यमंत्री रघुवर दास का सारा काम तमाम कर देंगे। जमकर नीतीश भक्ति में लीन रहेंगे और मंत्रिमंडल की आड़ में, सरकार की आड़ में स्वहित में अन्य कामों को निबटायेंगे। क्या ये राज्य के साथ धोखाधड़ी नहीं...।
सब को कटघरे में खड़ा करनेवाले सरयू राय राज्य की जनता को बताये कि उन्हें जो विभाग मिला, उसमें उन्होंने कौन-कौन से काम किये, जिसको लेकर जनता उन्हें माथे पर बिठाएं...। रही बात मुख्यमंत्री रघुवर दास की तो ये न तो वसुंधरा राजे सिंधिया और न ही शिवराज सिंह चौहान की तरह मुख्यमंत्री है, जो ऐसे लोगों को उनकी औकात बता दें, ये तो मामूली प्रभात खबर के मामूली संपादकों के इशारे पर वे काम करते है, जिसको एक सामान्य विधायक भी तवज्जों नहीं देता...ऐसे में ये सरयू राय जैसे अशांत मंत्रियों को शांत करा देंगे, हमें नहीं लगता...। एक साल होने को आये, सच पूछिये तो राज्य का कोई भी ऐसा मंत्री नहीं, जो ये दावे के साथ ये कह सकता है कि उसने राज्य की जनता के हित में ये कार्य किये है, उसे इसके लिए शाबाशी मिलनी चाहिए...पर हम इतना जरुर कह सकते है कि इन मंत्रियों ने ऐसी-ऐसी हरकतें जरुर की जो जग हँसाई का कारण भी बन गयी...
भाजपा में ही रहकर, भाजपा से अपने तन का वजन बढ़ानेवाले ये नेता, अपनी मातृसंगठन संघ के प्रति भी वफादार नहीं है, तो ये समाज और देश के लिए कितने वफादार होंगे, समझा जा सकता है...ये तो सत्ता में आते ही, अपने चारणों व अपने अनुचरों पर दया लुटाने में लीन हो जाते है, इन्हें देश व राज्य से क्या मतलब...। जरा नजर दौड़ाईये...झारखंड सरकार की हरकतों पर पता लग जायेगा कि जो लोग इनकी आरती उतार रहे है, वे बम बम हो रहे है, और जो इन्हें आइना दिखा रहा है, उसे ये फूंटी आंखों नहीं देख रहे, वे तो उसे ठिकाने लगाने में भी देर नहीं कर रहे...
और रही बात हमारी...तो मैं उन्हें बता दूं...
कबीर का हूं, कबीर ही रहूंगा...
कबीरा खड़ा बाजार में लिये लुआठी हाथ। जो घर जारे आपना चले हमारे साथ।।
कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर। ना काहुं से दोस्ती ना काहु से वैर।।
हमें राज्यसभा या लोकसभा में नहीं जाना और न ही किसी नेता मंत्री का चरणोदक पीना है, जो नेताओं व मंत्रियों का चरणोदक पीना चाहते हैं, पीते रहे और नीतीश या किसी अन्य राज्य के मुख्यमंत्री जैसे लोगों या अन्य नेताओं के चरणोदक पीकर कृतार्थ होते रहे...हमें क्या?

Thursday, November 19, 2015

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........
पन्द्रह साल झारखंड बने हो गये...
राज्य की जनता ने इसी बीच एक से एक नेता देखें, जिन्होंने झारखंड का नेतृत्व किया...पर किसी नेता में हिम्मत नहीं हुई कि बाबू लाल मरांडी द्वारा खींची गयी विकास की लकीर से बड़ी लकीर खींच कर दिखा दें...।
कितने नाम गिनाऊं...
अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन और अब रघुवर दास...। दावे तो सबके थे और हैं, पर जरा पूछिये कि वो कौन ऐसी चीजें है, जिसको लेकर राज्य की जनता इन पर गर्व कर सकें और ये कहें कि ये इनकी देन है – इन झारखंडी नेताओं का...झारखंड की जनता के लिए...।
सच्चाई यह है कि इन सारे नेताओं ने अपनी कोठी ठीक की, अपना दबदबा कायम किया पर जनता के हित में कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिस पर जनता इन्हें अपना मान सकें...हां इतना जरुर हुआ कि इनके यशोगान गानेवाले मीडिया में रह रहे लोग व इनके चारणों की आर्थिक स्थिति इन नेताओं के समान जरुर हो गयी...।
गर इन नेताओं के कार्यकाल को देखिये और विभिन्न अखबारों में इनके शासनकाल के दौरान विकास को पैमाना बनाकर छपे विज्ञापनों को देखे तो इनकी पोल खुलकर रह जायेगी...। ये सारे नेता बाबू लाल मरांडी के इर्द-गिर्द भी नहीं ठहरते...।
हमें याद है कि जब बाबू लाल मरांडी ने सत्ता संभाली तो बिहार के घटिया स्तर नेताओं की मार झेल रहा झारखंड को उपर उठाना कोई सामान्य कार्य नहीं था, पर बाबू लाल मरांडी ने योग्य लोगों की मदद से जो खाका तैयार किया और उस पर जो चलने की कोशिश की...उसका फायदा सबने उठाया और आज भी वह फायदा देखने को मिल रहा है...
हालांकि बाबू लाल के विकासात्मक सोच को कुंद करने और झारखंड के विकास की पटरी को धराशायी करने का प्रयास उस वक्त के नीतीश भक्त नेताओं व विधायकों ने कम नहीं किया...। जिसका खामियाजा लाल चंद महतो, जलेश्वर महतो, बच्चा सिंह, गौतम सागर राणा आज भी उठा रहे है, जबकि मधु सिंह और रमेश सिंह मुंडा तो स्वर्ग ही सिधार गये...। इसलिए इन पर बोलना अब ठीक नहीं...पर सच्चाई यहीं है...
आखिर क्या किया बाबू लाल ने...आज इस पर चर्चा होना ही चाहिए, क्योंकि झारखंड अपने स्थापना के 15 साल पूरे कर लिए और आज 16 वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है...।
बाबू लाल का झारखंड को देन......
1. झारखंड के बच्चों को बिहार से पिंड छुड़ाया और सीधे सीबीएसई पैटर्न लागू करते हुए, झारखंड के बच्चों को एनसीईआरटी की पुस्तकें निःशुल्क थमा दी...पढ़ों और खुद को गढ़ो का सिद्धांत बाबू लाल ने झारखंड के बच्चों को दिया... और किसी से भेदभाव नहीं की....
2. झारखंड की आदिवासी बालिकाएँ कल्याण विभाग को जान सकी और वे साइकिल से अपने घरों से निकलती हुई, स्कूल पहुंचने लगी...ऐसा पहली बार सुंदर सा दृश्य झारखंड में देखने को मिला, जहां बेटियां आगे निकल रही थी...वह सरकार द्वारा दिये गये साइकिल से अपने स्कूल जा रही थी।
3. बाबू लाल जानते थे कि बिना आधारभूत सरंचना के झारखंड का विकास नहीं हो सकता...इसलिए उन्होंने जर्जर झारखंड को ठोस झारखंड बनाना शुरु किया...बड़े पैमाने पर पुल-पुलिया बनाये गये...सड़कों की दशा सुधारी गयी...उस वक्त लोग बोला करते थे कि गर बसे हिचकोले खाना बंद कर दें तो समझ लो, झारखंड आ गया...
4. भारतीय रेल की मदद ली...झारखंड में अच्छी ट्रेनें इन्हीं के शासनकाल में देखने को मिली, जो रांची में इक्के – दुक्के ट्रेन देखने को मिलते थे, जहां दिल्ली जाने के लिए कोई बेहतर ट्रेन नहीं थी, इनके शासन काल में भारत सरकार के सहयोग से रांची देश के सभी महत्वपूर्ण महानगरों से रेलमार्ग द्वारा जुड़ना शुरु हुआ...यहीं नहीं कई रेलवे प्रोजेक्ट भी उन्होंने शुरु करवाएं...ज्यादा जानकारी के लिए तत्कालीन रेलमंत्री और अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कोई भी दरवाजा खटखटा सकता है...
5. बाबू लाल ने भ्रष्टाचार पर भी सीधा चोट किया... मात्र एक साल में बाबू लाल मरांडी के शासन काल में सौ से भी ज्यादा भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी निगरानी की भेंट चढ़ चुके थे।
6. झारखंड के दलितों व आदिवासियों के आर्थिक उत्थान के लिए बाबू लाल मरांडी ने उन्हें बस, टेम्पू भी उपलब्ध करायी थी...
7. किसानों को कम कीमत पर पानी पटाने के लिए डीजल चालित मशीन उपलब्ध करायी गयी, यहीं नहीं जैसे ही सुखा पड़ने की आशंका होती, वे बैठक बुलाते और एक्शन लेते, ये अलग बात थी कि जैसे ही एक्शन की बात होती, प्रकृति इतनी बारिश कर देती कि राज्य से सूखे पड़ने की आशंका ही खत्म हो जाती...
8. बाबू लाल मरांडी के शासनकाल में ही विधानसभा में सरपल्स बजट पेश होता था...
9. बाबू लाल मरांडी ने ही झारखंड के मूलवासियों को उनका हक मिले, इसके लिए डोमिसाइल नीति की घोषणा की, इस नीति में कहीं भी कुछ गड़बड़ नहीं था, पर उनके विरोधियों ने उनके खिलाफ कुचक्र रचा, जिसके वे शिकार हुए...आखिर झारखंड जिनके लिए बना, उन्हें वह हक क्यों नहीं मिलना चाहिए...आखिर जो अन्य राज्यों में भी वहां का डोमिसाइल बनाकर लाभ ले रहे है, वे यहां भी उसका लाभ ले, यानी एक व्यक्ति का परिवार दो – दो जगहों का लाभ लें और यहां के आदिवासी – मूलवासी झारखंड में भी दोयम दर्जें का नागरिक बन कर रहें, क्या ये गलत नहीं?
10. आज जो विधानसभा भवन और उच्च न्यायालय भवन निर्माण की बात हो रही है, उसके लिए ग्रेटर रांची बनाने का स्वप्न किसका था, ये तो सबको मालूम होना चाहिए...
11. ये किसी को नहीं भूलना चाहिए कि झारखंड के मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ही थे, जो विकास के आधार पर देश के सभी राज्यों में से सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रुप में उस वक्त तीसरे स्थान पर पहुंच गये थे...जो आज तक कोई नहीं पहुंच सका....
12. जब उनका शासन था तो झारखंड का सम्मान था...जरा पूछिये मधु कोड़ा से और उनका समर्थन करनेवाले झामुमो, कांग्रेस और राजद के नेताओं व विधायकों से आज वो झारखंड को सम्मान क्यों नहीं मिलता...आखिर झारखंड के सम्मान के साथ खिलवाड़ किसने की...
13. भाजपा को शिखर पर ले जाने में भी बाबू लाल मरांडी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता...हमें याद है कि झारखंड बनने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई...। उस वक्त राजनाथ सिंह, अर्जुन मुंडा और बाबू लाल मरांडी ने संयुक्त रुप से प्रेस कांफ्रेस किया था...। हमारा सवाल था – बाबू लाल मरांडी से कि गर भाजपा सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा...बाबू लाल मरांडी ने बिना देर किये बताया – अर्जुन मुंडा। तुरंत यहीं सवाल अर्जुन मुंडा से मेरा था, अर्जुन मुंडा ने जवाब दिया कि पार्टी जो कहेगी, वो करेंगे, हालांकि वे भी दरियादिली दिखा सकते थे, पर उन्होंने नहीं दिखायी। ये वो समय था जब लाल कृष्ण आडवाणी के होठों पर अटल बिहारी वाजपेयी और अटल बिहारी वाजपेयी के होठो पर आडवाणी हुआ करते थे, पर झारखंड में बाबू लाल मरांडी के होठों पर अर्जुन मुंडा तो थे, पर अर्जुन मुंडा के होठों पर बाबू लाल मरांडी नहीं थे। एक बात और...झारखंड के राजनीति के धुरंधरों को ये जान लेना चाहिए कि अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले जाने में बाबू लाल मरांडी की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी... न कि किसी और नेता की...पर काल के पहिये ने... बाबू लाल मरांडी को भाजपा से इतना दूर कर दिया कि....वे भाजपा को आज की तारीख में पसंद ही नहीं करते...और न भाजपा के नेताओं को....
14. बाबू लाल मरांडी मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान अपने विरोधियों को भी उतना ही सम्मान देते थे, जितना आज तक किसी ने नहीं दिया...याद करिये...भाकपा माले विधायक दल के नेता महेन्द्र प्रसाद सिंह के प्रति विधानसभा में दिया गया उनका बयान बहुत कुछ कह देता है...जरा आज के नेताओं का बयान देख लीजिये....हालांकि बाबू लाल मरांडी आज भी अपने विरोधियों को उतना ही सम्मान देते है...चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट और ये पूछना...क्या जी, कैसे है, सब ठीक...
15. सिंगल विंडो सिस्टम हो या ग्रेटर रांची, सब पर बाबू लाल मरांडी का विजन क्लियर था...नक्सलवाद का सफाया हो...या बेहतर झारखंड निर्माण की ललक...सचमुच बाबू लाल मरांडी आज भी झारखंड की जनता के बीच उतने ही लोकप्रिय है, जितने कल थे...ये अलग बात है कि चुनाव के समय उनके सहयोग से लोग जीत तो जाते है, पर झारखंड के दलबदलू कल्चर से अनुप्राणित होकर, ये जीते विधायक बाबू लाल मरांडी को ही ठेंगा दिखा देते है...हमें लगता है कि ऐसे लोगों को भी जनता देख रही है...
एक बार फिर बाबू लाल मरांडी को हृदय से आभार...
क्योंकि उनकी सोच, आज भी झारखंड को मजबूत करती है...

Monday, November 16, 2015

एक पत्र झारखंड के मुख्यमंत्री को..........

सेवा में,
श्री रघुवर दास, मुख्यमंत्री, झारखंड।
विषय - क्या प्रभात खबर द्वारा किये जा रहे पाप को इसलिए छोड़ देना चाहिए, कि वह झारखंड में सर्वाधिक बिकनेवाला अखबार है?
महाशय,
सर्वप्रथम, आप ये जान लीजिये......
इसी साल अप्रैल महीने में अल जजीरा चैनल लगातार भारत के नक्शे से छेड़छाड़ कर रहा था और कश्मीर का गलत मानचित्र लगाकर समाचार प्रस्तुत कर रहा था, जिसे लेकर भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कड़ी कार्रवाई करते हुए भारत में अलजजीरा के प्रसारण पर पांच दिन के लिए रोक लगा दी थी.....
इसी साल पाकिस्तान में क्या हुआ, वह भी जान लीजिये....
10 सितम्बर 2015 पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक प्रोफेसर आबिदा नसरीन से ऐसी ही गलती हो गयी, उन्होंने एक सेमिनार में पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान में नहीं दिखाया। उसका परिणाम क्या हुआ? पाकिस्तान स्थित पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने इस घटना पर वहां के वीसी से रिपोर्ट मांगी। यहीं नहीं इंस्स्टीच्यूट ऑफ एजूकेशन एंड रिसर्च की सहायक प्रोफेसर आबिदा नसरीन को तत्काल प्रभाव से तीन महीने के लिए निलंबित कर दिया गया......
इसी साल आप के झारखंड में....
धनबाद का एक लड़का, धनबाद के झरिया में, एक धार्मिक जुलूस में पाकिस्तानी झंडा लेकर चल रहा था, उस पर कार्रवाई हुई, वो जेल भेज दिया गया।
इसी साल रांची से प्रकाशित एक अखबार फारुकी तंजीम ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़नेवाला लेख प्रकाशित किया। आपने उस पर कड़ी कार्रवाई की। तो फिर ऐसे में, रांची से ही प्रकाशित अखबार प्रभात खबर जो बार-बार भारत के मानचित्र को गलत ढंग से प्रकाशित करता है, उस पर आप कार्रवाई क्यों नहीं करते....
कल का यानी 15 नवम्बर 2015 के प्रभात खबर का लाइफ संडे अखबार देखिये...जिसमें भारत के मानचित्र को दर्शाया गया है, कैसे पाक अधिकृत कश्मीर को भारत से काट कर, प्रभात खबर ने दिखाया है। आश्चर्य है कि ये गलती कोई पहली बार नही हुई, वो बार-बार गलत करता है। मेरे पास उसके कई दृष्टांत मौजूद है। वो भारत के गलत मानचित्र प्रकाशित करता है, और माफी भी नहीं मांगता। डंके की चोट पर वो गलती किये जा रहा है, और आपकी सरकार उस पर कोई कार्रवाई नहीं करती, आखिर क्यों? क्या प्रभात खबर, भारत देश से भी बड़ा है....
आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप इस पर देशहित में एक्शन लेंगे...
भवदीय
कृष्ण बिहारी मिश्र
स्वतंत्र पत्रकार,
रांची।

Saturday, November 14, 2015

बाबा रामदेव का टूटता तिलिस्म............

योगगुरु के नाम से विख्यात, बाबा रामदेव आज देश के सुप्रसिद्ध उद्योगपतियों में से एक है...। अरबों के व्यवसाय, पूरे विश्व में चल रहे उनके दवा व खाद्यान्नों के व्यापार ने विश्व के बाजारों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है...यहीं नहीं बाबा रामदेव जो कल तक योग के ब्रांड थे, आज अपने प्रतिष्ठान से उत्पादित वस्तुओं का स्वयं को ही ब्रांड के रुप में प्रस्तुत कर विज्ञापन करते हुए भी नजर आ रहे है...आज इनके पास पैसों की कमी नहीं, पैसे इनके आगे – पीछे नाचती है...।
कल तक कांग्रेस के आंखों में खटकनेवाले बाबा, आज भी कांग्रेस के आंखों में बुरी तरह खटकते है...। कांग्रेस व कांग्रेस के लोग तो इन्हें फूंटी आंख नहीं समाते और न रामदेव व रामदेव के लोगों को कांग्रेस व कांग्रेस के लोग फूंटी आंख समाते है...। दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी है। बस मौका मिलना चाहिए, दोनों एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी में एक दूसरे से बीस निकलने की कोशिश में लग जाते है। रामदेव की जितनी कांग्रेस से खुन्नस है, ठीक उसके उलट भाजपा से प्रेम...। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कट्टर प्रशसंक बाबा भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं में खासा लोकप्रिय है। कमाल यह भी है कि बाबा यादव समुदाय से आते है, ज्यादातर यादव खासकर बिहार व उत्तरप्रदेश में भाजपा को पसंद नहीं करते, वे तो लालू और मुलायम को ही अपना सब कुछ मानते है, पर रामदेव का यादव होकर भी लालू व मुलायम को रास नहीं आना ज्यादातर लोगों के समझ से परे है...
हाल ही में रांची के किशोरी चौक पर एक बैनर देखा, जिसमें यादव महासभा ने रामदेव को यादव समुदाय का बताते हुए, गौरवान्वित महसूस किया था, जबकि अपने देश में कोई भी संत चाहे उसकी जाति जन्म से कुछ भी हो, वह सर्वग्राह्य बन जाता है, क्योंकि उसका जीवन सब के लिए हो जाता है, ठीक जैसे गंगा किसी से भेदभाव नहीं करती, उसी प्रकार संत किसी से भेदभाव नहीं करते...। पर रामदेव संत हैं या यादव या उदयोगपति, इसको लेकर अब चर्चा चल पड़ी है। इतिहास खंगाले तो पता चलेगा कि देश में आज तक किसी संत ने दुकान नहीं खोली, न व्यवसाय का पल्लू पकड़कर, विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाते हुए राजनीति में दखलंदाजी की। हां, इतना जरुर किया कि जो उनके पुश्तैनी कार्य थे, उस पुश्तैनी कार्य में लगते हुए, भगवान को प्राप्त करने के मार्ग को चुन लिया। राजनीति में दक्ष और भारत स्वामिमान ट्रस्ट बनाकर, अपने चहेतों में लोकप्रिय रामदेव को शायद मालूम नहीं कि जब अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास को अपने राजमहल में बुलाने की जुर्रत की, तब गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट रुप से कहा था – मोसो कहां सीकरी सो काम अर्थात् मुझे फतेहपुर सीकरी से क्या काम... पर यहां ठीक इसके उलट है, रामदेव को राजनीतिज्ञों के बीच रहना, उठना-बैठना, राजधानी में रहनेवाले मुख्यमंत्रियों से वार्ता करना उनका आनन्द का विषय होता है।
रामदेव का रांची आना – जाना बराबर लगा रहता है। यहां के कई व्यवसायी बाबा के परम भक्त है। भाजपा की सरकार होने के कारण इनकी भक्ति का पैमाना और छलकता है। पिछले तीन नवम्बर को बाबा पुनः रांची पधारे, खुब जमकर प्रचार- प्रसार किया गया। उनके कार्यक्रम में भाग लेने के लिए शुल्क तय किये गये। ये शुल्क इंट्री कार्ड पर रखे गये थे, जिसके लिए कई व्यवसायिक केन्द्रों को कार्ड बेचने के लिए चुना गया था, पर सच्चाई ये है कि वे कार्ड इक्के दुक्के ही बिके, बाकी धरे के धरे रह गये...। रामदेव के एक दिन आने के पूर्व शोभायात्रा भी निकाली गयी, पर वह शोभा यात्रा भी बेकार साबित हुई...। बाबा 2 नवम्बर को जब सायं समय रांची हवाई अड्डे पर आये, तब वहां उनके स्वागत में भी कोई खास भीड़ दिखाई नहीं पड़ी, इतने लोग पहुंचे थे, जिन्हें हाथों से गिना जा सकता था...। जो लोग रामदेव को जानते है, वे ये भी जानते है कि पहले रामदेव का स्वागत कैसे किया जाता था? और कैसे उनके लिए जन-ज्वार उमड़ पड़ता था?
आपको ज्ञात हो, रांची से प्रकाशित एक अखबार तो बाबा रामदेव के पीछे ऐसा उमड़ता था, जैसे लगता हो, कि वे भगवान हो...। यहीं नहीं इस अखबार ने तो इनकी स्तुति भी गायी थी। उन्हें अपने यहां एक दिन का संपादक भी बना डाला था...। अखबार की आवभगत से खुश बाबा उस अखबार के पक्ष में कशीदे भी पढ़े थे। अर्जुन मुंडा के शासनकाल में आये बाबा ने ऐलान किया था कि आनेवाले पांच वर्षों में भारत विश्वगुरु बन जायेगा। प्रभात खबर ने प्रमुखता से इस खबर को प्रथम पृष्ठ पर छापा था...। पांच से ज्यादा साल बीत गये, पता नहीं भारत विश्वगुरु बना या नहीं, पर बाबा सुप्रसिद्ध उद्योगपति जरुर बन गये...उनका कारोबार विश्वस्तर तक जरुर पहुंच गया...वे संत से सुप्रसिद्ध उदयोगपति का तमगा जरुर ले लिये, यानी रामदेव पहले संत हुए, जो उद्योगपति भी है, राजनीतिज्ञ भी है, संत भी है, गुरु भी है...यानी बहुमुखी प्रतिभा के धनी...। कलयुग का प्रभाव कहिये...या और कुछ...पर सच्चाई तो यही हैं...
इन हालातों में हमारी नजर बाबा रामदेव के कार्यक्रम पर थी...अचानक 2 नवम्बर को मेरे मोबाइल पर मैसेज आया कि आप रामदेव के कार्यक्रम में सपरिवार शामिल हो, इंट्री फ्री है...। हमें समझ में नही आया...मुझे योग में दिलचस्पी नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाया जा रहा, निमंत्रण क्यों दिया जा रहा...। इसके पूर्व तो हमें संवाददाता सम्मेलन में भी नहीं बुलाया जाता था...अचानक आस-पास बैठे लोगों के पास भी इस प्रकार मैसेज आने लगे...। मुझे समझते देर नहीं लगी कि बाबा को बहुत बड़ा झटका लगनेवाला है...। लोगों की बाबा में दिलचस्पी घटने लगी है...। इंट्री कार्ड नहीं बिका है...। जब इंट्री कार्ड ही नहीं बिका और लोगों की दिलचस्पी घट रही तो फिर सुबह साढ़े सात बजे 3 नवम्बर को भीड़ कहां से आयेगी... तो नुस्खा निकाला गया, सभी को मोबाइल मैसेज करिये...बाबा से मिलिये...। सच्चाई ये है कि उसके बाद भी बाबा रामदेव को वो माइलेज नहीं मिला, जो माइलेज कभी मिला करता था...।
आज से ठीक छह-सात साल पहले एक बाइट लेने के लिए संवाददाताओं को तेल निकल जाते थे, पर आज बाबा टीवी वालों को ढूंढ रहे थे, पर टीवी वाले नजर नहीं आ रहे थे। लाइफ रांची निकालनेवाले के लिए तो बाबा एक आयटम थे, आयटम के रुप में उसने जगह दी और बाबा ने उसकी प्रशंसा कर दी...और लाइफ रांची वालों ने उसका भी न्यूज बना दिया...यानी जीव विज्ञान आपने पढ़ा होगा...तो आपने सहजीविता जरुर पढ़ा होगा... जिसमें दो जीव एक दूसरे पर आश्रित रहकर साथ – साथ जीवन जीते है और उससे किसी को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता...। इसी सहजीविता के आधार पर प्रभात खबर और रामदेव ने पिछले दिनों अपनी भूमिका निभायी।
इसी दरम्यान बाबा के मन में छुपा हुआ – भयंकर दर्द से भी मेरा आमना –सामना हुआ। बाबा रामदेव ने रांची में दर्दे बयां किया कि उन्हें नोबल पुरस्कार इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि वे काली चमड़ी वाले है, नोबेल पुरस्कार गोरी चमड़ीवालों को दिया जाता है...यानी भारत स्वाभिमान की बात करनेवाले, भारत माता की जय बोलनेवाले, भारत-भारती की जमकर दुहाई देनेवाले विदेशी पुरस्कार नोबेल के लिए कितने लालायित है...वो पता चल गया...ऐसे संत है...बाबा रामदेव...। ऐसी है, इनकी भारत भक्ति...। हमारे देश में बहुत सारे संत है, संत होंगे भी पर किसी ने ऐसी पीड़ा व्यक्त नहीं की, जो रामदेव ने कर दी...यानी हमारे देश के संत-परंपरा का अपमान...
अरे रामदेव जी संत जो होता है, वो किसी पुरस्कार का भूखा नहीं होता...
धन का भूखा नहीं होता...
वो दुकान नहीं खोलता...
वो मार्गदर्शन करता है...
वो करता नहीं, कराता है, और बदले में स्वयं के लिए कुछ नहीं कर पाता...
बाद में तो वो गर्व से यहीं कहता है...जो कबीर ने कभी कहा था...
सुना देता हूं...
यहीं चादर सुर-नर-मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैली कीनी चदरिया...
दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया...

Wednesday, November 11, 2015

धिक्कार, उन कलमों को...उन चैनलों को...

धिक्कार, उन कलमों को...उन चैनलों को...
जो बिहार चुनाव परिणाम का सही विश्लेषण न कर सकें...
• जीत कर भी हार गये नीतीश...
(संदर्भ – बिहार चुनाव परिणाम)
आइये हम आपको एक कहानी सुनाते है। दो बिल्लियां थी। उन्हें कहीं से एक रोटी मिली। एक रोटी के टूकड़े में अधिक हिस्से पाने को, वे आपस में लड़ पड़ी। दो बिल्लियों को आपस में लड़ता देख, कहीं से आए वानर ने कहां कि लाओ इस रोटी को, हम तुम दोनों के बीच में बराबर – बराबर बांट दें, फिर क्या था? बिल्लियों ने हामी भर दी और वह चालाक वानर इन दोनों बिल्लियों को मूर्ख बनाकर सारा रोटी हजम कर गया.........
बिहार चुनाव परिणाम के संदर्भ में बचपन में सुनी इस कहानी में, आप दो बिल्लियों में एक को जदयू और दूसरे को भाजपा के रुप में रख सकते है। हालांकि बहुत सारे लोगों को ये कहानी बिहार संदर्भ चुनाव में गले से नहीं उतरेगी। उतरना भी नहीं चाहिए, क्योंकि बहुत सारी ऐसी कहानियां है, जो गले में तब उतरती है, जब कोई घटना का बहुत बुरा अंजाम सामने आता है...क्योंकि कहानियां समझ में आ जाये और उस अनुरुप हम कार्य करें, ऐसा होता भी नहीं......
बिहार के चुनाव परिणाम बताते है कि नीतीश की लालू भक्ति की वजह से लालू यादव एक बार फिर किंग मेकर बने है और नीतीश स्वयं फिसड्डी। नीतीश जानते थे कि लालू कृपा बिना इस बार वे मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, इसलिए उन्होंने अपने सारे अहं का त्याग कर लालू कृपा पाने के लिए वे लालू के चरणों में लोट गये...हुआ वहीं, यादवों के नेता लालू ने, कुर्मियों के नेता नीतीश को गले लगाया और कहा कि तुम चिंता क्यों करते हो?, हम यादव नेता, तुम कुर्मी के नेता और बचा मुसलमान...तो मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु कौन है, तो वह हैं भाजपा....। मुसलमानों का नारा क्या होता है?...बस वहीं वोट उसी को जायेगा, जो भाजपा को हरायेगा....और जब हमारा कंबिनेशन बनेगा तो वो जायेगा कहां...उसका वोट इधर ही आयेगा....और हुआ वहीं....यादव, मुस्लिम और कुर्मी तीनों मिल गये और भाजपा धराशायी..........
सच्चाई यहीं है... इसमें कोई अरंतु-परंतु नहीं, ये अलग बात है कि नीतीश-लालू भक्ति और इन दिनों मोदी से परेशान मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग इस परिणाम के बाद लंबा-चौड़ा संपादकीय दिये जा रहा है...
हम आपको एक और कहानी सुनाते है.........
बिहार के एक मुख्यमंत्री थे – कर्पूरी ठाकुर। वो बराबर कहा करते थे। आप कितना भी विकास कर लो, बिहार में विकास के नाम पर वोट थोड़े ही पड़ता है। यहां तो सिर्फ कंबिनेशन चलता है...ये कंबिनेशन हमेशा से रहता है, ये अलग बात है कि इसका फायदा कोई – कोई, कभी – कभी उठाता है और कोई हमेशा उठाता रहता है....
नीतीश ने कम दिमाग नहीं लगाया था...वो मीडिया के महत्व को भी जानता था। इसलिए उसने प्रभात खबर के प्रधान संपादक पर डोरे डाले, पता चला कि ये तो राज्य सभा भेजने में ही गदगद हो जायेंगे, उसे राज्य सभा भेज दिया। फिर देखा कि एनडीटीवी को भी उपकृत करना चाहिए, पता चला कि रवीश का भाई चुनाव लड़ना चाहता है, नीतीश ने बहुत बड़ा त्याग किया। निरंतर जदयू की सीट रहनेवाली गोविंदगंज की सीट रवीश के भाई को थमा दी, कांग्रेस के टिकट पर रवीश का भाई लड़ा, ये अलग बात है कि वह चुनाव हार गया, पर कशिश चैनल के मालिक ने तो बेनीपुर में जदयू के टिकट पर आखिरकार झंडा बुलंद कर ही दिया। यानी नीतीश ने राजनीति के साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई और वो चीजें पाई, जिसको लेकर वो ज्यादा सक्रिय था.....
पर नीतीश को भी मालूम है कि सरकार तो उसकी बनी पर उसके क्या परिणाम निकले....कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। याद करिये, चुनाव परिणाम के बाद का नीतीश, लालू और अशोक का संयुक्त प्रेस काँफ्रेस। जो शारीरिक विज्ञान को जानते है, उन्हें ज्यादा दिमाग लगानी नहीं पड़ेगी, जो बयानों की तकनीक को जानते है, उन्हें भी ज्यादा दिमाग लगाना नहीं पड़ेगा। नीतीश ने चुनाव परिणाम की बारीकियां समझी और उसी के अनुसार बयान दिया, ज्यादा आक्रामकता नहीं दिखाई, चेहरे पर भी जीत का भाव नहीं दिखा, एक संशय जरुर दिखा...जबकि इसके विपरीत लालू गदगद, वो सारी बाते लालू ने कहीं, जो उनके स्वभाव में है, इस प्रेस कांफ्रेस में भी, उन्होंने उनलोगों को चेता ही दिया कि जो वोट उन्हें नहीं दिये, वे संभल जाये... यानी इशारा किस ओर था, इशारों को समझने वाले जान गये है...
अब दूसरी बात..........
नीतीश से कुछ सवाल, जो उनके भक्त पत्रकार उनसे नहीं पूछ सकते या उनसे अनुप्राणित मीडिया का वर्ग, या उनके जाति के पत्रकार नहीं पूछ सकते.....
क्या नीतीश-लालू बता सकते है, कि जब उनका गठबंधन इतना ही लोकप्रिय था और जब कुर्मी, यादव और मुस्लिमों का इतना बड़ा गठजोड़ था तो फिर वे कुर्मी, यादव और मुसलमान बहुल राजधानी पटना के पटनासिटी, कुम्हरार, दीघा, बांकीपुर और दानापुर की सीट पर बुरी तरह से क्यों हार गये?
क्या नीतीश बता सकते है कि जब उनका शासन बहुत ही लोकप्रिय था तब उनकी सीटे लालू से भी कम क्यों आयी?
क्या नीतीश बता सकते है कि जब चुनाव परिणाम आ रहा था तो राजधानी पटना के व्यवसायियों और अन्य प्रबुद्ध वर्गों में भय क्यों व्याप्त हो रहा था?
क्या नीतीश बता सकते है कि उनके स्पीकर और अन्य मंत्रियों की करारी हार कैसे हो गयी?
क्या नीतीश बता सकते है कि इतनी बड़ी जीत के बाद भी, उन्हीं के द्वारा आयोजित प्रेस कांफ्रेस में उनके चेहरे का रंग उतरा हुआ क्यों था?
क्या नीतीश दावे के साथ कह सकते है कि उन्होंने इस चुनाव में प्रधानमंत्री के खिलाफ निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग नहीं किया?
क्या नीतीश दावे के साथ कह सकते है कि उन्होंने मीडिया जगत के लालची पत्रकारों और लालची मालिकों को खुश करने के लिए वे सारे हथकंडे नहीं अपनाए, जो भाजपा ने अपनाए थे?
ये सारे सवाल सिर्फ नीतीश से पूछना चाहिए, क्योंकि वे सुशासन बाबू है, लालू से तो पूछने का सवाल ही नहीं है...क्योंकि वे खुद ही बता चुके है, इस चुनाव में कि वे क्या है?
नीतीश जी, ये याद रखिये.....जब कोई जीतता है तो उसके जीत का कारण कोई नहीं पूछता, हां जो हारता है, उसके हार के कारण गिनाएं जाते है.....
मैं जानता हूं कि बहुत सारे अखबार और मीडिया हाउस में भी जातिवादी पत्रकारों और लालची पत्रकारों का समूह पैदा हुआ है, जो कभी कांग्रेस, तो कभी भाजपा और आज आपका गुणानवाद कर रहा है, पर इससे नुकसान किसका हो रहा है। आप ये जानकर भी अनजान है....नुकसान उन बेवकूफों का हो रहा है, जो नहीं जानते कि पिछले पच्चीस और अब आज से तीस सालों तक वे अभी सड़कों, बिजली और पानी पर ही अटके हैं जबकि अन्य राज्य इन सबसे कहीं बहुत दूर निकल चुके है.....
ये बेवकूफ बन रहे लोग नहीं जानते कि उनके बच्चे विकसित होते कई राज्यों में दोयम दर्जें के नागरिक बन कर रह रहे हैं और उनकी औकात सिर्फ कुली, पोछा लगानेवाले से ज्यादा कुछ भी नहीं...
आप में जितना अहं हैं, हमें नहीं लगता कि केन्द्र और राज्य के बीच कोई मधुर संबंध रहेगा और आप बिहार को इन परिस्थितियों में जबकि राजद आपसे बीस है, कोई राज्यहित में स्वतंत्र रुप से निर्णय ले लेंगे.....
• नीतीश भक्ति और प्रभात खबर...........
सभी जानते है कि जैसे ही बिहार चुनाव की घोषणा हुई, दिल खोलकर प्रभात खबर ने लालू यादव, नीतीश कुमार, सोनिया गांधी और उनके लाडले राहुल की भक्ति में स्वयं को अनुप्राणित करना शुरु कर दिया....ऐसा होना भी चाहिए था क्योंकि नीतीश कुमार ने बिना एक पैसे प्रभात खबर से लिये, इसके प्रधान संपादक को राज्य सभा में पहुंचा दिया था....
प्रभात खबर की भूमिका देखिये, उसकी महागठबंधन भक्ति देखिए........
उसके लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत नहीं, बस 9 नवम्बर का अखबार कहीं से उठा लीजिये और सबसे पहले प्रथम पृष्ठ पर नजर दौड़ाइये...उसने भाजपा के हार के कारण गिनाएं है, लिखा है...भाजपा के हार के प्रमुख कारण, निम्नलिखित है....
• आरक्षण पर संघ प्रमुख भागवत का बयान
• नीतीश के डीएनए पर सवाल उठाना
• गोमांस को लेकर अनावश्यक बयानबाजी
• लालू को शैतान कह कर हमला करना
• नीतीश पर बिना तथ्यों के हमला करना
• प्याज, दाल की कीमतों में भारी वृद्धि
• नीतीश के मुकाबले राज्य में एनडीए के पास कोई दमदार चेहरा का न होना
• नीतीश सरकार के कामकाज के प्रति लोगों की सकारात्मक राय
यानी हार के 8 कारणों में नीतीश व लालू की भक्ति में पांच कारण जोड़ दिये गये....
यहीं नहीं प्रथम पृष्ठ पर लिख दिया लालू प्रसाद के बेटों तेज प्रताप व तेजस्वी को छोड़ कर सभी नेतापुत्रों को मिली हार, जबकि खुद पृष्ठ संख्या 13 पर शिवानंद तिवारी के बेटे को भी जीत दिखलाता है, सच्चाई क्या है? प्रभात खबर ही बेहतर बता सकता है....
इस अखबार में नीतीश के प्रशसंकों के कई आलेख भी छपे है...
पृष्ठ संख्या 13 पर प्रंजॉय गुहा ठकुराता के आलेख है – सांप्रदायिकता की राजनीति की पराजय। सवाल - ठकुराता से। 2005 व 2010 में जब नीतीश भाजपा का बांह पकड़कर सत्ता में आये थे तो उस वक्त क्या सांप्रदायिकता की राजनीति की जय हुई थी?
पृष्ठ 14 पर संपादकीय में तो नीतीश भक्ति के सिवा कुछ भी नहीं, अभिमत में रविभूषण जो वामपंथी पत्रकार है, विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी है, इनके कलम से मैंने आज तक भाजपा व संघ की प्रशंसा में दो शब्द नहीं देखे तो आज कैसे देख पाउंगा...हां पत्रकार को कभी भी किसी का सदा के लिए विरोधी या सदा के लिए प्रेमी नहीं होना चाहिए...पत्रकार को तटस्थ होना चाहिए.......
पृष्ठ संख्या 15 तो भगवान नीतीश को समर्पित है...हल्की दाढ़ीवाले बाबा नीतीश का बहुत बड़ा फोटो और उनका चरित्र वर्णन है...ये आम तौर पर होता है, जब कोई सत्ता में आता है तो उसके लिए एक विशेष पेज होता है...इस पर हमें कोई टिप्पणी नहीं करनी है.......
पृष्ठ संख्या 18 पर चरणवार भाजपा की हार का मनगढंत विश्लेषण और अजय कुमार व एमएन कर्ण का संपादकीय आधारित आलेख है, जिसमें नीतीश व लालू को भगवान का दर्जा दे दिया गया है।
और अंतिम पृष्ठ पर भाजपा व संघ का दुश्मन व जब तक जीवित रहेगा दुश्मन बना रहेगा...नाम बता देता हूं, उर्मिलेश का आलेख है। ये वहीं उर्मिलेश है, जिसे चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू में सामाजिक न्याय नजर आता है और नीतीश में शासन के सर्वगुण संपन्न होने के गुण...ये पत्रकार जहां भी भाजपा का विरोध हुआ देखता है, पुलकित हो जाता है, और जहां अपनी जाति के लोगों को जीत देखता हैं, प्रसन्न होकर उसकी स्तुति करता है....इन दिनों प्रभात खबर का चहेता बना हुआ है... इसके आलेख है........
यानी गर आप नीतीश के कट्टर समर्थक है, भाजपा का विरोध करना जानते है, तो हरिवंश को पकड़िये, प्रभात खबर से जूड़िये और कल तक खलनायक थे, तो नायक बन जाइये.........
अपनी बात.......
नीतीश के जीत के कारण...
एकमात्र जीत का कारण – जातिवादी लहर को फैलाना, लोगों को उनकी जाति का हवाला देना, यादववाद, कुर्मीवाद और अंत में मुस्लिमों के अंदर ये बात फैलाना कि भाजपा आई तो उनकी खैर नहीं........
भाजपा के हार के कारण.....
• जातिवाद लहर के आगे संप्रदायवाद की हवा निकल जाना।
• बेवजह असहिष्णुता का बवंडर विपक्षियों द्वारा अपने शुभचितकों, लेखकों, फिल्मकारों साहित्यकारों द्वारा खड़ा करना, ताकि मोदी सरकार को अल्पसंख्यक विरोधी और हिंदूवादी बताया जाय।
• भाजपा के कई नेताओं द्वारा विषवमन करना।
• भाजपा के अंदर शत्रुघ्न सिन्हा जैसे जयचंदों का बराबर अपनी ही पार्टी के खिलाफ विषवमन करना और नीतीश व लालू का प्रशंसा करना।
• भाजपा के एक नेता साक्षी महराज द्वारा दूसरे चरण के बाद भाजपा की हार स्वीकार करनेवाले बयान को जारी करना।
• एकमात्र मोदी के भाषण पर ही ध्यान टिका कर, अन्य चुनाव प्रचारों व सशक्त जनसमर्थन जुटाने पर ध्यान का न होना।
• सामान्य वर्ग द्वारा बढ़ती महंगाई के खिलाफ गुस्सा।
• प्रधानमंत्री द्वारा पूर्व में दिये गये बयान कि काला धन वापस लायेंगे, पर अभी तक उस पर कोई प्रगति का न होना, जबकि कोई भी सरकार आये, ये इतना जल्द संभव भी नहीं, पर आम जनता को लगा कि सरकार अपने इस वायदे को पूरा करने में सफल नहीं रही।
• मीडिया के एक बहुत बड़े वर्ग द्वारा नीतीश को खुलकर समर्थन करना और उसे बिहार की जनता के बीच एक महान शख्सियत के रुप में पेश करना, जैसे ये दीने इलाही अकबर हो।
• नीतीश द्वारा अनुप्राणित अखबार जैसे प्रभात खबर और कुछ चैनलों द्वारा खुलकर नीतीश भक्ति में डूब जाना।
चुनाव परिणाम के प्रभाव............
• अब नीतीश कुमार गर चाह लें कि वे स्वतंत्र रुप से बिहार के लिए कोई निर्णय कर लें, ये अब संभव नहीं है, उन्हें हर बात के लिए लालू की शरण में जाना होगा और लालू वहीं करेंगे, जो उनके हित में होगा।
• लालू सर्मथकों का स्थानीय प्रशासन पर बोलबाला रहेगा, गुंडों की जमात स्थानीय शासन पर हावी रहेगी और व्यापार में बिहार पिछड़ता चला जायेगा।
• ऐसे ही बिहार की नकारात्मक छवि पूरे देश में है, अब इसकी छवि और पुष्ट होगी, कोई भी उदयोग जगत का व्यक्ति यहां उद्योग लगाने से हिचकेगा, जो अब बचा भी होगा तो यहां से दूसरे जगहों पर वो सिफ्ट करेगा।
• ऐसे ही अहंकार में डूबे नीतीश को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से नहीं बनती, ऐसे में विकास को लेकर बिहार में संशय की स्थिति बनी रहेगी।
• पन्द्रह साल लालू-रावड़ी और दस साल नीतीश और अब फिर लालू-नीतीश मतलब एक बार फिर रोजगार की तलाश में जाने को मजबूर बेरोजगार युवकों की फौज बिहार को छोड़ अन्य राज्यों में जाने को मजबूर होगी।
• एक बार फिर बिहार के ये युवा महाराष्ट्र, असम, कर्णाटक आदि राज्यों में दोयम दर्जें के नागरिक बन कर रहने को विवश होंगे और समय-समय पर जलील होंगे, पिटाई खायेंगे...क्या नीतीश व लालू बता सकते है कि महाराष्ट्र व गुजरात से कितने युवा बिहार में रोजगार के लिए आते है।
• एक बार फिर बिहार के लोग अच्छी स्वास्थ्य सेवा के लिए बिहार से दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर होंगे।
• एक ओर जहां आंध्र प्रदेश अपनी नई राजधानी अमरावती को बसाने के लिए ठोस प्रयास कर रहा होगा, तो बिहार की जनता अपनी जातिवाद पहचान के लिए संघर्ष करती नजर आयेगी।
• एक साल में झारखंड व्यापार सुगमता सूचकांक में भारत के प्रमुख विकसित राज्यों में तीसरा स्थान बना लिया और तेजी से बढ़ते राज्यों में चौथा स्थान प्राप्त कर लिया और बिहार सबसे नीचे रहने के लिए स्थान बनाने को व्याकुल रहेगा।
• प्रभात खबर के प्रधान संपादक एक बार फिर राज्यसभा में जाने के लिए नीतीश कुमार की द्यादृष्टि पाने के लिए लालायित रहेंगे और सामान्य जनता इस बात के लिए व्याकुल रहेगी कि उसके घर से निकली बेटियां सही सलामत घर लौटेंगी भी या नहीं।
कौन कहता है कि बिहार में विकास व सुशासन की जीत है, मैं कहता हूं कि ये पूर्णतः जातिवाद की जीत है...जैसे सांप्रदायिकता बुरी है, वैसे ही जातीयता बुरी है, पर कुछ पत्रकार, कुछ बुद्धिजीवी जातीयता का तो समर्थन करते है, पर सांप्रदायिकता की आलोचना...ठीक उसी प्रकार जैसे पाकिस्तान भारत प्रायोजित आतंकवाद का तो समर्थन करता है, पर अन्य जगहों पर होनेवाले आतंकवाद की कड़ी भर्त्सना करता है...ये दोगली सोच बिहार को बर्बाद कर डालेगी...पता नहीं, बिहार की जनता को अक्ल कब आयेगी?
हमें लगता है कि एक दिन अक्ल जरुर आयेगी...पर तब तक बहुत देर हो चुका होगा...और कुछ लोग गाने गायेंगे...सब कुछ लूटा के होश में आए तो क्या किया....

Thursday, November 5, 2015

लालू यादव ब्राह्मणों को अच्छी गाली दे लेते है...........

लालू यादव ब्राह्मणों को अच्छी गाली दे लेते है...........
बिना ब्राह्मणों को गाली दिये, लालू का भोजन पचता भी नहीं.......
लालू यादव दुनिया के पहले नेता नहीं जो ब्राह्मणों को गाली देता है, ऐसे कई नेता है जो ब्राह्मणों को गाली देना शान समझते है, इससे उन्हें वोटों में बढ़ोत्तरी होती है और उनके दल का प्रचार – प्रसार भी हो जाता है। कंस की परंपरा को वर्तमान युग में भी ले चलने की उनकी सोच बहुत ही निराली है। स्थिति ऐसी है कि एक समय उनके घोर विरोधी माने जानेवाले अखबार के प्रधान संपादक भी, अपने अखबार में उनके दिव्य फोटो छापने से अब परहेज नहीं करते, क्योंकि उनके प्रिय नेता नीतीश कुमार के बड़े भाई के नाम से आजकल लालू यादव विख्यात हो रहे है.......अपने प्रिय नीतीश को वे भला निराश कैसे कर सकते है...। कुछ लोग कहते है कि शिवानंद तिवारी और मनोज झा जैसे ब्राह्मण लालू की पार्टी में है, तो भाई मेरे रावण को भी कुछ लोग ब्राह्मण कहा करते है, तो ऐसे में क्या हम शिवानंद तिवारी और मनोज झा जैसे लोगों को इसलिए हम ब्राह्मण मान लें कि उसने ब्राह्मण कुल में जन्म ले लिया। जो लालू यादव जैसे ब्राह्मण द्रोही की शरण में बैठकर, उसके भ्रष्टवाणियों को सुने, जो पशुओं के चारा खा जानेवाले भ्रष्ट नेताओं की आरती उतारे वह किसी जिंदगी में ब्राह्मण नहीं हो सकता....। उसके हाथ से तो जल ग्रहण करना या अपने बच्चों पर आशीर्वाद के रुप में पुष्प-अक्षत छिड़कवाना भी महापाप है....जो भी ब्राह्मण लालू यादव अथवा उसकी पार्टी या उसके समर्थकों का गुणगान करता है, वह महापातक है, उसे तो नर्क में भी जगह नहीं मिले....जो गोमांस का समर्थन करे, वह गोपालक कैसे हो सकता है, वह गोसंहारक है..........
सही मायनों में अभी लालू यादव को ब्राह्मण से भेंट ही नहीं हुआ है, जिस दिन भेंट हो जायेगा, उन्हें पता चल जायेगा, कि ब्राह्मण क्या होता है?, वे मनोज झा और शिवानंद तिवारी जैसे ब्राह्मण, जो उनकी चरणवंदना करते है, वे समझ लेते है कि बस अब ब्राह्मणों की यहीं औकात है...अरे लालू जी, जिस दिन ब्राह्मण अपने तेज को पहचान लिया तो फिर आप कहां रहोगे, आपको पता ही नहीं चलेगा...
हां एक बात और, आपको आपके किये का फल ब्याज समेत ईश्वर दे रहा है, फिर भी आपको शर्म नहीं...शर्म आयेगी भी कैसे, शर्मवालों को न शर्म होता है...आप तो विशुद्ध रुप से बेशर्म है....बोलने की तो आपको तमीज है नहीं और न ही आप बोलने की तमीज सीखेंगे, क्योंकि आप नमूने जो ठहरें, हमें तो लगा था कि बिहार की सत्ता से दस साल बेदखल होने के बाद आपको बुद्धि आ गयी होगी, पर आप तो वहीं है, न सुधरे थे, न सुधरे है, न सुधरेंगे........
खुब गाली दीजिये ब्राह्मणों को, हो सके तो सारे चैनलों पर संतों की तरह प्रातः का एक बुलेटिन बुक करवा लीजिये, और जी भरकर ब्राह्मणों को गाली दीजिये, क्योंकि जब तक आप ब्राह्मणों को गाली नहीं दीजियेगा, तब तक आपका और आपके दल का उद्धार कैसे होगा.....वोट कैसे मिलेगा, आप धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील कैसे कहलाइयेगा....हां आप ही के एक दल में एक नेता है, शायद उसका नाम रघुवंश प्रसाद सिंह है। उससे ज्ञान भी अर्जन करिये, वो बतायेगा कि गोमांस कब और कैसे खाया जाता है?, कौन- कौन ऋषि गोमांस खाकर भगवान को प्राप्त कर लेते थे? इससे एक नये समाज का जन्म होगा। सुबाहुवाद और मारीचवाद बिहार के कण-कण में फैलेगा, तब परिकल्पना कीजिये....अपना बिहार कितना सुंदर दीखेगा....जब सब बिहारी भाईयों के हाथों में गोमांस होगा....और जोरदार नारा लगायेंगे, नारा इस प्रकार होगा.....
गोमांस हम खायेंगे,
लालू के संग जायेंगे....
धन्य – धन्य बिहार प्रदेश,
जहां मिले गोमांस अनेक....
यादव-मुस्लिम भाई-भाई
गोमांस से करो कमाई....
भाईचारा तभी आयेगा,
जब गोमांस सब खायेगा....
शाकाहारी मुर्दाबाद,
मासांहारी जिन्दाबाद.....
शाक-सब्जी नहीं खायेंगे
केवल गोमांस घर लायेंगे.....
रोज सबेरे, एक ही काम
ब्राह्मणों का, कर दो काम तमाम....
और लालू जी आपके लिए एक और काम की बात....सारे बिहार के लोगों को बता दीजिये कि कैसे कश्मीर से सारे कश्मीरी पंडितों को भगा दिया गया और आज वहां केवल मुस्लिमों की आबादी शान से रह रही है....इसलिए बिहार में भी ब्राह्मणों को हटाने के लिए नीतीश कुमार के साथ एक व्यापक आंदोलन चलाईये ताकि बिहार से ब्राह्मणों का सदा के लिए सफाया हो जाय और आप माई समीकरण के तहत जब तक जिंदा रहे राज करें.....फिर आपके बेटे-बेटियां राज करें....कालांतराल के बाद जब मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ जाये तो फिर आप के खानदान के लोग सदा के लिए उन्हें सत्ता सौंप दें....बाद में आपकी आनेवाली पीढ़ी खुद भी यह कहकर धर्मांतरण कर लें कि उन्हें लोकतंत्र में गहरी आस्था है..........