Sunday, March 31, 2013

हनुमान मंदिरों का शहर - रांची......................

मेरा रांची से 28 सालों का रिश्ता है। इस दौरान रांची में, मैंने बहुत कुछ देखा और महसूस किया। सर्वाधिक अचरज में डाला - रांची के लोगों का हनुमान प्रेम। ये हनुमान प्रेम ही हैं कि रांची में यत्र-तत्र-सर्वत्र हनुमान ही  हनुमान दीखते है। कोई ऐसा इलाका नहीं, जहां हनुमान विद्यमान न हो। ऐसे कहा भी गया हैं कि हनुमान, इस कलियुग के एकमात्र जीवित देवता हैं, जो सरल, सहज व सहृदय हैं, भक्तों की जल्द सुनते हैं और हर प्रकार के कष्टों से मुक्त कर देते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि रांचीवासियों को संकटमुक्त करने के उद्देश्य से, रांचीवासियों ने इन्हें यत्र-तत्र-सर्वत्र स्थापित कर दिया हैं और लगे हाथों हनुमानजी ने भी, रांचीवासियों की सुरक्षा का भार संभाल लिया हैं। आखिर कहां- कहां हनुमानजी हैं, सबसे पहले हम इसकी चर्चा करते हैं।
प्रारंभ रांची जंक्शन से - गर आप झारखंड अथवा रांची के बाहर के निवासी हैं तो आप सबसे पहले रांची जंक्शन आये। आप देखेंगे कि स्टेशन से बाहर निकलते ही उत्तर की ओर, संकटमोचन हनुमान मंदिर दीखेगा, जिसे टेम्पूचालकों, रिक्शाचालकों और स्थानीय लोगों ने स्थापित किया हैं। रांची जंक्शन के सौंदर्यीकरण के दौरान इस मंदिर को स्थानांतरित करने का प्रयास करने की कोशिश की गयी, फिर क्या था, लोग उबल पड़े। खूब भजन-कीर्तन होने लगी। विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जूड़े लोग आ खड़े हुए और सौंदर्यीकरण का काम ठप पड़ गया। अंततः फैसला हुआ कि हनुमान मंदिर को छूए बिना सौंदर्यीकरण का कार्य शुरु हो, और हनुमान जी तब से लेकर आज तक गदा पकड़े और संजीवनी उठाये जमे हुए हैं। रांची जंक्शन के दक्षिण ओर गर आप जाये तो इसके दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में भी हनुमान जी दीखेंगे। ये हनुमान इस प्रकार से आपको मिलेंगे, जैसे लगता हैं कि हनुमान जी, पूरे रांची जंक्शन की सुरक्षा में लग गये हो। रांची जंक्शन से जैसे आप ओभरब्रिज की ओर चलेंगे तो पटेल चौक पर भी हनुमान मंदिर दीखेगा। शायद यहां के हनुमान जी लोहरदगा-रांची रेलवे लाइन, सरकारी बस स्टैंड और इसके आसपास स्थिति विभिन्न लग्जरी होटलों की सुरक्षा में लग गये हो, यहीं नहीं इसी चौक से शुरु होती हैं रांची-पटना मुख्यमार्ग तो इसकी भी सुरक्षा, हनुमान जी ही किया करते हैं। इससे थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो मिलेगा ओभरब्रिज और ठीक इसके नीचे आपको हनुमान मंदिर मिलेगा, जहां हनुमान जी आपको करताल बजाते मिलेंगे। शायद ये हनुमान जी करताल बजाते हुए, ये कह रहे हो कि रांची में रामजी की कृपा से सब कुछ ठीक-ठाक हैं और यहीं से पश्चिम की ओर बढ़ेंगे तो कडरु ओभरब्रिज मिेलेगा, उसके नीचे भी हनुमानजी मिलेंगे, यहीं नहीं यहीं से थोड़ा दूर हटकर, अरगोड़ा रेलवे स्टेशन जानेवाली मार्ग पर भी  हनुमान जी हाथ में गदा हिलाते हुए मिल जायेंगे। दूसरी ओर सुजाता चौक अथवा लाला लाजपत राय चौक पर भी हनुमान जी की मंदिर आपको देखने को मिलेंगी। अलबर्ट एक्का चौक की ओर गर आप बढ़े विभिन्न प्रमुख बैंकों, गुरुद्वारों और होटलों के ठीक पास एक मल्लाह टोली हैं, जहा आपको हनुमानजी वीरासन में बैठें मिलेंगे और ठीक इसके आगे मिलेंगे डेली मार्केट के पास हनुमान जी, अपने पांवों से अहिरावण को दबाये, अपने कंधों पर राम और लक्ष्मण को उठाये। इस मंदिर को भव्यता प्रदान करने के लिए भक्तों की बड़ी टोली लगी हैं, निरंतर यहां कुछ न कुछ निर्माण चलता रहता हैं। 
हनुमान जी का सिक्का यहां कैसे चलता हैं, उसका परिदृश्य देखिये। जब अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने मुख्यमंत्री आवास में भी हनुमान मंदिर का निर्माण करा दिया। अब जब राज्य के मुख्यमंत्री, हनुमान के शरण में हो, तो आप समझ सकते हैं कि यहां हनुमान जी कैसे राजकाज में दखल देते हुए सुरक्षा का भार उठाये हुए हैं। मुख्यमंत्री आवास हो या राजभवन या स्पीकर आवास या पुलिस आवास, इन सभी आवासों से निकलनेवाले महानुभावों की सुरक्षा का भार भी हनुमान जी ने उठा रखा हैं। वे इसके लिए रातू रोड चौक पर उपस्थित होकर, सभी को सुगमता और सुरक्षा प्रदान करते हैं। कहा भी गया हैं कि जो हनुमान की शरण में गया, उसके सारे ग्रह-गोचर ठीक, क्योंकि हनुमान हैं ही ऐसे।
गोस्वामी तुलसीदास को जब कष्ट हुआ तो वे हनुमानजी की शरण में ही गये और लिख डाली - हनुमान चालीसा। ये हनुमान चालीसा इतनी लोकप्रिय हो गयी, कि पूरे देश में बिना सूचना एवं प्रौद्योगिकी के ही घर - घर पहुंच गयी। धन्य हैं हनुमान जी..................
कहा भी जाता हैं....................
संकट कटैं मिटै सब पीड़ा,
जो सुमिरै हनुमत बल-बीरा
जै जै हनुमान गोसाईं
कृपा करहुं गुरदेव की नाईँ
जो सत बार पाठ कर कोई
छुटिहिं बंदि महासुख होई
जब हनुमान चालीसा पढ़ने से महासुख हो सकता हैं तो भला हनुमानजी के दर्शन करने से क्या होता होगा, समझा जा सकता हैं, इसलिए, रांचीवासी फिलहाल हनुमान की शरण में हैं और हनुमानजी सभी का कल्याण करने के लिए, सुरक्षा प्रदान करने के लिए पूरे रांची के मुह्ल्लों, चौक-चौराहों में विद्यमान हैं। हमें लगता हैं कि इतने हनुमानजी तो किसी तीर्थस्थल पर भी नहीं होंगे, जितने हमारे रांची में। अब तो हमारी हनुमानजी से यहीं प्रार्थना हैं कि जैसे, उन्होंने सभी के सुरक्षा का भार उठा रखा हैं, थोडा़ हमारे उपर भी कृपा बनाये रखे...............

Wednesday, March 27, 2013

जब आप होली के मूलस्वरुप को अर्थात् कृष्ण को अपनायेंगे, तब न तो रंग और न ही गुलाल की आवश्यकता पड़ेगी........

सारा भारतवर्ष होली के रंग में रंगने को तैयार हैं। कई होली के रंग में रंग चुके हैं तो कई इसके लिए तैयारी कर रहे हैं। वो इंतजार कर रहे हैं, एक निश्चित समय का। जब वो होली के आनन्द में डूबकी लगायेंगे। पर सच्चाई ये हैं कि होली वहीं मनाता हैं जो कृष्ण के समीप हैं, जो कृष्ण के समीप ही नहीं, वो होली का आनन्द क्या लेगा। आज तो सारा भारतवर्ष जलसंकट से जूझ रहा हैं, कई लोग तिलक होली खेलने की वकालत कर रहे हैं और पानी बचाने का इसे एकमात्र उपाय बता रहे हैं, तो कई ने होली नहीं खेलने का फैसला किया हैं। होली नहीं खेलने का तर्क भी, उन्होंने बहुत अच्छा ढूंढ निकाला हैं। उनका कहना है कि होली में पानी बेतहाशा खर्च होता हैं, नष्ट होता हैं। इसलिए वो होली नहीं खेलेंगे। जबकि सच्चाई ये हैं कि होली के समय ऐसा तर्क देनेवाले अन्य दिनों में जल संरक्षण पर ध्यान ही नहीं देते। कभी - कभी मैं सोचता हूं कि
क्या होली, एक दूसरे को रंग लगाने का नाम हैं
क्या होली, एक दूसरे के गालों पर गुलाल मलने का नाम हैं
क्या होली, एक दूसरे को तंग करने या एक दूसरे को देख लेने का नाम हैं
उत्तर हैं - नहीं।
होली तो इन सबसे अलग प्रभु के हृदय में स्थान पाने का नाम हैं। होली तो उन सबको गले लगाने का नाम हैं, जो किन्हीं कारणों से हमसे बहुत अलग हैं, जो समाज के मुख्यधारा से कटे हैं, जिन्होंने संसार के प्रमुख उपभोग करनेवाली वस्तुओं का सेवन तक नहीं किया। उन्हें अपने घर बुलाकर, स्वयं से अहंकार को दूर कर, प्रभु का हो जाने का नाम हैं। जब - जब होली आती हैं, लोग प्रह्लाद और होलिका की कथा को याद करते हैं, पर भूल जाते हैं कि प्रह्लाद और होलिका दोनों एक प्रतीक हैं। प्रह्लाद धर्म का तो होलिका अधर्म की प्रतीक हैं। आश्चर्य इस बात की भी कि प्रह्लाद और होलिका एक परिवार से हैं। होलिका प्रह्लाद की बुआ हैं। वो प्रह्लाद को मार डालना चाहती हैं, फिर भी प्रह्लाद बच कर निकल जाता हैं। प्रह्लाद का बचकर निकलना, होलिका का जल जाना- क्या संदेश देता हैं। संदेश वहीं हैं। धर्म हमेशा विजयी होता हैं, अधर्म सदैव हारता हैं। ये कथा बड़े ही सरल शब्दों में ये भी संदेश देती हैं कि अधर्म से आपको घर में भी जूझना पडे़गा, ये आपके उपर निर्भर करता हैं कि आप अधर्म से कैसे लड़ते हैं, उस पर कैसे विजय प्राप्त करते हैं या अधर्म के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। वो कहते हैं न कि जीने के दो मार्ग हैं, एक धर्म का और दूसरा अधर्म का। ये आपके उपर निर्भर करता हैं कि आप किस मार्ग को अपनाते हैं। आप होली के दिन रंग-गुलाल लगाये अथवा नहीं लगाये पर जब आप समाज के मुख्यधारा से कटे लोगों को हृदय लगाते हैं तो होली को बहुत फर्क पड़ता हैं। वो फर्क ये हैं कि इससे समाज बनता हैं, देश बनता हैं और होली के एकात्मता, मानवीय मूल्यों और धर्म के मूलस्वरुप की पहचान हो जाती है......................
जायसी हो या रसखान या रहीम, सभी ने कृष्ण को पहचाना और वे आजीवन होली के रंग में डूबे रहे
याद करिये रहीम मानवीय मूल्य रुपी रंग को कैसे परिभाषित करते हैं............
जे गरीब पर हित करे. ते रहीम बड़ लोग
कहां सुदामा बापूरो, कृष्ण मिताई जोग
मीरा तो कृष्ण के सांवले सलोने रुप पर इतनी बलिहारी होती हैं, वो कृष्णरुपी भक्ति रंग में ऐसे डूबी कि वो बार - बार यहीं कहती रही
श्याम पिया, मोरी रंग दे चुनरियां...........यहीं नहीं वो तो इससे भी अलग कह डालती हैं, वो क्या, जरा मीरा के शब्दों में सुनिये
अपने ही रंग में, अपने ही रंग में, रंग दे चुनरिया, श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया................
हमें लगता हैं कि कृष्णरुपी भक्तिरंग, धर्म स्वरुपी विलक्षणरंग में जो रंग जाता हैं, उस पर कोई अन्य रंग चढ़ ही नहीं सकता और जिस पर अन्य रंग नहीं चढ़ता, वो कृष्ण का हो जाता हैं, तो हम क्यों नहीं कृष्ण के आचरण को अपनाते हुए, धर्म को धारण करते हुए, इस होली को मनाये। हमें नहीं लगता कि इस प्रकार की होली खेलने में, रंग और गुलाल की भी आवश्यकता पडे़गी और फिर कोई कह नही पायेगा कि वो जल संरक्षण के लिए, इस बार तिलक होली खेलेगा या होली नहीं खेलेगा। जरुरत हैं, होली के मूलस्वरुप को समझने की, जो हम भूलते जा रहे हैं...........................

होली तो प्यार बांटने का नाम हैं..........................

फिर होली आ गयी। लोग फिर रंग-गुलाल अपने घरों में लायेंगे। एक दूसरे को लगायेंगे। होली हैं....कहकर शोर मचायेंगे। पुए-पकवान खायेंगे। आजकल तो एक नया फैशन भी चला हैं। कई घरों में मुर्गे-मुर्गियां हलाक होंगे। बकरें भी काट दियें जायेंगे, लोग होली हैं..........कहकर इठलायेंगे, बलखायेंगे और लीजिये मन गयी होली...................। क्या सचमुच होली इसी का नाम हैं। बचपन से लेकर आजतक होली के इस रंग ने मेरे मन को व्यथित किया हैं जिसे मैंने कभी स्वीकार ही नहीं किया। क्योंकि भारतीय वांगमय तो सदियों से यहीं कहता आया हैं...........................
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होली तो प्यार बांटने का नाम हैं
होली तो एक दूसरे को गले लगाने का नाम हैं
होली तो स्वीकार्यता का दूसरा नाम हैं
होली तो एक दूसरे में समा जाने का नाम हैं
पर शायद ही ऐसे भाव अब होली के दौरान, देखने को मिलते हो। एक दिन, एक बच्चे ने मेरे पास आकर कहा - भैया, हम होली खेलेंगे। मैंने कहा - हां हां, खेलो होली। वो अपने दोनों नन्हीं-नन्ही हाथों में लाल रंग लगाकर आया और मेरे गालों पर लगाकर, खिलखिलाकर होली हैं-होली हैं, कहता हुआ भाग खड़ा हुआ। मैं कुर्सी से उठा और अचानक आइने के पास पहुंच अपने चेहरे को देखा, तो मुस्कुराएं बिना नहीं रह सका। बच्चे की छोटी छोटी अंगूलियों और हथेलियों से चेहरे पर लगे रंगों के भाव कुछ कह रहे थे।
वाराणसी के विद्वान प्रो. सुधाकर दीक्षित आजकल एक - दो वर्षो से रांची में रह रहे हैं। उनसे कुछ दिन पहले होली क्यों विषय पर लंबी बातचीत की। बातचीत के दौरान, उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारतीय पर्व त्योहार ऐसे ही नये मनाये जाते। ये पर्व त्यौहार केवल खाने-पीने तक ही सिमटे नहीं रहते, बल्कि ये एक सुंदर संदेश भी देते हैं। ये कहकर कि इन संदेशों को आत्मसात करोगे तभी आप पर्व - त्यौहारों के परम आनन्द कौ प्राप्त कर सकते हो, अन्यथा भौतिक आनन्द को ही गर आनन्द आप समझते हो तो फिर कोई बात ही नहीं।
भारतीय वांग्मय कहता हैं कि होली, वहीं मनाता हैं, जो अपने से दीन-हीन अवस्था में रह रहे, अपने समाज के लोगों को आज के दिन आत्मसात करता हैं। जो समाज व देश के प्रति प्रेम का रंग अपने हृदय में भरता हैं। जिसके हृदय में लेशमात्र भी कटुता का भाव प्रकृति व सत्य के प्रति नहीं रहता। जरा हिरण्यकशिपु को देखिये वो सत्य के प्रतीक प्रह्लाद को मिटा देना चाहता हैं। वो इसके लिए अपनी बहन होलिका का सहारा भी लेता हैं। इसी दौरान होलिका जलकर मर भी जाती हैं, फिर भी उसका दंभ नहीं मिटता, पर प्रह्लाद तो प्रह्लाद हैं, उसके कण-कण में आह्लाद हैं, भला, उसके आह्लाद को कौन मिटा सकता हैं। सत्य अंततः जीतता हैं, क्या इस सत्यरुपी रंग को असत्य कभी मिटा सकता हैं। उत्तर होगा - नहीं। तब ऐसे हालात में असत्य को धारण कर, राक्षसी प्रवृत्तियां अपना कर लोग किस प्रकार का आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं।
एक उदाहरण, जो फिलहाल होली के दौरान ही दीख रहा हैं। मार्च का महीना हैं। संभवतः 31 मार्च को क्लोजिंग डेट भी होता हैं। मैंने कई लोगों को देखा हैं, अभी से ही दिमाग लगा रहे हैं कि इस बार आयकर के रुप में उनके कमाई की राशि नहीं कटे। असत्य का सहारा भी उन्होंने जमकर लिया हैं। संभव हैं, ये पकड़े भी नहीं जायेंगे, पर हृदय के किसी कोने में बैठा परमेश्वर अथवा सत्य, उसे इस गलत कार्यों के लिए, क्षमा करेगा या वो इस गलत कार्यों में संलिप्तता होने के बावजूद आनन्द की प्राप्ति कर पायेंगे। उत्तर होगा - नहीं। क्योंकि आनन्द तो सिर्फ सत्य के पास होता हैं। असत्य को आनन्द कहां। जो देश के लिए अपनी आय की राशि का एक हिस्सा ईमानदारी से नहीं दे सकता। वो देश के लिए तन और मन को कैसे उत्सर्ग करेगा। जो ऐसा नहीं कर पायेगा। वो होली कैसे मनायेगा। होली तो मनाया कबीर ने, ये कहकर..............
मन लागा मेरा यार फकीरी में,
जो सुख पाउं राम भजन में,
वो सुख नाहीं अमीरी में,
भला बुरा सबका सुन लीजै
कर गुजरान,गरीबी में
मन लागा, मेरा यार फकीरी में..................
अर्थात, जो सत्य को धारण करेगा, उसे ही सुख प्राप्त होगा, उसे ही राम मिलेंगे, असत्य को प्राप्त कर न तो राम मिलेंगे और न ही कोई परम आनन्द को प्राप्त कर पायेगा। परम आनन्द को प्राप्त करने का नाम ही होली हैं। स्वयं को परमात्मा के अधीन कर, सत्य का आश्रय ले, सब को परम आनन्द देने का नाम ही होली हैं................................

Tuesday, March 26, 2013

आजसू की महिला पंचायत यानी पैसा फेंको, तमाशा देखो......

24 मार्च को झारखंड के मोराबादी मैदान में आजसू ने महिला पंचायत बुलाई। इस महिला पंचायत को आर्गेनाइज करने में आजसू ने करोड़ो रुपये फूंक डाले। कुछ को एक दिन की मजदूरी का लालच देकर, कुछ को ये सपने दिखाकर कि उन्हें विधानसभा का टिकट दिया जायेगा, आजसू ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। लाखों तो नहीं पर हजारों की संख्या में महिलाएं, इस महिला पंचायत में दिखी। कहीं पत्रकार नाराज न हो, अखबार व मीडिया नाराज न हो, इसके लिए जमकर इन पर भी धन लूटाये गये। महिला पंचायत के एक दिन पहले व बाद में भी अखबारों को मुंहमांगी रकम अदा की गयी। इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी विज्ञापन दिये गये ताकि वे अपनी बात न रखकर, आजसू और सुदेश की जय जयकार के लिए ही मुंह खोले। हुआ भी ठीक ऐसा ही। भला रुपये लेकर, कोई गद्दारी कैसे कर सकता हैं। इसलिए जमकर सभी ने जय जयकार की। हालांकि इसका कितना फायदा मिलेगा, फिलहाल कुछ कहां नहीं जा सकता।
हुआ ऐसा हैं कि मीडिया के कुछ धुरंधरों ने आजसू और सुदेश को सब्जबाग दिखाये हैं ये कहकर की आनेवाले समय में जब कभी विधानसभा चुनाव होंगे तो आजसू की सीटें बढ़ सकती हैं। फिर क्या, इस सब्जबाग को जमीन पर उतारने के लिए आजसू ने कमर कस ली और हो गये शुरु। हर जिले में एक पंचायत बुलायी गयी। आजसू के नेताओं व कार्यकर्ताओं को कह दिया गया कि वे जमकर पैसे बटोरे और पंचायत पर खर्च करें, मीडिया के कबूतरों पर भी पैसे खर्च करें, गर वो एक शराब की बोतले मांगते हैं तो उन्हें दो नहीं बल्कि शराब से नहला दिया जाय, खूब पैसे दिये जाये उन्हें ताकि वे सोते - जागते, सिर्फ और सिर्फ आजसू और सुदेश के ही गुण गायें। आजसू के इस कार्यप्रणाली का फायदा भी मिला हैं, जब पैसों के बल पर, उसने हटिया सीट जीत ली। अब तो सुनने में ये भी आ रहा हैं कि एक मीडियाकर्मी को आजसू ने चुनाव लडा़ने की ठानी हैं, और इस एवज में उक्त मीडियाकर्मी ने एक रिपोर्टर को आजसू के साथ लगा दिया हैं कि वो जमकर उक्त रिपोर्टर को जैसे पाये, वैसे यूज करें। खूब जमकर आजसू के विजूयल, टिकटैक और समाचार भी दिखाये जा रहे हैं।
कमाल हैं, जो पार्टी भ्रष्ट आचरण अपनाकर सत्ता हासिल करने की ठानी हो, उससे सदाचार की बातें करना, क्या मूर्खता को सिद्ध करने के बराबर नहीं। हमें तो इस पार्टी के नाम से ही हंसी आती हैं, नाम हैं - आजसू यानी आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन, पर सच्चाई ये हैं कि इसके जितने भी विधायक हैं वे स्टूडेंट्स हैं ही नहीं, विशुद्ध राजनीतिबाज हैं, जो हमेशा सत्ता से चिपककर, सत्ता की राशि, अपने हित में डकार जाते हैं, ये वहीं पार्टी हैं जो बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन और मधु कोड़ा के साथ भी सत्तासुख भोगी। ये सत्ता के बिना एक पल रह ही नहीं सकती, और ये झारखंड को महान बनाने की बात करती हैं। हां भाई आजकल ऐसे ही लोग तो देश व समाज का निर्माण करते हैं, क्योंकि आजकल इनकी संख्या बहुतायत हैं और लोकतंत्र में वहीं आगे बढ़ता हैं, जिनकी संख्या सर्वाधिक हैं. तो चलो भ्रष्ट आचरण अपनाकर, खूब पैसे लूटाकर, आम जनता को दिग्भ्रमित करें और वोट लेकर, सत्ता का परम सुख प्राप्त करें, क्योंकि जब मीडिया सत्ता में आने के पहले ही, उनकी आरती उतार रही हैं तो सत्ता आने के बाद तो उनके आगे साष्टांग दंडवत् करेगी।

Sunday, March 24, 2013

यहां तो नेता, मंत्री, पत्रकार, ब्यूरोक्रेट्स और पुलिस सभी खतरनाक जानवर की श्रेणी में हैं..............................

कभी - कभी भारतीय राजनीतिज्ञों को दिव्य ज्ञान हो जाता हैं और वो इस दिव्य ज्ञान के सहारे एक से एक बयान दे देते हैं। इन बयान देनेवालों की सर्वाधिक संख्या गर किसी पार्टी में हैं तो वो हैं - कांग्रेस पार्टी। झारखंड के राज्यपाल सैय्यद अहमद को तो दुनिया के सारे सद्गुण सोनिया गांधी में ही दिखाई पड़ते हैं। दिखाई पड़े भी क्यों नहीं, क्योंकि सोनिया की कृपा से ही तो वे झारखंड में राष्ट्रपति शासन का मजा ले रहे हैं। इसलिए अपने भाषण में गाहे-बगाहे, सोनिया जी की जय-जयकार करते रहते हैं। इधर झारखंड में सर्वाधिक समय देनेवाले और दिलचस्पी रखनेवाले जयराम रमेश ने कुछ ऐसा बयान दे दिया कि यहां के सारे के सारे ब्यूरोक्रेट ही अचंभित हैं। वो भी इसलिए कि इन ब्यूरोक्रेट्स से क्या गलती हो गयी कि जयराम रमेश ने ऐसा बयान दे डाला। झारखंड के ब्यूरोक्रेट्स तो हरदम, केन्द्र सरकार में शामिल नेताओं व मंत्रियों के आगे नतमस्तक रहते हैं, जो वे काम कहते हैं चाहे उससे झारखंड का कबाडा़ ही क्यों न निकल जाये। वो काम करने में विश्वास रखते हैं। जरा देखिये, जयराम रमेश ने क्या बयान दिया हैं। इन्होंने शनिवार को रांची में एक निजी अस्पताल के कार्यक्रम में अधिकारियों की तुलना खतरनाक जानवर से कर दी। इसके पहले भी जयराम ऐसे-ऐसे बयान दिये हैं, जिससे कांग्रेस के लोग कभी अचंभित हो गये थे। जब उन्होंने यह कह दिया था कि देश में मंदिरों से ज्यादा महत्वपूर्ण शौचालय  हैं।
सवाल उठता हैं जयराम रमेश जी के इस बयान पर हम आश्चर्य करे या उनकी मूर्खता पर हम सवाल उठाये। जयराम रमेश ने जो आज उदारतापूर्वक ये बयान दिया। क्या उन्हें ये नहीं पता कि जिन अधिकारियों की तुलना वे खतरनाक जानवर से कर रहे हैं। उन्हें खतरनाक जानवर, इन्हीं के पार्टी के महानुभावों के कुकृत्यों ने बनाया हैं। जब देश की सेवा का दंभ भरनेवाले, घोटालों का कीर्तिमान बनाने का प्रयत्न करेंगे तो ये बेचारे अधिकारी क्या करेंगे, ये भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर, समय की रफ्तार को देखते हुए काम करेंगे। नहीं तो होगा वहीं, मंत्री-नेता मालामाल और ये बेचारे फिसड्डी हो जायेंगे। इसलिए ये अधिकारी मौके का नजाकत समझते हुए, नेताओं के साथ, उनके विचारों के साथ तालमेल बिठाते हुए बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। मैं तो रांची में रहकर कई नेताओं और अधिकारियों को देखा हुं जो सचमुच खतरनाक जानवरों जैसा कुकृत्य कर रहे है। कानून की धज्जियां उड़ाते हुए, इतना धन इकट्टा कर लिया हैं कि अब इन्हें कोई चुनौती देने की ताकत भी नहीं रख सकता। यहीं नहीं राजधानी बनने के बाद रांची में गर सर्वाधिक अपार्टमेंट्स बने हैं या उन अपार्टमेंट्स में सर्वाधिक फ्लैट्स पर कब्जा किसी का जमा हैं तो ये चाहे तो नेता हैं, या मंत्री हैं, या अधिकारी हैं, या पत्रकार। आम जनता यहां कहां हैं। आम जनता तो आज भी राजभवन के समक्ष प्रदर्शन करती हैं कि उनका पैसा कई लोगों ने सब्जबाग दिखाकर लूट लिये हैं, पर  होता क्या हैं। सच्चाई तो ये हैं कि नेताओं, अधिकारियों और पत्रकारों की टीम ने मिलकर ऐसी लूट मचा रखी हैं कि पूछिये मत। एक उदाहरण देखिये। रांची में संजीवनी बिल्डकॉन ने गोरखधंधा चलाया। पुलिस और ब्यूरोक्रेट्स, नेताओं और मंत्रियों साथ ही साथ राजधानी के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ मिलकर गोरखधंधा चलाया। आम जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर वो चलता बना, आखिर वो किसके बल पर किया। कौन लोग उससे उपकृत होते थे. क्या किसी को पता नहीं। हद तो तब हो गयी, जब इस संस्था के मालिक को झारखंड रत्न भी प्रदान कर दिया गया। जहां ऐसे ऐसे घटिया सोच वाले, खतरनाक जानवर सम्मिलित होकर झारखंड को लूट रहे हो, वहां केवल ब्यूरोक्रेट्स को खतरनाक कहना तो सरासर गलत हैं। जयराम रमेश को उदारतापूर्वक ये बयान देना चाहिए था कि झारखंड में ब्यूरोक्रेट्स, नेता, मंत्री, पुलिस और पत्रकार सभी खतरनाक जानवर हैं और इसे बचाने के लिए जयराम रमेश अथवा कांग्रेसियों को जरा भी दुख करने की जरुरत नहीं हैं, क्योंकि उनके इस नकली दुख व्यक्त करने की कला, जनता जानती हैं, बस समय का इंतजार करिये, जनता उठेगी और सब को उचित समय पर जवाब देगी.......................................

Sunday, March 17, 2013

ये भीख मांगने का नया तरीका हैं, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश का..................................

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने, देश के अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भीख मांगने की नयी तरकीब दिखायी हैं, पर देश के अन्य अविकसित राज्यों के मुख्यमंत्री दिल्ली में इस प्रकार की अधिकार रैली कर, भीख मांगना शुरु करेंगे, ऐसा हमें संदेह हैं। भाजपा की वैशाखी पर बिहार का सत्तासुख भोग रहे नीतीश को, भाजपा के ही कई नेता अच्छे नहीं लगते हैं। वे समय - समय पर अपनी गीदड़-भभकी से भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को उनकी औकात बताते रहते हैं, पर वे जानते हैं कि बिना भाजपा की वैशाखी पर टिके वे बिहार में एक दिन भी सत्ता में नहीं रह सकते, इसलिए समय - समय पर भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के आगे झूकने का नौटंकी खूब किया करते हैं। 
हम आपको बता दें कि किसी भी रैली में भीड़ कैसे जुटती हैं या जुटायी जाती हैं, सब को पता हैं। कोई भी काम करनेवाला व्यक्ति जो काम करता हैं, वो अपने काम को नष्ट कर, किसी नेता का भाषण सुनने नहीं जायेगा, क्योंकि वो जानता हैं कि आज का नेता लाल बहादुर शास्त्री या महात्मा गांधी नहीं हैं। बिहार में इस तरह की रैली करने में माहिर लालू यादव, बहुत अच्छी तरह बता सकते हैं कि दिल्ली में हुई नीतीश की रैली में कौन - कौन से हथकंडे अपनाये गये हैं, गर लालू को मौका मिले तो वे नीतीश की अधिकार रैली से भी बड़ी रैली, दिल्ली में कर सबको आश्चर्यचकित कर सकते हैं, क्योंकि लालू ने सत्ता रहते, पटना में कभी रैली की ही नहीं, वे तो रैला किया करते थे।
बिहार की शान और बिहारियों के सम्मान करने की बात करनेवाले नीतीश ये भूल जाते हैं कि अधिकार रैली कर, केन्द्र पर दबाव बनाना, बार - बार पिछड़ों की रट लगाकर भाजपा को आंख दिखाना भी भीख मांगने की शैली हैं। नीतीश को ये भी जान लेना चाहिए कि बिहार से ज्यादा तरक्की सिक्किम और गोवा जैसे प्रांत कर रहे हैं, उन प्रांतों ने कभी भी केन्द्र को आंख नहीं दिखाया और न ही अधिकार रैली करके भीख मांगने में विश्वास किया।
रही बात बिहारियों के सम्मान की या अपमान की तो उन्हें मालूम होना चाहिए कि अब आतंकी गतिविधियों में लिप्त बिहारी भी खूब दिखाई पड़ रहे हैं। दिल्ली में जो महिला के साथ रेप की घटना हुई तो उसमें एक बिहारी भी था। जब ऐसी - ऐसी घटनाओं में बिहारियों की संलिप्तता होगी तो फिर बिहार को सम्मान कहां से मिलेगा। आज भी गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली या अन्य विकसित अथवा अविकसित प्रांतों में जो बिहारी मिल रहे हैं, जो वहां रहकर अपने बिहार में रह रहे परिवारों को भरण पोषण कर रहे हैं, वो बताता हैं कि बिहारी कितने गैरत वाले हैं। कभी - कभी बिहारियों के खिलाफ विभिन्न प्रांतों में जो गुस्सा दिखता हैं, उसका मूल कारण हैं कि वहां के लोगों को लगता हैं कि ये बिहारी, उनका हक छीन रहे हैं। जब बिहार के राजनीतिज्ञ व सत्ता में शामिल लोग, अपने ही प्रांत के लोगों के साथ कभी दलित तो कभी महादलित, पिछड़ा तो कभी अंत्यत पिछड़ा के नाम पर भेदभाव बरतते हो तो वो प्रांत क्या खाक तरक्की करेगा।
जदयू में तो एक नेता हैं - नरेन्द्र सिंह, उसे तो बात करने की तमीज ही नहीं मालूम। विभिन्न चैनलों में उसके जो भाषण व बाइट दिखाई पड़ते हैं, उससे साफ पता लग जाता हैं कि बिहार में नेताओं की क्या सोच हैं। जदयू के ही  नेता हैं - अनंत सिंह, सुनील पांडे, शिवानंद तिवारी। जिनकी हरकतों से पूरे राज्य की तस्वीर साफ हो जाती हैं। ऐसे - ऐसे नेताओं व मंत्रियों से ये बिहार की सम्मान बढ़ने और बढ़ाने की बात करते हैं। ये वहीं मुख्यमंत्री नीतीश हैं जो लड़कियों के सीने से काले दुपट्टे तक उतरवा लिये, जो महिला शिक्षकों के साथ बदतमीजी में सबसे आगे रहे और बिहार के सम्मान की बात करते हैं।
जिन्होंने दलितों में भी एक और महादलित बना डाला, यानी नरकों में ठेला ठेली की बात करनेवाले को बिहार के विकास की चिंता हैं। जिसने पत्रकारों को अपने पैसों से, विज्ञापन से खरीदकर, नचनियां बना डाला। वे बिहार और बिहारियों की बात करते हैं, इन्हें शर्म भी नहीं आती। जो फूट डालों शासन करो की आधारशिला रखकर, पूरे बिहार के लोगों को बेवकूफ बना डाला। वे बिहार की चिंता करते हैं। जरा पूछिये नीतीश से जब वे रेलमंत्री थे, केन्द्र में बड़े मंत्री थे, गुजरात दंगा, उसी समय हुआ था। उस वक्त वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विषवमन क्यों नहीं करते थे, उस वक्त उन्हें मुस्लिम प्रेम क्यूं नहीं जगा था। उन्होंने राम विलास पासवान की तरह केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र क्यो नहीं दिया और आज मुस्लिम प्रेम का ढोंग  इस प्रकार रचते हैं कि पूछिये मत। सचमुच इसने जो बिहार का अपमान किया, आज तक किसी ने नहीं की। अरे इसने तो हद कर दी, महाराष्ट्र जाकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे के इशारों पर ताता थैया  किया, पर शर्म नहीं आती। शर्म आयेगा कैसे, जमीर हो, तब न.............................

Friday, March 15, 2013

देश गलत हाथों में तो नहीं..................................

पाकिस्तान कश्मीर पर अपना दावा ठोकता है................
पाकिस्तान कश्मीर के एक तिहाई भाग पर अवैध रुप से कब्जा जमा रखा है....................
पाकिस्तान कश्मीर को लेकर, कई युद्ध हमसे लड़ चुका हैं और इसके लिए वो असंख्य युद्ध लड़ने का, समय - समय पर संकल्प भी लेता रहता है.................
पाकिस्तान ने कभी भी हमसे दोस्ती नहीं निभाई, बल्कि शत्रुता उसके रोम रोम में भरा पड़ा है...............
पाकिस्तान ने हमारे संसद पर हमला बोला...............
पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध के दौरान हमारे पांच सौ से अधिक जवानों को मौत के घाट उतार डाला.........
पाकिस्तान और उसका आईएसआई भारत के विभिन्न महत्वपूर्ण शहरों में आतंकी विस्फोट करके, हमसे करीब पच्चीस - तीस वर्षों से परोक्ष युद्ध लड़ रहा हैं..................
उसने भारत में एक नया संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन बना डाला हैं, जिसको लेकर वो पूरे देश में भारत के खिलाफ ऐसा नफरत पैदा कर रहा हैं कि इससे बचना भारत के लिए मुश्किल की घड़ी हैं..............
हाल ही में कई साल पहले इनके आकाओं ने दस आतंकियों की खेप मुंबई में भेजी, जिन्होंने मुंबई में ऐसा कोहराम मचाया कि उस आतंक के सदमे से अभी तक देश निकल नहीं पाया...................
हाल ही में इसके आतंकी संगठनों ने कश्मीर में हमारे एक जवान का सिर काटकर ले गये.................
हाल ही में कश्मीर के सीआरपीएफ के कैंप पर इन्होंने आतंकी हमले कर कई जवानों को मार डाला...........
और 
अब एक नयी आंतकी घटना, पाकिस्तानी संसद ने अफजल की फांसी पर भारत के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया.....................
ऐसे तो जितने आतंकी घटनाएं पाकिस्तान ने भारत में कराये हैं, उसका लेखा जोखा ठीक से लिया जाये तो अब तक लाखों भारतीयों की इन आंतकी घटनाओं में जान जा चुकी हैं, पर हमारे देश के पालिटिशियनों को देखिये..............
खासकर कांग्रेसियों को, जिनके दिल में भारत, भारतीय सैनिकों और भारतीय नागरिकों के लिए जरा भी रहम नहीं हैं, वे क्या करते हैं। ये जानते हुए कि पाकिस्तान हमारे सैनिक का सर काट कर ले गया है उस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ का जयपुर में शानदार स्वागत करते है, उनके साथ भोज करते है। इससे बड़ी शर्मनाक घटना भी कोई हो सकती हैं क्या.......................
हमें तो इनकी देशभक्ति पर ही प्रश्नचिह्न लगता हैं..............
इन पालिटिशियनों को देखिये, जब इनके खानदान के किसी भी व्यक्ति का जब कोई आतंकी संगठन अपहरण कर लेता हैं, तो वे अपने परिवार के सदस्य को बचाने के लिए ये पालिटिशियन कुख्यात आतंकियों को छोड़ देते हैं ( याद करिये वी पी सिंह के शासनकाल में मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद को छुड़ाने के लिेए कई आंतकी छोड़ दिये गये थे).......................
जिस देश में नेताओं का ऐसा चरित्र हो, उस देश का भी कोई सम्मान होता हैं या कोई अन्य देश सम्मान करता है क्या........उत्तर होगा - कभी नहीं.
अब एक नयी घटना देखिये...................
भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोप में भारत के जेल में बंद दो इतालवी नागरिकों को छोड़ दिया गया। ये दोनों नागरिक जैसे ही इटली पहुंचे, वहां की सरकार ने भारत को दो टुक जवाब दिया कि वो अपने इन दो इतालवी नागरिकों को भारत के हाथों नहीं सौंपेगा, गर भारत को लगता हैं कि ये दोषी हैं तो वो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाये। 
इसके बाद क्या हुआ, वहीं जो होता हैं, हमारे देश की सरकार, सांप के बिल में घूस जाने के बाद, बिल के उपर लाठी पटकने लगी..................
आश्चर्य तो इस बात की हैं कि जब इटली प्रकरण पर कई चैनलों ने कांग्रेसी नेताओं को बहस के लिए अपने यहां बुलाया तो इन्होंने आने से इनकार कर दिया। ये घटना क्या बताती हैं। हमें लगता हैं कि ज्यादा बताने की जरुरत नहीं। इनका भारत प्रेम साफ झलक जाता हैं........................
अब बात आती हैं, जिस देश में सरकार में ऐसे लोग शामिल हो, जो अपने देश के प्रति वफादार न होकर, अपने परिवार और ऐसे लोगों के प्रति वफादार हो, जिनका दिल भारत के लिए धडकता ही न हो, तो क्या ऐसे लोगों के हाथों में भारत सुरक्षित हैं या यूं ही भारत, पाकिस्तान और अन्य भारत विरोधी देशों के हाथों अपमानित होता रहेगा...................
ये भारत से प्यार करनेवाले नागरिकों के सामने यक्ष प्रश्न हैं कि क्या भारत को घटिया स्तर के नेताओं, अपनी जमीर बेचनेवाले नेताओं के हाथों सौपकर निश्चिंत हो जायेंगे..................
जरा सोचिये................
क्योंकि फिलहाल देश गलत हाथों में है........................

Sunday, March 10, 2013

झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष के लिए भाजपा में घमासान......................................

देश के हर समस्याओं के समाधान का दावा करनेवाली भाजपा, एक प्रदेश अध्यक्ष चुनने में नाकामयाब हैं। झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर घमासान हैं। प्रदेश अध्यक्ष बनने की लाईन में रघुवर दास, रवीन्द्र राय, सुनील सिंह, यदुनाथ पांडेय आदि नेताओं की लंबी लाइन हैं, पर राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सूझ ही नहीं रहा कि वे झारखंड की कमान किसके हाथों में सौंपे। इधर झारखंड में भाजपा के स्वंयभू नेता अर्जुन मुंडा परेशान हैं, वो चाहते हैं कि प्रदेश में ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बने, जो उनके इशारों पर नाचे, जैसा कि अभी दिनेशांनद गोस्वामी कर रहे हैं। इसलिए वे रवीन्द्र राय को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। उनको लगता हैं कि रवीन्द्र राय, जो उनके कहने पर प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे, वे आजन्म उनके प्रति वफादार रहेंगे, जैसा कि पूर्व में बाबू लाल मरांडी के प्रति अपनी वफादारी, उन्होंने दिखायी थी, पर स्थिति ऐसी हैं कि अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रवीन्द्र राय के नाम उछलवाने के बावजूद, अर्जुन मुंडा को सफलता नहीं मिल रही। ऐसी स्थिति में, अर्जुन मुंडा ने एक सुनियोजित साजिश के तहत भाजपा विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा देने की घोषणा करवा दी। ये जानते हुए कि ऐसी घोषणा के कोई मायने नहीं, क्योंकि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हैं। ऐसे में आप किसी दल के विधायक दल के नेता रहे अथवा नहीं रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। 
अर्जुन मुंडा भाजपा के तेज व चालाक नेता हैं। किसको कैसे पटाना हैं और कैसे किनारे लगाना हैं, वे इसमें माहिर हैं। जो लोग अर्जुन मुंडा को जानते हैं, वे ये भी जानते हैं कि ये वे ही अर्जुन मुंडा हैं, जो एक समय बाबू लाल मरांडी की गणेश परिक्रमा किया करते थे, और उन्हीं की कृपा से वे मुख्यमंत्री भी बने और जैसे ही ये मुख्यमंत्री बने, उन्होंने बाबू लाल मरांडी को ऐसा परेशान किया कि बाबू लाल ने सदा के लिए भाजपा ही छोड़ दी और ये खंड खंड हो रही भाजपा के अखंड नेता बनकर उभरे। इन्होंने कभी भी देश हित अथवा दल हित में इस्तीफा देने की पेशकश नहीं की, पर जैसे ही प्रदेश अध्यक्ष की बात आयी और उनकी बातों को नजरंदाज करने की कोशिश की गयी। उन्होंने इस्तीफे का दांव खेला, ताकि लोगों को लगे कि ये व्यक्ति भाजपा का महान कार्यकर्ता हैं, पर चाल तो चाल होती हैं, सभी इस चाल को समझ गये हैं। यानी बात वहीं हैं वो बात हैं कि ये एक बूंद खून बहाकर, शहीद होने की श्रेणी में खड़ा होना चाहते हैं।
सच्चाई ये हैं कि इसी प्रकार की घटिया स्तर की राजनीति के कारण भाजपा पूरी तरह से नष्ट होती जा रही हैं। कोई भी भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बने या खुद अर्जुन मुंडा ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष क्यों न बन जाये, भाजपा पुनः राज्य में प्रतिष्ठित हो जायेगी, ऐसा अब नहीं लगता, क्योंकि पूरे प्रदेश में भाजपा में फिसड्डी नेताओं का आधिपत्य हो गया हैं, जो न चरित्रवान हैं और न ही दल के प्रति समर्पित। ये भी वहीं करते हैं, जैसा कि अन्य दलों के कार्यकर्ता और नेता। जब सभी वहीं करते हैं और भाजपा भी वहीं कर रही हैं तो ऐसे में लोग भाजपा के साथ क्यों चले। सवाल यहीं बार - बार झारखंड की जनता के मन में घर कर रहा हैं और गर यहीं चलता रहा तो भाजपा के लाश पर चढ़कर अन्य पार्टियां यहां शासन करने लगे तो इस बात को लेकर किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।

Tuesday, March 5, 2013

सोनिया जैसी क्यूं बने राज्यपाल महोदय, देश में अन्य वीरांगनाओं की कमी हैं क्या....................................

झारखंड के राज्यपाल डा. सैय्यद अहमद ने राज्य की महिलाओं से अपील की हैं कि वो इंदिरा गांधी, लक्ष्मीबाई या सोनिया गांधी जैसी बनकर देश का विकास करें। इंदिरा गांधी बनना, लक्ष्मीबाई बनना तो हमें समझ में आता हैं, पर सोनिया बनना और उसका विकास से जुड़ जाना हमें समझ में नहीं आया। खासकर तब, जब इस महिला ने भारत के प्रधानमंत्री को नाइटवाच मैन बना दिया हो, जो प्रधानमंत्री अपने ढंग से सोच नहीं सकता और न ही कोई फैसला ले सकता हो, जिस महिला ने रेलमंत्री पवन कुमार बंसल को जी हूजुरी करना सिखाया हो। मैं उस पवन कुमार बंसल की बात कर रहा हूं, जिसने इस बार रेलवे बजट के दौरान राजीव गांधी को इसलिए याद किया, कि उन्होंने बंसल को राजनीति के क्षेत्र में कहां से कहां पहुंचा दिया, जिसने सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र से उपर जाने की कोशिश तक नहीं की हो, उस सोनिया को इंदिरा और लक्ष्मीबाई की श्रेणी में ला खड़ा करना - बुद्धिमानी हैं या चाटुकारिता। हमें लगता हैं कि ये बताने या समझाने की जरुरत नहीं। ऐसे भी सामान्य व्यक्ति, जिसकी कोई औकात नहीं हो, और उसे किसी की कृपा से, कोई बड़ी जगह मिल जाती हैं तो उसे उस व्यक्ति को याद करना मजबूरी होती हैं, जब तक वह जिंदा रहता हैं, अथवा जिसकी कृपा से वह बार -बार उपकृत होता रहता हैं। सोनिया ने देश को कहां पहुंचा दिया वो तो इस साल का प्रस्तुत बजट ही साफ - साफ बता देता हैं। 
इधर झारखंड के राज्यपाल द्वारा विभिन्न चैनलों को दिये गये विज्ञापन भी बहुत कुछ कह देते हैं कि यहां किसका शासन हैं। आप इस विज्ञापन को साफ - साफ देखे, जिसमें एक उद्घाटन के दौरान राज्यपाल सैय्यद अहमद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व रांची के सांसद सुबोधकांत सहाय के साथ दीख रहे हैं। ये तस्वीर ही साफ साफ बयां करती हैं कि यहां राष्ट्रपति शासन कम और कांग्रेस का शासन ज्यादा हैं। जो अभी कुछ महीनों तक चलेगा और फिर इसी आधार पर विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए वोट भी मांगे जायेंगे। ये कहकर कि देखिये हमने राष्ट्रपति शासन के दौरान - कैसे झारखंड की कायाकल्प कर दी। हालांकि कायाकल्प हुआ या झारखंड और नीचे चला गया, इसका आकलन करना अभी ठीक नहीं हैं। अभी तो एक महीने ही हुए हैं और इस एक महीने के दौरान, ट्रेन का हाईजेक होना, चतरा में सांप्रदायिक दंगा का होना और रांची में एक व्यापारी का अपहरण कर हत्या कर देने की घटना बहुत कुछ बता देती हैं कि राज्य में किस प्रकार से शासन चल रहा हैं।
देश का दुर्भाग्य हैं कि इधर जितने भी राज्यपाल हो रहे हैं, चाहे वे किसी भी प्रदेश के क्यूं न हो। वे संवैधानिक कम, पर किसी पार्टी के प्रति और उससे भी बढ़कर उसके सुप्रीमो के प्रति ज्यादा वफादार होने का सबूत देने के लिए मौके तलाशते रहते हैं, हो सकता हैं कि कुछ लोग, एक अखबार में छपे, राज्यपाल के इस बयान को बतौर सोनिया तक भी अब तक भेज दिये हो, कि मैडम देखिये - झारखंड के महामहिम, आपको कितना सम्मान देते हैं, आप तो लक्ष्मीबाई और इंदिराजी की श्रेणी में आ गयी। मैंडम आप धन्य हैं और धन्य हैं झारखंड के राज्यपाल, जिनकी इतनी सुंदर सोच हैं। ऐसे ही कांग्रेसियों से देश व राज्य का भला होगा, दूसरे से नहीं।
 

Friday, February 1, 2013

बेचारा मुर्गा, बयानवीर नेता और कोयलांचल के ज्ञानवान पत्रकार..........................

कोयलांचल में पिछले हफ्ते एक बात थोड़े समय के लिए चर्चा में रही। वो बात थी -- भाजपाईयों द्वारा गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाने की । एक चैनल जो दक्षिण भारत के एक शहर से हिन्दी क्षेत्रों में संचालित हैं, उसने इस समाचार को गणतंत्र दिवस के दिन प्रसारित किया था। फिर क्या था -- यहां के बयानवीर नेताओं के इस पर बयान आने शुरु हुए। उन नेताओं के इस बयान को देख और पढ़कर हमें बड़ी निराशा हुई। निराशा इस बात को लेकर हुई कि यहां के नेता जिन्हे ये पता नहीं कि मांसाहार कब मना हैं और कब मना नहीं हैं वे देश और समाज को क्या दिशा देंगे। ये तो मुर्गा और मछली से उपर अब तक उठ ही नहीं पाये हैं। वे बिना सिरपैर के बयान देने शुरु कर दिये थे। जिस चैनल ने उक्त न्यूज को प्रसारित किया था, वो तो अपने समाचार को महिमामंडित करने के लिए इसका फौलोअप भी शुरु कर दिया था।
जब भी कोई समाचार प्रसारित अथवा प्रकाशित किया जाता हैं तो उस समाचार की वस्तुस्थिति का आकलन किया जाता हैं, तब प्रसारित या प्रकाशित किया जाता हैं, पर यहां तो कुछ और ही हो रहा था। हद तो भाजपा के नेताओं की थी, वे इस प्रकार के बयान दे रहे थे, जैसे लग रहा हो, कि उन्होंने बहुत बड़ा पाप कर दिया हो। धनबाद के भाजपा सांसद पी एन सिंह का बयान था कि उन्होंने मांस उस दिन नहीं खाया था, वे तो अपना टिफीन लेकर चलते हैं, शाकाहार भोजन ग्रहण किया था। भाजपा जिलाध्यक्ष हरि प्रकाश लाटा भी इस पूरे प्रकरण पर काउंटर करने के बजाय, स्वयं को बचाते नजर आये, जैसे लग रहा था कि गर उन्होंने इस पर बयान दिया कि उन्होंने या भाजपाईयों ने उस दिन मुर्गा खाया था, तो इज्जत चली जायेगी, यहीं हाल भाजपा के राज सिन्हा का था, जिनका बयान था कि पूर्णमासी होने के कारण, उन्होंने मुर्गा को हाथ तक नहीं लगाया। अरे भाई हाथ लगा भी देते तो क्या हो जाता। गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाना या खिलाना पाप थोड़े ही हैं, या कानून का, अथवा संविधान का उल्लंघन थोड़े ही हैं, गर आपको बुद्धि नहीं हैं, आप मीडिया के अनुसार चलते हैं तो इसमें संविधान और कानून क्या कर सकता हैं, आप हमेशा मूर्ख बनते रहिये और वो बनाते रहेंगे।
ये तो रही भाजपा और अब विपक्षी नेताओं के बयान देखिये। झारखंड विकास मोर्चा के जिलाध्यक्ष ज्ञान रंजन सिन्हा का बयान आ गया कि भाजपाईयों को बापू की प्रतिमा के समक्ष जाकर, उपवास करना चाहिए, प्रायश्चित करना चाहिए, सांसद पर मुकदमा करना चाहिए। अरे भाई भाजपाईयों को क्यों प्रायश्चित करना चाहिए। क्या उन्होंने गुनाह कर दिया, पहले गुनाह तो बताओं, गणतंत्र दिवस के दिन मांस खाना गुनाह तो हैं नहीं, फिर मुकदमा कैसा। लगे हाथों बयानवीर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष मन्नान मल्लिक भी आपसे बाहर हो गये। इनके बयान देखिये -- इन्होंने तो सब पर कानूनी कार्रवाई करने की बात कह दी, पर कानूनी कार्रवाई करेगा कौन, कैसे करेगा। ये हमें आज तक समझ में नहीं आया। सिर्फ गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाने से, कानूनी कार्रवाई हो जायेगी, तब तो बहुत लोगों को जेल में जाना पडे़गा।
हमें गुजारिश हैं, बयानवीर नेताओं से कि कोई बयान देने के पहले वे दस बार सोंचे कि वे जो बयान देने जा रहे हैं, उस बयान का कोई अर्थ भी हैं या यूं ही अनर्गल बयान दे रहे हैं, वो भी अखबार में नाम नामक कहानी के प्रमुख पात्र गुरदास की तरह, जो अखबार में नाम छपाने के लिए उटपुटांग हरकतें कर दे रहा था। साथ ही यहां के पत्रकारों से भी, कि वे समाचार प्रसारित व प्रकाशित करने के पहले वे भी दस बार सोचे कि क्या गलत हैं क्या सही। बेवजह गलत खबरें दिखाकर, उसे प्रसारित कर, बेवजह किसी बात को तिल का ताड़ न बनाये और न ही उन बेवजह बातों को महिमामंडित करें, क्योंकि इससे अतंतः मीडिया की छवि आमजनमानस में खराब होती हैं। अंततः गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाना कोई अपराध नहीं हैं और न ही कानून की अवहेलना। ये बात मीडिया और नेताओं को भलीभांति जान लेना चाहिए।

Thursday, January 31, 2013

कोयलांचल में एक ऐसा घर, जिसके हर कमरें में राधिका संग भगवान कृष्ण विराजते हैं...............

क्या ऐसा संभव हैं कि एक सामान्य गृहस्थ के घर में राधिका संग भगवान कृष्ण विराजे। सामान्य सा उत्तर हैं - कभी नहीं,कदापि नहीं, पर मैंने अनुभव किया हैं कि ऐसा संभव हैं। गर सामान्य व्यक्ति अपने कर्म को भगवान कृष्ण के लिए, और उनकी ओर से, उन्हीं को समर्पित कर दे, तो ऐसा संभव हो जाता हैं। कोयलांचल से हमारा नाता 2000 ई. में तब जूड़ा। जब मैं दैनिक जागरण का ब्यूरो प्रमुख बना। उसी समय अपने कार्यालय में उस वक्त भाजपा से जूड़े एक सामाजिक कार्यकर्ता विजय झा से मुलाकात हुई थी। तभी से लेकर आज तक जो उनसे अंतरंगता बढ़ी, वो बढ़ती ही चली जा रही हैं। इन बारह सालों में कई बार, मैं उनके घर पर गया था, समाचार संकलन हेतु, पर ऐसी अनुभूति कभी नहीं हुई। जैसा कि इस बार हुआ हैं। शायद ऐसा इसलिए हो सकता हैं कि पूर्व में, मैं जब भी गया, तो ज्यादातर उनके घर में बैठा नहीं, बस नीचे ही नीचे, उनसे बात की समाचार संकलन किया और चलते बने। पर इन दिनों उनके घर में मैं पिछले एक सप्ताह से प्रवास पर हूं और जो मैंने अनुभव किया, वो मैं इस अपने ब्लॉग में लिखे बिना नहीं रह सकता। इस आलेख को पढ़नेवाले - सोचनेवाले इस लेखन के कई अर्थ निकाल सकते हैं, वे इसके लिए स्वतंत्र भी हैं, पर मेरी अनुभूतियों को उनकी सोच परतंत्र कर दें, ऐसा संभव नहीं। 
इन दिनों मैं अपनी पत्नी की बीमारी से थोड़ा चिंतित हूं। रांची में कई जगह इलाज कराया, पर जिस प्रकार का अर्थयुग हैं, उससे सही इलाज कराना, आज के युग में संभव नहीं हैं। हर जगह प्रोफेशनलिज्म ने ऐसा बाह्यांडबर तैयार किया हैं कि सामान्य व्यक्ति, इलाज के दौरान सहज रुप से मौत का साक्षात्कार भी कर लेता हैं, पर मैंने हर प्रकार से सोचा कि अपनी पत्नी का इलाज कहां कराउं। प्रभु की कृपा हुई, अचानक मैंने विजय जी को फोन लगाया। उन्होंने कहा कि आप तुरंत उनको लेकर, यानी पत्नी को लेकर कतरास आ जाये, यहां आराम से इलाज हो जायेगा, चिंता की कोई बात नहीं। 23 जनवरी को वनांचल एक्सप्रेस से हम दोनों कतरास पहुंचे और उनके आवास पर उस रात्रि से जो समय बिताना शुरु किया। जैसे लगा कि मैं किसी घर में नहीं बल्कि राधिका और श्रीकृष्ण के चरणकमलों के नीचे सोया हुआ हूं, क्योंकि जहां हमने शयन किया था, वहां भगवानश्रीकृष्ण राधिका संग चित्र में इस प्रकार विराजमान थे, कि उनके चरणकमल, मेरे मस्तक को छू रहे थे। ऐसे तो विजय झा के घर में जिधर देखिये, उधर ही श्रीकृष्ण, राधिका संग विराजते दीखते हैं। कहीं बालस्वरुप में तो कहीं युवास्वरुप में। सचमुच धन्य हैं, वे लोग जिन पर हरि इतनी कृपा लूटाते हैं, औरों के साथ ऐसा क्यूं नहीं होता। ऐसे में हमें गोस्वामी तुलसीदास विरंचित श्रीरामचरितमानस की वो चौपाई अनायास याद आती हैं, जिसमें विभीषण जी, हनुमान से कहते हैं कि --------
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरि कृपा मिलहि नहि संता।।
अर्थात हे हनुमान जी अब मुझे पूरा विश्वास हो गया कि बिना ईश्वरीय कृपा के सज्जनों से मुलाकात नहीं होती।
सचमुच इन दिनों में ईश्वर से प्रतिदिन साक्षात्कार करता हूं। विजय झा की पत्नी डा. शिवानी झा, एक अच्छी चिकित्सक हैं, और उन्होंने कोयलांचल के कतरास इलाके की माताओँ और बहनों पर बड़ी कृपा लुटाती हैं, वो मेरे आंखों ने देखे हैं, यहीं कारण है कि यहां की सामान्य जन उन्हें बहुत सम्मान देती हैं। ये श्रीकृष्ण से इतना प्रेम रखती हैं कि उन्होंने अपना निजी अस्पताल के नामकरण ही भगवान कृष्ण के नाम से कर दिया हैं। उन्होंने अपने चिकित्सालय का नाम ही रखा हैं -- कृष्णा मातृ सदन। ज्यादातर डाक्टरों को देखिये तो अपने चिकित्सालयों के नाम - नर्सिंग होम, या अस्पताल, या हास्पिटल वगैरह - वगैरह रख देते हैं, पर यहां तो भारतीय धर्म और संस्कृति का मूल ध्येय वाक्य -- सेवा का स्पष्ट रुप ही झलक जाता हैं। जरा गोस्वामी तुलसीदास की पंक्तियां को समझे ---
दया धर्म का मूल हैं, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोडि़ये, जब तक घटि में प्राण।।
लोग ये क्यूं भूल जाते हैं, धर्म का मूलस्वरुप दया हैं, गर आपने करुणा व दया हृदय में रखा तो जीवन धन्य, नहीं तो आप खुद अपने ही हाथों, अपनी चित्ता क्यूं सजा रहे हैं। जरुरत हैं, अपने हृदय को पवित्र बनाने की, ताकि आपके घर में भी, आपके घर के हर कमरे में, राधिका संग भगवान श्रीकृष्ण विराज सकें।

Monday, January 21, 2013

ये गांधी-नेहरु-पटेल और शास्त्री की कांग्रेस नहीं, बल्कि सोनिया-राहुल की कांग्रेस हैं.................................

हमें बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा हैं, जिस कांग्रेस पार्टी में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री,  सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे नेताओं ने अपने वाकपटुता और चरित्र के माध्यम से पूरे देश ही नहीं बल्कि विश्व को प्रभावित किया। जिनके आचरण को उतारने की सीख हमारे माता -पिता आजीवन देते रहे। आज उस कांग्रेस पार्टी में दिग्विजय सिंह, संजय निरुपम, मणिशंकर अय्यर और सुशील कुमार शिंदे जैसे नेताओं का बोलबाला हैं, जिनके चरित्र को उतारना तो दूर, उनके बोलचाल की भाषा को देख कोई भी माता - पिता अपने बेटे को, इनके भाषण को सुनने तक की इजाजत नहीं देगा। ऐसे हम आपको बता दें कि आज की कांग्रेस पार्टी को चला रही सोनिया व राहुल लाख कह लें कि वह पुरानी कांग्रेस को लेकर ढो रहे हैं, मैं मान नहीं सकता। क्योंकि पुरानी कांग्रेस पार्टी ने देश को चरित्र दिया, ताकत दी, महानता की सीख दी, आज की कांग्रेस सारी निर्लज्जता को पार कर चुकी हैं।
जरा दिग्विजय सिंह का बयान सुनिये -- ये कुख्यात आतंकवादी हाफिज सईद को जनाब कहके नवाजते हैं। जरा मणिशंकर अय्यर को देखिये - ये अपने प्रतिद्वंदियों को पशुओं से मिलान करते हैं।
जरा संजय निरुपम को देखिये -- अपने प्रतिद्वंदी पार्टी की एक महिला नेता को नाचनेवाली - ठुमके लगानेवाली कहकर संबोधित करते हैं।
पूर्व में गृह मंत्री और अब वित्त मंत्रालय संभाल रहे पी चिदम्बरम को तो केसरिया कलर में ही आतंकवाद नजर आता हैं, और इसी पार्टी के वर्तमान गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तो भाजपा और संघ को हिंदू आतंकवाद से जोड़कर, एक नयी मिसाल कायम कर दी। 
जिस देश में ऐसे ऐसे लोग महत्वपूर्ण मंत्रालय सँभालते हो, जिस पार्टी के नेता, जो ये कहते नहीं थकते कि उनकी पार्टी ने देश को आजादी दिलवायी हो, उन पार्टी के नेता, अपने प्रतिद्वदिंयों के लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं करते हो। उससे देश चलेगा, हम मानने को तैयार नहीं। ये दिखावे के लिए तो पाकिस्तान और वहां चल रहे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ खूब बोलते हैं, पर सच्चाई ये हैं कि आज इतनी इनकी ताकत नहीं कि वे पाकिस्तान से सीधे - सीधे युद्ध कर, उसकी हेकड़ी निकाल दें। हां ये इतना जरुर करते हैं कि अपना वोट बैंक, मुस्लिमों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए, संघ और भाजपा को गंदी गंदी गालियों से नवाज जरुर देते हैं, और जब इनकी देशव्यापी आलोचना होती हैं तो बड़ी ही बेशर्मी से ये कह देते हैं कि उनकी बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर दिया गया।
सच्चाई ये हैं कि पूरे देश में महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहे हैं। इनके शासनकाल में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड टूट गये हैं। महंगाई सुरसा की तरह मुंह बायें जा रही हैं। पूरे देश में पाकिस्तानी आईएसआई ने नक्सलियों के साथ मिलकर देश को निगलने को तैयार हैं जबकि बाहरी मोर्चे पर वो हरदम भारत को नीचा दिखाने की कोशिश करता हैं। आंध्रप्रदेश में तो कांग्रेस के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाली एक पार्टी के नेता ने तो देश के साथ बगावत करने की बात कहीं, जिसके भाषण यू टयूब पर बिखरे पडे हैं, जो सीधे - सीधे हिन्दूओं को गाली देता हैं, उसके लिए, इस पार्टी के नेता अथवा किसी भी मंत्री के जुबां नहीं खुले, पर इन नामर्दों को देखिये, पुरुषार्थ दिखाने के लिए भाजपा और संघ ही इन्हें मिलता हैं।
दंगा कहीं भड़का तो भाजपा और संघ ने करा दिया और कहीं विकास के कार्य हुए तो बस कांग्रेस ने किया। जबकि सच्चाई ये हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेसी शासन में किस प्रकार पूरे देश में सिक्खों का कत्लेआम हुआ, वो पूरा देश जानता हैं। कैसे हाल ही में असम में कांग्रेसी सरकार के होते हुए मानवता की हत्या कर दी गयी। कैसे असम में बांगलादेशी घुसपैठियों को सुनियोजित तरीके से बसाया जा रहा हैं और वहां के मूल वाशिंदे को खदेड़ा जा रहा हैं। इस पर इन्हें शर्म नहीं महसूस होता, पर जैसे ही गुजरात विधानसभा का चुनाव आता हैं, नरेन्द्र मोदी के रुप में उन्हें दंगाई नजर आता हैं। ये अलग बात हैं कि इन कांग्रेसियों के खिलाफ, गुजरात की जनता आज भी नरेन्द्र मोदी के पीछे सशक्त रुप से खड़ी हैं और नरेन्द्र मोदी को अपना नेता मानती हैं। 
ऐसे एक बात पूरे देश को जान लेना चाहिए, कि कांग्रेसियों के इस चाल चरित्र को आगे बढा़ने में मुख्य भूमिका कांग्रेस भक्त पत्रकारों का भी हैं, जो समय - समय पर इन कांग्रेसियों के साथ मिलकर, देश को मिट्टी में मिलाने के लिए हर प्रकार का राग जनता के बीच अलापते हैं। जब कभी इन्हें मौका मिलता हैं, वे कांग्रेसियों के साथ हो लेते है। बदले में ये कांग्रेसी, कभी राज्यसभा तो कभी मुंहमांगी मुरादें देकर इन पत्रकारों को उपकृत करते रहते हैं और इसी में, यह देश मिट्टी में मिल रहा होता हैं। अब आगे देखिये कि कौन कांग्रेसी नेता, कब किस अन्य नेता को गाली देने के लिए अपना मुंह खोलता हैं। तब तक इंतजार करिये....................

Saturday, January 19, 2013

रांची में एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का आगाज, ये साली क्रिकेट पास जो न कराये.................

ये साली क्रिकेट पास जो न कराये........। आम जनता, मीडियाकर्मियों और माननीय विधायकों को पता नहीं क्या - क्या बना दिया, इस क्रिकेट पास और टिकट ने। गर आम जनता की बात करें तो, इस क्रिकेट पास के लिए के लिए तो नहीं, बल्कि क्रिकेटरों की एक झलक पाने के लिए, यहां की जनता पुलिस की मार तक खा चुकी, यहीं नहीं अपना पैंट तक उतरवा चुकी हैं, जबकि क्रिकेट की एक झलक पाने के लिए, एक अदद क्रिकेट के लिए, महंगाई तक को चुनौती दे डाली हैं, रांची की जनता ने। गर आप रांची आये तो देख सकते हैं, क्रिकेट की दीवानी यहां की जनता को, जो इस महंगाई में क्रिकेट मैच देखने के लिए बीस- बीस हजार रुपये में, टिकट ब्लैक में खरीदकर, क्रिकेट को इंज्वाय किया हैं। ये तो रही जनता और अब बात करते हैं मीडिया की। 
बात -बात में राजनीतिज्ञों और कारपोरेट जगत पर बरसनेवाली यहां की मीडिया और उनमें कार्यरत पत्रकारों और छायाकारों को भी कम नहीं झेलना पड़ा हैं। टिकट और पास पाने के लिए, जेएससीए द्वारा धकियाएं गये ये लोग, जेएससीए के आलाधिकारियों की वंदना और  विशेष पूजा करने से भी बाज नहीं आये। एक अखबार ने तो जेएससीए के एक आलाधिकारी की चरणवंदना में एक सप्लीमेंट ही निकाल दिया और उसमें एक पेज विशेष रुप से उक्त आलाधिकारी को समर्पित कर दिया। जिसके एवज में उक्त आलाधिकारी ने उक्त अखबार पर विशेष कृपा भी बरसायी। इसी तरह एक और अखबार, जो अपने को कारपोरेट जगत का सबसे बड़ा अखबार मानता हैं,  आज के दिन उसने जेएससीए के एक आलाधिकारी का बयान छापकर, अपनी मौन आराधना और वंदना उक्त आलाधिकारी के प्रति जगजाहिर कर दी हैं। पर जिन अखबारों व मीडिया को पास व टिकट नहीं मिले, उन्होंने जमकर, जेएससीए पर बरसना शुरु कर दिया। यहीं नहीं, खोद - खोदकर ऐसे ऐसे समाचार छापे गये, जिससे उक्त आलाधिकारी के चेहरे पर हवांइयां उड़ी होगी, इसकी संभावना कम ही दिखती हैं, क्योंकि फिलहाल, उस व्यक्ति के सितारे बुलंद हैं, और जब सितारे बुलंद होते हैं तो आप कुछ भी कर लें। उसे कुछ भी नहीं होता। लेकिन ये सितारे बराबर बुलंद रहेंगे, इसकी संभावना कम ही रहती हैं, क्योंकि रावण और कंस के सितारे भी इसी तरह कभी बुलंद हुआ करते थे, पर जब सितारें उनके गर्दिश में पड़े तो वे भी कहीं के नहीं रहे। 
आज एक अखबार ने लिखा हैं झारखंड में चार हजार करोड़ से अधिक के घोटाले के मास्टरमाइंड संजय चौधरी का पासपोर्ट आइपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी की सिफारिश पर ही बना था। इन्होंने ही 2004 में रांची पासपोर्ट कार्यालय को चिट्ठी लिखी थी। दिल्ली की सीबीआई टीम की जांच में इसका खुलासा हुआ हैं। इसी अखबार ने ये भी प्रकाशित किया हैं कि गुरुजी ने क्रिकेट स्टेडियम की नींव रखी थी पर स्टेडियम के उद्घघाटन में उक्त अधिकारी ने शिबू सोरेन को पूछना तक उचित नहीं समझा।  अखबार ने ये भी लिखा हैं कि स्टेडियम का उद्घाटन अधिकारियों का आयोजन बनकर रह गया। साथ ही स्पोर्टस पेज पर दो आईपीएस की लड़ाई में धूल धूसरित हुआ - कीनन स्टेडियम जैसे आलेख छापकर, अमिताभ चौधरी की बैंड बजा दी हैं। इस अखबार ने जो भी लिखा हैं, उसकी दाद देनी होगी, कि उसने ऐसा कर के एक ऐसे व्यक्ति को चुनौती दे डाली हैं, जिसका ख्वाब बहुत ही उंचा हैं, जो अब राजनीति में भी उतरकर, अपना लोहा मनवाने को उत्सुक हैं, पर जैसे खेल में कामयाब हुआ, वैसे राजनीति में भी कामयाब हो जायेगा, इसकी संभावना कम दिखती हैं, क्योंकि राजनीति में उससे ज्यादा की घटिया सोच रखनेवाले लोग पहले से ही विद्यमान हैं।
किसकी क्या सोच हैं, वह कितनी दूर जा सकता हैं, उससे देश व समाज का कितना भला होगा। उसका अंदाजा लगाना बहुत ही आसान हैं। बिहार में हमारी मां बहनें, चावल पका या नहीं, इसका अंदाजा, तसले पर उबल रहे चावल के एक दो कण को अंगूलियों पर रखकर, उसे मसल कर, पता लगा लेती हैं। ठीक उसी प्रकार जेएससीए कैसे-कैसे लोगों के हाथों में हैं, वह तो जेएससीए के आलाधिकारियों के आचरण से पता लग जाता हैं, उसके गतिविधियों से पता लग जाता हैं। जरा जेएससीए की कारगुजारियां देखिये ------------
1. यहां के जेएससीए के आलाधिकारियों ने पैसे लेकर, उद्घाटन समारोह के सीधा प्रसारण एक चैनल के हाथों बेच दिया। नतीजा लोग, उद्घाटन समारोह को ठीक से नहीं देख पाये। विजूयल इतना घटिया आ रहा था कि जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं।
2. उद्घाटन समारोह में राज्य के सभी आइपीएस व आइएएस आलाधिकारियों व उनके परिवारों को आमंत्रित किया गया था, जो बचे उसमे गर्वनर और कार्यवाहक मुख्यमंत्री के परिवारों ने कब्जा जमाया। आम जनता इस पूरे उद्घाटन समारोह से दूर रही। वो जनता, जिसकी दुहाई, उद्घाटन समारोह के अंदर भाषण करनेवाले महानुभाव बारंबार दे रहे थे।
3. जेएससीए के एक आलाधिकारी ने अपने घर में क्रिकेटरों को बुलाया। इसकी महक पत्रकारों को लगी। पत्रकार जब उक्त आलाधिकारी के घर गये। तब वहां पहुंचे पत्रकारों और छायाकारों को धकियाने में लग गये, वहां कार्यरत पुलिस अधिकारी। ये इशारा भी मिला था, जेएससीए के आलाधिकारियों द्वारा कि - पत्रकारों को सबक सिखाओ।
4. जेएससीए के एक आलाधिकारी ने आनेवाले समय में लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर नजर ऱखकर, जमकर अपने चहेतों को क्रिकेट पास रेवड़िय़ों की तरह बांटी, और माननीय विधायकों और अन्य सम्मानित लोगों को ठेंगा दिखा दिया।
5. हद तो तब हो गयी, जब उक्त आलाधिकारी ने एक अखबार में ये बयान दे दिया कि उसने उनलोगों को पास दे दिया हैं, जो सम्मानित हैं। यानी जिन लोगों को उसने पास दिलवाया, वे सम्मानित हैं और जिन्हें नहीं दिलवाया वो अपमानित। अर्थात सम्मान देने और लेने का उसने दुकान खोल लिया हैं क्या।
बात ये हैं कि हर व्यक्ति की अपनी महत्वाकांक्षा होती हैं। महत्वाकांक्षा होनी भी चाहिए, पर किसी को नीचे गिराने की अंदर भावना पालना, ठीक नहीं, क्योंकि ये ही एक भावना, किसी भी व्यक्ति, संस्थान व समाज को नीचे ले जाने के लिए काफी होती हैं। फिर भी बहुत सारी गड़बड़ियों और संभावनाओं के बीच रांची में एकदिवसीय क्रिकेट नजर आया। इसकी हमें भी खुशी हैं।

Monday, December 31, 2012

ये नया वर्ष हैं..................


कल भी आया, कल आयेगा भी,
हंसो, खेलो, ये नया वर्ष हैं
हंसो, खेलो, ये नया वर्ष हैं..................
भ्रष्टाचार-दुष्कर्म, निरंतर
भारत की दिन-रात भयावह
सिसकती, कराहती, जैसे-तैसे
जीने की ये नयी चाह हैं
हां हां, सुनो
ये नया वर्ष हैं.....................
कल दल-गण आंदोलन करती थी
अब, आंदोलन से पीछे हटती हैं
अब जनता आगे बढ़ कहती
हटो, अरे ये मेरा वक्त हैं
क्योंकि,
ये नया वर्ष हैं....................
गंगा – जमना, अब रोती कहती
कभी हरती थी, वो पापों को
अब खुद मैली होकर भी,
त्राहिमाम संदेश सुनाती
घाटों की सुनी दिन रातें
कलकल निनाद न, अब सुन पाती
फिर भी बोलो, कि हम खुब खुश हैं
झूठ बोल, मन को बहलाओ
और कहो
ये नया वर्ष हैं.............................

Sunday, December 30, 2012

काला शनिवार.............................

शनिवार को सुबह, मैं जैसे ही जगा। एक बुरी खबर, मेरे कानों को सुनाई दी। 16 दिसम्बर को सामूहिक दुष्कर्म की शिकार 23 वर्षीया लड़की अब दुनिया में नहीं रही। सारा देश हतप्रभ था। देश की बहादुर बिटिया चल बसी। उसके साथ हुए अमानुषिक कुकृत्य ने पूरे देश को अंदर से झकझोर दिया था। दिल्ली क्या, दूर गांवों में भी इसकी गूंज सुनाई दी। सभी ने एक स्वर से मांग किया कि दुष्कर्मियों को कठोर से कठोर सजा मिले। संसद में भी इसकी शोर सुनाई दी। सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री जया भादुड़ी तो इस घटना से इतनी मर्माहत हुई कि वो रो पड़ी, पर इसी संसद में कांग्रेस का एक ऐसा भी नेता था, जो संसदीय कार्य मंत्री होते हुए भी इस घटना के समय़, संसद में चल रही बहस के दौरान हंस रहा था। जिसका नाम था -- राजीव शुक्ला। वो स्वयं को पत्रकार भी समय - समय पर कहा करता हैं। ऐसे तो नेता, नेता होता हैं। चाहे वो किसी भी पार्टी का क्यों न हो। बेशर्मी में इसका रिकार्ड तोड़ना सामान्य व्यक्तियों के वश की बात नहीं। हाल ही में कांग्रेस पार्टी का ही एक नेता संजय निरुपम, भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी को ठुमके लगानेवाली कह डाला था, वो भी टीवी बहस के दौरान। इसी तरह राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने भी नारियों के खिलाफ घटियास्तर की टिप्पणी कर डाली पर इससे भी आगे निकल गये माकपा नेता अनीसुर्रहमान जिन्होंने प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर ऐसी टिप्पणी कर डाली, जिसे सभ्य समाज कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकता।
सवाल उठता हैं कि जब देश में सामूहिक दुष्कर्म के खिलाफ, स्वतः स्फूर्त आंदोलन प्रारंभ हो जाते हो। उसके बाद भी देश के नेताओं की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता हो। नारियों के खिलाफ उनके बयान घटियास्तर के आते हो। साथ ही उक्त आंदोलन को दबाने के लिए नाना प्रकार के षडयंत्र रचे जाते हो। ऐसे में हम इन नेताओं पर और उनकी पार्टियों से हम ये भरोसा क्यों रखे, कि ये सामूहिक दुष्कर्म की शिकार युवती को मरणोपरांत भी न्याय दिलायेंगे। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ये बयान कि, उनकी भी लड़किया हैं, और इस घटना से वे भी मर्माहत हैं, पर ये मर्माहत होने के बावजूद भी खुद बचने का प्रयास करते हो। उक्त लड़की को सिंगापुर इलाज के नाम पर, इसलिए ट्रांसफर करते हो, कि देश में ये मैसेज जाय कि सरकार, उसे बचाने के लिए हरसंभव प्रयास की हैं। ये जानते हुए भी कि उस लड़की की स्थिति यहां पर ही, इतनी बिगड़ गयी हैं कि उसे बचाया नहीं जा सकता, क्या दिखाता हैं।
जनता मांग कर रही हैं कि त्वरित न्याय के तहत इस दुष्कर्म कांड के आरोपियों को सजा दिलायी जाय, पर सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही। मैं तो कहता हूं कि जिन लोगों ने नारियों को सम्मान नहीं दिया हैं, जिनकी मानसिकता नारियों के प्रति कभी ठीक नहीं रहा, जिन्होंने हमेशा विवादास्पद बयान नारियों के खिलाफ दिया हो, क्या इन्हें ऐसे ही छोड़ देना चाहिए। जिन नेताओं ने नारियों के खिलाफ घटियास्तर का बयान दिया हैं, क्या उन्हें इसलिए छोड़ देना चाहिए कि वे नेता हैं, या उन्हें भी दंडित करना चाहिए।
मेरा मानना हैं कि ये दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि हमारी नारियों के प्रति मानसिकता बदल गयी हैं। गलती खुद करें, और इसके लिए लड़कियों और नारियों के ड्रेस पर इल्जाम लगा दे। कमाल हैं, ऐसे कई कांग्रेसी-भाजपाई नेताओं के हास्यास्पद बयान, मीडिया में भरे पड़े हैं। जो इसके लिए लड़कियों के पोशाक को जिम्मेवार मानते हैं। मेरा मानना हैं कि जब इन नेताओं के मन में ही गंदगी भरी पड़ी हैं, जिसकी वे चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये जानते हैं कि जैसे ही वे मन के अंदर, जागृत होनेवाली अपनी गंदी भावनाओं को देखेंगे, तो वे खुद शर्म से गड़ जायेंगे, पर हमें नहीं लगता कि इनकी जमीर इतनी मजबूत हैं कि वे शर्म से खुद मरेंगे, ये तो पैदा ही लिए हैं, हम सामान्य जन को जिंदा मार डालने के लिए। ये तब तक कुकर्म करेंगे, बयान देंगे, जब तक जिंदा रहेंगे, क्योंकि ये जानते हैं कि देश में जो भी हो रहा हैं, उससे वे परे हैं। इसकी आंच भी, उनके घरों तक नहीं पहुंचेगी। इसलिए आम जनता की इज्जत व आबरु जाये भाड़ में, हमें क्या पड़ी हैं। बस घटना घटेंगी। देखने जायेंगे।  घड़ियाली आँसू बहायेंगे। अपने विवेकाधीन कोटे से कुछ रुपये दें देंगे और जनता तो मूर्ख हैं ही, ये छोटी - मोटी घटनाएं थोड़े ही याद रखेंगी, बस पांच साल के लिए फिर से चुनाव के बाद, अपनी सीटे आरक्षित करा लेंगे।

Friday, December 21, 2012

बिहार के मुख्यमंत्री अहंकारी नीतीश क्या जाने, किसी का सम्मान कैसे किया जाता हैं...........................

गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने शानदार तरीके से एक बार फिर सत्ता हासिल की हैं। गुजरात की छः करोड़ जनता ने एक बार फिर उन पर विश्वास किया और विपक्षियों के लाखों - करोड़ों आरोपों को दरकिनार करते हुए, नरेन्द्र मोदी को अपना हीरो चुना। इसमें कोई दो मत नहीं कि वे आनेवाले समय में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार है और यहीं प्रबल दावेदारी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आंखों की नींद गायब कर दी हैं। वे इतने सदमे में हैं कि वे मर्यादा तक भूल गये हैं। बिहार में एक कहावत हैं - हम अपने दुश्मनों को भी उंचा पीढ़ा देते हैं, पर इसे देखिये। सामान्य तौर पर, लोग जो शिष्टाचार निभाते हैं। ऐसे अवसरों पर बधाई देते हैं। इसने नरेन्द्र मोदी को बधाई देना भी उचित नहीं समझा। अरे आप नरेन्द्र मोदी को बधाई दो या मत दो। उसे क्या फर्क पड़ता हैं। ऐसे थोड़े ही ना हैं कि वो आपकी बधाई की लालसा पाले हुए हैं। वो तो अच्छी तरह जानता हैं कि आप क्या हो। कल तक गाली देने में आगे थे, तो आज भी गाली ही दो। तुम्हारे मुंह से यहीं अच्छा लगता हैं। जो नीतीश को जानते हैं, वे उनके कैरेक्टर को भी जानते हैं। नीतीश भारतीय राजनीति में अहंकारी पुरुष थे, और रहेंगे। समय आने पर लालू की तरह इनका भी अहंकार मिट्टी में मिल जायेगा और जो सुशासन बाबू के नाम से जाने जाते हैं, कुशासन बाबू कहाने में भी देर नहीं लगेगा।
बिहार - एक अनोखा प्रदेश। यहां एक से एक शूरवीरों ने जन्म लिया। जिनकी यशोगाथा आज भी पूरे विश्व में देखी और सुनी जाती हैं, पर पिछले बीस पच्चीस वर्षों से इस बिहार में एक से एक मसखरे और अहंकारी दिखाई पड़ रहे हैं, जिनके कुकृत्यों से बिहार पर अंगूलियां उठायी जा रही हैं। ऐसे भी बिहार और बिहारी क्या हैं। इसके बारे में गर जानना हैं तो बिहार से अलग, आप किसी भी प्रदेश में जाकर बिहारियों के बारे में पूछे, तो पता चल जायेगा। एक नारा, बिहारियों के लिए, जो हर जगह सुनायी देती हैं वो हैं -- एक बिहारी, सौ बिमारी। 
क्या सचमुच एक बिहारी, सौ बिमारी के बराबर हैं, या लोग ऐसे ही कह देते हैं।
सबसे पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बिहार के लोग के बारे में क्या कहती हैं, वो सुनिये --  बिहार और यूपी से आये लोगों ने दिल्ली को गंदा करके रख दिया हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिव सेना के लोग तो बिहारियों को देखना ही पसंद नहीं करते और इसका मौन समर्थन करते हैं, महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेता व वहां के मुख्यमंत्री पृथ्वी राज चौहान। देश के पूर्वी भाग असम और दक्षिण के चेन्नई और बंगलौर में तो ये बिहारी कई बार मार खाकर लौट आते हैं। क्यों मार खाते हैं। ये बताने की जरुरत नहीं। इधर बिहार में लालू और अब नीतीश के शासन को झेल रहे बिहारी समझते हैं कि नीतीश के आने के बाद, बिहार का सम्मान बढ़ा हैं, बिहार तेजी से विकास कर रहा हैं। तो इन मूर्खों को कौन समझाये कि जो नयीं लेटेस्ट रिपोर्ट आयी हैं विकास की। उसमें एक नंबर पर छोटा सा प्रदेश - सिक्किम हैं। जो आज तक अपने लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग तक नहीं की हैं। जबकि बिहार का मुख्यमंत्री नीतीश हमेशा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की भीख मांगा करता हैं, जबकि यहीं शख्स जब केन्द्र में सरकार में शामिल था, तो तत्कालीन बिहार की मुख्यमंत्री रावड़ी देवी के इस मांग पर ही अंगूली उठा दी थी। हाल ही में जब महाराष्ट्र में एक बिहारी युवक की निर्मम हत्या कर दी गयी थी। नीतीश ने इस पर अपना बयान जारी किया था कि एक छोटी सी मुर्गी पर तोप छोड़ दिया गया, पर इसी नीतीश ने जब महाराष्ट्र का दौरा किया तो वह महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेताओं व कार्यकर्ताओं से डरते हुए अपने भाषण की शुरुआत ही, जय महाराष्ट्र से की।
आज भी नीतीश बिहार में उद्योग लगाने के लिए, देश के उद्योगपतियो से चिरौरी करते हैं, पर कोई भी उद्योगपति बिहार में उद्योग लगाना पसंद नहीं करता। पर गुजरात को देखिये। वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्या किया। बंगाल में नैनो पर ग्रहण लगा और उसने गुजरात में नैनो का प्रोडक्शन करा, दिखा दिया कि थॉट क्या हैं। गुजरात के सैकड़ों कपड़ा मिलों और अन्य संस्थानों में आज भी बिहारी मजदूर शान से काम करते हैं। इन बिहारी मजदूरों को गुजरात और गुजरातियों से कोई शिकायत तक नहीं। ये चुनावों में भी भाग लेते हैं और नरेन्द्र मोदी को अपना हीरो मानते हैं, पर नीतीश को देखिये।
नीतीश धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट बांटते हैं। ये धर्मनिरपेक्षता के सर्टिफिकेट का दुकान पटना और दिल्ली के जदयू कार्यालय में खोले हुए हैं। बिहार में भाजपा के वैशाखी पर शासन कर रहे हैं और भाजपा को ही समय - समय पर गीदड़भभकी और बंदरघुड़की दिखाते रहते हैं। बिहार के अल्पसंख्यकों को ये दिखाऩे के लिए की, वे लालू से ज्यादा सेक्यूलर हैं, अल्पसंख्यक उनकी पार्टी को भूले नहीं, इसलिए समय - समय पर नरेन्द्र मोदी को नीचा दिखाने का कोई कसर नहीं छोड़ते। इस बार तो उन्होंने मर्यादा को ही ताक पर रख दिया। सामान्य तौर पर देखा जाता हैं कि कोई भी व्यक्ति गर शीर्ष पर पहुंचता हैं या कोई विजयी होता हैं तो उसका घुरविरोधी भी उसको बधाई देने के लिए पहुंच जाता हैं। पर ये संस्कारवान अथवा चरित्रवान व्यक्ति ही कर सकता हैं। सामान्य नहीं। 
कल गुजरात में चुनाव परिणाम निकले। गुजरात परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष जो पूर्व में भाजपा में रहकर, गुजरात का बागडोर संभाल चुके हैं। भाजपा को चुनौती दी, बुरी तरह हार गये। पर नरेन्द्र मोदी को देखिये, चुनाव जीतने के बाद, वे उनके घर जाते हैं, उनका पांव छूते हैं। पर नीतीश को देखिए, अहंकार में चूर हैं। नरेन्द्र मोदी को बधाई तक नहीं दिये हैं। उनके पिछलग्गू नेता इस पर बयान देते हैं कि नीतीश जी बहुत व्यस्त हैं, इसलिए वे बधाई नहीं दे पाये। जैसे लगता हैं कि नीतीश जी के पास दो सेंकेंड का भी समय नहीं हैं। जैसे लगता हैं कि नीतीश को शौचालय जाने तक का समय नहीं हैं, या दिनचर्या के दौरान नीतीश जी मुंह भी नहीं धो पा रहे हैं और न ही नहा रहे होंगे। अरे पिछलग्गूओं साफ कहो कि नीतीश को नरेन्द्र मोदी की जीत रास नहीं आ रही हैं। उसे लग रहा हैं कि विकास को लेकर और आनेवाले समय में प्रधानमंत्री पद को लेकर, उसका कोई घुरविरोधी सामने हैं तो वो नरेन्द्र मोदी हैं, जिसके कारण वो इतना जल भून गया हैं कि उसे मर्यादा तक याद नहीं रही। ऐसे नीतीश ही बिहार की कब्र खोदेंगे। क्योंकि जिसके पास मर्यादा, चरित्र व संस्कार नहीं, वो बिहार को क्या सम्मान दिलायेगा। ये तो बेशर्मी की हद हैं। इसने तो बिहार के दस करोड़ जनता का अपमान कर दिया हैं। बिहार की तो परंपरा रही हैं कि अपने दुश्मनों को भी आगे बढ़कर स्वागत करने का, पर इस नीतीश ने तो सारी मर्यादाएं लांघ कर बता दिया कि वो सिर्फ और सिर्फ बिहार के सम्मान पर दाग लगाने के लिए सत्ता हासिल की हैं। भाजपा को चाहिए कि अपने पीठ पर जो नीतीश को उसने सवार कर रखा हैं, उसे उतार कर फेंके नहीं तो ये खुद तो जायेगा ही, भाजपा की भी कब्र खोद देगा।

Thursday, December 20, 2012

गुजरात की जनता का अपमान बंद कर, जनादेश का सम्मान करें राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित नेता..........................

गुजरात की जनता ने एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के हाथों में गुजरात की बागडोर सौंप दी हैं। इस बार भी भारी बहुमत के साथ नरेन्द्र मोदी सत्तारुढ़ हुए हैं। ये अलग बात हैं कि इस भारी जीत को उनके विरोधी पचा नहीं रहे हैं, और फिर धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए, उन्हें धर्मनिरपेक्ष बताने से इनकार कर रहे हैं। इसकी शुरुआत, बिहार से ही हुई हैं। बिहार में भाजपा की वैशाखी पर टिकी, नीतीश की पार्टी के एक प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा हैं कि वे नरेन्द्र मोदी को धर्मनिरपेक्ष नहीं मानते। ऐसे भी समय - समय पर इनकी पार्टी और इनके बहुत सारे नेता, जिसमें राजद से जदयू में गये शिवानंद तिवारी और राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी हैं जो नरेन्द्र मोदी को समय - समय पर नीचा दिखाने के लिए बेतुके बयान देते रहते हैं पर उन्हें नहीं मालूम कि उनका इस प्रकार का बयान, नरेन्द्र मोदी का अपमान नहीं, बल्कि सीधे तौर पर गुजरात की छः करोड. जनता का अपमान कर देता हैं, जो नरेन्द्र मोदी को बार - बार सत्ता सौंपता हैं। 
ऐसे ही लोग मीडिया में भी हैं। जो गाहे - बगाहे नरेन्द्र मोदी को नाना प्रकार के विभूषणों से समय - समय पर अलंकृत करते रहते हैं। जब - जब चुनाव आते हैं, इन मीडिया हाउस को कई साल पहले हुए गुजरात के दंगे याद आने लगते हैं, और इसका दृश्य वे बार - बार अपने टीवी चैनलों के माध्यम से जनता को दिखाने शुरु करते हैं। यहीं नहीं इस दंगे में नरेन्द्र मोदी को लपेटने का भी प्रयास करते है, पर गुजरात की जनता शायद इस घटना को उस रुप में नहीं लेती और अपने ढंग से मतदान कर, सबको बता देती हैं कि उसे अपने नरेन्द्र पर कितना भरोसा हैं। 
सवाल उठता हैं कि गुजरात में दगे हुए, तो उसके लिए भाजपा के नरेन्द्र मोदी दोषी, तो फिर हाल ही में असम में जो दंगे हुए, उसके लिए असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई व भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोषी क्यों नहीं। देश की भुतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो पूरे देश में सिक्ख विरोधी दंगे फैले, उसके लिए कांग्रेसी दोषी क्यों नहीं, जबकि उस वक्त देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी का दंगे पर ही विवादास्पद बयान आ गया था। दंगों पर मीडिया और देश के मूर्धन्य नेताओं का दोहरा मापदंड क्यों। आपके पास कानून हैं, संविधान हैं। आपके पास गर सबूत हैं, तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाये, कोई रोक रखा हैं क्या। अदालत में उन्हें दोषी सिद्ध करें और फिर बोले कि वो नरेन्द्र मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, पर बिना किसी सबूत के किसी व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष न बताकर, उसे दोषी सिद्ध कर देना, क्या गलत नहीं हैं।
इधर मैं देख रहा हूं कि जिसकी कोई औकात नहीं, जो खुद भाजपा के वैशाखी पर सत्तासुख प्राप्त कर रहे हैं,  या जिन्होंने सत्तासुख पाया हैं। जो समय - समय पर भाजपा का सहयोग लेकर संविधान में प्रमोशन पर संशोधन के समर्थन का सहयोग लेने को लालायित भी रहते हैं, पर जब भाजपा को सहयोग करने की बात आती हैं तब उसे सांप्रदायिक कहकर, कन्नी काट लेते हैं, जैसे लगता हैं कि भाजपा अछूत हैं, उसे भारतीय राजनीति में रहने का कोई हक ही नहीं। अब तो कई पार्टियों ने धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट जारी करने का दुकान भी खोल दिया हैं। ये समय - समय पर धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट जारी भी करते रहते हैं। जबकि सबसे बड़े सांप्रदायिक और जातिवाद तथा परिवारवाद के पोषक वहीं हैं। मुलायम की पार्टी समाजवादी पार्टी हो या लालू की पार्टी राजद अथवा मायावती की पार्टी बसपा। क्या ये पार्टियां जातिवाद का सहारा लेकर देश को तोड़ने का काम नहीं करती, क्या जातिवाद से देश को खतरा नहीं हैं। सांप्रदायिकता से देश को खतरा और जातिवाद से देश बनता हैं क्या। इस देश में तो ज्यादातर पार्टियां जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष घोषित की हुई हैं, वे खुद घोर सांप्रदायिक और जातिवाद की शिकार हैं। हाल ही में जाति आधारित जनगणना करवाकर,  इन पार्टियों ने सिद्ध कर दिया कि इनकी मानसिकता कितनी भयानक हैं और देश को तोड़ने के लिए ये कितना बड़ा षडयंत्र रच रहे हैं। 
इसमें कोई दो मत नहीं कि आज देश को नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं की जरुरत हैं, क्योंकि वो जो कहता हैं, वो करता हैं। वो जाति की राजनीति नहीं करता। वो अपने छः करोड़ गुजरातियों की बात करता हैं। वो किसी दूसरे प्रांत से आये, नागरिकों को ये कहकर नहीं दुत्कारता कि तुम बिहारी हो, अपने प्रांत लौट जाओ। आज भी गुजरात के कई शहरों में लाखों की संख्या में बिहारी रहते हैं और गुजरात के विकास में चार चांद लगा रहे हैं साथ ही अपने बिहार में रह रहे परिवारों का भरण - पोषण कर रहे हैं। जरा दिल्ली में देखिये - शीला दीक्षित बिहारियों और यूपी के लोगों के बारे में क्या बयान जारी करती हैं। ये तो कांग्रेसी हैं। इनका इस प्रकार का बिहार व यूपी के लोगों के बारे में घटिया बयान क्यों आता हैं, पर जब शोर मचता हैं तो वो अपने बयान में क्यों सुधार करती हैं। पूछिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृश्वी राज चौहान से कि जब महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर अत्याचार होते हैं तब ये अपना मुंह क्यों सी लेते हैं। ये कुछ उदाहरण हैं। सभी को अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए। 
सब ने नरेन्द्र मोदी के नाम पर गुजरात की जनता का अपमान किया हैं। साथ ही अपमान करने का सिलसिला रुका भी नहीं हैं, जारी हैं। मीडिया व देश के कुछ पार्टियों के नेता अभी भी नरेन्द्र मोदी को सांप्रदायिक बनाने पर तूले हैं। जरुरत हैं जैसे गुजरात की जनता, गोधरा और अन्य दंगे भूलकर, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात को आगे बढ़ाने के लिए लालायित हैं। सभी मीडिया और अन्य पार्टियों के लोग अपने बयानों और कार्यो में सुधार लाये और गुजरात की जनता का अपमान करने का काम नहीं करें, क्योंकि आपको किसी ने ये अधिकार नहीं दिया कि आप बेवजह, उनका अपमान करें..............।

Wednesday, December 19, 2012

दिल्ली में दुष्कर्म, पूरा देश आंदोलित, संसद में बहस - वो रो रही थी, मंत्री जी हंस रहे थे..........................

पूरे देश ने देखा कि दिल्ली में दुष्कर्म, संसद में बहस  - वो रो रही थी, मंत्री जी हंस रहे थे। सारा देश दिल्ली में हुई गैंगरैप वाली घटना को लेकर शर्मसार हैं, आंदोलित हैं। जिनके पास चरित्र हैं, वे स्वयं को मानव कहने पर अपमानित महसूस कर रहे हैं, पर कांग्रेसियों को लज्जा नहीं आती, ये देखिये, संसद में क्या कर रहे हैं। जब राज्यसभा में दिल्ली में गैंग रैप को लेकर, समुचा सदन अवाक् था। घटना को अंजाम देनेवालों आततायियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग कर रहा था। देश के संसदीय कार्य राज्यमंत्री राजीव शुक्ला मंगलवार को उस गंभीर बहस के दौरान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। जबकि इसी सदन में जया बच्चन अपनी भावनाओं को रोक नहीं पायी और उनकी आँखों से आंसू छलक पड़े, हालांकि जिस पार्टी से जया बच्चन आती हैं, उनके नेता मुलायम सिंह यादव की तो बात ही निराली हैं। इनके नेता मुलायम सिंह यादव, विधानसभा चुनाव के दौरान, सिद्धार्थनगर जिले में आयोजित एक चुनावी सभा के दौरान ये कह डाला था कि हमें सत्ता में लाईये, आपको देंगे बलात्कार भत्ता। ऐसे भी हम आपको बता दें कि जैसे हर विषय पर हर पार्टियों की अलग - अलग विचारधारा होती हैं, और वे उन विचारधाराओं को मूर्तरुप देने के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं। उसी प्रकार बलात्कार जैसे विषय पर भी इनकी अलग - अलग विचारधारा हैं।  संयोग से गर किसी ने इनके घर में ऐसी घटना कर डाली तो उसकी खैर नहीं, वे कानून खुद अपने हाथों में ले लेंगे, पर सामान्य जनों के लिए कानून, संविधान और पता नहीं क्या - क्या कह डालेंगे। जो उन्हें पता तक नहीं होता।
सबसे पहले कांग्रेसियों को देखिये कि इन्होंने समय - समय पर बलात्कार के बारे में क्या कहा हैं। सबसे पहले हरियाणा चलिए, जहां 2012 में इतने रेप के कांड हुए कि ये प्रदेश इसी के नाम से ज्यादा जाना जाने लगा। यहां के कांग्रेसी नेता इस कांड पर क्या - क्या बयान दिये हैं। जरा गौर करे। हरियाणा कांग्रेस के प्रवक्ता धरमवीर गोयल के अनुसार बलात्कार के लिए महिलाएं ही जिम्मेवार हैं, 90 फीसदी महिलाएं स्वेच्छा से रेप कराती हैं।
हरियाणा के ही विधायक संपत मीणा कहते हैं कि बलात्कार के लिए चाउमिन और पिज्जा जिम्मेवार हैं। कभी सोनिया गांधी ने ही हरियाणा कांड पर कहा था कि बलात्कार सिर्फ हरियाणा में ही नहीं पूरे देश में होते हैं। ऐसे में हम आपको बता दें कि कांग्रेसी सिर्फ बलात्कारियों पर ही इतनी उदारता नहीं दिखाते ये तो देश को मिट्टी में मिलानेवाली ताकतों पर भी अपनी कृपा बरसाते हैं। जैसे हाल ही में आपने गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को सुना होगा कि कैसे उन्होंने सदन में हाफिज सईद को श्री लगाकर संबोधित किया। ऐसे इसी पार्टी का एक पागल नेता, जिसे दिग्विजय सिंह के नाम से जाना जाता हैं, ये ऐसी हरकतें बराबर किया करता हैं।
आप कहेंगे कि मुझे ये बात लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी। मेरा कहना हैं कि जहां के राजनीतिज्ञों की सोच बलात्कार वाले मुद्दे पर एकमत नहीं हैं. जो इस प्रकार की अमानुषिक घटना को सामान्य ढंग से लेते हो। अपराधियों को सम्मान देते हो तथा गंभीर विषयों पर जब बहस हो तो उसे हंसी में उडा़ देते हो। तब ऐसी हालत में हम ऐसे राजनीतिज्ञों से ये क्यूं आशा रखे, कि ये देश में कानून का शासन स्थापित करेंगे और बलात्कार के दोषियों को सजा दिलवायेंगे। ये तो हमारी लाशों पर राजनीति कर रहे हैं। हमारी संतानों को, वे पशुओं से भी बदतर समझते हैं, तभी तो सत्ता का स्वाद चख रहे, इन मंत्रियों के चेहरे पर मुस्कान दिखी, गर ऐसा नहीं होता तो फिर ये भी हमारी तरह, आंदोलित व आक्रोशित होते। साथ ही गैर - जिम्मेदारानां बयान नहीं देते।
हम आपको बता दें कि आज जरुरत हैं, हर परिवार को कि वे अपनी बेटियों को लक्ष्मीबाई बनाये। ये संभव हैं। गर आपने लक्ष्मीबाई बना दिया यानी स्वरक्षा के उपाय बता दिये तो फिर किसी की हिम्मत नहीं होगी कि वो आपकी बेटी को छू भी सकें। क्योंकि सरकार और पुलिस से स्वरक्षा का विश्वास रखना मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। ये सरकार और ये पुलिस, सिर्फ और सिर्फ नेताओं और उनकी बहु-बेटियों की हिफाजत के लिए हैं। आम जनता के लिए नहीं। आम जनता तो बनी ही हैं - इन नेताओं की खुराक, जमकर, जहां होता हैं ये अपने पेट में, अपने हिसाब से खुराक डाल लेते हैं।

Wednesday, December 12, 2012

12.12.12 का चक्कर..................

12.12.12 को आना ही था, वो आ गया। अब आप इसे कैसे मनाते हैं। कैसे सेलीब्रेट करते हैं। कैसे इस दिन को यादगार बना देते हैं। ये श्रेय ईश्वर ने आपको दिया हैं, पर आप 12.12.12 को सेलीब्रेट करने के चक्कर में ईश्वर को जब चुनौती दे डालते हैं, तो ये ईश्वर को तनिक भी अच्छा नहीं लगता। आज 12.12.12 को सेलीब्रेट करने के चक्कर में लोग यहीं कर रहे हैं। कई ज्योतिषियों ने तो यहां तक कह दिया कि आज के दिन जो बच्चे जन्म लेंगे वे बहुत ही बलशाली व पराक्रमी होंगे, क्योंकि आज के दिन पांच ग्रहों का संयोग मिल रहा हैं। मंगल ग्रह का प्रभाव बच्चों पर पड़ेगा और आज जन्म लेनेवाले बच्चे और दिनों की अपेक्षा कुछ बेहतर स्थिति में होंगे। इस मनगढ़ंत बेफिजूल की बातों व चर्चाओं का प्रभाव यह पड़ा या यूं कहें कि कुछ लोगों को पता नहीं क्या हो गया, वो आज ही के दिन आपरेशन करा बच्चे को जन्म दे रहे हैं और नाम दे रहे हैं कि वे मातृत्व-पितृत्व सुख पाना चाहते हैं। क्या ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देते हुए, खुद आपरेशन करा बच्चे को जन्म दिलाकर, मातृत्व-पितृत्व सुख पाना सहीं हैं। 
कुछ लोग आज ही वैवाहिक जीवन का आनन्द लेने की कामना करते हुए दाम्पत्य सूत्र में बंध रहे हैं। ऐसा करने से उन्हें लगता हैं कि उनका जीवन धन्य हो जायेगा और कुछ लोग अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं, जिसे देख हमें लगता हैं कि हम पढ़े - लिखे लोगों की दुनिया में हैं, या मूर्खों की दुनिया में। अनपढ़ लोग जब ऐसी हरकतें करते हैं तो समझ में आता हैं कि वे अनपढ़ हैं, पर पढ़े लिखे लोग ऐसी हरकतें करे तो क्या कहेंगे। एक घटना सुनाता हूं, जब आपरेशन से बच्चों का जन्म नहीं होता था, तब ऐसी हालात नहीं थी, जबसे आपरेशन की धंधे ने जोर पकड़ा, ऐसी वाहियात बातों का प्रभाव ज्यादा दिखा। सच्चाई ये हैं कि बच्चे - बच्चे होते हैं। ये ईश्वरीय अनुभूतियां हैं, आप इन्हें ईश्वर पर ही छोड़ दे। उन्हें जब ईश्वर ने मुकर्रर कर दिया हैं, दुनिया में आने को। उन्हें उस दिन ही आने दे, नहीं तो इसका खामियाजा आपको ही भुगतना पड़ेगा और फिर आप जिंदगी भर अपने आपको कोसते रहेंगे कि आपने ऐसा क्यूं किया। एक उदाहरण, जो अपने जीवन में घटा हैं, वो आपके समक्ष रखता हूं। एक व्यक्ति ने एक ज्योतिष के घर जाकर कहा, ज्योतिष महोदय। डाक्टर ने कहां हैं कि आपका बच्चा आपरेशन से होगा, आप जब कहें दो तीन दिन के अंदर आपरेशन कर बच्चे को दुनिया में ले आया जाय। आप ये बताये कि कौन दिन आपरेशन कराना अच्छा रहेगा, ग्रहों की स्थिति किस दिन शुभ और अद्भुत हैं, जिस दिन बच्चे को दुनिया में ले आया जाये, और एक पंथ दो काज हो जाय। ज्योतिष ने सारे पंचांग उलटकर डेट मुकर्रर कर दी। और उक्त डेट को बच्चा दुनिया में आ गया। बच्चा जब दुनिया में आया तो फिर ज्योतिष से पंचांग दिखाने की, कुंडली बनाने की बात हुई। चूंकि जन्म के पहले ही पंचांग दिखा लिया गया था, अब केवल औपचारिकता पूरी की गयी। ज्योतिष ने कहा - अरे जजमान, गजब हो गया। आपका बच्चा होनहार, विद्वान, महापराक्रमी, बलशाली हैं, कोई इसके सामने टिकेगा ही नहीं। एकदम मस्ती में रहेगा। जब तक रहेगा, दोनों हाथों में इसके लड्डू रहेंगे। जजमान खुश। ज्योतिष को मुंहमांगी दक्षिणा देकर विदा किया गया। इधर बच्चे के ननिहाल से भी बच्चे को देखने की जिज्ञासा हुई कि ज्योतिष ने कहा हैं कि बच्चा बहुत ही पराक्रमी होगा, हम भी देखे कि मेरा नाती कैसा हैं, मेरा भांजा कैसा हैं। ननिहाल के नाना - नानी, मामा- मामी सभी व्याकुल। छोटा सा बच्चा, जब चार साल का हुआ, वो अपने ननिहाल पहुंचा। सभी खुश, दिन खुशियों से कट रहे थे। ज्योतिष की बात, कुछ सर चढ़ कर बोल रहा था। सभी ज्योतिष की बातों में फूले नहीं समा रहे थे। अचानक एक घटना घटी, चार साल का बच्चा, आकाश से आती हुई किसी चीज को देखने के लिए दौड़ा, शायद पतंग होगा। उसके पांव, खूले छत से फिसले और वो जमीन पर गिर पड़ा। उसे लोग लेकर फिर अस्पताल की और दौड़े और बच्चा दुनिया में मात्र चार साल ही टिक सका। लोग ज्योतिष को कोसने लगे, कि आपने कहा था - ऐसा होगा, वैसा होगा। लेकिन बच्चा तो चार साल में ही दुनिया से चल बसा। ज्योतिष ने कहा कि जजमान मैने गलत कहां कहा। बच्चे की चार साल की आयु थी और इन चार सालों में मैं वो पूरी तरह मस्ती काटा, मैने तो बच्चे की जन्म कुंडली देखी थी, आपकी नहीं। इसलिए आप देखे की बच्चा चार साल में ही मस्ती काटी की नहीं। बच्चे के माता - पिता के होश उड़ गये। वो ज्योतिष की बातों और उसकी इस सोच से अवाक् हो गये। 
आज जिस प्रकार से बच्चे को जन्म दिलाने  और शादी करने की होड़ 12.12.12 के चक्कर में लगी हैं। हमें लग रहा हैं कि कहीं ऐसा नहीं कि लोग इस 12.12.12 के चक्कर में अपने ही हाथों से आनेवाले भविष्य के सुखद पल का कहीं गला न घोंट दे। हम तो यहीं चाहेंगे कि लोग ईश्वर की सत्ता को चुनौती देने के बजाय, ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानकर, ये दिन भी उन्हीं को सौंप, इसका आनन्द लें, तभी हम सच्चे सुख का आनन्द ले पायेंगे, नहीं तो वहीं होगा, जो मैंने एक सच्ची घटना के माध्यम से आपके समक्ष कुछ कहने की बात रखी............