Monday, November 21, 2016

वनवासी के नाम पर.............

ईसाई मिशनरियों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत "वनवासी" शब्द पर अपनी आपत्ति दर्ज क्या करा दी? कुछ लोग वनवासी शब्द से ही चिढ़ने लगे, जबकि सच्चाई यह है कि मिशनरियों के धर्मांतरण और अनुसूचित जन जातियों के मूल धर्म से अलग करने की उनकी हरकतों की आलोचना और प्रतिकार स्वयं उसी समय के अनेक आदिवासी महापुरुषों ने किया। भगवान बिरसा मुंडा का प्रमाण सबके सामने है, पर इन दिनों देख रहा हूं कि मिशनरियों ने एक बार फिर वनवासी के नाम पर वो गंदी हरकत शुरु की है, जिससे समाज में एक बार फिर विष घुल रहा है...आखिर मिशनरियां ये विष क्यों घोल रही है, हमें लगता है कि यहां बताना जरुरी है।
इन दिनों आदिवासियों का एक बहुत बड़ा वर्ग मिशनरियों के धर्मांतरण के कुचक्र से लोहा ले रहा है और अपने बंधुओं को सरना धर्म में लौटने की मुहिम चला रखी है, जिससे उनके धर्मांतरण की मुहिम की हवा निकल गयी है, इसलिए वे बेतुके शब्दों के माध्यम से विष-बेली बो रहे है,ताकि समाज में नफरत की वो बुनियाद तैयार हो, जिससे मिशनरियां अपनी रोटी सेंक सकें। हमें अच्छी तरह पता है कि इसके लिए खाद - बीज कहां से उन्हें उपलब्ध हो रहा है...
और अब बात उनसे जो वनवासी शब्द पर आपत्ति दर्ज करा रहे है?
जब हम वनों में रहेंगे, तो हम भी वनवासी कहलायेंगे, इसमें दिक्कत क्या है...सिर्फ आदिवासी ही वनवासी के पर्याय नहीं है, अगर कोई ये सोचता है, तो कृपया अपने दिमाग से इस विकार को निकाल दें...सिर्फ आदिवासी को जो लोग सिर्फ वनवासी कहते है, वे मूरख ही होंगे...राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण और अपनी पत्नी के साथ 14 वर्षों तक वनों में रहे, वनवासी कहलाये। पांडव वनों में रहे, वनवासी कहलाये...एक समय था पूरा भारत वनों से ढंका था, सभी वनवासी कहलाये...आज भी जिसे हम चंपारण कहते हैं, वह चंपा और अरण्य शब्द से ही बना है, आरा अरण्य का ही अपभ्रंश है, आज भी दारुकावन, दंडकारण्य आदि कई नाम है, जो वन और वहां के वाशिदों का प्रतिनिधित्व करते है... जो आदिवासी ये सोचते है कि वनवासी सिर्फ उन्हीं के लिए बना है, तो माफ करें...मुझे भी वनवासी कहलाने में उतना ही गर्व महसूस होगा, जितना की नगरवासी या भारतवासी कहलाने में...ये तो कुछ घटियास्तर के बुद्धिजीवियों की दिमाग में उपजी घटियास्तर की मानसिक दिवालियापन है, कि इस सुंदर शब्द में भी अलगाववाद और कुत्सितविचारों का बीजारोपण कर दिये है...ईश्वर उन्हें सदबुद्धि दें ताकि वे शब्दों का सही अर्थ निकाल सकें....

Friday, November 18, 2016

हेमंत का बयान यानी हर साख पर उल्लू........

हमारे देश में एक से एक नमूने नेता है, जो अपने पप्पू टाइप सलाहकारों के इशारों पर नाचते और बयान देते है। इस नाचने और बयान देने में कभी – कभी सफलता हाथ लग जाती है तो ये नेता बौरा जाते है और कह डालते है कि अरे वाह क्या तूने हमें सलाह दिया है... हमारी तो बल्ले – बल्ले हो गयी। ये नमूने नेता ये भी नहीं सोचते कि उनका ये बयान दोयम दर्जें से भी नीचे का है। बयान देने में ये नमूने नेता ये भी नहीं देखते कि इससे सामाजिक ढांचा बिखरेगा, वे ऐसी – ऐसी हरकते करते है कि क्या कहा जाय? हम इसके लिए कोई एक दल को दोषी नहीं ठहरा सकते, इसमें सभी दोषी है।
जरा देखिये एक उदाहरण। झामुमो के नेता व वर्तमान में विरोधी दल के नेता हेमन्त सोरेन ने क्या कह दिया? हेमन्त सोरेन का विधानसभा में बयान है कि एटीएम से पैसे निकालने के दौरान मरनेवालों को सरकार शहीद का दर्जा दे। विधानसभा में इस बयान को स्पष्ट रूप से रखने के बाद, तो हमें लगता है कि हेमन्त को एक और बयान देना चाहिए कि भारत में जितने भी घूसखोर नेता है, जिन्होंने देशहित में घूस खाकर केन्द्र की सरकार बचाई, उसे भारत रत्न मिलना चाहिए, क्योंकि उन्होंने स्वयं को घूस की दांव पर बिठाकर नरसिम्हाराव की सरकार बचाई। ऐसे नेताओं को भी भारत रत्न मिलना चाहिए जो अपने बेटे, बेटियों, पत्नियों और बहूओं को सांसद, विधायक बनाने के लिए मरे रहते है।
पता नहीं, हमारे देश के नेताओं को क्या हो गया है? वे चिरकूट टाइप का बयान क्यों दे देते है?, क्या उन्हें थोड़ा सा भी दिमाग नहीं? क्या एटीएम की लाइन में लगना और सीमा पर लाइन लगाकर देश की रक्षा करना दोनों एक ही बात हो सकती है, आखिर ये नेता दोनों अलग – अलग बातों को एक ही तराजू पर क्यों तौल रहे है? नेता विरोधी दल हेमन्त के बयान ने साफ कर दिया कि झारखण्ड के नेताओं की सोच किस स्तर का है? जब नेताओं की सोच दोयम दर्जें की होगी तो ये अपने राज्य को किस दिशा में ले जायेंगे?, ये भी जगजाहिर है, यानी मान लीजिये कि हर साख पर उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?

Wednesday, November 16, 2016

मोदी जी, मत झूकिये, इन निर्लज्जों के सामने...........

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, इन निर्लज्जों के आगे मत झूकिये, नोटबंदी जारी रखिये, भारत काला धन नामक कैंसर से स्वयं को मुक्त करना चाहता है और जब तक इस पर कड़े निर्णय नहीं लिये जायेंगे, देश इस भयानक रोग से मुक्त नहीं हो सकता। कमाल है, कल तक जो नेता भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ आंदोलन करते थे, आज आप के द्वारा काला धन के खिलाफ लिये गये निर्णय को ही कटघरे में रख रहे है और काला धन को संरक्षित करने के लिए आंदोलन पर उतारु है। एक नेता जो स्वयं को समाजवादी कहता है, उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री है, काला धन को आर्थिक मंदी से लड़नेवाला हथियार बता रहा है। राहुल गांधी की तो बात ही निराली है, वो क्या बोलता है?, क्या सोचता है?, उसे खुद मालूम नहीं। कल तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आपके द्वारा लिये गये निर्णय को साहसिक बता रहे थे, आज उनके दल आपके खिलाफ विपक्षी दलों के सुर में सुर मिला रहे है। वामपंथी पार्टियों का तो चरित्र ही रहा है कि भाजपा के खिलाफ हर बात पर आंदोलन कर देना, चाहे उसके लिए उसकी पार्टी की हवा ही क्यों न निकल जाये? इधर एक चीज और देखने को मिल रही है। कुछ चैनल और कुछ अखबार इस मुद्दे पर दो भागों में विभक्त हो गये। जीटीवी, एबीपी, इंडिया टीवी को आपके द्वारा चलाया जा रहा यह अभियान देश हित में लग रहा है, पर आजतक और एनडीटीवी जो शुरू से ही आपके विरोधी रहे है, इस अभियान के खिलाफ आग उगलने शुरु कर दिये है।
पर आम जनता की क्या राय है, वो भी देखिये आज तक का सईद अंसारी नोटबंदी पर सोमवार की रात लाइभ समाचार दिखा रहा था, समाचार में वो दिखा रहा था कि जनता को नोटबंदी के बाद से कितनी परेशानी उठानी पड़ रही है, और इसी खरखाई में वह जनता की ओर माइक लगा कर जनता से पूछ डाला, आप इस परेशानी पर क्या कहेंगे?, जनता ने कह डाला – हम मोदी के साथ है, जनता मोदी-मोदी कहकर चिल्लाने लगी, फिर क्या था?, सईद अँसारी और आजतक के होश ही उड़ गये। इसमें कोई दो मत नहीं कि आम जनता को इस नोटबंदी अभियान से परेशानी हुई है, पर जनता इतनी मूर्ख भी नहीं कि इसके अंदर की बात को नहीं जानती और न समझती हो। जनता नरेन्द्र मोदी के साथ है, क्योंकि जनता जानती है कि काला धन ने देश को कितना नुकसान पहुंचाया है? कैसे ये आतंकवादियों और नक्सलियों को मदद पहुंचा रहा है?, कैसे आंतकी कश्मीर के पत्थरबाजों तक ये काला धन पहुंचाते थे?, नकली नोटों के माध्यम से। कैसे जमाखोंरों और भ्रष्ट अधिकारियों का दल काला धन के माध्यम से देश और विदेश में अपना कारोबार फैला रखा था? हमारा मानना है कि देश को आत्मनिर्भर और सम्मान के साथ जीना है तो इस पर अंकुश लगाना ही होगा।
जरा बेशर्म नेताओं को देखिये...एक नेता कहता है कि काला धन पर अंकुश लगना चाहिए, पर समय गलत चूना गया। मैं पूछता हूं कि काला धन पर अंकुश कब लगे?, इसके लिए किसी पंडित के पास जाकर सुदिन देखना था क्या? क्या इससे काला धन रखनेवाले लोग सतर्क नहीं हो जाते? देश में जब भी काला धन पर अंकुश लगाने का निर्णय लिया जाता, समस्याएं आती, और समस्याओं से लड़ने के लिए हमें कुछ त्याग करना होगा, देश हित में। सिर्फ खाने-पीने, सुतने और बेवजह की तिरंगे लहराने को देशभक्ति नहीं कहते।
मैं तो देख रहा हूं कि काला धन पर अंकुश लगाने के निर्णय से राजनीतिज्ञों, व्यापारियों, पत्रकारों, इंजीनियरों, डाक्टरों, आइएएस, आइपीएस, सरकारी बाबूओं और उन सारे दो नंबरियों के नींद उड़ चुके है, वे पैसों को ठिकाने लगाने के लिए नये – नये तरकीब ढूंढ रहे है। जो मजदूर कल तक सब्जी के बोरे ढोते थे, जो सामान ढोते थे, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी तबाह हुआ करती थी, जो तत्काल टिकट की बुकिंग करने के लिए रात से ही लाइन लगाने के लिए रेलवे टिकट बुकिंग काउंटर पर लगे रहते थे, उनसे रुपये बदलवाने का काम लिया जा रहा है, ये लोग बेवजह की एटीएम पर भीड़ लगा रहे है, जिनके कारण 30 प्रतिशत जरुरतमंदों को परेशानी उठानी पड़ रही है, हालांकि इन परेशानियों के बावजूद जनता मोदी की तारीफ करते नहीं थकती।
कल की ही बात है, रात में मैं एबीपी न्यूज देख रहा था, उस न्यूज में साफ दिखलाया जा रहा था कि जो लोग रात में ही एटीएम के पास पूरे परिवार के साथ खटिया और कंबल के साथ आ धमके है, वे सारे के सारे वहीं लोग है, जो काला धन को सफेद बनाने के लिए काला धन रखनेवालों की मदद कर रहे है। इनका एक ही मकसद है, काला धन रखनेवालों से मुंहमांगी रकम लो, और उनके काला धन को सफेद कर दो। हालांकि इन पर नकेल कसने के लिए केन्द्र सरकार ने स्याही लगाने का प्रबंध इनके हाथों में किया है। मैं चाहता हूं कि ऐसे लोगों को सीसीटीवी खंगाल कर, जेल में बंद भी करना चाहिए, ताकि काला धन रखनेवालों की मदद करनेवालों की नानी – दादी याद हो जाये।
हमारे देश में हर अच्छे काम करने पर उसका विरोध करना एक फैशन हो चला है। याद करिये, जब राजीव गांधी ने सरकारी कार्यालयों में कम्प्यूटर का प्रवेश कराया था, तो यहां की तत्कालीन वामपंथी और विपक्षी पार्टियों ने इसकी कितनी आलोचना की थी, इस निर्णय के खिलाफ कितना बड़ा आंदोलन चलाया था, पर आज सच्चाई क्या है?, सब के सामने है, इस कम्प्यूटर ने हमारी जिंदगी बहुत ही आसां कर दी है। ठीक इसी प्रकार नरेन्द्र मोदी द्वारा लिया गया, यह निर्णय देश को मजबूती देने के लिए है। बस हमें मजबूती प्रदान करनी है, इस निर्णय की।
सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर का नरेन्द्र मोदी द्वारा लिये गये निर्णय की प्रशंसा करते हुए यह कहना कि जब हमारे फौजी, देश के जवान, विपरीत परिस्थितियों में, अपनी जान पर खेलकर देश की हिफाजत कर रहे है तो क्या हम देश के लिए इतना भी नहीं कर सकते?, आखिर दो – चार घंटे लाइन में लग गये तो क्या हो गया?, कौन सा पहाड़ टूट गया?
इस एटीएम पर लगी लाइन पर जो लोग सवालिया निशान उठा रहे है, उनसे हमारा भी सवाल है, कि आखिर हाल ही में फोकट के जियो सिम लेने के लिए लोगों ने डेढ़ किलोमीटर की लंबी लाइऩ नहीं लगाई है क्या? फिल्मों के टिकट पाने के लिए लोग लंबी लाइन नहीं लगाते क्या? और लंबी लाइन लग भी गयी तो क्या हो गया? अरे देश तुम्हारा है, देश के लिए कुछ तो करो भाई...

Thursday, November 10, 2016

माफ करिये मोदी जी................

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 व 1000 के नोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक क्या चलायी, बाजार से एक, पांच, दस, बीस, पचास और 100 रुपये के नोट ही गायब हो गये। जिन्हें घर में सब्जी या जरुरत की चीजें - राशन खरीदनी है, उनके लिए जीवन - मरण का यक्ष प्रश्न आ गया है। सर्वाधिक चिंता का विषय ग्रामीण इलाकों में है, जहां स्थिति भयावह है। कल तक बैंक और पोस्टआफिस के बाबू मक्खी मारते थे, आज उनकी पौ बारह है। हर कोई उनकी आरती उतार रहा है, शायद ये बाबू भगवान बनकर कुछ मदद करा दें। एक से लेकर 100 रुपये के कुछ भी नोट का दर्शन करा दें, ताकि बनियों की दुकान पर जाकर, वे जरुरत का सामान खरीद सकें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि कुछ दिन दिक्कते आ सकती है, शायद उनका इशारा इसी ओर था, पर हमें लगता है कि ये दिक्कतें बहुत लम्बी जायेगी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत अन्य मंत्रियों के बयान अखबारों में धमाल मचा रहे हैं। देश की जनता भी प्रसन्न है, मोदी जी ने बहुत अच्छा काम किया है। नक्सलियो से लेकर आतंकवादियों, जमाखोरों तक पर बुलडोजर चला दिया, पर जब वे बाजार जा रहे है और उनसे पूछा जा रहा है कि छोटे नोट है, तो उनके हाथ - पांव फूल जा रहे है। शायद जमाखोरों को भी पता था कि मोदी जी धमाल मचायेगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी धमाल में उन्होंने देश में पड़े सारे छोटे नोटों पर कुंडली मार कर बैठ गये। मोदी जी, कभी-कभी अच्छा काम से भी नुकसान होता है...
हम जानते है कि आपका हृदय साफ है, पर यकीन मानिये हमलोगों का भी हृदय साफ है। बहुतों के घर में शहनाइयां बजनेवाली है...कहीं ऐसा नहीं कि उनके घरों में मातम पसर जाये। बहुत सारी देश की महिलाएँ अपने पति से छुपाकर पैसे रखती है, ताकि आसन्न संकटों का मुकाबला किया जा सकें, यहीं नहीं वे इन पैसों से अपने पति और परिवार का मान भी रखती है, पर आज वो मजबूर होकर घर से पैसे निकाल रही है। आपने कहा था कि आप बाहर के पैसों को भारत ला्येंगे, पर आपने घर से ही उनके पैसे निकाल लिये, जिनके सपने थे। आपने बहुत अच्छा किया है, आपकी सरकार में शामिल सभी मंत्री और नेता और आपकी पार्टी दूध के धूले है, लेकिन हमारा मत है कि देश की बेटियां और मां आपके लोगों से ज्यादा ईमानदार है...उन्हें भी देश प्यारा है...वे भी आतंकियों और नक्सलियों को अपने पैरों के ठोकरों पर रखती है...पर क्या करें। वे आज दुखी है। कहीं ऐसा नहीं कि उनकी आह आपको ले डूबे...इसलिए पहले वो काम करें, जिससे इन गरीबों व महिलाओं के सम्मान पर आंच न आये...बाकी आप जो करें, देश और जनता तो आपके साथ है ही...

Monday, November 7, 2016

अल कर, बल कर, छठ पर आर्टिकल, लिख चल..........

अल कर,
बल कर,
छठ पर आर्टिकल, लिख चल...
अल कर,
बल कर,
छठ पर, अलबल बोल चल...
अल कर,
बल कर,
छठ पर रिपोर्टिंग कर चल,
टीवी पर अनाप-शनाप बक चल...
पिछले एक सप्ताह से हमारे आंख-कान दोनों पक गये...
अखबारों और टीवी चैनलों तथा गुगुल पुराणों ने छठ महापर्व की धज्जियां उड़ा दी है...
जितने अखबार, उतनी बुद्धि, जितने टीवी उतनी बक-बक
और सभी ने अपने ज्ञान से छठ की ऐसी-तैसी कर दी...
जिनको छठ के बारे में एबीसीडी नहीं मालूम
वे महाज्ञानी और महापंडित बनकर उपदेश देते नजर आये
और
जो छठ के सर्वज्ञानी है, वे अपने कमरों में बंद होकर पागलों जैसा बुदबुदाते नजर आये...
मैं पिछले एक सप्ताह से देख रहा हूं कि अखबारों और टीवी चैनलों में नये- नये चिरकुटानन्दों की फौज ने धमाल मचा रखा है...
बंदरों जैसी हरकते, गधों जैसी सोच रखे, रिपोर्टरों और अखबार व चैनल के संपादकों ने छठव्रतियों और उनके परिवारों का कीमा बना दिया है...
सच पूछिये, अगर जो नये ढंग से छठ से जुड़ना चाहते है, तो उनके लिए इन महाचिरकुटानंदों ने हर प्रकार के कुसंग से छठ का नाता जोड़ दिया है...
जबकि पूर्व में ऐसा नहीं था...
बच्चे अपनी मां और दादी से छठ की आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को जान लेते...
कल की ही बात है...
एक अखबार और उसके बाद चैनल पर हमारी नजर गयी...
जनाब एक सज्जन, छठि मइया को भगवान भास्कर का पत्नी बता दिये...
एक ने बहन बना दिया
और एक ने क्या कह दिया, उसे खुद पता नहीं...
यहीं नहीं
आजकल वामपंथियों की एक नई फौज जो धर्म को अफीम मानती है, वह भी छठ में साम्यवाद ढुंढती नजर आयी, उन वामपंथियों को छठ के ठेकुएं और केले में कैसे साम्यवाद नजर आ गया, हमारी समझ से परे है...
चोरी से, चीटिंग से मैट्रिक, इंटर, बीए, एमए कर किसी तरह से प्रोफेसर और रीडर बने लंपटों का समूह भी छठ पर आर्टिकल लिख रहा था और उसे अखबार वाले इस कदर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे थे, जैसे लग रहा हो, कि वह महाज्ञानी हो...पर जो लोग छठ के बारे में विस्तृत जानकारी रखते है, उन्हें ये पता लगते देर नहीं लगी कि ये ढोंगी प्रोफेसर चोरी से डिग्री लेकर यहां तक पहुंचा है, जो सारी दुनियां को भरमा रहा है, और इसके माध्यम से संपादकों का समूह अपनी उल्लू सीधी कर रहा है...
यहीं हाल सारे चैनलों के रिपोर्टरों का था...
चूंकि छठ के बारे में नॉलेज तो है नहीं तो बस घिसी पिटी सवाल से फिल्मों में काम करनेवाले असरानी, जगदीप, राजेंद्रनाथ और धूमल जैसे हास्य कलाकारों का रोल अदा कर रहे थे और यहीं हाल टीवी के एंकरों का था...
इन सारी हरकतों को देख, हमें ये जानते देर नहीं लगी कि आनेवाला समय महामूर्खों चिरकूटानंदों का है...यानी जो जितना मूर्ख वो उतना ज्ञानी...जितना अल बल लिखो, उतना बड़ा साहित्यकार और पत्रकार...
पर इसके परे,
एक परिवार को भी देखा...
बुढ़ी माता...छठ कर रही थी...
उनके संग, बहुत सारी औरते थीं, जो बुढ़ी माता को सहयोग कर रही थी...
बच्चे बुढ़ी माता को आजी कहकर पुकार रहे थे...
तभी मैं रह नहीं पाया...
पूछ डाला कि आजी आप अखबार पढ़ती है, टीवी देखती है...
आजी ने कहा – ए बचवा, आग लागे अइसन पढ़ाई के

आउर आग लागे अइसन टीवी दिखाई के
अरे जब भावे नइखे, तो पूजा करके का होई...
हमरा कोई सीखवले बा...
अरे हम अपना घर में बुढ़ परनिया के देखनी और सीख गइनी...
इ तो अखबरवन और टीवीवालन सब बर्बाद करके धर देले बारन सब...
हम तो सोचतानी कि अइसने चलत रही...
त आगे चलके
भीड़ त दीखी पर छठि मइया ना दिखाई दीहे...

Thursday, October 27, 2016

धर्मांतरण के नाम पर एआइपीएफ की चिरकूटई...........

झारखण्ड में मिशनरियों द्वारा अनैतिक तरीके से चलाये जा रहे धर्मांतरण के कट्टर समर्थक ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम ने राज्यपाल से मांग की है कि वे वंदना डाडेल मामले में हस्तक्षेप करते हुए राज्य सरकार पर दबाव डाले कि वह वंदना डाडेल के खिलाफ जो कारण बताओ नोटिस जारी की है, वह नोटिस को राज्य सरकार वापस ले लें। हम आपको बता दें कि ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम भाकपा माले की प्रतिलिपि है, जिसके ज्यादातर सदस्य भाकपा माले से जुड़े है, तथा जो शेष बचे है, उनमें से एक दो अन्य वामपंथी दलों से जुड़े है। इनका मूल मकसद हिंदू और आदिवासियों के उनके मूल धर्म को सबके समक्ष निकृष्ट बताना है। इनके ज्यादातर कार्यक्रम मिशनरियों से जुड़े संस्थानों में आयोजित होते है। इनके बाहर के सदस्य भी आते है, तो वे या तो वामपंथी कार्यालयों में ठहरते है अथवा मिशनरी संस्थाओं में ठहरते है और यहीं से धर्मांतरण के कार्यक्रमों को गति देते है।
कुछ सवाल ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम के लोगों से...
1. वंदना डाडेल से इतना प्रेम क्यों? वंदना डाडेल ने सोशल साइट्स पर अपनी बातें रखी, राज्य सरकार के कार्मिक विभाग ने उनसे सवाल पूछे। इसे राजनीतिक रंग देने की जरूरत भाकपा माले एंड कंपनी को जरूरत क्यों पड़ गयी?
2. वंदना डाडेल ने जो सोशल साइट्स पर मुद्दे उठाये कि आदिवासियों में सर्वाधिक गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी देखे गये है, ऐसे में वे स्वेच्छा से धर्म भी नहीं चुन सकते? मैं पूछता हूं भाकपा माले एंड कंपनी से कि क्या धर्मांतरण कर लेने से ये सारी समस्याएं दूर हो जाती है? क्या भारत के सारे लोग जो गरीब है, उन्हें धर्मांतरण कर ईसाई बन जाना चाहिए? गरीबी का धर्म से क्या संबंध? मैं पूछता हूं कि विदेशों में लोग जो गरीब नहीं है, हर प्रकार से परिपूर्ण है, वे हिन्दू क्यों बन रहे है?
3. मैं पूछता हूं कि किसी गरीब को रोटी दिखाकर, कपड़े दिखाकर, रोजगार का लोभ दिलाकर, उन्हें प्रलोभन देकर, उनकी गरीबी का मजाक उड़ाकर, उनका धर्मांतरण कराना गलत नहीं है क्या? वंदना डाडेल पर बयान देनेवाली भाकपा माले एंड कंपनी बताएं कि फादर कामिल बुल्के भारत के गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस से क्यों प्रभावित थे?
4. आजकल मैं देख रहा हूं कि भाकपा माले एंड कंपनी के लोग जिनको हिन्दूत्व की एबीसीडी मालूम नहीं, वे भी मनुवाद पर खुब लिख रहे है, जबकि सच्चाई ये है कि इन वामपंथियों के जमात को कई मस्जिदों में नमाज और कई मंदिरों में घंटे बजाते भी मैं देखा हूं और ये सब राज्य की जनता को उल्लू बनाने के लिए करते है, ये कहकर कि देखो कि मैं आपके साथ हूं, जबकि सच्चाई ये है कि ये वो हर हरकत करते है, जिससे समाज को टूटने का खतरा है।
5. सच्चाई ये है कि सारी दूनिया जानती है कि वामपंथी धर्म को अफीम मानते है, पर यहां के वामपंथी, धर्म को अपने-अपने हिसाब से तौलते है और उसकी रूपरेखा तय करते है।
6. हमारा मानना है कि धर्म – सत्य और शाश्वत है। किसी व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया गया कोई भी मंतव्य, धर्म नहीं हो सकता। धर्म तो उस व्यक्ति विशेष के मंतव्य चलने-चलाने के पूर्व से ही मौजूद रहा है। आप उसको कोई नाम दें पर वह सत्य ही रहता है, उसके मूल स्वरूप में कोई बदलाव नहीं ला सकता। फिर भी धर्म के नाम पर धर्मांतरण का खेल, झारखण्ड में कुछ ज्यादा ही चल रहा है, और इस खेल में जो सर्वाधिक नंगे है, वे कुछ ज्यादा ही डॉयलॉगबाजी कर रहे है और दूसरे को अनैतिक और असंवैधानिक बताते है। हमारे विचार से, राज्य व केन्द्र सरकार को इस पर एक्शन लेना चाहिए और कहीं भी प्रलोभन और अनैतिक तरीके से धर्मांतरण का कार्य कोई भी कर रहा है, तो उसे कानून के शिकंजे में कसना चाहिए, क्योंकि हमारा संविधान भी अनैतिक तरीके से कराये गये धर्मांतरण को मान्यता नहीं देता।

Tuesday, October 25, 2016

झारखण्ड बंद की हवा निकल गयी................

दिनांक 24 अक्टूबर, दिन सोमवार को हजारीबाग के बड़कागांव में बीते दिनों हुई पुलिस फायरिंग के विरोध में कांग्रेस, झाविमो, राजद, जदयू और सभी वामदलों एवं आदिवासी नामधन्य संगठनों ने झारखण्ड बंद का ऐलान किया था। इस बंद को राज्य की प्रमुख विपक्षी दल झामुमो ने भी अपना नैतिक समर्थन दिया था। कुल मिलाकर कहें तो भाजपा को छोड़कर सभी दलों ने बंद बुलाया था, जिस प्रकार बंद की तैयारी थी, उस प्रकार से तो ये बंद ऐतिहासिक हो जानी चाहिए थी, पर आम जनता द्वारा इस बंद को नकार दिये जाने के कारण ये बंद प्रभावहीन दिखा। हम आपको यह भी बता दें कि इस बंद को एक प्रकार से रांची के प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों ने भी अपना नैतिक समर्थन दिया था। एक अखबार जो स्वयं को अखबार नहीं आंदोलन कहता है, उसने तो इस आंदोलन को दमदार आंदोलन की संज्ञा दे डाली थी, पर उसे कल अवश्य घोर निराशा हाथ लगी होगी कि उसके इस दमदार आंदोलन में रांची में मात्र 472 बंद समर्थक ही सड़क पर दीखे, जो गिरफ्तार हुए। अगर हम झारखण्ड बंद की बात करें, तो पूरे झारखण्ड में बंद का मिला-जुला असर दिखा। राज्य के प्रमुख महानगरों जैसे रांची, जमशेदपुर, धनबाद व डालटनगंज में बंद का कोई असर नहीं दिखा। रांची में तो दोपहर के 12 बजे, जिंदगी आमदिनों की तरह दिखी।
सर्वाधिक मजा तो धनबाद में बंद के दौरान दिखा। बंद करानेवाले नेता मुकदमे के डर से स्वयं ही सेल्फी लेकर अपना फोटो पत्रकारों को उपलब्ध करा रहे थे। स्थिति ऐसी थी कि धनबाद में ज्यादातर नेता ड्रामेबाजी में ही मशगुल दीखे। कांग्रेस का एक नेता संतोष सिंह सुबह में राजधानी एक्सप्रेस को रोकने धनबाद स्टेशन पहुंचा, ट्रेन के आने पर फोटो खिंचवाई और चलता बना। झाविमो का रमेश राही का भी यहीं हाल था, सुबह बंद कराने निकले, स्टेशन पहुंचे, चेहरा चमकाये और चल दिये। जदयू के पिंटू सिंह का भी यही हाल था, यानी जेल और मुकदमे के डर ने इन नेताओं का गला सूखा दिया था।
आखिर ये बंद क्यों असफल रहा? इस बंद के असफल होने का मूल कारण, बंद के तिथि का समय ठीक नहीं होना है। चूंकि दीपावली है, धनतेरस है, धन्वतंरि जयंती है, भैया दूज है, छठ महापर्व का आगमन है, इन सारे पर्व – त्यौहारों के कारण बंद की हवा निकल गयी और जनता ने इस बंद से स्वयं को अलग रखा। शायद बंद समर्थक नेता व कार्यकर्ता इन बातों को समझने में असफल रहे।
बंद का भी एक समय होता है, आप जब बंद बुला लें और बंद का जनसमर्थन जुटा लें, ये संभव नहीं है। हां, अगर जनता का समर्थन चाहिए तो जनता का दिल भी टटोलना होगा, उनकी मनोदशा का भी आकलन करना होगा।
एक बात और, यहां की जनता पिछले 15 सालों से बंद का दंश झेलकर आजीज हो चुकी है, अब एक तरह से वह बंद से नफरत करने लगी है, ये बंद समर्थकों को समझना होगा। हां अब बंद का वे विकल्प तलाशें, अच्छा रहेगा कि ये बंद एकदिवसीय न होकर, कुछ घंटे का हो, जिसमें बंद समर्थक अपनी नीतियों को सरकार तक भी पहुंचा दें और आम जनता को तकलीफ भी नहीं हो। अगर इन विकल्पों पर राजनीतिक दलों ने नहीं सोचा, तो समझ लीजिये, राज्य की जनता उन्हें अच्छी तरह समझा देगी, क्योंकि ये राजनीतिज्ञ कोई दूध के धूले नहीं है, जनता सब समझती है...
एक बात और, भले ही बंद समर्थकों के बंद को रांची की जनता ने नकार दिया, पर झारखण्ड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने बंद को सम्मान देते हुए बंद समर्थकों के हौसले जरुर बुलंद कर दिये। उन्होंने अपने एक कार्यक्रम को झारखण्ड बंद के कारण रद्द कर दिया। जैसे उन्हें कल रांची के एक्सआइएसएस जाना था, पर वे वहां नहीं गयी और कह दिया कि चूंकि बंद है, इसलिए वे वहां जाने में असमर्थ है, यानी सरकार बंद में जनता के साथ और राज्यपाल बंद में बंद समर्थकों के साथ।

Sunday, October 23, 2016

प्रभात खबर के लिए बाबू लाल हीरो और रघुवर खलनायक........

रांची से प्रकाशित अखबार प्रभात खबर ने आज बाबू लाल मरांडी को हीरो और रघुवर को विलेन बनाकर जनता के सामने पेश किया है। इसका मूल कारण प्रभात खबर के प्रधान संपादक रह चुके हरिवंश है, जो फिलहाल जनता दल यू से राज्यसभा सांसद है, हालांकि कहनेवाले ये भी कहते है कि हरिवंश प्रभात खबर छोड़ चुके है, पर हमारे पास पुख्ता प्रमाण है कि वे प्रभात खबर छोड़े नहीं है, आज भी वे प्रभात खबर को कस कर पकड़े हुए है। चूंकि नीतीश कुमार ने झारखण्ड मामले में अपनी नीति स्पष्ट कर दी है कि बाबू लाल मरांडी झारखण्ड के नायक है, वे ही उनकी ओर से झारखण्ड के मुख्यमंत्री उम्मीदवार है। तभी से हरिवंश ने उनकी राह आसान बनाने के लिए कमर कस ली है और जब भी मौका मिलता है, वे बाबू लाल के प्रति वफादार बन कर पत्रकारिता को अपने इशारों पर नचा रहे है। जैसे कल ही की बात को ले लीजिये। रांची में कल आदिवासी आक्रोश रैली थी। इस रैली में 42 आदिवासी संगठनों के लोग थे, पर प्रभात खबर ने इस पूरे प्रकरण का हीरो बाबू लाल मरांडी को बना दिया, जबकि उस रैली में कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू, गीताश्री उरांव, झामुमो के पौलुस सुरीन और अन्य नेता भी मंच पर मौजूद थे। यहीं नहीं अपने अखबार में प्रथम पृष्ठ पर इस प्रकार की हेडिंग दे दी कि अगर सामान्य व्यक्ति उस समाचार को पढ़े तो पता लग जायेगा कि यहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास सचमुच में खलनायक है, जबकि सच्चाई कुछ और ही है।
प्रभात खबर के अनुसार, कल की रैली को रोकने के लिए राज्य सरकार ने कमर कस लिया था, और इसी क्रम में खूंटी में फायरिंग हुई और एक व्यक्ति की मौत हो गयी, जबकि सच्चाई कुछ और ही है। इस सच्चाई को जानने के लिए आपको दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आजाद सिपाही, राष्ट्रीय सागर तथा अन्य अखबारों का रूख करना पड़ेगा।
दैनिक भास्कर ने अपने प्रथम पृष्ठ पर फोटो देते हुए हेडलाइन्स दिया – रांची में रैली, खूंटी में नाकेबंदी से आक्रोश। एएसपी-थानेदार को ढाई घंटे रस्से से बांधकर पीटा, फिर पुलिस फायरिंग में किसान की मौत, लेकिन प्रभात खबर ने इसी घटना को पृष्ठ संख्या 11 पर लिखा – खूंटी में प्रशासन ने एक हजार ग्रामीणों को रोका और पुलिस के साथ होनेवाली हादसे और सेंदरे की बात अपनी ओर से छुपा ली, साथ ही इस घटना को सामान्य दिखाते हुए पुलिस के मुख से लिखवाया, जैसे लगता है कि वहां कोई ऐसी घटना घटी ही नहीं। जबकि सच्चाई यह है कि अगर पुलिस आत्मरक्षार्थ गोली नहीं चलाती तो आज कितने पुलिसकर्मियों के घरों में लाशों के ढेर नजर आते क्योंकि इस रैली में नक्सलियों ने अपनी भूमिका तय कर रखी थी। इस घटना को दैनिक जागरण ने प्रथम पृष्ठ पर हेडिंग्स देते हुए लिखा – खूंटी में उग्र भीड़ पर फायरिंग, एक मरा, पुलिस ने आत्मरक्षार्थ चलाई गोलियां, 8 ग्रामीण घायल और इस हेडिंग्स के माध्यम से दैनिक जागरण ने पत्रकारिता धर्म की रक्षा की, साथ ही आक्रोश रैली को भी प्रमुखता से उठाया, जो उठाना भी चाहिए।
चूंकि हिन्दुस्तान अखबार ने तो परसो से ही ताल ठोक दिया था कि उसे आदिवासी आक्रोश रैली को बेहतर ढंग से पेश करना है और रघुवर दास की सरकार को कील ठोकना है, तो उसने अपने उक्त निर्णयों पर आगे बढ़ते हुए, आज भी वहीं किया। इसलिए हिन्दुस्तान अखबार पर क्या कहना।
अब अपनी बात – ये जो अखबार वाले है न। कोई धर्म या समाज हित में पत्रकारिता के लिए अपना दुकान नहीं खोले है। प्रभात खबर का मालिक प्रभात खबर की आड़ में कहा-कहां माइन्स चला रहा है, क्या किसी को नहीं मालूम। हिन्दुस्तान अखबार के लोग अर्जुन मुंडा के शासन काल में कहा पर गोल्डमाइन्स लिये थे। हमको नहीं मालूम है क्या? यानी ये अखबार वाले अपना धंधा चलाने के लिए आदिवासियों की जमीन लूटे तो सही और दूसरा कोई लूटे तो गलत। अरे गलत है तो सब गलत है, एक गलत और दूसरा सहीं...और दूसरा गलत तो पहला सही कैसे भाई। सच्चाई यह है कि यहां झारखण्ड का हर नेता और हर पत्रकार अपने – अपने ढंग से राज्य की जनता को बरगला रहा है, और भोली-भाली जनता इनके बहकावे में आ रही है। नेताओं और पत्रकारों को तो कुछ नहीं होता, पर जनता हर प्रकार से मारी जाती है। अखबार के मालिकों और संपादकों को क्या है? वे तो पेड न्यूज की आड़ में अपनी गोटी सेंक चुके होते है और उनके प्यादे यानी रिपोर्टर्स उनके इशारे पर वो न्यूज बनाते है, जो उनके आकाओं को पसंद आती है। आज का अखबार देखने से तो यहीं लगता है।
... और अब एक सलाह राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास को, आप कृपा कर किसी भी अखबार के कार्यक्रम में जाये, तो प्लीज ये न कहें कि पत्रकारिता हो तो फंलाने अखबार जैसी। हमारे पास प्रमाण है एक अखबार बार-बार आपका वक्तव्य छापता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास ने प्रभात खबर की प्रशंसा की। हमें हंसी आती है, जो अखबार हमारे परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के परिवार के साथ धोखा करता है। अमर शहीद की मिट्टी पर राजनीति करता है, उसे आप कैसे कह सकते है कि बहुत ही अच्छा है। प्लीज माफ करें। झारखण्ड की जनता के साथ इँसाफ करें। ये अखबारवाले किसी के नहीं है, न तो देश के और न ही देश के जवानों के। ये तो वीर जवानों के शहीदों का भी व्यवसायीकरण कर देते है। शर्मनाक...

Saturday, October 22, 2016

आदिवासियों के हित के नाम पर चेहरा चमकाने की कोशिश............

राज्य सरकार ने राज्य के आदिवासियों के हित के लिए एसपीटी और सीएनटी में बदलाव करने का फैसला लिया। इस फैसले से आदिवासियों का एक बहुत बड़ा तबका, जो चाहता है कि आदिवासियों के जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव हो, वह बहुत ही खुश है, पर एक तबका इस पर राजनीति कर, अपना चेहरा चमकाने को बेताब है। जो अपना चेहरा चमकाना चाहता है, वह यहां के मिशनरियों से अनुप्राणित है। मिशनरियां भी चाहती है कि जिस प्रकार डोमिसाइल आंदोलन की आग को उन्होने हवा दी थी, इसे भी अपने ढंग से हवा देकर इस मुद्दे को आग की तरह फैला दे, ताकि रघुवर सरकार की जमकर किरकिरी हो जाय, पर इसके विपरीत न लाभ और न हानि, न सत्ता का लोभ, न कुछ पाने की इच्छा ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को स्थानीय नीति और अब एसपीटी और सीएनटी पर हीरो के रूप में झारखण्ड में स्थापित कर दिया है। जिसको लेकर राज्य के छोटे से लेकर बड़े आदिवासी नेताओं की हवा निकल गयी। पिछले दिनों गुपचुप तरीके से आदिवासियों की रैली आयोजित करने के बाद, आज बाबूलाल मरांडी का ग्रुप आदिवासी आक्रोश रैली का आयोजन किया। इस रैली के सफल आयोजन के लिए खूब मेहनत की गयी। जमकर गांव-गांव का परिभ्रमण किया गया। मिशनरियों से भी सहयोग लिया गया। उन सारे लोगों के पांव पकड़े गये, जो किसी न किसी प्रकार से आदिवासी समुदाय के नाम पर नेतागिरी चमकाते है, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि कहीं आदिवासी के नाम पर उनकी नेतागिरी न छिन जाये। राज्य व राष्ट्रस्तर पर जो आदिवासी नेता का बड़ा लेबल लगा है, वह न छिन जाये। मोराबादी से लेकर कचहरी चौक तक लाउडस्पीकर का बंदोबस्त किया गया, पर भीड़ उतनी नहीं जूट सकी, जितना का उन्होंने ऐलान कर रखा था।
दूसरी ओर रांची से प्रकाशित एक अखबार हिन्दुस्तान की सारी टीम इस रैली के आयोजन के पूर्व ही आयोजनकर्ताओं के आगे नतमस्तक हो गयी। खूब जमकर तारीफ के पूल बांधे। प्रथम पृष्ठ से लेकर अंदर के पृष्ठों तक आदिवासी आक्रोश रैली के गुणगान छापे। प्रथम पृष्ठ पर तो इस अखबार ने एक प्रकार से आदिवासी आक्रोश रैली के नाम पर दहशत फैलाने की कोशिश की। यह लिखकर कि “रांची की सड़कें आज प्रदर्शनकारियों से रहेंगी जाम” पर खुशी इस बात की कि आज प्रशासन ने इस प्रकार की व्यवस्था कर दी थी कि कहीं भी कोई जाम नहीं लगा, नहीं तो यकीन मानिये हिन्दुस्तान इसे भी बढ़ा-चढ़ा कर दूसरे दिन छाप देता, पर हिन्दुस्तान अखबार की हेकड़ी निकल गयी। ऐसे भी रांची में कोई अखबार नहीं, जो दूध का धुला हो, सभी पत्रकारिता छोड़ दुकान खोलकर बैठ गये है और जिसमें उनका हित सधता है, उस प्रकार से वे अपना दिमाग सेट कर कभी सरकार के खिलाफ तो कभी किसी नेता के खिलाफ तो कभी किसी संगठन के खिलाफ लिख चलते है और जैसे ही इनका विज्ञापनों से मुंह बंद कर दिया जाता है, फिर ये उसकी स्तुति गाने लगते है।
रांची से प्रकाशित ही एक अखबार है – राष्ट्रीय सागर। बहुत ही छोटा अखबार, पता नहीं आप जानते है या नहीं। इसी में काम करते है एक पत्रकार उमाकांत महतो। उनका एक आलेख छपा है, आज प्रथम पृष्ठ पर। शीर्षक है – पहला संशोधन 1914 में और 26वां 1995 में, अगर ये आर्टिकल आप पढ़े तो आपको पता लग जायेगा कि अब तक छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 में 26 बार संशोधन हो चुके है। अब मेरा सवाल है कि केवल 1914 से लेकर 1995 तक जब 26 संशोधन हो चुके है तो फिर इस बार के संशोधन से आदिवासियों के लिए नेतागिरी करनेवाले, आदिवासी नेता और मिशनरियों के पेट में दर्द क्यों? मैं पूछता हूं कि अब तक 26 संशोधनों को अपने माथे पर ढोनेवाले आज झारखण्ड बनने के बाद रघुवर दास द्वारा लिये गये सही निर्णयों को नहीं मानने के लिए आंदोलन को हवा क्यों दे रहे है? आखिर आदिवासी आक्रोश रैली के नाम पर भीड़ क्यों जुटाई जा रही है। जरा पूछिये, बाबू लाल मरांडी, शिबू सोरेन, सूरज सिंह बेसरा और डोमिसाइल आंदोलन की उपज बंधु तिर्की से, कि वे इन 26 संशोधनों पर क्या कहते है?
• आखिर एक ही जगह पर एक आदिवासी परिवार और एक सामान्य परिवार की जमीन की बिक्री में आकाश और जमीन का अंतर क्यों होता है?
• आखिर एक आदिवासी परिवार अपने जमीन पर केवल कृषि और कृषि से जुड़ा ही कार्य क्यों करें, अन्य कार्य जैसे अन्य समुदाय के लोग करते है, उस पर लागू क्यों न हो, ताकि उसका भी आर्थिक उन्नयन हो।
ये दो सवाल ऐसे है, जिसे लेकर सारा आदिवासी समुदाय पहली बार इस प्रकार की भ्रांतियों से उबरने की कोशिश कर रहा है। हमें खुशी है कि राज्य सरकार ने इन नेताओं द्वारा फैलायी जा रही भ्रांतियों को समय रहते दूर करने की कोशिश की।
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की धारा 21 एवं धारा 13 संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम के तहत रैयत अपनी जमीन का उपयोग सिर्फ कृषि और कृषि से जुड़े कार्यों के लिए ही कर सकते है, यानी उन्हें अपनी ही जमीन का गैर कृषि कार्यों के लिए उपयोग करने का अधिकार प्राप्त नहीं है, ऐसे में अगर वे चाहे कि अपनी जमीन पर, मैरिज हॉल, होटल, ढाबा, दुकान या अपनी मर्जी का कोई और प्रतिष्ठान खोल सकें तो वे ऐसा नहीं कर सकते, ऐसे में उनका आर्थिक विकास कैसे होगा, वे सशक्त कैसे होंगे। ये सब को सोचना होगा। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने उनके आर्थिक उन्नयन के लिए संशोधन का प्रस्ताव रखा है, ताकि वे अपनी जमीन का अपनी मर्जी से अपने हित में सही इस्तेमाल कर सकें, साथ ही अपना विकास भी कर सकें। राज्य सरकार ने स्पष्ट कहा कि जो भ्रांतियां फैलायी जा रही है कि इससे आदिवासियों के जमीन पर उनका स्वामित्व खत्म हो जायेगा, वे गलत कर रहे है, पूर्णतः भ्रांति फैला रहे है। इस संशोधन से किसी भी रैयती के जमीन पर स्वामित्व के उसके अधिकार को कोई चुनौती दे ही नहीं सकता, बल्कि इससे उनके स्वामित्व का सही आर्थिक लाभ रैयतों को प्राप्त होगा।
राज्य सरकार ने अपना स्पष्ट दृष्टिकोण रखा और जनता से कहा कि इसके लिए वे जितना हिस्सा गैर कृषि कार्यों के लिये करेंगे, उतनी ही भूमि के बाजार मूल्य के अधिकतम एक प्रतिशत के बराबर ही उन्हें गैर कृषि लगान देना होगा। इससे रैयतों के अधिकार एवं स्वामित्व को और मजबूती मिलेगी। राज्य सरकार के अनुसार अगर कोई रैयत द्वारा ऐसे भूखण्ड पर गैर कृषि कार्य किया जा रहा है तो उसे नियमित भी किया जा सकेगा। जिससे रैयत भविष्य में होनेवाले कानूनी झंझट से भी बच जायेंगे, साथ ही कानूनी संरक्षण भी उन्हें प्राप्त हो जायेगा।
रघुवर सरकार ने यह भी कहा कि धारा 49 छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम में भी संशोधन प्रस्तावित है। चूंकि राज्य में चल रहे रेलवे, सड़क, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, विभिन्न प्रकार की जनोपयोगी परियोजनाओं के लिए जमीन की आवश्यकता होती है। अतः उक्त आवश्यकताओं को देखते हुए इसमें भी बदलाव की आवश्यकता है, जिससे जनकल्याणकारी योजनाओं के लिये कोई भी रैयत उपायुक्त से अनुमति प्राप्त कर अपनी भूमि जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए हस्तांतरित कर सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भूमि हस्तांतरित होगी, उनका कार्यान्वयन 5 वर्षों के अंदर करना होगा, अन्यथा संबंद्ध रैयतों को पूर्व में हस्तातंरण की गयी राशि बिना वापस किये उनकी भूमि उन्हें लौटा दी जायेगी।
पूर्व में राज्य के आदिवासियों की अवैध रूप से हस्तांतरित भूमि को उन्हें एसएआर कोर्ट द्वारा वापस करने का प्रावधान है। धारा 71 ए के द्वीतिय और तृतीय की आड़ में बिहार अनुसूचित क्षेत्र विनियमन अधिनियम 1969 में प्रावधानित नियमों के विपरीत 30 वर्षों के बाद भी एसएआर कोर्ट द्वारा कम्पन्शेसन का आदेश जमीन माफिया/जमीन दलाल प्राप्त कर आदिवासियों की जमीन हड़पने में सफल होते रहे है। धारा 71 ए में कम्पन्शेसन का प्रावधान ही हटा दिया गया है तथा 6 महीने के अंदर आदिवासियों की जमीन उन्हें वापस करने का प्रावधान कर दिया गया है। ऐसे में ये कहना कि इन संशोधनों से आदिवासियों का अहित होगा, वह पूर्णतः गलत है, सच्चाई यह है कि इससे आदिवासियों का ही हित सधेगा।

Thursday, October 20, 2016

अरे चीन, पगला गया भइया................

जब से भारतीयों ने चीन और चीनियों को आर्थिक चोट पहुंचाने का संकल्प लेते हुए, अपने सपने साकार करने की कोशिश प्रारंभ की है, तभी से चीन और चीनियों की बौखलाहट सातवें आसमान पर हैं। वे भारत और भारतीयों के बारे में अनाप-शनाप बक रहे हैं। वे कोई भी ऐसी जगह नहीं छोड़ रहे, जहां वे अपनी हरकतों से भारत को नीचा दिखाने की कोशिश न कर रहे हो। दोस्त का दोस्त अपना दोस्त और दोस्त का दुश्मन अपना दुश्मन की कहावत को सार्थक करते हुए, वे पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों पर भी प्यार लूटा रहे है। वे हमारी ही बदौलत आर्थिक शक्ति को बढ़ाए है और हमें ही आंख दिखा रहे है। वे समझते है कि जैसे वे गुंडागर्दी करते हुए 1962 में हमारा बड़ा भू-भाग पर कब्जा कर लिया, तिब्बत पर कब्जा कर लिया। वैसे ही वे बार – बार करते रहेंगे और हम चुपचाप इनकी गुंडागर्दी के आगे नतमस्तक हो जायेंगे, पर उन्हें ये पता नहीं कि आज देश में एक नये युवाओं की टोली का जन्म हुआ है। वह अपने देश भारत को महाशक्ति बनाने के लिए वचनबद्ध है। उसके साथ 125 करोड़ की भारतीय आबादी भी साथ है। आज वह जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान के साथ आगे निकल पड़ा है।
चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स का पागलपन देखिये, वह हर दम हमें धौंस दिखाता है। वह समझ लिया है कि जैसे उसने तिब्बत को कब्जे में कर लिया, जैसे वह समय-समय पर अपने पड़ोसी जापान, ताइवान, विएतनाम, फिलीपीन्स को आंखे दिखाता है, उसी तरह भारत को भी आँख दिखायेगा और भारत उसके चरणों में जाकर झूक जायेगा। हम अच्छी तरह जानते है कि चीन को ये सब करने का मौका हमारी पूर्ववर्ती सरकारों ने दिया है, जिस पर अंकुश लगाने का काम वर्तमान सरकार और यहां की वीर युवाओं की टोली ने प्रारंभ किया है। हम चीन को बता देना चाहते है कि वे गीदड़भभकी दिखाना बंद करें और सच्चाई को समझे।
चीन का यह कहना कि भारत के लोग मेहनती नहीं, सिर्फ हल्ला करना जानते है, माल उससे ही खरीदेंगे तो फिर वो बौखलाहट में क्यों है?, वो हमें गाली क्यों दे रहा है?, जब वह सब कुछ जानता है। हम आपको बता देते है कि चीन समझ चुका है कि भारतीयों ने अब ये पूर्णतः समझ लिया है कि बिना चीन को उसकी औकात बताएं भारत का निर्माण हो ही नहीं सकता। तभी तो देश की करोड़ों जनता ने चीन को उसकी औकात बताने के लिए इस दीपावली में संकल्प कर लिया और चीन को उसकी औकात बतानी शुरु कर दी। पूरे भारत में एक प्रकार का चीनी सामानों के बहिष्कार का लहर है, जिस पर सारी जनता एक है।
आखिर चीनी सामानों का बहिष्कार क्यों?
1. चीन का सामान भारतीय सामानों की अपेक्षा घटिया होता है।
2. चीन के सामान से प्रदुषण का खतरा होता है।
3. चीन के खाद्य पदार्थों की विश्वसनीयता नहीं के बराबर होता है, वह किन चीजों से बनाकर भारत या अन्य देशों में भेजता है, उसकी विश्वसनीयता ही नहीं होती।
4. चीन कभी भी विश्वसनीय नहीं रहा।
5. चीन सिर्फ अपनी भलाई में ही मग्न रहता है और अपनी भलाई के लिए वह कुछ भी कर सकता है, जैसे दुसरे देश पर चढ़ाई और उसका मान-मर्दन। जैसे उसने तिब्बत पर चढ़ाई कर उस तिब्बत को सदा के लिए बर्बाद कर दिया। भारत का कई हजार वर्गमील उसने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है।
6. चीन पाकिस्तान के उन आतंकी समूहों की सराहना और बचाव करता है, जो भारत में आतंक फैलाता है।
7. चीन पाकिस्तान को हर मोर्चें पर मदद करता है, जिससे भारत को नुकसान पहुंचने की शत प्रतिशत गारंटी रहती है।
8. चीन के सैनिक हमेशा भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं।
चीन के समर्थक – भारत में चीन के भारत विरोधी और उसकी आक्रमणकारी गतिविधियों का समर्थन यहां के वामपंथी खुलकर करते है। वे अमरीकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगाते है, पर चीन के साम्राज्यवादी नीतियों को खुलकर समर्थन करते है, कई वामपंथी कार्यालयों में चीनी साम्यवादी नेताओं के चित्र और उन पर लदे फूल मालाएं आप स्वयं जा कर देख सकते है।
चीन अब जान चुका है कि भारत और भारत के लोग जाग चुके है, इसलिए वह अपनी भड़ास अब भारत और भारतीयों को गाली देकर निकाल रहा है। बस भारतीय सिर्फ इतना ही करें, अपने लिये संकल्प को पूरा करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। जहां भी देखे, चीनी सामान उसका बहिष्कार करें। सरकार और यहां के नेता मजबूर हो सकते है, पर हम मजबूर नहीं, चीन को हम औकात बता कर रहेंगे, भारत को आर्थिक महाशक्ति बना कर रहेंगे। हम अपने पैसे से चीन की ताकत नहीं बल्कि चीन की ताकत को मटियामेट करेंगे और अपने जवानों को कहेंगे कि देखों हम तुम्हारे साथ है। डटे रहो सीमा पर। चीन को जवाब दो। हम सब मिलकर भारत की कायाकल्प करेंगे। चीन मुर्दाबाद। उसकी साम्राज्यवादी नीतियां मुर्दाबाद। उसकी भारत विरोधी गतिविधियां मुर्दाबाद। आंतक समर्थक पाकिस्तान समर्थक चीन और चीन की नीतियां मुर्दाबाद। मुर्दाबाद वे अखबार, वे नेता जो भारत में ही रहकर चीन की स्तुति गाते है, मेरा इशारा किस ओर है, आप समझ गये होंगे।

Wednesday, October 19, 2016

प्रभात खबर यानी हम नहीं सुधरेंगे.........

नीतीश भक्ति में सराबोर और जदयू के मुख पत्र के नाम से जनता में लोकप्रिय हो चुका प्रभात खबर सुधरने का नाम नहीं ले रहा, इसने एक बार फिर हम नहीं सुधरेंगे की पंक्ति को सर माथे बिठा, वो सारी हरकतें कर डाला है, जिससे यहां की नई पीढ़ी पूर्णतः बर्बाद हो जाये अथवा सर्वदा के लिए कन्फ्यूज्ड होकर अपनी जिंदगी बिताएं...
जरा एक बार फिर आज का रांची से प्रकाशित प्रभात खबर का पृष्ठ संख्या 3 का पहला कॉलम में प्रकाशित आज का पंचाग देखिये। जिसमें उसने लिखा है कि आज तृतीया तिथि है, जो रात्रि के 3.09 मिनट तक है, उसके बाद चतुर्थी तिथि है। मैं पूछता हूं कि जब आज तृतीया तिथि है, तो लोग आज करवा चौथ कैसे मना रहे है, ये प्रभात खबर बताये। कमाल है इसी में आगे पढ़िये तो प्रभात खबर के अनुसार आज बुधवार नहीं, बल्कि मंगलवार है और सबसे नीचे पर्व त्यौहार की पंक्ति पढ़े तो उसने लिख डाला है कि आज कोई व्रत-त्यौहार नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि आज चतुर्थी तिथि है, जो रात्रि के 12.48 तक है, दिन बुधवार है और आज महिलाओं के लिए बहुत ही खास पर्व है – करवा चौथ है।
मेरा स्पष्ट मानना है कि जब आपको पंचाग के बारे में जानकारी ही नहीं, तो तुम पंचाग क्यों छापते हो? इसकी आवश्यकता ही क्या है? अगर तुम्हें जानकारी नहीं तो फिर क्या इस आधार पर गलत छापोगे और सबको कन्फ्यूज्ड करते रहोगे। यह कहकर कि हमें कुछ भी बेवजह छापने का अधिकार है और सभी को कन्फ्यूज्ड और उनके पर्व-त्यौहारों में मानसिक खलल डालने का अधिकार है। हम आपको बता दें कि ऐसी हरकत प्रभात खबर पहली बार नहीं किया, ये ऐसी हरकते बार-बार करता है, और सुधरने का नाम नहीं ले रहा।
मेरा इस आलेख लिखने का अभिप्राय यह है कि आम जनता जान लें कि अखबार में लिखी सारी बातें सच्ची नहीं होती, ज्यादातर झूठ के पुलिंदे होते है, जो मूर्खों के द्वारा लिखित व प्रकाशित होते है, इसलिए जनता इनकी बातों में न आये और अपने विवेकानुसार पंचाग को देखे, समझे, तब व्रत व त्यौहार का निर्णय लें, नहीं तो आप समझ लें कि इन्होंने आपको धोखे देने का मन सदा के लिए बना लिया है, और ये बराबर धोखे देते रहेंगे, ये कहकर कि हम अखबार नहीं आंदोलन है.......

Tuesday, October 11, 2016

महाशक्ति, हम और पाकेटमार...............

महाष्टमी का दिन
प्रातः दुर्गा पाठ, फिर दिन भर का भागम भाग, उसके बाद ऑफिस आना और वहां के कार्य को संपन्न करना, तत्पश्चात् रात्रि में हम अपनी पत्नी के साथ रांची के विभिन्न पंडालों में स्थापित मां दुर्गा का दर्शन करने के लिए घर से निकले। सर्वप्रथम हम पहुंचे चर्च रोड स्थित मां दुर्गा के पंडाल में, वहां श्रद्धा निवेदित किया। उसके बाद ओसीसी क्लब, राजस्थान मित्र मंडल, भारतीय युवक संघ बकरी बाजार, शक्ति श्रोत संघ, सत्य अमर लोक होते हुए आर आर स्पोर्टिंग क्लब रातू रोड पहुंचे।
यहां भारी भीड़ थी, महिला और पुरुषों के लिए अलग – अलग कतार बने थे, मैंने अपनी पत्नी को कहा कि आप महिला वाली कतार से होते हुए भगवती के दर्शन कर बाहर निकलिये और हम पुरुषों वाली कतार से होकर बाहर निकलते है। कुछ कदम ही उपर बढ़ाये कि मेरे आस-पास पांच-छ व्यक्तियों का ग्रुप मेरे चारों ओर घेरा बनाकर चलने लगा। एक के हाथ मेरे फुलपेंट के पाकेट की ओर बार-बार बढ़ रहे थे। मुझे अब जानते देर नहीं लगी कि हम पाकेटमारों के घेरे में आ गये है। हम भी पाकेटमारों के घेरे में आने के बाद सचेत हो गये और उन पर अपनी नजरे टिका दी और साथ ही अपने फुलपेंट के पाकेट पर अपने हाथ को एक सिपाही की तरह मुस्तैद कर दिया। जब हम आर आर स्पोटिंग क्लब से बाहर आये, तो हमने पाया कि वह पाकेटमारों का दल, पाकेटमारी में सफल नहीं होने के कारण बेचैन दीखा।
अब उन्होंने मेरी पाकेटमारी करने के लिए ब्रह्म कुमारियों द्वारा लगाये गये स्टाल को चुना, जहां जीवंत देवियों की झांकियां दिखाई जा रही थी। पाकेटमारों का दल यहां मुस्तैद था, पर मेरी पत्नी ने कहा कि वह इस प्रकार की झांकियां देख चुकी है, बारिश हो रही है, जल्द घर भी पहुंचना है, नहीं तो मकान मालिक दरवाजा बंद कर देगा तो फिर रात भर बाहर ही गुजारना पड़ेगा, इसलिए यहां से चला जाये। मैंने भी सोचा की बात में दम है, इसलिए निकला जाये। तभी पाकेटमारों का दल जो यहां हमारी पाकेटमारी करने के लिए मुस्तैद था, मुझे उस ओर से गुजरते हुए, फिर मेरी ओर लपकने की कोशिश की। पाकेटमारों की इस हरकत को देख, मैने उन पाकेटमारों को स्पष्ट रुप से कह दिया कि भाई, मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तुम सभी पाकेटमार हो, और मेरे पाकेट में रखे हुए रुपयों पर तुम्हारी नजर है। अच्छा रहेगा कि तुम लोग दूसरी जगह पाकेटमारी की तलाश करों, नहीं तो तुम्हें दिक्कत हो जायेगी, क्योंकि पहली बात कि तुम हमारी पाकेटमारी नहीं कर सकते, क्योंकि मैं तुम्हें जान गया हूं कि तुम सभी पाकेटमार हो और अब हमारा पीछा किया तो हमें पुलिस की सेवा लेते देर नहीं लगेगी। इतना कहना था कि स्वयं को पोल खुलता देख, वे सारे पाकेटमार उसके बाद फिर हमारी पीछा नहीं कर पाये, शायद उन्हें लगा कि मेरे सामने उन सबकी पोल खुल गयी है। ऐसे मैं इन सारे पाकेटमारों को देख कर पहचान सकता हूं, अगर रांची पुलिस हमारी मदद लेनी चाहे, तो मैं यह मदद देने को भी तैयार हूं।
इसके बाद हम कचहरी रोड पहुंचे, फिर बिहार क्लब। बिहार क्लब से आगे बढ़ते ही हमारे साथ एक घटना घट गयी। एक जगह प्रसाद बंट रही थी, हम दोनों ने प्रसाद ग्रहण किया और प्रसाद ग्रहण करने के बाद जैसे ही हाथ धोने के लिए हम झुके, तभी एक 14 वर्षीय एक किशोर ने हमारी उपरी पाकेट से सैम्संग जी 7 मोबाइल आराम से निकाल लिया और चुपके से भागने की कोशिश करने लगा। जैसे ही वह किशोर हमारे पाकेट से पाकेटमारी करते हुए सैम्संग जी 7 मोबाइल निकाला, हमें आभास हुआ कि किसी ने मोबाइल हमारी निकाल ली, और तभी हमने झट से उक्त किशोर को पकड़ा, उस किशोर को अपने चंगुल में, मैंने जैसे ही लिया। वह बोला कि मेरा मोबाइल नीचे गिर गया था, यानी पकड़ में आने के बाद झूठ बोलकर बचने की कोशिश। तभी गुस्सा आया और मैंने चार-पांच थप्पड़ जड़ दिये। अंततः मुझे दया आयी और मैंने उसे छोड़ दिया। मेरा छोड़ना था कि वह दनदनाते हुए भाग निकला। यानी महाष्टमी के दिन हमारे साथ पाकेटमारी की दो घटना और दोनों घटनाओं से हम बच निकले, कोई नुकसान नहीं।
हम आपको बता दे कि जैसे ही यह दोनों घटनाएं घटी थी, हमें लगा कि कोई अदृश्य शक्ति ने हमें बताया कि तुम्हारे साथ घटना घट रही है, बचो और मैं स्वयं को बचा लिया। जरा सोचिये, अगर दोनों घटनाओं को अंजाम देने में पाकेटमार सफल हो जाते तो हमारा क्या होता? हम महाष्टमी का आनन्द नहीं ले पाते, फिर दो – तीन दिनों के लिए तनाव की स्थिति आ जाती और हम दुर्गा पूजा का आनन्द कम, विषाद में ज्यादा डूब जाते। सचमुच मां ने कृपा किया और हम पाकेटमारों द्वारा मिलनेवाले दुख से बाल – बाल बच गये।

Wednesday, October 5, 2016

लो शुरू हो गया अपनी ढपली अपना राग..............

अरविंद केजरीवाल, अरुण शौरी, दिग्विजय सिंह के बाद संजय निरुपम और पता नहीं और कौन – कौन से लोग आयेंगे। इन सभी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मांग की है कि वे सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो जारी करें। इन्होंने प्रत्यक्ष रुप से ये भी कह डाला कि इस प्रकार के स्ट्राइक पूर्व में भी होते रहे पर किसी ने इस प्रकार से मीडिया के समक्ष इन बातों को नहीं उठाया, पर भाजपा की मोदी सरकार ने पालिटिकल माइलेज के लिए ऐसा किया। हमें पूरा विश्वास था कि कुछ दिनों के बाद इस प्रकार के बयान सुनने को मिलेंगे, इसकी संभावनाएं हमें पहले से थी, क्योंकि विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां देशद्रोहियों की एक परंपरा रही है। उन परंपराओं की ओर जायेंगे तो देखेंगे कि इसकी बहुत बड़ी लिस्ट है, पर मैं ज्यादा तो नहीं, पर कुछ महान देशद्रोहियों का नाम यहां जरुर रखना चाहेंगे। मो. गोरी के समय जयचंद, ब्रिटिश हुकुमत के समय जब महारानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ रही थी, तो सिंधिया परिवार ने लक्ष्मीबाई को मदद न कर, अंग्रेजों की मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसका वर्णन तो सुप्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने भी किया – यह कहकर कि अंग्रेजों के मित्र सिंधिंया ने छोड़ी रजधानी थी, खुब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी। सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी व देश की युवाओं के धड़कन भगत सिंह को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने में सुप्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह का बहुत बड़ा हाथ था। इसलिए जब हाफिज सईद जैसे आतंकियों को सईद जी कहकर संबोधित करनेवाला वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह जब ये कहता है कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसी चीज कुछ हुई ही नहीं तो हमें यह आश्चर्य नहीं होता और रही बात संजय निरुपम की तो फिलहाल शिव सेना से कैरियर शुरु करनेवाला अभी सेकुलर राजनीति का प्याज खा रहा है, अरविंद केजरीवाल तो दुनिया के एकमात्र ईमानदार नेता है, इसलिए उनकी ईमानदारी तो इसी में है कि वे प्रधानमंत्री के साथ – साथ भारतीय सेना पर भी अंगूली उठा दें। अरुण शौरी के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो वो बैंटिग की है कि उनका वश चले तो वे जयचंद को भी मात दे दें। ये तो रहा भारतीय पक्ष अब देखते है पाकिस्तान के क्या हाल है... पाकिस्तान भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर इतना घबराया हुआ है कि पाकिस्तानी सेना पिछले दिनों पत्रकारों का एक दल बार्डर के समीप ले गया। उसके इस हरकत पर फ्रांसीसी न्यूज एजेंसी एएफपी ने पाकिस्तान के इस हरकत को एक दुर्लभ कदम करार दिया। पाकिस्तानी मीडिया डॉन और द न्यूज इंटरनेशनल के मुताबिक वहां सर्जिकल स्ट्राइक के कोई निशान नहीं मिले पर एएफपी ने पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल असीम बाजवा का बयान छापा कि जिसमे बाजवा ने कहा कि उनका इलाका मीडिया के लिए खुला है, आप देख सकते है कि यहां शांति है, यहां कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई, हालांकि एएफपी ने यह भी लिखा बाजवा के दावों की पुष्टि करना संभव नहीं था कि भारतीय सेना ने उन क्षेत्रों में सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की। इधर आतंकी दाउद इब्राहिम का समधी जावेद मियांदाद अपने स्वभावानुरुप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गालियों से नवाजा है। पाकिस्तान के पूर्व वायुसेना प्रमुख रह चुके एयर मार्शल असगर खान ने कहा है कि पाकिस्तान को भारत से कभी कोई खतरा नहीं रहा, सच्चाई यह है कि पाकिस्तान ने ही भारत पर ज्यादा हमले किये। इसी बीच भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इतनी विकट परिस्थितियों में भी मानवीय मूल्यों को तरजीह देकर दोनों देशों में सुर्खियां बटोर ली है, जब उन्होने पाकिस्तानी यूथ डेलिगेशन के साथ मित्रवत् व्यवहार किया। हुआ यह कि एक अक्टूबर को पीस फोरम आगाज दोस्ती की कन्वेनर आलिया हरीर ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से अपनी सुरक्षा को लेकर बात की। सुषमा ने आलिया को सुरक्षित वापसी को लेकर भरोसा दिलाया। सुषमा स्वराज ने इस टीम को हृदय को छू लेनेवाली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बेटियों के लिए कोई सरहद नहीं होती। बेटियों का ताल्लुक सबसे होता है।
इसी बीच यूनाइटेड नेशन में रूस के राजदूत और अक्टूबर महीने के लिए सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष ने पाकिस्तान को तगड़ा झटका दिया है। उन्होंने यूनाइटेड नेशन जैसी वैश्विक संस्था में कश्मीर मसले और भारत की सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा उठानेवाले पाकिस्तान को स्पष्ट तौर पर झिड़की लगायी है और कह दिया कि यह सुरक्षा परिषद भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनावों पर चर्चा नहीं करने जा रहा। संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत विताली चर्किन ने तो मीडिया के द्वारा पूछे गये सवाल पर भी नो कमेंट्स कहकर निकल गये। कुल मिलाकर पूरे विश्व स्तर पर भारत को मिल रही साख और भारतीय सेना को मिल रहे साथ पर अब भारत के कुछ जयचंदों की फौज अंगूलियां उठानी शुरु कर दी है, वह भी क्षुद्रस्वार्थ के लिए। यही भारत की सही इमेज है, जो कभी भी खत्म नहीं हो सकती।
(यह आर्टिकल रांची से प्रकाशित समाचार पत्र आजाद सिपाही में आज के अंक में संपादकीय पृष्ठ 11 पर प्रकाशित है।)

Sunday, October 2, 2016

एम एस धौनी दि अनटोल्ड स्टोरी – खूब तो नहीं, पर चलेगा जरुर........

रांची की धड़कन है धौनी
हर युवा के दिलों में बसते है धौनी
इसलिए एम एस धौनी पर तो रांची का हक बनता ही है। मीडिया से लेकर सोशल साइट्स तक धौनी के फिल्म की धूम है। तभी तो फेसबुक पर कई लोगों ने अपने फोटो पर एम एस धौनी दि अनटोल्ड स्टोरी की मुहर लगाकर फिल्म का एक तरह से प्रचार भी कर दिया और अपने फोटो को कवर फोटो बनाने से भी हिचक नहीं की। एम एस धौनी दि अनटोल्ड स्टोरी बनाने के लिए फिल्म निर्माता अरुण पांडे, निर्देशक नीरज पांडे बधाई के पात्र है, वे प्रशंसा के हकदार है। फिल्म नीति राज्य में लागू हो जाने के बाद, इस प्रकार के फिल्म की राज्य को जरुरत भी थी और उस पर से अपने ही राज्य का कोई आइ-कॉन पर फिल्म बन जाये तो मजा आनी ही है।
इस फिल्म को राज्य सरकार ने टैक्स फ्री कर दिया है। हमारा राज्य सरकार से अनुरोध होगा कि वे इस फिल्म पर रहम करें और अपना टैक्स फ्री की कृपा वापस ले लें, क्योंकि इसका फायदा राज्य की जनता को न के बराबर मिल रहा है, हमें लगता है कि राज्य की जनता के हित में ही राज्य सरकार ने यह फैसला लिया होगा, पर जब राज्य की जनता को इसका लाभ न मिलें तो इस प्रकार की घोषणा या फैसला बेमानी है, टैक्स फ्री का सीधा फायदा मिल रहा है मल्टीप्लेक्स और सिनेमाघरों को। फिल्म अच्छी बन पड़ी है, लोग देख रहे है, लोगों को फिल्म प्रभावित भी कर रही है, एक साधारण घर में पैदा लेनेवाला बच्चा अपनी प्रतिभा के आधार पर कैसे शिखर पर पहुंचता है, इसकी बानगी है – एम एस धौनी, दि अनटोल्ड स्टोरी।
जो लोग धौनी को जानते है, समझते है, उनके लिए ये फिल्म किसी रामायण से कम नहीं पर जिनको धौनी पसंद नहीं, उनके लिए भी ये फिल्म किसी इतिहास से कम नहीं। जरा फिल्म को देखिये। हर जगह कसावट, बिना विलेन के फिल्म, और लोग कुर्सी से चिपके है। डायलॉग भी बिहारी और झारखण्डी टोन लिये हुए, इसलिए हंसी खूब जमकर आ रही है। इस फिल्म में कुछ रोचक तथ्य भी जोड़े गये है, जैसे पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के वे बयान जो धौनी पर दिये गये, इस फिल्म में दिखाया गया है। जो लोग जानते है कि भारत की करारी हार के बाद, रांची के एक पत्रकार द्वारा कैसे धौनी के घर पर पत्थरबाजी करवायी गयी थी, विजूयल बनाने के लिए, उसका भी चित्रण है। चित्रण इसका भी किया गया है कि कैसे फार्म में नहीं चल रहे सचिन तेदुंलकर को लेकर, धौनी ने टीम भावना को उपर रखते हुए अपनी बात रखी थी। चूंकि फिल्म का नाम द अनटोल्ड स्टोरी से जुड़ा है, इसलिए धौनी के दिल पर राज करनेवाली युवती का बड़ा ही खुबसुरत और मार्मिक चित्रण इस फिल्म में देखने को मिला है, पर कुछ अनसुलझे सवाल भी है, जो फिल्मकार सुलझा नहीं पाये, दर्शकों को यह बात कुछ ज्यादा ही खटकती है।
महेन्द्र सिंह धौनी के एक बड़े भाई है – संभवतः नरेन्द्र सिंह धौनी। आखिर जब फिल्मकारों ने धौनी के परिवारों को दिखाया, और धौनी के जन्म से लेकर बात उठाई तो भला उनका बड़ा भाई नरेन्द्र कहां गायब हो गया। हो सकता है कि नरेन्द्र से किसी बात को लेकर, धौनी के परिवार को दूरियां हुई हो, पर उसे बचपन के रोल में तो दिखाया ही जा सकता था, इस फिल्म में तो महेन्द्र सिंह धौनी की एक बहन को दिखाया गया पर भाई को छोड़ दिया गया। यहां दर्शकों के साथ फिल्मकार द्वारा न्याय नहीं किया गया।
महेन्द्र सिंह धौनी, ऑल राउंडर है, वे अच्छा बैटिंग करते है, अच्छा फील्डिंग करते है, अच्छा विकेट कीपरिंग करते है, कभी – कभी वे बालिंग भी कर लेते है, पर मूलतः वे विकेटकीपर ही है, इस फिल्म में उन्हें केवल बैट भांजते हुए दिखाया गया, पर यह नहीं दिखाया गया कि वे कैसे फील्डिंग, कैसे विकेट कीपरिंग कर अपने देश का सम्मान बढ़ाया। यानी फिल्मकार ने विकेटकीपर को केवल बैट्समेन बनाकर प्रस्तुत किया।
धौनी के नेतृत्व में भारत ने वर्ल्ड कप जीता पर धौनी के नेतृत्व में भारत ने टी 20 पर भी कब्जा जमाया, पर हमें लगता है कि फिल्म की लंबाई बढ़ने के भय ने फिल्मकारों को वर्ल्ड कप तक ही रखने पर विवश किया होगा।
एक बात और फिल्मकारों ने दिउड़ी मंदिर को कैसे छोड़ दिया, क्योंकि धौनी तो कहा जाता है कि जब भी रांची आते है तो दिउड़ी मंदिर जरुर जाते है, उनके कारण ही दिउड़ी मंदिर की लोकप्रियता बढ़ी, खूब यहां के चैनलवालों ने भी इस मंदिर को धौनी से जोड़ा और फिल्मकारों को इसकी भनक तक नहीं लगी, आश्चर्य है।
पूरे फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत, राजेश शर्मा, दिशा पटानी ने बेहतर अभिनय से लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है, जबकि अनुपम खेर इस फिल्म में सामान्य नजर आये, ऐसे भी इस फिल्म में उनके लिए कुछ करने को भी न था। अंततः पूरे देश को एक बेहतरीन, साफ-सुथड़ी फिल्म बहुत दिनों के बाद मिली है, लोग पूरे परिवार के साथ इस फिल्म का आनन्द ले सकते है। रही बात झारखण्ड की, तो धौनी के लिए तो पूरा झारखण्ड ही उतावला है। आशा की जानी चाहिए कि पांडे परिवार द्वारा बनायी गयी यह फिल्म उनके कैरियर में भी धौनी की तरह धनवृद्धि का उपहार विशेष तौर पर लेकर आयेगी।

Saturday, October 1, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक ने पाकिस्तानियों के बैंड बजा दिये, पूरा पाकिस्तान सदमें में.................

सर्जिकल स्ट्राइक ने पाकिस्तानियों के बैंड बजा दिये, पूरा पाकिस्तान सदमें में
पाकिस्तान की सड़कों पर पिछले दो दिनों से नहीं दीख रहे आतंकी...
भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक को क्या अंजाम दे दिया। पूरा पाकिस्तान ही सदमें में है। पाक अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल आपरेशन के खात्मे के बाद, न तो लश्करे तैय्यबा, न हिजबुल मुजाहिद्दीन और न ही जैशे मोहम्मद के आतंकियों की ओर से इस संबंध में कोई बयान आये है। बात-बात में जमात उत दावा का आतंकी जो भारत के खिलाफ जहर उगलता था, उसकी भी बोलती बंद है। कल तक हर बात में भारत को देख लेनेवाले पाकिस्तान आतंकियों का समूह जो पाकिस्तान की सड़कों पर एक भारी भीड़ लेकर जमा होता था, वो दिखाई नहीं दे रहा। न तो पाकिस्तान के अखबार में उनके बयान नजर आ रहे है और न ही भारत के अखबारों में। चूंकि ये सर्जिकल वार उन आतंकियों के खिलाफ था, जो भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों में लिप्त होते हुए पाकिस्तान की सरजमीं को अपना जन्नत समझते है, ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया ज्यादा जरुरी थी, पर हमें लगता है कि जिस प्रकार से भारतीय सेना ने उड़ी का बदला लिया है। अब वे भी समझ गये होंगे कि वे पाकिस्तान में भी सुरक्षित नहीं है। भारतीय सेना उनका हर जगह, उन्हें सबक सिखाने को अब तैयार है। भारत अब पाकिस्तान के इस गीदड़भभकी से भी डरने को तैयार नहीं कि पाकिस्तान एक न्यूक्लियर पावर है।
आश्चर्य इस बात की है कि पूरे पाकिस्तान के ये हाल है कि उसका प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सेना इन सब के बयान सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर समानता लिये हुए नहीं हैं, जबकि इसके ठीक उलट भारत की ओर से भारत के प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सेना के बयानों में समानता है।
यहीं नहीं पहले पाकिस्तानी नागरिक और अब भारतीय नागरिकता प्राप्त कर चुके अदनान सामी के ट्वीट ने पाकिस्तानियों के नींद उड़ा दिये है। अदनान सामी ने ट्वीट कर भारतीय प्रधानमंत्री और भारतीय सैनिकों को आतंक के खिलाफ कार्रवाई करने पर बधाई दे दी है। पाकिस्तानियों ने अदनान सामी के खिलाफ गालियों का बौछाड़ कर दिया है, स्थिति ऐसी है कि अदनान सामी के इस ट्वीट पर पाकिस्तानियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है।
अगर पाकिस्तान की अखबारों की बात करें, तो उनके भी सुर बदले हुए है, अपने पोर्टलों पर कभी कुछ तो कभी कुछ लिखकर आत्मसंतुष्टि दिखा रहे है, जिसमें डॉन जिसे एक जिम्मेदार अखबार माना जाता है, उसकी ओर से भी गलतियां साफ दिखाई पड़ रही है, जैसे डॉन ने लिख दिया कि पाकिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई में 8 भारतीय सैनिक मारे गये, जबकि इस खबर में कोई सच्चाई नहीं, बाद में उसने संशोधित किया। यानी एक सर्जिकल स्ट्राइक ने पाकिस्तानियों के दिमाग में ऐसे स्ट्राइक किये है कि पूछिये मत।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री, वहां के सरकार में शामिल अन्य नेता व विपक्ष, यहां तक की मीडिया और सेना तक यह बात मानने को तैयार नहीं कि भारत ने उनसे उड़ी का बदला ले लिया, सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया पर विश्व के अन्य देशों के अखबारों ने सिद्ध कर दिया कि भारतीय सेना ने आक्रामकता दिखाई और पाकिस्तान को बैकफूट पर भेजने में कामयाबी हासिल किये। इसके लिए आप बीबीसी और न्यूयार्क टाइम्स का आधार ले सकते है।
हालांकि ये सवाल पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लोग पूछ रहे है कि अगर उनके अनुसार भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की तो फिर उन्हें बेचैनी क्यूं है। वे इस घटना की गुरुवार से लेकर बार-बार निंदा क्यूं कर रहे है। जब मामला लाइन ऑफ कंट्रोल पर सामान्य घटना से जुड़ा है तो वहां के रक्षा मंत्री और सेना के चेहरे, यहां तक मीडिया में काम कर रहे लोगों के चेहरों पर हवाइयां क्यों उड़ रही। बार –बार परमाणु बम की धौंस कहा गयी। एक गैर-जिम्मेदारानां मुल्क की तरह बयानबाजी करनेवाला देश आज असहाय क्यूं है, ये पाकिस्तान को चिंतन करना चाहिए। क्या वजह है कि आज बांगलादेश, भूटान, अफगानिस्तान, भारत यहां तक ईरान आप से खफा है। एक समय था कि कश्मीर मुद्दे को ही लेकर विश्व के कई देश आपके साथ हो जाया करते थे, पर आपने आतंकियों को ऐसा पाला कि इक्के-दुक्के को छोड़ कोई आपके साथ नहीं।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा केरल में दिया गया बयान आज पूरे विश्व के लिए प्रासंगिक है कि हमें गरीबी, बेरोजगारी के लिए लड़ना है, अपने देश को विकसित करने के लिए काम करना है, पर आप तो नरेन्द्र मोदी को सुनने को ही तैयार नहीं। आज पता नहीं कैसे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने स्वयं के द्वारा बुलाये गये फेडरल कैबिनेट की बैठक में गरीबी और बेरोजगारी से लड़ने की बात कह दी, पर वे ये कहना नहीं भूले कि भारत के इस आक्रामक प्रहार का जवाब देने के लिए उनकी सेना तैयार है। वे आज भी कश्मीर को लेकर अपनी नीति स्पष्ट कर दी, कि हम नहीं सुधरेंगे। हम भी जानते है कि पाकिस्तान कभी नहीं सुधरेगा, क्योंकि पाकिस्तानियों को जो इतिहास पढ़ाये जा रहे है, उस मूल में ही भारत के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरा जाता है, ऐसे में आप पाकिस्तान से बेहतर संबंध किसी कालखंड में संभव नहीं। हम आपको बता दें कि अगर कश्मीर समस्या हल भी हो जायेगा तो ये मत भूलिये कि ये देश आपको शांति से रहने देगा, क्योंकि इसकी बुनियाद में ही भारत के प्रति नफरत भर दी गयी है, जबकि इसके विपरीत आप भारत के किसी भी शिक्षा केन्द्र में चल रहे पुस्तकों को टटोलें तो उसमें पाकिस्तान के खिलाफ एक भी शब्द नहीं मिलेगा, जिससे यह पता चलता हो कि भारत ने कभी अपने पड़ोसी के खिलाफ सपने में भी बुरा सोचा हो।
(यह आर्टिकल रांची से प्रकाशित समाचार पत्र आजाद सिपाही में आज के अंक में संपादकीय पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुई है।)

Friday, September 30, 2016

भारतीय सेना पहली बार लाइन ऑफ कंट्रोल के पार..................

मोदी ने किये पाकिस्तानी हुक्मरानों के बोलती बंद, भारतीय सेना पहली बार लाइन ऑफ कंट्रोल के पार
भारतीय जनमानस को बहुत बड़ी राहत देनेवाली खबर, बरसों बाद सुनने को मिली। भारत ने पाकिस्तान की नींद उड़ायी है। बरसो बाद भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एक बड़े हमले को अंजाम दिया और सर्जिकल स्ट्राइक को सफलता पूर्वक संपन्न किया है। इस घटना के साथ ही
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे विश्व को बता दिया कि अब भारत नियोजित आतंक को नहीं सहेगा, बल्कि उसका जवाब भी देगा। याद करिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण का समय, जब उन्होंने सभी पड़ोसियों को आमंत्रित कर अपने पड़ोसियों के साथ बेहतर संबंध बनाने की ओर कदम बढ़ाया था। याद करिये वे कभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर भी अचानक पहुंच गये थे, यानी उन्होंने लगातार पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने के प्रयास किये, यहां तक कि पठानकोट में हुए हमले पर भी उन्होंने कड़वे घूंट पीये। भारतीय प्रधानमंत्री के इस कड़वे घूंट पीने और बार-बार संयम अपनाने से पाक हुक्मरानों को लगा कि वे भारत के साथ पिछले इंदिरा युग से चले आ रहे प्रॉक्सी वार को मोदी युग में भी कामयाबी दिलाकर रख देंगे, पर उन्हें पता नहीं कि मोदी, तो मोदी है, जहां जाते हैं, अपनी वाकपटुता और कार्यशैली से सभी को अपना मुरीद बना लेते है, ऐसा मुरीद की सामने वाले शत्रुओं के परम मित्र भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिभा के कायल हो जाते है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहनशीलता पर पाक हुक्मरानों ने तो यहां तक कह दिया कि अगर पाकिस्तान के खिलाफ भारत ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार किया तो उसके बम केवल शो पीस के लिए नहीं बना है, यानी हर वक्त धमकी, हर वक्त उन्माद फैलाने की बात, आतंकियों की भी एक जमात बनाना, एक अच्छा आतंकी और दूसरा बुरा आतंकी। हर वक्त भारत को देख लेने की बात, पाकिस्तान की ओर से सुनाई पड़ रही थी। जिसका जवाब पाकिस्तान को देना जरुरी था। इसी बीच उड़ी की घटना और 18 भारतीय जवानों की मौत ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अंदर से हिलाकर रख दिया। जब यह घटना घटी थी तो हम एक-दो दिनों के बाद रांची के खादी बोर्ड के मुख्यालय में पहुंचे थे, जहां खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष संजय सेठ, अरुण श्रीवास्तव और कई गण्यमान्य नागरिक उपस्थित थे। मैंने उसी समय कहा था कि उड़ी घटना के बाद, आज जो सोशल साइट्स या भारत के विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बेवजह हमले हो रहे है, शायद उन्हें पता नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूसरे मिट्टी के बने हुए है। मैंने उसी समय कह दिया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि वे इसका बदला जरुर लेंगे तो इसका मतलब है कि वे बदला जरुर लेंगे और लीजिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बदला ले लिया। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो साफ कह दिया था कि कश्मीर के गीत गानेवाले पाकिस्तान के हुक्मरानों से हमें अब बात नहीं करनी। उन्होंने साफ कहा कि आतंकी कान खोलकर सुन लें, हमारा देश उड़ी हमले के शहीदों की कुर्बानी कभी नहीं भूलेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि हमसे हजार साल लड़ने की बात कहनेवाले पाक के हुक्मरानों की चुनौती मैं स्वीकार करता हूं।
ऐसे में हम अपने माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बातों पर कैसे विश्वास नहीं करते। गर्व करिये, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज इतिहास बनाया है, पहली बार 1971 में बनी लाइन ऑफ कंट्रोल को भारतीय सेना ने पार किया, जिसका ऐलान संवाददाता सम्मेलन कर भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल रणवीर सिंह ने किया। उन्होंने बताया कि पैरा कमांडोज हेलिकॉप्टर से एलओसी पहुंचे, फिर पैदल ही पाक के कब्जे वाले कश्मीर में 3 किलोमीटर अंदर घुसकर आतंकियों के 7 कैम्प ध्वस्त कर दिये। इस घटना से पाकिस्तान इतना तिलमिलाया कि उसके प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इस स्ट्राइक की निंदा कर दी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का बयान था कि यह सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तान पर हमला है, उसे कमजोर समझने की कोशिश न समझा जाये।
लेफ्टिनेंट जनरल रणवीर सिंह के अनुसार उन्हें विश्वस्त सूत्रों से सटीक जानकारी मिली थी कि आतंकी एलओसी के साथ लॉन्चपैड्स पर इकट्ठे हुए है। उनका मकसद भारत में घुसपैठ करने आतंकी हमले को अंजाम देना था। भारत ने उन लॉन्चपैड्स पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया। इन हमलों के दौरान आंतकियों और उनके समर्थकों को भारी नुकसान हुआ है। कई आतंकियों को मार गिराया गया है। इस घटना की जानकारी पाकिस्तानी सेना को भी दे दी गयी। इधर पाकिस्तान इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस ने स्वीकार किया कि भारत ने भीमबेर, हॉटस्प्रिंग, केल और लिपा सेक्टर पर हमले किये है। इधर पाकिस्तान सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि इस हमले में उसके दो सैनिक मारे गये और नौ घायल हुए। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के इस बयान को पाकिस्तानी अखबार डान ने प्रमुखता दी है। हमें अपने भारतीय सेना पर गर्व है, हम भारतीयों को गर्व है, ऐसे कमांडोज पर जिन्होंने उड़ी की घटना का बहुत जल्द ही बदला ले लिया। हम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उन नीतियों की भी प्रशंसा करते है, जिन नीतियों के कारण आज पाकिस्तान पूरे विश्व में मुंह दिखाने के लायक नहीं। हम प्रशंसा करते है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जिनके कार्यों से आज पूरे विश्व में भारत का मान बढ़ा है, भारत की साख बढ़ी है और विश्व के विभिन्न देशों में रह रहे भारतीय शान से स्वयं को भारतीय कहलाने पर गर्व महसूस कर रहे है।
(यह आर्टिकल आज रांची से प्रकाशित आजाद सिपाही नामक समाचार पत्र में संपादकीय पृष्ठ संख्या 11 पर प्रकाशित हुई है।)

Thursday, September 29, 2016

थाली में छेद..........

क्या होता है थाली में छेद?
आम तौर पर अगर किसी व्यक्ति को आप कहे कि वो तो जिस थाली में खाता है, उसी थाली में छेद करता है, बस देखिये जिसके बारे में कहा गया, वह व्यक्ति ये वाक्य बोलनेवाले व्यक्ति का किस प्रकार मुंह नोच लेता है, अगर मुंह नोचने की ताकत नहीं तो फिर उससे वह वो बदला लेगा, जिससे ये वाक्य बोलनेवाले की नानी – दादी याद आ जायेगी।
आम तौर पर इस लोकोक्ति का प्रयोग सर्वाधिक हो रहा है, खासकर तब, जब किसी को नीचा दिखाने की जरुरत हो। सर्वाधिक इस लोकोक्ति का प्रयोग वे लोग करते है, जो अपना जमीर बेच चुके होते है, भले ही उसका कारण कुछ भी हो।
आजकल बहुत सारे पत्रकारों का समूह अपना जमीर बेचकर विभिन्न संस्थानों में कार्य कर रहा है और अपने संस्थान के मालिक अथवा संपादकों के इशारे पर वह कुकृत्य कर रहा है, जिसकी इजाजत उसका जमीर भी नहीं देता, पर दूसरों को उल्लू बनाने के लिए वह इस डायलॉग का प्रयोग खुब करता है कि वह जिस थाली में खाता है, उस थाली में छेद नहीं करता, यानी उसके कुकृत्यों से देश का भले ही नुकसान हो जाये, या यो कहें कि देश की थाली में भले ही छेद हो जाये, पर उस संस्थान या मालिक की थाली में छेद नहीं होना चाहिए, जिसने देश का नुकसान करने का बीड़ा उठा लिया है।
जरा देखिये, एक से एक नमूने है...
पटना में एक संवाददाता है, खूब नीतीश की परिक्रमा करता है, उसे नीतीश में खुदा नजर आता है, कभी – कभी उसके सपने में नीतीश तीर लेकर राम के रुप में भी आ जाते है, इसलिए नीतीश के खिलाफ वो सुनना ही नहीं चाहता और चूंकि अब लालू भी नीतीश के साथ हो गये तो वह लालू को हनुमान के रुप में हृदय में धारण किये है, ये अलग बात है कि इनके कुकृत्यों से बिहार का जो नुकसान होना है, वो हो ही रहा है, पर चूंकि वह जिस संस्थान में काम करता है उसका मालिक स्वयं नीतीश की पार्टी से विधायक बना हुआ है, इसलिए वह लालू और नीतीश के बारे में कुछ सुनना ही नहीं चाहता, पर मोदी के खिलाफ विषवमन करने की बात हो तो देखिये वह अपने मालिक को खुश करने के लिए हद से भी गुजर जाता है। अब ऐसे लोगों से क्या बात करनी।
कल ही की बात है उक्त सज्जन को एक व्यक्ति ने उसे आइना देखाने की कोशिश की, तो उसका जवाब था कि झारखंड सरकार के पैसे पर अपना काम चलाने वाले लोग अगर नैतिकता की दुहाई दें तो यह शर्म की बात है?
हमारा उत्तर - क्या झारखण्ड सरकार में काम करना और उस काम का पैसे लेना अनैतिक है?
हम बताते है कि अनैतिक क्या है? झारखण्ड सरकार के आगे विज्ञापन के लिए नाक रगड़ना और उस विज्ञापन के पैसे से अपना पेट चलाना और उसके बाद अपना जमीर गिरवी रख देना, यह अनैतिक है। जो आजकल सभी कर रहे है। हमारे पास एक नहीं कई उदाहरण है। बिहार में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे। उन्होंने ईटीवी पर ऐसा जादू डाला कि रात्रि के नौ बजे के समाचार में 18 मिनट नीतीश का ही समाचार येन केन प्रकारेन चलता रहा और भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की खबर तेल लेने चली गयी। ये कुछ उदाहरण है और मैं फिर ताल ठोंक कर कहता हूं कि बिहार में कई चैनल या अखबार है, पत्रकार है, जो नीतीश और लालू के दरबारी है। और अब हम आपको बताते है कि अनैतिक क्या है?
क. जमीर बेचना अनैतिक है।
ख. जमीर बेचकर अपने मालिक और संस्थानों के लिए सिर्फ जीना और इसकी आड़ में देश को नुकसान पहुंचाना अनैतिक है।
ग. अपने गिरेबां में नहीं झांकना और दूसरों पर झूठा आरोप लगाना अनैतिक है।
घ. कोई भी व्यक्ति कहीं भी काम कर सकता है, चाहे वह सरकारी सेवा में रहे या निजी संस्थाओं में, ध्यान यह रहे कि वह कहीं भी काम कर रहा है, पर अपना जमीर तो नहीं बेच रहा। अगर जमीर बेच दिया, देश को नुकसान किया, एकतरफा सोच रखा तो अनैतिक है।
ङ. हां, हर बात में अपने मालिक की हां में हां मिलानेवाला, देश का सबसे बड़ा शत्रु और अनैतिक है, क्योंकि वह सही मायनों में देश की थाली में छेद कर रहा है, जिससे अंततः उसका भी नुकसान होता है, क्योंकि वह देश से अलग नहीं है।

Tuesday, September 27, 2016

कमाल है........................

रांची में नकली शक्तिवर्द्धक दवा के करोड़ों के कारोबार से संबंधित समाचार आजकल अखबारों में सुर्खियां बटोर रहे है। प्रतिदिन समाचार आ रहे है कि रांची के चुटिया, लालपुर, सुखदेवनगर आदि इलाकों में औषधि नियंत्रण निदेशालय की ओर से इन दवाओं के कारोबार में लिप्त लोगों पर शिकंजा कसा जा रहा है, इनके खिलाफ छापेमारी भी की जा रही है। छापेमारी के दौरान बड़ी मात्रा में औषधि निर्माण के उपकरण, एलोपैथिक दवाएं, इंप्टी हार्ड जेनेटिक कैप्सूल सेल, लिंग वर्द्धक यंत्र, स्तन वर्द्धक यंत्र आदि बरामद हो रहे है। इस धंधे में लिप्त छह लोगों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज करायी गयी है। औषधि निदेशालय इस धंधे में सलिप्त किसी अलख देव सिंह की तलाशी कर रहा है, पर औषधि निदेशालय उन अखबारों पर शिकंजा नहीं कस रहा, जो इस धंधे को संजीवनी दे रहे है, या इससे सीधा मुनाफा उठा रहे है। हाल ही में जब औषधि निदेशालय ने इन कारोबारियों पर जब अपना शिकंजा कसना शुरू किया तो एक दिव्य ज्ञान प्रदान करनेवाले एक अखबार ने लिखा कि इस धंधे में पोस्टआफिस के लोग शामिल है, पर उसने यह नहीं लिखा कि इस धंधे में अखबार के लोग भी शामिल है, जो विज्ञापन के नाम पर इन कारोबारियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाते है और स्वयं भी लाभान्वित होते है, साथ ही सामान्य जनता को दिग्भ्रमित भी करते है।
सच्चाई यह है कि ये सारे के सारे कारोबारी बिना अखबार को अपने तरफ मिलाए इतने बड़े कारोबार को अंजाम नहीं दे सकते। इसमें अखबार की सबसे बड़ी भूमिका होती है, वे इन कारोबारियों द्वारा मिले विज्ञापन को जमकर छापते है, रांची में कमोबेश सभी बड़े अखबार इस धंधे में लिप्त है और इसके द्वारा अपनी आर्थिक समृद्धि में लगे है। आज भी देख लीजिये – कौन ऐसा अखबार है जो इस धंधे में लिप्त नहीं है। एक अखबार तो अपना वर्गीकृत इसी धंधे को समर्पित कर दिया है। अगर उसके वर्गीकृत विज्ञापन को देखिये तो पता लग जायेगा कि इस धंधे में उसका जोर भी नहीं है, पर बेशर्मी इतनी कि उसे बेशर्म शब्द की परिभाषा से कोई लेना – देना भी नहीं।
आश्चर्य है कि इस धंधे में कौन-कौन लोग है, सभी को पता है, पर क्या मजाल कि इन अखबारों पर कोई भौं भी टेढ़ा कर दें, क्योंकि जैसे ही इन अखबारों पर शिकंजा कसेगा, सत्ता और विपक्ष में बैठे एवं छपास की बीमारी से पीड़ित नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और सम्मान के लालचियों का समूह इन अखबारों के पक्ष में बयानबाजी शुरू करेगा और नकली डायलॉग बोलेगा कि यहां अखबारों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है, लोकतंत्र खतरे में पड़ गया आदि-आदि। यानी कुल मिलाकर, जो इस धंधे में लिप्त है, उनके उपर शनि की वक्र दृष्टि और जो इस धंधेबाजों से अपनी आर्थिक समृद्धि कर रहे है उनके उपर शुक्र की महादृष्टि मजे लीजिये और क्या?

Monday, September 26, 2016

प्रभात खबर दूसरों के लिए अखबार नहीं आंदोलन और जब अपने पर आये तो.............

प्रभात खबर दूसरों के लिए अखबार नहीं आंदोलन और जब अपने पर आये तो आंदोलन घूस गया भीतरअअअअअअअ....................
कल यानी 25 सितम्बर को रांची से प्रकाशित सभी प्रमुख अखबारों (प्रभात खबर को छोड़कर) ने एक खबर प्रमुखता से प्रकाशित किया। खबर था ऊषा मार्टिन के कार्यालयों पर सीबीआइ छापा, पर प्रभात खबर में ये खबर ढूंढने पर कहीं नहीं मिली। आखिर क्यों नहीं मिली भाई, आप तो अखबार नहीं आंदोलन हो। आप तो खोजी पत्रकारिता के मिसाल हो, यह खबर आपकी नजरों से कैसे फिसल गयी। आप तो रिम्स के चंद्रमणि की झूठी खबरों के आधार पर, उसका जीना मुहाल कर देते हो। पूरे राज्य को बदनाम कर देते हो और जब अपने पर आयी तो उलटे पांव दौड़ते हुए अपने घरों में छुप जाते हो। तुम्हें तो जवाब देना ही होगा, जनता को, क्योंकि कई मुद्दों पर तुम खुब फोन मंगवाते हो, पत्र मंगवाते हो, इ-मेल से पाठकों के मंतव्य मंगवाते हो, पर सीबीआइ के छापे पर मौन व्रत तुमने क्यों धारण कर लिया।
दोस्तों मैं बताता हूं कि इस अखबार ने मौन व्रत क्यों धारण कर लिया। वह इसलिए धारण कर लिया क्योंकि यह अखबार ऊषा मार्टिंन का ही है, चूंकि अपनी इज्जत बची रहे, इसलिए उसने इस समाचार को अपने पृष्ठों पर जगह ही नहीं दी, पर खबर आपको मालूम होना चाहिए।
खबर यह है कि 24 सितम्बर को ऊषा मार्टिन के दो दफ्तरों पर सीबीआइ की दिल्ली स्थित आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा की टीम ने छापा मारा। सूत्र बताते है कि यह छापा उस पर अपने प्लांट के लिए आवंटित आयरन ओर का इस्तेमाल स्वयं न कर बाजार मूल्य पर बेचने के आरोप के मद्देनजर पड़ा है। सीबीआइ ने शनिवार को ऊषा मार्टिन के बड़ाजामदा और कोलकाता स्थित दफ्तरों पर छापा मार कर दस्तावेजों की जांच भी की। हम आपको बता दें कि ऊषा मार्टिन को एमएमडीआर एक्ट के तहत बड़ाजामदा लौह अयस्क खदान कैप्टिव प्लांट के लिए आवंटित किया गया था। कैप्टिव प्लांट के लिए आवंटित माइंस की शर्त यह है कि वह केवल अपने प्लांट के लिए ही अयस्क का प्रयोग कर सकता है, लेकिन इस कंपनी ने अन्य कंपनियों को बाजार मूल्य पर लौह अयस्क मुहैया कराया। इस मामले में जस्टिस शाह की अध्यक्षता में गठित कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में पश्चिम सिंहभूम में हो रहे अवैध खनन का मामला उठाया था। शाह कमीशन ने स्थल जांच कर रिपोर्ट दी थी कि सभी आयरन ओर कंपनियां मानकों का उल्लंघन कर सीमा क्षेत्र से अधिक उत्खनन कर रही है।
मतलब समझ गये न भैया – ये है अखबार नहीं आंदोलन का दोहरा मापदंड..........................

Saturday, September 24, 2016

फर्श पर भोजन........................

रिम्स में एक मनोरोगी लावारिस मरीज को फर्श पर भोजन देने का मामला रांची से प्रकाशित दो प्रमुख अखबारों दैनिक भास्कर और प्रभात खबर ने उठाया। ये ऐसा मामला था जो मानवीय दृष्टिकोण से किसी भी प्रकार से सहीं नहीं ठहराया जा सकता, और जैसा कि पहले से ही पता था कि ये मामला तूल पकड़ेगा और तूल पकड़ा भी...
दो अखबारों ने इस प्रकरण का श्रेय लेने के लिए प्रथम पृष्ठ पर खबर छापा - एक ने लिखा प्रभात खबर की खबर पर पहल तो दूसरे दैनिक भास्कर ने लिखा दैनिक भास्कर ने छापी थी खबर।
राज्य सरकार ने 24 घंटे में ही फैसला लिया और खाना परोसनेवाले कॉन्ट्रेक्ट कर्मचारी चंद्रमणि प्रसाद को बर्खास्त कर दिया। चंद्रमणि ने अपनी बर्खास्तगी पर जो बयान दिया है, वो बयान दैनिक जागरण ने छापा है इस खबर को भी पढ़िये तो पता चलेगा कि आजकल दया करना भी कितना भारी पड़ता है, जिसे इन दोनों अखबारों ने नहीं छापा है। चंद्रमणि कोई टाटा बिड़ला या अडानी समूह का व्यापारी नहीं है, वह भी आदमी जैसा दिखनेवाला ही प्राणी है।
न्यायालय ने भी स्वतः संज्ञान लिया है, अपने अनुसार और कह डाला कि अपराध है फर्श पर खाना परोसना सरकार जवाब दें। ये कथन हालांकि एक भला मानुष भी जानता है कि फर्श पर खाना परोसना अमानवीय है।
एक और बयान आया है कोई रोजी रोटी अधिकार अभियान की संयोजिका है कविता, जिसने कह डाला कि जहां आज भी फर्श पर खाना परोसा जाता है, वहां भारत माता की जय कैसे बोले। कविता का यह कथन बता रहा है कि जैसे लगता है कि भारत माता चंद्रमणि को आकर बोली कि तुम उक्त मनोरोगी महिला को फर्श पर भोजन परोस दो, यानी स्वयं मानसिक रुप से बीमार है और दूसरों को ज्ञान दिये जा रहे है। कविता ने तो इस प्रकरण पर ऐसा बयान दिया कि जैसे भारत माता विलेन हो, खलनायिका हो।
हमारे देश में इस प्रकार की अमानवीय घटनाएं हमेशा इक्के-दूक्के जगह देखने को और सुनने को मिलती है, इसका मतलब ये तो नहीं कि हम भारत माता को ही कटघरे में रख दें। आपकी घटिया सोच और घटिया मनोवृत्ति के लिए भारत माता दोषी कैसे हो गयी, लेकिन जब आप वामपंथी होंगी या वामपंथ में ही भारत का निर्माण दिखेगा तो भारत माता आपकी नजरों में विलेन तो दिखेंगी ही।
इधर रांची में विभिन्न प्रकार का एनजीओ चलानेवाले और स्वयं को गरीबों का मसीहा बतानेवालों का अधिवेशन चल रहा है, ये वो लोग है, जो एनजीओ के माध्यम से राज्य व केन्द्र सरकार की विकासात्मक योजनाओं और गरीबों के लिए चलनेवाली योजनाओं को खुद गड़प कर जाते है, वे डायलागबाजी कर रहे है।
फर्श पर भोजन प्रकरण, कुछ नहीं, हमारी घटिया मानसिकता का घोतक है, हम स्वयं को तो मनुष्य मानते है, पर सामनेवाले को मनुष्य मानने को तैयार नहीं। हर प्रकार का कुकर्म करेंगे और स्वयं द्वारा किये गये कुकर्म को औरों से बेहतर मानेंगे और दोष ठहरायेंगे भारत माता को। वामपंथी बनेंगे, एनजीओ बनायेंगे और अपने बेटे-बेटियों को दूसरे महानगरों में बसायेंगे और कहेंगे कि भारत माता की जय कैसे बोले। लाशों की राजनीति करेंगे, गुंडों, अपराधियों और देशद्रोहियों की मदद करेंगे और बोलेंगे कि भारत माता की जय बोले कैसे। जैसे कल का ही अखबारों में छपा भाकपा माले के महासचिव दीपंकर का वह बयान पढ़ लीजिये, जिसमें उसने कहा कि बुरहान वानी आतंकी नहीं था।
अब आप समझ लीजिये कि कौन इस प्रकार की व्यवस्था के लिए दोषी है। राज्य व केन्द्र सरकार या हमारी घटिया स्तर की सोच। जिसमें हम स्वयं को तो श्रेष्ठ और बाकियों को दो कौड़ी का नागरिक समझते है।

Wednesday, September 21, 2016

शहीदों के नाम पर हिन्दुस्तान अखबार और छपास की बीमारी से पीड़ित नेता.............

सदैव अश्लील व अनैतिक विज्ञापनों को प्रकाशित करनेवाला तथा बच्चों में मानसिक विकृतियों का जन्मदाता हिन्दुस्तान अखबार के हृदय में 20 सितम्बर को देशभक्ति का ज्वार फूंटा। उसने अपने विशेष माध्यम से लोगों को उड़ी की याद दिलाई और लोगों से कैंडल मार्च में शामिल होने का अनुरोध कर डाला, चूंकि हिन्दुस्तान अखबार ने अनुरोध किया तो जितने भी छपास की बिमारी से पीड़ित नेता (चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हो) और विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग उनके कार्यक्रम में आ धमके, खूब फोटो सेशन कराया, हंसा – हंसाया और फिर रोजमर्रा के कामों में जूट गये। इन्हें न तो देशभक्ति से मतलब था और न ही उड़ी की घटनाओं से, चूंकि अखबार को आदमी चाहिए थे, अपने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए, उन्हें आदमी मिल गये और जिन्हें चेहरे चमकाने थे, उनके चेहरे चमक गये, पर जिन्होंने उड़ी के नाम पर ये सब किया, उनसे कुछ सवाल तो मैं जरुर पूछना चाहुंगा।
सवाल नं. 1 – क्या उड़ी में शहीद हुए सैनिकों की आत्मा या उनके परिवार के लोगों ने उनसे ऐसा कार्यक्रम आयोजित करने को कहा था, क्या?
सवाल नं. 2 – क्या कोई बता सकता है, कि जो लोग इस कार्यक्रम में शामिल थे, उनके परिवार के कितने लोग सेना या केन्द्रीय अर्द्ध सैनिक बलों में कार्यरत है?
सवाल नं. 3 – क्या जिस प्रकार का ये फोटो सेशन कराये हैं और इस मर्माहत होनेवाली घटनाओं में दांत निपोड़ें है, उनके घरों में भी ऐसी हादसा होने पर, वे इसी प्रकार दांत निपोड़ा करते है क्या?
सवाल नं. 4 – क्या इस प्रकार के आयोजन से माइलेज लेने की जो नई प्रवृत्ति का जन्म हुआ है, उससे पता नहीं चलता कि लोगों में संवेदनशीलता समाप्त हो गयी और लोग इस शहादत का भी व्यवसायीकरण करने में लग गये, ये कहकर कि लोग जाने कि हिन्दुस्तान अखबार का जवाब नहीं और जब अखबार में काम करनेवाले लोगों में संवेदनशीलता है ही नहीं तो इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने के मायने क्या है?
आप पूछेंगे कि ये सब लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी, आवश्यकता है, हमारे पास प्रमाण है कि इस दुख भरी घटना में, जहां सारे देश में उबाल है, एक नेता मुस्कुरा रहा है, और अगर यह दृश्य देखना है तो धनबाद से प्रकाशित हिन्दुस्तान का पृष्ठ संख्या 3 देखिये, जिसमें भाजपा सांसद पी एन सिंह मुस्कुराते हुए फोटो खींचा रहे है, जैसे लग रहा है कि फोटो सेशन चल रहा है, यहीं भाजपा समर्थित एक मेयर भी है, उसके चेहरे को भी पढ़ने की कोशिश कीजिये, कैसे वह फोटो सेशन में स्वयं को समाहित कर रहा है और पृष्ठ संख्या 4 देखियेगा तो आपको सब कुछ क्लियर हो जायेगा, कि हिन्दुस्तान अखबार का बैनर लेकर लोग कैसे आनन्दित हो रहे है, मुस्कुरा रहे है, जैसे लगता है कि देश में कोई जश्न का माहौल हो...यहीं नहीं इस अखबार में काम करनेवाले कई कर्मचारियों ने तो गजब कर डाला है, फोटो खिंचवाया तो खिंचवाया, उसे बड़े शान से सोशल साइट्स पर भी डाल दिया। लीजिये देखिये, हिन्दुस्तान अखबार के कारनामे, फोटो सब कुछ क्लियर कर दे रहा है...

Saturday, September 17, 2016

कौन है पंकज पाठक.................

कौन है पंकज पाठक?
जानिये पंकज पाठक को। पंकज पाठक को 14 दिनों के लिए जेल भेज दिया गया है। उस पर आरोप है कि उसने अडानी पावर लिमिटेड के गोपनीय दस्तावेज बेचे है। किसको बेचे है, किसलिये बेचे है, अब तक पुलिस पता नहीं लगा पाई है। आज के विभिन्न अखबारों को देखने से पता चलता है कि वह रह – रह कर अपना बयान बदल रहा है। हिन्दुस्तान अखबार के अनुसार, उसके बयान है कि अगर वह मुंह खोलेगा तो कई बड़े लोग फंसेंगे। कौन लोग फंसेंगे जाहिर है, जिसका वह नाम लेगा, पर वह जिसका नाम लेगा, वे फंस ही जायेंगे, इस बात में दम नहीं है, क्योंकि जिन्हें उसके नाम लेने से फंसने का डर है, वे जरूर अब तक अपनी सुरक्षा के बड़े-बड़े बांध बना लिये होंगे। फिर भी हमारा पंकज से आग्रह होगा कि वह सत्य के साथ रहे और सत्य का अनुसरण करते हुए, अपनी बात बिना किसी भय के कानून के समक्ष रखे, क्योंकि सत्य में ही सिर्फ ताकत होती है। सत्य ही उसे बचायेगा, बाकी असत्य की क्या भूमिका होती है, वह सब को पता है।
पंकज को मैं अच्छी तरह जानता हूं, अनेक बार उससे मिला हूं। फेसबुक पर भी बाते होती रही है, कई बार फोन पर बात किया हूं। जब वह प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश का पीए हुआ करता था, तब तो ज्यादा ही बाते हुआ करती थी। उसके आलेख बराबर प्रभात खबर के संपादकीय पृष्ठ पर दीख जाया करते थे। एक दो आलेख तो दैनिक जागरण में भी उसके छपे है, वे भी राष्ट्रीय स्तर पर। फेसबुक पर उसके धारदार पोस्ट तो प्रभात खबर में काम करनेवाले संपादकों से लेकर नीचे के कर्मचारियों तक को कमेंट्स करने पर मजबूर कर देते थे, चाहे वे विजय पाठक हो या अभी दूसरे जगहों पर कार्य कर रहे स्वयं प्रकाश, इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उस बच्चे में प्रतिभा है और प्रतिभा के बल पर कई वर्षों तक उसने प्रभात खबर को अपनी सेवा दी।
आखिर प्रभात खबर में शीर्ष पर रहनेवाला पंकज अडानी पावर लिमिटेड में जाते ही अपराध कैसे कर बैठा? ये सवाल रहस्यमय बना हुआ है और इस रहस्य को सुलझाना झारखण्ड पुलिस के लिए बहुत ही जरूरी है, ऐसे तो ये सवाल से पर्दा उसी समय उठ गया, जब पंकज ने यह बयान दिया कि “मुंह खोलूंगा तो फंसेंगे कई बड़े लोग”। भाई पंकज, मुंह खोल ही दो, किसके लिए धर्मसंकट में फंसे हो। उपनिषद कहता है – धर्मों रक्षति रक्षितः।
हां, एक बात के लिए प्रभात खबर को जरुर दाद दूंगा कि उसने तुम्हारी फोटो अभी तक अपने अखबार में इस प्रकरण में नहीं छापी, शायद वह इस बात को आज भी आत्मसात किये हुए है कि तुम वहां कभी काम किये थे, चलो प्रभात खबर ने इतना तो अपना धर्म निभाया, नहीं तो वो कितना धर्म निभाता है, मैं जानता हूं। हमें तो लगता है कि कुछ न कुछ जरूर गड़बड़ है, जिससे पर्दा उठना चाहिए और ये पर्दा तुम्हीं उठाओगे। ईश्वर सदैव तुम्हारे साथ है, सत्य का साथ कभी मत छोड़ना।

Thursday, September 15, 2016

चूंकि प्रभात खबर कह रहा है, तो मान लीजिये...............

चूंकि प्रभात खबर कह रहा है, तो मान लीजिये कि आज अनन्त चतुर्दशी नहीं, बल्कि आज ऋषि पंचमी है...
हां, भाई हां...
आज अनन्त चतुर्दशी नहीं, बल्कि आज ऋषि पंचमी है, क्योंकि झारखण्ड का सर्वाधिक प्रसारित हिन्दी दैनिक प्रभात खबर के अनुसार आज अनन्त चतुर्दशी नहीं, बल्कि ऋषि पंचमी है, इसलिए आज सभी ऋषि पंचमी व्रत करें, क्योंकि प्रभात खबर कभी झूठ नहीं बोलता।
हमारे राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास तो कई जगहों पर बोल चुके है कि पत्रकारिता हो तो प्रभात खबर जैसी, नहीं तो पत्रकारिता हो ही नहीं। वे तो प्रभात खबर पर इतने खुश रहते है कि वे मुक्त कंठ से उस पर जमकर अर्थ लूटाते रहते है, उस अखबार के संपादक या प्रबंधक या मालिक के एक इशारे पर उनके कार्यक्रमों में लाख व्यस्तताओं के बावजूद दिखाई पड़ जाते हैं...
इसलिए मैं कह रहा हूं कि सभी लोग प्रेम पूर्वक आज ऋषि पंचमी व्रत मनाएं...
एक बात और
अगर कोई पूछे कि आज कौन सा दिन है...
तो भूल कर भी आज वृहस्पतिवार है, ऐसा न कहें...
प्रेम से हृदय में प्रभात खबर अखबार को रखकर बोले कि आज मंगलवार है...
क्योंकि आज प्रभात खबर ने अपने रांची संस्करण में पृष्ठ संख्या 3 जो सिटी फर्स्ट के नाम से जानी जाती है, उसमें आज का पंचांग में स्पष्ट रूप से उद्धृत किया है कि आज पंचमी तिथि है जो रात्रि के 8.42 तक रहेगी और उसके उपरांत षष्ठी तिथि है। प्रभात खबर के इस दिये पंचांग के अनुसार आज वृहस्पतिवार नहीं, बल्कि मंगलवार है, उसने आज पर्व त्यौहार में लिखा है कि आज ऋषि पंचमी व्रत और रक्षा पंचमी है।
यानी ये वहीं बात हो गयी...
मैं चाहे, वो करूं, मैं चाहे जो करूं
मेरी मर्जी...
यानी बेशर्मी की सारी सीमा पार कर दी है, इस अखबार ने, पर कोई बोलनेवाला नहीं, सभी चुप्पी साधे हुए हैं...
शर्मनाक...

Monday, September 12, 2016

देखिये बिहार के बेशर्म पत्रकारों को...

हत्या और शव को तेजाब से गला देने के जिस मामले में शहाबुद्दीन को जमानत मिली है, उस पीड़ित परिवार के घर पर सन्नाटा पसरा है, प्रभावित परिवार के चंदा बाबू और उनकी पत्नी बेहद दुखी है, शहाबुद्दीन के बेल मिलने पर वे राज्य सरकार को कटघरे में रखते है। वे कहते है कि मुझे यहां की व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा। तीन बेटों की हत्या के बाद अब उनके दैनिक जीवन पर किसी भी खुशी या गम का कोई असर नहीं होता...
दूसरी ओर हिन्दुस्तान के पत्रकार राजदेव की पत्नी ने भी शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आने पर चिंता जता दी कि उसे बिहार सरकार पर भरोसा नहीं, उसने सीबीआइ की जांच की मांग कर दी, पर पटना से प्रकाशित अखबार हिन्दुस्तान में ये खबर नहीं है, क्यों नहीं है, ये खबर, आप स्वयं चिंतन - मनन करिये, पता लग जायेगा।
दूसरी ओर जदयू विधायक का चैनल जो रांची से संचालित होता है, उसके पटना के दो संवाददाता नीतीशायन गा रहे है, और बता रहे हैं कि नीतीश साक्षात् परम पिता परमेश्वर है, अगर वे है, तभी बिहार है, नहीं तो बिहार ही नहीं, इसलिए हे बिहार की जनता आपने जो जनादेश नीतीश भगवान को दिया है, उस पर भरोसा रखे, नीतीश भगवान आपका अवश्य उद्धार करेंगे।
ऐसे - ऐसे है, बिहार के पत्रकार जो पैसे के लिए अपनी जमीर तक बेच दिये है...
इन पत्रकारों के सोशल साइटस को देखें तो बेशर्मों को न तो रघुवंश का बयान दिखाई पड़ा है और न ही शहाबुद्दीन की मार से कराह रहे जनता की आवाज सुनाई पड़ी है, इन्होंने अपने मालिक को खुश रखने और नीतीश के चरणोदक पीने में सारी शक्ति लगा दी है।
रांची से प्रकाशित निर्लज्ज अखबार प्रभात खबर की तो बात ही अलग है, उसे नीतीश में खुदा नजर आता है, उसने तो आज पृष्ठ संख्या 18 में नीतीश भक्ति में सारी शक्ति लगा दी, उसने नीतीश को अपना खुदा मानते हुए, उसे बचाने में प्रमुख भूमिका निभा दी और झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के महत्वपूर्ण बयान को सिंगल और छोटा समाचार बनाकर भीतर के पृष्ठ संख्या 8 पर ठेल दिया, वह भी आपको बहुत खोजने पर मिलेगा। वह भी तब, जबकि सर्वाधिक विज्ञापन झारखण्ड सरकार का यहीं अखबार प्राप्त करता हैं और बाकी अखबार उसके आस-पास भी नजर नहीं आते, पर यहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास का तार्किक बयान, उसे नहीं सुहाता। वह स्वयं को झारखण्ड का सर्वाधिक प्रसारित अखबार बताता है, पर रांची से मात्र 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धनबाद, देवघर और दुमका का इलाका बता देता है कि इस अखबार की क्या स्थिति है।
हमारा मानना है कि कोई भी व्यक्ति अगर वह पत्रकार है तो कम से कम निरपेक्षता दिखाएं, नीतीश भक्ति में न डूबे, नीतीशायन न गाये, वह यह भी देखे कि नीतीश के कुकर्मों से सामान्य जनता को क्या दिक्क्ते आ रही है...मैं तो देख रहा हूं कि जिस नीतीश के कुकर्मों के शिकार एक अखबार में काम करनेवाले पत्रकार हो रहे है, वो संस्थान का संपादक, प्रबंधक और वहां काम करनेवाले तथाकथित "लाल झंडा करे पुकार, इन्कलाब जिंदाबाद" का नारा लगानेवाले तथाकथित वामपंथी पत्रकार भी नीतीश की जयकारा लगा रहे हैं...

Saturday, September 10, 2016

पूरा बिहार पगलाया हुआ है, शहाबुद्दीन को लेकर...............

पूरा बिहार पगलाया हुआ है,शहाबुद्दीन को लेकर...
बेचारा नीतीश लालू का चरणामृत ग्रहण करने के बाद बिहार में अखंड शासन का सुखभोग रहा है...
मैं कहता हूं कि शहाबुद्दीन जेल से छूट गया तो क्या हो गया...
इसमें पगलाने की जरुरत ही क्या है...
इतिहास के पन्ने पलटो...
आजादी के पूर्व में कोई भी एक ऐसा अंग्रेज का नाम बताओ, जिसे सजा मिली हो, यहां तक की जनरल डायर जिसने अमृतसर के जालियावालां बाग में गोलियां चलाई, सैकड़ों निहत्थों को मौत के घाट उतार दिया, क्या उसे भी अंग्रेजों ने सजा दी?
और
आजादी के बाद, एक भी ऐसे नेता का नाम बताओ, चाहे वो कोई भी पार्टी से आता हो, उसे किसी भी अदालत ने सजा दी, दिमाग लगाओ, अरे सारे नेता कुछ दिन के लिए जेल जाते है, फिर जमानत पर निकल आते है और सुप्रीम कोर्ट तक जाते - जाते किसी न किसी बहाने दोषमुक्त हो जाते है,
अरे भाई
आपको ये बात क्यों नहीं समझ आती कि हर नेता जेल जाने के समय, ये डायलॉग जरुर बोलता है कि भाई हमें न्यायालय पर और देश के कानून पर पूरा भरोसा है...
इस भरोसे का मतलब नहीं समझते यार...
तुम एक दिन देखना कि चारा खा जानेवाला नेता लालू यादव भी एक न एक दिन अदालत से जरुर बरी हो जायेगा...
नीतीश बुर्बक थोड़े ही हैं, वो देश की न्यायिक व्यवस्था को, यहां की जनता के दिमाग को जानता है...
इसीलिए चारा घोटाले और अन्य घोटाले में बार-बार लालू को कटघरे में खड़ा करने के बावजूद अंत में नीतीश, लालू का चरणामृत ग्रहण कर सो गया...
और सोने के पूर्व, चरणामृत पीते-पीते क्या श्लोक बोला -
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्याप्त नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।
अब ये नीतीश उत्तम प्रकृति का है, या अधम प्रकृति का...
समझते रहिये...

Thursday, September 8, 2016

रांची पुलिस और ईमानदार – ये बात कुछ हजम नहीं हुई.........

रांची पुलिस और ईमानदार – ये बात कुछ हजम नहीं हुई...
रांची पुलिस ने जयपुर से न्यूज इंडिया चैनल के मालिक वी एस तोमर को गिरफ्तार क्या कर लिया, रांची पुलिस की जय – जय हो रही है, जैसे लगता है कि रांची पुलिस दूध की धूली है...
ये वहीं रांची पुलिस है कि जिसके लोग कभी वीएस तोमर प्रकरण पर ही तोमर को महान घोषित कर चुके है, जो उस वक्त रांची के सभी अखबारों में छपी थी...
कई बार तोमर को गिरफ्तार करने के लिए रांची से पुलिस गई और जयपुर जाकर तोमर से उपकृत हुई, पर आज तक उन पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई...
ये वहीं रांची पुलिस है, जो रांची में ही संचालित न्यूज 11 के मालिक अरुप चटर्जी को सुरक्षा गार्ड तक मुहैया करायी हुई है, उस अरूप चटर्जी पर जिसके खिलाफ रांची की न्यायालय ने कुर्की जब्ती तक का आदेश दिया, जिसके खिलाफ केस लड़ रहे गुंजन सिन्हा ने रांची के एसएसपी से एक नहीं कई बार गुहार लगायी, पर चूंकि अरूप चटर्जी पहले आजसू और अब भाजपा का नेता बन चुका है, उसे गिरफ्तार नहीं करती...
कई मामले तो मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र मे भी ऐसे ऐसे आये है...
जिससे रांची पुलिस का चरित्र उजागर हो जाता है। रांची पुलिस तो मुख्यमंत्री के सीधी बात में आये प्रश्नों को भी हवा में उड़ा देती है, जिसका प्रमाण है लालपुर थाना से संबंधित एक कम्प्यूटर शॉप और मकान मालिक का प्रकरण, जिस पर मुख्यमंत्री ने सीधी कार्रवाई कर समस्या का समाधान करने को कहा, पर रांची पुलिस ने इस पर कार्रवाई तो दूर ध्यान ही नहीं दिया...
हमें वी एस तोमर प्रकरण पर, प्रेमचंद का लिखा नमक का दारोगा कहानी याद आ गया। मुंशी वंशीधर पं. अलोपीद्दीन को गिरफ्तार कर लेते है, पर आम जनता में ये बात ज्यादा घर कर रही है, कि पं. अलोपीद्दीन इतने रसूखवाले आदमी पुलिस की गिरफ्त में कैसे?
यहां मुंशी वंशीधर ईमानदार है, पर रांची पुलिस ईमानदार नहीं हैं...
मैं अच्छी तरह से तोमर को जानता हूं...
एक नंबर का इडियट और लड़कियों को देखकर फिसल जानेवाला आदमी है...
उसके बहुत सारे ऐसे – ऐसे लोगों से रिश्ते है, जिसे सुन और जानकर आप आश्चर्यचकित हो जायेंगे...
प्रख्यात हिदूवादी नेता प्रवीण भाई तोगड़िया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाई के साथ फोटो खींचवाकर ये बहुत आनन्दित होता है, यहीं नहीं वह इन लोगों को जयपुर स्थित अपने यूनिवर्सिटी बुलाता है, अपने चैनल में कार्यक्रम करवाता है, लंदन स्थित जयपुर के लोगों द्वारा होनेवाले कार्यक्रम में खुद को महिमामंडित करवाता है और दिन भर उस महिमामंडित होनेवाले कार्यक्रम की अपनी टीवी पर न्यूज भी चलवाता है...
उधर बिहार से भी एक खबर आ रही है, महान देशभक्त शहाबुद्दीन जेल से छूट रहे है...
वाह-वाह सचमुच बिहार भी जग रहा है, दारू के नशे से छुटकारा के बाद, असली छुटकारा जिंदगी से शहाबुद्दीन ही देंगे और उनके कार्यों की, उनकी देशभक्ति की सुरक्षा का जिम्मा बिहार पुलिस करेंगी...
और चिरकूट टाइप के बिहार के पत्रकार उनकी आरती गायेंगे...

Friday, August 19, 2016

हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं..................

पटना से प्रकाशित भटियारे अखबारों ने आज भी अपना भटियारापन जारी रखा...
जी हां, पटना से प्रकाशित कुछ भटियारे अखबारों ने आज भी अपना भटियारापन जारी रखा। भटियारेपन का खिताब जीत चुका पटना से प्रकाशित अखबार “हिन्दुस्तान” ने आज मुख पृष्ठ पर हेडिंग दिया...
“प्रशासन ने माना, शराब से ही हुई 17 लोगों की मौत” – यानी “हिन्दुस्तान” अखबार मानता है कि जिन लोगों की मौत हुई वह शराब से नहीं बल्कि उसके कल के कथनानुसार कै-दस्त से ही हुई।
नीतीश को समर्पित परमभक्त अखबार “प्रभात खबर” ने जो कल यह हेडिंग दिया था कि “गोपालगंज में मरनेवालों की संख्या 14 पहुंची, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नहीं मिला अल्कोहल का अंश”। आज हेडिंग दिया है – “गोपालगंज नगर थाने की सभी 15 पुलिसकर्मी निलंबित” और लगे हाथों जमकर नीतीशायन गाया है।
कल तक जो “दैनिक जागरण” अपने हेडिंग के माध्यम से सही समाचार लिखने का प्रयास करते हुए अपनी गरिमा बचाने का प्रयास किया था, आज उसकी हेडिंग देखिये तो पता चलेगा कि उसने आज नीतीशायन की ओर कदम बढ़ाया है।
दैनिक जागरण का आज का हेडिंग है...
“बख्शे नहीं जायेंगे शराब के धंधेबाज
इस्पेक्टर सहित 25 पुलिसकर्मी निलंबित”
दूसरी ओर “दैनिक भास्कर” ने आज एक बार फिर नीतीश की बैंड बजा दी है। हेडिंग दिया है – “तीन और की मौत, इसंपेक्टर समेत 25 पुलिसकर्मी सस्पेंड”
अब अपनी बात...
क्या पत्रकारिता सत्ता में बैठे मठाधीशों की सुरक्षा और उनकी आरती गाने के लिए होती है या जनता की आवाज बनने के लिए?
जनता इन अखबारों के संपादकों-मालिकों से पूछे कि वे अखबार खोलकर सत्ता में बैठे लोगों के तलवे क्यूं चाटते है?, इससे अच्छा है कि वे कोठा खोल लें...
फिलहाल गोपालगंज शराबकांड में जिस प्रकार से पटना से प्रकाशित अखबारों ने पत्रकारिता धर्म का पालन न कर, सत्ता में बैठे लोगों का महिमामंडन करने का कार्य किया है, हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं...

Thursday, August 18, 2016

अखबारों का भटियारापन...............

मौत गरीबों का और पटना से प्रकाशित एक-दो अखबारों को छोड़कर सभी अखबारों ने आज गरीबों के मौत का मजाक उड़ाया हैं और नीतीश भक्ति से स्वयं को अलंकृत कर लिया है। भटियारापन दिखाने में इस बार पटना से प्रकाशित हिन्दुस्तान अखबार ने बाजी मार ली है, इस बार हिन्दुस्तान प्रथम स्थान पर और प्रभात खबर दूसरे स्थान पर है, जबकि दैनिक जागरण ने अपनी गरिमा बचाने में कुछ हद तक सफलता पायी, वहीं दैनिक भास्कर ने सही खबरें प्रकाशित कर गरीबों के मौत पर मरहम और नीतीश को डायरेक्ट चुनौती दे दी है।
जरा खबर क्या है, उसे जानिये – खबर यह है कि जहरीली शराब पीने से गोपालगंज में 15 लोगों की मौत हो गयी, प्रशासन मानने को तैयार ही नहीं कि यह मौत जहरीली शराब पीने से हुई है, जबकि जिनके घर में ये घटना घटी, वे चीख-चीखकर कह रहे हैं कि यह मौत जहरीली शराब के कारण हुई, पर बेशर्म अखबारों को देखिये, क्या हेडिंग बनायी है...
सबसे पहले पटना से प्रकाशित हिन्दुस्तान को देखिये...
हेंडिग बनाई है...
“गोपालगंज में कै दस्त से 14 मरे”
प्रभात खबर को देखिये, ये हेंडिग बनाया है
“गोपालगंज में मरनेवालों की संख्या 14 तक पहुंची”
दैनिक जागरण ने हेडिंग दिया
“जहरीली शराब से 14 मरे”
दैनिक भास्कर ने हेडिंग दिया
“पहले आंखों की रोशनी गई, फिर जान, जहरीली शराब से 15 लोगों की मौत”
ये हैं कुछ अखबारों का दोगला चरित्र और नीतीशायण गाने की प्रतियोगिता...
और अब अपनी बात...
जो लोग हमारे फेसबुक से जुड़े है, और हमारा फेसबुक पढ़ते है। वे जानते होंगे कि मैंने 4 अगस्त 2016 को क्या लिखा था, पर जो नहीं पढ़े है, उनके लिए मैं पुनः उद्धृत कर रहा हूं, वो यह हैं...
“बिहार के बबुआ नीतीश को समर्पित...
ए भाई इ देश में दहेज के खिलाफ कानून बना है...भ्रष्टाचार रोकने के खिलाफ भी कानून बना है...कम उम्र में शादी रोकने का भी कानून बना है...चोरी, बलात्कार, गुंडागर्दी रोकने के लिए भी कानून बना है...लगे हाथों एक और भी कानून बन गया, क्या कहते है दारु पीने से रोकने का कानून...हम सभी का स्वागत करते है...जैसे पहले के कानून का किया...जैसे आज भी दहेज लेते है, भ्रष्टाचार का सारा रिकार्ड अपने नेता जी अपने पास रखते है, कम उम्र में शादी भी करते और करा देते है, चोरी, बलात्कार और गुंडागर्दी तो नेताओं के आभूषण ही है...इसलिए दारु के बारे में क्या कहना हैं, नई - नई दुल्हन बनी है, देखते है आगे कितने लोग इसका घूंघट उठाते है...”
ये लिखने का अभिप्राय यहीं था कि आप कुछ भी कर लो, जो गलत लोग है, जो चरित्रहीन लोग है, वे अपनी कलाबाजी दिखायेंगे ही, उन्होंने अपनी कलाबाजी आज दिखा दी...
पर इससे हुआ क्या?
मरा कौन गरीब, मरा कौन था गरीब और मरेगा कौन गरीब
और इस पर मजा लूटेगा कौन, वहीं हिन्दुस्तान, वहीं प्रभात खबर जो दांत निपोड़ कर फिलहाल नीतीशभक्ति में सर से पांव तक डूबा है...
बेशर्म है ये लोग, पत्रकारिता क्या करेंगे...
ये तो नीतीशायन गायेंगे और गरीबों के शव पर ठुमके लगायेंगे...
हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं...

Thursday, August 11, 2016

संभ्रांत पत्रकार बनकर झारखण्ड को लूटने का सुनहला अवसर हाथ से जाने न दें..........

संभ्रांत पत्रकार बनकर झारखण्ड को लूटने का सुनहला अवसर हाथ से जाने न दें...
कंबल ओढ़कर, घी पीने का सुनहला अवसर झारखण्ड में...
अगर आप किसी न्यूज एजेंसी से जुड़े है, या अन्य मीडिया हाउस से, तो फिर आपकी बल्ले-बल्ले है, यानी दोनों हाथों में लड्डू...
ये आपके हाथों में है...
बस आपको इतना ही करना है...
एक संस्थान खोलिए, या कोई न्यूज पोर्टल खोल लीजिये...
और उसमें अपने पिता को चेयरमेन बना दीजिये...
अपनी पत्नी को संपादक बना दीजिये...
अगर आपका बेटा है तो उससे आप अपने ही पोर्टल पर बेमतलब का कमेंट्स डलवाया कीजिये या कभी – कभी उससे रिपोर्टर्स का काम ले लीजिये ताकि जब बड़ा हो तो उसे आराम से संवाददाता या पत्रकार बनाया जा सके...
कमेंटस दिलवाने में आप अपने मित्रों और परिवारों की भी मदद ले सकते हैं...
और खुद मुख्य संपादक बन जाइये और विज्ञापन प्रबंधक का काम शुरू कर दीजिये...
जैसे ही आप ऐसा करेंगे, विभिन्न दलों के नेता, मंत्री और अधिकारी से आप मुंहमांगी राशि विज्ञापन के रूप में वसूलना शुरू कर देंगे...
यहीं नहीं, अनैतिक कार्यों और इन हरकतों को अपनाते ही आप जल्दी धन-कूबेर बन जायेंगे, वह भी प्रतिष्ठा के साथ...
आपको सहयोग करने के लिए झारखण्ड के श्रम विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, उद्योग विभाग के लोग सदैव आपके साथ है, यहीं नहीं स्वास्थ्य, खेल, पर्यटन आदि विभाग भी आपको इस अनैतिक कार्य में सहयोग देने के लिए तैयार है...
यहीं नहीं झारखण्ड में स्थित सीएमपीडीआई, सीसीएल या प्रमुख भारतीय कंपनियां जैसे- सेल, गेल या कई सासंद मौजूद है ही...
हां एक बात और...
अपने संस्थान या न्यूज पोर्टल के नाम पर समय – समय पर एक स्मारिका निकलवाइये और पूरे स्मारिका में अपने बेटे, अपनी पत्नी और अपने पिता का फोटो भर दीजिये और नैतिकता पर भाषण देने के लिए आजकल गर्दिश में चल रहे किसी भी नेता को बुला लीजिये...फिर क्या सम्मान और पैसे दोनों एक साथ...
यहीं सत्य है,
अगर किसी कारण से ईमानदारी का कीड़ा, आपको काटे हुए है, तो समझ लीजिए, कहीं के न रहियेगा आप, यहां तक कि आप ही से लोग इस बात का प्रमाण मागेंगे कि आप पत्रकार है, इसके क्या प्रमाण है...तो फिर देर किस बात की...
बेशर्मी जिन्दाबाद, लंठई जिन्दाबाद...
नैतिकता का लबादा ओढ़िये और सारे अनैतिक हरकतें अपनाइये...
अनैतिकता के रास्ते, पत्रकारिता के वास्ते...

Friday, August 5, 2016

ले लोट्टा...................

ले लोट्टा, इ त नीतीशवा के दारू कानून के हव्वे निकल गइल भइया...
अरे जादा दिन के बात नइखे, बिहार विधानमंडल में हमार बबुआ नीतीश दारू कानून पेश कइले...
उनकर बुतरूवन बिधयकवन सब खूब दांत निपोरत रहे...
उनकर लटकन पत्तरकार लोग तो झूम झूम के नीतीशायन गावत रहे...
ताड़ी पिये के रिकार्ड तोड़ले लालू भगवान तो नीतीशवा के अपन भक्त बना दिहले,
और कहिले कि कोई यादव और कुरमी भाई अब दारू ना पीहे...
और जो दारू पीहे, तो जइहे काम से...
लेकिन इ का होयल भइया
न दारू कानून पास होते देरी
आउर न उ कानून में छेद होते देरी...
आजे एगो अखबार पटना डेडलाइन से समाचार छपले बा...
समाचार के शीर्षक बा...
पकड़े गये व्यापारियों के ब्लड सैंपल में अल्कोहल नहीं मिला...
इ समाचार में लिखल बा कि
बिहार में शराबबंदी के बाद पटना पुलिस ने होटल पनास से सात व्यापारियों को शराब पीने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा था। फांरेसिक साइंस लेबोरेट्री ने सभी व्यापारियों को क्लीन चीट दे दी।
वाह रे भाई, वाह...
एकरा कहल जाला, कानून तू केतनो बना ल, चलइहे धरती लोक के प्राणिये न...

आउर इ धरतीलोक के प्राणी केतना महान, केतना चरित्रवान होखेला
उ तो लालू भगवान और उनकर बड़ भगत बबुआ नीतीश से ज्यादा कौन जनिहे...
अरे जो दल बदल में माहिर ह,
अरे जो पशु चारा खाए में माहिर ह
और जो काल्हे पशु चारा खाएवाला घोटालेबाज कह कह के, अपना चेहरा चमकवले
और फिर जाके बाद में, ओकरे गोदी में बैठके
आपन दाढ़ी टोवे लगले
उ केतनो कानून बना दी
ओकरा से का होई
हाल ही में एगो केजरिया, खूब ईमानदारी के ढोल पीटले
और आज ओकर सारा ईमानदारी, एक-एक कर काठ के कड़ाही जइसन भो - काटा हो जाता
तो समझ जाइ, कि नीतीशवा के इ दारू कानून के का होई
आज ओकर पहला अध्याय, सामने दिखाई पड़ गइल...
मजा ली बबुआ नीतीश के दारू कानून के...
बबुआ नीतीश के कोई नजर ना लगावे भाई
बड़ काम के हमर बबुआ नीतीश बाड़े...

Monday, August 1, 2016

प्रतिभा सम्मान की आड़ में अखबारों का चलता व्यवसाय...

क. जब ढोंगी बाबाओं के विज्ञापनों को अपने अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित करनेवाला...
ख. जब ढोंगी बाबाओं को अपने यहां बुलाकर उसे महिमामंडित करनेवाला...
ग. जब सेक्स से संबंधी उलुलजुलूल विज्ञापन प्रकाशित करनेवाला...
घ. जब वशीकरण के नाम पर तमाम तरह के अंधविश्वास को आगे बढ़ाने से संबंधित विज्ञापन प्रकाशित करनेवाला...
ङ. जब नेताओं के चरणवंदना कर स्वयं को उपकृत करनेवाला...
च. जब बिल्डरों से आर्थिक मदद लेकर नाना प्रकार के कुकृत्यों को जन्मदेनेवाला...
प्रतिभा सम्मान का आयोजन करने लगे तो समझो दाल में काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। इन दिनों जिसे देखों, प्रतिभा सम्मान आयोजित कर रहा है, और आश्चर्य इस बात की है कि ऐसे आयोजनों में लोग अपने पूरे परिवार के साथ इस प्रकार भाग ले रहे है, जैसे लग रहा हो कि उनके बच्चों को भारत रत्न की उपाधि मिल रही हो। सच्चाई यह है कि इन अखबारों के द्वारा इस प्रकार का आयोजन इसलिए किया जाता है ताकि इसकी आड़ में अखबारों का आर्थिक सुदृढ़ीकरण हो सकें। आप देखेंगे कि इस प्रकार के आयोजन में बड़ी संख्या में प्रायोजक भाग लेते हैं। उसका मूल कारण, बड़े-बड़े अखबारों को अपनी ओर आकर्षित करना है, ताकि उनके द्वारा भविष्य में जब उनकी गलतियां उजागर हो, तो ये अखबार अपनी ओर से मुंह बंद रखे, और ये होता भी है।
प्रतिभा सम्मान समारोह में सहजीविता के आधार पर प्रायोजक, आयोजक और सम्मानप्राप्तकर्ता सभी आनन्दित रहते है, और नुकसान उठाना पड़ता है, समाज को, राज्य को और देश को। नुकसान इसलिए कि, इस प्रकार के आयोजन से न तो बच्चों को लाभ होता है और न उन परिवारों को, जो इसका लाभ उठा रहे होते हैं। अरे इन बच्चों की प्रतिभा का सम्मान उसी दिन हो गया, जब बच्चे मैट्रिक अथवा इंटर की परीक्षा में प्रथम, द्वितीय या तृतीय आ गये।
प्रतिभा का सम्मान, अगर अखबार करने लगे तो फिर वे बच्चे जो इन अखबारों से कभी उपकृत ही नहीं हुए, वे बैठकर आलू छीलेंगे क्या?
अखबार का काम – सिर्फ नैतिकता के आधार पर समाचारों को प्रकाशित करना है, अगर अखबार यहीं काम ईमानदारी से करने लगे तो फिर प्रतिभा सम्मान समारोह की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, पर यहां हो क्या रहा है, जिन्हें जो काम करना है, वे उस काम को छोड़कर, वो सारी काम कर रहे है, जो उन्हें नहीं करना है।
एक महत्वपूर्ण बात, सम्मान को लेकर ही...
आइये महात्मा गांधी से जुड़ी एक कहानी सुनाता हूं। महात्मा गांधी का मूल नाम मोहनदास था, पर मोहनदास कौन है, आज किसी से पूछे, तो कोई नहीं बतायेगा, पर महात्मा गांधी बोले तो सभी बता देंगे कि महात्मा गांधी कौन है या महात्मा गांधी कौन थे...
क्या आप जानते है कि महात्मा गांधी को महात्मा की उपाधि किसने दी थी...
इसका सही उत्तर है – रवीन्द्र नाथ ठाकुर।
क्या आप जानते है कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि किसने दी थी...
इसका सही उत्तर है – सुभाष चंद्र बोस।
यानी सम्मान देनेवाला कौन है, उसकी नीयत क्या है, उसका समाज में क्या भूमिका है, यह भी देखी जाती है, ये नहीं कि किसी ने दे दिया और हमने ले लिया। जहां इस प्रकार की हरकतें चलती हो, उसे पूर्णतः व्यवसाय कहते है, न कि प्रतिभा सम्मान...
जरा कोई बता सकता है क्या कि रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने जब गांधी को महात्मा से नवाजा था या जब सुभाष चंद्र बोस ने गांधी को राष्ट्रपिता कहा था तब इस सम्मान समारोह के प्रायोजक कौन-कौन थे... और इस सम्मान समारोह में ताली पीटने के लिए गांधी के परिवार से कौन – कौन लोग मौजूद थे...
मेरे भाइयों,
अपने बच्चों को इस प्रकार के प्रतिभा सम्मान समारोह से दूर रखो...
उनमें सही मायनों में गांधी, रवीन्द्र और सुभाष जैसा चरित्र डालों...
पढ़ने का मतलब क्या होता है...
पढ़ने का मतलब प्रतिभा सम्मान समारोह में जाकर पीतल के टूकड़ें बंटोरना नहीं होता...
पढ़ने का मतलब, सिर्फ और सिर्फ चरित्र और संस्कार को अपनाना होता है...
झूठी सम्मान के पीछे या उसे प्राप्त करने के लिए बौराना नहीं होता...
अरे सम्मान तो मिलेगा ही, वो तो आपको दौड़कर, आपका हक दिलाकर रहेगा...
पर पहले कुछ करके तो दिखाओ...
अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है, सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दो, और कुछ नहीं...
वह भी कैसे...
केवल प्रबल प्रयास और अथक प्रयास से ज्ञान अर्जित नहीं किया जा सकता...
जरा अपने पूर्वजों की बताई मार्ग का अनुसरण करो...
जानो, ईश्वर किसकी मदद करता है...
उद्यमं, साहसं, धैर्यं, बुद्धि, शक्तिं, पराक्रमं।
षडते यत्र वर्तन्ते, तत्र देव सहाय्यं कृतः।।
जानो,
अभिवादनशीलस्य नित्यंवृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्यवर्दधन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।।
मेरे कहने का मतलब क्या...
एक दृष्टांत तुम्हारे सामने है...
बहुत लोग इंजीनियरिंग और डाक्टरी की पढाई कर रहे है, कुछ लोग कामयाब हो जाते है और कुछ कामयाब नहीं होते, जो कामयाब हो गये उसकी भी क्या गारंटी की वे इंसान ही होंगे और जो कामयाब नहीं हुए, उसकी भी क्या गारंटी की वे इंसान ही होंगे...
अगर तुमने शुरूआत ही गलत कर दी, तो मानकर चलो की अंत भी गलत ही होगा...
क्योंकि जिस घर की नींव ही गलत है, उस गलत नींव पर अच्छे मकान नहीं तैयार होते...
ठीक उसी प्रकार प्रतिभा सम्मान में उपकृत होनेवाले बंधु या परिवार इस प्रकार के सम्मान प्राप्त कर, सोचते है कि वे आगे निकल जायेंगे, तो हमें नहीं लगता कि वे आगे निकल पायेंगे, क्योंकि जो प्रतिभा सम्मान दे रहे है, उनका तो स्वयं ही आधार नहीं है, वे तो इस आड़ में स्वयं को आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा रहे है, वो आपको समृद्धि या सम्मान क्या दिला पायेंगे...
ऐसे आप स्वयं समझदार है, समझते रहिये...