Sunday, July 17, 2011

उस देश की हालत क्या होगी, जिस देश में डाकू चोर बसे


जब मुंबई में बम ब्लास्ट हुआ, लोगों की चीत्कार से समस्त देशवासी हिल गये। उस वक्त हमारे नेता किस प्रकार की बयानबाजी कर रहे थे, अपना समय कैसे गुजार रहे थे। जरा उस पर प्रत्येक देशवासी को विचार करना चाहिए। विचार ये भी करनी चाहिए कि जिनकी इतनी घटियास्तर की सोच हो। क्या उनके देख रेख में अपना देश सुरक्षित हैं, गर नहीं तो ऐसे हालात में हमें क्या करना चाहिए।
मुंबई ब्लास्ट के बाद सबसे पहले, इस देश के घटियास्तर के नेताओं का बयान सुनिये--------
घटियास्तर का नेता नं. एकदिग्विजय सिंह – ये कहता है कि पाक में तो हर दिन धमाके होते हैं, हम उनसे बेहतर।
घटियास्तर का नेता नं. दो
राहुल गांधी, जो खुद को युवराज, भविष्य का प्रधानमंत्री और पता नहीं क्या क्या विभूषित करा रखा हैं, इसका बयान आता हैं कि अफगानिस्तान, ईरान – इराक में भी होते हैं आतंकी हमले, आतंकी हमले को रोकना मुमकिन नहीं हैं।
घटियास्तर का नेता नं. तीन
गृहमंत्री पी. चिदम्बरम – जो गृह मंत्रालय संभाल रहा हैं, कहता हैं कि खुफिया एजेंसी ने 31 महीने तक मुंबई को बचाये रखा।
घटियास्तर का नेता नं. चारराज ठाकरे – महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का स्वयंभू- इसका देश महाराष्ट्र से शुरु होता हैं और महाराष्ट्र पर ही खत्म हो जाता हैं, कहता हैं कि इस आतंकी घटना के लिए उत्तर भारतीय जिम्मेवार।
घटियास्तर का नेता नं. पांच
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह – जो झूठी दिलासे दिलाते हुए कहता हैं सरकार भविष्य में आतंकी हमले नहीं होने देगी और इसी पार्टी का,
घटियास्तर का नेता नं. छः
पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय, जिसकी आंखों में शर्म तक नहीं, उधर लोग चीख चिल्ला रहे थे, ये अर्द्धनग्न युवतियों के दृश्यों को अपने आंखों में कैद कर रहा था।
ये सारी घटनाएं बताती हैं कि हमारे देश के नेता कितने निर्लज्ज, बेहया और कायर है। इन्हें आतंकियों की आहट सुनायी नहीं देती। क्योंकि आतंकियों के धमाके, इनके परिवारों को प्रभावित नहीं करते। करेंगे भी कैसे। आतंकी इनके मेहमान और रिश्तेदार जो होते हैं। याद करिये, कि जब रुबिया सईद का अपहरण हुआ था तो हमारे देश के कर्णधारों ने कैसे पांच आतंकियों को ससम्मान छोड़ दिया था। ऐसे उदाहरण एक नहीं, अनेक है।
हम भारतीय भी इस आतंकी घटनाओं के लिए कम जिम्मेवार नहीं है। याद करिये, केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार, कारगिल युद्ध के बाद, एक भारतीय विमान का आतंकियों ने अपहरण किया। उस विमान में आतंकियों के गिरफ्त में जिनके परिवार के सदस्यों का जीवन खतरे में था, उन्होंने बलिदान की भावना को त्याग कर
देश हमारा भाड़ में जाये,
मेरा परिवार घर को आये,

इस भावना के तहत, प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय का घेराव कर दिया। नतीजा क्या हुआ, एक अरब का देश भारत, आतंकियों के आगे सर झूकाया। तीन पाकिस्तानी आंतकी छोड़े गये, और नतीजा सामने है। ये आंतकी हमेशा आतंक के बल पर हमें घिघियाने को विवश करता हैं, हम घिघियाते हैं, और उसके रहमोकरम पर रहने को विवश हैं।
वो देश जो हर पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को ये गीत गाता हैं कि
"लाख फौजे लेके आये
अमन का दुश्मन कोई
रुक नहीं सकता,
हमारी एकता के सामने
हम वो पत्थर हैं, जिसे
दुश्मन हिला सकते नहीं.
अपनी आजादी को, हम हरगिज मिटा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झूका सकते नहीं।"
कमाल हैं ये गीत गानेवाला देश, जब – जब सर कटाने की बारी आयी। आतंकियों के आगे सर झूकाया हैं, वो सिर्फ मैंने ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व देखा हैं कि भारत में अब महाराणा प्रताप, चाणक्य, गुरु गोविन्द सिंह जैसे महापुरुष नहीं पैदा हो रहे, अब शत प्रतिशत कायर और अपने पत्नी के लिए जीनेवाले, लोग पैदा हो रहे हैं और जिस देश में ऐसी पौध होगी, वो देश आतंकियो के रहमोंकरम पर ही जिंदा रहेगा। ये शाश्वत सत्य हैं और गर कोई इसे नकारने की बात करता हैं, तो उसकी मूर्खता पर हमें कुछ भी बातें नहीं करनी।
अब जबकि पूरा देश आतंकियों के गिरफ्त में है, तो हमें क्या करना चाहिए। ये यक्ष प्रश्न, उस हर देशवासी के हृदय में हैं, जो देश के लिए सोचता हैं। उनके लिए, कुछ सुझाव हैं
1. नेताओं के बातों पर ध्यान न दें, ये गद्दार है, गद्दारी करेंगे, और अंत में अपने लिए, अपने शव पर तिरंगा भी डलवा लेंगे। ऐसे लोगों से सावधान रहे।
2. जहां भी रहे, ये मन में ध्यान रखें कि ईश्वर आपके साथ हैं, गर आप दुनिया में नहीं भी रहेंगे तो आपके परिवार का भरण पोषण करनेवाला ईश्वर आपके परिवार को देखेगा। आप देश के लिए मरने को तैयार रहे, कहीं भी कोई आतंकी घटनाएं होती हैं, उस पर आंसू न बहाये, न रोए, उसका मुकाबला करें, किसी की हिम्मत नहीं कि इस देश और इसकी संस्कृति को मिटा सकें।
3. आतंकी विदेश में नहीं हैं, इसी देश में हैं, विदेश से तो इनके गिने चुने आका ही आते हैं, और हम सबकी नींद उड़ा देते हैं, आप अपने आसपास जहां रहते हैं, वहां जैसे ही बाहरी लोगों को देखे, सतर्क हो जाये।
4. आतंकी जब भय दिखाकर, हमें डिगा सकने का इरादा रखते हैं, तो हम भी उन्हें भय दिखाये कि यहां रहना तुम्हारे लिए मौत को आमंत्रण देना हैं, लेकिन आप जैसे ही इन आतंकियों को जिंदा पकड़ेंगे तो ये नेता उन्हें बचाकर विदेश पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे, जैसा कि पूर्व में आतंकियों को छोड़कर और जेलों में आज भी कई आतंकियों की आवभगत कर हमारे देश के नेताओं ने एक सुंदर उदाहरण पूरे विश्व को दे दिया हैं।
5. हमारे देश के कानून में इतना दम ही नहीं कि कोई आतंकी बच कर निकल जाये, ये कानून सदियों पहले अंग्रेजों के द्वारा बनाये गये थे, जो अंग्रेज अपने लिए बनाये थे ताकि इसका फायदा उठाकर वे विदेश चले जाये। इन्हीं कानूनों को कांग्रेसी सरकार ने यथावत् स्वीकार कर लिया, जिसका दंश हमारा देश आज भी झेल रहा हैं।
6. जो नेता, आपको सांप्रदायिक कहकर, आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें, उसे ही देश का सबसे पहला गद्दार माने, क्योंकि इनकी संख्या सुबाहु, मारीच की तरह बढ़ती जा रही है।
7. अपने घरों में महात्मा गांधी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, सरदार पटेल, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सरोजिनी नायडू, लक्ष्मीबाई आदि महानायकों व महानेतृयों के विचारों को सुने और सुनाये। अपने बच्चों को ये जरुर बतायें कि इस देश की प्राचीन संस्कृति क्या रही हैं। कैसे ये देश सदियों से हमलावरों का दंश झेलते रहा हैं, कैसे इसी देश के गद्दारों ने दूसरे देश के लोगों के साथ मिलकर भारत के स्वाभिमान को बेच दिया और कैसे इतनी दुर्घटनाओं का दंश झेलने के बाद भी भारत आज भी खड़ा हैं, जबकि इस देश में गद्दारों की कमी नहीं हैं।
8. अपने बच्चों को कायर न बनाएं, देशभक्त बनाएं।
9. वंदे मातरम् और भारत माता की जय को हृदयंगम करें। कुछ नेताओं को इन नारों से चीढ़ होती हैं, ये चीढ़ क्यों होती हैं, आप खुद समझ सकते हैं। इसलिए इन बातों पर ध्यान न दें।
10. महत्वपूर्ण ये नहीं कि कौन कितने दिन जीया, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन जीया, कैसे जीया। अंततः देश के लिए जीये और देश के लिए मरे।

Thursday, July 14, 2011

नेता पर लेख.............................


नेता एक दोपाया और खतरनाक जंगली जानवर होता है। मनुष्यों की तरह इसके भी दो आंख, दो कान, एक नाक और एक मुंह होते है, पर अपने दिमाग और पेट में रहनेवाले ज्वलनशील विचारों और कीटाणुओं के कारण ये आम आदमी से अलग हो जाता है। ये जानवर पूरे विश्व में अलग – अलग शक्लों में पाया जाता है और सभी जगह की जनता इनसे त्रस्त होती रहती है। ये वोट के चलते अपने देश को भी दांव पर लगा सकता है। इसका आवास संसद, विधानसभा और उनके पार्टी कार्यालय होते है। नेताओं के विचार से ओतप्रोत होकर, इनकी पत्नियां और इनके बेटे और बेटियां भी अनुप्राणित होती है, और देश की सामाजिक संरचना को चूहों और छुछुंदरों की तरह कुतरती रहती है। इनके जीवन का मुख्य उद्देश्य अपने देश की सम्मान को दूसरे देशों के आगे गिरवी रखना, अमरीका, स्विटजरलैंड, इटली तथा वेटिकन सिटी जैसे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के आगे ताता-थैया करना होता हैं और जो इनके खिलाफ बोल रहा होता हैं, उसे सांप्रदायिक और देशद्रोही करार देकर फांसी पर लटका देना ही मुख्य मकसद होता हैं। जो आंतकी इस देश के खिलाफ आग उगलते हैं, ये नेता उनकी आरती उतारनें में अपनी शान समझते हुए, अपने खानदानों और अपने दल के कार्यकर्ताओं को, उसके पक्ष में जय जयकार करने का नारा देने का प्रस्ताव भी रखता हैं।
अपने देश में फिलहाल ऐसे नेताओं की संख्या 90 से 95 प्रतिशत हैं। इन नेताओं के आगे पत्रकारों की टोली भी चल रही होती हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे जंगलों में शेरों के पीछे – पीछे सियारों और गीदड़ों की टोली चल रही होती हैं। जैसे शेर किसी का शिकार कर, अपना भोजन ग्रहण करने के बाद जूठन छोड़ देता हैं, फिर उस जूठन को सियार या गीदड़ खाते हैं, ठीक उसी प्रकार पत्रकारों का दल इन नेताओं के पीछे-पीछे चलकर खुद को अनुप्राणित कर रहा होता हैं। ऐसे दृश्य चुनावों के समय अथवा समय – समय पर बराबर दिखाई पड़ता हैं, पर किसी को इनके खिलाफ बोलने का अधिकार नहीं होता, क्योंकि इनके खिलाफ बोलने पर, इन नेताओं के द्वारा विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने का अधिकार भी मिला होता हैं, जिसका ये नेता बराबर सदुपयोग करता रहता हैं। अब तक लाखों – करोड़ों लोग, इन नेताओं के शिकार बन चुके हैं, और बनने को कुछ तैयार भी हैं, पर फिलहाल इस जानवर से बचने के लिए, न तो डाक्टरों ने किसी टीके का इजाद किया हैं और न ही आनेवाले समय में इनसे मुक्ति मिलने के आसार है।
नेताओं का पेट ----------------
नेताओं का पेट ही इनकी बड़ी विशेषता हैं – आप कोई भी गैरकानूनी काम करें, इसके पेट में आप मुंहमांगी रकम डाल दें, आप मुक्त हो जायेंगे। इनका पेट ऐसा हैं, कि कभी भी इनका भूख शांत नहीं होता, ये डाकघर की डाकपेटी के समान हैं, कि कभी भी इनका पेट भरता नहीं। आप लाख इन पर घोटालों का केस करे, भ्रष्टाचार का आरोप लगायें, इनका बाल बांका नहीं होता, थोड़ी दिन तक तो ये जेल जाता हैं, पर जल्द ही जेल से निकल कर शेखी बघारता हैं। उसका उदाहरण ये हैं कि आजादी के बाद से अब तक किसी नेता को सजा ही नहीं मिली, क्योंकि नेता कभी गलत हो ही नहीं सकता, क्योंकि वो नेता है।
आजादी से लेकर अब तक कई हास्य कवियों ने इन नेताओं पर चुटकियां ली, पर इन नेताओं पर, इसका असर नहीं दिखता, क्योंकि भगवान इन्हें फुर्सत के क्षण में विशेष रुप से बनाया होता हैं, इसलिए नेता को आप कुछ भी नाम दें, वो नेता ही रहता है। आजकल नेता बनने का दौर चल गया हैं, इसलिए इनकी जनसंख्या बढ़ रही हैं। हाल ही में हुए जनगणना के दौराऩ इनकी संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई हैं, इसलिए पार्टियों और नेताओं की संख्या भी बढ़ रही हैं, इन नेताओं पर परिवार नियोजन का भी असर नहीं पड़ रहा हैं, ताकि ये नियंत्रित हो सकें, लेकिन इन्हें नियंत्रित करने के लिए पूरे देश में एक नये तकनीक पर काम चल रहा हैं, जिस दिन वो तकनीक बन गयी, ये नेता भी नियंत्रित हो जायेंगे, ऐसा तकनीक बनाने में लगे, वैज्ञानिकों का दावा हैं।
वैज्ञानिकों का ये भी कहना हैं कि आगामी 2020 तक नेताओं को नियंत्रित करने के टीका का इजाद कर लिया जायेगा, तब तक आप नेताओं के जंगली व्यवहार का शिकार होने से बचने के लिए, खुद ठोस प्रयास करें, फिलहाल एड्स और कैंसर की तरह नेताओं के काट से बचने के लिए कोई दवा बाजार में उपलब्ध नहीं हैं।

निम्नलिखित प्रश्ऩों के उत्तर संक्षेप में दें ----------------------
क. नेता, मनुष्यों से कैसे अलग हो जाता है ?
ख. नेता वोट के चलते क्या – क्या कर सकता हैं ?
ग. नेताओँ के पेट की क्या विशेषताएं हैं ?
घ. वैज्ञानिकों ने क्या दावा किया हैं ?
ङ. पत्रकारों और नेताओं में क्या संबंध हैं, वो इन संबंधों को किस प्रकार निभा रहा होता हैं ?

Wednesday, June 29, 2011

काश! हमारे देश के नेता............

काश! हमारे देश के नेता गरीब होते,
वो दिन भर काम करने के बाद बीस रुपये कमा पाते,
उनके कम से कम एक बच्चे होते,
जिन्हें स्कूल भेजने का सपना होता,
वो कम से कम दिन में एक बार बाजार जाते,
बाजार जाकर, आटा, चावल, दाल और सब्जी लाते,
केवल आटा, चावल, दाल और सब्जी ही लाने में,
उनकी कमर टूट जाती,
तो फिर अखबारौं में हमें लगता हैं कि
आज जैसे विज्ञापन नहीं आते,
कि पाकिस्तान, नेपाल और बांगलादेश से भी कम रेट,
गैस सिलिंडरों के दाम भारत में हैं
मिट्टी तेल और डीजल के लिए आज भी अपनी सरकार सब्सिडी दे रही है,
कमाल ये भी हैं
कि भारत की जनता की कमाई अंकगणितीय ढंग से बढ़ती हैं
पर भारत के नेताओं की
कमाई ज्यामितीय प्रणाली सी बढ़ती हैं
एक नेता पांच साल में,
अपनी कमाई 200 से 1785 प्रतिशत तक बढ़ा लेता हैं,
पर हम आज तक ईमानदारी से,
दो जून रोटी भी ठीक से नहीं खा पाये,
ये कहते हैं कि अपने देश में लोकतंत्र हैं
पर ये लोकतंत्र सिर्फ,
इन्हीं के घरों में दिखता हैं,
इनकी बीवियां करोड़ों में नहाती हैं.
गरीबों की तो चिथड़ों में नजर आती हैं
पता नहीं बापू का लोकतंत्र कहां खो गया।
हम आज भी वहीं हैं,
नेता हमारा बहुत दूर निकल गया।
कोई ढूंढ कर ला दो,
मुझे वो गांधी,
जो लाठी लेकर चलता था,
चिथड़ों में दिखता था
अपना चेहरा उसमें नजर आता था,
हम खुश थे,
क्योंकि वो भी मेरे जैसा था,
पर आज तो अजब गजब हैं
जो नेता हैं,
खुद को गांधीवादी कहता हैं.
खूब टीप टॉप में रहता हैं
चम्मच कांटे से खाता हैं
पता नहीं क्या हैं य़े,
नेता का चक्कर की,
कुछ बनते ही,
बोलेरो से चलता हैं।
काश इस पर भी वे विज्ञापन लाते,
बताते कि उनके जीवन शैली का,
राज क्या हैं,
पर शायद ही ऐसा विज्ञापन दिखेगा,
ये नेता अपने ही लोगों को लहू पीयेगा,
झूठ बोलेगा,
अपने ही देशवासियों के धन से,
अपने परिवार को राजसुख देगा,
मरती रहे जनता अपनी बला से,
हम पैदा हुए हैं, राजभोगने को,
राज भोगेंगे।
दाम बढ़ायेंगे, महंगाई हमने थोड़ी बढाई
अमेरिकी ने कह दिया बढ़ा दी।
बाजार हमसे थोड़े ही नियंत्रित हैं,
इसका तो अंतर्राष्ट्रीय फंडा हैं,
केवल नामके हम मंत्री, प्रधानमंत्री हैं,
असली राजा तो विदेशों में बैठे हैं,
जिनके हम कठपुतली हैं।

Monday, June 20, 2011

बोलिये झोलझाल महराज की जय...........

(व्यंग्य)

धर्मप्रेमी सज्जनों,
आज बड़ा ही शुभ दिन है................ कि श्रीश्री मूर्खापीठाधीश्वर 420 जी महाराज स्वामी झोलझाल जी, हमारे बीच में हैं.........................। ऐसे तो झोलझाल जी महराज की कृपा हम सब पर सदा बनी रहती हैं, पर इधर कुछ दिनों से महराज जी रांची आकर, कुछ पल हमलोगों के बीच व्यतीत करना चाहते थे। इसलिए स्वामी झोलझाल जी सत्संग समिति ने निर्णय लिया, कि महराज जी को यहां बुलाकर, इस रांची नगरी को धन्य धन्य कर दिया जाय। चूंकि अब हम सभी पर झोलझाल जी महराज की कृपा बरस रही हैं। अब हम, झोलझाल जी की कृपापात्र शिष्या खटेश्वरी जी से निवेदन करेंगे कि अपना खटेश्वरी राग सुनायें और हम सब को अपने राग से अभिभूत करें.................. बोलिये खटेश्वरी माता की जय............
जय जय जय झोलझाल बाबा की, जय जय जय
जय जय जय झोलझाल बाबा की, जय जय जय
एक हाथ में कलम विराजे,
दूजे हाथ कैमरा साजे
सब के नाम डूबावे ये नटखट री. जय जय जय..................
सारे नेता गिरगिट जैसा नाचे
उद्योगपति छिपकली जैसा लागे
पत्रकार की शामत री, जय जय जय...................
घोटाला करत, भ्रष्ट सम लागत
चोर चुहार के भैया लागत
एक नंबर के दुष्टन जी, जय जय जय............
नेह लगाकर जो कोई बोले
झोलझाल जी के भजन जो गावै
उनकर जन्म सफल होरी, जय जय जय..........
देश विदेश में अरबों नर नारी
भ्रष्ट समाज के हैं रखवारी
स्विस बैंक के उपकारी, जय जय जय..............
प्रातः सायं जो नाम हैं लीन्हा
करोंड़ों अरबों रुपये पहुचीन्हा
डॉलर में वो खेलिन्हा, जय जय जय.............................
बोलिये प्रेम से मूर्खपीठाधीश्वर, झोलझाल महराज की जय
प्यारे धर्मप्रेमी सज्जनों, आपने बड़े ही प्रेम और शांतिपूर्वक से माता खटेश्वरी जी के मुखारविंद से ललित ललाम, श्री झोलझाल जी महराज के भजन सुनें, अब आप सभी से अनुरोध हैं कि स्वामी झोलझाल जी महराज के मुखारविन्द से प्रवचन सुने.................
सभी बोले....................
मूर्खों की जय जय, सदा रहे
मूर्खों की......................
अज्ञानी सदा अरे फले फूले
अज्ञानी......................
जो जो घोटाला करत रहेंगे
देश में उनकी जय जय करेंगे
करेंगे, उनका अभिषेक हम दिल से
मूर्खों की जय जय, सदा रहे
हे धर्मप्रेमी सज्जनों,
जरा आप सोंचों क्या आप सौ साल पहले थे, उत्तर होगा – नहीं
क्या सौ साल बाद जिंदा रहोगे, उत्तर होगा – नहीं
तो फिर देश की चिंता करने के लिए तुम ही बने हो, अरे मूर्खों, तुम अपना जीवन हमें यानी झोल झाल को समर्पित कर दों, सब ठीक हो जायेगा.................
और एक बार फिर बोलो
मूर्खों की जय जय सदा रहे
मूर्खों की.......................
अरे बंधुओं, सुनने में आया हैं कि दिल्ली में धमाल हो रहा हैं, कुछ लोग भ्रष्टों के खिलाफ, आमरण अनशन पर तुले है, ये तो मूर्ख और भ्रष्ट समाज पर हमला हैं। क्यां हमनें कभी किसी विद्वत और संभ्रांत, देशभक्त ईमानदार पर हमला किया, जो हम पर हो रहा हैं, कभी हमनें विद्वत और संभ्रात व्यक्तियों के खिलाफ आमरण अनशन किया। उत्तर होगा – नहीं तो फिर ये लोग हम मूर्खों और भ्रष्टों के खिलाफ क्यों आमरण अनशन कर, हमें धमकी देते रहते है। ये सरासर गलत हैं। अब हमनें सोचा हैं कि इनके खिलाफ हमलोग – मिलकर संसद में सदबुद्धिविनाशक यज्ञ करेंगे। हमें आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास हैं कि इस यज्ञ से देश की सारी जनता की सदबुद्धि नष्ट हो जायेगी और हमारे देश में एक सुंदर माहौल बनेगा, सभी घोटालायुक्त भारत बनाकर, देश का कल्याण करेंगे।
बोलिये झोलझाल महराज की जय
देखिये कितना सुंदर प्रवचन, हमारे स्वामी झोलझाल जी महराज ने दे दिया हैं, आशा ही नहीं, बल्कि आप सभी मिलकर स्वामी झोल झाल जी महराज के सपनों का भारत बनायेंगे। जिन्हें सदबुद्धिविनाशक यज्ञ में दिल खोलकर दान देना हैं वो कृपया बाबा झोलझाल के स्विस बैंक में खुले हुए खाते में अपनी राशि जमा करा दें ताकि बाबा और हम सब का सपना पूरा हो जाय। जो लोग सदबुद्धिविनाशक यज्ञ में शामिल होना चाहते है, वे अपना रजिस्ट्रेशन आज ही करा लें।
और अब सभी हृदय से बोले
स्वामी झोलझाल जी महराज की जय
फिलहाल बाबा झोलझाल जी, रांची प्रवास पर है, इसके बाद इनका भ्रमण सभी प्रदेशों में होगा। स्वामी झोलझाल जी सत्संग समिति के सदस्यों से विनम्र निवेदन हैं कि बाबा के कार्यक्रमों को अपने अपने प्रदेशों में सफल बनाने के लिए तन मन धन से जूट जाये, क्योंकि---


जो जितना योगदान करेगा, वो उतना ही सुख पायेगा
हृदय में बाबा झोलझाल को धारण कर, देश में एक भ्रष्ट वातावरण को तैयार कर, अपना और अपने परिवार का जीवन सफल करें।

Thursday, June 16, 2011

नक्षत्रों की दृष्टिकोण में मानसून........


पूरे देश में मानसून की चर्चा हैं, वैज्ञानिकों की मानें तो इस बार मानसून अच्छा रहेगा। भारतीय विद्वानों का समूह जो नक्षत्रों की भाषा समझता और जानता है, उसका भी मानना हैं कि इस बार नक्षत्र चमत्कार दिखायेंगे, पिछली बार इन नक्षत्रों ने भी दगा दिया था, पर इस बार ज्यादातर नक्षत्रों का समूह अच्छी वृष्टि की संकेत दे रहे हैं, आखिर ये नक्षत्र कब आयेंगे और इनका क्या लक्षण होगा। इस पर हमें विचार करना चाहिए। आज भले ही, आप मौसम विभाग के चक्कर काट लें और मौसम विभाग जिस प्रकार से आपको अपनी बात कह दें, आप उसे मानने को तैयार हो जायेंगे, ये कहकर कि, उसका वैज्ञानिक आधार हैं, पर आज से लेकर सैकड़ों साल पहले, ऐसी बात नहीं थी। किसानों और मानसून के बारें में जानने की इच्छा रखनेवाले लोगों का समूह, पंडितों और विद्वानों के पास पहुंचता था कि आखिर इस बार नक्षत्र क्या संकेत दे रहे हैं। पंडितों और विद्वानों का समूह इन नक्षत्रों की दशा और दिशा देखकर बता देता कि इस बार मानसून दगा देगा या अच्छी बारिश होगी, ये तो रही कल की बात पर, आज भी कमोवेश स्थिति यहीं हैं, जिन्हें थोड़ा बहुत भी नक्षत्रों की जानकारी है, वे पंडितों से पूछ ही देते हैं कि आखिर इस बार मानसून अथवा बारिश कैसी रहेगी। हमनें भी इन पंडितों से पूछने की कोशिश की है, उनका कहना हैं कि इस बार बारिश अच्छी होगी और उसके संकेत नक्षत्र दे चुके हैं। एक दो नक्षत्रों को छोड़, बाकी सारे नक्षत्र इस बार अच्छी वृष्टि के संकेत दे रहे है।
क. आद्रा -- 22 जून की रात 9.11 से प्रारंभ -- सुवृष्टि योग
ख. पुनर्वसु -- 6 जुलाई की रात 10.45 से प्रारंभ -- सामान्यवृष्टि योग
ग. पुष्य -- 20 जुलाई की रात 12.15 से प्रारंभ -- सुवृष्टि योग
घ. आश्लेषा –- 3 अगस्त की रात 12.53 से प्रारंभ -- सृवृष्टि योग
ङ. मघा – 17 अगस्त की रात 12.09 से प्रारंभ -- सामान्य वृष्टि
च. पूर्वाफाल्गुन - 31 अगस्त से की रात 9.30 से प्रारंभ -- सुवृष्टि योग
छ. उत्तराफाल्गुन - 14 सितम्बर को दिन में 3.59 से प्रारंभ – सुवृष्टि योग
ज. ह्स्त –- 28सितम्बर को प्रातः 7.15 से प्रारंभ –- स्वल्पवृष्टि योग
झ. चित्रा --- 11 अक्टूबर को रात्रि 7.38 से प्रारंभ –- स्वल्पवृष्टि योग

यानी हस्त जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में हथिया नक्षत्र कहते हैं, इस बार इस नक्षत्र में भारी बारिश या सामान्य बारिश की अपेक्षा कम बारिश होने की संभावना हैं, जबकि लोग बताते है कि हथिया की बारिश में तबाही हो जाया करती थी। इसी प्रकार उत्तरा नक्षत्र को कनवा नक्षत्र कहकर भी लोग संबोधित करते है। हमारे जनकवियों ने भी बारिश के बारे में खुलकर विचार दिया हैं और उनके विचार आज भी प्रासंगिक है......................... घाघा कवि को ले लीजिए, उन्होंने कहा हैं कि---
रेवती रवे मृगशिरा तपे,
कछु दिन आदरा जाये,
कहे घाघा जिन से,
श्वान भात न खाये.
यानी जिस कालखंड में रेवती रव गया और मृगशिरा नक्षत्र तप गया समझ लीजिये आदरा ऐसा झमझमाएगा और फसल इतनी अच्छी होगी कि कौआ भी अघा जायेगा। ये है हमारी संस्कृति और मानसून की सांकेतिक दृष्टिकोण और हमारे पूर्वजों की भाषा.

Monday, June 13, 2011

बहुत कठिन है, डगर पनघट की..................................

जमशेदपुर लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। करीब हर छोटी – बड़ी पार्टियों ने अपनी ओर से उम्मीदवारी तय कर दी है। जिन बड़ी पार्टियों के बड़े नेताओं को टिकट मिलनी थी पर टिकट नहीं मिल पाया, उन्होंने अपनी पार्टी के खिलाफ शंखनाद भी कर दिया है, और एक तरह से ये कहकर ताल ठोक दिया कि अपनी पार्टी से न सहीं, दूसरे पार्टी का दामन थामकर वे चुनाव लड़ेंगे पर लड़ेंगे जरुर। जबकि कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अन्दर ही अन्दर टिकट न मिलने से नाराज है और अपने प्रत्य़ाशी की कब्र खोदने में लगे है। दूसरी ओर ऐसी भी पार्टियां हैं जो कल तक गठबंधन धर्म की दुहाई दे रही थी पर आज गठबंधन को ताक पर रख, एक दूसरे के खिलाफ उम्मीदवारी तय कर दी। हालांकि ये उपचुनाव आम तौर पर फ्रैंडली होगा, पर चुनाव संपन्न होने और परिणाम आने के बाद माहौल फ्रैंडली ही रहेगा, ये कहना मुश्किल है, क्योंकि जीत तो पचा ली जा सकती हैं, पर हार पचा पाना किसी भी पार्टी के लिए मुश्किल ही होगा। आश्चर्य इस बात की है जो झामुमो गठबंधन धर्म का दुहाई दे रही थी और भाजपा से सहयोग की बात कर रही थी, सुधीर महतो के टिकट की घोषणा के साथ ही नये नये झंझावातों को झेल रही हैं। उन्हीं की पार्टी से कभी लोकसभा का रास्ता तय कर चुकी सुमन महतो, तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम चुकी हैं। आजसू जो झामुमो की ही देन है, उसने भी अपनी पार्टी से आस्तिक महतो को उतार दियाहै। इधर कांग्रेस से बन्ना गुप्ता की उम्मीदवारी तय हो जाने से प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू और उनका कुनबा पूरी तरह से गुस्से में है, ये अलग बात हैं कि वो खुलकर नहीं बोल रहा, पर इतना तो तय हैं कि यहां भी सब कुछ ठीक नहीं है। कांग्रेस को लग रहा था कि गठबंधन के नाते, झाविमो के लोग उसकी मदद करेंगे, तो यहां झाविमो ने अजय कुमार को उतारकर, कांग्रेस की एकतरह से कमर ही तोड़ दी हैं, ऐसे में फिलहाल भाजपा ही एक ऐसी पार्टी है, जहां विद्रोह की गुंजाईश कम दिखाई पड़ रही है, पर यहां भी सब कुछ ठीकठाक हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। कई ऐसे लोग हैं जो इस दौड़ में थे, पर टिकट नहीं मिलने से नाराज भी चल रहे हैं। कुल मिलाकर देखे, तो सभी जगह कुछ न कुछ अनबन है, और इसका परिणाम सभी पार्टियों को भुगतना पड़ेंगा।साथ ही ये भी तय हैं कि जमशेदपुर लोकसभा का चुनाव आनेवाले झारखंड की राजनीति की दशा और दिशा भी तय करेगा क्योंकि जो चुनाव जीतेगा, उसके हौसले बुलंद रहेंगे, साथ ही वो झारखंड में मजबूत स्थिति में होगा और जो हारेगा, उसकी स्थिति बहुत ही कमजोर होती जायेगी, क्योंकि इसका प्रभाव इस रुप में पड़ेगा कि हारनेवाली पार्टियों में भगदड़ की स्थिति होगी, जबकि जीतनेवाले अपने कुनबे को स्थिर और मजबूत करने की स्थिति में होंगे। शायद राजनीति केजानकार, इसीलिए इस चुनाव को झारखंड की दशा और दिशा से जोड़ रहे हैं। खुशी इस बात की हैं कि सभी पार्टियों ने अपनी उम्मीदवार जमशेदपुर की जनता के समक्ष उतार दिये है, अब जमशेदपुर की जनता के सामने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के विकल्प है, अब जमशेदपुर की जनता की भी परीक्षा हैं कि वो इतने विकल्पों में से किसे चुनती हैं, क्योंकि अब वो ये भी नहीं कह सकती कि उनके पास विकल्प नहीं था, आज उनके पास विकल्पों की भरमार हैं। देखतेहैं कि किसके माथे जीत का सेहरा और किसके माथे हार का ठीकरा फूटता हैं, तब तक नजर बनाये रखिये कि जमशेदपुर की जनता किसे संसद में भेजने के लिए राजी होती हैं।

Sunday, June 12, 2011

संतों को नमन..........................


संतों को नमन, जिन्होंने राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए, सारे काम काज छोड़ कर, भ्रष्टाचार के खिलाफ, सड़कों पर उतर गये। जिन्होंने राक्षस रुपी कांग्रेस गठबंधन केन्द्र सरकार के नाक में दम कर दिया। जिन्होंने दिल्ली के राष्ट्रीय चैनलों के पत्रकारों पर चढ़ा कांग्रेसी मुखौटा उतारकर फेंक दिया। जिन्होंने कांग्रेसियों द्वारा चलाये जा रहे दमन अभियान की परवाह नहीं की और पूरे देश के जनमानस में भ्रष्टाचार और विदेशों में पड़ें कांग्रेसी नेताओं और यहां के अन्य देशद्रोहियों के काले धन के खिलाफ, सभी के हृदय में बीजारोपण कर दिया, आप माने या न मानें पर कालांतराल में, ये बीज एक दिन वृक्ष बनेगा और फिर ये भारतीय जनता इन भ्रष्ट कांग्रेसियों और देशद्रोहियों को सबक सीखाने के लिए सड़कों पर उतरेगी और जब ये सड़कों पर उतरेगी, तो स्वयं को चालाक समझनेवाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहां होंगे, उन्हें इस बात पर ज्यादा चिन्तन करना चाहिए। रही बात कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, जनार्दन द्विवेदी, सुबोधकांत सहाय और पी चिदम्बरम जैसे अंगूलियों में गिने जानेवाले घटियास्तर के नेताओं की तो ये उस वक्त कहां होंगे, उन्हें खुद पता नहीं चलेगा।
इधर एक और बिहार के नेता लालू प्रसाद कुछ ज्यादा ही बोलने लगे है, वो लालू जिसने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सपनों का सत्यानाश कर दिया। बाबा रामदेव के खिलाफ घटिया स्तर का बयान देने लगा, मजाक उड़ाने लगा। यानी जो खुद आज मजाक बना हुआ हैं, वो मजकिया लहजे, में अलबल बक रहा है, वो भी रामदेव के खिलाफ। ये वे लालू है – जो जयप्रकाश आंदोलन के समय कांग्रेस के खिलाफ बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे, जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने एक समय बिहार के 54 लोकसभा सीट से किसी भी कांग्रेसी को दिल्ली जाने नहीं दिया था, आज सोनिया माता का हृदय से प्रतिदिन सोनिया जप करते है, कि वो किसी भी प्रकार से उन्हें उपकृत कर दें। वो लालू जो अपनी पत्नी और बेटे-बेटियों के अलावा किसी की सोचते नहीं, वो लालू जिसने चारा घोटाले, अलकतरे घोटाले, वर्दी घोटाले, यानी बिहार को घोटालों का प्रदेश बना दिया, आज बहुत बोलने लगे हैं, वो भी तब जब बिहार की जनता इन्हें लगातार, उनकी औकात बता रही हैं, तब। वो कहावत हैं न, रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया। ये इसी कहावत के फिलहाल सटीक उदाहरण बनते जा रहे हैं। खैर, इनकी मर्जी ये भाड़ में जाये, इनसे हमें और बिहार की जनता को क्या मतलब, ये सोनिया माता का आंचल और राहुल का कुर्ता पकड़कर सत्ता की वैतरणी पार करते रहे।
आज एक अच्छी खबर हैं, कि संतों के आग्रह पर, बाबा रामदेव ने अपनी नौ दिन पुरानी अनशन तोड़ दी। ये अलग बात हैं कि उनके अनशन तोड़ने पर भी कांग्रेसी और कांग्रेस समर्थित पत्रकार ये पूछने से बाज नहीं आ रहे कि केन्द्र ने तो उनकी बात नहीं मानी, फिर भी बाबा रामदेव ने अनशन तोड़ दिया, आखिर इस अनशन का क्या मतलब, ये तो बाबा रामदेव का सत्याग्रह झूठ निकला। इस बारे में मेरा कहना स्पष्ट हैं कि मूर्खों और बेशर्मों से सत्य से संबंधित सवालों को पूछा जाना और उनके उत्तर उनके द्वारा पचा पाने का आग्रह रखना मुर्खता के सिवा दुसरा कुछ नहीं। इसलिए मूर्खों और बेशर्मों के द्वारा इस मुददे पर पूछे जा रहे सवालों को जवाब देने के पहले सोच लीजिये कि सवाल पूछनेवाला कांग्रेसी और कांग्रेस समर्थित पत्रकार, दोयम दर्जे का राक्षस है। क्योंकि रावण भी राक्षस था, पर वो भी मर्यादित व्यवहार करता था, पर ये ऐसा राक्षस है कि कब क्या कर देगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिए ऐसे राक्षसों से हमें निरंतर लड़ते रहना हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभी जंग खत्म नहीं हुई। हमें इस लड़ाई को यहीं पर छोड़ना नहीं हैं, इसे तब तक जारी रखना हैं, जब तक विदेश में पड़े कांग्रेसियों और कांग्रेस समर्थित पत्रकारों, देशद्रोहियों के काले धन, अपने देश तक नहीं आ जाते। ये भी याद रखिये कि जब तक कांग्रेसी सत्ता में बने रहेंगे, ये काम पूरा नहीं होगा, इसलिए आनेवाले समय में जब भी चुनाव हो, इन सत्ता में बैठे देशद्रोहियों को हिन्द महासागर में फेंकने के लिए तैयार रहे। हो सकता हैं कि इस संघर्ष में ये कांग्रेसी आपको जान लेने की कोशिश करें, जैसा कि उसने बाबा रामदेव के साथ किया। आधी रात को उनके आंदोलन को कुचलने के लिए हजारों पुलिस के जवान लगा दिये। उनके आमरण अनशन को समाप्त कराने के लिए दिलचस्पी नहीं ली, ये सोचकर कि वो आमरण अनशन पर है, भूख से तड़प तड़प कर खुद ही मर जायेगा, और हमारे रास्ते का- कांटा भी निकल जायेगा, ऐसे में इस संन्यासी के आमरण अनशन को खत्म करने की क्या जरुरत….? सुना हैं, ये कांग्रेसी अब बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन का जवाब देने का मन बना रहे हैं, ये देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने की बात कर रहे हैं, यानी अब मच्छड़, पहलवान बनने की सोच रहा हैं। आईये इन मच्छड़ों की औकात बताये और देश में उठे भ्रष्टाचार के खिलाफ ज्वार को, इस आंदोलन के दीप को कभी भी बुझने न दें।
जय हिन्द।

Saturday, June 11, 2011

विनाशकाले विपरीतबुद्धि

शास्त्रों में एक बात आयी है – जिनको ईश्वर दुख देने को होते हैं – उनकी मति (ज्ञान) हर लेते है। शायद ये वाक्य सत्तारुढ़ कांग्रेस पर सत्य साबित होती है। दो साल पूर्व सत्ता में दोबारा आयी, इस सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी के नेताओं को लगता है – जनता ने उन्हें सदा के लिए सत्तारुढ़ होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया है और इसी मद (अहंकार) में चूर होकर, वो सब काम कर रही है, जिसे न तो धर्म इजाजत देता है और न ही सत्य (ईश्वर)। जबकि इस सरकार में शामिल सभी मंत्री ईश्वर की ही शपथ लेकर सत्ता का सुख भोग रहे है, पर इनके ज्ञान को देखिये कितनी निम्नस्तर की हो गयी कि इन्हें अभी तक पता ही नहीं चल पा रहा कि उन्हें आज की परिस्थितियों में क्या करना चाहिए।
फिलहाल ये एक संन्यासी से टकराने में अपना पुरुषार्थ समझ रहे है और सच पूछिये, तो उस संन्यासी से टकराने का खामियाजा उसे भुगतना भी पड़ रहा हैं पर उसे इसका अनुमान नहीं हो रहा, क्योंकि फिलहाल धृतराष्ट्रों की संख्या इस पार्टी में ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। मुझे एक बात समझ में नहीं आ रहा कि बाबा रामदेव ने भारतीयों के विदेशी काला धन को, भारत में लाने और भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की बात कहकर क्या गलत कह दिया, जो कांग्रेसियों को रास नहीं आ रहा। इससे तो बिहार में प्रचलित लोकोक्ति की याद आ रही है कि – चोर के दाढ़ी में तिनका। इसका मतलब हैं कि कांग्रेसियों के ही धन विदेशी खातों में जमा है, जिससे भयभीत कांग्रेसी नहीं चाहते कि वो काला धन, भारत में आये और यहां की जनता उन पर थू – थू करें।
हालांकि बाबा रामदेव के आंदोलन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान चालाकी भरा रहा हैं, जबकि उनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों और कांग्रेसी नेताओं का बयान अमर्यादित और संस्कारहीन आचरण को जन्मदेनेवाला रहा है। दूसरी ओर दिल्ली के विभिन्न राष्ट्रीय चैनलों ने तो हद कर दी है, वो तो फिलहाल इस दौड़ में शामिल हो गयी हैं कि कौन चैनल बाबा रामदेव को भ्रष्ट साबित करने में एक नंबर हैं ताकि कांग्रेसियों और सोनिया गांधी के द्वारा उपकृत हो सकें। मुझे तो इन चैनलों और ऐसे घटियास्तर के पत्रकारों की बुद्धि पर तरस आती है कि आखिर इनका आचरण इतना घटिया कैसे हो गया, पर चिंतन करने पर पता लगता है कि भला मुर्खों से विद्वता की अपेक्षा रखना भी, मुर्खता ही है।
जरा प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों और राष्ट्रीय चैनलों का बाबा रामदेव के आंदोलन के पूर्व का चरित्र और उनके आंदोलन को कुचलने के बाद के चरित्र को देखिये, पता लग जायेगा कि देशद्रोही कौन है। सबसे पहले रामदेव के आंदोलन के पूर्व का चरित्र पर ध्यान दीजिये ---------
1. प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल तथा कांग्रेस के सभी नेताओं का बयान, बाबा रामदेव के खिलाफ न होकर मर्यादित है, सभी चाहते हैं कि बाबा रामदेव आंदोलन पर न बैठे, उनके आमरऩ अनशन का आंदोलन किसी भी कीमत पर समाप्त हो, इधर राष्ट्रीय चैनल भी बाबा रामदेव को नायक के रुप में प्रदर्शित कर रहे हैं, सभी विदेशी काला धन को भारत में लाने की उनके आंदोलन को लेकर जय जयकार कर रहे हैं, परिचर्चा करा रहे हैं, सरकार को कटघरे में लाने का प्रयास कर रहे है. पर जैसे ही बात बनते बनते बिगड़ती है कांग्रेस अपना असली रुप अख्तियार करती है, कांग्रेस का साथ देने में राष्ट्रीय चैनल आगे आते हैं और फिर ये सत्तारुढ़ कांग्रेसियों के साथ सुर में सुर मिलाकर बाबा रामदेव के खिलाफ समाचार दिखाने का अभियान शुरु कर देती है, वो चैनल जिनकी हिम्मत नहीं थी बाबा रामदेव की आंखों में आंख डालकर बात करने की, वो उन्हें बाबा रामदेव से रामदेव और पता नहीं क्या क्या कह डालने में शेखी बघारते हैं।
और अब बाबा रामदेव के आंदोलन को कुचलने के बाद का चरित्र देखिये ------
जो कांग्रेसी और मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में शामिल मंत्री बाबा रामदेव के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलते थे। आग उगलने शुरु करते है। कांग्रेसी दिग्विजय सिंह को आगे करते है और ये दिग्विजय वहीं करता हैं जो सोनिया माता उसे पूर्व में सिखाये रहती है, वो सोनिया के चरणों में, सर्वस्व समर्पित कर, एक संन्यासी के खिलाफ विषवमन करता है और सभी चैनल दिग्विजय सिंह जैसे नेता को एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत अपने चैनल में प्रोजेक्ट कर, बाबा रामदेव के आंदोलन पर कीचड़ उछालते हैं।
2. जनार्दन और दिग्विजय सिंह जैसे नेता, इस आंदोलन को भाजपा और संघ द्वारा प्रायोजित करार देता है। दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो नेपाल और भारत के साथ चल रही मित्रता को भी आग में झोंक देना चाहता है, वो बालकृष्ण को नेपाली कहकर, संबोधित कर डालता है, बेशर्मी की हद तो ये है कि इस आड़ में देशभक्ति गीतों पर झूमनेवाली सुषमा स्वराज के चरित्र पर भी अंगूली उठाता हैं, वो दिग्विजय जिसमें छेद ही छेद हैं, वो कहावत हैं न कि चलनी दूसे, सुप के जिन्हें बहत्तर छेद।
3. इधर कुछ दिनों के बाद अपना गृहमंत्री को पता नहीं कहां से दिव्य ज्ञान हो जाता है, लगे हाथों वह भी अपना हाथ साफ करने लगता है, वो कहता हैं कि बाबा रामदेव के आंदोलन में भाजपा और संघ का हाथ है, पर यहीं गृह मंत्री को पता नहीं, उस वक्त दिव्य ज्ञान कहा चला गया था, जब इसके मंत्री, आंदोलन को कुचलने के पहले, बाबा रामदेव के आगे पीछे दौड़ लगा रहे थे। ये गृहमंत्री इतना नीचे गिरता हैं कि अपना गिरेबां न देखकर, बाबा रामदेव को ही भला बुरा कहते हुए, सारी मिशनरियों का दुरुपयोग करते हुए, बाबा के खिलाफ, वो हर प्रकार के कुकर्म करता हैं, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं और विभिन्न राष्ट्रीय चैनल, इस गृहमंत्री के आगे पीछे ठुमके लगाते हुए, वो खबरें दिखाता हैं, जो इस गृहमंत्री और कांग्रेसियों को पसंद होता हैं। ये हैं सत्तारुढ कांग्रेसियों और राष्ट्रीय चैनलों के चरित्र।
पर इसके विपरीत एक सामान्य संन्यासी, जिसे लोग बाबा रामदेव, संत रामदेव और पता नहीं क्या क्या नामों से संबोधित करते हैं। (जिन्हें मैं संत नहीं, बल्कि एक सामान्य व्यक्ति के अलग कुछ नहीं मानता) इस सतारुढ़ सरकार के नाक में ऐसा दम करता है – वो भी आमरण अनशन के माध्यम से कि इस सरकार की हालत सांप और छुछुंदर की तरह हो जाती है और लगे हाथों ये बयान प्रसारित करती हैं कि वो बाबा रामदेव के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन चलायेगी – बताईये ये कितना हास्यास्पद बयान है। एक सरकार, चुनी गयी सरकार, एक संन्यासी के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन चलाने की बात करें, तो उसे क्या कहेंगे। एक सामान्य निश्छल व्यक्ति से इसका जवाब पूछे तो ये ही कहेगा कि ये तो एक संन्यासी की शानदार जीत है, पर इस केन्द्र सरकार को कौन बताये कि उसने किस प्रकार अपना संचित सम्मान खो दिया है।
बाबा रामदेव पिछले आठ दिनों से आमरऩ अनशन पर है, केन्द्र सरकार को हिला कर रख दिया है, ये अलग बात हैं कि केन्द्र सरकार जिसको अपने सम्मान की चिंता नहीं, गलथेथरी बतिया रही हैं कि हम सही हैं, पर सच्चाई क्या हैं, सभी जानते हैं पर राष्ट्रीय चैनलों की गलथेथरी देखिये – वो बाबा रामदेव के अनशन पर ही सवाल उठा रही हैं कि बाबा ने ग्लूकोज ले लिया हैं तो भला अनशन कैसा। अनशन तो टूट गया। अरे बेशर्म पत्रकारों, तुम्हें पत्रकार किसने बना दिया, क्यूं कांग्रेसियों और सरकार के तलवे चाटने में समय जाया कर रहे हो, कम से कम, सच तो बोलों, नहीं तो जान लो, इन कांग्रेसियों और सरकार को तो आनेवाले समय में जनता सबक सिखायेंगी ही, तुम्हें भी तुम्हारी औकात बतायेगी। फिर तुम्हारे टीआरपी का क्या होगा, तुम जब जनता की नजर में गिरोगे तो क्या फिर उठ पाओगे, क्यों विनाशकाल की ओर आगे बढ़ रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी विपरीत बुद्धि तुम्हें विनाशकाल की ओर ले जा रही हैं।

Tuesday, June 7, 2011

इन पत्रकारों और उन कांग्रेसियों को चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए...........................


इन पत्रकारों और उन कांग्रेसियों को चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए, जो देशभक्ति गीत पर नृत्य कर रही सुषमा स्वराज के चरित्र पर अंगूली उठाती है। कई चैनलों किस किस की बात करुं, वो सुषमा स्वराज के नृत्य पर ठुमके का प्रयोग कर रही है। कांग्रेसियों का चरित्र ही क्या हैं, वो तो मैं जानता हूं, वो तो अपनी मां – बहनों की कितनी इज्जत करते हैं, वो हम सब जानते हैं, इसलिए वो सुषमा स्वराज के बारे में, जनार्दन और दिग्विजय जैसे घटिया स्तर के नेता क्या बोलेंगे, हमें पता हैं। पर जरा इन पत्रकारों को देखिये – ये सुषमा स्वराज पर पिल पड़ें हैं, लगे उन्हें चरित्र का पाठ पढ़ाने। जैसे लगता हैं कि सुषमा स्वराज ने बहुत बड़ा पाप कर दिया हो, अरे मूर्खों तुम्हें क्या पता कि
ये देश हैं वीर जवानों का,
अलबेलों का मस्तानों का,
इस देश का यारों क्या कहना,
ये देश हैं, दुनिया का गहना........ पर इठलाने का क्या आनन्द है।
अरे कांग्रेसियों के तलवे चाटनेवालें पत्रकारों - देशद्रोहियों तुम्हें तो वंदे मातरम गाने से चिढ़ है, तुम क्या जानों की देशभक्ति गीतों पर थिरकने का क्या मतलब होता है। तुम्हें तो देशभक्ति गीतों पर थिरकना और शीला की जवानी जैसे गीतों पर डांस करना दोनों एक जैसा लगता हैं, ये तुम्हारे मानसिक दिवालियापन का घोतक है।
इधर दिल्ली के पत्रकारों की मर्दानगी देखिये, बड़े बड़े चैनलों के पत्रकार, उस व्यक्ति पर हाथ साफ करने लगे थे, जिसने प्रेस कांफ्रेस के दौरान, कांग्रेस द्वारा प्रायोजित संवाददाता सम्मेलन में, जनार्दन को जूते दिखाये थे। अरे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सारा हिन्दुस्तान कांग्रेसियों को जूते दिखाने को बेताब है। तुम दिल्ली में बैठे, कांग्रेस का तलवा चाटनेवाले पत्रकारों क्या जानो। जिस प्रकार से तुम पत्रकारों ने उस व्यक्ति पर हाथ छोड़ा, क्या तुमने कानून को हाथ में नहीं लिया। क्या तुम पत्रकारों को कानून हाथ में लेने की छूट है, अरे दिग्विजय और जनार्दन के सुर में सुर मिलानेवाले पत्रकारों, तुम्हें लज्जा नहीं आती, अरे कांग्रेस तो आज हैं, चली जायेगी, जिस देश का अन्न खाते हो, उसके प्रति तो ईमानदार बनो, पर तुम बनोगे कैसे, तुमने तो कांग्रेस और विदेशी ताकतों के पैसे से अपना तन – मन सब बेच रखा हैं, तुम क्या जानो कि देशभक्ति क्या चीज है। तुम जो कर रहे हो, करते रहो, देश की करोड़ों जनता देख रही हैं कि दिल्ली के पत्रकारों ने कैसे अपना जमीर कांग्रेसियों और विदेशी ताकतों के हाथों गिरवी रखा हैं, एक दिन करोंड़ो भारतीय जगेंगे और तुम जैसे तथाकथित लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से बदला लेंगे। वो दिन दूर नहीं, फिलहाल कांग्रेसियों के तलवे चाटते रहो, और विदेशी ताकतों के आगे सर झूकाकर गुलामीगिरी करते रहो।

ऐसी हरकतें सिर्फ कांग्रेसी ही कर सकते हैं............

संदर्भ --- बाबा रामदेव प्रकरण
सारा देश जानता हैं कि विदेशों में जो काला धन है, वो काला धन किस पार्टी का है और उस काला धन को संरक्षित करने में कौन सी सरकार ज्यादा दिमाग लगाती है। ऐसे में उस काला धन के खिलाफ जो भी आवाज उठायेगा, उसका हश्र क्या होगा। वो बाबा रामदेव के साथ जो आज आधी रात को कांग्रेसी सरकार ने किया, उससे सभी को सीख लेनी चाहिए। आप गुंडों और अपराधियों के घर के पास जाकर, कहो कि तुम गुंडे और अपराधी हो, ऐसे में वो गुंडा या अपराधी, गांधीवादी तो हैं नहीं कि आपको मिठाई खिलाकर अथवा फूल मालाओं से लादकर विदा करेगा, अरे वो तो वो कुटाई करेगा कि आप जिंदगी भर याद रखेंगे। वहीं कुटाई कांग्रंसियों और उसकी सरकार ने रामदेव के साथ कर दी, तो इसमें आश्चर्य कैसा, ये तो होना ही था, ये तो कांग्रेस का चरित्र ही है। जब भी देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठी, उस भ्रष्टाचार के खिलाफ उठनेवाली आवाज को कांग्रेंसियों ने बखूबी बंद किया। क्योंकि ये सशरीर भ्रष्टाचार रुपी नदीं में प्रतिदिन डुबकी लगाते हैं, नहीं तो जरा इनसे पूछो कि इनके पास जो ज्यामितीय प्रणाली से धन बढ़ते हैं, उसका राज क्या हैं।
कांग्रेसियों के घटियास्तर के चरित्र से देश को कितना नुकसान हो रहा हैं, उससे इन्हें क्या मतलब, ये तो देश भाड़ में जाय, खुद अरबों की संपत्ति इकट्ठा कर परम सुख पाते हुए, इस दुनिया से चल जाना चाहते हैं, ये कहकर की देश की आजादी हमारे लोगों ने लड़कर दिलायी हैं तो इसका फायदा, ब्याज सहित प्राप्त करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जो इसका विरोध करेगा, वो झेलेगा।
बाबा रामदेव पर हमले कराना, बाबा रामदेव के आंदोलन व आमरण अनशन की धार को कुंद करने के लिए जनार्दन व्दिवेदी के प्रेस कांफ्रेस में एक सुनियोजित साजिश के तहत एक व्यक्ति द्वारा जनार्दन पर जूते फेंकने का नाटक करवाना, और इस घटना के लिए भाजपा और आरएसएस को दोषी ठहराना और इसके बाद रामदेव के चल रहे आमरण अनशन से देश और मीडिया का ध्यान बटवाना, इऩका बाये हाथ का खेल है। आजादी के बाद से लेकर, ये तो यहीं सब किये हैं। दिल्ली के मीडिया में, हैं किसी की हिम्मत जो कांग्रेसियों के इस चरित्र को नंगा करके दिखायें, जो उसके खिलाफ बोलेगा, कांग्रेसी साम दाम दंड भेद के द्वारा उसकी बोलती बंद करेंगे। यहीं कारण हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार के नाम पर जितने भी आंदोलन हुए, उसका फलाफल य़े हैं कि मीडिया कांग्रेसी नेताओं के तलवे चाटने में ही ज्यादा रुचि दिखायी, उसका सुंदर उदाहरण लोकनायक जयप्रकाश आंदोलन के बाद की इंदिरा की राजनीति है। मैं ये नहीं कहता कि देश के सभी मीडिया हाउस और पत्रकार कांग्रेसियों के हाथों के कठपुतलियां हैं, पर इतना जरुर कह सकता हूं कि ज्यादातर ऐसे ही हैं।
कांग्रेस में एक नेता है – दिग्विजय सिंह, उसे मध्यप्रदेश की जनता ने जब से मुख्यमंत्री पद से हटाया, वो पागल सा हो गया है। उसका पागलपन इसी से सिद्ध होता है कि वह लादेन के लिए, सम्मानजनक सूचक शब्द का प्रयोग करता हैं, और बाबा रामदेव को महाठग करार देता है। मुख्यमंत्री पद खोने के बाद, उसे आरएसएस और भाजपा के भूत दिन-रात, सुबह-शाम दिखाई पड़ते हैं, उसका वश चले तो ये भी कह दें कि ओसामा बिन लादेन को मारने में भाजपा और आरएसएस का ही हाथ हैं, वो कुछ भी कह सकता हैं और ऐसे पागलों को कभी कभी कांग्रेसी, उनका व्यक्तिगत बयान मानकर पिंड भी छुड़ा लेते हैं, पर जब सोनिया माता पर बन आती है, और सोनिया माता के पक्ष में जब इसका बयान कांग्रेसियों को लगता हैं कि सही है तो इसकी लंगोटी को पकड़ने के लिए, सभी कांग्रेसी राग यमन गाने लगते है। ये हैं कांग्रेसियों का चरित्र। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि देश में लोकतंत्र को गर खतरा है तो इन कांग्रेसियों से। इन्होंने देश का सत्यानाश करने का ठेका ले रखा है और इसके खिलाफ एक जोरदार आंदोलन की जरुरत है और वो आंदोलन एक दिन अवश्य होगा। कांग्रेसियों को हिन्द महासागर में फेंकने के लिए एक और लोकनायक को जन्मलेना होगा।
ऐसे मैं बता दूं कि रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु किये गये आंदोलन अथवा विदेशों में पड़े भारतीयों के कालेधन को भारत लाने की मांग का मैं भी समर्थक हूं, पर उनके आंदोलन की कड़ी आलोचना करने में मैं पीछे नहीं हटता, क्योंकि वे खुद अपने को संत बताते हैं, योगगुरु बताते हैं पर शायद उन्हें पता नहीं कि संतों अथवा योगगुरु का काम, आंदोलन करना नहीं, बल्कि आंदोलन करवाना है। चाणक्य खुद लड़ा नहीं, बल्कि चंद्रगुप्त को पैदा कर वो काम करा लिया, जो वो चाहता था। महर्षि विश्वामित्र चाहते तो, खुद सुबाहु मारीच और ताड़का को मार सकते थे पर उन्होंने ऐसा किया नहीं, बल्कि उन्होंने दशरथ पुत्र राम और लक्ष्मण को इसका श्रेय दिया। पर रामदेव तो संत हैं नहीं कि उन्हें इसका भान हो अथवा कोई उऩ्हें बता दें कि ऐसा करें और वो मान ले। वो तो शत प्रतिशत उदयोगपति और राजनीतिज्ञ है, और जैसा कि एक उदयोगपति अपना उद्योग लगाने के लिए अथवा राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति चमकाने के लिए तेला – बेला करता हैं, वो भी कर रहे हैं, ऐसे भी इसमें गलती क्या हैं, सबको अपने अपने ढंग से जीने का अधिकार हैं, बाबा को सबको मूर्ख बनाने और अपना जय जयकार कराने में मजा आता हैं, और उनके अनुयायियों को भी मूर्ख बनने में परम आनन्द की प्राप्ति होती हैं तो गलत क्या हैं। खैर, हम इस पचड़ें में पड़ना भी नहीं चाहते।
पहले आंदोलन की बात ----------------
क्या ये सही नहीं कि बाबा रामदेव ने दिल्ली प्रशासन से झूठ बोला कि वो दिल्ली के रामलीला मैंदान में योग शिविर लगायेंगे और योग शिविर के नाम पर लगे हाथों सत्याग्रह और आमरण अनशन की धमकी दे डाली। क्या ये रामदेव के दोहरे चरित्र का भान नहीं कराता। जो संत अपने समर्थकों को दिल्ली में बुला लें और चुपके से दिल्ली की केन्द्र सरकार के मंत्रियों के साथ बैठक कर अपने आंदोलन पर डील कर लें, फिर डील तोड़ने का नाटक करें और अपने समर्थकों को फिर आंदोलन के नाम पर भड़काने का काम करें, क्या ये एक संत का चरित्र हो सकता हैं और इस प्रकार के लोगों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन क्या मूर्तरुप ले सकते हैं। उत्तर होगा – कभी नहीं। आप ऐसा कर, भीड़ इक्ट्ठी कर सकते हैं, पर एक सफल आंदोलन नहीं कर सकते, क्योंकि आपके आंदोलन में ही खोट हैं। विदेश में पड़े भारतीयों के काले धन पर चलाये गये बाबा रामदेव के इस आंदोलन से, बाबा रामदेव के असली चरित्र का भान शायद भारतवासियों को हो चुका हैं, और जो कुछ बचा हैं, वो धीरे – धीरे इनके द्वारा कालांतराल में जब कभी आंदोलन चलाया जायेगा, लोग पूरी तरह से जान लेंगे।
कुछ बातें कांग्रेसियों से ----------------
जब बाबा रामदेव का आंदोलन, गलत था। रामदेव और उनके समर्थक गैर कानूनी ढंग से आंदोलन स्थल पर आ डटे, तब उनसे किस आधार पर बात करने की केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने पहल की। क्या ये गलत नहीं था और जब सरकार ने बात कर ली, सारे बात बाबा रामदेव के मान लिये, तो चुपके से आधी रात को जब सारे के सारे सत्याग्रही सोये थे, तो किस पुरुषार्थ को आधार बनाकर, वहां लाठियां चला दी, आंसू गैस के गोले छोड़ दिये, ये तो केन्द्र सरकार को अपनी बात जनता के समक्ष रखनी ही चाहिए, पर कांग्रेसी सरकार ऐसा करेगी, हमें नहीं लगता। क्योंकि महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान आत्माओं के सपनों का गला घोंटनेवाली इस निकम्मी और कायर सरकार से देश की ज्वलंत समस्याओं और विदेश में पड़े भारतीयों के काले धन को, स्वदेश लाने की कल्पना करना बेमानी और मूर्खता है।
भले ही रामदेव में लाखों दुर्गुण हो, पर ईश्वर ने उससे इतना काम जरुर करा लिया हैं कि उसके द्वारा जनता को मैसेज जरुर गया हैं कि जनता जगे। खासकर विदेशों में पड़े भारतीयों के काले धन को लेकर। देश का पैसा, कांग्रेसियों और देश के करोड़ों भारतीयों के सपनों का गला घोटनेवाले कुछ चंद लोगों ने विदेशों में जमा कर रखा है। आज इसकी शुरुआत हुई हैं, ये आंदोलन और भड़केगा, हो सकता हैं कि कुछ वर्षों तक ये आंदोलन ढीला भी पड़ जाये, पर यकीन मानिये कि एक न एक दिन करोंड़ों भारतीयों का सपना पूरा होगा, और विदेशों में पड़ें चंद लोगों के काला धन भारत आयेगा और फिर इससे देश एक नये कीर्तिमान को गढ़ेगा, क्योंकि कोई भी घटना जब घटती हैं तो जब तक उसका परिणाम नहीं आ जाता, वह कालांतराल में विभिन्न रुप लेकर आपके सामने घटती रहती हैं, इसलिए विदेशों में पड़े भारतीयों के काले धन पर अब जनता ने करवट लिया हैं, इसका परिणाम जरुर निकलेगा।
बाबा रामदेव को भी चाहिए कि उनके पास जो अकूत संपति हैं, उस संपत्ति को भी देश के हवाले कर दें, ठीक वैसे ही जैसे कि कई संतों ने देशहित में अपने शरीर तक को त्याग दिया। गर रामदेव को उस संत का भान नहीं तो मैं बता देता हूं, उनका नाम था – दधीचि। वो इसलिये, कि आप खुद धन बनाने के चक्कर में विभिन्न स्थानों पर योगशिविर लगा रहे हो, और दूसरों से कह रहे हों कि विदेशी काला धन स्वदेश आये, ये दोहरा चरित्र है। ये भी चोरों के लक्षण है। क्योंकि कबीर की पंक्ति हैं-------------
साई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय,
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय

पर पता नहीं आपको कितना धन चाहिए, कब आपकी धन कमाने की भूख मिटेगी, कब आप बड़बोले बनने से बचेंगे, हमें इसका कोई प्रत्य़क्ष प्रमाण नहीं दीखता और यहीं संत और असंत के विभेद का बहुत बड़ा कारण हैं।
पहले आप शत प्रतिशत संत बनिये, क्योंकि अभी आप संत नहीं, एक चालाक नागरिक हैं, जो बहुत ही चालाकी से, वो सब कुछ किये जा रहा, जिसका ज्ञान सामान्य जन को नहीं हैं, और जिस दिन ये सामान्य जन आपकी चालाकी को जान जायेगा, आप पूरी तरह से समाप्त हो जायेंगे, फिर आप दिल्ली में मजमा लगाने की कोशिश करेंगे भी तो लोग विश्वास नहीं करेंगे, जैसा कि आज देखने को मिला हैं। धन्यवाद।

Thursday, June 2, 2011

चला रामदेव हीरो बनने..........

पने देश में एक रामदेव है, जिन्हें कई लोग बाबा रामदेव, योगगुरु रामदेव, संत रामदेव और पता नहीं क्या क्या, विभिन्न नामों से पुकारते है। ये स्वयं को क्रांतिदूत कहलाने में भी फक्र महसूस करते है। इन दिनों इनकी खूब चर्चा है और वो चर्चा है – विदेश में जमा भारतीय काले धन को, देश में लाने के नाम पर आंदोलन करने और आगामी 4 जून से देशव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन करने के ऐलान के कारण। इस ऐलान से सुना हैं कि देश की लोकतांत्रिक केन्द्र सरकार के मुखिया भी हिल गये है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें पत्र लिखकर, उनसे आमरण अनशन न करने की अपील की है। रामदेव ने भी, प्रधानमंत्री के इस मार्मिक अपील से वशीभूत होकर, प्रधानमंत्री पद को लोकपाल से मुक्त करने की बात कहीं है।
हम आपको बता दें कि देश में आज तक ऐसा कोई संत नहीं हुआ। जिसने बाबा रामदेव की तरह, प्लानिंग के तहत, ऐसा काम किया हो, जिसे पूरे संत समाज का सर झूक जाये। एक नहीं, अनेक संत, कितने का नाम लूं। गुरुनानक, रविदास, नामदेव, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, अगर नाम जूड़वाने लगे तो दस पेज, ऐसे संतों के नाम लिखवाने में खर्च हो जायेंगे, पर इतना मान लीजिये कि किसी योगी ने, इस प्रकार से भारत के विभिन्न शहरों में जाकर योग के नाम पर दुकानें नहीं खोली और न चलायी, जो इन्होंने किया है और इन दुकानों से इनकी चांदी भी हो रही है। एक तो रांची में ही संत योगानन्द जी का आश्रम है जो बताता हैं कि संत और संत की गरिमा क्या होती है।
आजकल सारे इलेक्ट्रानिक मीडिया और अखबारों में इनका महिमामंडन हो रहा हैं, जाहिर हैं कि इनके महिमामंडन होने से पूरे देश के लोगों की नजरें इन पर आ टिकी है। ( उन इलेक्ट्रानिक मीडिया और अखबारों के द्वारा महिमामंडन हो रहा हैं जो पिछले कई वर्षों से आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित साईबाबा के खिलाफ खूब विषवमन करते थे, अनाप शनाप दिखाया करते थे, पर जैसे ही उनका स्वर्गवास हो गया, उनका यशोगान करना शुरु कर दिया, और लगे हाथों अपनी गलतियां सुधारने लगे, साई बाबा से संबंधित सकारात्मक खबरों को दिखाने लगे। यहीं नहीं ये वे इळेक्ट्रानिक मीडिया, उनकी जय – जयकार कर रहे हैं, जो पैसे लेकर कभी – कभी दो नंबर के संतों को, विज्ञापन के रुप में प्रोजेक्ट कर, उन्हें महान संतों की श्रेणी में लाने का कुत्सित प्रयास करते हैं) खैर, शेर की खाल में जब भेड़िये होंगे तो समाज और देश का क्या होगा, जगजाहिर है।
फिलहाल केन्द्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है और इस सरकार के मुखिया, यूपीए गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा उपकृत और मनोनीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, ये वे ही करते है जो उन्हें कहा जाता है। इसलिए बेचारे के बारे में मैं क्या बोलूं......। फिलहाल इन्हें किसी ने कह दिया होगा कि रामदेव के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से सरकार की सेहत पर असर पड़ेगा, उन्होंने रामदेव के आगे अपनी झोली फैला दी। बेचारे रामदेव कहां चुप रहनेवाले थे, संत हैं और संत तो कुछ न कुछ देते हैं, कह दिया कि प्रधानमंत्री सम्मानित और गरिमा वाला पद हैं, इसलिए इस पद को लोकपाल से मुक्त रखना चाहिए, पर ये भी कह दिया कि वे आमरण अनशन के निर्णय पर अडिग हैं।
ये निर्णय का ऐलान करना उऩ्हें जरुरी भी था क्योंकि सारी मीडिया, वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी बिना विज्ञापन के उनकी जयजयकार करने, उन्हें महानायक बनाने पर तुली हो तो क्यों न इसका पूरा पूरा लाभ उठा लिया जाय, क्योंकि ये ही वो मीडिया हैं, जिसने बिना किसी विज्ञापन के अन्ना हजारे को हीरो बना दिया था और सरकार झूक गयी थी तो वो तो रामदेव है। इस देश में कई भ्रष्टाचार में लिप्त और सरकार को करोड़ों का चूना लगानेवाले उदयोगपति और राजनीतिज्ञ उनके चेले हैं, जिनकी कृपा से उन्होंने खुद इतना धन इकट्ठा कर लिया हैं कि उतनी संपत्ति देश में शायद ही, किसी तथाकथित संत के पास होगी।
हमारे विचार से संत का शाब्दिक अर्थ हैं --- स+अन्त यानि जो समस्याओं का अंत करें, वो संत। जो समस्याओँ को बढ़ा दे। वो संत कैसे हो सकता हैं। भ्रष्टाचार और देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में सत्याग्रह और आमरण अनशन का विशेष महत्व था। अंग्रेजी सरकार, इससे झूकती थी, क्योंकि एक बहुत बड़ा चरित्रवानों का समूह इन आंदोलन के पीछे रहता था, पर आज की जो स्थिति हैं, उसे देखकर हमें हंसी आती है। हमनें बाल्यकाल से लेकर अभी तक कई पुस्तकें पढ़ी हैं, सभी में सत्याग्रह और आमरण अनशन का जिक्र है, गांधी का सत्याग्रह तो अनुरकरणीय है। गांधी ने कह दिया कि फलां तारीख से वे सत्याग्रह पर है और सत्याग्रह शुरु। न किसी पंडाल की जरुरत और न किसी से उनके साथ रहने का आग्रह और न ये ढिंढोरा पिटवाने की जरुरत कि वे आंदोलन पर जा रहे हैं, पर जरा आज देखिये क्या हो रहा है ----------
रामदेव के इस तथाकथित आंदोलन पर नजर डालिये। एक अखबार ने लिखा हैं कि
दिल्ली के रामलीला मैदान में ढाई लाख वर्ग फुट का पंडाल बन रहा हैं, उस पंडाल में मच्छड़ न रहे, इसके लिए फोगिंग मशीन लगायी गयी है। एक लाख आरओ वाटर का इंतजाम किया गया हैं। 1000 शौचालय बनाये जा रहे है। 40 बेड का वातानूकूल आईसीयू, 3000 वर्ग फुट का चार मंच बनाया जा रहा है। इनकी सुरक्षा में 500 दिल्ली पुलिस के जवान लगाये जा रहे हैं। पांच बड़े एलसीडी स्क्रीन लगेंगे। यानी पूरे आंदोलन को हाईटेक करने की कोशिश की जा रही है। यानी भ्रष्टाचार रोकने के लिए, कालेधन को देश लाने के लिए, ये सब किया जा रहा है, वो भी कोई रामदेव के द्वारा।
जब मैं ईटीवी में था। तब धनबाद में मुझे ईटीवी में सेवा देने का मौका मिला। उस दरम्यान, ये रामदेव, धनबाद आये थे। और वहां के चनचनी कालोनी में एक बहुत बड़े धनाढ्य के घर में उनका प्रवास हुआ था। बड़े – बड़े उद्योगपतियों जो पांच लाख रुपये दे सकते थे, आराम से मिलते, उनके आश्रम को पैसे देने के लिए जीजान से जूटते वो भी उनके साथ खूब गप्पे लड़ाते, आनन्दित होते। एक दिन प्रेस काँफ्रेस हुआ था, उसी चनचनी कालोनी में, उसी धनाढ्य के घर में, मैं भी गया था, देखा कि सारे पत्रकार, उनके साथ फोटो खिचाने के लिए बेताब थे, जैसे कि गर उनके साथ फोटों नहीं खिचाया तो जीवन ही बर्बाद हो जायेगा, ऐसी स्थिति थी। पर मैं इन सबसे अलग रहता हूं क्योंकि पता नहीं क्यूं। घर के हालात या माता पिता द्वारा दिया गया संस्कार अथवा वो श्लोक जो बार बार मेरे कान में गूंजते हैं – अधमा धनं इच्छन्ति, धनं मानं च मध्यमा, उत्तमा मानं इच्छन्ति, मानो हि महता धनम्।। रामदेव मुझे प्रभावित नहीं कर सकें। क्योंकि मैंने कई संतों के बारें में पढ़ा हैं, जिन्होंने धन के पीछे, यश के पीछे भागा नहीं, वे तो निरंतर, मानव निर्माण में लगे रहते हैं, क्योंकि मानव निर्माण हो गया तो फिर समाज और देश बनने बनाने में कितना समय लगेगा। पर यहां तो एक संत द्वारा एक ऐसे पेड़ बोने की कोशिश की जा रही हैं, जिससे सदाचार फैले, पर उस सदाचार वृक्ष को रोपने में जड़ में पानी न देकर, उसके शिखाओं पर पानी देने की कोशिश हो रही हैं और इस कोशिश में सभी प्रयास कर रहे हैं। कोई गांव-शहर में जाकर मानव निर्माण का कार्य, संस्कार व चरित्र निर्माण का कार्य नहीं कर रहा। सभी पतली गली से राजनीतिक सफर तैयार करने में लगे हैं, एक देख रहा हैं कि जब योग के झांसे से पूरा देश उसके साथ हो गया और भ्रष्टाचार के नारे सें पूरी दिल्ली हिल गयी तो फिर प्रधानमंत्री का पद कितना दूर हैं। दूसरा देख रहा हैं कि बंदूक की गोली से सत्ता हथियाने में अब ज्यादा दूर हैं कहां, कई बुद्दिजीवी प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से उन्हें समर्थन दे ही रहे हैं तो फिर दिक्कत कहां हैं, इस नाहक कमजोर केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकने में कहां दिक्कत हैं, मौका मिलते ही, उखाड़ फेंकेंगे और भारत के गर्दन को जब चाहे, जब तोड़ मरोड़ देंगे और चीन के हाथों सौंप देंगे। दिक्कत कहां हैं।
कमाल है, जिस सरकार को जनता चुनती है, वो सरकार का मुखिया, एक योग के नाम पर झांसा देनेवाले के आगे झूकता हैं, चार – चार मंत्रियों को दिल्ली एयरपोर्ट भेज देता हैं, जैसे कि किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष, उससे मिलने आ रहा हो। उस प्रधानमंत्री से देश के विकास और सम्मान की आशा की जा सकती हैं। इस देश में लोकतंत्र हैं या तथाकथितयोगतंत्र। हमें तो लगता हैं कि इस देश की कोई मर्यादा ही नहीं और न ही कोई गरिमा है। सभी अपने अपने ढंग से इस देश का सत्यानाश करने में लगे है। भ्रष्टाचार क्या कोई बकरी का बच्चा है, दौड़ा और पकड़ लिया, क्या रामदेव में हैं ताकत कि वे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा दें। अगर नहीं तो इस प्रकार का नाटक क्यो, इससे किसका फायदा होगा और किसका नुकसान। ये तो योग के नाम पर झांसा देनेवाले रामदेव को तब पता चलेगा जब वे मृत्युशैय्या पर पड़ें होंगे, क्योंकि वे सब को धोखा दे सकते हैं, अपनी आत्मा को नहीं।
ऐसे भी इस देश का कौन ऐसा चरित्रवान व्यक्ति होगा, जो विदेशों में पड़े अपने देश के काले धन को लाना नहीं चाहेगा, कौन ऐसा चरित्रवान व्यक्ति होगा जो भ्रष्टाचार मुक्त भारत नहीं चाहेगा, पर इस देश में चरित्रवानों की संख्या कितनी हैं, इनकी संख्या तो देश में विलुप्त होते सिंह की तरह हो गयी हैं, जरुरत हैं, इन चरित्रवानों की संख्या में वृद्धि कराने की, जैसे ही इनकी संख्या बढ़ेगी, भ्रष्टाचार रुपी दावानल खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा, फिर किसी तथाकथित रामदेव को, दिल्ली के रामलीला मैदान में करोड़ों खर्च कर, इस प्रकार की झूठी आंदोलन करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी।

Saturday, May 21, 2011

ऐसे आयोजन से क्या लाभ, जब आप समय का मूल्य न समझे और न अनुशासित हो.....!


16 मई से 20 मई तक राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने रांची के बीएनआर होटल में विभिन्न विभागों पर परिचर्चाएँ करायी, लोगों से सुझाव मांगें कि 12वीं पंचवर्षीय योजनाओं में राज्य की विभिन्न विभागों को योजनाओं को कैसे मूर्तरुप दिया जाय, ताकि झारखंड विकास के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बन जाये। लोगों ने सूझाव भी दिये, लोगों ने इनकी परिचर्चाओं में भाग लिया, मीडिया ने अपनी विशिष्ट भूमिका भी निभायी। सच्चाई ये भी हैं कि मैं खुद चाहता हूं कि ये प्रांत जो विभिन्न प्रकार से कष्टों को झेल रहा हैं, आगे बढ़े, शक्तिमान बने, पर जो स्थितियां हैं, उससे साफ लगता हैं कि इस राज्य को अभी भी दुर्दिन देखने हैं, कयोंकि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता है। अतीत कैसा था, वो आज के वर्तमान को देखकर पता लग रहा है, पर जो आज का वर्तमान है और जिस प्रकार के लोग इस वर्तमान के माध्यम से झारखंड के सुखद भविष्य का सपना संजोये हैं, उससे लगता हैं कि फिलहाल इस प्रांत का भविष्य अंधकारमय है।
किसी भी देश, प्रांत, संस्थान अथवा व्यक्ति के विकास के लिए अनुशासन काफी मायने रखता है, और ये अनुशासन सर्वप्रथम राज्य के प्रमुख व्यक्तियों में देखा जाता हैं कि वो कितना अनुशासित है, क्योंकि जब वो अऩुशासित होगा, तभी उसका देश, प्रांत, संस्थान और वह व्यक्ति विकसित होगा, नहीं तो किसी जिंदगी में वो विकसित नहीं हो सकता और न ही वो देश व प्रांत का कायाकल्प कर सकता हैं, ये छोटी सी बात सभी को समझ में आ जाना चाहिए, क्योंकि ये ध्रुव सत्य है।
कल यानी 20 मई को मुझे सूचना मिली। राज्य के सूचना भवन के माध्यम से कि मुख्यमंत्री आज यानी 21 मई को हटिया डैम का निरीक्षण सुबह 9 बजे करेंगे। आज 21 मई को जब सुबह के दस बजे तब मुझे सुचना मिली की, मुख्यमंत्री 11 बजे हटिया डैम पहुंचेगे, लेकिन जब 1 बज गये तब हमने, मुख्यमंत्री आवास पर फोन लगाया, तब सूचना मिली की मुख्यमंत्री हटिया डैम पहुंचेंगे जरुर, लेकिन अभी विलम्ब हैं, चूकि उन्हें आज जमशेदपुर जाना हैं, इसलिए जमशेदपुर जब जायेंगे तब रास्ते में हटिया डैम भी जायेंगे। ये हैं हमारे राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की सोच। और उनकी समय की पाबंदी तथा अनुशासन। और इधर उऩके समाचार को संकलन करने तथा उनके दर्शन को व्याकुल जनता राहे जोह रही हैं कि मुख्यमंत्री अब आ रहे हैं, तब आ रहे हैं। जहां सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठा व्यक्ति समय और अनुशासन को नहीं समझ पा रहा तो ऐसे में राज्य का विकास कैसे होगा।
विकास कोई निश्चित स्थान नहीं हैं, कि वहां पहुंच गये तो विकास की मंजिल पा ली, ये निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं, इसका लक्ष्य समय समय पर बदलता रहता हैं और यहीं नियति भी हैं पर इतनी छोटी सी बात हमारे देश व प्रांत के भविष्यद्रष्टा को दिखाई नहीं पड़ती। बीएनआर होटल में एक बार हमने जाकर देखने की कोशिश की कि सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं को मूर्तरुप देने के लिए जो बैठक बुलायी हैं, उसकी स्थिति क्या हैं। हमने देखा कि वहां वैसे ही लोग हैं जो पूर्व से ही राज्य की विभिन्न योजनाओं पर कुंडलियां मारकर बैठे हैं, जिन्होंने विभिन्न योजनाओं को सत्यानाश करके रख दिया हैं और इसी में अपना उल्लू भी सीधा कर रहे हैं और भ्रष्टाचार की नयी परिभाषा गढ़कर, इतनी कमायी अवश्य कर ली कि इनके सात पुश्तों तक अब आगे पीछे सोचने की जरुरत ही नहीं।
अरे भाई, शिक्षा में सुधार लाना चाहते हो, तो करना क्या हैं..........
सुधार लाओ, किसने रोक रखा हैं, पर सच्चाई ये हैं कि तुम खुद ही नहीं चाहते कि शिक्षा में सुधार हो, क्योंकि गर शिक्षा में सुधार हो गया तो फिर तुम्हारे बच्चों का क्या होगा। हम कहना क्या चाहते हैं दिमाग पर जोर लगाईये। समझ में आ जायेगा। और जिन्हें नहीं समझ में आ रहा। वो ऐसे समझिये। क्या आपके प्रांत के नेताओं, वरीय अधिकारियों, व्यवसायियों, बड़े-बड़े पूंजीपतियों अथवा जिनके पास थोड़े से भी पैसे हैं, उनके बच्चे क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं अथवा सरकारी अस्पतालों में इनकी इलाज होती हैं। गर नहीं तो फिर ऐसे स्कूल अथवा अस्पताल की आवश्यकता क्यूं। अरे भई जिस दिन से इन नेताओं, वरीय अधिकारियों, व्यवसायियों, बड़े बड़े पूंजीपतियों और मठाधीशों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने और सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने लगेंगे। ये सब खुद ब खुद ठीक हो जायेंगे। मैंने तो देखा कि जो टीचर जिस सरकारी स्कूल से 40-50 हजार का वेतन उठा रहा होता हैं, वो खुद अपने बेटों-बेटियों को उस स्कूल में न पढ़ाकर, निजी स्कूलों में पढ़ा रहा होता हैं. यहीं नहीं यहीं हाल सरकारी अस्पतालों से अपनी जिंदगी बेहतर कर रहे डाक्टरों का हैं।
पूरे देश व पूरे राज्य को चरित्रहीन बना कर रख दिया और अब चले हैं देश व राज्य को बेहतर बनाने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं पर चर्चा कराने के लिए, ये तो वहीं बात हुई। बचपन में तोता रटंत की कथा वाली बात।
गर सचमुच में कोई राज्य को आगे बढ़ाने की बात करता है तो मैं यहीं सुझाव दूंगा कि पहले गांधी की तरह बनने की कोशिश करो। नहीं तो ये झूठी दिलासा देना बंद करों कि तुम झारखंड को आगे बढ़ाना चाहते हो।
गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे तब वे मुंबई में गोपाल कृष्ण गोखले से मिले, उन्होंने गांधी से सिर्फ यहीं कहा कि गांधी जो आप सोच रहे हो, वो भारत नहीं हैं, पहले आप भारत को निकट से देखो, तब पता चलेगा कि भारत क्या हैं और उसके बाद जब लक्ष्य बनाकर चलोगे तो तुम अवश्य कामयाब होंगे। मैं भी यहीं कहता हूं कि यहां के राजनीतिज्ञ पहले झारखंड को नजदीक से देखे, यहां की जनता क्या चाहती हैं, उनके दिलों से पूछे, राजधानी और बड़े शहरों से प्यार जरुर करें पर गांवों में रहनेवाले लोगों को ये महसूस नहीं होने दें कि वे उऩसे दूर हैं नहीं तो स्थिति भयावह हो जायेगी क्योंकि शहर तक आने के लिए गांव को मजबूत होना बहुत ही जरुरी है। सच्चाई यहीं हैं कि यहां ज्यादातर नेता चालाक है, अपनी चालाकी में ये ज्यादा मशगूल है। और वो चालाकी जनता खूब समझती हैं पर ये समझते हैं कि जनता महामूर्ख हैं।
एक मई को यहां के एक नेता ने मोराबादी मैदान में आमरण अनशन का कार्यक्रम रखा, गांधी बनने की कोशिश की, पर सच्चाई ये भी हैं कि इनके आमरण अनशन को तुड़वाने के लिए न तो सरकार आगे आयी और न ही जनता। खुद इन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को मोराबादी बुलवाया, एक भोजपुरी गायक अभिनेता आया, सभी ने गुहार लगायी, कि वे अऩशन तोड़े और उन्होंने अनशन तोड़ दिया। जबकि गांधी ने जब भी अनशन किया और सत्याग्रह की, तब तब वे कामयाब होकर लौटे। ये हैं कल के गाँधी और आज के नेताओं का चरित्र। ऐसे में ये प्रांत झारखंड कैसे आगे बढ़ेगा। मैं तो यहीं कहूंगा कि बस सारे नेता चरित्रवान बन जाये, समय को पहचाने, आदर्शवादिता को अपनाएं, जो कहें वो करें जो करें वो कहें, मन, वचन और कर्म से एक रहे, फिर देखिये कि ये झारखंड कहां जाता हैं, पर बिना चरित्रवान बने, आप चाहेंगे कि देश व समाज को नयीं दिशा दे दें तो ये तो किसी जिंदगी में आप नहीं कर सकतें और न ही आनेवाले समय में आपको लोग याद रखेंगे।

Sunday, May 1, 2011

निर्बल को न सताईये, जाकी मोटी हाय...!


झारखंड में अतिक्रमण की आग में छः लोगों की जान चली गयी। सैकड़ों गरीबों के आशियाने उजाड़ दिये गये। जानें उन लोगों की गयी, आशियाने उनके उजाड़े गये, जो आजीवन कमाई करते करते मर भी जाये, तो भी वे किसी जिंदगी में जमीन खऱीदकर अपना आशियाना नहीं बना सकते। ये दलित और अनुसूचित जन जाति से भी नहीं आते कि सरकार इनके लिए इंदिरा आवास उपलब्ध करा दें। पर इन पर गाज लोकतंत्र के तीन स्तंभ कहे जानेवाले विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी ने मिलकर गिरायी। ये रोते रहे, बिलखते रहे, इनके सपनों का आशिय़ाना ढहता रहा, पर किसी को दया नहीं आयी। वह भी तब, जबकि सभी जानते हैं। तुलसीदास ने कहा हैं कि ------------------
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोड़िये, जब तक घट में प्राण।।

अतिक्रमण हटना चाहिए, मैं भी इसका पक्षधर हूं, पर अतिक्रमण हटाने के नाम पर सिर्फ गरीबों पर बूलडोजर चलाना, इसे कायरता व बुजदिली समझता हूं। जिसने भी गरीबों पर बूलडोजर चलायी हैं, उसे उसके किये की सजा ईश्वर अवश्य देगा, चाहे वो कितना भी बड़ा अथवा सर्वशक्तिमान व्यक्ति क्यूं न हो, जो इस अहं में जी रहा हैं कि उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता. वह भी कबीर की, इस पंक्ति को पढ़ ले, गर वो बाल्यकाल से लेकर वृद्धावस्था तक नहीं पढ़ा हो, पंक्तियां है ------------
निर्बल को न सताईये, जाकी मोटी हाय।
मरे मृग के छाल से, लौह भस्म हो जाय।।

राज्य में अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है, कहा जा रहा है कि न्यायालय के आदेश पर चल रहा है, पर ये अतिक्रमण हटाओ अभियान चल कहा रहा है। वहां चल रहा है – जहां गरीबों का निवासस्थल है। जिनकी फूटपाथ पर जिंदगी चलती है और फूटपाथ पर ही समाप्त हो जाती है, पर जिन अमीरों ने कानून को ठेंगा दिखाकर, फूटपाथ को भी नहीं छोडा, उस पर बुलडोजर क्या, एक सूई भी नहीं चूभोई गयी है। ये है – हमारा देश भारत, उसका एक प्रांत झारखंड और उसकी व्यवस्था।
शायद ऐसी व्यवस्था, इसलिए कि लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों ने रामचरितमानस की चौपाईयों को अक्षरशः कंठस्थ कर, उस पर चलना शुरु कर दिया है – ये कहकर कि ----------------------
समरथ के नहिं दोषु गोसाई
आज हमें हरि शंकर परसाई बरबस याद आ रहे है........। उनकी लिखी कहानी भेड़ और भेड़िये याद आ रही है। हमें लगता है कि अतिक्रमण के नाम पर, अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर जिस प्रकार से गुंडागर्दी चली हैं, मुझे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से विश्वास उठ गया है। पूर्व में, जो घटनाएं घटी, जो मेरे आंखों के सामने नहीं घटी थी, फिर भी इस प्रकार की घटनाएं घटित होती थी, तो मैं समझता था कि देश में कानून का राज है। जो लोग गलत करेंगे, उन्हें आज न कल सजा मिलेगी। पर मैंने जो महसूस किया, उसका लब्बोलुआब ये है कि गरीब तो पैदा ही होते है, अमीरों के द्वारा काट दिये जाने के लिए।
गरीबों को तो जीने का अधिकार ही नहीं है, जीने का अधिकार तो सिर्फ उन्हें है – जो हजारों, लाखों और करोड़ों में खेलते है। जो झारखंड के महानगरों में, टूटे – फूटे प्लास्टिक, मिट्टी और कचरों के घरों में रहकर, इन अमीरों के सुख साधन का सामान जूटाने और उनकी सेवाओं में अपना सम्मान तक गिरवी रख देते है, उन्हें जीने का अधिकार किसने दे दिया। शायद यहीं कारण रहा कि गरीबों के आशियाने ढहते रहे, गरीबों के बेटे पुलिसिया गोली के शिकार होते रहे और लोकतंत्र के तीनों स्तंभ चुपचाप मौन रहकर, इनकी बेबसी पर खुश होते रहे, इन्हें इनके हाल पर दया तक नहीं आयी।
ये खुश होनेवाले वे लोग है --------- जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी ईमानदारी नहीं बरती। जिन्होंने इन्हीं गरीबों के पैसे खाकर, उनकी जिंदगी तबाह कर दी और विभिन्न घोटालों को अंजाम दिया। जिन्होंने अपने लिए बिना किसी नक्शा को पास कराये, बड़े-बड़े आलीशान होटल और अपने मकान बनाये। जिन्होंने बेईमानी के सारे रिकार्ड तोड़ कर अपने परिवार के लिए दुनिया के सारे सुखसाधन अपने लिये जुटा लिये और जूटा रहे है। इन पर किसी की नजर नहीं जाती, क्योंकि ऐसे लोग इन लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में बड़ी संख्या में देखने को मिल जाते है। इसलिए इन पर बुलडोजर चले भी तो कैसे। इधर अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर गरीबों के आशियाने पर बुलडोजर चलते रहे, गरीबों के छातियों पर गोलियां चला दी गयी, पर सरकार बेबस थी। केवल एक राग अलाप रही थी कि न्यायालय का आदेश है ----------- इसलिए वह अतिक्रमण हटाओ अभियान चला रही है। विपक्ष न्यायालय पर तो नहीं, पर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा था कि ये गलती सरकार की है। इस अतिक्रमण हटाओ अभियान से मुक्ति सिर्फ अध्यादेश लाकर ही पायी जा सकती है, पर इनके इस अध्यादेश लाने के चक्कर में कितनी मांओं के गोद सुनी हो गयी, शायद लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों को मालूम नहीं। उन्हें ये भी मालूम नहीं कि अपने आशिय़ाने को ढहने का समाचार मिलते ही, कितनों की दहशत में ही जान निकल गयी, पर लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों को इससे क्या मतलब। मौत तो इस देश में होती ही रहती हैं............................
और अब इस राज्य के तथाकथित गुरुजी यानी बात शिबू सोरेन की ------------------झारखंड के लोग, इन्हें गुरुजी के नाम से जानते है, इन्हें गुरुजी किसने बनाया, हमें नहीं मालूम और न ही हम जानना चाहते है। अचानक पता चला, कि ये जनाब अतिक्रमण हटाओ अभियान और गरीबों पर चल रही बुलडोजर से परेशान है, दुखी है। इन्होंने मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को पत्र लिखा है कि मुख्यमंत्री जल्द इस समस्या का समाधान करें। बेचारे इतने दुखी थे कि इन्होंने संथालपरगना में होनेवाले उदघाटन और शिलान्यास कार्यक्रम से स्वयं को अलग कर दिया। लगा कि सरकार अब गयी और तब गयी, पर जैसा कि गुरुजी का आदत है कि वे क्या बोलते है और क्या करते है उन्हें खुद मालूम नहीं होता। उन्होंने आनन फानन में कोर कमेटी और पता नहीं क्या – क्या झामुमो की बैठक बुला दी और हुआ वहीं यानी ढाक के तीन पात। सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है, वो सरकार और सरकार के मुखिया से नाराज नहीं है। ये बयान दे डाला। जब सरकार अच्छा ही काम कर रही थी तो उन्होंने अर्जुन मुंडा को पत्र ही क्यूं लिखा कि वे सरकार के काम काज से दुखी हैं या संथाल परगना के उद्घाटन और शिलान्यास कार्यक्रम से खुद को अलग क्यूं कर लिया। यानी ये जनता को बेवकूफ समझते है, ये समझते है कि वे गुरु जी है और झारखंड के नागरिक उनके चेले। जैसा कहेंगे वैसा समझ लेंगे, पर उन्हें ये मालूम नहीं कि उनकी इस गंदी राजनीति को जनता बहुत अच्छे ढंग से समझती है। यहां की जनता जानती हैं कि जो नरसिम्हा राव की सरकार, रिश्वत लेकर बचा सकते है, उस पर भरोसा कभी किया ही नहीं जा सकता और न ही जनता गुरुजी पर विश्वास करती है।

Sunday, April 10, 2011

अन्ना, मीडिया और गांधी….!

जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी भी सदाचार अपनाया ही नहीं, उन्हें भ्रष्टाचार की चिंता सताती जा रही हैं। उन्हें देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और उससे प्रभावित होते विकास की तीव्र चिंता हैं। ये वे लोग हैं जो लाखों-करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों – खरबों में खेलते हैं। जिनकी दिन की शुरुआत ही भ्रष्टाचार और दिन की समाप्ति भ्रष्टाचार पर ही खत्म हो जाती हैं। इन्होंने आजकल गांधी नाम जप शुरु कर दिया हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे देश के गांवों – मुहल्लों में हरे राम संकीर्तन चल रहा होता हैं। आज से ठीक पांच दिन पहले अन्ना हजारे ने एक प्लान के तहत दिल्ली में लोकपाल विधेयक और भ्रष्टाचार मुद्दे पर आमरण – अनशन क्या शुरु किया। पूरे देश में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इनकी तुलना गांधी से कर दी। पूरे देश में गांधी और गांधीवाद तथा बाकी बचे तो अन्ना हजारे छाये रहे, लेकिन ये अन्ना खेतों और खलिहानों में नहीं, बल्कि सिर्फ अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही थे, इधर लगातार अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छाये रहने के कारण केन्द्र सरकार सकते में आ गयी, अंततः आनन फानन में अन्ना की सारी बातें केन्द्र द्वारा मान ली गयी । हालांकि जानकार ये भी कहते हैं कि केन्द्र सरकार और उसके समर्थकों ने एक कूटनीति के तहत इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कराये और ठीक एकदिवसीय वर्ल्ड कप के बाद इसे शुरु कराया और आईपीएल शुरु होने के पूर्व ही इस कार्यक्रम को समाप्त करने की योजना को मुर्त रुप दे दिया, क्योंकि ये जानते थे कि मीडिया की भी अपनी मजबूरियां हैं, और इसे आईपीएल शुरु होने के बाद, बड़ा मुद्दा मीडिया नहीं बना सकती। इसलिए देश में बड़े घरानों के सौजन्य से चल रहे प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम कर रहे लाखों का मासिक वेतन उठानेवालों ने अन्ना हजारे के आमरण अनशन को हाईलाईट करना शुरु कर दिया और अन्ना हजारे की तुलना गांधी और उसके कार्यक्रमों की तुलना गांधीवाद से शुरु कर दी, साथ ही देश में एक तरह से ऐलान करा दिया कि अन्ना हजारे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ दूसरी क्रांति शुरु कर दी हैं, लोगों को इनका साथ देने के लिए बिना विज्ञापन राशि लिए, विज्ञापन शुरु कर दी कि लोग समर्थन करे, इस महापुरुष का। जो बूढ़ा होते हुए भी, युवाओं जैसा काम कर रहा है। ये हल्ला और प्रोपेगंडा करनेवाले वे तथाकथित देश के मूर्धन्य पत्रकार थे, जो अपने मुफ्स्सिल संवाददाताओं के अरमानों का गला घोंटकर, उन्हें औने पौने पैसे देकर, खुद लाखों का वेतन उठाते हैं, और ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं। जो अपने अखबारों के प्रचार प्रसार में अरबों खर्च कर देते हैं ये कहकर कि अब घर में आपकी बीबी की नहीं, आपकी चलेगी मर्जी यानी नारी की स्वतंत्रता का हनन करने में भी, जिन्हें शर्म नहीं आती। वे लोग भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए संपादकीय तक लिख डाले थे। जो देश के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार इस प्रकार की हरकतें कर रहे थे, उनकी सोच और उनकी गिरगिट की तरह रंग बदलने की प्रवृति देख, हमें पूर्व के आंदोलन और उसकी वर्तमान अवस्था पर शर्म महसूस हो रही थी। जरा देखिये, अन्ना के आंदोलन का, आज अऩ्ना ने अपना आंदोलन समाप्त कर दिया पर उसके बदले में क्या उसने पाया। सिविल सोसाईटी की ओर से खुद ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य बन गये हैं। जो ड्राफ्टिंग कमेटी बनी हैं, उसके अध्यक्ष शांति भूषण हैं तो बेटे प्रशांत भूषण सदस्य है। इस मुद्दे पर जब किसी ने अऩ्ना से सवाल किया तो अन्ना का कहना था कि दोनों ईमानदार थे, इसलिए उन्हें रखा गया। क्या देश में इन्हीं बाप बेटों में इनको सबसे ज्यादा ईमानदारी दिखी और देश के 121 करोंड़ों में कोई ईमानदार नहीं था। अरे जिसकी बुनियाद ही इतनी छिछोरी हो, तो वो भ्रष्टाचार से कैसे लड़ेगा। अरे गांधी के नाम को बेचकर अपनी दुकान चलानेवालो, जरा सोचों क्या गांधी ने अपने आंदोलन की कभी कीमत वसूली, जैसा कि अन्ना ने वसूला। खूद सदस्य बनकर। क्या गांधी ने कभी भी अपने जीवन में कोई पद पाया। गर नहीं तो फिर गांधी और गांधीवाद के नाम पर इतना नौटंकी क्यों। जो लोग आंदोलन को मूर्तरुप दे रहे थे, जरा पूछिये कि उनकी पृष्ठभूमि क्या रही हैं, जो स्वामी अग्निवेश खुद नक्सलियों के साथ और उसके आंदोलन को प्रत्य़क्ष समर्थन देता हैं, क्या वो स्वामी हो सकता हैं। जो लोग कश्मीर के विघटनकारियों को समर्थन देने में अपनी शान समझते हैं, क्या वे भ्रष्टाचार के खिलाफ और गांधीवाद के समर्थन में कभी भी आगे आ सकते हैं गर नहीं तो फिर गांधी और गांधीवाद के साथ इतनी बड़ी सौदेबाजी क्यों। मैं उनलोगों से पूछना चाहता हूं जिन्होंने इस नौटंकी को गांधीवाद कह डाला। क्या वे बता सकते हैं कि जिस प्रकार गांधी ने भारत में अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका, क्या इस प्रकार की नौटंकी से अब देश में भ्रष्टाचार का खात्मा हो गया या हो जायेगा। अरे जिस देश में पढ़ाई के नाम पर क्लर्क बनाने और पैसे कमाने की मशीन बनाने की ट्रेनिंग शुरु हो गयी हो, वहां अब भगत सिंह और चंद्रशेखर कहां से पैदा होंगे, और जब ये पैदा ही नहीं होंगे तो फिर भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगेगा। इतनी छोटी बात आंदोलनकरनेवाले लोगों को समझ में नहीं आती। गर नहीं समझ में आती तो वे जाने, पर यहां की जनता जानती हैं। इसीलिए देश के अन्य भागों में अन्ना के इस तथाकथित आंदोलन मे वे लोग शरीक हुए, जो किसी न किसी प्रकार से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, जिन्होंने मां भारती को पग-पग पर अपमानित करने का संकल्प कर रखा हैं। खेतों-खलिहानों अथवा विभिन्न कल कारखानों में काम करनेवाले या प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही काम करनेवाले उन पत्रकारों ने इस आंदोलन से अपनी दूरी बना ली थी, जो सच में बिना किसी शोर-शराबे के देश को नयी दिशा देने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं, जो देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए, कानून बनाने की बात नहीं, बल्कि खुद कानून बनने की कोशिश कर रहे हैं।

Thursday, March 31, 2011

क्यों नहीं, क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाय..............!

भारत ने पाकिस्तान को एक बार फिर मोहाली में 29 रनों से हरा दिया। सचमुच एक बार फिर ये बात सिद्ध हो गयी कि पाकिस्तान भारत से खासकर वर्ल्ड कप में हमेशा से हारता रहा हैं और इस बार भी हारेगा। कुछ संयोग भी था कि कुछ कौतुक मोहाली में देखने को मिले, सचिन तेंदुलकर बार- बार आउट होते हुए बचे और उन्होंने 85 रनों का व्यक्तिगत स्कोर खड़ा कर लिया। ये घटनाएं भी बहुत कुछ बता रही थी कि मैच भारत के पक्ष में हैं। खैर ये मेरा विषय भी नहीं हैं, आज के समाचार पत्रों और बीती रात से विभिन्न इलेक्ट्रानिक मीडिया ने धौनी सेना की गुणगान करनी शुरु कर दी हैं और साथ ही ये भी राग अलाप दिया कि भारत ही वर्ल्ड कप जीतेगा, मैं भी भारतीय हूं चाहता हूं कि कप भारत में ही रहे। पर केवल क्रिकेट के ही क्यूं और अन्य खेलों के लिए भी ऐसी भावना क्यूं नहीं। खासकर, हॉकी के लिए, जो कि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हैं। यहीं बात पाकिस्तान के लिए भी क्योंकि हॉकी वहां का भी राष्ट्रीय खेल हैं, पर सच्चाई क्या हैं। सभी को मालूम हैं, दोनों देशों में हॉकी हाशिये पर चला गया हैं। न तो सरकार, न ही अधिकारी, न ही बड़े बड़े पूंजीपति-खेल के आयोजक ही इस खेल में रुचि लेते हैं। पूरे देश में जिस प्रकार से क्रिकेट का जूनून हैं। गांव – शहर, कस्बा मुहल्ला सभी जगह छोटे से लेकर बड़े विकेट और बल्ले की ही बात कर रहे हैं, ऐसे में हमारा अभिमत हैं कि क्यूं नहीं क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाय, क्यूं हम बेवजह उसे राष्ट्रीय खेल मानने को तैयार हैं- जिसपर हम बात करने को अपना समय देने को तैयार नहीं हैं। आखिर हम ऐसा क्यूं कह रहे हैं। उसके पुख्ता प्रमाण हैं। आप उन देशों को लीजिये जहां का राष्ट्रीय खेल फुटबॉल हैं, जरा उन देशों और वहां के निवासियों को देखिये कि वे फुटबॉल को किस प्रकार लेते हैं, पर हमारे देश में राष्ट्रीय खेल हॉकी के प्रति किस प्रकार अनादर का भाव हैं। वो हॉकी खेलनेवाले खिलाड़ियों की मनोदशा देखकर ही पता लग जाता हैं।
जबकि क्रिकेट की बात हो तो पूछिये मत, गांव – महल्ला, नगर –शहर तो दूर हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक इस पर चर्चा करने लगते हैं। दूसरे मित्र व पड़ोसी देश को क्रिकेट का आन्नद लेने के लिए निमंत्रण तक दे देते हैं। क्रिकेट को लेकर भारत और पाकिस्तान में जैसे मारामारी दीख रही होती हैं, वैसी मारामारी अन्य देशों के खिलाफ होनेवाले क्रिकेट मैचों में नहीं होती। आखिर ऐसा जुनून क्यूं हैं, क्यों हमें पाकिस्तान को हराने में परमानन्द की प्राप्ति होती हैं, जबकि ऐसा ही आनन्द फाइनल में जीतने पर देखने को नहीं मिलता। हमें लगता हैं कि ये शोध का विषय हैं, पर जो सामान्य लोग हैं, वे जानते हैं कि आखिर इसका आनन्द का कारण क्या हैं। किस प्रकार हमारे भारत और पाकिस्तान के राजनीतिज्ञों ने अपने-अपने पड़ोसी देशों को लेकर, हमारे मन में विषवमन पैदा किया हैं, जिसका परिणाम भारत और पाकिस्तान के साथ होनेवाले सिर्फ क्रिकेट में दिखायी पड़ता हैं, न कि इन दोनों देशों के साथ होनेवाले किसी अन्य मैचों में।
कमाल हैं, जैसे ही क्वार्टरफाइनल में ये श्योर हो गया कि भारत और पाकिस्तान सेमीफाईनल में भिड़नेवाले हैं, हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी और वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को भारत मैच का आनन्द लेने के लिए आमंत्रित कर दिया। उधर से भी वहीं प्रतिक्रिया हुई, जिसका अंदेशा कि हम आ रहे हैं। क्या बात हैं जो काम और कोई नहीं कर सकता, क्रिकेट ने कर दिया। दोनों देश क्रिकेट देखने ही नहीं, बल्कि बातचीत को भी तैयार हो गये। जनाब गिलानी पाकिस्तान से आये, खाये-पीये, मैच का मजा लिया और गये। ऐसा लगा कि भारत और पाकिस्तान कभी लड़े ही नहीं थे और न ही कभी लड़ेंगे। यानी भारत और पाकिस्तान अब शांति की डगर पर चल पड़े हैं। इधर सोनिया गांधी और और राहुल गांधी भी मैच देखने के मोहाली पहुंचे और बाकी बचे तो अन्य नेता, व फिल्मी अभिनेता- अभिनेत्री व पूंजीपतियों का बड़ा समूह मोहाली पहुंच गया था। क्रिकेट मैच का आनन्द लेने के लिए। उस क्रिकेट का मजा लेने के लिए जो हमारा राष्ट्रीय खेल नहीं हैं, और जिनके पास अपने राष्ट्रीय खेल देखने के लिए समय नहीं होता। जरा पूछिये, अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी से और उन अन्य नेताओं, अभिनेताओं व पूंजीपतियों से कि क्या ऐसी ही कशिश उनके दिलों में राष्ट्रीय़ खेल के प्रति होती हैं। उत्तर होगा – नहीं। जिस देश में सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठनेवालों के दिलों में अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी के प्रति दर्द नहीं उभरता, उस देश में राष्ट्रीय खेल की क्या स्थिति होगी, वो जो हम देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, हमसे बेहतर कौन समझ सकता।
हम झारखंड में हैं, जहां हॉकी जन-जन में रचा बसा हैं, जहां कई पुरुष और महिला खिलाड़ी हॉकी के द्वारा अपने देश का मान बढाया हैं। इस प्रांत में भी एक क्रिकेट के धौनी ने, उन हॉकी खिलाड़ियों की चमक थोड़ी फीकी कर दी हैं जिन्होंने हॉकी में अपना ही नहीं बल्कि इस राज्य और देश का मान बढ़ाया पर आज उनकी क्या स्थिति हैं, झारखंड की जनता से बेहतर और कौन जान सकता हैं। धौनी का तो कहना ही नहीं, उसके पास तो इतने धन आ चुके हैं कि पूछिय़े मत, पर इसी राज्य में हॉकी के बल पर देश व राज्य का मान बढ़ानेवाले लोगों की हालत पस्त हैं, उस पर न तो केन्द्र और न ही राज्य सरकार का ध्यान हैं। ले – देकर बेचारे अपने हालत पर आंसू बहा रहे हैं, पर क्रिकेट के पक्षधरों और उसके झंडाबरदारों ने उनकी सूध तक नहीं ली। वो भी उस राज्य में उस देश में जहां हॉकी राष्ट्रीय खेल हैं।
कल मैंने ये भी देखा कि जैसे ही भारत ने पाकिस्तान पर जीत दर्ज की, सोनिया गांधी और मनमोहन के चेहरे पर खुशी का ठिकाना नहीं था, वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी के चेहरे पर हार का गम साफ दिखाई पड़ रहा था। पूरे देश की तो बात ही अलग थी। क्या दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता और मुंबई की बात करे, सभी खुश, देश ने पाक पर फतह कर लिया। ऐसी खुशी, जिसको अभिव्यक्त करने के लिए शब्द नहीं थे, जब पूरे देश में ऐसा माहौल हो, तो फिर हम तो ये ही कहेंगे कि हे महान देश के महान राजनीतिज्ञों ( दोनों देशों ) आप जल्द ही ये घोषणा कर दो कि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी नहीं, क्रिकेट हैं। क्योंकि तुम घोषणा करों या न करों, आम जनता तो हॉकी को भूलाकर क्रिकेट के रंग में रंग ही चुकी हैं और क्रिकेट को राष्ट्रीयता से जोड़ दी हैं। साथ ही सचिन-धौनी इऩके सरताज हो चुके हैं। तो फिर देर कैसी।

बिहार, मीडिया और बारबालाएं….!

होली बीते कुछ ही दिन बीते हैं, लेकिन होली के दिन और उसके पहले अथवा होली के बाद, जो मीडिया में होली को केन्द्रित बारबालाओं के उपर बिहार से संबंधित समाचार आये। वो चौकानेवाले तो नहीं, पर चिंतन करनेलायक जरुर थे। ज्यादातर मीडिया ने खुलकर दिखायें कि बिहार में होली की संस्कृति को कैसे तारतार कर यहां के अधिकारी बार बालाओं के डांस का आनन्द ले रहे हैं। किसी ने आधे घंटे तो किसी ने इस पर एक घंटे का विशेष चला दिया तो किसी ने अपने फोन नंबर प्रसारित कर दिये कि दर्शक इस पर अपना विचार दे दे। ये वे लोग थे, जो बंद कमरों में वीडियो चलाकर, एडल्ट फिल्में देखने अथवा विभिन्न वेवसाईटों पर एडल्ट साईट देखने पर शर्म महसूस नहीं करते अथवा मुन्नी बदनाम हुई या शीला की जवानी फिल्मों पर डांस करने से ग़ुरेज नहीं करते और ही मुन्नी बदनाम हुई अथवा शीला की जवानी जैसे गाने इन्हें अश्लील लगती हैं, पर जैसे ही कोई लड़कियां अथवा बार बालाएं इन्हीं गीतों पर चौक चौराहों पर डांस कर रही होती हैं तो इन्हें उसमें अश्लीलता, बिहार की संस्कृति पर चोट जैसी चीजें दिखाई पड़ने लगती हैं। कमाल हैबात वहीं हुई, चलनी दूसे सूप के, जिन्हें बहत्तर छेद। यहीं नहीं बिहार के किसी किसी इलाकें में तो कई अधिकारियों ने बिहार दिवस और होली का एकसाथ आनन्द लिया, इन्होंने देखा कि जब बिहार दिवस मनाना ही हैं, नाचगाना करना ही हैं, पैसा सरकारी खर्च होना ही हैं तो फिर क्यूं बहती गंगा में हाथ धो लिया जाय, इसलिए कई लोगों ने अपने कार्यालय में ही बारबालाओं को बुलाकर गीत संगीत का आनन्द लिया, उन पत्रकारों को भी बुलाएं जिनकी इसमें गहरी रुचि हैं, इन पत्रकारों ने भी जमकर रुचि ली और ठुमके लगाये पर ठुमके लगाने के बाद जैसे ही उन्हें पत्रकारिता की याद आयी तो इसे अपने चैनलों तक भेज दिया ताकि इसके आधार पर कुछ कमायी भी हो जाये। इधर डेस्क पर बैठे लोगों ने देखा कि ये तो समाचार हैं, बिकनेवाला आयटम हैं, तो उन्होंने बिहार की संस्कृति और अश्लीलता पर दिखाकर लगे व्याख्यान देने, जिन्हें अश्लील साईट और अश्लील फिल्में देखने का शुरु से ही शौक रहा हैं।
ऐसे तो हमारे देश में इस प्रकार के गीत और संगीत अथवा नृत्य कोई पहली बार नहीं हुए हैं, हमेशा से चलते रहे हैं, जिनकी जो पसंद हैं, उसमें रुचि लेकर वे डूवकी लगाते हैं, पर इन बारबालाओं के माध्यम से पूरे देश के घरों में चुपके से दिखाने का कुकर्म और प्रयास किसने किया ये तो भारत के और बिहार के इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करनेवाले मान्यवर ही बेहतर बता सकते हैं, पर किया क्या जाये। का पर करहू शृंगार, पुरुष मोर आन्हर।
आश्चर्य इस बात की हैकि क्या मुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी में अश्लीलता नहीं हैं, फिल्म खलनायक में चोली के पीछे क्या हैं, क्या ये अश्लील नहीं हैं। होता तो ये हैं कि सदियों से लोग अश्लीलता को अपनी अपनी आंखों से नापते और देखते हैं और उसके बाद व्याख्यान देते हैँ और इसके बाद शुरु होता हैं एक दूसरे को नीचा दिखाने का आरोप प्रत्यारोप। हालांकि इसका असर कुछ होता नहीं हैं। भले ही जहां बार बालाओं के डांस हुए, बिहार सरकार ने उन अधिकारियों पर गाज भी गिराये पर क्या इस प्रकार के गाज गिराने से उन अधिकारियों के चरित्र सुधर जायेंगे।
हुआ तो ये हें कि पूरे देश के गांव शहरों के कुएं और तालाब, नदियों और सागरों में भांग पड़ गयी हैं। सभी इसमें से एक लोटा जल निकालकर स्वयं को तृप्त कर रहे हैं, ऐसे में अश्लीलता पर कोई टिप्पणी करें तो हमें आश्चर्य लगता हैं. भाई, जब महर्षि विश्वामित्र, मेनका के आगे झूक सकते हैं, जब महर्षि पराशर, सत्यवती के रुप लावण्य को देख मोहित हो सकते है तो ये बार बालाएं किस मर्ज की दवा हैं। ये तो सामान्य लोगों को अपने रुप सौंदर्य और लटकोंझटकों से सिर्फ उनके दिलों को मरहम लगा रही होती हैं। अरे याद करियेभोजपुरी गायक बलेसर को, जो कहते हैं -- काशी में माजा, काबा में माजा, ही माजा बरसाने में, अरे तीन बजे आके जगइहे पतरकी सुतल रहब खरियानी में....................
इसी से पता लग जाता हैं कि सामान्य लोगों की पहली पसंद और आखिरी पसंद क्या हैं। कोई भी व्यक्ति आनन्द की खोज में हैं, पर वो आनन्द उसे कहां मिल रहा हैं, किस रुप में मिल रहा हैं, जिसे वो प्राप्त करने की कोशिश कर रहा है, उसे वो लेकर रहेगा, चाहे आप झूठी व्याख्यान देकर स्वयं को स्वामी इलेक्ट्रानिकानंद अथवा प्रिंटानंद की उपाधि से विभूषित होने का मन में ख्याल ही क्यूं रखे.

Wednesday, March 23, 2011

हमारा प्रधानमंत्री और यहां के पत्रकार बड़े होशियार हैं.......!

संदर्भ --- घूस देकर सरकार बचाने का...

चाहे सदन में चर्चा हो या न हो। गर हो भी तो भले ही उसका अर्थ न निकले। पर प्रधानमंत्री मनमोहन जी और यूपीए की नेता सोनिया गांधी को मालूम होना चाहिए कि भारत की जनता इतनी मूर्ख नही, जितना वो समझते हैं। भारत की सौ करोड की आबादी जानती हैं कि जो केन्द्र में सरकार चल रही हैं, वो भ्रष्टाचार को आत्मसात कर ही चल रही हैं, और इसी सरकार ने पिछली बार 14 वी लोकसभा में अपनी कुर्सी को बचाने के लिए, सांसदों को घूस दिये थे। ये अलग बात हैं कि जिनके पास सबूत थे, उन पत्रकारों और नेताओं ने इस सरकार के आगे अपनी जमीर बेच दी थी। प्रधानमंत्री जी का संसद में विकीलीक्स मामले पर विपक्षी नेताओं के प्रश्नों के जवाब के दौरान ये कहना कि इसका कोई सबूत नहीं कि उऩकी पार्टी अथवा सरकार ने घूस देकर, सरकार बचायी थी, इसलिए वे निर्दोष हैं अथवा उनकी पार्टी या सरकार दोषी नहीं हैं, बचकाना बयान हैं। ये तो वहीं बयान हैं जब कोई अपराधी, अपराध तो करता हैं, जिसका ताउम्र उसे एहसास होता भी रहता हैं, पर अपने अपराधिक सबूतों को बड़ी ही सफाई से इस प्रकार गायब कर देता हैं, जिसका पता दूसरों को नहीं लगता। पर इस बार विकीलीक्स द्वारा किया गया खुलासा कि कांग्रेस ने सांसदों को घूस देकर अपनी सरकार बचायी थी, सब कुछ क्लियर कर देता हैं कि इस देश में कैसे – कैसे राजनीतिज्ञ शासन कर रहे हैं और इसका साथ यहां के तथाकथित जमीर बेचने वाले पत्रकार कैसे दे रहे हैं । ऐसे तो सभी जानते हैं कि कांग्रेस और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय हैं। चाहे विदेशों में धन रखने की बात हो या विभिन्न घोटालों को जन्म देना ये कांग्रेसियों का बायें हाथ का खेल हैं। ये अलग बात हैं कि भारत इनके द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार के बावजूद भी सरकता हुआ आगे बढ़ता जा रहा हैं, क्योंकि यहां की आज भी एक बहुत बड़ी आबादी देश को आगे बढ़ाने के लिए अपना खून पसीना बहाती जा रही हैं, ये कहकर कि-----
तेरा वैभव अमर रहे मां,
हम दिन चार रहे ना रहे
इस देश का दुर्भाग्य रहा हैं कि जब से ये देश स्वतंत्र हुआ तब से लेकर आज तक ज्यादातर समय तक कांग्रेसियों का शासन रहा हैं, जिन्होंने शायद संकल्प कर लिया हैं कि वे इस देश का बंटाधार करके रहेंगे। उनके इस संकल्प को पूरा करने में, वे पत्रकार भी शामिल हो गये हैं, जिनका मकसद, समाचारों के माध्यम से पत्रकारिता और देश सेवा न कर ब्लैकमेलिंग करना हैं, पर इन ब्लैकमेलर पत्रकारों को भी कैसे ठीक किया जाता हैं, शायद कांग्रेसियों को बहुत अच्छी तरह पता हैं। इसलिए जिन पत्रकारों अथवा चैनल के पास सासंदों को घूस देनेवाली खबर व उसके पूख्ता सबूत मौजूद थे, उस चैनल और उसके पत्रकारों ने बिना देर किये कांग्रेसियों के चरण पकड़ लिये ये कहकर कि आप हो तो हम हैं, इसलिए आप घबराये नहीं, हम कभी भी उस खबर को अपने चैनल पर नहीं दिखायेंगे, जिसकी वजह से सरकार पर आंच आती हो, आप जो कहेंगे, वहीं करेंगे। इसलिए, उस वक्त, उक्त चैनल ने वो समाचार नहीं दिखायी, जिसको देखने के लिए भारत की जनता बेकरार थी, जिसका कथन था, खबरें किसी भी कीमत पर वो पता नहीं कौन सी कीमत लेकर अपना जमीर बेच चुका था। पर जनता तो जनता हैं वो जान चुकी थी कि दाल में काला हैं, पत्रकारों ने जमीर बेचा हैं, सब जगह थू थू होने लगी, उक्त चैनल ने बहुत दिनों बाद, जब मामला ठंडा पड़ गया, समाचार दिखाई, वो भी जैसे तैसे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, कांग्रेसियों ने पूरे प्रकरण को गड्मगड कर दिया था, वे अपने मकसद में कामयाब हो गये थे, पर कहा जाता हैं न कि सच, सच होता हैं, विकीलीक्स ने रहस्योदघाटन करके बता दिया कि कांग्रेसियों ने घूस देकर, अपनी सरकार बचायी, और केन्द्र की सोनिया मनमोहन की सरकार तो नंगी हुई ही, वे पत्रकार भी नंगे हो गये जिनके पास सत्य था पर वे सत्य दिखाने का साहस नहीं दिखा सकें । जो पत्रकार कहते हैं कि वे खबरें किसी भी कीमत पर जाकर दिखा सकते हैं। वे भी कांग्रेसियों के चरणोदक पीने को बेताब हो जाते हैं, जब कांग्रेसियों की धमक, उन पत्रकारों के कानों तक पहुंच जाती हैं। लेकिन देश के अन्य इमानदार पत्रकारों द्वारा, उन जमीर बेचनेवाले पत्रकारों अथवा चैनलों पर थू थू की जाती है, तब भी ये बेशर्मी से अपने को पाक साफ बताने में लग रहते हैं। जब देश के संसदीय इतिहास में पहली बार, नोटों के बंडलों को भाजपाईयों द्वारा रखा जा रहा था और ये नेता ये कहकर चिल्ला रहे थे कि उन्हें कांग्रेसियों ने खरीदने की कोशिश की, जिसका सबूत देश के एक प्रमुख चैनल और पत्रकार के पास था, उसने किस कारण से अपनी जमीर बेच दी, वे तो वहीं बता सकते हैं, पर देश की जनता जान गयी थी कि यहां नेता व पत्रकार सभी मिले हैं, सभी तरमाल खा रहे हैं, सभी देश को बर्बाद करने में तूले हैं, चारो ओर घोर अंधियारा हैं, कहीं कोई किनारा नहीं हैं, इसलिए जनता सब कुछ जानते हुए भी, एक बार फिर अनिच्छा से विष पीया और कांग्रेस को सत्ता सौंप दी, और इस सता को पाने के बाद कांग्रेसियों ने तो समझ लिया कि भारत की जनता उनके साथ हैं, इसलिए भ्रष्टाचार का कीर्तिमान बनाओ, और देश के दिल्ली में बैठे पत्रकारों को साम दाम दंड भेद के तहत अपने पास मिलाये रखों और देश पर शासन करने का मजा लेते रहो। शर्म हमें आती हैं कि हम उस कालखंड में रह रहे हैं, जहां जमीर बेचनेवाले नेता व पत्रकार देश के शीर्ष स्थानों पर बैठकर, भारत के विकास का बेशर्मी राग, देशवासियों को सुना रहे हैं, ये कितने बेशर्म हैं, इस बात का पता इसी से चल जाता हैं कि देश के संसद में भी बैठकर हसंते हुए, अपनी बेशर्मी का फागुनी राग सुना रहे होते हैं, और इनके फागुनी राग में पत्रकार भी ये कहकर बेशर्म बनते हैं, कि कांग्रेसी और मनमोहन तो आज तक कुछ गलत किया ही नहीं, ये तो विपक्षी दल के नेताओं की आदत हैं, सत्तापक्ष को कठघरे में खड़ा करने की, इसलिए गाहे बगाहे चिल्लाते रहते हैं। इसलिए इन्हें चिल्लाने दीजिये। हम अपना काम करते रहे। यानी की, हम हमेशा जीवित थोड़े ही रहेंगे, जब तक जीयेंगे ऐश करके जीये, देश भाड़ में जाये, जिनको देश के बारे में सोचना हैं, वो सोचे। अपना क्या हैं, खाओ, पीओ, ऐश करो। देश पर चीन हमले की योजना बनाये अथवा पाकिस्तान व बांगलादेश हमारी सरहदों को छोटा करने की कोशिश करें तो उससे हमें क्या। हमने ही ठेका ले रखा हैं, भारत का क्या।

Monday, March 14, 2011

तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा..................!


जी हां। तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा। कुछ ऐसी ही सोच है, झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का। जोड़ – तोड़, सांठ – गांठ, तिकड़मबाजी में महारत हासिल, भाजपा के इस नेता ने झारखंड की सत्ता संभालने के बाद अपनी छवि जनता के बीच ठीक जाये, इसके लिए, इन्होंने अपने आवास पर 12 मार्च 2011 को मीडियाकर्मियों को भोज पर आमंत्रित किया, और उनसे गुफ्तगू की। इस गुफ्तगू में रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के गण्यमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया। सभी पहुंचे भी। क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री ने भोज पर आमंत्रित किया था। ऐसे भी जब दिल्ली में प्रधानमंत्री, दिल्ली के पत्रकारों को अपने आवास पर भोज में आमंत्रित करें तो भला किस पत्रकार की लार नहीं टपकेगी। ठीक उसी प्रकार, मुख्यमंत्री आवास से जैसे ही भोज का आमंत्रण मिला। रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार पहुंच गये। जिनका मुख्य मकसद मुख्यमंत्री की चाटुकारिता करना, उनके सम्मान में स्वयं को समर्पित कर देना और इसके बदले सरकारी विज्ञापन प्राप्त करना, मुंहमांगी उपहार प्राप्त करना, पैरवी कर अपने लोगों को धन्य – धन्य करा देना, होता हैं, पर इसके उलट इस भोज में कुछ ऐसे भी एक दो पत्रकार पहुंचे थे, जिनका इन सबसे कोई भी लेना देना नहीं होता, जब उन्होंने मुख्यमंत्री आवास पर पत्रकारों के हाल देखे तो भौचक्के रह गये, क्योंकि ये वे पत्रकार थे जिनके जेहन में केवल पत्रकारिता और सिर्फ पत्रकारिता ही होती है।
मुख्यमंत्री आवास पर मुख्यमंत्री के साथ पत्रकारों ने चर्चाएं भी की। पत्रकारों ने कुछ मांगे भी मुख्यमंत्री के सामने रखी। मुख्यमंत्री ने भी दिल खोलकर बातें की --- पत्रकारों के हाल, उनके सम्मान, फैलोशिप, जो अच्छे समाचार प्रसारित अथवा प्रकाशित करेगा, उन्हें सरकार सम्मानित करेगी, धन उपलब्ध करायेगी। पता नहीं क्या – क्या बातों का दौर चला। मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचे पत्रकार खुश, क्योंकि अब जो जितनी चाटुकारिता करेगा, उसे उतना ही लाभ मिलेगा। पत्रकारों को खुशी का ठिकाना नहीं था। अब रेवड़ियां केवल एक को नहीं, बल्कि सबको मिलेगी। फिर भी कुछ को चिंता थी कि ये कैसे हो सकता है। जिसे मुख्यमंत्री पहले से ही रेवड़ियां देते आये हैं, क्या इस प्रकार की शुरुआत से उन्हें तकलीफ नहीं होगी। क्योंकि वे तो चाहते ही हैं कि मुख्यमंत्री रेवड़ियां सिर्फ उन्हें ही दे, ऐसे भी मुख्यमंत्री, उन्हें रेवड़ियां देने में सबसे ज्यादा आगे रहते है, क्यूं रहते है, ये तो मुख्यमंत्री ही बेहतर बता सकते है।
मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये भोज में कुछ ऐसे तथाकथित पत्रकार भी पहुंचे थे, जिनका मुख्यमंत्री आवास पर आना जाना बराबर होता हैं, जो इनके सामने साष्टांग दंडवत् किये हुए रहते है और मुख्यमंत्री भी बड़ी उदारता से उन्हें लाखों के विज्ञापन और उपहार देकर, उपकृत करते रहते हैं, यहीं नहीं, मुख्यमंत्री को भी खुद उनके साथ बैठना और बातें करते रहना अच्छा लगता हैं, ऐसे भी अपनी बड़ाई सुनना किसे अच्छा नहीं लगता। जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी बड़ाई सुनने में आनन्द प्राप्त होता है, तो ये तो झारखंड के मुख्यमंत्री है। पर जनता जानती हैं कि दोनों के कामकाज में आकाश जमीन का फर्क हैं। एक ने अपने काम काज से, अखबारों में सुर्खियां बटोरी, आवश्यकतानुसार विज्ञापन दिये, तो दूसरे ने काम काज पर कम और अपनी छवि जनता के बीच बेहतर दिखे, इसके लिए पत्रकारों को विज्ञापन और उपहार के लॉलीपॉप का लालच दिखाया, और पत्रकार भी इस लॉलीपॉप के आगे उछलते कूदते नजर आये।
ऐसे में झारखंड की जनता के पास मरने के सिवा दूसरा क्या रास्ता बचा हैं। जहां का शासक अपनी छवि बेहतर दीखे, उसके लिए पत्रकारों को मुंहमांगी धन व उपहार देकर, उनकी मुंह बंद करना चाहता हैं और पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के आगे अपनी मुंह बंद करने के लिए करवद्ध हो, खड़ा रहता हैं, साष्टांग दंडवत् करता हैं, उस राज्य का भगवान ही मालिक है।
जिस प्रकार से मुख्यमंत्री आवास में पत्रकारों के लिए भोज आयोजित किये जाते है, और जिस प्रकार से पत्रकार उन भोजों पर टूटते हैं, उसे देखकर कोई भी सामान्य व्यक्ति लज्जित हो जाता हैं कि ये आदमी हैं या कुछ और.......!
कभी – कभी तो मैंने खुद देखा हैं कि मुख्यमंत्री आवास अथवा अन्य जगहों पर जिन पत्रकारों को भोज पर आमंत्रित नहीं किया जाता, जो सिर्फ समाचार संकलन के लिए जाते है, वे भी बिना किसी आग्रह के भोजन व उपहार पर टूट पड़ते हैं, जो बताता हैं कि यहां किस प्रकार की पत्रकारिता चल रही है और जब पत्रकार खुद बिकने को तैयार है तो शासक वर्ग को खरीदने में क्या दिक्कत, वो अपना काम कर रहा है।

Sunday, March 6, 2011

आखिर सुमन गुप्ता को जाना ही पड़ा........।

दसवीं का जब छात्र था, तो उस वक्त कहानी संकलन नामक पुस्तक चला करती थी। उसी में मैंने मुंशी प्रेमचंद की लिखित कहानी नमक का दारोगा पढ़ा था, जिसमें एक पिता अपने पुत्र को नौकरी में जाने के पूर्व हिदायत दी कि बेटा मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद हैं, उपरि आमदनी बहता हुआ स्रोत हैं यानी नाना प्रकार से व्यवहारिक जिंदगी अपनाने की बात, अपने बेटे से कहीं, पर बेटा नहीं माना। नमक का दारोगा बना। ईमानदारी से जिंदगी बितानी शुरु कर दी। एक समय ऐसा आया कि धन ने धर्म पर जीत दर्ज कर ली, पर अंततः कहानी के अंत अंत आते आते, धर्म की जीत हो जाती है। यहीं जीत बताती हैं, कि भारत का ध्येय वाक्य सत्यमेव जयते की सर्वदा जय होती है, इसीलिये भय नहीं करें, संघर्ष करें, आगे बढ़ते जाये, और देश व समाज को नयी दिशा दे दे।
सुमन गुप्ता जो पुलिस अधीक्षक के पद पर धनबाद में शोभायमान थी। आज वो वहां नहीं है, उन्हें राज्य सरकार ने रांची वायरलेस के एसपी पद पर स्थानांतरित कर दिया। धनबाद एसपी के रुप में आर के धान को पदभार ग्रहण करने के लिए कहा गया है। हम आपको बता दें कि सुमन गुप्ता जैसी वीरांगनाएं कई कभी कभार ही जन्म लेती है, जबकि आर के धान जैसे लोगों की संख्या झारखंड में बहुत है, आर के धान न कभी, सुमन गुप्ता बन सकते है और न उन्हें बनने की आवश्यकता है। ऐसे तो राज्य सरकार ने पहले ही सुमन गुप्ता को स्थानांतरित करने का फैसला ले लिया था पर पता नहीं क्या उनकी मजबूरी हो गयी, उन्होंने स्थानांतरण के फैसले को स्थगित कर दिया और अब अचानक, इसे इम्पलीमेंट करा दिया। हालांकि सामान्य जनता जानती हैं कि ऐसा क्यूं हुआ हैं, और हमें लिखने में कोई दिक्कत नहीं कि राज्य सरकार ने कुख्यात कोयलामाफियाओं और कोयलांचल के कुख्यात अपराधियों, सत्तापक्ष और संपूर्ण विपक्ष में शामिल भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट वरीय पुलिस पदाधिकारियों व भ्रष्ट पत्रकारों के आगे घूटने टेकते हुए, वो कर दिया, जिसकी आशा सामान्य जनता को पहले से ही थी। सामान्य जनता जानती थी कि जिस प्रकार से सुमन गुप्ता कोयलांचल के कोलमाफियाओं पर एक एक कर हमले करते हुए, उन्हें उनकी औकात बता रही हैं, वो ज्यादा दिनों तक धनबाद नहीं टिकेंगी। और आखिर वहीं हुआ भी, नहीं टिकी। ऐसे भी यहां कोई पुलिस पदाधिकारी वो भ्रष्ट ही क्यूं न हो, ज्यादा दिनों तक नहीं टिकता, क्योंकि राज्य के वरीय पुलिस पदाधिकारी आईपीएस ही नहीं, यहां तक की आईएएस अधिकारी भी, जब झारखंड कैडर चुनते हैं तो उनकी पहली और अंतिम इच्छा होती हैं कि एक बार धनबाद संभाला जाये, क्योंकि धनबाद में वो सब कुछ है, जिसके कारण दुनिया की सारी सुख सुविधाएं, देखते ही देखते, उनके घर में आ जाती है। इसलिए हमारा मानना है कि महत्वपूर्ण ये नहीं कि धनबाद में कौन कितने दिन एसपी के रुप में रहा, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन भी रहा, कैसे रहा। और हमें ये कहने में गुरेज नहीं कि, सुमन गुप्ता का कार्यकाल अद्वितीय रहा है और आज के बाद धनबाद में जो भी एसपी आयेंगे, उन्हें सुमन गुप्ता बनने में, पसीने छूट जायेंगे। धनबाद से सुमन गुप्ता का जाना, भ्रष्ट व्यवस्था के हावी होने और भ्रष्ट अर्जुन मुंडा सरकार का प्रत्यक्ष और सुंदर उदाहरण है। कुख्यात कोयला माफियाओं, कुख्यात अपराधियों, कुख्यात पुलिस पदाधिकारियों की फौज, इस वीरांगना के खिलाफ लगी थी, जिसमें ये एकमात्र महिला अपनी पूरी ताकत लगाकर, भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ रही थी, ठीक उसी प्रकार जब 1857 में सिंधिया परिवार अंग्रेजों से मित्रता करने की संधि कर रहा था, और उसी वक्त लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से चुन चुन कर बदला ले रही थी, संघर्ष कर रही थी। जिस पर सुप्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है –
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया,
ने छोड़ी रजधानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वो तो,
झांसी वाली रानी थी।
मैं भी कहना चाहता हूं, जब सुमन गुप्ता भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिस पदाधिकारियों, कुख्यात कोल माफियाओं, भ्रष्ट पत्रकारों को उनकी औकात बता रही थी, तब अर्जुन मुंडा की सरकार, इन भ्रष्ट लोगों के साथ सुर में सुर मिलाकर ये कह रही थी कि ऐ भ्रष्टाचारियों, चिंता मत करों, मैं हूं न। जल्द ही, उक्त महिला को, मैं वहां से हटाकर, उसे ऐसा शंट करुंगा कि तुम देखते रह जाओगे। और अर्जुन मुंडा की सरकार ने ये करके दिखा दिया। शर्म – शर्म।
इधर सुमन गुप्ता का स्थानांतरण पत्र आया, उधर उक्त महिला ने तनिक देर नहीं की और अपना बोरा बिस्तर बांध लिया, चल दी। इधर आम जनता को पता लगा कि सुमन गुप्ता जा रही हैं, आम जनता की भीड़ उनके आवास पर आ खड़ी हुई, किसी के हाथों में फूल मालाएं थी, तो कोई उनसे ऑटोग्राफ ले रहा था। आश्चर्य कोई पैसा कमाता हैं तो कोई यश। मैंने कोयलांचल में, कई एसपी को आते जाते देखा, पर आज तक किसी एसपी की, ऐसी विदाई नहीं देखी।
सचमुच मह्त्वपूर्ण ये नहीं, कि कौन कितने दिन जिया, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन जिया, कैसे जिया। शेर की तरह या मच्छड़ की तरह। अब धनबाद में शायद ही कोई एसपी के रुप में शेर दिखेगा। शेर लिखने का मतलब, पुरुषार्थ से हैं। सुमन गुप्ता गर चाहती तो वो भी अन्य भ्रष्ट अधिकारियों और समझौतावादी व्यवहार, भ्रष्ट नेताओं की चाटुकारिता कर वो पद पा लेती, जिसकी चाहत यहां के आईएएस व आईपीएस अधिकारियों को होती हैं, पर जो रास्ता उन्होंने अपनाया है, ईश्वर से यहीं प्रार्थना हैं कि उस पर सदैव चलती जाये, क्योंकि ये मार्ग कठिन है, इस राह में नाना प्रकार की परीक्षाएं होती है और उन परीक्षाओं में सफल होना बहुत ही कठिन होता है। क्योंकि आईएएस व आईपीएस बन जाना आसां हो जाता है, पर इस पद को पाकर, एक अच्छा इंसान बनना, पुरुषार्थी इंसान बनना, लक्ष्मीबाई बनना, बहुत मुश्किल होता है। निरंतर संघर्ष करते जाईये, सुमन जी, आप खूब चमकेंगी, क्योंकि ईश्वर आपके साथ है।