Wednesday, March 23, 2011

हमारा प्रधानमंत्री और यहां के पत्रकार बड़े होशियार हैं.......!

संदर्भ --- घूस देकर सरकार बचाने का...

चाहे सदन में चर्चा हो या न हो। गर हो भी तो भले ही उसका अर्थ न निकले। पर प्रधानमंत्री मनमोहन जी और यूपीए की नेता सोनिया गांधी को मालूम होना चाहिए कि भारत की जनता इतनी मूर्ख नही, जितना वो समझते हैं। भारत की सौ करोड की आबादी जानती हैं कि जो केन्द्र में सरकार चल रही हैं, वो भ्रष्टाचार को आत्मसात कर ही चल रही हैं, और इसी सरकार ने पिछली बार 14 वी लोकसभा में अपनी कुर्सी को बचाने के लिए, सांसदों को घूस दिये थे। ये अलग बात हैं कि जिनके पास सबूत थे, उन पत्रकारों और नेताओं ने इस सरकार के आगे अपनी जमीर बेच दी थी। प्रधानमंत्री जी का संसद में विकीलीक्स मामले पर विपक्षी नेताओं के प्रश्नों के जवाब के दौरान ये कहना कि इसका कोई सबूत नहीं कि उऩकी पार्टी अथवा सरकार ने घूस देकर, सरकार बचायी थी, इसलिए वे निर्दोष हैं अथवा उनकी पार्टी या सरकार दोषी नहीं हैं, बचकाना बयान हैं। ये तो वहीं बयान हैं जब कोई अपराधी, अपराध तो करता हैं, जिसका ताउम्र उसे एहसास होता भी रहता हैं, पर अपने अपराधिक सबूतों को बड़ी ही सफाई से इस प्रकार गायब कर देता हैं, जिसका पता दूसरों को नहीं लगता। पर इस बार विकीलीक्स द्वारा किया गया खुलासा कि कांग्रेस ने सांसदों को घूस देकर अपनी सरकार बचायी थी, सब कुछ क्लियर कर देता हैं कि इस देश में कैसे – कैसे राजनीतिज्ञ शासन कर रहे हैं और इसका साथ यहां के तथाकथित जमीर बेचने वाले पत्रकार कैसे दे रहे हैं । ऐसे तो सभी जानते हैं कि कांग्रेस और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय हैं। चाहे विदेशों में धन रखने की बात हो या विभिन्न घोटालों को जन्म देना ये कांग्रेसियों का बायें हाथ का खेल हैं। ये अलग बात हैं कि भारत इनके द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार के बावजूद भी सरकता हुआ आगे बढ़ता जा रहा हैं, क्योंकि यहां की आज भी एक बहुत बड़ी आबादी देश को आगे बढ़ाने के लिए अपना खून पसीना बहाती जा रही हैं, ये कहकर कि-----
तेरा वैभव अमर रहे मां,
हम दिन चार रहे ना रहे
इस देश का दुर्भाग्य रहा हैं कि जब से ये देश स्वतंत्र हुआ तब से लेकर आज तक ज्यादातर समय तक कांग्रेसियों का शासन रहा हैं, जिन्होंने शायद संकल्प कर लिया हैं कि वे इस देश का बंटाधार करके रहेंगे। उनके इस संकल्प को पूरा करने में, वे पत्रकार भी शामिल हो गये हैं, जिनका मकसद, समाचारों के माध्यम से पत्रकारिता और देश सेवा न कर ब्लैकमेलिंग करना हैं, पर इन ब्लैकमेलर पत्रकारों को भी कैसे ठीक किया जाता हैं, शायद कांग्रेसियों को बहुत अच्छी तरह पता हैं। इसलिए जिन पत्रकारों अथवा चैनल के पास सासंदों को घूस देनेवाली खबर व उसके पूख्ता सबूत मौजूद थे, उस चैनल और उसके पत्रकारों ने बिना देर किये कांग्रेसियों के चरण पकड़ लिये ये कहकर कि आप हो तो हम हैं, इसलिए आप घबराये नहीं, हम कभी भी उस खबर को अपने चैनल पर नहीं दिखायेंगे, जिसकी वजह से सरकार पर आंच आती हो, आप जो कहेंगे, वहीं करेंगे। इसलिए, उस वक्त, उक्त चैनल ने वो समाचार नहीं दिखायी, जिसको देखने के लिए भारत की जनता बेकरार थी, जिसका कथन था, खबरें किसी भी कीमत पर वो पता नहीं कौन सी कीमत लेकर अपना जमीर बेच चुका था। पर जनता तो जनता हैं वो जान चुकी थी कि दाल में काला हैं, पत्रकारों ने जमीर बेचा हैं, सब जगह थू थू होने लगी, उक्त चैनल ने बहुत दिनों बाद, जब मामला ठंडा पड़ गया, समाचार दिखाई, वो भी जैसे तैसे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, कांग्रेसियों ने पूरे प्रकरण को गड्मगड कर दिया था, वे अपने मकसद में कामयाब हो गये थे, पर कहा जाता हैं न कि सच, सच होता हैं, विकीलीक्स ने रहस्योदघाटन करके बता दिया कि कांग्रेसियों ने घूस देकर, अपनी सरकार बचायी, और केन्द्र की सोनिया मनमोहन की सरकार तो नंगी हुई ही, वे पत्रकार भी नंगे हो गये जिनके पास सत्य था पर वे सत्य दिखाने का साहस नहीं दिखा सकें । जो पत्रकार कहते हैं कि वे खबरें किसी भी कीमत पर जाकर दिखा सकते हैं। वे भी कांग्रेसियों के चरणोदक पीने को बेताब हो जाते हैं, जब कांग्रेसियों की धमक, उन पत्रकारों के कानों तक पहुंच जाती हैं। लेकिन देश के अन्य इमानदार पत्रकारों द्वारा, उन जमीर बेचनेवाले पत्रकारों अथवा चैनलों पर थू थू की जाती है, तब भी ये बेशर्मी से अपने को पाक साफ बताने में लग रहते हैं। जब देश के संसदीय इतिहास में पहली बार, नोटों के बंडलों को भाजपाईयों द्वारा रखा जा रहा था और ये नेता ये कहकर चिल्ला रहे थे कि उन्हें कांग्रेसियों ने खरीदने की कोशिश की, जिसका सबूत देश के एक प्रमुख चैनल और पत्रकार के पास था, उसने किस कारण से अपनी जमीर बेच दी, वे तो वहीं बता सकते हैं, पर देश की जनता जान गयी थी कि यहां नेता व पत्रकार सभी मिले हैं, सभी तरमाल खा रहे हैं, सभी देश को बर्बाद करने में तूले हैं, चारो ओर घोर अंधियारा हैं, कहीं कोई किनारा नहीं हैं, इसलिए जनता सब कुछ जानते हुए भी, एक बार फिर अनिच्छा से विष पीया और कांग्रेस को सत्ता सौंप दी, और इस सता को पाने के बाद कांग्रेसियों ने तो समझ लिया कि भारत की जनता उनके साथ हैं, इसलिए भ्रष्टाचार का कीर्तिमान बनाओ, और देश के दिल्ली में बैठे पत्रकारों को साम दाम दंड भेद के तहत अपने पास मिलाये रखों और देश पर शासन करने का मजा लेते रहो। शर्म हमें आती हैं कि हम उस कालखंड में रह रहे हैं, जहां जमीर बेचनेवाले नेता व पत्रकार देश के शीर्ष स्थानों पर बैठकर, भारत के विकास का बेशर्मी राग, देशवासियों को सुना रहे हैं, ये कितने बेशर्म हैं, इस बात का पता इसी से चल जाता हैं कि देश के संसद में भी बैठकर हसंते हुए, अपनी बेशर्मी का फागुनी राग सुना रहे होते हैं, और इनके फागुनी राग में पत्रकार भी ये कहकर बेशर्म बनते हैं, कि कांग्रेसी और मनमोहन तो आज तक कुछ गलत किया ही नहीं, ये तो विपक्षी दल के नेताओं की आदत हैं, सत्तापक्ष को कठघरे में खड़ा करने की, इसलिए गाहे बगाहे चिल्लाते रहते हैं। इसलिए इन्हें चिल्लाने दीजिये। हम अपना काम करते रहे। यानी की, हम हमेशा जीवित थोड़े ही रहेंगे, जब तक जीयेंगे ऐश करके जीये, देश भाड़ में जाये, जिनको देश के बारे में सोचना हैं, वो सोचे। अपना क्या हैं, खाओ, पीओ, ऐश करो। देश पर चीन हमले की योजना बनाये अथवा पाकिस्तान व बांगलादेश हमारी सरहदों को छोटा करने की कोशिश करें तो उससे हमें क्या। हमने ही ठेका ले रखा हैं, भारत का क्या।

Monday, March 14, 2011

तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा..................!


जी हां। तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा। कुछ ऐसी ही सोच है, झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का। जोड़ – तोड़, सांठ – गांठ, तिकड़मबाजी में महारत हासिल, भाजपा के इस नेता ने झारखंड की सत्ता संभालने के बाद अपनी छवि जनता के बीच ठीक जाये, इसके लिए, इन्होंने अपने आवास पर 12 मार्च 2011 को मीडियाकर्मियों को भोज पर आमंत्रित किया, और उनसे गुफ्तगू की। इस गुफ्तगू में रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के गण्यमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया। सभी पहुंचे भी। क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री ने भोज पर आमंत्रित किया था। ऐसे भी जब दिल्ली में प्रधानमंत्री, दिल्ली के पत्रकारों को अपने आवास पर भोज में आमंत्रित करें तो भला किस पत्रकार की लार नहीं टपकेगी। ठीक उसी प्रकार, मुख्यमंत्री आवास से जैसे ही भोज का आमंत्रण मिला। रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार पहुंच गये। जिनका मुख्य मकसद मुख्यमंत्री की चाटुकारिता करना, उनके सम्मान में स्वयं को समर्पित कर देना और इसके बदले सरकारी विज्ञापन प्राप्त करना, मुंहमांगी उपहार प्राप्त करना, पैरवी कर अपने लोगों को धन्य – धन्य करा देना, होता हैं, पर इसके उलट इस भोज में कुछ ऐसे भी एक दो पत्रकार पहुंचे थे, जिनका इन सबसे कोई भी लेना देना नहीं होता, जब उन्होंने मुख्यमंत्री आवास पर पत्रकारों के हाल देखे तो भौचक्के रह गये, क्योंकि ये वे पत्रकार थे जिनके जेहन में केवल पत्रकारिता और सिर्फ पत्रकारिता ही होती है।
मुख्यमंत्री आवास पर मुख्यमंत्री के साथ पत्रकारों ने चर्चाएं भी की। पत्रकारों ने कुछ मांगे भी मुख्यमंत्री के सामने रखी। मुख्यमंत्री ने भी दिल खोलकर बातें की --- पत्रकारों के हाल, उनके सम्मान, फैलोशिप, जो अच्छे समाचार प्रसारित अथवा प्रकाशित करेगा, उन्हें सरकार सम्मानित करेगी, धन उपलब्ध करायेगी। पता नहीं क्या – क्या बातों का दौर चला। मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचे पत्रकार खुश, क्योंकि अब जो जितनी चाटुकारिता करेगा, उसे उतना ही लाभ मिलेगा। पत्रकारों को खुशी का ठिकाना नहीं था। अब रेवड़ियां केवल एक को नहीं, बल्कि सबको मिलेगी। फिर भी कुछ को चिंता थी कि ये कैसे हो सकता है। जिसे मुख्यमंत्री पहले से ही रेवड़ियां देते आये हैं, क्या इस प्रकार की शुरुआत से उन्हें तकलीफ नहीं होगी। क्योंकि वे तो चाहते ही हैं कि मुख्यमंत्री रेवड़ियां सिर्फ उन्हें ही दे, ऐसे भी मुख्यमंत्री, उन्हें रेवड़ियां देने में सबसे ज्यादा आगे रहते है, क्यूं रहते है, ये तो मुख्यमंत्री ही बेहतर बता सकते है।
मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये भोज में कुछ ऐसे तथाकथित पत्रकार भी पहुंचे थे, जिनका मुख्यमंत्री आवास पर आना जाना बराबर होता हैं, जो इनके सामने साष्टांग दंडवत् किये हुए रहते है और मुख्यमंत्री भी बड़ी उदारता से उन्हें लाखों के विज्ञापन और उपहार देकर, उपकृत करते रहते हैं, यहीं नहीं, मुख्यमंत्री को भी खुद उनके साथ बैठना और बातें करते रहना अच्छा लगता हैं, ऐसे भी अपनी बड़ाई सुनना किसे अच्छा नहीं लगता। जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी बड़ाई सुनने में आनन्द प्राप्त होता है, तो ये तो झारखंड के मुख्यमंत्री है। पर जनता जानती हैं कि दोनों के कामकाज में आकाश जमीन का फर्क हैं। एक ने अपने काम काज से, अखबारों में सुर्खियां बटोरी, आवश्यकतानुसार विज्ञापन दिये, तो दूसरे ने काम काज पर कम और अपनी छवि जनता के बीच बेहतर दिखे, इसके लिए पत्रकारों को विज्ञापन और उपहार के लॉलीपॉप का लालच दिखाया, और पत्रकार भी इस लॉलीपॉप के आगे उछलते कूदते नजर आये।
ऐसे में झारखंड की जनता के पास मरने के सिवा दूसरा क्या रास्ता बचा हैं। जहां का शासक अपनी छवि बेहतर दीखे, उसके लिए पत्रकारों को मुंहमांगी धन व उपहार देकर, उनकी मुंह बंद करना चाहता हैं और पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के आगे अपनी मुंह बंद करने के लिए करवद्ध हो, खड़ा रहता हैं, साष्टांग दंडवत् करता हैं, उस राज्य का भगवान ही मालिक है।
जिस प्रकार से मुख्यमंत्री आवास में पत्रकारों के लिए भोज आयोजित किये जाते है, और जिस प्रकार से पत्रकार उन भोजों पर टूटते हैं, उसे देखकर कोई भी सामान्य व्यक्ति लज्जित हो जाता हैं कि ये आदमी हैं या कुछ और.......!
कभी – कभी तो मैंने खुद देखा हैं कि मुख्यमंत्री आवास अथवा अन्य जगहों पर जिन पत्रकारों को भोज पर आमंत्रित नहीं किया जाता, जो सिर्फ समाचार संकलन के लिए जाते है, वे भी बिना किसी आग्रह के भोजन व उपहार पर टूट पड़ते हैं, जो बताता हैं कि यहां किस प्रकार की पत्रकारिता चल रही है और जब पत्रकार खुद बिकने को तैयार है तो शासक वर्ग को खरीदने में क्या दिक्कत, वो अपना काम कर रहा है।

Sunday, March 6, 2011

आखिर सुमन गुप्ता को जाना ही पड़ा........।

दसवीं का जब छात्र था, तो उस वक्त कहानी संकलन नामक पुस्तक चला करती थी। उसी में मैंने मुंशी प्रेमचंद की लिखित कहानी नमक का दारोगा पढ़ा था, जिसमें एक पिता अपने पुत्र को नौकरी में जाने के पूर्व हिदायत दी कि बेटा मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद हैं, उपरि आमदनी बहता हुआ स्रोत हैं यानी नाना प्रकार से व्यवहारिक जिंदगी अपनाने की बात, अपने बेटे से कहीं, पर बेटा नहीं माना। नमक का दारोगा बना। ईमानदारी से जिंदगी बितानी शुरु कर दी। एक समय ऐसा आया कि धन ने धर्म पर जीत दर्ज कर ली, पर अंततः कहानी के अंत अंत आते आते, धर्म की जीत हो जाती है। यहीं जीत बताती हैं, कि भारत का ध्येय वाक्य सत्यमेव जयते की सर्वदा जय होती है, इसीलिये भय नहीं करें, संघर्ष करें, आगे बढ़ते जाये, और देश व समाज को नयी दिशा दे दे।
सुमन गुप्ता जो पुलिस अधीक्षक के पद पर धनबाद में शोभायमान थी। आज वो वहां नहीं है, उन्हें राज्य सरकार ने रांची वायरलेस के एसपी पद पर स्थानांतरित कर दिया। धनबाद एसपी के रुप में आर के धान को पदभार ग्रहण करने के लिए कहा गया है। हम आपको बता दें कि सुमन गुप्ता जैसी वीरांगनाएं कई कभी कभार ही जन्म लेती है, जबकि आर के धान जैसे लोगों की संख्या झारखंड में बहुत है, आर के धान न कभी, सुमन गुप्ता बन सकते है और न उन्हें बनने की आवश्यकता है। ऐसे तो राज्य सरकार ने पहले ही सुमन गुप्ता को स्थानांतरित करने का फैसला ले लिया था पर पता नहीं क्या उनकी मजबूरी हो गयी, उन्होंने स्थानांतरण के फैसले को स्थगित कर दिया और अब अचानक, इसे इम्पलीमेंट करा दिया। हालांकि सामान्य जनता जानती हैं कि ऐसा क्यूं हुआ हैं, और हमें लिखने में कोई दिक्कत नहीं कि राज्य सरकार ने कुख्यात कोयलामाफियाओं और कोयलांचल के कुख्यात अपराधियों, सत्तापक्ष और संपूर्ण विपक्ष में शामिल भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट वरीय पुलिस पदाधिकारियों व भ्रष्ट पत्रकारों के आगे घूटने टेकते हुए, वो कर दिया, जिसकी आशा सामान्य जनता को पहले से ही थी। सामान्य जनता जानती थी कि जिस प्रकार से सुमन गुप्ता कोयलांचल के कोलमाफियाओं पर एक एक कर हमले करते हुए, उन्हें उनकी औकात बता रही हैं, वो ज्यादा दिनों तक धनबाद नहीं टिकेंगी। और आखिर वहीं हुआ भी, नहीं टिकी। ऐसे भी यहां कोई पुलिस पदाधिकारी वो भ्रष्ट ही क्यूं न हो, ज्यादा दिनों तक नहीं टिकता, क्योंकि राज्य के वरीय पुलिस पदाधिकारी आईपीएस ही नहीं, यहां तक की आईएएस अधिकारी भी, जब झारखंड कैडर चुनते हैं तो उनकी पहली और अंतिम इच्छा होती हैं कि एक बार धनबाद संभाला जाये, क्योंकि धनबाद में वो सब कुछ है, जिसके कारण दुनिया की सारी सुख सुविधाएं, देखते ही देखते, उनके घर में आ जाती है। इसलिए हमारा मानना है कि महत्वपूर्ण ये नहीं कि धनबाद में कौन कितने दिन एसपी के रुप में रहा, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन भी रहा, कैसे रहा। और हमें ये कहने में गुरेज नहीं कि, सुमन गुप्ता का कार्यकाल अद्वितीय रहा है और आज के बाद धनबाद में जो भी एसपी आयेंगे, उन्हें सुमन गुप्ता बनने में, पसीने छूट जायेंगे। धनबाद से सुमन गुप्ता का जाना, भ्रष्ट व्यवस्था के हावी होने और भ्रष्ट अर्जुन मुंडा सरकार का प्रत्यक्ष और सुंदर उदाहरण है। कुख्यात कोयला माफियाओं, कुख्यात अपराधियों, कुख्यात पुलिस पदाधिकारियों की फौज, इस वीरांगना के खिलाफ लगी थी, जिसमें ये एकमात्र महिला अपनी पूरी ताकत लगाकर, भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ रही थी, ठीक उसी प्रकार जब 1857 में सिंधिया परिवार अंग्रेजों से मित्रता करने की संधि कर रहा था, और उसी वक्त लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से चुन चुन कर बदला ले रही थी, संघर्ष कर रही थी। जिस पर सुप्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है –
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया,
ने छोड़ी रजधानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वो तो,
झांसी वाली रानी थी।
मैं भी कहना चाहता हूं, जब सुमन गुप्ता भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिस पदाधिकारियों, कुख्यात कोल माफियाओं, भ्रष्ट पत्रकारों को उनकी औकात बता रही थी, तब अर्जुन मुंडा की सरकार, इन भ्रष्ट लोगों के साथ सुर में सुर मिलाकर ये कह रही थी कि ऐ भ्रष्टाचारियों, चिंता मत करों, मैं हूं न। जल्द ही, उक्त महिला को, मैं वहां से हटाकर, उसे ऐसा शंट करुंगा कि तुम देखते रह जाओगे। और अर्जुन मुंडा की सरकार ने ये करके दिखा दिया। शर्म – शर्म।
इधर सुमन गुप्ता का स्थानांतरण पत्र आया, उधर उक्त महिला ने तनिक देर नहीं की और अपना बोरा बिस्तर बांध लिया, चल दी। इधर आम जनता को पता लगा कि सुमन गुप्ता जा रही हैं, आम जनता की भीड़ उनके आवास पर आ खड़ी हुई, किसी के हाथों में फूल मालाएं थी, तो कोई उनसे ऑटोग्राफ ले रहा था। आश्चर्य कोई पैसा कमाता हैं तो कोई यश। मैंने कोयलांचल में, कई एसपी को आते जाते देखा, पर आज तक किसी एसपी की, ऐसी विदाई नहीं देखी।
सचमुच मह्त्वपूर्ण ये नहीं, कि कौन कितने दिन जिया, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन जिया, कैसे जिया। शेर की तरह या मच्छड़ की तरह। अब धनबाद में शायद ही कोई एसपी के रुप में शेर दिखेगा। शेर लिखने का मतलब, पुरुषार्थ से हैं। सुमन गुप्ता गर चाहती तो वो भी अन्य भ्रष्ट अधिकारियों और समझौतावादी व्यवहार, भ्रष्ट नेताओं की चाटुकारिता कर वो पद पा लेती, जिसकी चाहत यहां के आईएएस व आईपीएस अधिकारियों को होती हैं, पर जो रास्ता उन्होंने अपनाया है, ईश्वर से यहीं प्रार्थना हैं कि उस पर सदैव चलती जाये, क्योंकि ये मार्ग कठिन है, इस राह में नाना प्रकार की परीक्षाएं होती है और उन परीक्षाओं में सफल होना बहुत ही कठिन होता है। क्योंकि आईएएस व आईपीएस बन जाना आसां हो जाता है, पर इस पद को पाकर, एक अच्छा इंसान बनना, पुरुषार्थी इंसान बनना, लक्ष्मीबाई बनना, बहुत मुश्किल होता है। निरंतर संघर्ष करते जाईये, सुमन जी, आप खूब चमकेंगी, क्योंकि ईश्वर आपके साथ है।

Tuesday, March 1, 2011

भारत क्या है .............................................

सदियों से भारत और भारत के बाहर के लोग भारत और उसकी अमूल्य धरोहर यानी इसकी संस्कृति के बारे में जानने की कोशिश करते रहे हैं। इसी क्रम में कुछ जान पायें और कुछ बिना जाने ही स्वर्ग सिधार गये। जिन्होंने जाना, उन्होंने जीने की कला सीख ली और खुद को धन्य करा दिया और जिन्होंने नहीं जाना, वे आज भी आवागमन में लगे हैं। क्या है भारत, क्यों ये आज भी जीवित है जबकि इसी दरम्यान कई देश जीवित हुए और मृत भी हो गये, पर भारत आज भी साकार खड़ा है। इसकी सीमाएं कालांतराल में फैली, सिकुड़ती गयी, पर इसके अस्तित्व पर कभी संकट नहीं आया और न आ पायेगा। शायद इसीलिए सुप्रसिद्ध शायर इकबाल ने आखिर लिख ही डाला कि ...
यूनान मिस्र रोमां, सब मिट गये जहां से,
अब तक मगर है बाकी, नामो निशां हमारा,
कुछ बात हैं कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा हैं, दुश्मन दौरे जहां हमारा......................

कमाल है, विश्व में कौन ऐसा देश है, जिस पर भारत जितने हमले हुए, और फिर इन हमलों से पार पाकर, वो देश फिर शान से खड़ा हो गया हो। इसका मतलब ही है कि भारत, अन्य देशों से कहीं भिन्न है, ये भोगभूमि नहीं, ये त्यागभूमि है। इसका कण-कण धर्म और देवत्व की परिभाषा कहता हैं, जरुरत हैं इसे समझने की। पर आज इसे समझने की फुरसत किसे है, गर नहीं हैं, तो समय का इंतजार करिये, प्रकृति खुद ऐसी लीलाएं करेगी कि आप को समझना आवश्यक पड़ जायेगा।
विष्णु पुराण कहता है………………………………………..
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रश्चैव दक्षिणम्।
वर्षम् तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।

अर्थात् हिमालय के दक्षिण और सागर के उत्तर में जो भूखण्ड है वो भारत के नाम से जाना जानेवाला हैं और उसकी संतान भारती कहलाती है।
भा का अर्थ होता है – प्रकाश, प्रभा, कांति, शोभा और रत का अर्थ है – उसमें रम जानेवाला। यानी प्रकाश की ओर सदैव गमन करनेवाले देश का नाम भारत है। कैसा प्रकाश तो उसका सीधा अर्थ है – ज्ञान का प्रकाश। सर्वप्रथम ज्ञानोदय यहीं हुआ, सभ्यता यहीं आयी और फिर इस ज्ञान के प्रकाश के आधार पर सारा विश्व आलोकित हुआ। सारा विश्व भी अब मान चुका है कि विश्व की पहली पुस्तक ऋग्वेद है और इससे ज्यादा वर्तमान में प्रमाणिक आधार दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
भारत और भारत का धर्म………………………………………………..
बार-बार धर्म को लोग, अपने अपने चश्मे से देखते हैं, कोई कहता है – हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, सिक्ख धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और पता नहीं कितने सारे धर्म आज विश्व में पैदा हो चुके हैं, जो अनगिनत हैं, हम कह सकते हैं कि जितने लोग, उतने धर्म। पर धर्म क्या है, उसका शाश्वत स्वरुप क्या है, उसका आधार क्या है, शायद ही इन धर्मों की वकालत अथवा इस पर गर्व करनेवालों को मालूम हो, पर सही में धर्म की व्याख्या बहुत पहले स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में कर दी थी – ये कहकर कि गर पूरे विश्व से हिन्दू धर्म समाप्त हो जाये और उसके जगह पर इस्लाम धर्म का बोलबाला अथवा ईसाई या अन्य किसी भी प्रकार के धर्मों का बोलबाला हो जाये तो उसके धर्म ध्वज अथवा उसके उपदेशों में क्या लिखा होगा – ये लिखा होगा कि झूठ बोलो, अमर्यादित आचरण करों, सज्जनों को दुख पहुंचाओं, नहीं तो फिर क्या लिखा होगा – यहीं न, कि सच बोलो, अमर्यादित आचरण न करों, सज्जनों को आनन्द पहुंचाओ, यहीं तो धर्म है। भारत तो सदियों से यहीं कहता आया है। यहीं धर्म का मूल स्वरुप हैं, आधार है। ऐसे भी धर्म शब्द की उत्पति ही संस्कृत के धृ धातु से हुई है। धृ का अर्थ है – धारण करना। क्या धारण करना तो सत्य धारयति धर्मः अर्थात् सत्य को धारण करना ही धर्म है। धर्म शाश्वत है यह प्रकृति के अधीन है। प्रकृति स्वयं सत्य आचरण करा लेती है कोई इसके विपरीत चल ही नहीं सकता। गर चलेगा तो प्रकृति उसे दंड देगी, ये पूर्णतः सत्य है। ठीक उसी प्रकार कि गर्मी के दिनों में कोई कंबल नहीं ओढ़ सकता, कंबल तभी ओढ़ेगा जब जाड़े का मौसम आयेगा। ये धर्म का सार है। किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा चलाया गया पंथ या मत – कदापि धर्म का स्वरुप नहीं ले सकता। क्योंकि धर्म उक्त व्यक्ति के पूर्व में नहीं रहने के बावजूद भी था और उक्त व्यक्ति के नहीं रहने पर भी रहेगा। वह मृत नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति के पंथ अथवा मत को माननेवाले पंथी अथवा मतावलंबी हो सकते है। धर्मावलंबी नहीं, धर्मावलंबी तभी होंगे जब वो प्रकृति के अनुरुप चलेंगे, भारत और भारत की वैदिक परंपराएं अथवा उपनिषद् यहीं कहती है, गर आप इसे नकारेंगे तो भला, वेदों अथवा उपनिषदों को क्या होनेवाला है, ठीक उसी प्रकार गर कोई आकाश पर थूकने का प्रयास करें तो क्या होगा, उत्तर उस व्यक्ति को खुद ही पता हैं, इस पर विवेचना की आवश्यकता नहीं।
भारत भोगभूमि नहीं, त्यागभूमि है........................................
ज्यादातर लोग आज पश्चिमी सभ्यता व संस्कृति से अनुप्राणित हो रहे है, उन्हें लगता हैं कि उनका जीवन पश्चिम की तरह सुखों का उपभोग करने के लिए हुआ हैं, इसलिए जमकर प्रकृति का दोहन करों, आनन्द पाओं और दुनिया से विदा हो जाओ, पर भारत के इतिहास को देखें तो यहां वहीं व्यक्ति जीवित रहा, जिसने त्याग को अपनाया, बाकी सभी मृतात्माओं की श्रेणी में आ गये। ये क्रम सदियों से चलता आ रहा है और चलता रहेगा, कोई इसे काटना भी चाहे तो नहीं काट पायेगा। कितने प्रमाण दूं।
जरा गोस्वामीतुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस अथवा वाल्मीकि रामायण का पृष्ठ उल्टे. प्रसंग अयोध्याकांड का है। राजा दशरथ अति प्रसन्न है। वे अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते है। सारी तैयारियां हो चुकी हैं, पर ऐन मौके पर कैकेयी, महाराज दशरथ से दो वर मांगती हैं, जिसमें राम को वनवास और भरत को राज्याभिषेक की मांग शामिल है। दशरथ किंकर्तव्यविमूढ़ है। क्या करें क्या न करें। पर श्रीराम मर्यादा का पालन करते हुए पुरुषार्थ के प्रथम सोपान त्याग को अपनाते हैं, धर्म की रक्षा करते हुए, पिता और रघुकुल की रीति प्रभावित न हो, वे वनगमन को स्वीकार करते हुए, जंगल की ओर निकल पड़ते है। राम चाहते तो आजकल की पीढ़ियों के अनुसार वे अपने पिता दशरथ से कह सकते थे कि पिताजी आपने माता कैकेयी को वर दिया था, मैंने नहीं, रघुकुल के नियमानुसार अयोध्या का राजा ज्येष्ठ पुत्र ही होता है, ऐसे में, मैं ही अयोध्या का असली उत्तराधिकारी हूं और मैं ही राजा बनुंगा। अब आप बताईये, जब श्रीराम इस प्रकार की मांग दशरथ के पास रखते तो वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते। उत्तर होगा – नहीं। तो ये है धर्म और ये है भारत। श्रीराम ने पिता के वचन को साकार करने के लिए, सारे सुखों का त्याग कर दिया, यहीं नहीं इसके बाद सीता और लक्ष्मण ने श्रीराम के लिए, महलों के सुख का परित्याग कर दिया। और अब आगे, श्रीराम के भाई भरत को पता चलता है कि उनकी माता कैकेयी, उनके लिए राज्याभिषेक और श्रीराम के लिए वनगमन की मांग कर दी है, तो वे अपनी माता कैकेयी तक का परित्याग करते हुए, अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम को वन से लौटाने के लिए, जंगल की ओर चल पड़ते है, यहीं नहीं 14 वर्षों तक अयोध्या में रहते हुए, भरत ने सारे सुखों का त्याग कर दिया और वनवासियों की तरह रहे, ये है त्याग की परिभाषा यानी भारत की परिभाषा का सुंदर उदाहरण।
एक और प्रसंग पर ध्यान दें...................................................
प्रसंग श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धाकांड का है
बालि श्रीराम के बाण से घायल है। घायल बालि ने कहा –
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि व्याध की नाई।।
मैं वैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा।।

श्रीराम ने कहा.......................
अनुज बधु भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।

यहां भी धर्म की व्याख्या हो गयी, गर आप चौपाईयों पर ध्यान दें तो भारत और भारत के धर्म की परिभाषा स्वतः प्राप्त हो जाती है।
ये तो भारत के महाकाव्यों में से एक की बात कही, हो सकता है कि कई मित्र इन उदाहरणों को धार्मिक कथा कहकर, इसे प्रमाण मानने से इनकार कर दें। उनके लिए भी भारत के कई उदाहरण जो समसामयिक है। मेरे पास मौजूद है।
जरा ध्यान दे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का काल खंड महात्मा गांधी, दक्षिण अफ्रीका से भारत आते है, भारत आते ही स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई जारी करने की घोषणा करते है। तभी उनकी मुलाकात गोपाल कृष्ण गोखले से होती है, गोपाल कृष्ण गोखले, उन्हें कहते है कि मिस्टर गांधी ( उस वक्त तक गांधी को महात्मा का खिताब, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने नहीं दिया था) जिस भारत की परिकल्पना वे अभी कर रहे है, वैसा भारत अभी नहीं हैं, स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई को ठीक ढंग से चलाने के लिए पहले, उन्हें यानी महात्मा गांधी को, भारत दर्शन का कार्यक्रम बनाना चाहिए, उसके बाद गांधी जी ने भारत दर्शन का कार्यकम बनाया। उसी दौरान, उन्होंने जो भारत की तस्वीर देखी, उनका हृदय विदीर्ण हो उठा। भारत और भारतीयों की दयनीय दशा देख उन्होंने सारे सुखों का त्याग करने का संकल्प लिया और उसके बाद जो उन्होंने सामान्य जन की वेष भूषा अर्थात् लंगोटी पहनी तो उसे आजीवन धारण किये रहे। फिर उन्होंने सामाजिक सुधार आंदोलन के साथ साथ देश की स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी, और उन्होंने खुद अपने आंखों से भारत की स्वतंत्रता को देखा। इसके बदले में, उन्होंने अपने लिए कुछ भी देश से नहीं मांगा, सिर्फ और सिर्फ देश को दिया। त्याग की ऐसी मिसाल किस देश में मिलती है। इसी त्याग के कारण तो गांधी अपनी मृत्यु के साठ साल बीत जाने के बाद भी, जीवित है। यहीं नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने इनके जन्म दिन को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी को लीजिए, इन्होंने इंदिरा गांधी के गर्व को चूर चूर कर दिया। संपूर्ण क्रांति की बात की। 1974 के छात्र आंदोलन और उसके बाद उपजे जनता के क्रोधाग्नि का सही नेतृत्व कर, उन्होंने 1977 में जनता पार्टी की सरकार बना दी, चाहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे, पर उन्होंने सत्ता से दूरी बनाये रखी, और कभी सत्ता की कामना ही नहीं की। मर गये, पर सामान्य जन की तरह जीवन जिया, और इसी जीवन के द्वारा, उन्होंने भारत की अमूल्य संस्कृति को बता दिया की, जीना इसी का नाम है।
भारतीय उपनिषद् तो स्पष्ट कहता है कि
नत्वामहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुर्नभवं।
कामये दुखतप्तानां, प्राणिणां आर्तनाशनम्।।

गर कोई सच्चा भारतीय है, तो वो न तो राज्य की कामना करेगा, न स्वर्ग की कामना करेगा, वो तो बस यहीं चाहेगा की सारे सुखों का त्याग कर, दुखियों और पीड़ितों के शोक को शमन करने के लिए, इस धरा पर बार बार आता रहे।
कौन सच्चा भारतीय अथवा पुरुषार्थ से भरा प्राणी रहा है, उसकी परीक्षा उसके पूरे जीवनकाल खंड के मूल्याकंण से हो जाती हैं कि उस व्यक्ति में कितना पुरुषार्थ रहा, जैसे चाणक्य ने कहा.
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते।
निर्घषणतापछेदनेताडनैः।।
तथा चतुर्भिः पुरुषं परीक्ष्यते।
त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।

जैसे सोने को चार प्रकार से परखा जाता है, घिसकर, तापकर, छेदकर और पीटकर। ठीक उसी प्रकार किसी पुरुष की पुरुषार्थ की परीक्षा, उसके अंदर त्याग, मर्यादा, गुण और कर्म की परीक्षा लेकर की जाती हैं। जो इसमें खड़ा उतरा वो सच्चा भारतीय और भारत माता का लाल, नहीं तो बस उसी प्रकार आये गये, जैसे इस श्लोक का भावार्थ...............................................
येषां न विद्या, न तपो, न दानं, न ज्ञान शीलं, न गुणो न धर्मः
ते मृत्युलोके भूविभारभूता, मनुष्यरुपेणमृगाश्चरन्ति।।

जो आज विज्ञान पर्यावरण की संकट के बारे में आगाह कर रहा है, उस संकट को लाया किसने खुद विज्ञान ने, और ऐसा होगा, इसके बारे में आगाह तो हमारे मणीषियों ने आज से हजारों वर्ष पहले कह दिया था कि एक दिन ऐसा आयेगा कि विज्ञान के नाम पर ही लोग, अपने जीवन के कालखंड को सदा के लिए बुझा देंगे। कमाल है, आज के जैसी टेक्नॉलॉजी तो, उनके पास थी ही नहीं, फिर भी वे कैसे जान गये। वो इसलिए जान गये, क्योंकि उन्होंने परमज्ञान की प्राप्ति के पीछे ही समय गवायां, व्यर्थ के पचड़े में नहीं पड़े, प्रकृति ने जैसा संदेश दिया, उस अनुरुप आचरण करते गये, खुद को बनाया, भारत को बनाया, भारत की संस्कृति को अनुप्राणित किया, अपने इस आचरण को और बेहतर और आनेवाले पीढ़ियों को संदेश देने के लिए उपनिषद और अनेक ग्रंथ उपलब्ध करा दिये, और इसे धर्म का स्वरुप दिया, कि शायद लोग समझेंगे और गर आप आज नहीं समझ रहे, तो उनमें उनका क्या दोष। फिर भी मैं मानता हूं कि आनेवाला समय भारत का हैं, निराशावादी होना, अज्ञानता का परिचायक होता है, जो ज्ञानवान हैं वे आशावादी होते हैं, परिवर्तन चक्र चलता रहता है। भारत का ध्येय वाक्य है – सत्यमेव जयते। एक दिन सत्य की जीत होगी, धर्म का वर्चस्व बढ़ेगा, प्रकृति सभी को आगोश में लेगी, भारत फिर खिल उठेगा, त्याग की भूमि फिर इठलायेगी, चिंता की कोई आवश्यकता नहीं।
अंत में, कबीर की पंक्ति मुझे याद आ रही है, जो उन्होंने बहुत पहले कहा था.......
मन लागा, मेरा यार फकीरी में,
जो सुख पाउं, राम भजन में
वो सुख नाही, अमीरी में,
भला – बुरा, सब का सुन लीजै,
कर गुजरान, गरीबी में,
मन लागा मेरा यार फकीरी में,
आखिर ये तन, खाक मिलेगा,
कहां फिरत मगरुरी में,
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
साहिब मिले, सबूरी में,
मन लागा मेरा यार, फकीरी में....................................................

Monday, February 28, 2011

राष्ट्रीय खेल के शानदार आयोजन पर झारखंड को बधाई..............

झारखंड की आज सभी मुक्तकंठ से प्रशंसा कर रहे हैं, प्रशंसा हो भी क्यूं नहीं। झारखंड ने वो कर दिखाया है, जिसकी आशा किसी को न थी। जब तक राष्ट्रीय खेल शुरु नहीं हो पाया था, राज्य व देश के कई समाचार पत्रों में झारखंड की तीखी आलोचना हो रही थी, कि झारखंड ऐसा प्रांत है, जहां राष्ट्रीय खेल भी यहां की सरकार आयोजन नहीं करा पाती, जो शर्मनाक है, पर आज जब राष्ट्रीय खेल संपन्न हो चुका है, सभी की बोलती बंद है। कमाल की बात ये है कि राष्ट्रीय खेल प्रारंभ से लेकर संपन्न होने तक झारखंड सुर्खियों में रहा है, जिस कारण हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। इस राष्ट्रीय खेल के दौरान जो कौतूक हमने देखे, उसका जिक्र मैं कर देना आवश्यक समझता हूं।
पहली बात कामनवेल्थ गेम्स देश की राजधानी दिल्ली में जब चल रहे थे, तो वहां दर्शकों और खेलप्रेमियों को टोटा नजर आता था। वहीं रांची के खेलगांव में, वलर्ड कप अंतराष्ट्रीय क्रिकेट के समय पर भी, यहां के झारखंडियों ने राष्ट्रीय खेल में दिलचस्पी ली, स्थिति तो ऐसी हो गयी कि एक दिन इतने खेलप्रेमी आ गये कि खेलगांव ही छोटा पड़ गया। खेलप्रेमियों ने खेलगांव में प्रदर्शन किया, हद हो गयी, खेलप्रेमियों के विशाल समूह ने, खेल न देख पाने से आक्रोशित होकर हंगामा तक खड़ा कर दी, पुलिस को लाठी चार्ज तक करनी पड़ गयी। यहीं नहीं इसी राष्ट्रीय खेल के दौरान जब महाराष्ट्र और झारखंड के बीच खेल में दर्शकों ने बेईमानी होती देखी तो उसके भी खिलाफ, यहां के दर्शकों ने अपना गुस्सा उतारा। इससे स्पष्ट है अथवा हम कह सकते हैं कि ऐसा दृश्य भारत के किसी भी प्रांत में अथवा नगर में राष्ट्रीय खेलों के दौरान आज तक देखने को नहीं मिला है। ये घटना इस बात की संकेत है कि यहां के लोग खेल को किस प्रकार से लेते है।
दूसरी बात, इसमें कोई दो मत नहीं कि यहां के अधिकारियों ने दिल से काम किया और अंतर्राष्ट्रीय तरह का स्टेडियम, खड़ा कर दिया। पर ये अंतर्राष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम कितने दिनों तक टिके रहेंगे, ये तो समय बतायेगा। पर जनता जानना चाहती हैं कि इसके अंदर की बात। पूरे राष्ट्रीय खेल पर शुरुआत से लेकर संपन्नता तक, क्या खर्च हुए, कैसे खर्च हुए, इस पूरे प्रकरण पर श्वेत पत्र तो अवश्य जारी होना चाहिए। यहां के नेताओं ने करीब करीब सत्तापक्ष या विपक्ष सभी ने यहां के अधिकारियों को बधाई दी है, पर सच्चाई ये भी हैं कि इन अधिकारियों और सत्तापक्ष व विपक्ष के नेताओं ने जिस प्रकार से उद्घाटन समारोह और समापन समारोह में अपने अपने चहेतो को दिल खोलकर पास दिये, मुफ्तखोरी का मजा लिया तथा जिस प्रकार पुलिसकर्मियों को राष्ट्रीय खेलों के दौरान अपने परिवारों की सेवा में लगा दी। वो दृश्य जनता भूली नहीं है।
राष्ट्रीय खेल को देखते हुए, हमें लगा था कि यहां झारखंड में परिवर्तन दिखेगा, पर हमें परिवर्तन नहीं दिखा। कुड़ें कर्कट आम दिनों की तरह सड़कों पर दीखे, रोड जाम आम दिनों की तरह था, सड़कों पर बने गड्ढे सरकार के चरित्र को दर्शा रहे थे, स्ट्रीट लाईट कहीं जल रही थी तो कहीं बूझी थी। ट्रैफिक लाईट तो कभी काम ही नहीं की और जब काम करनी शुरु की, तब तक राष्ट्रीय खेल अवसान की ओर चल पड़ा था। सड़कों पर चलनेवाले टेम्पूचालकों और बसचालकों ने तो कसम खा ली थी कि वे नहीं सुधरेंगे, इसलिए वे सुधरें नहीं, वे हर उस काम को किये, जिससे यातायात के नियमों के उल्लंघन होते थे, पुलिसकर्मी भी सोच लिये थे कि भला कुत्ते के पूछ भी कहीं सीधे होते हैं, इसलिए उन्होंने इन्हें सीधी करने की कोशिश भी नहीं की। एक पुलिसकर्मी ने कहा कि भला राष्ट्रीय खेल आज हो रहा है, कल खत्म हो जायेगा, उन्हें तो नौकरी यहीं बजानी है, गर किसी टेम्पू अथवा बस के मालिक ने, उसी के बॉस से शिकायत कर दी, तो फिर लेने के देने पड़ जायेंगे, कहीं ऐसी जगह बदली हो गयी तो फिर नक्सली के आगे बैंड कौन बजाये। राष्ट्रीय खेल हो जाना, ये तो होना ही था, ये कौन सी बड़ी बात हैं, जिसके लिए लोग एक दूसरे को श्रेय दे रहे हैं तो दूसरा श्रेय लेने के लिए तिकड़मबाजी कर रहा हैं। सच्चाई ये हैं कि जिस प्रकार से राष्ट्रीय खेल का आयोजन होना चाहिए, जैसी व्यवस्था करनी चाहिए, वैसी हुई ही नहीं।
पहली बार हमने देखा कि राष्ट्रीय खेल से दिल्ली की केन्द्र सरकार, यानी भारत सरकार दूरी बनायी रखी, यहां तक केन्द्रीय खेल मंत्री ने भी इस राष्ट्रीय खेल के आयोजन में आना जरुरी नहीं समझा। कहनेवाले कह सकते हैं कि केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रुप में सुबोध कांत सहाय तो मौजूद ही थे, पर क्या यहां की जनता को नहीं मालूम की रांची संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व सुबोधकांत सहाय करते हैं और वे राष्ट्रीय खेल आयोजन समिति से भी जूड़े है, इसलिए उनका केन्द्र सरकार की ओर से प्रतिनिधित्व करने का सवाल ही नहीं उठता। पूर्व में राज्य सरकार ने राज्य की जनता को भरोसा दिलाया था कि भारत की राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री में से कोई न कोई, राष्ट्रीय खेल के उद्घाटन अथवा समापन समारोह में जरुर पहुंचेगा, पर खेल समाप्त हो गया, इन बड़े – बड़े महानुभावों को छोड़ दीजिये, केन्द्रीय खेल मंत्री ने भी, इसमें अपना योगदान देना उचित नहीं समझा, क्यूं नहीं समझा। ये केन्द्रीय खेल मंत्री ही बता सकते है। पर आम जनता इतना जरुर जानती हैं कि इन सब का न आना खेल की राजनीति का एक अंग है। शायद केन्द्र सरकार के नेताओं व मंत्रियों को यहां के कुछ नेताओं ने फीडबैक दिया होगा कि पूरे इस राष्ट्रीय खेल को राज्य सरकार ने हाईजैक कर लिया है, इसलिए उनका यहां आना ठीक नहीं होगा, जिसकी वजह से केन्द्र के नेताओं अथवा मंत्रियों ने झारखंड में आयोजित राष्ट्रीय खेल से ऐसी दूरी बना ली कि जिसकी जितनी आलोचना की जाये, कम है। हालांकि केन्द्र के नेता अपने बचाव के लिए, अनेक डायलॉग संभाल कर रखे हैं, जिसमें एक संवाद तो सुरेश कलमाडी से जूड़ा है।
मैं बता देना चाहता हूं केन्द्र और राज्य सरकारों को। कि वे कृपया खेल में राजनीति न आने दें, नहीं तो उनका सत्यानाश हो या न हो पर खेल का सत्यानाश अवश्य हो जायेगा।
झारखंड में आयोजित राष्ट्रीय खेल ने एक और वाकया आम जनता के समक्ष पेश किया। जो भारत के राज्य सामाजिक और आर्थिक विकास के पायदान पर पहले और दूसरे स्थान पर हैं, यानी गुजरात और बिहार वे खेलों के मामले में फिसड्डी साबित हुए हैं, जबकि खेलों के मामले में मणिपुर जैसा पिछड़ा राज्य अग्रगणी बन गया। ये बता रहा हैं कि आनेवाले समय में, खासकर खेलों में मणिपुर क्या करने जा रहा है। हमें ये समझ में नहीं आता कि जो राज्य, जैसे गुजरात और बिहार सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में प्रगति कर रहे हैं तो उनका ध्यान खेलों की ओर क्यूं नहीं हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन राज्यों ने पूर्व के समय में प्रचलित कविता को कंठस्थ कर लिया हैं कि
पढ़ोगे लिखोगे, होगे नवाब
खेलोगे कूदोगे, होगे खराब
और इसी आधार पर, वे चलते चले जा रहे हैं। इन राज्यों को सोचना चाहिए कि विकास समग्रता में होनी चाहिए। इस राष्ट्रीय खेल में सर्विसेज के बाद पूरे राज्यों में भारत का पूर्व का छोटा राज्य मणिपुर 48 स्वर्ण, 37 रजत, 33 कांस्य यानी कुल 118 पदक जीतकर प्रथम स्थान पर रहा, जबकि गुजरात एक भी स्वर्ण नहीं जीत सका। गुजरात 3 रजत और 4 कांस्य पदक यानी मात्र सात पदक ही जीते, जबकि बिहार एक स्वर्ण, पांच रजत और 6 कांस्य पदक जीतकर मात्र बारह पदक जीतने में ही सफल रहा। बधाई झारखंड को, इस बात के लिए, जहां कल तक खेल का माहौल नहीं था, सरकार ने खिलाड़ियों को, अपनी ओर से कुछ भी नहीं उपलब्ध कराया था। पर झारखंड की जनता की जोश, उमंग और उत्साह ने खिलाड़ियों का ऐसा उत्साहवर्द्धन किया कि पदक तालिका में झारखंड 33 स्वर्ण, 26 रजत, 37 कांस्य यानी कुल 96 पदक जीतकर पांचवा स्थान प्राप्त किया। बिना किसी सरकारी सहायता के पांचवा स्थान प्राप्त कर लेना कोई सामान्य बात नहीं, इसलिए झारखंड के खिलाडी बधाई के पात्र है।
चलिए राष्ट्रीय खेल, झारखंड में संपन्न हो चुका है। सभी खेल से जूड़े अधिकारी, राज्य सरकार, पुलिसकर्मी और इससे जूड़े सभी अन्य लोग, आराम के मूड में होंगे, पर इतना तो तय हैं कि दक्षिण के एक छोटे से राज्य केरल ने रांची में राष्ट्रीय खेल के दौरान आयोजित समापन समारोह में, अपने प्रांत की एक सांस्कृतिक झलक दिखाकर, यहां के नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों को बता ही दिया कि उनका प्रांत आनेवाले राष्ट्रीय खेल को किस प्रकार ले रहा है और उसकी आयोजन किस प्रकार की है। कम से कम यहां की सरकार को तो इससे सबक लेनी ही चाहिए।
अंत में, एक बात और, यहां के नेता व मंत्री, पता नहीं कब भाषणबाजी करना बंद करेंगे। इनकी आदत होती है. चाहे वो जगह भाषणबाजी की हो अथवा न हो। ये भाषणबाजी करेंगे, जरुर। चाहे दर्शकों को, उनकी भाषणबाजी पसंद आये या नहीं, ये अपनी भाषणबाजी की जन्मघूंटी पिलायेंगे, जरुर। आश्चर्य इस बात की हैं कि जब जनता इनके भाषण को पसंद नहीं कर रही होती, और हूड करती हुई ताली बजाती हैं, तो इन नेताओं को लगता हैं कि जनता उनकी भाषण को पसंद कर रही होती है। राष्ट्रीय खेल के समापन समारोह में इसकी झलक भी मिली, जब एक नेता के भाषण के दौरान, आम जनता ने खुब हुल्लडबाजी की, पर यहां के नेता, इससे सबक लेंगे, हमें नहीं लगता।

Wednesday, February 23, 2011

वाह मुलायम...................!


समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेसनीत गठबंधन सरकार को आगाह किया है कि वे अपनी आदत तत्काल सुधारे और देश की जो स्थिति है, उस पर विचार करते हुए तत्काल प्रभाव से कदम उठाये, क्योंकि चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर, भारत पर हमला करने और भारतीय भूभाग को अपने कब्जे में करने के लिए लालायित है। मुलायम सिंह यादव, राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान अपना पक्ष सदन में रख रहे थे, खुशी इस बात की कि उनके भाषण के दौरान किसी भी पार्टी के लोगों ने हो हंगामा खड़ा नहीं किया, जैसा कि आम तौर पर होता हैं, विभिन्न दलों के छुटभैये सांसद, बेवजह हो हंगामा खड़ा कर, संसद का समय नष्ट कर रहे होते हैं।
आश्चर्य इस बात की है कि मुलायम सिंह यादव ने खुद के पहले दिये गये भाजपा नेता राजनाथ सिहं के भाषण का भी समर्थन किया कि चीन ने अपने लोगों से ऑनलाईन वोटिंग कर, चीनवासियों का मत भी मांगा हैं कि भारत पर हमला किया जाये या नहीं। ऐसे भी चीन की नीतियां रही हैं कि जब कमजोर रहो, तो चुपचाप रहो और बलवान हो जाओ तो दूसरे देश पर हमला कर दो, यहीं नहीं चीन की नीतियां ये भी रही हैं कि सीमा अथवा किसी भी विवाद का हल, शांति से नहीं युद्ध से ही किया जा सकता हैं, जब उनकी नीतियां ही ऐसी है तो फिर उन पर विश्वास कैसे किया जा सकता है। ऐसे भी इन पिछले पांच छह वर्षों में चीन ने जो सीमा पार हरकत की है और भारतीय भूभाग पर कब्जा जमाने का जो पैतरेबाजी की हैं, उसका समाचार विभिन्न इलेक्ट्रानिक चैनलों व प्रिंट मीडिया के माध्यम से देशवासियों के बीच आता रहा है, जिससे भारतीय जनता भी सशंकित हैं कि चीन कल क्या कर बैठे, पर हमारे देश की कांग्रेस सरकार इन सभी मामलों में चुप्पी साधी बैठी हैं, और आराम से टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, आदर्श घोटाला, एस बैंड घोटाला, खाद्यान्न घोटाला करते हुए देश का सम्मान प्रभावित कर रही है। यहीं नहीं जहां अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश विदेशों में गये अपने देश के धन को स्वदेश मंगवा रहे हैं, वहीं अपना देश का प्रधानमंत्री इस मामले पर किंकर्तव्यविमूढ़ है। इस पर अभी तक कोई नीति स्पष्ट नहीं कर पाया है। जहां चीन का प्रधानमंत्री अपने देश में आकर, बड़ी सफाई से अपनी बात कह कर चला जाता है, वहीं अपने देश का प्रधानमंत्री अपनी बात, अपने देश में हीं नहीं रख पाता। कमाल हैं, चीन, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को स्टैप्ल वीजा जारी करता है, वहीं हमारे देश का शासक ये भी नहीं कह पाता कि गर उसने ऐसा करना जारी रखा तो भारत भी तिब्बत के लोगों के लिए स्टैपल वीजा जारी करना शुरु करेगा।
यहीं नहीं हमने खुद देखा कि यहां की वामपंथी पार्टियों के शीर्षस्थ नेताओं ने कैसे चीनी शासक से सम्मानित होने के लिए लालायित दीखे, यहीं नहीं सम्मानित होने में गर्व भी महसूस किया, ये जानते हुए कि चीन की नीतियां भारत के प्रति कभी ठीक नहीं रही, यहीं नहीं अभी भी भारतीय भू भाग के कई हिस्सों पर चीन का अवैध कब्जा हैं, और दूसरी ओर एक बार फिर चीन ने भारत के अन्य भू भाग पर कब्जा जमाने की अनैतिक तैयारी शुरु कर दी है, क्या ऐसे चीनी शासक से सम्मानित होने की लालसा, भारतीय वामपंथी नेताओं के चरित्र पर अंगूली नहीं उठाती।
मुलायम सिंह यादव ने सदन में ठीक ही कहा कि भारत की विदेश नीति तो अमेरिका के हाथों गिरवी रखी है, उन्होंने उदाहरण भी दिये, और वे उदाहरण सत्य भी प्रतीत होते हैं। कहां गयी भारत की विदेश नीति -------------------
जब आस्ट्रेलिया में भारतीय युवकों की पिटाई हो रही थी अथवा भारतीय छात्रों की हत्या की जा रही थी। अमेरिका में जब भारतीय छात्रों के पांवों में रेडियो कॉलर लगाये गये। नेपाल और श्रीलंका जो भारत के साथ कदम से कदम मिला कर चलते थे, वे आज भारत से दूर होते जा रहे हैं। आज कोई भी ऐसा देश नहीं हैं, जो भारत के साथ खड़ा होने की बात करता हो, जबकि पूर्व में भारत के कई पड़ोसी देश ही नहीं बल्कि अन्य दूसरे देश भी भारत के साथ मजबूती से खड़े होते थे।
कमाल हैं, देश का सैन्य प्रमुख खुलकर कह रहा हैं कि चीन के मंसूबे सहीं नहीं हैं पर भारतीय नेता, शांति की बात कहते हुए, आराम फरमा रहे है। गर यहीं हाल रहा, तो देश बचेगा या भी नहीं, ये कांग्रेसी क्यूं नहीं समझते। गर देश रहेगा, तो ये शासन भी कर सकते हैं, गर देश ही नहीं रहेगा, तो फिर शासन कैसे करेंगे, ऐसे में मुलायम का ये कहना कि अभी सरकार नहीं, पहले देश बचाने की बात करें कांग्रेसी, हमें सटीक लगती है। उन्होंने सुप्रसिद्ध समाजवादी नेता व चिंतक राम मनोहर लोहिया का हवाला देते हुए ठीक ही कहा कि इस देश को खतरा पाकिस्तान से उतना नहीं, जितना चीन से हैं, पर हमे लगता हैं कि राम मनोहर लोहिया की बातों को आज तक कांग्रेसियों ने स्वीकार ही नहीं किया।
सदन में कांग्रेसियों का ज्यादातर समय आरएसएस और भाजपाईयों पर हमला बोलने और उन्हें नीचा दिखाने में ही जाता हैं, ऐसा लगता हैं जैसे की देश की जनता, इन कांग्रेसी सांसदों को भाजपाईयों और आरएसएस के लोगों को गाली देने के लिए ही सदन में भेजती हैं। हमें लगता हैं कि गर वे चीन मामले पर इतना सजग होते, तो देश आश्वस्त भी होता कि इन कांग्रेसियों के हाथों देश सुरक्षित हैं, पर हमें नहीं लगता, कि देश इनके हाथों सुरक्षित है, ये तो चीन के हमले होने पर भी ये बयान दे देंगे कि भाजपाईयों और संघ के लोगों ने देश पर हमला बोलवा दिया हैं, जैसा कि इनके नेता दिग्विजय सिंह 26/11 मामले में बोलकर, पाकिस्तान की मदद करने में प्रमुख भूमिका निभायी और देश को ही कटघरे में रख दिया। कमाल हैं – कांग्रेसियों का चरित्र।
यहीं नहीं देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और देश की दुर्दशा पर, टीवी चैनलों के संपादक से बातचीत में हमारे प्रधानमंत्री का ये कहना कि विभिन्न मामलों में, जितना उन्हे दोषी बताया जाता हैं, उतना वे दोषी हैं नहीं, उन्होंने गठबंधन सरकार की मजबूरियां भी बतायी, इसी से साफ पता लगता हैं कि हमारे देश में कैसी मजबूर और कमजोर सरकार चल रही है, और इसे कौन चला रहा है। फिर भी। इस देश में पंचवर्षीय सरकार चलती हैं, आशा तो इन्हीं से हैं। गर देश पर बाहरी व आंतरिक खतरा आया तो इससे निजात दिलाना तो इन्हीं को हैं, आशा रखना होगा कि ये कुछ करेंगे और देश को बाहरी खतरों से बचाने में सक्षम होंगे, पर ये तो वक्त बतायेगा। कि इन्होंने क्या किया। पर मुलायम सिंह यादव जी, आपका जवाब नहीं, खूब बोले, देशहित में बोले। सरकार को जगाने की कोशिश की, गर सरकार जग गयी तो देश का बल्ले बल्ले होना तय है। कोशिश करते रहिये, इन्हें जगाते रहिये। अपना काम जगाते रहने का है, आपने देशहित में जो सदन में बाते रखी, आपको बहुत बहुत बधाई..............

Sunday, February 13, 2011

मौसम झारखंड का...!

झारखंड यानी वनों से आच्छादित प्रदेश...

इन दिनों इस प्रदेश में गजब का दृश्य दिखाई दे रहा हैं, गर आप प्रकृतिप्रेमी हैं तो देर मत करिये और आज ही घने जंगलों की ओर प्रस्थान करें, क्योंकि फिर ये दृश्य आपको देखने के लिए, पूरे एक वर्ष इंतजार करने पड़ेंगे, जब से सभी ऋतुओं ने रितुराज वसंत का पिछले 08 फरवरी को शानदार स्वागत किया, तभी से चुपके से पतझड़ ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। जंगलों से आच्छादित इस प्रदेश में वनों के पुराने और सूखे पत्तों ने चुपके से, डालियों से अलग हो जाना उचित समझा और पेंड़ों से अलग होने लगे, ऐसे में कौन पेड़ पूरी तरह से पत्तियों से विहीन हो गये और किसमें नये नये पत्ते कब आकर लग गये, पता ही नहीं चला, हालांकि किसी किसी वृक्षों में पुराने और सूखे पत्तों का गिरना अथवा अलग होना जारी है, साथ ही उसमें नये पत्तों का विकसित होने का क्रम जारी हैं, इसी क्रम ने पूरे झारखंड की आबोहवा और उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा दिये हैं, गर हमसे कोई पूछे कि रांची अथवा झारखंड घूमने का सबसे सुंदर, समय कौन सा है, तो लगता हैं कि प्रकृति भी ये कह देगी कि बस अभी और अभी, क्योंकि अब वक्त भी नहीं है। इन पत्ती विहीन वृक्षों और नये नये पत्तियों से युक्त हो रहे वृक्षों से सूर्य की किरणों की अठखेलियां करना देखते ही बन रहा हैं, यहीं नहीं इन डालियों से होकर चलनेवाली हवाएं भी बहुत कुछ कह दे रही हैं ----------------- कि क्या तुमने झारखंड में ही रहकर, इस अलौकिक दृश्य को देखा हैं अथवा इस समय को भी आम दिनों की तरह बीता देना है ------------------------------------------
कवियों की कल्पना भी, इस समय अपना मुंह खोल रही हैं, कुछ बोल रही हैं -----
आया मौसम पतझड़ का,
आओ मुझमे खो जाओ,
जीवन के सार तत्व को,
प्रकृति संग तुम पा जाओ,
आना जाना लगा रहता हैं,
ये सूखी पत्तियां कहती हैं,
नव पल्लव को शुभाशीष दें,
खुद आगे बढ़ जाती हैं,
तुम भी नये लोगों को,
ऐसे स्थान देते जाओ,
और, उन्हें आशीष दे,
खुद भी आगे बढ़ते जाओ।



Monday, January 31, 2011

मैला से मैला साफ करने की कोशिश...!


30 जनवरी को महात्मा गांधी के शहादत दिवस पर पूरे देश में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आह्वान पर हजारों लोग, सड़कों पर उतरे। सभाएं की, भ्रष्टाचार से अंत अंत तक लड़ने का संकल्प लिया, भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की बात कहीं। भारत के कई राज्यों की राजधानियों और अन्य महानगरों से निकलनेवाले समाचार पत्रों ने भी, इस कार्यक्रम का भरपूर कवरेज किया और दिया। हालांकि प्रथम दृष्ट्या, इसमें वामपंथ की भी थोड़ी बू आयी, पर जिससे देश बनता हैं, वह कोई भी पंथ हो, हमें ग्राह्य हैं। पर क्या, सचमुच, देश में क्रांति हो गयी, लोग जग गये, अब कभी भ्रष्टाचार यहां देखने को नहीं मिलेगा, सरकार इस आंदोलन से घबरा गयी, सरकार में शामिल लोगों ने भी इस आंदोलन के बयार को भांप कर, अब भ्रष्ट न होने की कमर कस ली। कम से कम हमें तो नहीं लगता और साथ ही देश के करोड़ों लोगों को भी नहीं लगता, क्योंकि अपने देश में इस प्रकार के आंदोलन व प्रदर्शन होते रहते हैं, कैसे होते है, और क्यूं होते हैं, ये भी सबको मालूम हैं।
कमाल हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन हुआ, उसमें वे लोग नेतृत्व कर रहे थे, जो आउट ऑफ डेटेड हैं, जिन्होंने जिंदगी का आधा से ज्यादा मजा ले लिया हैं, और अब उनके पास, आज के डेट में सिवाय उनके अपने नाम चमकाने और अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में आने के सिवा कुछ भी नहीं। क्योंकि भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा हैं, जो कभी खत्म नहीं होगा, और इसमें न तो हड़े लगती हैं और न फिटकिरी, रंग भी चोखा हो जाता हैं, सामान्य जनता की नजरों में ये नायक और नायिका के रुप में आ चुके होते हैं और फिर क्या. फिर चुनाव, चुनाव में पार्टी बनाकर लडेंगे, टिकट देंगे और टिकट लेंगे, और फिर अपनी सल्तनत, यानी भ्रष्टाचार खत्म करने के बजाय, खुद भ्रष्टाचार का हिमायती बन जाना। अब तक हुआ क्या हैं, यहीं तो हुआ हैं। आज जो सत्ता में हैं, या जो सत्ता में नहीं हैं, उन्होंने किसके खिलाफ मोर्चा खोलकर सत्ता हासिल की हैं। वो तो भ्रष्टाचार ही तो हैं।
अब जरा देखिये कौन – कौन लोग, कल के कार्यक्रम में शामिल थे।
स्वामी अग्निवेश, योग गुरु रामदेव, श्रीश्री रविशंकर की संस्था। जरा इन महानुभावों से पूछिये कि आपकी संस्था को पैसे कहां से मिलते हैं, और पैसे देनेवाले कौन हैं। क्या सभी ईमानदार हैं, और ईमानदारी से पैसे कमाकर, उनकी संस्था को पैसे पहुंचाये हैं क्या। क्या इनलोगों ने ईमानदारी से देश की जनता को बताया हैं कि उनके पास कितने पैसे हैं और कहां से आये, किसने दिये हैं। हैं इनमें हिम्मत कि वे देश की जनता के सामने अपनी आय को सार्वजनिक कर सकें। यानी दूसरों से पूछेंगे कि उनके पास पैसे कहां से आये पर अपनी आमदनी और उसके स्रोत नहीं बतायेंगे। यानी खुद मैले और मैला पोछने, उसे साफ करने की बात कहेंगे।
सबसे पहले इन महानुभावों से पूछिये कि भ्रष्टाचार का मतलब भी जानते हैं क्या।
भ्रष्टाचार का अर्थ हैं – आचरण से भ्रष्ट हो जाना। जब आचरण ही भ्रष्ट होगा, तो फिर बचा क्या रह जायेगा।
जरा अग्निवेश को देखिये, ये खुद को स्वामी अग्निवेश कहते हैं, पर माओवादियों के घोर हिमायती हैं, ये उनके लिए और उनकी ओर से सरकार से बात करने की भी इच्छा रखते हैं, जब माओवादियों की हत्या होती हैं तो इनका हृदय व्यथित हो जाता हैं, बयान भी दे देते हैं, पर इन्हीं माओवादियों की गोली से आम जनता की मौत होती हैं, सरकारी सेवा में कार्यरत किसी पुलिसकर्मी की मौत हो जाती हैं तो इनके होंठ सील जाते हैं, और ये अपने को संत कहते हैं। यहीं नहीं जो अरुंधती राय कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानती, उसके संग कार्यक्रम करने में इन्हें बड़ा ही आनन्द आता हैं, और ये महात्मा गांधी की शहादत दिवस के दिन नई दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देते हैं, जिस गांधी ने अंग्रेजों के बंदूक से निकली गोली और भारतीयों के बंदूक से निकली गोली से मरनेवाले लोगों, दोनों को समान बताते हुए अहिंसा को अपनाया। उस गांधी के शहादत दिवस पर दोहरा मापदंड अपनाते हुए भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करना, क्या इन दोहरे चरित्रवालों से देश का भला होगा।
जरा योग गुरु राम देव को देखिये, ये खुद को संत कहते हैं, आज तक देश में ऐसा संत हुआ ही नहीं, जो अपनी सुरक्षा के लिए गुहार लगायी हो, पर ये संत ऐसे हैं, जिन्हें अपनी जान संकट में आने लगी, और लगे बयान देने की, उनकी जान को खतरा हैं, लगे हाथों सरकार ने इनकी जान बचाने के लिए जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करा दी। क्या इस रामदेव को गौतम बुद्घ और अंगूलिमाल की कहानी याद नहीं, जरुर याद होगा, पर इसे गौतम बुद्ध थोड़ी ही बनना हैं, ये तो अंबानी और टाटा को टक्कर देने के लिए पैदा हुए हैं। टक्कर दे रहे हैं और अब तो सत्ता की कुर्सी उन्हें दिखाई देने लगी हैं, जो संत सत्ता की राजनीति करे, भ्रष्ट तरीके से प्राप्त धन को, धर्म के नाम पर प्राप्त कर, अपना आश्रम बनाये, उसे भी अधर्म ही कहा जायेगा और इस प्रकार से प्राप्त धन को भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में रखा जायेगा, इन संतों को मान लेना चाहिए। क्योंकि इस देश में रामदेव से बढ़कर, अनेक संत हुए, जिनके पांव के धूल भी रामदेव नहीं बन पायेंगे, रामदेव को जो बनना था, बन गये, पर याद रखे, वे देश की गरीब और ईमानदार, मेहनतकश किसानों और मजदूरों को धोखा नहीं दे सकते, ये धोखा दे सकते हैं – गलत तरीकों से धन प्राप्त किये, धंधेबाजों, करचोरी करनेवाले पूंजीपतियों को। सामान्य जनता को बाबा रामदेव, श्रीश्रीरविशंकर, और स्वामी अग्निवेश के आंदोलन से क्या मतलब, या रिटायर्ड नौकरशाहों से क्या मतलब। ये रिटायर्ड नौकरशाहों से ही पूछिये कि जब ये नौकरी में थे, तब क्या, इन्होंने ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहण किया, गर नहीं तो आज भ्रष्टाचार के नाम पर घड़ियाली आंसू क्यों.
गर सचमुच में देश में भ्रष्टाचार, से लड़ने के लिए इन्में जज्बा उत्पन्न हो गया हैं। तो कहा जाता हैं कि जब जगे तभी सबेरा। इन सबकों चाहिए कि अपनी पूर्व जिंदगी के किये गये अनैतिक और भ्रष्ट तरीकों को भी सार्वजनिक करें, कि उन्होंने पूर्व में ये ये गलत तरीके अपनाये, भ्रष्टाचार किया, भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहे, अब संकल्प लेता हूं कि आगे ऐसा नहीं करुंगा, ये देश की जनता को वचन देता हूं। तब जाकर विश्वास किया जा सकता हैं, पर अचानक ये देशभक्ति का छलावा, से आम जनता को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता और न ही भ्रष्टाचार पर रोक ही लग सकता हैं, क्योंकि मैले से मैला साफ नहीं होता, बल्कि गंदगी और फैलती हैं।

Sunday, December 19, 2010

सौ दिन अर्जुन मुंडा सरकार के

अर्जुन मुंडा सरकार ने आज सौ दिन पूरे कर लिये। सचमुच बधाई स्वीकार करें, अर्जुन मुंडा जी, क्योंकि आपने सौ दिन पूरे कर लिये, पर क्या आप बता सकते हैं, कि आपने इन सौ दिनों में कौन ऐसा काम कर लिये। जिससे आम जनता के मन में ये विश्वास जगें कि ये सरकार सचमुच में उनके लिए कुछ काम कर रही हैं अथवा आप पर विश्वास कर सकें कि आपके छत्र छाया में उनका जीवन आनन्दित बीतेगा। आप से जब पत्रकार पूछते हैं कि मुंडा जी, इन सौ दिनों में आप अपनी पांच उपलब्धियां बतायें, तो आपका बयान आता हैं कि आप काम करने में विश्वास करते हैं न कि उपलब्धियां गिनाने में। गर आप काम करने में विश्वास रखते हैं तो लगे हाथों अपने काम करने का विश्वास भी तो हमें दिलाये। जिस विश्वास की आप बात करते हैं, वो तो कहीं दिखता नहीं। हमें तो लगता हैं कि आपकी उपलब्धियां न के बराबर हैं, क्योंकि न तो आपके पास झारखंड को आगे बढ़ाने का प्लान हैं और न ही विजन। बस चलते जा रहे हैं, कहां चलना हैं, क्यों चलना हैं, किसलिए चलना हैं, झारखंड को कहां ले जाना हैं, इसका भान न तो आपको हैं और न हीं यहां की जनता को हो पाया हैं कि आप उन्हें अथवा झारखंड को कहां ले जाना चाहते हैं। आपके सौ दिनों के शासनकाल में जो घटनाएं घटी हैं, वो बताता हैं कि सरकार के काम करने के तरीके और लक्षण ठीक नहीं हैं।
जरा गौर फरमाईये -----------------------------------------------
• आप ही के पार्टी के सिमडेगा विधानसभा अंतर्गत पिथरा पंचायत अध्यक्ष मदन साहू गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं, पर उसकी सूध लेनेवाला कोई नहीं होता हैं, न तो आपकी सरकार और न ही आप।
• जमशेदपुर जो आपका संसदीय इलाका हैं, वहां की महिला रेवती के साथ एक गुंडा दुष्कर्म करता हैं, फिर उसे जिंदा जलाने का प्रयास करता हैं, कई दिनों तक वो युवती इलाज कराते हुए दम तोड़ देती हैं, उसकी सुध न तो आपकी पुलिस लेती हैं और न ही आप उसे न्याय दिलाने में दिलचस्पी रखते हैं।
• आपही के इलाके की दीपिका के साथ कुछ मनचले छेड़खानी करते हैं, वो आत्महत्या कर लेती हैं, पर दीपिका को मरणोपरांत भी आप न्याय नहीं दिला पाते।
• आपही की राज्य की रुकमिणी के साथ केन्या में यौन शोषण होता हैं, यौन शोषण करनेवाला व्यक्ति गुजरात में बैठा हैं, गर आप चाहते तो मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात कर, उस व्यक्ति को सलाखों के पीछे ढकेल सकते थे, पर आपने अभी तक नरेन्द्र मोदी से बातचीत तक नहीं की, जबकि नरेन्द्र मोदी आप ही के पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं।
• आप जिस राज्य के मुख्यमंत्री हैं, आपका पड़ोसी राज्य हैं बिहार, जिसके कोख से निकला हैं – झारखंड। वहां एक दिन में सरकार बन जाती हैं, ठीक दो दिनों में विधानसभा का सत्र आहूत हो जाता हैं, सरकार ऐसे ऐसे निर्णय लेती हैं कि बिहारवासियों का सर गर्व से उठ जा रहा हैं, लेकिन आप और आपकी सरकार क्या कर रही हैं, आपको एक महीने लग जाते हैं, सरकार गठन करने में और बहाना ढूंढते हैं कि पितृपक्ष चल रहा है। वहां विधानसभा सत्र चल रहा हैं, और आप शीतकालीन सत्र तक नहीं बुला पाते, और इसके लिए भी आपने अच्छा बहाना ढूंढा, ये कह कर कि राज्य में पंचायत चुनाव हो रहे हैं। आप हर गलत काम को, छिपाने के लिए बहाने बनाते हैं और आपका पड़ोसी राज्य हर अच्छे काम को करने के लिए, अनेक प्रकार के बहाने ढूंढ रहा हैं। हैं न कमाल की बात, पर आपको इससे क्या मतलब।
• बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दिल्ली जाने में मन नहीं लगता, पर आपको दिल्ली – रांची, रांची – दिल्ली करने में बहुत मन लगता हैं अब तक आठ बार आप दिल्ली की परिक्रमा लगा चुके हैं।
• यहां आप सरकार चला रहे हैं, मंत्री लोग सरकार चला रहे हैं या राज्य के प्रशासनिक अधिकारी, सरकार चला रहे हैं, लोगों को पता ही नहीं चल पा रहा हैं, सीएनटी एक्ट पर भूमि सुधार एवं राजस्व सचिव के द्वारा, सभी उपायुक्तों को भेजा गया पत्र तो फिलहाल ये ही बता रहा हैं और हमें लगता हैं कि डोमेसाईल आंदोलन के बाद, कहीं ये मामला राज्य का बंटाधार न कर दें, यानी वो कहावत याद हैं न काम धाम कुछ नहीं, गिलास तोड़ा आठ आना।
• एक तरफ बिहार सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए लोकपाल विधेयक को मंजूरी दे रही हैं, अपने विधायकों और मंत्रियों से जल्द अपने संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने को आदेश दे दी हैं। एमएलए फंड पर रोक लगा दी हैं और आप इन सबसे अलग कुछ करने, कुछ निर्णय लेने के बजाय, सीधा कहते हैं कि जो बिहार करें, वो ही हम क्यूं करें। जबकि सर्वाधिक एमएलए फंड इसी प्रांत में हैं और इससे यहां की आम जनता का कितना भला होता हैं और विधायक और उनके परिवार तथा अधिकारी कैसे मालामाल होते हैं, वो किसी से छूपा हैं क्या।
• क्या आपको मालूम नहीं कि जिस बाबा रामदेव को आप की सरकार ने राज्य अतिथि घोषित किया हैं, वो ही झारखंड प्रवास के दौरान, यहीं की सड़कों के बारे में जो टिप्पणी की हैं, वो शर्मनाक हैं।
• भ्रष्टाचार चरम पर है, जो एसपी कोयलांचल के कोलमाफियाओं को नाक में दम कर रखी थी, जिसे धनबाद में ही रखने के लिए, धनबादवासी आंदोलनरत हैं, आप मौके की तलाश में थे उनका स्थानांतरण करने का, और जैसे ही धीरेन्द्र प्रकरण आया, आपने कोलमाफियाओं की मुंहमांगी मुराद पूरी कर दी और उन्हें स्थानांतरण करने का फैसला ले लिया, वह भी तब जब राज्य में पंचायत चुनाव की घोषणा और आचार संहिता लागू था। आखिर ऐसा कर आप क्या संदेश देना चाहते हैं।
• क्या आप बता सकते हैं कि आपकी प्लानिंग क्या हैं, विजन क्या हैं, आपके प्लानिंग और विजन को पूरा करने के लिए, कौन कौन लोग प्रयत्नशील हैं और अब तक उन्होंने इन सौ दिनों में कैसा काम किया हैं।
• इन सौ दिनों में तो हमने देखा कि आप ही के मुख्य सचिव, खुलकर स्वीकारते हैं कि राज्य में सिस्टम फेल हैं, बीडीओ – सीओ आफिस नहीं जाते हैं, इसलिए नक्सलिज्म बढ़ रहा हैं। ऐसे में आम जनता आपसे क्या उम्मीद लगायें।
• स्थिति तो ऐसी हैं कि जिन प्रशासनिक अधिकारियों को आपकी सरकार के द्वारा विभिन्न आरोप लगाकर, दंडित किया गया, फिर उन्हें शीघ्र ही महिमामंडित कर, सेवा कार्य में लगा भी दिया गया। आखिर ये दोहरे मापदंड क्यों, इस प्रकार की हरकतें, क्या साबित करती हैं।
हमारे पास एक नहीं अनेक अकाट्य प्रमाण हैं, पर कितने प्रमाण लिखूं। इतने से गर सरकार की आंखे खूल जाती हैं और सरकार कुछ जनता के हित में ठोस निर्णय लेते हुए, प्लान बना कर, अपने विजन को साकार करती हैं, तो झारखंड का बड़ा ही भला होगा, पर हमें ऐसा दीखता नहीं, क्योंकि झारखंड बर्बादी के कगार पर हैं, और बर्बादी के कगार पर पहुंचाने के बाद, इस सरकार और अन्य नेताओं को अपने बचाव के लिए एक सुंदर, उदाहरण भी मौजूद हैं, वो ये कि यहां की जनता, स्थिर सरकार ही नहीं देती, स्पष्ट जनादेश ही नहीं देती तो ऐसे में झारखंड कैसे आगे बढ़े। जो लोग इस प्रकार का तर्क देते हैं, उनसे हमारा एक ही सवाल हैं कि वे बतायें कि देश में एनडीए और उसके बाद चल रहा यूपीए का शासन क्या एक ही पार्टी का हैं, गर नहीं तो फिर इस प्रदेश का बुरा हाल क्यूं। कृपया झूठ बोलने से ये नेता बाज आये और अपने गिरेबां में झांक कर देंखे। अपनी गलतियों का ठीकरा यहां की भोली भाली जनता पर न फोड़ें, अपनी गलतियों को स्वीकार करना, बहुत बड़ा पुरुषार्थ हैं, इन नेताओं और आज की सरकार को ये बात नहीं भूलना चाहिए।

Saturday, December 4, 2010

संघ, भाजपा और गडकरी के बेटे की शादी...!


संघ का एक गीत है --------------
"देश के लिये जीये,
समाज के लिये जीये,
ये धड़कनें, ये श्वास हो,
पुण्यभूमि के लिए, जन्मभूमि के लिए..............."
पर ये गीत, संघ और संघ का एक राजनीतिक संगठन भाजपा से जूड़ें कुछ धनाढ्य लोगों, अंधकूप में रहनेवालों, केवल खुद के लिए जीनेवालों पर लागू नहीं होता, ये लागू होता हैं, उन अंसख्य स्वयंसेवकों पर जो लाठी और गणवेश में खुद को, इस गीत पर झूमा रहे होते हैं और भ्रम में जीने को विवश होते हैं। ये कैसे होता हैं। उसका बानगी देखने को मिला -- झारखंड की राजधानी रांची से प्रकाशित एक समाचार पत्र प्रभात खबर में। इस अखबार ने 03 दिसम्बर को बड़ी ही संजीदगी से प्रथम पृष्ठ पर दो समाचारों को एक साथ स्थान दिया और जनता को सोचने और समझने पर विवश कर दिया कि जनता जाने कि जो भाजपा और संघ उसके समक्ष दिखाई पड़ रहा हैं, सचमुच उसका चरित्र हैं या उसने अपना चरित्र खो दिया हैं। सचमुच प्रभात खबर को, हृदय से बधाई, ऐसे समाचार प्रकाशित करने के लिए। ऐसे भी, इस प्रकार की खबरें, प्रभात खबर में ही दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि बाकी अखबारों में तो इस प्रकार की खबरों को स्थान मिलना, असंभव सा दिखता हैं।
आखिर इस अखबार ने क्या छाप दिया.......................
इस अखबार ने छापा हैं कि झारखंड के शहर सिमडेगा के पिथरा पंचायत के भाजपा अध्यक्ष मदन साहू ने गरीबी से तंग आकर गुरुवार यानी 2 दिसम्बर को आत्महत्या कर ली, जबकि दूसरी ओर इसी तारीख को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने नागपुर में अपने बेटे निखिल की शादी में 60 करोड़ खर्च कर दिये।
अखबार ने आगे लिखा हैं कि केवल एक करोड़ तो नितिन ने निमंत्रण पत्र पर खर्च कर डालें, बेटे निखिल को नौ करोड़ का बंगला और बीएमडब्लयू भी दिया। दो दिनों तक तीन लाख लोगों के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की व्यवस्था, 300 तरह के व्यंजन, रिसेप्शन में चार्टड प्लेन से मेहमानों की आने की व्यवस्था, मेहमानों के लिए 22 विशेष उड़ानों की व्यवस्था आदि कर डाली। और इधर गरीबी का शिकार पिथरा पंचायत के भाजपा अध्यक्ष मदन साहू की हालत देखिये टमाटर की खेती में उसे नुकसान उठाना पड़ा, मदन साहू अपने बच्चों और पत्नी का बोझ उठाने में असमर्थ, एक डिसिमल जमीन तक नहीं, बटाई पर खेती करके, अपने परिवार का भरण पोषण करता था, टमाटर की दर घटने से हुए भारी घाटे ने उसका जीवन बर्बाद कर दिया था, बेटी के इलाज के लिए उसके पास पैसे नहीं थे, लाल कार्ड से उसका नाम तक काट दिया गया था, बेचारा इस हालात से तंग आकर अपनी जिंदगी ही समाप्त कर डाली।
कमाल देखिये, ये अखबार आज प्रमुखता से इस समाचार को प्रकाशित किया हैं, पर भाजपा के बड़े नेता, खासकर झारखंड की राजनीति करनेवाले संघ और उसके लोग, तथा भाजपाई, उस दिवंगत मदन साहू के घर तक जाने की हिमाकत नहीं की, और चल पड़े नितिन गडकरी के नागपुर स्थित आवास, जहां दो दिनों तक चलेगी, नितिन के बेटे निखिल की रिसेप्सन पार्टी। हम आपको बता दें कि जिस नितिन के घर ये झारखंडी नेता व मंत्री सलाम बजाने गये हैं, वो नितिन इन नेताओं को शायद ही भाव देगा। फिर भी, सभी ने नागपुर का दौरा करना, ज्यादा उचित समझा।
यानी इधर गयी जान और उधर शादी आलीशान और वो भी उस पार्टी में, जो कहती हैं कि भाजपा के साथ चले, रामराज्य की ओर चले। उस पार्टी में जहां राम, सुराज, सुशासन की बात कुछ ज्यादा ही कहीं जाती है, अरे जो पार्टी अपने पंचायत अध्यक्ष की मौत की जिम्मेवारी न लें, जो पार्टी अपने पंचायत अध्यक्ष की मौत का समाचार सुनने के बाद उसके परिवार तक का सुध न लें, वो पार्टी आम जनता के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा क्या करेगी।
इधर हमने देखा हैं कि कुछ राजनीतिज्ञों के द्वारा अपने बेटे बेटियों की शादी के अवसर पर फिजूलखर्ची करना, दिखावे करने का फैशन जगा हैं, खासकर उस देश में जहां गरीबी से तंग आकर, किसानों और सामान्य लोगों का समूह हमेशा आत्महत्या कर रहा होता हैं। इसमें लालू प्रसाद, झारखंड के ही एक पूर्व मंत्री कमलेश सिंह का नाम हमारे बिहार झारखंड में ज्यादा चला हैं, पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने सबको पीछे छोड़ दिया, शायद लालू को चुनौती भी दे दी हो, कि लालू जी आप क्या खर्च करोगे, जो हमने कर दिया। सचमुच नितिन गडकरी जी, आप महान हैं, आप ऐसा ही कर सकते हैं, आप से इससे ज्यादा कुछ आशा भी नहीं की जा सकती, पर ये भी जान लीजिए, कि आप ही की पार्टी की तरह एक राष्ट्रीय पार्टी हैं, जिसका नाम हैं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस। जिसकी अध्यक्ष हैं सोनिया गांधी। जिन्होंने अपनी बेटी प्रियंका की बिल्कुल सामान्य ढंग से सादगी के साथ शादी संपन्न करायी। ये पूरा देश जानता हैं। ऐसे भी भारत का एक संदेश है --------- सादा जीवन, उच्च विचार। पर आप जैसे लोगों को इस भारतीय संस्कृति का यह सुंदर संदेश दिमाग में नहीं घूसेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक राजनीतिक संगठन भाजपा कहती हैं कि उसकी पार्टी पंडित दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के कथन पर चलनेवाली पार्टी हैं, पर भाजपा के बड़े नेता बताये कि जो चरित्र इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दिखायी हैं, क्या वो चरित्र दीन दयाल उपाध्याय के कथन से मेल खाता है। गर मेल नहीं खाता, तो आनेवाले चुनावों में यहां की जनता भाजपा को क्यों वोट दें। संघ को राष्ट्रवादी संगठन क्यों माने।
संघ ये बतायें और भाजपा भी, कि जिस देश में करोड़ों लोग भूख और गरीबी से तंग आकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देते हो, ठीक उसी तरह जैसे भाजपा के पंचायत अध्यक्ष ने आत्महत्या कर जीवन लीला समाप्त कर ली। यहीं नहीं जिस प्रांत से नितिन गडकरी आते हैं, उसी प्रांत में कई किसानों ने आत्महत्या की हैं। उसी देश में एक सार्वजनिक जीवन जीनेवाला व्यक्ति को इस प्रकार के समारोह आयोजित करना शोभा देता हैं। भ्रष्टाचार और चरित्र को लेकर हाय तौबा मचानेवाली, भाजपा खासकर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में संसद को जो चलने नहीं दे रही हैं, वो खुद बतायें कि कर्नाटक और झारखंड में उसके लोग क्या कर रहे हैं। अरे भाजपाईयों शर्म करना सीखों, पर तुम्हें शर्म आयेगी। इस पर हमें संदेह हैं, क्योंकि शर्म तो उन्हें आती हैं, जिनका चरित्र होता हैं। पर भाजपाईयों और संघ के लोगों ने तो अब चरित्र, तेल लेने भेज दिये हैं।

Monday, November 29, 2010

स्थानांतरण एक एसपी का ......


जनता चाहती हैं, कि वो मेरे पास रहे, मेरे साथ रहे, मेरे हर दुख सुख में साथ दें, क्योंकि वो जब से आयी, तब से धनबाद में वो चीज थम गया, जिसके लिए धनबाद जाना जाता था। आखिर वो कौन हैं – जिसके बारे में धनबाद की जनता ने धनबाद बंद बुला दिया और यहीं नहीं सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने को तैयार हो गयी। स्पष्ट हैं – वो नाम हैं, धनबाद के वर्तमान एसपी सुमन गुप्ता का। वो हैं महिला, पर पुरुषार्थ इतना भरा कि उनके सामने पुरुष की पुरुषार्थ भी फेल। जब वो धनबाद की एसपी बनी थी, तब मैं उस वक्त ईटीवी धनबाद का प्रभारी था। मनौज कौशिक एसपी की विदाई हो गयी थी और सुमन गुप्ता प्रभार ले रही थी। व्यवसायी वर्ग रोज रोज की रंगदारी से तंग था, कोल माफियाओं की तूती बोल रही थी। नेताओं-माफियाओं-भ्रष्टाचार में लिप्त कुछ पुलिसकर्मी और पत्रकारों का गठजोड़ अपने रंग में था। ऐसे में इन पर नकेल कसना और धनबाद को रास्ते पर लाना कोई सामान्य काम नहीं था। ऐसे भी कहा जाता हैं कि जो भी आईपीएस झारखंड आता है, और उसे पैसे कमाने होते हैं तो वो एक बार धनबाद की पोस्टिंग चाहता हैं, इसके लिए वो सत्ता में बैठे नेताओं को मुंहमांगी रकम देने को भी तैयार होता है। यहीं नहीं जब पैसे के बल पर, वो एसपी धनबाद आ जाता हैं, तब अपने मनमुताबिक, वो थाना प्रभारियों को नियुक्त करता हैं, सस्पेंड करने का नाटक करता हैं और जम कर पैसे कमाता हैं। ऐसे एसपी को कुछ करने की भी जरुरत नहीं पड़ती, धनबाद हैं, इसलिए पैसे खुद ब खुद इनके पास पहुंच रहा होता हैं, पर इसके बदले में एक सामान्य जनता को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं। चाल धंसते हैं, सामान्य लोग मरते हैं, व्यवसायियों से रंगदारी मांगी जाती हैं, अपहरण उद्योग चलता हैं, रेलवे से लोहे और कोयले की चोरी नहीं, तस्करी होती हैं और अपना प्रांत व देश लूट रहा होता हैं। इधर, भ्रष्ट एसपी, आराम से सो रहा होता हैं, क्योंकि उसे सोने की कीमत हर महीने, कार्यालय, आवास अथवा मनमुताबिक जगहों पर पहुंचा दी जाती हैं।
सुमन गुप्ता, झारखंड का एक जाना पहचाना नाम हैं, इसलिए नहीं कि वो एसपी हैं, इसलिए कि वो अपने कामों से जनता का दिल जीती हैं, साथ ही दिल जीती हैं, उन पुलिसकर्मियों का जो ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ हैं, और उक्त जनता का, जिसे लटपट से कोई मतलब नहीं, सिर्फ उसे मतलब हैं कि चैन से जीने का। जब मैं ईटीवी धनबाद में था, तभी मैं समझ गया था कि इनकी नेताओं, माफियाओं, धनबाद में रह रहे कुछ भ्रष्टपुलिसकर्मियों और पीतपत्रकारिता में संलिप्त लोगों से नहीं बनेगी, और हुआ भी ऐसा ही। सुनियोजित साजिश के तहत शुरु से ही ऐसा ताना बाना बनाया जाने लगा, जैसे लगता हैं कि इनके आने से धनबाद में अमन चैन ही खत्म हो गया हो। और रही सही कसर निकाल दी, धनबाद में धीरेन्द्र प्रकरण ने, जो नेता ये मुद्दा उछाल रहे हैं, उन्हें धीरेन्द्र से कोई मतलब नहीं। मतलब हैं कि इसी की आड़ में, अपना उल्लू सीधा कर लें। यहीं नहीं रांची में बैठे सत्तासीन लोगों को भी पैसे की चाहत हैं, वे भी चाहते हैं कि धनबाद में अपने ऐसे लोगों को बिठा दें, जो आराम से उनके चौखट तक पैसे पहुंचा दे। ऐसे में जब तक धनबाद के एसपी सुमन गुप्ता को नहीं हटायेंगे, तो फिर मनचाहा आदमी कैसे बैठेगा। इसलिए उन्होंने तरकीब निकाली कि क्यूं नहीं, विपक्ष के इस हंगामें को आधार बनाकर, अपना उल्लू सीधा कर लिया जाय। हमें याद हैं कि जिस दिन विधानसभा अपना स्थापना दिवस मना रहा था, उस दिन धनबाद के कई पुलिसकर्मियों और पत्रकारों के फोन हमारे पास आये, उनका एक ही प्रश्न था कि धनबाद के एसपी सुमन गुप्ता का क्या हुआ। आज झाविमो विधायक समरेश सिंह और फूलचंद मंडल ने जो हंगामा किया, उसका कितना असर रहा। और जिस दिन आईपीएस अधिकारियों का तबादला हुआ, उसमें सभी समाचार पत्रों ने सुमन गुप्ता को ही प्रमुखता दे दी, जबकि तबादला सिर्फ सुमन गुप्ता का ही नहीं, औरों का भी हुआ था। ये बातें साबित करती हैं कि एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ महिला, कोलमाफियाओं, सत्ता में बैठे अथवा बाहर में रह रहे राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिसकर्मियों और पीत पत्रकारिता करनेवाले पत्रकारों को किस प्रकार खटक रही हैं।
मैं ये भी नहीं कहता कि सुमन गुप्ता हमेशा धनबाद में ही रहे, ऐसी महिला, हर जगह जानी चाहिए, जिससे एक नये समाज की रचना हो, पर उक्त महिला का स्थानांतरण भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, कोलमाफियाओं, भ्रष्टपुलिसकर्मियों और भ्रष्ट पत्रकारों को खुश करने के लिए हो, तो इससे ज्यादा शर्मनाक दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। धीरेन्द्र सिंह प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, और इसके दोषियों को दंड भी मिलना चाहिए, पर इस प्रकरण को बहाना बनाकर, बिना जनता को विश्वास में लिए, स्थानांतरण करना, सरकार की नीयत पर भी सवाल खड़ें करता हैं? आखिर सरकार को सोचना चाहिए कि जो लोग रांची से धनबाद अथवा धनबाद से रांची तक ये मामला उठा रहे हैं, वे चाहते क्या हैं, उनका क्या स्वार्थ हैं, पर बिना इन सबकी जांच पड़ताल किये, स्थानांतरण कर देना, बहुत कुछ कह देता हैं। आखिर फुलचंद मंडल, ढुल्लू महतो और समरेश सिंह जैसे विधायक, धनबाद में क्या करते हैं, क्या चाहते हैं, क्या धनबाद की जनता नहीं जानती। कैसे पंचायत चुनाव के दौरान, अर्जुन मुंडा की सरकार ने आनन फानन में, सुमन गुप्ता का स्थानांतरण कर दिया, क्या इस सरकार के क्रियाकलापों को यहां की जनता नहीं जानती। सब जानती हैं, पर जनता करें क्या, यहां तो अंधेर नगरी, चौपट राजा, टके सेर भाजी और टके सेर खाजा वाली कहावत चरितार्थ हो रही हैं।

Thursday, November 25, 2010

चेते लालू, नहीं तो कहीं के नहीं रहेंगे।

रहस्यमय जनादेश बिहार का....!

ये जनादेश बता रही है, कि इस जनादेश में नीतीश की जीत कम एवं लालू, रामविलास और कांग्रेस की करारी हार ज्यादा हैं। गर इस जनादेश के माध्यम से भी लालू, रामविलास और कांग्रेस के राहुल नहीं चेते, तो ये सब आनेवाले समय में कम से कम बिहार में तो समाप्त ही हो जायेंगे। और बिहार से समाप्त होने का मतलब आनेवाले समय में देश की संपूर्ण राजनीति से भी समाप्त हो जाना हैं, ये बातें इन्हें नहीं भूलना चाहिए।
सबसे पहले लालू की बात ----
लालू जी ने जब 1990 में बिहार की पहली बार सत्ता संभाली तो ये सत्ता मिलते ही ऐसे बौराये कि पूछिये मत। अजब गजब के निर्णय, हर किसी को गाली और अपने आगे किसी को नहीं लगाना, मसखरी करना, खुद के लिए लालू चालीसा लिखवाना, अपनी गुणगान कराना इनके रोज का शौक बन गया। मैं, उस लालू की बात कर रहा हूं, जिस लालू के बारे में उस वक्त बिहार की जनता एक भी शब्द नहीं सुनना चाहती थी, और गर किसी ने भूल से भी लालू के बारे में बोला तो उसके बुखार छुड़ा देती थी। यानी इतना शक्तिशाली बिहार का नायक लालू, आज श्रीहीन हैं, आज का लालू सत्ता तो दूर एक एक सीट के लिए तरस रहा है और जनता उसके बारे में कुछ बात करने से भी परहेज करती हैं। शायद उस वक्त सत्ता के मद में लालू प्रसाद श्रीरामचरितमानस की चौपाई वो भूल गये थे कि
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें।।
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहु धन खल इतराई।।
फिर भी लालू अब सुधरेंगे, कल सुधरेंगे, ऐसा मानते हुए यहां की जनता ने एक नहीं तीन – तीन बार सत्ता सौंपा, पर बिहार की जनता को मिला क्या। इस व्यक्ति ने सत्ता प्राप्त कर ऐसा चक्कर चलाया कि इसी चक्कर में, इनका पूरा परिवार और ससुराल सत्ता का सुख भोगा, पन्द्रह वर्षों तक ये बिहार का भाग्य विधाता, अपने परिवार का भाग्य विधाता बनकर, सत्ता का परमसुख लेता रहा और बिहार की जनता गरीबी के बोझ तले, इधर से उधर भटकती रही, इसी दरम्यान देश के कुछ प्रांतों के लोग बिहारियों को हीन नजरों से देखकर उस पर लात घूंसों का बौछार करने से नहीं चूके। कमाल हैं बिहारी दूसरे प्रांतों में लात जूते खा रहे थे और इधर इनका ज्यादा समय पटना के गांधी मैदान में जातीयता रैली करने, और उसकी अध्यक्षता करने में जाता, यहीं नहीं गरीब रैला, लाठी पिलावन रैला, तेल पिलावन रैला, यहीं करके खुद को आनन्दित करने में यह व्यक्ति मजा लेता रहा और लोग अपने आप को कोसते रहते। यहीं नहीं इस व्यक्ति को विदेश जाने का भी मौका मिला तब विदेश में भी उसने अपने हाव भाव से बिहार के लोगों की वो तस्वीर पेश की, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं। कमाल हैं बिहार की राजनीति में आज तक कोई ऐसा व्यक्ति अथवा राजनीतिज्ञ नहीं हुआ, जिसने सत्ता के मद में आकर, अपने परिवार और ससुरालवालों की इतनी आवभगत की हो या मसखरी करते हुए खुद सत्ता में नहीं है, तो अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया हो। क्या इन्हें बिहार की जनता ने इसीलिए सत्ता सौंपी थी।
बिहार को किसी भी कीमत पर नहीं बांटने की बात करनेवाले इस व्यक्ति को जैसे ही बिहार में कम सीटें मिली, इसने बिहार को बांटने का सहर्ष निर्णय ले लिया। कभी इसने कहा कि ये शाकाहारी हो गये, और कभी कहा कि भगवान उनके सपने में आये और कहा कि मांसाहारी हो जा, और वे मांसाहारी हो गये।
इस व्यक्ति के शासनकाल में महिलाएं, रात तो दूर, सायंकाल में घर से निकलना पसंद नहीं करती थी। अपहरण उद्योग तो इनके शासनकाल में ऐसा फैला कि पूछिये मत और भ्रष्टाचार का तो कहना ही नहीं। इस भ्रष्टाचार में तो खुद ऐसे पारंगत हैं कि इन्हें इसकी पाठशाला खोल देनी चाहिए ताकि लोग भ्रष्टाचार का प्रशिक्षण लेकर, देश का सत्यानाश कर सके। ये वो व्यक्ति हैं जो कहता हैं कि वो संपूर्ण क्रांति के आंदोलन का प्रोडक्ट है गर ऐसा व्यक्ति संपूर्ण क्रांति के आंदोलन का प्रोडक्ट हैं तो मुझे उस संपूर्ण क्रांति आंदोलन पर ही शक हो जाता है। पर लोकनायक जयप्रकाश के आंदोलन पर शक मैं सपने में भी नहीं कर सकता, क्योंकि इसी आंदोलन के प्रोडक्ट कई ऐसे लोग मिले हैं, जो सचमुच में संपूर्ण क्रांति के भाव को जन जन तक पहुंचा रहे हैं। याद करिये, लालू प्रसाद को, कभी ये खुद को किंग मेकर कहा करते थे, पर एक मामूली रेल मंत्रालय लेने के लिए ऐसा जिच किये कि सोनिया ने मनमोहन सिंह से कहा कि लालू को रेल वे दे दें ताकि ये रेल से खेल सकें, जैसा कि एक छोटा सा बच्चा अपनी मां से रेलरुपी खिलौने लेने की जिद कर बैठता हैं। क्या एक किंग मेकर, खुद के लिए ऐसा जिच कर सकता हैं और जो ऐसा जिच करता हैं वो कभी किंग मेकर हो सकता हैं। किंग मेकर क्या होता हैं, लालू को कम से कम सोनिया गांधी से सीखना चाहिए, पर इन्हें मसखरी करने से फुर्सत हो तब न, कुछ सीखेंगे। हर बार ये कहना कि उन्होंने गरीबों, मजलूमों को आवाज दी, जैसे लगता है कि गर ये न होते तो कभी गरीबों और मजलूमों को आवाज ही नहीं मिलती। जरा लालू जी जाकर उन गांवों में देखे कि उनके नाम पर, उनकी जाति के लोगों ने किस प्रकार से आंतक मचा कर लोगों को जीना मुहाल कर दिया, कैसे अल्पसंख्यकों की कब्रिस्तान की जमीन तक इनके लोगों ने कब्जा कर लिया है। आज ही एक चैनल ने दिखाया कि एक पटना के रिक्शेवाले ने कैसे अपनी दुख भरी कहानी सुना दी कि लालू के शासनकाल में जब वो रिक्शावाला सुबह से शाम तक रिक्शे खींचता, पैसे कमाता तो उसके पैसे को अपराधी कैसे, घर जाने के क्रम में लूट लिया करते, पर नीतीश के शासन में अब उसके साथ ऐसा नहीं होता। क्या रिक्शावाला का ये बयां, लालू के दिमाग में नहीं घूसता। कि वो क्या कहना चाहता है।
आज जब एनडीए को तीन चौथाई बहुमत मिला है, तो इस बहुमत को भी नहीं पचाना और इस पर ये टिप्पणी करना कि इसमें रहस्य हैं, ये लालू प्रसाद जैसे लोग ही बयान दे सकते हैं, जबकि दूसरे नेता तो ऐसे मौके पर अपने प्रतिद्वंदियों के घर जाकर, उसे अपनी शुभकामना देते है पर लालू प्रसाद से ऐसी परिकल्पना मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं।
जरा रामविलास पासवान को देखिये कल तक मुख्यमंत्री मुस्लिम हो, इसकी बात करनेवाला ये शख्स ऐन मौके पर ये बयान ही भूल गया और चल पड़ा अपने परिवार को मजबूत करने के लिए। कल तक कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगानेवाले ये दोनो शख्स खुद ही परिवार के आगे कुछ सोचना भी नहीं चाहता, क्या ऐसे लोगों को बिहार की जनता से वोट मांगने का हक भी हैं, और जब जनता ने अपना फैसला सुना दिया तो उस फैसले पर रहस्य पैदा करनेवाले ये कौन होते हैं। क्या ऐसा कहकर वे जनता का अपमान नहीं कर रहे।
रही बात राहुल की तो उन्हें ये जान लेना चाहिए कि ये उत्तर प्रदेश अथवा महाराष्ट्र नहीं हैं कि उनका जादू चल जायेगा, ये खांटी कर्मयोगियों की भूमि हैं, बिहार हैं, यहां एक्टिंग नहीं चलती, यहां के लोगों को जमीन से जूड़ा हुआ नेता चाहिए, इसलिए पहले वे बिहार के बारे में जानें, तब बिहार में आकर बात करें। कल तक विदेश में अपना सारा समय गंवानेवाले राहुल बिहार को क्या जानेंगे। ऐसे भी कहावत हैं, बांझ का जाने प्रसव का पीड़ा। बिहार और बिहार के लोगों की पीड़ा राहुल क्या जानेंगे। कम समय में जिस प्रकार से उन्होंने बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाही और जो करतब दिखायें, वो तो बिहारवासियों ने जनादेश के माध्यम से उन्हें बता दिया। शायद राहुल समझ लिये थे कि बिहार के लोग लालू जैसे होते हैं, और जैसे लालू को उन्होंने अपने कब्जें में कर लिय़ा, उसी प्रकार बिहार के लोगों के मतों पर भी कब्जा कर लेंगे, तभी तो उन्होंने साधु यादव, पप्पू यादव की पत्नी और आनन्द मोहन की पत्नी को कांग्रेस से टिकट देकर, अपनी बुद्धिमता का परिचय दे दिया और जब जनता की बारी आयी तो जनता ने इनकी सारी बुद्धिमता पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया, ये कहकर कि उन्हें न तो लालू चाहिए और न ही लालू के पदचिन्हों पर चलनेवाले पूर्व के नेता अथवा उनकी पत्नियों से उपकृत होनेवाली पार्टी।
जनता ने पहली बार, ऐसा जनादेश दिया हैं कि लोगों को बिहारी होने पर गर्व महसूस हो रहा हैं। सारे के सारे जातीय समीकरण ही ध्वस्त हो गये। नेताओं की पत्नियां और उनके परिवार के अन्य लोग हार का मुंह देखे हैं। चारों और एक ही बात की चर्चा का, हमें विकास चाहिए, बिहार का स्वाभिमान चाहिए और जो बिहार का स्वाभिमान लौटायेगा, हम उसके साथ होंगे। हम ऐसा नहीं मानते कि नीतीश ने पूरे बिहार में क्रांति ला दी हैं, पर इतना तो जरुर हैं कि नीतीश के शासनकाल में कानून व्यवस्था ठीक हुई हैं, महिलाओं को उनका अधिकार मिला हैं, लड़कियों में कोई भेदभाव नहीं हुआ हैं, चाहे वो कोई हो, माध्यमिक शिक्षा से जूड़ी बालिकाओं को साईकिल थमा दी गयी कि वे इससे जहां जाये, जायें, लेकिन पढ़े। सड़कों और आधारभूत संरचनाओं को ठीक किया। अपराधी चाहे वे किसी भी पार्टी के हो, उन्हें जेल का रास्ता दिखाया। लोगों में विश्वास जगाया कि हां राज्य में कोई शासन हैं, पर पहले के पन्द्रह सालों में कहीं कुछ दिखा ही नहीं। लालू के पन्द्रह सालों में तो अखबारों और मीडिया में लालू और लालू से संबंधित ही चीजें दिखाई पड़ती थी, चाहे वो लालू के जानवर ही क्यूं न हो, पर आज वैसी बातें नहीं दिखाई देती। आज बिहार और बिहार का युवा, कहता हैं कि वो मसखरे के राज्य का नहीं हैं, बल्कि सपने देखनेवाले राज्य का युवा हैं, जो अन्य राज्यों की तरह विकास के पथ पर चल पड़ा हैं। लेकिन नीतीश के लिए भी कुछ बातें, उन्हें भी जवाब देना होगा, ऐसा नहीं कि उनकी गलतियों पर जनता का ध्यान नहीं हैं, उन्होंने किस प्रकार इस चुनाव में मीडिया मैनेजमेंट किया और अपनी गुणगान करायीं, ये भी किसी से छुपा नहीं हैं, उदाहरण अनेक हैं, पर इतना तो तय हैं कि नीतीश के गुनाह, फिलहाल लालू, रामविलास और राहुल के गुनाहों से बहुत ही कम हैं। शायद यहीं कारण हैं कि गुनाहगारों में जो कम गुनाहगार था, जनता ने उसे अपना बहुमत दे दिया कि वो पांच साल तक, एक बेहतर बिहार बनाने की दिशा में काम करें, रही बात भाजपा की, तो वो नीतीश के पीछे पीछे चलते रहे, कुछ न कुछ, उसको इसका लाभ मिलता ही रहेगा। क्योंकि भाजपा, कांग्रेस के पदचिन्हों पर चल रही हैं, गर ये सुधर गयी तो ठीक है, नहीं तो इसका भी कांग्रेस जैसा हाल होना तय है।

Friday, November 12, 2010

एहि सूर्य ..........

( छठ पर विशेष )
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्तया गृहाण अर्घ्यं दिवाकर।।

जब से सृष्टि बनी तभी से मनुष्य ने प्रकृति द्वारा प्रदत्त हर वस्तूओं को जानने की कोशिश की, और अपने अपने ढंग से परिभाषा गढ़नी शुरु की। जब जब कार्तिकशुक्ल रविषष्ठी व्रत आता हैं, जिसे सामान्य जन छठ व्रत कहते हैं, अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छठव्रत से संबंधित मनगढ़ंत बातें छपनी और दिखानी शुरु हो जाती हैं, ऐसी ऐसी बातें, जिनका छठ से कोई लेना देना नहीं होता, और इस कारण से आनेवाली नयी पीढ़ी, इस छठ के आध्यात्मिक पक्ष से विमुख होती जा रही हैं, लेकिन जब इन्हीं से संबंधित उन समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों से ये पूछे कि आखिर उनके पास जो वे लिख रहे हैं या दिखा रहे हैं, उसके क्या शास्त्रीय आधार है, तो वे तुरंत ये कहकर पल्ले झाड़ लेंगे कि इससे संपादक का कोई लेना देना नहीं, पर क्या संपादक को ये अधिकार हैं कि वे अपनी दकियानूसी विचारधाराओं और अविश्वसनीय आलेखों और प्रवचनों से आम लोगों की बुद्धि को प्रभावित कर दें। खैर, जो इन्हें करना था, कर चुके हैं, पर आम जनता को ये जानना अवश्य चाहिए कि आखिर ये छठ व्रत क्या हैं और इसके वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार क्या हैं.....
सर्वप्रथम वैज्ञानिक पक्ष.......
सूर्य क्या है........?

सामान्य सा उत्तर हैं कि सूर्य ग्रह नहीं हैं, यह एक तारा हैं, जो सामान्य तारों की अपेक्षा पृथ्वी के नजदीक हैं और इसी से पृथ्वी प्रकाशित होती हैं और अन्य नौ ग्रह इसके चारों और चक्कर लगाते हैं।
कुछ इस प्रकार भी इसे परिभाषित कर सकते हैं कि सूर्य उच्च तापक्रम वाले अंसख्य पिंडों से बना हैं, इसमें मुख्यतः हाईड्रोजन होती हैं। सूर्य का व्यास पृथ्वी से 109 गुणा बड़ा है, और इसका भार पृथ्वी से 3,30,000 गुणा अधिक है। परंतु सूर्य का घनत्व पृथ्वी की तुलना में केवल एक चौथाई है। वैज्ञानिकों की माने तो करीब 10.5 अरब वर्ष पहले समस्त अंतरिक्ष में फैले गैस के बादल विभिन्न स्थानों पर निकट आये, धीरे-धीरे विभिन्न स्थानों पर वे पास आते गये। गैस के बादलों की ये गेंदे समय के साथ दबती गयीं। और जैसे जैसे उनका तापमान बढ़ता गया, उनमें से हरेक गेंद एक चमकीला सितारा बन गयी। इस प्रकार अंसख्य तारे बने, जिनमें से हमारा सूर्य भी एक था।
वैज्ञानिक ये भी कहते हैं कि करीब 15 अरब वर्ष पहले, एक उंचे तापमान और घनत्व के बड़े धमाके के कारण यह अंतरिक्ष बना, जहां हम आज है। जैसे-जैसे अंतरिक्ष फैला, वैसे-वैसे तापमान ठंडा होने लगा। विभिन्न प्रकार के पदार्थ और विकिरण उत्पन्न होने लगे। जैसे जैसे यह और बड़ा हुआ, गैस के दो प्रकार के बादल बने – एक में गैस का घनत्व अधिक था, दूसरे में गैस का घनत्व कम था। अंत में अतरिक्ष में तैरते गैसे के ये बादल और पदार्थ कुछ स्थानों पर पास आये और अनेक आकाशगंगाएं बनी। इनमें से एक आकाशगंगा में एक अकेला सितारा बहुत तेजी से चमकने लगा। ये चमकता तारा हमारा सूर्य बना और इसके चारों और मंडराते हुए गैस के बादलों ने ही निकट आकर अन्य ग्रहों और पृथ्वी को बनाया। इस प्रकार माना जाता हैं कि सूर्य आज से कोई 460 करोड़ वर्ष पहले बना हुआ होगा।
वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि वर्तमान सूर्य हाईड्रोजन गैस के जलने के कारण लगातार गर्मी और प्रकाश दे रहा है। सूर्य के क्रोड में हाईड्रोजन लगातार जलकर हीलियम में बदलती है। जैसे-जैसे हाईड्रोजन की मात्रा कम होती हैं, सूर्य लगातार कमजोर होता है। बाद में सूर्य में ही हीलियम गैसे जलने लगेगी और सूर्य फैलने लगेगा। सूर्य फैलकर इतना बड़ा हो जायेगा कि वह समीप के बुध और शुक्र जैसे ग्रहों को ही निगल सकता हैं। अंत में सूर्य तेजी से सिकुड़ने लगेगा और श्वेत वामन तारा बन जायेगा। फिर सूर्य अपनी जीवन यात्रा खत्म करेगा और अंतरिक्ष की धूल के रुप में शुन्य में विलीन हो जायेगा। और
अब आध्यात्मिक पक्ष......
भगवान सूर्य को धार्मिक शास्त्रों में विभिन्न नामों से जाना जाता है ----------
भास्कर, दिवाकर, प्रभाकर, रवि, भानु, अंशुमाली, मार्तंड, मरीची, आदित्य, सविता, पतंग, दिनकर, हंस आदि।
भगवान सूर्य के अर्चन के लिए विहित पत्र-पुष्प
भविष्य पुराण बताता हैं कि सूर्य भगवान को यदि एक आक का फूल अर्पन किया जाय, तो सोने की दस अशर्फियां चढ़ाने का फल प्राप्त हो जाता है। भगवान सूर्य को बेला, मालती, काश, माधवी, पाटला, कनेर, जपा, यावन्ति, कुब्जक, कर्णिकार, पीली कटसरैया, चंपा, रोलक, कुंद, काली कटसरैया, बर्बर मल्लिका, अशोक, तिलक, लोध, अरुपा, कमल, मौलसिरी, अगस्तय और पलाश के फूल तथा दूर्वा अतिप्रिय है। भगवान सूर्य को बेलपत्र, शमी का पत्ता, भँगरैया की पत्ती, तमाल का पत्र, तुलसी और काली तुलसी के पत्ते, कमल के पत्ते भी पसंद है। भगवान सूर्य को गुंजा, धतूरा, कांची, अपराजिता, भटकटैया, तगर और अमड़ा न चढ़ाये, क्योंकि वीरमित्रोदय इन वस्तूओं को सूर्य पर न चढ़ाने को कहा है।
धार्मिक पुस्तकों की माने तो भगवान सूर्य की माता का नाम अदिति और पिता का नाम कश्यप है। इसलिए इन्हें आदित्य और कश्यपनंदन के नाम से भी पुकारा जाता हैं। इनकी पत्नी दक्षकन्या रुपा थी। ये सप्तअश्व से युक्त रथ पर आरुढ़ होते हैं और इनके सारथि अरुण है। इनके एक हाथ में चक्र होता है। भविष्य पुराण की मानें तो दक्षकन्या जिनका नाम रुपा था, उनसे भगवान भास्कर का विवाह हुआ और उससे दो संताने हुई, जिनका नाम था यम और यमुना। किन्तु भगवान भास्कर के तेज को रुपा सहन नहीं कर सकी, और छाया के रुप में अपनी ही एक प्रतिमूर्ति बनाकर वह स्वयं तप करने चली गयी। इसी छाया से शनि और ताप्ती की उत्पत्ति हुई। यमुना और ताप्ती आज भी भूलोक में पृथ्वी पर पवित्र नदियों के रुप में प्रत्यक्ष है।
कहा जाता है कि जड़ व चेतन की आत्मा, प्रत्यक्ष भागवत स्वरुप साकार ब्रह्म रुप हैं – भगवान सूर्यदेव।
वेद कहते हैं -----
ऊं आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।। (ऋग्वेद)
ऋग्वेद में तो भगवान भास्कर से संबंधित कई सूक्त आपको मिल जायेंगे। उस ऋग्वेद में जिसे गिनीज बुक ऑफ वलर्ड रिकार्डस नामक पुस्तक मानती हैं कि ये विश्व की सबसे प्राचीन पुस्तक हैं।
यहीं नहीं अथर्ववेद कहता हैं कि ---------------
सूर्यस्तवाधिपतिमृर्त्योरुदायच्छतु रश्मिभिः अर्थात भगवान भास्कर की रश्मियां जीवन प्रदाता, स्वास्थ्य प्रदाता हैं ये अमृततुल्य होती है। ओंकार सूर्य देव की नित्य उपासना व अर्घ्य, पुष्प अर्पण सर्वदा शुभ हैं।
कौन हैं छठि मईया..........?
छठि मईया और कोई नहीं वहीं आदिशक्ति हैं, जिनसे सारी सृष्टि उत्पन्न हुई हैं, वहीं प्रकृति की छठवीं अंश हैं, उन्हें आप षष्टम् कात्यायिनी कहें, अथवा और जो नाम डाल दे। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार देवसेना, जो ब्रह्मा की मानसपुत्री और कार्तिकेय की भार्या है, उन्हें भी षष्ठी देवी के नाम से पुकारते है, क्योंकि कहा गया हैं कि ये ही मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण षष्ठी देवी कहलायी हैं, इन्हीं के प्रसाद से पुत्रहीन व्यक्ति सुयोग्य पुत्र, प्रियाहीनजन प्रिया, दरिद्री धन तथा कर्मशील पुरुष कर्मों के उत्तम फल प्राप्त कर लेते है। ब्रह्मवैवर्तपुराण की मानें तो रविषष्ठी व्रत के दिन, भगवान भास्कर की रश्मियों में देवी षष्ठी का प्रार्दुभाव हो जाता हैं, और जो लोग इस दौरान भगवान भास्कर को अर्घ्य प्रदान कर रहे होते हैं, उन्हें भगवान भास्कर और छठि मईया दोनों की कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती है।
सर्वप्रथम इस व्रत को किसने किया ---------------
भविष्योत्तर पुराण कहता हैं कि इस व्रत को सर्वप्रथम नागकन्या की उपदेश सुनकर सुकन्या ने किया था। वो सुकन्या जो महराज शर्याति की पुत्री थी। कहा जाता हैं सतयुग में राजा शर्याति नामक एक राजा हुए। जब राजा शर्याति अपने सपरिवार और राजकीय लोगों को लेकर जंगल में शिकार करने के लिए निकले। तभी उस जंगल में सुकन्या फूल लाने के लिए निकली। सुकन्या वहां पहुंची, जहां महर्षि च्यवन तपस्यारत थे। महर्षि की तपस्या से ऐसी हालत हो गयी थी कि उनके शरीर में दीमक लग गया था। मुनि के शरीर में दीमक लगा देखकर सुकन्या चिन्तित होकर क्या देखती हैं कि दीमक लगे मिट्टी के टीले के मध्य में दो आंखे, जूगनू की तरह चमक रही हैं। आखिर ये चमकती चीजें क्या हैं, इसे जानने के लिए सुकन्या ने महर्षि के नेत्रों को फोड़ डाला। इससे महर्षि के नेत्रों से खून की धारा निकल पड़ी, महर्षि को असह्य पीड़ा होने लगी और इधर सुकन्या अपने स्थान पर लौट आयी। इधर महर्षि च्यवन के नेत्र, सुकन्या द्वारा फोड़ दिये जाने के कारण राजा शर्याति और उनके परिवार तथा राजकीय अधिकारियों के मलमूत्र बंद हो गये, तीन दिनों तक मल मूत्र बंद हो जाने से सभी व्याकुल हो गये। राजा शर्याति ने इसका कारण अपने पुरोहित से पूछा। पुरोहित ने योग बल के द्वारा राजा शर्याति को सारी कहानी बतायी कि सुकन्या के द्वारा क्या अपराध हुआ है। राजा शर्याति सारा माजरा समझ गये और अपनी पुत्री सुकन्या का विवाह महर्षि च्यवन से कर दिया। इधर सुकन्या अपने पति महर्षि च्यवन की खूब सेवा सुश्रुषा करने लगी। एक दिन जब कार्तिक शुक्ल रविषष्ठी तिथि आयी तब सुकन्या ने जल लेने के लिए एक छोटे तालाब के निकट आयी। वहां उसने देखा कि बहुत सारी नागकन्याएं भगवान भास्कर की पूजा कर रही है। सुकन्या उन नागकन्याओं से इस व्रत के विधान और महात्मय पूछे, उन नागकन्याओं ने सुकन्या को सारी विधान बता दी। जब पुनः कार्तिकशुक्ल रविषष्ठी तिथि आयी तो सुकन्या ने विधिवत् तरीके से भगवान सूर्य नारायण की पूजा अर्चना की और अपने पति च्यवन की नेत्र ज्योति पुनः प्राप्त कर ली। इसके बाद इस व्रत के महात्मय को महर्षि धौम्य के द्वारा द्रौपदी ने सुना और इस व्रत को की। इसी व्रत के प्रभाव से द्रौपदी अपना खोया सारा सुख प्राप्त कर ली। कहा जाता हैं कि आज भी जो इस व्रत को विधि पूर्वक करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल स्वतः प्राप्त हो जाता है।
ऊं नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे।
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरंचिनारायण शंकरात्मने।।

अर्थात् समस्त चराचर के एकमात्र नेत्रस्वरुप, जगत के उत्पति, पालन, नाश के कारणभूत, सत्व, रज, तमरुप, ( ब्रह्मा, विष्णु और महेश ) त्रिगुणात्मस्वरुपवाले सूर्य नारायण को नमस्कार है।
व्रत कैसे करें -------
गर भगवान ने आपको सबकुछ दिया हैं तो कृपया कंजूसी न करें और गर कुछ नहीं दिया तो फिर आपसे उन्हें कुछ नहीं चाहिए, केवल अंजूली भर जल लेकर अर्घ्य दे दें तो आपको सारी मनोवांछित वस्तूएं प्राप्त हो जायेगी। फिर भी चार दिनों के इस व्रत में कुछ लोकाचार हैं. प्रथम दिन यानी कार्तिक शुक्ल रवि चतुर्थी तिथि को आप अपने शरीर को शुद्ध करने का प्रथम प्रयास करें। लहसुनप्याज रहित, सामान्य मौसमी सब्जी बनाये, कद्दु और चने दाल की मिश्रित दाल बनाये, अरवा चावल की भात बना लें और पूर्वाह्न के आसपास, भगवान भास्कर को ये सारी वस्तुएं भोग लगाकर भोजन करें और अन्य को भी प्रसाद स्वरुप दें। दूसरे दिन पंचमी तिथि को सायं काल में मिट्टी की चुल्हें पर आम की लकड़ी से बनी गुड़ मिश्रित अरवाचावल और दूध की बनी खीर बनाये और उसे रोटी के साथ भगवान भास्कर को भोग लगाकर ग्रहण करें और दूसरे को भी प्रसाद स्वरुप बांटे। तीसरे दिन यानी षष्ठी तिथि को किसी तालाब, नदी अथवा कूएं पर अपने सपरिवार सहित अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को सूप में विभिन्न मौसमी फलों नारियल, गुड़ और आटे की बनी ठेकूआ, नैवेद्य स्वरुप अर्घ्य प्रदान करें और फिर यहीं प्रक्रिया चौथे दिन यानी सप्तमी तिथि को उद्याचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देते समय अपनायें और इसी के साथ आपकी पूजा – तपस्या संपन्न हो जाती है।
हालांकि ये बिहार में सर्वाधिक प्रतिष्ठित है। खासकर पटना के गंगा किनारे इस व्रत करने का एक अपना अलग ही आनन्द हैं। छठ व्रत के गीतों में गंगा बार बार आयी है। इस व्रत को डाला छठ या बूढी छठ कहते है। वो इसलिये कि इस व्रत को ज्यादातर पूर्व में बुढ़ी पुरनिया ही किया करती थी, मान्यता ये थी कि वो अपने सारी दायित्वों की पूर्ति कर लेने के बाद, भगवान भास्कर से अपना इहलोक और परलोक सुधारने और अपने परिवार के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नियम धर्म से व्रत रखती थी, पर वर्तमान में ऐसा दौर चला हैं कि अब ये ठेक ही पूरी तरह से मिट गया हैं। हर उम्र के लोग, इस व्रत को कर रहे हैं। ऐसे भी व्रत करनी चाहिए, क्योंकि व्रत करने से आप अंदर से शुद्ध होते हैं, आपके विचार पुष्ट होते हैं, और इसके बाद जो आप काम करते हैं, उससे आपका परिवार, समाज और राष्ट्र सभी उपकृत होते हैं।
जय छठी मईया................................................।

Wednesday, November 10, 2010

तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय, न तुम हारे, न हम हारे....!

संदर्भ अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा 2010...

अमरीकी राष्ट्रपति की जब कभी भारत यात्रा हुई है, तो ये यात्रा शुरु से लेकर आखिरी तक नयी नयी विवादों में घिरी होती है। जो लोग चाहते हैं कि अमरीका से हमारे संबंध मजबूत हो, उन्हें अमरीकी राष्ट्रपति का प्रत्येक संवाद मन को जीत लेनेवाला लगता हैं, जबकि इसके घुर विरोधी को हर बातों में कुछ न कुछ घालमेल दिखाई देते हैं, खासकर चीन और रुस के कटटर समर्थक भारतीय वामपंथियों को अमरीका और अमरीकन राष्ट्रपति एकदम नहीं सुहाते। आखिर क्यों, इस पचड़े में हम पड़ना नहीं चाहते, सभी लोग जानते है।
आज की स्थिति और परिस्थिति में भारत की नयी पीढ़ी अमरीका से बेहतर संबंध बनाने में विश्वास रखता है, क्योंकि वो जानता हैं कि बिना बेहतर संबंध के न तो भारत को वो स्थान मिल सकता हैं, जिसकी उसे जरुरत है और न ही आगे बढ़ने का रास्ता। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा छठे राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने भारत की यात्रा में दिलचस्पी दिखायी और अपने हाव भाव और विचारों से भारतीयों के दिल जीतने में कामयाब रहे। खासकर मुबंई में दीवाली फेस्टिवल मनाने के क्रम में भारतीय बच्चों के साथ नृत्य करने का मामला हो अथवा दिल्ली के हुमायूं के मकबरे पर नन्हे – मुन्ने बच्चों के साथ मिलने का तरीका। सभी में वे बीस साबित हुए। रही बात मुंबई में भारतीय उद्योगपतियों से बातचीत और दिल्ली में संसद में उनके दिये गये भाषण बताने के लिए काफी थे कि उनकी आज की सोच क्या हैं। इसमे कोई दो मत नहीं कि जो आज पूरे विश्व की स्थिति है, उसने अमरीका के सोच में काफी बदलाव लाया है और भारत को ऐसे समय में नजरंदाज करना, अमरीका को मुश्किल सा लग रहा हैं। याद करिये जब पूर्व में हमारे देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति का अमरीका दौरा होता था तो क्या होता था, अमरीकन राजनीतिज्ञ उन्हें कितना भाव देते थे, यहीं नहीं वहां के समाचार पत्रों की क्या भूमिका होती थी और आज के वहां के राजनीतिज्ञों और समाचार पत्रों की क्या भूमिका है। आज तो वहां के अखबार भारत-अमरीका के इस दौरे और उसके नतीजों और सम्पादकीय से पटे हैं। ये है – बदलाव। और ये बदलाव। भारत के राजनीतिज्ञों के क्रियाकलापों से नही हुए, बल्कि उन सैकड़ों, हजारों, लाखों गुमनाम भारतीयों के उनकी मेहनत और उनसे निकले परिणामों का नतीजा हैं कि आज भारत ऐसे मोड़ पर खड़ा हैं कि अमरीकन राष्ट्रपति बराक ओबामा को कहना पड़ गया कि भारत एक विकसित राष्ट्र हैं, भारत को सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए और जब कभी सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या बढाने को हुई तो अमरीका भारत के इस पक्ष का समर्थन करेगा। आज अमरीकन राष्ट्रपति भारतीय उद्योगपतियों से सहयोग मांग रहे हैं, वे भारत के साथ व्यापारिक समझौते करना चाह रहे हैं, क्यों चाह रहे हैं, इसका भी खुलासा करीब – करीब देश व विदेश के समाचार पत्रों ने कर दी है।
एक बहुत ही मशहूर पंक्ति में यहां उद्धृत करना चाहता हूं.......
किसी ने ठीक ही कहा हैं...

खुद ही कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।
क्या पहले के भारतीय प्रधानमंत्री की ये हैसियत थी कि किसी अमरीकन राष्ट्रपति के साथ संवाददाता सम्मेलन में भारतीय पक्ष को इतनी मजबूती से रख सके, जैसा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बार कह कर जता दिया कि भारत अमरीका की नौकरी चूरा नहीं रहा और हमारी भागीदारी, समान मूल्यों और हितों विश्व के प्रति समान दृष्टिकोण और हमारी जनता की गहरी मैत्री पर आधारित है।
आखिर क्या वजह हुई कि अमरीकन राष्ट्रपति आज जय हिंद तक बोलने पर मजबूर हैं, पाकिस्तान में आतंकी ठिकाने उन्हें मंजूर नहीं और 26 नवम्बर के हमलावरों को पाकिस्तान सजा दे, ये बोलने से नहीं चूके। इसका सीधा सा अर्थ हैं कि अमरीका फिलहाल आर्थिक मंदी से उबर नहीं पाया हैं और वह धीरे धीरे नीचे की ओर खिसकता जा रहा हैं। वहां बेरोजगारी बढ़ी हैं, और इसका परिणाम खुद अमरीकन राष्ट्रपति झेल रहे हैं, जबकि इसके विपरीत भारत में वैसी स्थिति नहीं हैं, जैसी अमरीका की हैं, और भारत ने जिस प्रकार आर्थिक मंदी को झेला और उबरा, ऐसी कूबत शायद किसी देश में नहीं और इसी का फायदा, अमरीका उठाना चाहता है। सचमुच आज हमें खुशी हैं कि महाशक्ति खुद को माननेवाला अमरीका और उसके राष्ट्रपति बराक ओबामा, भारत की ताकत का लोहा माना हैं और कहा कि भारत एक बड़ी ताकत बन चुका हैं, पर हमें इससे ज्यादा खुश होने की जरुरत नहीं क्योंकि इनके ये बोल, कितने सत्य हैं, ये आनेवाला समय बतायेगा, पर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारी एक बहुत बड़ी आबादी भूख और गरीबी से लड़ रही हैं। जिनके पास खाने पीने पहनने ओढ़ने और रहने को तक को नहीं हैं, हमे उनके लिए कुछ करना हैं, ताकि हम सचमुच भारत को विकसित राष्ट्र बना सकें। भारत विकसित राष्ट्र, झूठ और भ्रष्टाचार में लिप्त राजनीतिज्ञों से नहीं बनेगा, बल्कि उन करोड़ों युवाओं से होगा, जिसके बारे में आज कहा जा रहा हैं कि भारत में युवाओं की एक बहुत बड़ी फौज हैं, गर ये युवा सही मायनों में अपनी शक्ति को पहचान लेंगे तो समझ लीजिए, आनेवाला समय सही मायनों में हमारा हैं, 21वीं सदी भारत का है।

Tuesday, November 9, 2010

दस वर्ष झारखंड निर्माण के...

झारखंड बने दस वर्ष हो गये, पर ये प्रांत जितना भ्रष्टाचार के लिए जाना गया, उतना किसी भी चीज के लिए नहीं। भ्रष्टाचार और झारखंड एक दूसरे के गर पर्याय हैं तो ये कहना अतिश्योक्ति भी नहीं होगी। झारखंड अलग राज्य के निर्माण की लड़ाई की बात हो या झारखंड के विकास की बात, सभी स्तर पर यहां के राजनीतिज्ञों ने अपने आचरण में गिरावट ही दिखायी, आचरण में शुद्धता तो कहीं दिखी ही नहीं। जिसका खामियाजा आज भी झारखंड भुगत रहा है। गर हम झारखंड निर्माण से पूर्व की बात करें तो पता चलता हैं कि झारखंड अलग राज्य के निर्माण की लड़ाई लड़नेवाले ज्यादातर नेता पदलोलुपता में आकर अपने जीवन भर की पूंजी व आंदोलन को कांग्रेस पार्टी के हाथों गिरवी रखा, या अपने पार्टी का विलय ही करा दिया, नतीजा न तो खुद रहे और न ही झारखंड आंदोलन की साख ही बची। ज्यादातर झारखंडी नेता व कार्यकर्ता एक नारा लगाते हैं कि कैसे लिया झारखंड, लड़ के लिए झारखंड। पर सच्चाई क्या हैं, जो लोग झारखंड के निर्माण के साक्षी है, जानते हैं। सच्चाई यहीं हैं कि -- भाजपा बिहार के कुछ पार्टस को अलग कर वनांचल प्रांत बनाने की मांग पर अडिग थी, ( जबकि झामुमो जैसी अनेक झारखंडी पार्टियां बंगाल, उड़ीसा और मध्यप्रदेश के कुछ पार्टस को भी इसमें मिलाकर झारखंड बनाने की मांग करती थी, जो संभव ही नहीं था) सन् 2000 में बिहार में राजद को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, जो कि झारखंड के निर्माण का कड़ा विरोध कर रही थी। लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के आरोप में इतने घिरे थे, कि किसी भी हालत में वे बिहार का शासन छोड़ना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने भी हामी भर दी और संयोग ऐसा हुआ कि झारखंड बन गया। इसे कोई जबर्दस्ती झूठलाने की कोशिश करें तो अलग बात हैं, और जब झारखंड बना तो क्या हुआ, स्थिति ऐसी हैं कि कोई भी झारखंडी खुद को झारखंडी कहलाने में गर्व महसूस नहीं करता। झारखंड एकमात्र प्रांत है – जहां निर्माण से लेकर आज तक, जितने भी मुख्यमंत्री हुए, सब के सब आदिवासी, जिनके बारे में कहा जाता हैं कि आदिवासी सरल, सहज और दिल के साफ होते हैं, पर इन मुख्यमंत्रियों के क्रियाकलापों पर नजर डाले, तो ये आदिवासियों को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे, और लोगों की आदिवासियों के बारे में जो धारणाएं हैं, वो बदलती नजर आयेगी। सर्वप्रथम बिहार से अलग होने के बाद बने नवोदित झारखंड के मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की बात करें। इसमें कोई दो मत नहीं कि इस शख्स से राज्य को बेहतर दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, आधारभूत संरचनाओं को ठीक करने में समय लगाया, उर्जा, सड़क और शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर, राज्य ही नहीं पूरे देश में नाम कमाया और देश में सबसे अच्छा काम करनेवाले तीसरे मुख्यमंत्री के रुप में लोकप्रिय हो गये। राज्य में जितनी योजनाएं हैं, उन्हीं के समय की हैं, जिसे लेकर, लोग अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, चाहे वो बालिकाओं को स्कूल से जोड़ने के लिए साईकिल देने की बात हो, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना हो, या आदिवासियों के बेहतर विकास की बात हो, इन्हीं के समय में पूरे राज्य में सीबीएसई पैटर्न पर माध्यमिक शिक्षा को लागू किया गया, पर जदयू के उस समय के भ्रष्ट मंत्रियों ने इनकी एक न चलने दी और उर्जा तथा खनन मामलों में इन नेताओं ने बाबूलाल को ऐसी पटखनी दी, कि बेचारे कहीं के नहीं रहे, जिस अर्जुन को वे भरत मानकर अपना उतराधिकारी बना रहे थे, वो अर्जुन ही बाद में ऐसी पट्टी पढ़ाई की बेचारे भाजपा से अलग होकर आज खुद की नयीं पार्टी बना कर भाजपा के जड़े में मट्ठा डालकर भाजपा को समूल नष्ट करने पर तूले हैं, पर इसमें वे कितना सफल होंगे, समय बतायेगा, पर सच्चाई ये ही हैं कि यहीं से भ्रष्टाचार के वटवृक्ष का बीज झारखंड की राजधानी रांची में बोया गया, जो इस दस साल में एक विशाल वृक्ष बनकर सभी भ्रष्टाचारियों को आश्रय दे रहा हैं।
हम कहां की बात करें, कौन ऐसा क्षेत्र हैं, जहां भ्रष्टाचार नहीं हैं। सीबीआई की तो ज्यादातर कार्य झारखंड में ही हैं, लगता हैं कि सीबीआई का निर्माण हमारे पूर्व के राजनीतिज्ञों ने झारखंड को देखते हुए ही किया था। जरा देखिये लालू के चारा घोटाला की बात हो या मधु कोड़ा से जुड़ा मामला सभी का केन्द्र बिन्दु झारखंड ही हैं। पर इनकी बात करने के पूर्व हम झारखंड के विधानसभा की बात कर लें तो ज्यादा बेहतर होगा। यहां अब तक जितने भी विधानसभाध्यक्ष हुए, अपने ढंग से नियुक्तियां की, और यहां पर नियुक्ति घोटाला हो गया, कौन सा मापदंड रखा गया, कैसे बहाली हुई, इस पर गर बात करें तो रामचरितमानस से भी बड़ा महाकाव्य तैयार हो जायेगा। आश्चर्य इस बात की हैं कि इसे लेकर किसी भी विधानसभाध्यक्ष ने अपनी गलती नहीं मानी हैं और न ही शर्मिदंगी दिखायी।
जरा इस विवरणिका को देखिये तो पता लग जायेगा कि अपने यहां विधायकों और दूसरे जगहों के विधायकों की संख्या कितनी और इसे देखते हुए स्टाफों की संख्या कितनी हैं और उस पर राशि कितनी खर्च हुई हैं -----------------------
राज्य-------विधायकों की संख्या----स्टाफ------वार्षिक खर्च करोड़ रुपये में
छत्तीसगढ़ -------91------------255 -----5.60
उत्तराखंड -------70 ------------190 -----4.25
बिहार --------243-------------630 -----7.25
झारखंड---------81 ------------960 ----16.81
कमाल इस बात की हैं कि विधानसभा को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता हैं और इस मंदिर में आवश्यकता से अधिक अयोग्य लोगों की बहाली, वो भी अपने चहेतों को नौकरी दिलाकर विधानसभाध्यक्षों ने कर दी, क्या ये शर्मनाक नहीं।
कमाल हैं दस साल बने हो गये, झारखंड के इसी बीच सात सरकारें आयी और चली गयी, दो – दो बार राष्ट्रपति शासन लगा, आठवी सरकार भी कैसे बनी, इसको लेकर तरह तरह की अटकलें लगायी गयी हैं, कहनेवाले तो कह भी चुके हैं कि इस सरकार को बनाने में कारपोरेट जगत के लोगों ने रुचि ली हैं, जिसके एवज में इस सरकार ने उन्हें उपकृत करने की योजना पर काम भी शुरु कर दिया हैं। कमाल इस बात की भी कि राज्य को बने दस साल हुए और इससे ज्यादा बार विकास आयुक्त बदले जा चुके हैं, छह – छह बार पुलिस महानिदेशक और महाधिवक्ता का बदलाव हो चुका हैं, औसतन हर दस बाहर महीने में सचिवों का तबादला हो जाता हैं। भ्रष्टाचार का आलम तो ये हैं कि यहां स्थानांतरण उद्योग भी चलता हैं, और वसूली भी की जाती है।
भ्रष्टाचार का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता हैं कि इस राज्य का अपना विधानसभा भवन नहीं, सचिवालय नहीं, जबकि इन्हीं पर करीब दो सौ करोड़ रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं। राष्ट्रीय खेल अब तक नहीं हो पाये है। इन मंत्रियों और अधिकारियों की करतूतों को देखिये अपने चहेतों को किस प्रकार झारखंड लोक सेवा आयोग के माध्यम सें शानदार नौकरियां दिलवा दी, ये अलग बात हैं कि पूरे मामले की जांच हो रही हैं, और कुछ लोग इस मामले में जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं। यहीं नहीं शायद देश का ये पहला राज्य हैं जहां पर भ्रष्टाचार मामले में ही एक निर्दलीय व्यक्ति जो मुख्यमंत्री बना, अपने रिकार्ड भ्रष्टाचार के कारण, रांची और दिल्ली की जेलों में रहकर झारखंड की मान को गिरवी रख दिया है। यहीं नहीं इनके शासनकाल में ही मंत्री रहे, कई मंत्रियों पर सीबीआई की पकड़ हैं और ये भी फिलहाल विभिन्न जेलों में बंद रहकर अपनी जिंदगी को नारकीय बना रखा हैं। आश्चर्य इस बात की भी हैं कि भ्रष्टाचार के आरोप में बंद इन मंत्रियों और नेताओं के रिश्तेदारों को उनके दैनिक जीवन में कोई दिक्कत नहीं आ रही, बल्कि वे इसका फायदा भी उठा रहे हैं और विधानसभा तक पहुंच जा रहे हैं, यहीं नहीं जेल में रहकर ये लोकसभा के चुनाव तक जीते हैं, ऐसे में यहां की जनता की सोच पर स्वतः प्रश्न चिह्न लग जाता हैं कि क्या वो भ्रष्टाचार को सदाचार की ताबीज मान चुकी हैं, गर नहीं मानती तो भ्रष्टाचार मामलों में बंद ये नेता और उनके रिश्तेदार चुनाव में तो कम से कम नहीं ही जीतते, पर इनकी जीत बताती हैं कि जनता के सोच में भी बदलाव आया हैं और यहां की जनता फिलहाल भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा नहीं मानती, तभी तो सभी मस्त हैं नहीं तो भ्रष्टाचार पर आज तक अंकुश क्यों नहीं लगा, ये तो और पनपता जा रहा हैं, भस्मासुर की तरह।