Monday, July 1, 2013

झारखंड की जनता की छाती पर मूंग दलने को मचलते झामुमो और कांग्रेस के पत्नीभक्त नेता...................................

झारखंड के कांग्रेस-झामुमो से जूड़े नेताओं-विधायकों की पत्नियां, बेटे-बेटियां, दामाद और उनके लटके - झटके दुखी है। जब से भाजपा-झामुमो-आजसू की खिचड़ी सरकार झारखंड में गिरी, तब से इनके हाल बेहाल हैं, क्योंकि इनके नेता बार-बार कहा करते थे, कि झामुमो आज भाजपा से नाता तोड़े और लीजिये कल झामुमो और कांग्रेस की सरकार बन कर तैयार, पर ये क्या राष्ट्रपति शासन के छह महीने बीतने को आये पर अभी तक झामुमो-कांग्रेस की राज्य में सरकार नहीं बनी। बेचारे हेमंत के हाड़ में हल्दी नहीं लगी, बेचारे मुख्यमंत्री नहीं बने, क्योंकि उनकी दिली तमन्ना हैं कि एक - दो महीने के लिए ही सही कम से कम मुख्यमंत्री की सूची में उऩका नाम तो अब लिख ही दिया जाना चाहिए, पर सफलता नही मिल रही, लेकिन कांग्रेस के पूर्व झारखंड प्रभारी शकील अहमद ने उनके अरमानों पर बड़ा ध्यान दिया और उनकी बाते अपने अन्नदाता राहुल तक पहुंचा दी, साथ ही ये भी बता दिया कि गर कांग्रेस ने हेमंत के हाड़ में हल्दी लगवा दी तो देर सबेर इसका फायदा कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव में अवश्य मिलेगा। जैसे ही शकील के सरकार बनाने की हवा देने के बाद कांग्रेस - झामुमो के नेताओँ व विधायकों को मिली, बेचारे खुशी से पगला गये। इनकी पत्नियां, बेटे-बेटियां-दामाद खुशी से पागल हो गये। फिर सरकार बनेगी, दोनों हाथों में लड्डू होंगे, जैसे पूर्व की सरकार में शामिल मंत्रियों, विधायकों की पत्नियां, बेटे-बेटियां और दामाद विदेश यात्रा का आनन्द लेते थे, अब वे भी 18 महीनों में सारा कसर निकाल लेंगे। उन्होंने कोई पाप किया हैं क्या। उन्हें भी विदेश यात्रा और दुनिया का सारा सुख लेने का अधिकार हैं, जनता ने उन्हें मौका दिया हैं, इसका फायदा क्यों न उठाये। और लीजिये इन्हीं सारी तिकड़मों के लिए सरकार बनाने का दौर चलना शुरु हो गया हैं। हां एक बात और हम तो ये लिखना भी भूल रहे हैं, पर अब याद आ गया हैं, लिख देता हूं। यहां का मीडिया जगत भी चाहता हैं कि राष्ट्रपति शासन के बजाय जनता के प्रतिनिधियों का शासन हो, क्योंकि वो जानता हैं कि यहां के जनप्रतिनिधियों को अपनी अंगूलियों पर नचाकर, यहां के प्रशासनिक अधिकारियों से अपने हित में वो काम कराया जा सकता हैं, जो फिलहाल राष्ट्रपति शासन में होता नहीं दीखता, चाहे वो विज्ञापन से संबंधित ही मामला क्यूं न हो। राष्ट्रपति शासन में विज्ञापन मीडिया को उतने नहीं मिलते, जितना की अर्जुन मुंडा के शासनकाल मे अथवा कांग्रेस -झामुमो के शासनकाल में संभव है, और गर किसी कारण से विज्ञापन नहीं मिला तो फिर अपना ब्लैकमेलिंग का धंधा हैं ही। इसलिए यहां का मीडिया जगत भी दिलोजां से चाहता हैं कि यहां सरकार बने, चाहे वो पांच दिन के लिए ही क्यूं न हो।
इस सरकार बनाने में, जनहित और राज्यहित की बात खूब हो रही हैं, पर जरा सोचिये ये जनहित और राज्यहित की बात करनेवालों का चरित्र क्या हैं। सबसे पहले बात कांग्रेस की - यहां काँग्रेस के नेता राजेन्द्र प्रसाद सिंह हैं जो अर्जुन मुंडा के शासन काल में नेता प्रतिपक्ष थे। इनके गुट ने बी के हरिप्रसाद, प्रभारी, झारखंड कांग्रेस के रांची आगमन पर क्या गुंडागर्दी दिखायी ये बताने की जरुरत नहीं। इन्हीं के बेटे हैं - अनूप सिंह जो प्रदेश में एक बड़े पद पर हैं और अपने ही विधायक मन्नान मल्लिक को वो सबक सिखाया कि पूछिये मत। आज भी रांची कोतवाली थाना में इनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हैं, जरा सोचिये ऐसे ऐसे लोग सत्ता में होंगे तो राज्य और जनता का कितना हित होगा। अब जरा झामुमो की बात कर ले। इनके सुप्रीमो है- दिशोम गुरु शिबू सोरेन। ये हमेशा गर्त में जा रहे कांग्रेस को संभालते हैं। पहली बार रिश्वत लेकर नरसिंहा राव की सरकार बचानेवाले शिबू सोरेन की महिमा निराली हैं। इन्हीं की बहू सीता सोरेन हैं, जो सीबीआई के शिकंजे में हैं, जिन्होंने वोट बेचने की अपनी पार्टी की परंपरा का खूब निर्वहण किया और उन पैसों से क्या किया। झारखंड की जनता को मालूम हैं। ऐसे तो इनके सारे विधायक वोट बेचने की परंपरा में पीएचडी हासिल कर ली हैं। इसी पार्टी की कृपा से कई राज्यसभा के सांसद बन गये और कई झारखंड को चारागाह समझ कर यदा कदा झारखंड का परिभ्रमण करते रहते हैं। 
सवाल उठता हैं कि जिस प्रांत के नेताओं का चरित्र इस प्रकार का हो। वहां सरकार बने अथवा न बने क्या फर्क पड़ता हैं। आखिर जनहित और राजहित में सरकार बनाने की बात करनेवाले ये जनता को इतना बेवकूफ क्यों समझते हैं, कि जैसे जनता जानती ही नहीं। अरे जनता यहां की सब जानती हैं तभी तो ऐसे लोगों को अपना नेता चूनती हैं ताकि वो विधानसभा पहुंचकर उनकी छाती पर मूंग दल सकें, और इधर कई महीनों से जनता की छाती पर मूंग नहीं दली गयी, इससे जनता भी परेशान हैं। भला एक व्यक्ति को जनता की छाती पर मूंग दलने का अधिकार जनता ने तो नहीं दिया, इसलिए यहां के सभी विधायकों और मंत्रियों को अधिकार हैं कि वे झारखंड की जनता के छाती पर मूंग दलकर, अपनी पत्नियों, बेटे-बेटियों और दामाद-बहूंओं के लिए सात पुश्तों तक पूंजी जमा कर लें, ताकि इनके मरने के बाद, इनकी आत्मा को कोई मलाल न हो, कि वे झारखंड में जन्म लिये पर झारखंड को मुहम्मद गोरी और गजनी की तरह लूट न सके।

Tuesday, June 18, 2013

बिहार के दंगाई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गुंडागर्दी.............................

आज बिहार में भाजपा विश्वासघात दिवस मना रही हैं, पूरे राज्य में बिहार बंद का आह्वान किया हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दंगाई बतानेवाला बिहार का दंगाई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गुंडागर्दी देखिये। वे अपने जदयू कार्यकर्ताओं को आह्वाऩ कर रहे हैं कि वे सड़कों पर उतरे। भाजपा कार्यकर्ताओं का मुकाबला करें और इनके आह्वाऩ पर जदयू कार्यकर्ताओं ने वहीं किया जो उनके आलाकमान नीतीश ने कहा - जमकर भाजपा कार्यकर्ताओं पर लाठियां बरसायी। भाजपा कार्यकर्ताओॆं को घायल कर दिया। इनके कार्यकर्ता राइफल लेकर भी पहुंचे, ये राइफल लेकर सड़कों पर भजन गाने के लिए तो आये नहीं थे। अंततः जदयू के इस गुंडागर्दी और स्वयं पर लाठियां बरसते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं ने वहीं किया जो सामान्य व्यक्ति ऐसी अवस्थाओं में करता हैं।
मैं पूछता हूं - कि नीतीश बिहार के खुद मुख्यमंत्री हैं। वे सरकार में हैं। पुलिस उनकी। प्रशासन उनका। ऐसे में वे पुलिस प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने के बदले, जदयू कार्यकर्ताओं को उकसाने का काम क्यों किया। ऐसा काम सेक्यूलर नेता नहीं बल्कि एक गुंडा करता हैं। ये बिहार ही नहीं, बल्कि देश का बच्चा - बच्चा जानता हैं। क्या नीतीश बता सकते हैं कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता जदयू के कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा कार्यालय क्यों गये थे। उनकी मंशा क्या थी। ऐसे में नीतीश के पुलिसकर्मी क्या कर रहे थे, वे क्या इंतजार कर थे, कि जदयू कार्यकर्ता, भाजपा कार्यालय जाये, भाजपा कार्यकर्ताओं को जमकर, उनकी औकात बताये। ऐसे में पूरे राज्य में कानून व्यवस्था गर बिगड़ी तो उसका जिम्मेदार कौन होगा।
कल तक भाजपा अच्छी, सत्ता से उसके साथ चिपकने में अच्छा लगा और अब लगे भाजपा और भाजपा कार्यकर्ताओं को औकात बताने। धर्मनिरपेक्षता का इतना ही ठेका ले रखा हैं, तो लोकनायक जयप्रकाश नारायण का लबादा क्यों ओढ़ रखा हैं, उसे फेंक दो और जाओ सोनिया व राहुल के चरणों में बलिहारी जाओ। ऐसे भी सोनिया और राहुल के इशारों पर ठूमके लगानेवाला, भारत का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तुम्हें धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण पत्र आज दे ही दिया हैं। इस देश की विडम्बना हैं, कि सत्ता से बाहर रहने पर सारे के सारे नेताओं को भाजपा अच्छी लगती हैं, उसके कंधों पर मुख्यमंत्री बनना अच्छा लगता हैं, पर जैसे ही उसे अपनी मूर्खता पर अभिमान आने लगता हैं, उसे भाजपा और भाजपा के नेता दंगाई नजर आने लगते हैं। पूरे बिहार को विकास का हौवा खड़ाकर, बिहार का नाश करनेवाला, बिहार की लड़कियों से काला दुपट्टा उतरवानेवाला नीतीश, पूरे बिहार को बर्बाद कर के रख दिया। फिर भी पता नहीं, नीतीश भक्त पत्रकार, आर्थिक विश्लेषक और उसके टुकड़ों पर पलनेवाले मूर्खों को नीतीश क्यूं अच्छा लगता हैं, समझ में नहीं आता। 
आश्चर्य तो तब हुआ, कि कल रांची से प्रकाशित एक अखबार ने लंदन में अपनी पूरी जिंदगी गुजारनेवाला एक व्यक्ति का आलेख छापा - कि नीतीश बिहार को संभाल लेंगे। उसका नमूना तो आज ही दीख गया कि नीतीश कैसे बिहार को संभालने का प्रबंध कर रखा हैं। अरे जो नेता, अपने ही नेता जार्ज फर्नांडिंस, दिग्विजय सिंह को ठिकाने लगा दे और अब शरद यादव को उसकी औकात बताते हुए, पूरे पार्टी से लोकतंत्र समाप्त कर दे और खुद को स्वयंभू नेता घोषित कर दे, वो देश या प्रांत का नेता या सेवक नहीं होता, वो तो विशुद्ध रुप से तानाशाह कहलाता हैं, और आज जिस प्रकार से उसने अपने कार्यकर्ताओं को पूरे प्रदेश में सड़कों पर उतरने का आह्वान कर दिया, उससे साफ लगता हैं कि ये काम तो गुंडें का भी नहीं, ये तो पूर्णतः दंगाई का काम हैं, पर देश के अन्य नेताओं को नीतीश का ये कुकृत्य दिखाई नहीं देता।

Monday, June 17, 2013

घबराइये नहीं - इस बार बारिश के नक्षत्र दगा नहीं देंगे, खूब बरसेंगे.......................

घबराइये नहीं - इस बार बारिश के नक्षत्र दगा नहीं देंगे, खूब बरसेंगे.......................
जी हां। संदेश तो कुछ इसी प्रकार के दे रहे हैं, ये नक्षत्र। भारतीय मणीषियों ने नक्षत्रों के आधार पर, उनका विश्लेषण करते हुए पूर्व में भविष्यवाणियां किया करते थे, और ये बाते सत्य साबित होती थी। पिछले कई वर्षों से मैंने भी महसूस किया कि ऐसा सहीं हैं। जब - जब नक्षत्रों ने ये संदेश दिया कि इस बार बारिश नहीं होगी तो हुआ भी ऐसा ही बारिश नहीं हुई। जब नक्षत्रों ने सामान्य अथवा मूसलाधार बारिश के संकेत दिये तो उस साल भी इसी प्रकार की घटना घटित हुई। इस बार ये नक्षत्र क्या कह रहे हैं। इसे देखना वर्तमान में जरुरी हैं। बारिश के कई नक्षत्र हैं जो विभिन्न प्रकार से संदेश दे रहे हैं। ये कह रहे हैं कि भारतीय जनता घबराये नहीं, वैज्ञानिक कुछ भी कहें, नक्षत्र इस बार दगा नही देंगे। केवल एक ही नक्षत्र आश्लेषा मे्ं अल्पवृष्टि के संकेत हैं। आइये देखते हैं, नक्षत्रों के दृष्टिकोण में मानसून...................
क. आर्द्रा - 22 जून को दिन 11.41 से प्रारंभ - सामान्य वृष्टि
ख. पुनर्वसु - 6 जुलाई को दिन 1.16 से प्रारंभ - सामान्य वृष्टि
ग. पुष्य - 20 जूलाई को दिन 2.43 से प्रारंभ - सामान्य वृष्टि
घ. आश्लेषा - 3 अगस्त को दिन 2.03 से प्रारंभ - अल्प वृष्टि
ड. मघा - 17 अगस्त को दिन 1.51 से प्रारंभ - सामान्य वृष्टि
च. पूर्वा फाल्गुन - 31 अगस्त को दिन 10.33 से प्रारंभ - वार्युवृष्टिश्च
छ. उत्तरा फाल्गुन - 13 सितम्बर को रा. 4.42 से प्रारंभ - वार्युवृष्टिश्च
ज. हस्त - 27 सितम्बर को रा. 8.06 से प्रारंभ - वार्युवृष्टिश्च
झ. चित्रा - 11 अक्टूबर को दि. 8.35 से प्रांरभ - वार्युवृष्टिश्च
यानी साफ संकेत हैं कि एक नक्षत्र को छोड़, सभी नक्षत्रों से सामान्य से अधिक बारिश होने के संकेत हैं, अंतिम के चार नक्षत्र जैंसे पूर्वा फाल्गुन, उत्तरा फाल्गुन, हस्त और चित्रा तो आँधी-पानी के साथ बरसने के संकेत दे रहे हैं यानी झमाझम बरसेंगे नक्षत्र और लहलायेंगी फसलें................

Saturday, June 15, 2013

नीतीश बदनाम हुआ, मुसलमां तेरे लिए.......

बहुत पहले एक गाना सुना था -- लौंडा बदनाम हुआ, नसीबन तेरे लिए......। ये गीत अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश पर पूरी तरह फिट बैठ रही हैं और वह भी इस प्रकार- नीतीश बदनाम हुआ, मुसलमां तेरे लिए...........,क्योंकि नीतीश सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम वोट के लिए, वो सारे कार्य कर रहे हैं, जो किसी भी राजनीतिज्ञ को शोभा नहीं देता। इन्हें ये लगता हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करके ये पूरे बिहार में मुसलमानों के रहनुमा बन जायेंगे। अकेले बिहार में लोकसभा और विधानसभा में जदयू का परचम लहरा देंगे, तो ये उनकी मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। मुस्लिम मतदाता चाहे वह बिहार का हो या किसी अन्य प्रांत का, हमें नहीं लगता कि वो इतना मुर्ख हैं कि सिर्फ मोदी का विरोध कर देने से, इनके साथ अथवा किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ चिपक जायेगा।बिहार में कभी कांग्रेस, कभी लालू को अपना हीरो चुननेवाली मुस्लिम मतदाता, कल तक नीतीश के साथ थी, पर महराजगंज लोकसभा उपचुनाव ने ये सिद्ध कर दिया कि मुस्लिम मतदाताओं को ज्यादा दिनों तक कोई भी मुर्ख नहीं बना सकता, पर जब कोई मुर्ख बनने को तैयार हैं, अपने घर में आग लगाकर खुद तमाशा देखना चाहता हैं तो उसे किया ही क्या जा सकता हैं। उसे भी अपना घर फूंकने का पूरा अधिकार है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत एक महान देश हैं और बिहार उसमें अनोखा। एक फिल्म में बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा ने डायलाग बोला था। डायलॉग था - बिहार में तो मां के पेट में ही बच्चा राजनीति सीख लेता हैं। तब समझ लीजिये, बिहार में राजनीति कैसे सर चढ़कर बोलता है। फिलहाल बिहार में नीतीश कुमार को, नरेन्द्र मोदी से चिढ़ हैं। उनका कहना हैं कि नरेन्द्र मोदी सांप्रदायिक हैं। उन पर 2002 में गुजरात में हुए दंगे का दाग हैं। उनके इस चिढ़ को उनके आसपास अथवा उनकी कृपा से दिल्ली के राज्यसभा तक पहुंचने वाले चिरकुट नेता शिवानन्द तिवारी अथवा कृषि मंत्नी नरेन्द्र सिंह बढ़ा चढ़ाकर पेश करते हैं और बताते हैं कि नीतीश सर्वाधिक सेक्यूलर नेता है, पर इन नेताओं के चेहरे से तब हवाइंया उड़ने लगती है। जब एक देशभक्त सवाल पूछ देता हैं, वो सवाल हैं............................
क. जब 2002 में गुजरात जल रहा था, उस वक्त नीतीश कुमार केन्द्र में मंत्री थे, उसी समय वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ इतनी उग्रता क्यों नहीं दिखाई, क्यों नही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एक्शन लेने के लिए दबाव बनाया।
ख. आडवाणी सेक्यूलर कैसे हो गये, आडवाणी को वे प्रधानमंत्री बनाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं, जबकि उन्हीं की पार्टी के कई नेता अच्छी तरह जानते हैं कि  रामरथ यात्रा निकालकर आडवाणी ने क्या किया था।
ग. भाजपा धर्मनिरपेक्ष नहीं पर कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष कैसे हो गयी, जबकि इंदिरा गांधी हत्याकांड के बाद देश में हुए दंगे के दौरान हजारों सिक्खों का कत्लेआम कर दिया गया। हाल ही में असम में एक बहुत बड़ा नरसंहार हो गया, वहां किस समुदाय के लोग मारे गये, ये नीतीश बहुत अच्छी तरह जानते हैं। यानी भाजपा करे तो दंगे और कांग्रेस व नीतीश की पार्टी करे तो हर हर गंगे।
घ. पूरा बिहार जानता हैं कि नीतीश बिहार के विकास की हवा खड़ा करते हैं, पर स्वयं घोर जातिवादी हैं, ये तो फूट जालो शासन करों में विश्वास रखते हैं, जैसे देखिये दलितों में भी बंटवारा खड़ा कर दिया और एक वर्ग को महादलित घोषित कर दिया, क्या इससे उस समुदाय का कल्याण हो गया।
ड. नीतीश ने विकास का हवा खड़ा कर, सर्वाधिक फायदा उन अपराधियों को पहुंचाया जो इनके दल में शामिल थे, और जो अपराधिक किस्म के नेता दूसरे दलों में थे, उन्हें चून-चूनकर जेलों के अंदर पहुंचाया, ताकि नीतीश का सामना कोई कर ही न सकें।
च. नीतीश ने नीतीश भक्त पत्रकारों को खूब फायदा पहुंचाया।  नीतीश भक्त पत्रकारों ने भी नीतीश को जमकर फायदा पहुंचाया। उसका नमूना देखिये, जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी पटना में तो एक चैनल ने पटना में आयोजित भाजपा कार्यकारिणी की बैठक का समाचार दो मिनटो में खत्म कर दी और नीतीश की एक सभा के समाचार को 21 मिनट स्थान दिया। बाद में जब हमने पता लगाया तो पता चला कि नीतीश के समर्थन में ये पेड न्यूज था।
छ. इसी नीतीश ने अपनी ही पार्टी के टॉप स्तर के नेता को ठिकाने लगाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। जान बूझकर बांका संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से दिग्विजय सिंह का टिकट काटा। अंत में दिग्विजय सिंह खुद निर्दलीय लड़ गये और नीतीश को उसकी औकात बता दी। फिलहाल दिग्विजय सिंह दुनिया में नहीं हैं।
ज. सच्चाई ये हैं कि जदयू कोई राष्ट्रीय पार्टी नहीं हैं, ये क्षेत्रीय पार्टी हैं जो बिहार में भाजपा के वैशाखी पर टिकी है, नीतीश इसके एकमात्र नेता हैं, जो कुर्मी जाति से आते हैं। इस नीतीश ने जदयू को पूरी तरह से हाईजैक कर लिया हैं। शरद यादव तो मुखौटा हैं, उनकी इतनी हिम्मत भी नहीं कि नीतीश के खिलाफ बगावत या आवाज बुलंद कर सकें, क्योंकि उन्हें भी लोकसभा पहुंचना हैं, राजनीति करनी हैं और वे जानते हैं कि नीतीश उन्हें लोकसभा में आराम से पहुंचा सकते हैं, इसलिए ये चाहकर भी राजग गठबंधन को मजबूती नहीं प्रदान कर सकते, ये वहीं करेंगे, जो नीतीश कहेंगे, इसलिए बेचारे शरद यादव पर क्या लिखना और क्या बोलना।
हमारे देश में अल्पसंख्यक का मतलब। बौद्ध, जैन, यहुदी अथवा पारसी नहीं होता। इनके खिलाफ कुछ भी अत्याचार कोई भी कर दे, किसी भी नेता के आंख से आंसू नहीं दिखाई पड़ेंगे पर जैसे ही मुस्लिम या इसाईयों के खिलाफ गर छिटपुट हिंसा भी हो जाये तो फिर देखिये इन घडि़याली नेताओँ के घड़ियाली आंसू, इतने आंसू टपकायेंगे कि पूछिेय मत। ये इसलिए घड़ियाली आंसू टपकाते है, क्योंकि कई विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रो में ये वोटर के रुप में निर्णायक हैं। गर इन्हें पता लग जाये कि मुस्लिम या इसाई वोट अब निर्णायक नहीं रहे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये घडि़याली आंसू क्या ये तो एक बूंद पसीने भी इनके लिए नहीं बहाये। ये हैं हमारे देश के वर्तमान घटियास्तर के नेताओं का चरित्र। विधायक और सांसद बनने के बाद तो ये शपथ लेते है कि वे भारत के संविधान की मर्यादाओं की रक्षा करेंगे पर सच्चाई ये  हैं कि जितना संविधान की धज्जियां ये उड़ाते हैं, उतना कोई नहीं और वोट के लिए तो ये कहीं मुसलमान तो कहीं घोर जातिवादी होने से भी नहीं चूकते। हम कहते हैं कि जब मुस्लिम वोटरों की इतनी ही चिंता हैं तो हमारा सलाह हैं कि नीतीश धर्मपरिवर्तन क्यों नहीं कर लेते। इससे अच्छा तो दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। मुस्लिम भी कहेंगे कि देखो ये नीतीश को, जो इस्लाम कबूल कर लिया, अपने हिंदू धर्म से खुद को अलग कर लिया। नेता हो तो ऐसा हो, जो वोट के लिए अपना ईमान और धर्म भी बदल लिया हैं, इसलिए वोट तो हम नीतीश कुमार जो अब मो.नीतीशुद्दीन बन गये हैं, उन्हें ही देंगे। इससे जदयू भी मजबूत हो जायेगा और सदा के लिए नीतीश बिहार के मुसलमानों में लोकप्रिय और ऐतिहासिक पुरुष हो जायेंगे................

Wednesday, June 12, 2013

बिहार में नरेन्द्र मोदी की बहती बयार व जदयू नेताओं का पागलपन.....................

नरेन्द्र मोदी को भाजपा ने चुनाव प्रचार अभियान समिति का कमान क्या सौंपा। भाजपा में शामिल आडवाणी ने भाजपा की नैया में पहली कील ठोक दी। फिर क्या था, जदयू जो पहले से ही गुजरात की जनता और वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को खूलेआम गाली दे रहा था, उसे मौका मिल गया। अब तो वो ताल ठोक कर नरेन्द्र मोदी को दंगाई कह रहा हैं, भाजपा से तलाक लेने की बात कर रहा है, भाजपा से खुद को अलग कर 2014 की लोकसभा के चुनाव लड़ने की बात कह रहा है। उसे ऐसा करना भी चाहिए, उसकी ताकत का उसे अंदाजा लगना भी चाहिए। हम बार - बार कह भी रहे हैं कि 2014 का चुनाव जब भी हो, लालू यादव के पास खोने के लिए कुछ नहीं, जबकि नीतीश के पास पाने के लिए कुछ भी नहीं, क्योंकि लालू के वोटर कल भी नहीं उससे खिसके थे, आज भी नहीं खिसके है। महराजगंज का लोकसभा का उपचुनाव परिणाम बताने के लिए काफी है।
आज नीतीश सरकार में शामिल जदयू कोटे से शामिल कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह ने बयान दिया हैं कि मोदी दंगाई है। ये वहीं नरेन्द्र सिंह हैं जो एक जनता दरबार में एक आम जनता को अपने संबोधन में ये कह देता हैं कि थोड़ा सा हमने आपको सम्मान दिया और लगे आप सर चढ़कर ........। ये वहीं नरेन्द्र सिंह हैं जो अन्ना हजारे को मां बहन की गाली भी दे देता हैं, वो भी तब जब संवाददाताओं को समूह उससे अन्ना हजारे से संबंधित सवाल पूछते हैं। ये वहीं नरेन्द्र सिंह हैं, जिसे ईश्वर ने भयंकर सजा भी दी, पर उसे ईश्वर की मार के बाद भी बुद्धि नहीं खुली। राजनीति में कायरता व अपराध का संगम का सबसे बड़ा नमूना नरेन्द्र सिंह आज बिहार के किसानों का भाग्य निर्माता बना बैठा हैं। ऐसे ही कई जदयू में नेता हैं, जो अपराधी किस्म के हैं, पर विधायक और मंत्री बने बैठे हैं, जिन पर कई - कई अपराधों की लंबी फेहरिस्त हैं, पर जदयू के बड़े नेताओं का इन पर ध्यान नहीं जाता। ऐसे कई नेता जो विधायक बन कर जदयू के नेता बने हैं, जिससे बिहार की छवि दूसरे प्रांतों में बदनाम होती हैं, पर ये अपने को पाक साफ बताते हैं और मोदी को गाली देने में शान समझते हैं।
जदयू को लगता हैं कि नरेन्द्र मोदी को गाली देने, गुजरात की जनता को गाली देने से, 2014 में लोकसभा की सीट बढ़ जायेगी तो उसे मुगालते में नहीं रहना चाहिए। भाजपा और उससे जूड़े अन्य संगठन कोई चूड़़ियां पहनकर नहीं बैठी हैं। उन्हें भी जवाब देना आता है। नरेन्द्र मोदी, बिहार आयेंगे और चुनाव प्रचार करेंगे। पता लग जायेगा कि बिहार में नरेंद्र मोदी क्या हैं। अगर नीतीश को हिम्मत हैं तो गुजरात जाकर लोकसभा की एक भी सीट जीतकर दिखा दें या नरेंद्र मोदी की तरह जनसभा में भीड़ एकत्रित कर दिखा दें। सारा गर्व ही चूर हो जायेगा। इधर नीतीश और उनके नेता मोदी के बयार से इतने पागल हो गये कि उन्हें रात-दिन सोते जागते मोदी - मोदी ही नजर आ रहे हैं। आश्चर्य इस बात की हैं कि जदयू के इन घटियास्तर के नेताओं को मोदी दंगाई नजर आते हैं, पर इसी पार्टी के लाल कृष्ण आडवाणी को धर्म निरपेक्ष बताने से नहीं चूक रहे। कमाल हैं कि ये वहीं आडवाणी हैं, जिन्होंने रामरथ यात्रा निकाला। जिसकी वजह से बाबरी मस्जिद का आज नामोनिशां नहीं हैं। जिनके वजह से पूरे देश में धर्मनिरपेक्षता को खतरा उत्पन्न  हो गया था, देश के कई शहरों में हिंदू मुस्लिम दंगे हो गये। जिनके बारे में इसी पार्टी के कई नेता, उस वक्त दूसरे दलों में थे, आडवाणी को देश के लिए खतरा मानते थे, आज उसके लिए वे झंडे ढोने को बेताब हैं।
कमाल इस बात की हैं, इसी देश में एक प्रधानमंत्री राजीव गांधी हुए। जिनके कार्यकाल में पूरे देश में सिक्खों का कत्लेआम हुआ, पर इन नेताओं को कांग्रंसी धर्मनिरपेक्ष दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि सिक्खों की संख्या मतदाताओं के रुप में उतना प्रभावशाली नहीं, इसलिए सिक्खों के लिए इनके आंखों से आंसू नहीं बहते और न ही बयान आता हैं। हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा अथवा सर्टिफिकेट का वितरण समय -समय पर मतदाताओं को ध्यान में रखकर रचा अथवा वितरित किया जाता हैं। धन्य हैं, भारत और भारत की जनता और इसके नेता। चीन पांच किलोमीटर अंदर तक घूसकर सड़क का निर्माण कर लिया। 20 किलोमीटर अंदर तक घूस गया, पर इनकी बेचैनी इस पर नहीं दिखी, पर नरेन्द्र मोदी के लिए बेचैनी देखिये। चीन की साम्राज्यवादी नीयतों पर इन्हें शक नहीं, उसके खिलाफ बयान हीं नहीं, बल्कि चीन का दौरा होता हैं, उसे गुरु बनाने की कोशिश होती हैं, और अपने ही देश के नागरिकों को देशद्रोही बताकर, पूरे विश्व के सामने नीचा दिखाने की कोशिश करने में, इन नेताओं को कितना आनन्द आता हैं। वाह रे नीतीश, वाह रे जदयू के घटियास्तर के नेता। तुम्हारा जवाब नहीं। बस एक साल का इंतजार करो, जनता बिहार की तैयार हैं, बताने के लिए कि तुम्हारी जगह कहां हैं...................................

Tuesday, June 11, 2013

आडवाणी का कुर्सी प्रेम और भाजपा.........................

निः संदेह लाल कृष्ण आडवाणी देश के बड़े नेता है, पर इतने भी बड़े नहीं, जिनका आचरण हम अपने जीवन में उतार सके या हम किसी को कह सके कि तुम आडवाणी जैसे नेता बनो। किसी भी नेता का जीवन-दर्शन, उसके संपूर्ण जीवन पर निर्भर करता हैं कि उसने अपने जीवन काल में क्या किया और क्या नहीं किया। क्या करने से उसके द्वारा देश को बल मिला, पार्टी को बल मिला अथवा उसकी पार्टी या देश की दुर्गति हो गयी। कमाल हैं ये वहीं आडवाणी है जो किसी समय दिल खोलकर ये बोला करते थे, कि गर देश में भाजपा सत्ता में आयी तो देश के प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी विराजमान होंगे, उन्होंने ऐसा किया भी और कभी भी वाजपेयी के आगे अपना कद उचा करने की कोशिश नहीं की, जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए, पर आज नरेन्द्र मोदी के आगे आते ही, इतने बड़े नेता ने जो ओछी हरकत की, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिख, जिन बातों का पत्र में उल्लेख किया, उससे ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति ने अपने जीवन के सारे कार्यकाल पर खुद से पानी फेर दिया। हमें तो अब संदेह होता हैं कि किसी कालखंड में इस व्यक्ति ने अटल बिहारी वाजपेयी के लिए, अपना सर्वस्व त्याग भी किया होगा।
पत्र में क्या हैं - पत्र में इस नेता ने वर्तमान भाजपा में शामिल नेताओं पर देश के लिए कम और निजी जिंदगी के लिए राजनीति करने का घिनौना आरोप लगाया है। ये कहकर उसने खुद को पाक साफ और सभी भाजपाइयों पर तोहमत लगा दी। ये दिव्य ज्ञान भी लाल कृष्ण आडवाणी को तब आया, जब गोवा में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेन्द्र मोदी को चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंप दी गयी। उसके पहले इन्हें दिव्य ज्ञान नहीं आया था। ये दिव्य ज्ञान आडवाणी को उस वक्त भी नहीं आया, जब नीतीश कुमार और उसकी पार्टी के  घटिया स्तर के नेताओं ने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ, गुजरात  की जनता के खिलाफ लगातार विष वमन करते रहे। आडवाणी को पता नहीं कि नरेन्द्र मोदी आज समय की मांग हैं। आम जनता नरेन्द्र मोदी की तरफ देख रही हैं, क्योंकि उसे लगता हैं कि ये व्यक्ति ऐसा हैं कि वो देश के लिए कुछ कर सकता हैं। आडवाणी बता सकते हैं कि उन्होंने देश के लिए अब तक क्या किया हैं। सिवाय कुर्सी प्रेम के। अरे आडवाणी को तो सोनिया गांधी से सीखना चाहिए, वो चाहे तो भारत की प्रधानमंत्री बन सकती थी, बन सकती हैं पर उसने कभी भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर ध्यान ही नहीं दिया। और इनको देखिये, प्रधानमंत्री बनने के लिए इतने बेचैन हैं, उस कुर्सी पर सोने के लिए इतने बेचैन हैं, कि जैसे ही उन्हें ये भनक मिली कि नरेन्द्र मोदी उनके आगे दीवार बनकर खड़े हो गये। भाजपा के सारे बड़े पदों से इस्तीफा दे दिया। ये जनाब ब्लाग भी लिखते हैं। ब्लाग में महाभारत का प्रसंग भी ऱखते हैं, पर उन्हें नहीं मालूम कि समय की मांग को देखते हुए, उस महाभारत के कई पात्रों ने कब और किस समय, किन - किन चीजों का त्याग किया।
आडवाणी को ये भी शायद मालूम नहीं हैं कि इसी देश में महात्मा गांधी थे, जो चाहते तो भारत के प्रधानमंत्री बन सकते थे, पर उन्होंने प्रधानमंत्री पद से ज्यादा अपने लिए गोली चुन ली। आज वे मोहनदास से महात्मा गांधी और राष्ट्रपिता बन गये। कहा भी जाता हैं कि जिसे सब कुछ मिल जाता हैं, उसे कुछ भी नहीं मिलता और जिसे कुछ नहीं मिलता, उसे सब कुछ मिल जाता हैं। क्या ये प्रसंग आडवाणी को मालूम नहीं। आडवाणी तो आज उस कसाई की तरह हो गये जो, एक बकरे को बड़े प्यार से पालता हैं और फिर उसी बकरे की अपने हित में हत्या भी कर डालता हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने भाजपा को उंचाईयों पर लाकर खड़ा किया, पर ये भी सही हैं कि जिस प्रकार की कारगुजारी, उन्होंने कल दिखायी। लगता है ंकि वो चाहते हैं कि वे अपने ही हाथों से भाजपा का गला घोंट दे। नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक जीवन की कैरियर ही समाप्त कर दे। पर उन्हें नहीं मालूम कि भारत की जनता ने कुछ फैसला किया हैं। वो फैसला देशहित में, जनहित में हैं। देश को उचांई पर ले जाने का वक्त हैं. ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी कुछ ऐसा न करें, जिससे देश की जनता और देश उन्हें कभी माफ ही न करें। ऐसे वो कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। नीतीश तो आपको धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट भी दे चुके हैं। ये वहीं नीतीश हैं जिनकी धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा समय - समय पर बदलती रहती हैं। फिर भी जब आप अपने कैरियर को खुद ही डूबो देना चाहते हैं तो कोई कर ही क्या सकता हैं। 

Thursday, June 6, 2013

बिहार ने लालू की लालटेन की लौ बढ़ाई, जबकि नीतीश के तीर भोथर किये.................

बिहार में महराजगंज लोकसभा के उपचुनाव के परिणाम आ गये। राजद के प्रभुनाथ सिंह 1 लाख 37 हजार से भी अधिक मतों से जीते। जदयू के पी के शाही दूसरे नंबर पर रहे, जबकि कांग्रेस की जमानत तक जब्त हो गयी। लालू की बल्ले - बल्ले है। चुनाव परिणाम के पहले चक्र की मतगणना के बाद ही वे दहाड़ रहे थे। टीवी पर उनका बयान आ रहा था, कह रहे थे कि प्रभुनाथ लालटेन लेकर दौड़ रहा हैं। नीतीश का हाल क्या होगा - गइल गइल भइसिया पानी में। ब्रह्मर्षि समाज की जय जयकार कर रहे थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इस बार ब्रह्मर्षि समाज के लोगों ने दिल खोलकर उनका साथ दिया हैं और हुआ भी ऐसा ही। बेचारे पी के शाही जिस नीतीश के विकास का तीर लेकर महराजगंज में खूंटा गाड़ने का प्रयास कर रहे थे, उनका खूंटा प्रथम चक्र की मतगणना के बाद ही उखड़ गया। उन्होंने बयान दे डाला कि कार्यकर्ताओं का उत्साह व जोश नहीं था और पार्टी के अंदर चल रही भीतरघात और गठबंधन धर्म के ठीक से निर्वहन नहीं होने के कारण उनकी हार हो गयी। इधर लालू दहाड़ रहे थे, और दिल्ली में नीतीश, छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह से गुफ्तगूं कर रहे थे। टीवी पर ये भी दिखा कि जब नीतीश, रमण सिंह से बातें कर रहे थे, तब छायाकारों का समूह, इनकी छवि को अपने कैमरे में कैद कर रहा था, पर ये क्या जैसे ही नरेन्द्र मोदी उधर से निकले छायाकारों का समूह मोदी की ओर दौड़ पड़ा। 
पांच जून को देश के कई हिस्सों में हुए लोकसभा और विधानसभा के चुनाव परिणामों ने सभी पार्टियों को सबक सिखायी हैं, पर सच्चाई ये हैं कि किसी भी दल ने इस सबक को सीखने की कोशिश नहीं की।
गुजरात में चार विधानसभा सीटों और दो लोकसभा सीटों पर भाजपा को मिली भारी जीत, इस बात का संकेत हैं कि गुजरात की जनता नरेन्द्र मोदी को छोड़ना नहीं चाहती, उसे लगता हैं कि नरेन्द्र मोदी के हाथों में ही गुजरात का भविष्य हैं। जनता का फैसला शिरोधार्य होना भी चाहिए। पर बिहार में क्या हो रहा हैं। लगातार नीतीश के विकास का हव्वा खड़ा करनेवाले नीतीश के चाटूकारों की हवा निकल गयी हैं। बोलती बंद हैं। कल तक नीतीश - नीतीश जपनेवाले और इसी दरम्यान भाजपा की वैशाखी पर सरकार चलाते हुए भाजपा को ही आंख दिखानेवाले, मौसमी शेर गायब दीखे। महराजगंज की हार ने, उनकी सारी हेकड़ी निकाल दी हैं। जदयू के इन छुटभैयें नेताओं को लगता था कि बिहार की जनता नीतीश के आगे नतमस्तक हैं। जो नीतीश बोलेंगे, वो मानेगी। नीतीश का विकास, बिहार में सर चढ़कर बोल रहा हैं। ये हवाई किले बनानेवाले को पता नहीं कि विकास कोई सड़क बनाने और बिजली का खंभा खड़ा करने का ही नाम नहीं, उसके आगे रोजगार उपलब्ध कराने का भी नाम हैं। हद तो तब हो गयी कि आज भी बिहार के सुदुरवर्ती गांवों के लोग महाराष्ट्र और गुजरात में रोजी - रोटी कमाने के लिए जा रहे हैं, पर इन्हें रोकने के लिए बिहार सरकार ने कोई योजनाएँ नहीं बनायी। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के चिरकुट नेता बिहारियों को गाली देते थे और उसी महाराष्ट्र में जाकर नीतीश मनसे की जी हुजूरी करते दीखे। शायद बिहार की जनता इस दोहरे चरित्र को भूल गयी, उन्हें लगता होगा और जिस गुजरात ने आजतक बिहार की जनता के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला, उस गुजरात की जनता का अपमान, इस नीतीश ने बार - बार किया, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विषवमन कर। नीतीश को लगता हैं कि दुनिया की सारी खूबियां इन्हीं में हैं। खुब अहं में डूबे हैं। विज्ञापन के चाबूक से अखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों को हांक रहे हैं, समझते हैं कि सम्राट अशोक हो गये, पर उन्हें नहीं मालूम कि बिहार की जनता तो असल में बिहार की जनता हैं। सबसे अनोखी। यहां जातिवाद सर चढ़कर बोलता हैं। लालू ने जातिवाद की सीढ़ी चढकर महराजगंज की लहलहाती फसल दुबारा काटी हैं। राजपूत -यादव तो उसके परंपरागत वोट हैं, भला वो मतदाता राजद से छिटके कब थे, छिटके तो मुस्लिम थे, फिर ससर गये, और लालू के लालटेन की जीत पक्की। रही बात भूमिहार जाति की, तो ये जाति अभी नीतीश से बिदकी हैं ही, ब्याज समेत इसने अपना किराया वसूल लिया और पी के शाही की तीर को भोथर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
हमें याद हैं कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर ने सामान्य बातचीत के दौरान कहा था कि भला बिहार में विकास के नाम पर वोट मिलता हैं क्या। यहां तो जातिवाद और बयार पर वोट मिलता हैं। जनता को जातीयता का बीयर पिलाते रहिए, अपना उल्लू सीधा करते रहिए और जब जीत जाईये तो अपने अनुसार उसका अर्थ निकालिये। ये हैं हमारा बिहार। उसे कभी तीर तो कभी लालटेन और कभी कमल खिलाने में आनन्द आता हैं पर वो भी जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर। बेचारी कांग्रेस जो कल तक इसी के सहारे राज करती थी, आज सारी जातियां उससे बिदक गयी हैं, देखते हैं, ये बिदकी जातियां कब कांग्रेस की ओर आती हैं  या कांग्रेस इसी तरह पिछलग्गू बनकर, बिहार में अपना काम चलाती रहेगी। फिलहाल बिहार की जनता ने लालू और उसकी पार्टी को च्यवनप्राश खिलाया हैं, ताकत दी हैं। ताकत मिलते ही, लालू अपनी आदत से लाचार हैं ही, फिर से शुरु कर दिया हैं दहाड़ना। देखते हैं कब तक दहाड़ते हैं, रही बात नीतीश की, तो मैं कहूंगा, कि अब भी वक्त हैं, अहं त्यागे और किसी की आलोचना व किसी के खिलाफ विषवमन करने से अच्छा हैं, बिहार की जनता का सम्मान बरकरार रखने में ध्यान लगाये। यहीं उनके लिए और उनकी पार्टी की सेहत के लिए बेहतर होगा।

Thursday, May 16, 2013

पटना की परिवर्तन रैली, नीतीश और लालू दोनों के लिए एक संदेश हैं, जनता की भावना को समझिये.....

15 मई को पटना में लालू की परिवर्तन रैली बहुत कुछ कह रही हैं। ये लालू के लिए भी सबक हैं और नीतीश के लिए भी। नीतीश के लिए ये कि उनके पास खोने के सिवा कुछ नहीं और लालू के लिए ये कि उन्होंने जनता द्वारा मिली सत्ता का जिस प्रकार दुरुपयोग किया, जनता आज तक वो भूली नहीं, यानी कहीं न कहीं वो दर्द जनता के बीच आज भी विद्यमान हैं। ये अच्छी बात हैं कि लालू ने इस परिवर्तन रैली के दौरान कोई ऐसी बात नहीं की, जो जनभावनाओं को ठेस पहुंचाये। ये अलग बात हैं कि वे अपने विरोधियों की तुलना कुत्तों से करने से नहीं चुके। लालू प्रसाद को मालूम होना चाहिए कि अपने विरोधियों को भी सम्मान करना, बिहार की संस्कृति रही हैं। गर आप इस प्रकार की संस्कृति को तिलांजलि दे, जब ये कहते हैं कि आप बिहार के सम्मान को बरकरार रखेंगे तो आम जनता को शक होने लगता हैं।
जब कोई राजनीतिक दल सत्ता से दूर रहे, तो उसे आत्ममंथन करना चाहिए। वो आत्ममंथन तब तक करना चाहिए, जब तक वो समस्याओं को न जान लें, कि किन कारणों से उसे सत्ता से वंचित रहना पड़ा हैं और जब समस्या मालूम हो जाये तो उसका समाधान करना चाहिए। हमें लगता है कि लालू जी ने अभी भी, इस ओर ध्यान नहीं दिया, गर ये ही हाल रहा तो नीतीश भले ही अपनी कुछ सीटे गवां दे, पर बहुमत उन्हें ही मिलेगी। ये लालू जी को मालूम होना चाहिए, जबकि सच्चाई ये हैं कि नीतीश विकास - विकास का हौवा खड़ाकर, इतने अहं में डूब गये हैं कि उन्हें अपने सामने सभी लोग जीरो दिखाई दे रहे हैं। जिसका फायदा लालू को उठाना चाहिए, पर लालू इसका फायदा उठा पायेंगे, इस पर हमें संदेह हैं। वह भी तब जबकि लालू को आज भी बिहार का एक बड़ा वर्ग अपना नेता मानता हैं। ऐसे में लालू जी को चाहिए कि वे स्वयं को पहचाने।
कुछ सवाल आज भी लालू से हैं कि जब आप रेलमंत्री बनते हैं और रेल मंत्रालय को नई दिशा दे देते है, तब आपने 15 सालों में बिहार का कबाड़ा क्यूं बनाया, और इसके लिए आप बिहार की जनता से क्यूं क्षमा नहीं मांगते। क्षमा तो अच्छे - अच्छे पालिटिशयनों ने मांगा हैं, अपनी गलतियों का पश्चाताप करते हुए, जनता से माफी मांगना कोई बुराई नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि हैं। फिर जनता को विश्वास दिलाना कि वे उनकी विकास को लेकर चिंतित हैं, ये भी जनता को दिखाना होगा, पर आप कर क्या रहे हैं, अपने बेटे और बेटियों को लांच कराने में लगे है, यानी पत्नी और ससुराल से शुरु करते हुए अब बेटे और बेटियों तक पहुंच गये। लालू जी, आप ये जान लीजिये, जिसमें नेतृत्व करने की क्षमता होती हैं, वहीं नेता होता हैं, आप लाख अपने बेटे - बेटियों को लांच कर ले, गर उनमें क्षमता होगी तो खुद ब खुद टाप के राजनीतिज्ञ हो जायेंगे। आपने तो एक बेटे को क्रिकेटर बनाने की सोची, क्या वो धौनी बन गया। ये छोटी सी बात आपको क्यों नहीं समझ आती। अरे लालूजी आपको ईश्वर ने बिहार की जनता की सेवा करने को बनाया हैं, आपके परिवार की सेवा के लिए आपको नहीं बनाया। आप परिवार को छोड़िये, जनता के बीच जाइये। सारी जनता को अपना परिवार समझिये। उनके दर्द को समझिये, फिर देखिये। नीतीश क्या, सारे के सारे लोग आपके पीछे रहेंगे, पर ऐसा कर पायेंगे। हमें संदेह हैं.......................................

Saturday, May 11, 2013

नाच न जाने आंगन टेढ़ा....................

हां भाई, नाच न जाने आंगन टेढ़ा......................
रांची से एक प्रकाशित अखबार ने लोगों से राय मांगी कि आखिर राज्य में स्थायी सरकार नहीं बन पा रही , इसके कारण क्या हैं। इस मुद्दे पर बुद्धिजीवियों को कई भागों में बांटा - आदिवासी बुद्धिजीवी, दलित बुद्धिजीवी, सामान्य बुद्धिजीवी और पता नहीं क्या - क्या। अरे बुद्धिजीवी तो बुद्धिजीवी होते हैं। इसमें भी ठेला - ठेली चल रही हैं। सभी ने एक स्वर से कहा कि यहां चूंकि सीटें बहुत ही कम हैं, इसलिए विधानसभा में बहुमत किसी एक दल को नहीं मिल पाती, गर इसकी संख्या 150 - 160 के आस पास हो जाये तो यहां स्थिति सुधर जायेगी, पर इसकी गारंटी क्या हैं, इसकी गारंटी कौन देगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं हैं। सच्चाई ये हैं कि जहां 150 - 160 से भी अधिक सीटे हैं, वहां भी लोकतंत्र में इसकी गारंटी नहीं होता कि वहां किसी एक दल को बहुमत मिल ही जायेगा। बहुमत मिलना या न मिलना, ये कई कारणों पर निर्भर करता हैं। क्या ये बुद्धिजीवी बता सकते हैं कि दिल्ली प्रदेश में तो विधानसभा की कुल सीटे, झारखंड से भी कम हैं, तो वहां किसी एक दल को बहुमत कैसे मिल जाता है। हम आपको बता दें कि दिल्ली में विधानसभा की कुल सीटे 70 है। यहीं नहीं हिमाचल प्रदेश में तो विधानसभा की कुल सीटे, दिल्ली से भी कम यानी 68 हैं तो वहां किसी पार्टी को बहुमत कैसे मिल जाती हैं। इस सवाल का उत्तर यहां के बुद्धिजीवियों के पास नहीं हैं। 
मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि यहां किसी एक दल को बहुमत क्यों नहीं मिल पाता। यहां किसी एक दल को इसलिए बहुमत नहीं मिल पाता, क्योंकि सारी पार्टियां, यहां की जनता का विश्वास खो चुकी हैं। किसी ने अपने कीर्तियों से जनता का विश्वास जीतने की कोशिश नहीं की। नतीजा सामने हैं। हम सबसे पहले बात करें - राष्ट्रीय पार्टियों का। राष्ट्रीय पार्टियों में भाजपा और कांग्रेस प्रमुख हैं। जरा बता सकते है कि इन पार्टियों के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चरित्र क्या हैं। इनके स्थानीय नेताओं ने कौन सा चरित्र दिखाया हैं, जिसके कारण जनता इनको अपना आदर्श माने। सभी ने स्व से अधिक किसी पर ध्यान ही नहीं दिया तो भला जनता, इन्हें वोट क्यूं दे। रही बात क्षेत्रीय पार्टियों की। तो लीजिये सबसे पहले बात झामुमो की। ये वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा हैं जिसके सांसद घूस लेकर नरसिंहा राव सरकार को बचाने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। ये वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा हैं, जिसके सुप्रीमो कभी - कभी झारखंडियों और बाहरियों के बीच ऐसे - ऐसे बयान दे देते हैं, कि यहां की जनता, इन्हें वोट दे या न दे, इसी उधेड़बून में पड़ी रहती हैं। आज भी बिहारियों और झारखंडियों में भेदभाव को बढ़ावा देने में ये पार्टियां सर्वाधिक भूमिका निभाती हैं, जबकि मध्यप्रदेश से अलग हुआ छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश से अलग हुआ उत्तराखंड में इस प्रकार का भेदभाव राजनीतिज्ञ नहीं पैदा करते। वहां स्थानीय मुद्दा का हल निकाल लिया गया, पर यहां अभी भी जारी हैं। आज भी झामुमो जैसी पार्टियों में परिवारवाद सर्वाधिक प्रमुख मुद्दा होता हैं। कहलाते हैं गुरुजी, पर अपने बेटे - बहुओं और पत्नी से उपर ही नहीं उठ पाये। जहां ऐसे लोग रहेंगे, वहां किसी दल को बहुमत मिलता हैं क्या। वहां तो वहीं होता हैं, जो फिलहाल यहां दीख रहा। अपना चरित्र नहीं सुधारते और सीटों को बढ़ाने की बात करते हैं। अरे झारखंड विधानसभा की कुल सीटे कितना भी बढ़ा लो, गर चरित्र ही नहीं हैं, तो फिर सुधार कहां से होगा, ये तो वहीं बात हुई, नाच न जाने अंगना टेढ़ा..........
रही बात भ्रष्टाचार की, तो यहां सारे के सारे पार्टियों ने भ्रष्टाचार का रिकार्ड बनाने में एक दूसरे को पछाड़ने की कोशिश की। किस पार्टी की बात करें, सभी ने अपना नंगापन दिखाया हैं। सीबीआई की रिकार्ड, उसका गवाह हैं।अरे हद तो तब हो गयी, जब थैला भरकर नोट लेकर दूसरे जगहों से धन्ना सेठ आते हैं और यहां के विधायक लाइन लगाकर, अपना वोट बेचते हैं और राज्यसभा में ऐसे - ऐसे लोगों को जीताकर भेज देते हैं कि वो जीतने के बाद, झारखंड में आना तक नहीं पसंद करता और बाद में अपना दल भी बदल लेता हैं, तो भाई जहां ऐसे - ऐसे निर्लज्ज रहते हो, वहां किसी दल को बहुमत कैसे मिलेगा। ये बात आपके समझ में क्यों नहीं आती, महाशय।

Wednesday, May 8, 2013

वाह री कर्नाटक की जनता, तुम्हारा भी जवाब नहीं..............

सबसे सुंदर, सबसे प्यारा
मेरा देश, मेरा देश
भ्रष्टाचारी यहां पनपते
देशद्रोही यहीं पे बढ़ते
अपनी जमीन पर, देश के नेता
दूसरे देश से कब्जा करवाते
जब मीडिया, अरे शोर मचाती
तब चीन के आगे, नाक रगड़ते
सबसे सुंदर, सबसे प्यारा
मेरा देश, मेरा देश
यहां की जनता
मस्त हैं रहती
मुंहमांगी रकम से, वोट बेचती
भ्रष्टाचारियों को खूब जीताती
भ्रष्ट पार्टियों को बहुमत देती
कहती लूटो, मेरे नेता
जमकर शोषित कर लो नेता
कर्नाटक क्या, दिल्ली क्या
सब जगह, तुम  बढ़ते जाओ
अपने देश को रौंद रौद कर
अपने महल बनाते जाओ
लूट लूट कर अपने पैसे
विदेशी बैंकों में भरते जाओ
जब तक जिंदा रहो, लूटो तुम
तुम्हें मदद हम करते रहेंगे
वोटों से और दिल देकर
तुम्हारा स्वागत करते रहेंगे
मेरा एक ही सपना भैया
मेरे दादा, कभी गुलाम थे
मैं स्वतंत्र, क्यू अरे कहाया
मैं परतंत्र होना चाहता हूं
कैसे सपना  पूरा होगा
जब तुम, नीचे से उपर तक
भ्रष्ट न होगे, भ्रष्ट न होगे
इसी हेतु ईश्वरीय प्रार्थना
सब नेता अरे भ्रष्ट हो जाये
नेता क्या
डाक्टर, इंजीनियर
यहीं क्यूं
शिक्षक, छात्र भी 
भ्रष्ट हो जाये, भ्रष्ट हो जाये
ताकि हम भारतवासी
दिल खोल कहे,
संपूर्ण विश्व से
देखो हमने रिकार्ड बनाया
विश्व का नं. एक हैं देश 
भारत देश भारत देश
भ्रष्टाचारियों का हैं देश
भारत देश, भारत देश
बधाई हो कांग्रेस पार्टी को। कर्नाटक में वो सरकार बनाने जा रही हैं। बधाई कर्नाटक की जनता को, कि उसने क्या जनादेश दिया हैं। जातियता में बहकर, सारे के सारे भ्रष्टाचारियों को जीताया हैं। ऐसे भी कर्नाटक की जनता, अन्य प्रदेशों से अलग थोड़े ही हैं। भारतवंशीय हैं, इसलिए भारतवंशियों का खून तो इनमें भी होगा। इसलिए दिल खोलकर, चीन के आगे नाक रगड़नेवाली, सीबीआई को अपने हाथों नचाकर, विदेशों में अपने पैसे समायोजित करानेवाली पार्टी में अपना विश्वास व्यक्त किया। अब मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये देश जरुर परतंत्र होगा। अरे परतंत्र होगा क्या, परतंत्र तो हैं ही। जो देश अपनी सीमा के अंदर 20 दिनों तक दूसरे देश की सेना का स्वागत करने के लिए पलक पावड़े बिछाये, उसे देश की औकात क्या। इस देश में कभी किसी मां के कोख से सुना हैं भगत सिंह पैदा हुआ करते थे। अब तो इस देश में येदियुरप्पा, राहुल, प्रियंका, मनमोहन, पवन  कुमार बंसल, ए राजा, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, अरे कितनो का नाम लिखूं, ये पैदा ले रहे हैं। ये देश को कहां ले जा रहे हैं, ये किसी से छुपा नहीं हैं। बार -बार हमारे मित्र कहते हैं कि ये देश बहुत तरक्की करेगा, मैं बार - बार कहता हूं कि ये देश गर तरक्की करेगा, तो फिर चीन के आगे नाक कौन रगड़ेगा, अमरीका का पांव कौन पखारेगा। कम से कम इन देशों में गुलामों की नौकरी करनेवाला एक वर्ग भी तो चाहिए। ऐसे में ये काम करने के लिेए भारतीयों जैसा दूसरा, पूरे विश्व में फिलहाल कोई देश नहीं दीखता। इसलिए गर्व से बोलो हम भारतीय हैं।
हम भ्रष्टाचारियों को वोट देते हैं।
हम भ्रष्टाचारियों में विश्वास व्यक्त करते हैं।
जो देश हमे आंख दिखाता हैं, उसके आगे हम नाक रगडते हैं।
हम अपना जमीर बेचकर, जयचंद और मानसिंह बनने को लालायित रहते हैं।
हम भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद को मूरख और राहुल तथा प्रियंका में आदर्श ढुंढते हैं।
जय हो भारत की..........................जय हो कर्नाटक की जनता की।
जिसने भ्रष्टाचारियों को वोट देकर, उसमें विश्वास व्यक्त कर भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ाया। 

Sunday, May 5, 2013

क्यों न इस मीडिया कप का नाम गुंडा कप रख दिया जाय..........................

..................और एक बार फिर पत्रकारिता की आड़ में वो सब हुआ। जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। पत्रकारों ने वो कार्य किया, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम है। वो भी अपने संपादक के नेतृत्व में, गुंडागर्दी की। अंपायरों की धुनाई की। अंपायरों को भद्दी - भद्दी गालियां दी। अंपायरों को धमकियां दे दी। वो भी सिर्फ एक मैच जीतने के लिए। कहां जाता हैं कि क्रिकेट संभ्रांतों का खेल हैं, पर जिस प्रकार से इस क्षेत्र में येन केन प्रकारेन केवल जीत का रसास्वादन करनेवाले लोग शामिल हो रहे हैं। मैं कह सकता हूं कि ये अब गुंडों का खेल हो गया हैं। यानी अब आप जब भी क्रिकेट खेलने जाइये तो गुंडे और असामाजिक तत्वों को अपने साथ अवश्य रखे, अच्छा रहेगा कि क्रिकेटर के रुप में हाथ - पांव से मजबूत गूंडों को ही क्रिकेटर बनाइये। इससे फायदा ये रहेगा कि गर आप हार गये तो इन गुंडों से असली काम लेते हुए, आप अपनी टीम को जीत दिलवा सकते हैं।
मैं ये बाते आज खुश होकर नहीं लिख रहा। दरअसल रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन ने स्व. शशिकांत पाठक मेमोरियल क्रिकेट मीडिया कप का आयोजन किया हैं। जिसमें पत्रकारों में क्रिकेट के प्रति उऩकी सोच को रेखांकित करने, खेल भावना को पुष्ट करने का संकल्प निहित हैं, पर जिस प्रकार से इस मीडिया कप में कुछ अखबारों की टीम शामिल हो रही हैं, और सिर्फ जीत का स्वाद चखने के लिए, मैदान में उतर रही हैं, उससे यहीं लगता हैं कि शायद ही ये मैच खेल भावना को पुष्ट कर रहा हैं। 
कुछ दिन पहले प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक ने कशिश और प्रभात खबर के बीच चल रही क्रिकेट मैच के दौरान, मैदान में जाकर अंपायर को धमकाया था और आज रही सही कसर पूरी कर दी, दैनिक भास्कर ने। दैनिक भास्कर के लोगों ने अपने संपादक के नेतृत्व में वो हरकतें की, जिसकी जितनी भर्त्सना की जाय कम हैं। मैच कोई जीते, कोई हारे। कहां जाता हैं कि क्रिकेट नहीं हारना चाहिए, पर यहां क्रिकेट हारा। आइये हम आपको बता देते है कि क्या हुआ। दरअसल हेहल के ओटीसी ग्राउंड में कशिश और दैनिक भास्कर के बीच मैच था। कशिश की टीम पहले खेलते हुए 20 ओवरों में 6 विकेट खोकर 120 रन बनाये। जवाब में दैनिक भास्कर की टीम 20 ओवर में 120 रन बनाकर आल आउट हो गयी। नियम के मुताबिक मुकाबला बराबर रहा। मैच का परिणाम सुनिश्चित करने के लिए, नियम के मुताबिक अंपायरों ने एक - एक ओवर दोनों टीम से खेलने को कहा। दैनिक भास्कर की टीम पहले खेलते हुए एक ओवर में सात रन बनाये, जवाब में कशिश की टीम को उतरना ही था कि दैनिक भास्कर की टीम अंपायरों से उलझ गयी। भद्दी - भद्दी गालियां, अपमानजनक शब्दों का प्रयोग, धक्का - मुक्की ये अंपायरों के साथ करने लगे। इनकी हरकतें ऐसी थी कि वहां मैच देख रहे लोग भी भौचक्के रह गये। वहां बच्चे भी थे, जो इनकी हरकतों को देख रहे थे। ये वे लोग थे, जो नित्य प्रतिदिन देश व समाज को देवदर्शन और चरित्र का पाठ कराते हैं, पर खुद आज वे वो कार्य कर रहे थे, वो भी अंपायरों के साथ, जिसे देख एक सामान्य आदमी शर्मिंदा हो जाये, पर इन्हें शर्म नहीं आ रही थी। जमकर तमाशा किया। वो हर हाल में जीतना चाहते थे, पर अंपायरों का कहना था नियमानुसार ही जीत - हार का फैसला होगा। अंपायरों ने जब देखा कि दैनिक भास्कर, खेलने को तैयार नहीं हैं, तो उसने कशिश को जीत दे दी, पर दैनिक भास्कर के लोगों को गुस्सा इतना था कि वो कुछ भी सुनने और मानने को तैयार नहीं थे। अंपायर के इस फैसले से वे और आग बबुला हो गये। फिर अंत में फैसला ये हुआ कि मामला रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन के पास जायेगा और रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन फैसला करेगी कि कौन जीता और कौन हारा।
नियम तो यहीं हैं कि अंपायर का डिसीजन अंतिम होता हैं। नियम तो ये हैं कि गर आप खेलते नहीं हैं तो दूसरी टीम को जीत करार देने का अंपायर को हक हैं, पर आप नियम का पालन नहीं करेंगे और न किसी और को करने देंगे। हमेशा जीत का ही स्वाद चखना चाहेंगे, तो ये तो साफ-साफ गुंडागर्दी हैं। इसलिए हम तो चाहेंगे कि इस मीडिया कप का नाम बदलकर गुंडा कप रख दिया जाये। जो जितना बड़ा गुंडा, जिसकी जितनी बड़ी गुंडागर्दी, उसका कप पर कब्जा। बताइयें कैसी रही..................................

Saturday, May 4, 2013

बेचारा बंसल मामा, रेलमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देगा......

रेलमत्री पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे। कांग्रेस भी कह चुकी हैं कि पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे। भला बंसल इस्तीफा क्यों दे, इस्तीफा तो वो देता हैं, जिसके पास जमीर होती हैं। अब कांग्रेसियों के पास जमीर तो हैं नहीं, तो भला रेलमंत्री अपने पद से इस्तीफा क्यों दे। इस्तीफा तो दिया था, हमारे लाल बहादुर शास्त्री ने, जब उनके कार्यकाल में एक रेल दुर्घटना हो गयी थी। हम आपको बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री इस घटना के लिए जिम्मेवार नहीं थे, फिर भी नैतिकता के आधार पर कि उनके कार्यकाल के दौरान इतनी बड़ी दुर्घटना हुई थी उन्होंने रेलमंत्रालय संभालने से ही इनकार कर दिया था।
आज पवन कुमार बंसल को देखिये। इसके भांजे विजय कुमार सिंगला को सीबीआई ने 90 लाख रुपये घूस लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया। यह रकम विजय को उन्हें बतौर रिश्वत दो दिन पहले ही रेलवे बोर्ड के सदस्य बनाये गये महेश कुमार ने भिजवाई थी। पूरी डील दो करोड़ की थी और फिर भी बेशर्मी से रेलमंत्री पवन कुमार बंसल कहता है कि वो इस्तीफा नहीं देगा। कांग्रेस भी पवन कुमार बंसल के बचाव में निर्लज्जता के साथ खड़ी हो गयी हैं, ऐसे भी निर्लज्ज को लज्जा कहा आती हैं। कांग्रेस अच्छी तरह भारतीय जनता की नब्ज टटोल चुकी हैं, वो जानती हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं बनता, इस देश में भारत की सीमा चीन छोटा क्यूं न कर दें, ये मुद्दा नहीं बनता। जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी, वो उतना बड़ा नेता, इसलिए भ्रष्टाचार में लिप्त रहो, चीन से अपने देश की सीमा छोटी कराते रहो और फिर निर्लज्जता के साथी तीसरे टर्म के लिेए वोट मांगने को तैयार रहो। 
जनता के पास विकल्प तो हैं ही नहीं, वो क्या करेगी, अंततः कांग्रेस के साथ ही खड़ी होगी। गर किसी कारण से बहुमत नहीं भी आया तो निर्लजज्ता की श्रेणी में खड़े होने के लिए लालायित नीतीश एक न एक दिन, उनके साथ खड़े हो ही जायेंगे। बिहार में लालू और रामविलास, यूपी में मुलायम और मायावती  तो पहले से ही सोनिया नाम केवलम् का मंत्र जाप कर रहे हैं, दक्षिण में करुणानिधि और बची खुची वामपंथी पार्टियां, ये क्या करेंगी, अतंतः उन्हीं के शरण में आयेगी। देश भाड़ में जाय, हमने थोड़ी ही ठीका ले रखा हैं, आराम से लूटेंगे, विदेश में पैसे रखेंगे और फिर पूरे परिवार के साथ विदेश में कहीं बस जायेंगे। ये देश कोई रहने का हैं। देश तो इटली हैं, जहां की सोनिया माता हैं, जिनकी कृपा से राहुल और प्रियंका जी हैं। देश तो अमरीका, इंगलैंड और स्विटजरलैंड हैं, उनकी सरकारों के जूतों पर अपना नाक रगड़कर, वहां का नागरिकता प्राप्त कर लेंगे, यानी जब तक जिंदा रहेंगे, मस्ती में रहकर, पूरा जीवन गुजार देंगे।
इसलिए पवन कुमार बंसल, उसी श्रेणी के नेता हैं। सर्वदा सोनिया-राहुल और प्रियंका में अपना सर्वस्व लूटाने, चाटुकारिता करने, चरणवंदना करने, गणेश परिक्रमा करने में बड़ी ही श्रद्धा दिखाते हैं। जिसके एवज में वरदान स्वरुप रेल मंत्रालय उन्हें संभालने को मिला। आपको याद होगा, जब वे पहली बार रेलमंत्री बने थे, तो अपने भाषण में सोनिया जी की बड़ी ही श्रद्धा से नाम लिया था, राजीव गांधी का बड़ा ही नाम लिया था। उन्हें दुसरा कोई नाम याद ही नहीं था, क्योंकि जब सोनिया और राहुल जैसे भगवन् की उनके उपर कृपा हैं, तो जरुरत क्या हैं, अन्य का नाम लेने की। धन्य हैं, आज के नेता, आज के रेलमंत्री पवन कुमार बंसल जो रेल मंत्री के पद पर रहते हुए, अपने भांजे से सुंदर - सुंदर कार्य कराते हुए, भ्रष्टाचार का नया रिकार्ड बनाते हैं, ऐसे ही नेताओं से तो भारत की सुंदर तस्वीर बनती हैं। हम चाहेंगे कि देश में एक निर्लज्जता का भी एवार्ड देने की परंपरा की शुरुआत हो, ताकि ऐसे निर्लज्जों को पुरस्कृत किया जा सके, क्योंकि इन्होंने निर्लज्जता का रिकार्ड बना रखा हैं।

Thursday, May 2, 2013

सरबजीत की बहन दलबीर की ललकार के बावजूद भारतीय जगेंगे, मनमोहन और सोनिया की जमीर जगेगी, इसकी संभावना हमें दूर - दूर तक नहीं दीखती........

भारतीय बेटी और बहन - दलबीर कौर ने आज मीडिया के समक्ष जो बाते कही, वो दिल को दहलानेवाला हैं। अपने भाई सरबजीत की पाकिस्तान में की गयी हत्या के बाद जो दलबीर ने कहा, वो प्रमुख वाक्यांश इस प्रकार हैं...................
पाक में चुनाव के चलते सरबजीत की हत्या।
भारतीय होने की वजह से सरबजीत का कत्ल।
लाहौर के जिन्ना अस्पताल की घटना - सरबजीत का हाल पूछने पर डाक्टर हंसते थे।
सरबजीत की बहन ने कहा - अंसार बर्नी, पाकिस्तान का बड़ा मानवाधिकार कार्यकर्ता, जिसने कहा 25 करोड़ दो, सरबजीत लो।
चुनाव के लिए जरदारी ने मरवाया।
पाक को पता था सरबजीत जिंदा नहीं हैं।
सरबजीत देश के लिए शहीद हुआ।
पाक मे हमारे साथ सही बर्ताव नहीं।
सही कोशिश होती तो सरबजीत जिंदा रहता।
पाक ने भारत की पीठ पर छुरा घोपा।
अब पाक को बर्दाश्त करने का वक्त नहीं।
बेईमान हैं पाक, कायर हैं पाक।
पाक को सारी दुनिया को जवाब देना होगा।
और अब दुनिया का सबसे घटिया मीडिया बीबीसी ने क्या लिखा, उसे भी जानिये - बीबीसी ने जो समाचार बनायी है। उसमें उसने सरबजीत को भारतीय जासूस बताया हैं। पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर बीबीसी ने बता दिया कि वो भी भारत और भारतीयों के प्रति क्या रुख रखता हैं, यानी उसने भी भारत के साथ पत्रकारिता के नाम पर गद्दारी की सारी सीमा रेखा लांघ दी। ऐसे भी बीबीसी कभी भी भारत और भारत के प्रति संवेदना नहीं दिखायी, इसलिए इस गद्दार बीबीसी से भारत प्रेम की संभावना तलाशना मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। पता नहीं, कैसे भारतीयों का एक वर्ग - बीबीसी से प्रेम रखता हैं और उससे आजीविका चलाता हैं। मुझे तो बीबीसी न कल अच्छा लगता था और ऩ आज ही अच्छा लगा, क्योंकि इस बीबीसी ने भारत के प्रति आज भी आग उगल कर करोड़ों भारतीयों के छाती पर गहरे जख्म दिये हैं। 
पाकिस्तान और चीन से भारतीयों के प्रति प्रेम की संभानाएं तलाशना भी कायरता हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ( सोनिया गांधी के इशारे पर ठुमके लगानेवाले प्रधानमंत्री ), या अन्य मंत्रालय संभाल रहे मंत्रियों का समूह जो सोनिया के इशारे पर ठुमके लगाते हैं, उन्हें सरबजीत की हत्या से क्या लेना - देना, एक बार फिर घड़ियाली आंसू बहायेंगे। दलबीर को झूठे दिलासे दिलायेंगे और आगे  बढ़ जायेंगे। सरबजीत की हत्या के बाद भी शायद भारतीयों के आंख खुले। क्योंकि मैं जानता हूं कि ये भारतीय कुछ दिनों तक पाकिस्तान को भला - बुरा कहेंगे और फिर पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने, पाकिस्तान के साथ संगीत का कार्यक्रम शेयर करने और पाकिस्तानियों को भारत में बुलाकर उसका स्वागत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इसके बदले पाकिस्तान उसके बदले में हर जगह, हर मोर्चे पर हमें नीचा दिखायेगा, वो हमारे जवान का सरकलम करके, हमारी गैरत को ललकारेगा और हम अपनी सेनाओं को सरहद तक ले जाकर, फिर अपने अपने बैरकों में वापस ले आयेंगे। 
हद तो तब हो गयी कि चीन हमारी सीमा में 20 किलोमीटर अंदर घूस आया हैं और हमारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ( सोनिया गांधी के इशारे पर ठुमके लगानेवाला प्रधानमंत्री ) कहता हैं कि इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए। हां प्रधानमंत्री जी, जरुरत क्या हैं तूल देने का। आपका जमीन तो गया नहीं हैं, आप तो आराम से सोनिया के इशारे पर ठुमके लगाते हुए प्रधानमंत्री कहलायेंगे और फिर दूसरे देश जाकर आराम फरमायेंगे। आपको क्या पता कि देश की मिट्टी क्या होती हैं। देश के लिेए मरना क्या होता हैं। देश को अपना मानना क्या होता हैं। आप मस्ती मारिये, और भारत के सम्मान को चीन और पाकिस्तान के पैरों तले रौंदवाते जाइये। ऐसे भी भारत की जनता को क्या चाहिए, आप और आपकी पार्टी को अच्छी तरह से मालूम हैं। पर ये जान लीजिये कि जिस दिन भारत की जनता देशभक्ति के पागलपन से लवरेज हुई तो फिर आप लोग कहां होंगे, शायद आपको पता नहीं। फिलहाल सभी अपने - अपने में मस्त हैं। आप भी मस्त रहिए। इतनी गद्दारी के बावजूद, चीन द्वारा 20 किलोमीटर जमीन ताजा - ताजा हड़पने के बावजूद आपके लिए एक अच्छी खबर कि आप कर्नाटक में वापस आ रहे हैं, और ये सारी घटनाएं सिर्फ भारत में ही दीखती हैं, क्योंकि देश की जमीन गवां देने वाली सरकार की वापसी सिर्फ भारत में ही होती हैं, दूसरे देशों में नहीं...........।

Sunday, April 28, 2013

फील्ड में जाकर क्रिकेट अंपायर को अपने पक्ष में फैसले देने के लिए धमकी देना गुंडागर्दी कहलाता है - विजय पाठक जी......

रांची जिला  क्रिकेट एसोसिएशन के तत्वावधान में शशिकांत पाठक मेमोरियल मीडिया कप क्रिकेट चल रहा हैं, जिसमें मीडिया में शामिल विभिन्न चैनल व अखबार के लोग एक दूसरे से भीड़ रहे हैं और क्रिकेट की शालीनता व एकसूत्र में बंधने की परंपरा को आत्मसात कर रहे हैं, पर इसी क्रिकेट में, मीडिया में ही कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्हें किसी भी सूरत में हार पसंद नहीं हैं, वे इसके लिए अंपायर को भला - बुरा कहने से नहीं चुकते। उनका मानना हैं कि वे सिर्फ और सिर्फ जीतने के लिए ही बने हैं, भला कोई उन्हें हरा दे, ये उन्हें मंजूर नहीं। आखिर जब ऐसी सोच किसी के मन में बन जाये, तो समझ लीजिये वो कितना नीचे तक गिर सकता हैं। हम आपको बता दें कि मुझे कभी भी खेल में दिलचस्पी नहीं रही, कभी - कभार क्रिकेट जब टीवी पर देखता हूं तो थोड़ा समय काट लेता हूं पर क्रिकेट या अन्य खेल मेरा जायका बदल दें, ऐसा नहीं हैं। हम बात कर रहे हैं रांची में चल रहे रांची जिला  क्रिकेट एसोसिएशन के तत्वावधान में शशिकांत पाठक मेमोरियल मीडिया कप क्रिकेट की। आज का मैच प्रभात खबर और कशिश चैनल के बीच था। मैच रांची के सेटेलाइट कालोनी स्थित मैदान में चल रहा था। पहले खेलते हुए कशिश की टीम 79 रन बनाकर ऑल आउट हो गयी थी। इसके बाद प्रभात खबर की टीम बैटिंग के लिए उतरी। ये क्या 38 रन में ही प्रभात खबर टीम के चार विकेट उखड़ गये। फिर क्या था, प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक, सीधे फील्ड पहुंचे और उलझ गये - अंपायर से। लगे भला बुरा उसे कहने। बेचारे को ऐसा धमकियाया, कि अंपायर के लगे हाथ -पांव फूलने, और अँपायर के धमकाने का असर ऐसा हुआ कि प्रभात खबर जो हार के कगार पर थी, पांच विकेट से जीत गयी।
मैं पूछता हूं कि क्या प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक को फील्ड में जाकर अंपायर को धमकी देना उचित था। जो संपादक मैच के अंपायर को धमकी देकर अपने पक्ष में मैच करवा लें, उसे क्या कहेंगे - क्रिकेटर या गुंडा। क्या ऐसे लोग संपादक बनने के लायक हैं। जब ऐसे लोग के मन पहले से ही ये बात घर कर गयी हो, कि उन्हें हर हाल में मैच जीतना हैं, तो फिर इस प्रकार के आयोजन का क्या मतलब। सीधे वाकओवर खुद से लेकर, कप पर कब्जा क्यूं नहीं जमा लेते। जरुरत क्या हैं - जोर आजमाइश की। बाजार में तो बहुत सारे कप और ट्राफी बिकते हैं, खरीद लीजिये, जो मन चाहे, खुदवा लीजिये और लोगों को दिखाइये कि हम बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। आज जैसी हरकत, विजय पाठक ने सेटेलाइट मैदान में की हैं, उससे हर क्रिकेटर का सर शर्म से झूक जाता हैं। मैं स्व. शशिकांत पाठक जी को अच्छी तरह जानता हूं कि वो क्या थे। मैं तो कहूंगा कि जो मैच उनके नाम पर हो रहा हैं, उनके नाम को इस मीडिया कप से हटा लेना चाहिए, क्योंकि उनकी आत्मा भी विजय पाठक की इस हरकत से, शर्मसार हो गयी होगी, क्योंकि क्रिकेट हर हाल में खेल -भावना के तहत प्यार और भाईचारगी सीखाता हैं - न कि गुंडागर्दी।
एक बात और, कुछ लोगों को लगता हैं कि वो जो कुछ कर लेंगे, उसमें जनता की भागीदारी रहेगी, जनता उनके साथ रहेगी, तो ये उनकी बड़ी भूल है, अब जनता बहुत अच्छी तरह से इन रंगे सियारों को देख रही हैं। समय आने दीजिये, अपना निर्णय सुनायेगी। शीर्ष से अर्श पर पहुंचते देर नहीं लगेगी। इसलिए अभी भी वक्त हैं, गुंडागर्दी की जगह, ईमानदारी से कदम बढ़ाइये। मैं बार - बार कह रहा हूं कि लिखने से अच्छा हैं कि कर के दिखाइये, पर यहां तो रोज देवदर्शन अखबार में कराये जाते हैं, पर सच्चाई में इन संपादकों की हरकतें कुछ और ही होती हैं, जैसा कि आज सेटेलाइट मैदान में मैंने एक संपादक की हरकतों को देखा, जो एक अंपायर को धमकिया रहा था।

Friday, April 26, 2013

धिक्कार हैं, ऐसे पत्रकारों व छात्र संगठनों से जूड़े मच्छड़ नेताओं को जिन्होंने पत्रकारिता को कर्मनाशा बना दिया...........

रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग का बवाल फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा। पत्रकारिता विभाग के पूर्व निदेशक सुशील अंकन को अभी भी लगता हैं कि तथाकथित छात्र संगठनों व विभिन्न समाचार पत्रों एवं चैनलों के मच्छड़ और चिरकुट नेताओं व पत्रकारों  द्वारा पत्रकारिता विभाग में निरंतर बवाल कराते रहने से वे पुनः निदेशक पद पर स्थापित हो जायेंगे। आश्चर्य इस बात की भी हैं कि पूर्व में, जिस व्यक्ति को मैं इतना सम्मान देता था, जो सम्मान के लायक ही नहीं हैं, हमसे इतनी बड़ी भूल कैसे हो गयी। आम तौर पर देखा यहीं जाता हैं कि शैक्षिक संगठनों में जब किसी को पद से हटाया जाता हैं वो व्यक्ति वहां से बोरिया बिस्तर समेट कर अपने नये संस्थान में मनोयोग से कार्य करनें में जूट जाता हैं, पर यहां ऐसा देखने को नहीं मिल रहा। फिलहाल पूर्व निदेशक एड़ी चोटी एक किये हुए हैं, पत्रकारिता विभाग में निदेशक पद पर रहते हुए जिन छात्रों ने उनसे थोड़ी बहुत शिक्षा - दीक्षा ली, उससे वे गुरुदक्षिणा के रुप में निरंतर आंदोलन करने, विभाग में तालाबंदी कराने का संकल्प करा चुके हैं, इसलिए फिलहाल पत्रकारिता विभाग में तालाबंदी हैं, ये ताला कब टूटेगा, पढ़ाई कब जारी होगी, इसका सही उत्तर - पूर्व निदेशक सुशील अंकन ही बेहतर ढंग से दे सकते हैं।
बहुत सारे ऐसे सज्जन हैं - जो इन्हें बेहतर इंसान बताते हैं, मैं भी उन्हें बेहतर इँसान मानता हूं, पर कोई इंसान पद पाकर कैसे पागल हो जाता हैं, उसका सुंदर उदाहरण मैं अपनी आंखों से देख रहा हूं। पहली बार, जब पत्रकारिता विभाग में, वीसी ने इनके खिलाफ कौसिंल की मीटिंग बुलवायी तो इन्होंने मीटिंग में शामिल होना उचित नहीं समझा, जब मैंने उनसे बातचीत करनी चाही तो कहा कि वे बात करने की स्थिति में नहीं हैं, जबकि वहां गुंडागर्दी कर रहे अवांछनीय तत्व, जो कौंसिल मीटिंग के दिन इनके दिशा निर्देश पर तालाबंदी कर रहे थे, उत्पात मचा रहे थे, उनसे बातचीत करने में, इन्हें कोई दिक्कत नहीं आ रही थी। हमारे पास विजुयल हैं, उस दिन की इनकी हरकतें कैमरे में मेरे पास कैद हैं।
अब जरा देखिये, इनकी सुंदर कृति, मैं इनकी सुंदर कृति पर प्रकाश डाल रहा हूं................
क. इन्हीं की देख रेख में एक शिक्षिका जो एक ही समय में झारखंड से अन्यत्र शिक्षा भी ग्रहण कर रही थी और यहां शिक्षिका के पद पर भी आरुढ़ थी, भला एक ही व्यक्ति एक ही समय में, दो जगहों पर कैसे मिल सकता हैं, पर ये कार्य कर, इन्होंने विश्व रिकार्ड तोड़ दिया, फिलहाल किसी ने आरटीआई के तहत सवाल किये, तो वो शिक्षिका, स्वयं को इस संस्थान से अलग कर ली।
ख. आज भी बहुत सारे ऐसे पत्रकार हैं, इस संस्थान में पढ़ाई कर रहे हैं, जो एक ही समय में दो - दो जगहों पर मिलते हैं, यानी यहां नियमित छात्र भी हैं और विभिन्न अखबारों में उसी समय आपको कार्य करते मिल जायेंगे। ऐसा कमाल, सिर्फ और सिर्फ यहीं कर सकते हैं, मैं इनकी इस चतुराई के लिए भी नमन करता हूं।
ग. एक और कमाल, एक अखबार का संपादक, जो यहां का छात्र हैं, वो ज्यादातर पढाई से गायब रहता हैं, वो रांची में रहता ही नहीं हैं। नियम हैं कि एटेंडेंस 75 प्रतिशत होना अनिवार्य हैं, पर वो आता ही नहीं, फिर भी बिना एटेंडेंस पूरा किये, उसे परीक्षा देने की अनुमति दे दी जाती हैं, वो पढाई भी जारी रखे हुए हैं। इस कार्य के लिए भी मैं, ऐसे निदेशक को नमन करता हूं।
घ. यहां बहुत सारे ऐसे चैनल व अखबारों के छात्र भी पढ़ाई कर रहे हैं, जो इनके निर्देश पर कभी छात्र तो कभी पत्रकार बनकर, इनकी दिशा-निर्देश पर आंदोलन भी करते हैँ और कैमरा चमकाते हैं, यानी एक ही समय में छात्र भी और पत्रकार भी, धन्य हैं, ऐसे निदेशक जो इस प्रकार का दुकान चलाते हैं, इस कार्य के लिए भी, मैं इन्हें नमन करता हूं।
ऐसे तो भ्रष्टाचार के कई किस्से हैं, इनके। पर छात्र संगठनों से जूड़े मच्छड़ व चिरकुट नेताओं व पत्रकारों को पूर्व निदेशक में केवल गुण ही गुण दिखाई पड़ते है, इसलिए आंदोलनरत हैं। खूलेआम धमकी देते हैं कि गर निदेशक के पद पर सुशील अंकन की पुनःवापसी नहीं हुई, तालाबंदी जारी रखेंगे, आंदोलन करेंगे............
कमाल हैं
क. देश के जम्मूकश्मीर प्रांत के लद्दाख में चीनी सैनिक दस किलोमीटर अंदर तक घूस आकर, हमारे पुरुषार्थ को ललकारा हैं, पर इन मच्छड़ व चिरकुट नेताओं व पत्रकारों का खुन नहीं खौलता, वे इस बात को लेकर आंदोलन नहीं करते..........................
ख. रांची में वहशियों और जानवरों ने हमारी गुड़ियां बिटियां को जीना दूभर कर दिया, दुष्कर्म के आधा दर्जन से भी ज्यादा समाचार एक दिन में प्रकाशित और प्रसारित हो रहे हैं, पर  इन मच्छड़ व चिरकुट नेताओं व पत्रकारों का खुन नहीं खौलता, वे इस बात को लेकर आंदोलन नहीं करते..............
पर एक भ्रष्ट निदेशक को जिसे कौंसिल ने मीटिंग कर, आरोप सिद्ध करते हुए, उसके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई करने की मांग कर दी, तो ये आंदोलन पर उतारु हैं। धिक्कार हैं, ऐसे पत्रकारों व छात्र संगठनों से जूड़े मच्छड़ नेताओं को जिन्होंने पत्रकारिता को कर्मनाशा बना दिया....................
कमाल इस बात की भी हैं, सारे के सारे छात्र संगठन, इस पूरे प्रकरण पर दोहरे मापदंड अपना रहे हैं, क्या इससे पता नहीं चलता कि वर्तमान में, इस देश में ऐसे नक्कारा युवाओं की फौज आ गयी है, जिसे देश के सम्मान से ज्यादा, एक भ्रष्टाचारी को बचाने में ज्यादा आनन्द आता हैं, और जहां ऐसे लोग होंगे, उस देश व राज्य का भगवान ही मालिक हैं। ऐसे में चीन ने अभी तो दस किलोमीटर अंदर आकर अपनी चौकी बनायी हैं, घबराइये नहीं कल वो बिहार - झारखंड तक आ जायेगा, और आप पत्रकारिता विभाग में ताला लगाते रहियेगा। अरे शर्म करो, यार...................

Friday, April 19, 2013

ऐसी पत्रकारिता और ऐसी संस्थाओं को हम दूर से ही प्रणाम करते हैं, जो एक इज्जतदार व्यक्ति की इज्जत लूटने में अपनी शान समझता हैं..........................

रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में बावेला मचा है। दो गुट आमने - सामने है। एक गुट का नेतृत्व पत्रकारिता विभाग के निदेशक सुशील अंकन तो दूसरे गुट का नेतृत्व अतिथि शिक्षक इंदुकांत दीक्षित कर रहे है। एक चाहता हैं कि पत्रकारिता विभाग में वहीं हो, जो वो चाहे। दूसरा गुट चाहता हैं कि पत्रकारिता विभाग में वो हो, जो पत्रकारिता का कायदा - कानून चाहे, जिसमें छात्रों का हित छुपा हो। इस पूरे प्रकरण को रांची से प्रकाशित अखबारों ने भी हवा दी है। रांची से प्रकाशित हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया हैं, पर इनके द्वारा प्रकाशित समाचारों से एक पक्ष में कार्य करने की बू आ रही है। इन अखबारों में प्रकाशित खबरों को कोई भी पढ़े तो उसे लगेगा कि इन अखबारों ने समाचार न प्रकाशित कर एक व्यक्ति विशेष के पक्ष में कार्य करने का ही कार्य किया हैं, जो पत्रकारिता की मर्यादा के प्रतिकूल है। इन अखबारों ने तो इस प्रकरण में एक पत्रकार का मान हानि ही कर दिया है। मैं इसके लिेए इंदुकांत दीक्षित को धन्यवाद दूंगा, कि इस विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया।
रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में फिलहाल राजनीति हावी हैं, पत्रकारिता विभाग का सम्मान दांव पर लगा है, पर इसकी किसी को चिंता नहीं। ऐसा नहीं कि इसमें केवल प्रतिष्ठा इंदुकांत दीक्षित की ही जा रही हैं, देखा जाय तो इसमें सुशील अंकन की प्रतिष्ठा भी जा रही हैं, पर हमें लगता हैं कि उन्हें ये मालूम नहीं कि ऐसे माहौल में क्या करना चाहिए। जब इधर बेसिरपैर की बातें, अखबारों में छपने लगी तो मैंने भी इस प्रकरण को नजदीक से देखने की कोशिश की। पत्रकारिता विभाग के छात्रों, वरिष्ठ पत्रकार व अतिथि शिक्षक इंदुकांत दीक्षित और सुशील अंकन से मुलाकात की और इन महानुभावों से मुलाकात करने के बाद, मैने महसुस किया कि ये लड़ाई बेसिरपैर की है, दोनों पक्ष इसे सम्मान से जोड़ कर देख रहे हैं। साथ ही रही - सही कसर रांची से प्रकाशित अखबारों ने निकाल दी। इन्होंने पत्रकारिता के मर्यादाओं को ताड़-ताड़ करते हुए एक व्यक्ति विशेष के पक्ष में इस कदर समाचार प्रकाशित किया, कि इन्हें अखबार कहते हुए भी हमें लज्जा आती है, क्या समाचार एक व्यक्ति विशेष के पक्ष में छापे जाते हैं, क्या जिसके सम्मान से आप खेलने जा रहे हो, आपने उससे पूछा कि उसकी राय क्या है। गर नहीं तो आपको क्या हक हैं, इस संबंध में कुछ भी छापने की।
और अब हम आपको बताते है कि ये राजनीति कहां से शुरु हुई। राजनीति शुरु होती हैं, उस वक्त से, जब छात्रों के एक दल ने पत्रकारिता विभाग में व्याप्त गड़बड़ियों को उचित मंच पर उठाना शुरु किया। जब इनकी बात नहीं सुनी गयी तो छात्रों के एक दल ने कुलपति, रांची विश्वविद्यालय को अपनी 10 सूत्री समस्याओं को लेकर एक पत्र लिखी। वो समस्याएं इस प्रकार हैं--------------
1. सेमेस्टर - 1 में अधिकतर विषयों में व्यवहारिक ज्ञान की जगह नोट्स का वितरण किया गया।
2. प्रोफेशनल विषयों पर पूरे सेमेस्टर -1 में देश के विभिन्न भागों से किसी भी प्रोफेशन्लस पर्सन्स को बुलाकर कक्षाएं नहीं करायी गयी।
3. व्यवहारिक ज्ञान, समसामयिक मुद्दे और करंट विषयों पर चर्चा नहीं के बराबर होती हैं सिर्फ ओर सिर्फ नोट्स दिये जाते हैं।
4. सेमेस्टर - 1 में हमारे चार पेपर्स थे, जिसमें से पेपर - 2 मि. मल्लिक सर के द्वारा लिया गया। इस विषय की पूर्ण कक्षाएं तो हुई परंतु सिलेबस पूरा होने पर मल्लिक सर से चर्चाएं करने का एक भी मौका नहीं मिला।
पेपर - 2 में कुछ हिस्से मि. संतोष सर के द्वारा लिए गये मगर सर सिर्फ नोट्स से पढ़ाते है, उनमे किसी प्रकार का प्रश्न पूछने पर जवाब नहीं मिलता है। पेपर -3  मिस अनुपमा मेम के द्वारा लिया गया जिसमें हमें काफी सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा। पहली तो यह कि इस विषय की विषय-वस्तु सही प्रकार के हमें समझायी नहीं गयी। दूसरी मेम की खुद की पीएचडी की कक्षाएं होने के कारण हमारा सिलेबस पूरा नहीं हो पाया। जिसका नुकसान हमें अपनी परीक्षा में उठाना पड़ा। पेपर - 4 मि. सुधीर सर के द्वारा लिया गया जो कि हमें समझ में आया। पेपर - 1 में मि. इंदुकांत दीक्षित सर के द्वारा ली गयी और इस विषय से हम संपूर्ण संतुष्ट हैं, क्योंकि इस विषय में सर के द्वारा हमारी अच्छी पकड़ बनवायी गयी तथा सर के द्वारा और भी कई व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त हुए। पत्रकारिता का सही ज्ञान और उद्देश्य हमें उनसे ही प्राप्त हुआ, मगर दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से इस बार उन्हें कम कक्षाएं दी गयी हैं।
5. विभाग में आंखन देखी वीडियो मैग्जिन के अलावा पत्रकारिता और जनसंचार के किसी और आयाम जैसे - साक्षात्कार करना, समाचार बनाना, किसी भी घटना की कवरेज करना, समाचार लिखने की कला, अखबारों एवं टीवी न्यूज के प्रोडक्शन के बारे में व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त होने की कोई भी व्यवस्था नहीं होने के कारण हम सभी विद्यार्थियों में भारी निराशा हैं। आंखन देखी का अधिकतर प्रोडक्शन्स निदेशक महोदयजी के घर में ही होता रहा हैं जिससे अधिकतर विद्यार्थियों को लाभ नहीं हो पा रहा हैं।
6. हमारा अनुरोध हैं कि अध्यापकों पर हमें गुप्तढंग से फीडबैक बताने का अवसर दिया जाये।
7. विषय के उचित ज्ञाता अध्यापक ही कक्षा में बुलाया जाये।
8. अध्यापकों को इंटरेक्टिव कक्षा लेने के निर्देश दिये जाये।
9. हम छात्रों को किस अध्यापक से पढ़ने की रुचि हैं, वह जाना जाये।
10. आवश्यक होने पर हमारे अध्यापकों की कक्षा में आप स्वयं भी निरीक्षण करने आये तो हमारी समस्या का अवश्य निदान हो पायेगा।
छात्रों के इन समस्याओं को देखने के बाद अतिथि शिक्षक इंदुकांत दीक्षित ने पत्रकारिता विभाग के स्थायी सलाहकार वरिष्ठ पत्रकार बलबीर दत्त जी को एक पत्र लिखा। इंदुकांत दीक्षित को पत्र को देख बलबीर दत्त जी ने निदेशक पत्रकारिता विभाग को दो बार पत्र भेजी, जिसमें एक बैठक आयोजित कर, इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करने की बात कहीं गयी, पर निदेशक पत्रकारिता विभाग को बलबीर दत्त की ये बातें अच्छी नहीं लगी। मैंने जब इस संबंध में पत्रकारिता विभाग के निदेशक सुशील अंकन से बात की तब उनका कहना था कि बलबीर दत्त जी सिर्फ परामर्श दे सकते हैं, आदेश नहीं। वे उनकी बातों को मानने को बाध्य नहीं हैं। इधर बातें बढ़ती गयी, बाते इतनी बढ़ गयी कि आनन - फानन में, रांची विश्वविद्यालय के कुलपति ने 15 अप्रैल को पत्रकारिता विभाग की बेहतर संचालन के लिए 12 लोगों की एक कमेटी बना डाली और इसकी पहली मीटिंग 20 अप्रैल 2013 को आयोजित कर दी। जिसे सुशील अंकन और उनके चाहनेवाले मीडिया में कार्य कर रहे अन्य पत्रकारों को अच्छी नहीं लगी। अब सभी ने मौका ढूंढना शुरु किया। मौका भी जल्द मिल गया। जब पत्रकारिता विभाग में दो दिन पहले एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ और इस कार्यक्रम का जबर्दस्त फायदा उठाया - इंदुकांत दीक्षित के विरोधियों ने। ऐसा फायदा उठाया कि पूछिये मत। आनन - फानन में निदेशक ने कई निर्णय ले लिये। तत्काल प्रभाव से इंदुकांत दीक्षित को कक्षा लेने से वंचित कर दिया। जिस छात्र ने पत्रकारिता विभाग हो रहे गलत कार्य को लेकर कड़ा रुख अपनाया, उसे भी दंडित करने का कार्य शुरु कर दिया गया और इन सारी बातों को हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर से जूड़े पत्रकारों ने अपना हित साधने के लिए अनाप - शनाप खबर छापनी शुरु कर दी और एक व्यक्ति की इज्जत लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब 20 अप्रैल को क्या निर्णय कुलपति लेते हैं, सभी का ध्यान उसी ओर हैं। कुलपति के पास सवाल भी बहुत हैं...........
क. क्या सत्य की विजय होगी।
ख. क्या कुलपति दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में छपी बातों पर विश्वास करेंगे या इसकी सत्यता का जांच करायेंगे।
ग. क्या उन छात्रों को न्याय मिलेगा, जिसकी वे आंदोलन कर रहे हैं।
घ. क्या अयोग्य शिक्षक जो फिलहाल पत्रकारिता विभाग में कार्य कर रहे हैं, वे पढ़ाते रहेंगे या योग्य शिक्षक भी पत्रकारिता विभाग में दीखेंगे। 
ये कुछ सवाल अभी से मन-मस्तिष्क में मंडरा रहे हैं। अब इन प्रश्नों का हल कल निकल पाता हैं या नहीं। सभी का ध्यान अभी कुलपति की ओर हैं। अब जबकि दोनों पक्ष आमने -सामने हैं। हम अब भी चाहेंगे कि छात्रों के हित में सुखद निर्णय सुनने को मिले, जिससे छात्रों का भविष्य प्रभावित न हो और पत्रकारिता विभाग की मर्यादा भी बची रहे।

Thursday, April 18, 2013

क्या हुआ था - 11 अप्रैल को, प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक जी को गुस्सा क्यूं आता हैं......................

15 अप्रैल को मैं पटना में था...........। मेरे अग्रज तुल्य एक वरिष्ठ पत्रकार का सुबह-सुबह फोन आया, कि मेरे बारे में रांची से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक श्री विजय पाठक जी ने अपने फेसबुक पर डायरेक्ट तो नहीं पर इंडायरेक्ट में बहुत कुछ लिखा हैं। उन्होंने हमें ( कृष्ण बिहारी मिश्र को) गुंडा करार दिया हैं, क्या लिखा हैं फेसबुक पर जरा देखिये.........................
प्रभात खबर के संपादक श्री विजय पाठक के अनुसार, जो उन्होंने फेसबुक पर लिखा............ 
एक पत्रकार से सामान्य शिष्टाचार की तो उम्मीद तो करनी ही चाहिए. पर मेरी आंखों के सामने 11 अप्रैल को एक चैनल के रिपोर्टर ने जो हरकत की, उससे मेरे कुछ मित्रों की इस धारणा की पुष्टि होती इस पेशे में गुंडों (माफ़ करियेगा) की संख्या कम नहीं? 
bhaiya ye post hai...
Chandan Kumar ye v to bataiye ki kya hua tha...?
11 April at 21:40 · Like
Vijay Pathak Jaroor Bataunga Chandan.
11 April at 21:41 · Like · 1
Chandan Kumar waiting....?
11 April at 21:41 · Like
Rita Das nice pic bhaia...ranchi mein garmi adhik hai kya??
11 April at 21:43 · Like
Vijay Deo Jha such things are bound to happen if we don't take timely action against a system cropping in where a journalist considers himself as authority
11 April at 21:48 · Like · 1
Nitesh Kumar Gupta 200% sahi bhaiya, or aise he kuch reporter aapke press me v hai, sorry
11 April at 21:54 · Like
Manohar Lal isliye katju ji keh rahe hain ki media is full of mediocre journalists...
11 April at 21:55 · Like · 1
Vijay Kumar Singh समाज का जो स्वरुप तैयार हो रहा है.। उसमें आज शालनता से ज्यादा उग्रता
दिखाई दे रही है.। 20 वर्षो के पत्रकारिता के जीवन काल में कम से कम मै तो यह महसुस करता हुं.। आज नये पीढ के जो लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे है.। उनको लगता है कि मैने एक तोप के समान कलम रुपी हथियार पकड ली है.। अब सबको उडाते जाना है.। सृजन की जगह लोग विध्वंश की भुमिका में रहना पसंद कर रहे है.। समय के थपेडे जब अच्छी तरह पड जायेगी, तब सब सीख जायेगें।
11 April at 22:07 · Like · 3
Manoj Pathak ऐसे लोग पान की दुकान पर खड़े होकर भ्रष्टाचार मिटने का दावा तो जरुर करेंगे..पर जब अख़बार में लिखने या भिजुअल दिखाने की बात आएगी तो ये पिछड़ जायेंगे...माफ़ करेंगे !!! वैसे इसके लिए केवल पत्रकार ही दोषी नहीं है...प्रबंधन भी कम जिम्मेवार नहीं.. 11 April at 22:15 · Like · 4
Umesh Singh सबके सब दादागिरी पे उतार आते है .हाथ मे माइक लेकर अपने आप को गवर्नर से उपर समझते है .सब बिना हेल्मेट के टू व्हेल्लेर चलते है और पोलीस को धमकाते है............
11 April at 22:17 · Like · 4
Vijay Kumar Singh भाई मनोज पाठक जी प्रबंधन से जुडे लोग कि मात्र एक जबाबदेही रह गई है पैसा जुटाना.। आप तो जानते ही हो, जिसने पैसे को अपना लक्ष्य बना लिया हो.। उसके लिए फ़िर कोई चीज मायेने नही रखती.। ऐसी हालत में उनके लिए कुछ भी बोलना, मतलब बेवजह सिर दर्द मोल लेना।
11 April at 22:21 · Edited · Like · 1
Kumar Arpan Sir jo prepisition ban raha hai exactly vyakt karne ka woh alag hai . Justify aakhir kaise hoga ...Ye to press hi samjhega aur aane wale samay me batayega ki justify kaise hoga ..
11 April at 22:40 via mobile · Like · 2
Ranjan Singh Yahi nahi bhaiya aise logo ki sankhya adhik hai, jo wakai me patrakar hai hi nahi, junoon ka yah pesha awaidh kamaai ka dhandha ban chuka hai, paise k liye ye na shirf apna kaam bechte hai, imaan bechne ki aadat par chuki hai,
11 April at 23:15 · Like · 2
मतिकांत सिंह शेखावत भैया घटना के बारे में पता नहीं, लेकिन जहां तक बात है शिष्टता की, तो यह संस्कार मां-बाप से आते हैं। विश्वास के साथ कह सकता हूं कि उसका जिसकी चर्चा आपने की है, सामाजकरण ठीक ढंग से नहीं हुआ। वह अपने पारिवारिक जीवन में भी अशिष्ट होगा।
11 April at 23:26 · Like · 3
Nilu Srivastava Jo bhi hai wo...use uski aukat bataiye.
Friday at 00:11 via mobile · Like · 2
Saikat Chaterjee bhaiya app karyakramo me nahi jate isliye itni der lagi ise samjhne me
Friday at 08:21 · Like
Vinay K Pathak पत्रकारिता में अशिष्ट लोगों की संख्या न तो आज कम है और न ही आज से दस पंद्रह साल पहले कम थी...और ऐसा न सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है...बल्कि प्रिंट में भी है...ये बात किसी से छिपी नहीं है...इसलिए इसे एक चैनल वाले की अशिष्टता कहना ठीक नहीं है..वैसे भी गिरावट हर पेशे में आई है...फिर पत्रकारिता करने वाले ही दूध के धुले कैसे हो सकते हैं...हां ऐसे लोगों का नाम बताकर उन्हें बेनकाब करने की कोशिश जरूर करनी चाहिए...ताकि बाकी लोगों को भी उनकी सचाई का पता चल सके
Friday at 08:44 · Like · 3
Vaibhav Mani Tripathi असल समस्या यहाँ इस बात कि नहीं है कोई पत्रकार अशिष्ट हो गया ... समस्या है कि करिअर को बूस्ट् करने कि चाहत, चैनल प्रबंधन के समक्ष खुद को अधिक आक्रामक दिखाने कि खब्त और मन के किसी कोने में इस बात का दंभ कि साहब हम आने वाले दिनों में पुण्यप्रसून वाजपेयी, रजत शर्मा, कारन थापर कि पंक्ति में शामिल कर लिए जायेंगे क्यूंकि हम भी कैमरे के सामने दबंग दीखते हैं (ये अलहदा तथ्य है कि उनके जैसे कितने संघर्ष या अध्ययन इन सज्जन द्वारा किये गए हो! इसका पता किसी को नहीं ...) लॉर्ड एक्टन का एक कथन है कि जितनी आपकी शक्ति उतना ही भ्रष्ट होने कि संभावना...और जरुरी नहीं कि यह भ्रष्टाचार आर्थिक हो ....ये भ्रष्टाचार सांस्कृतिक और संस्कारिक है !!!
Friday at 09:40 · Like · 2
Manoj Singh avi chunav ka mahaul hai na sir. tb, aisa hona lazmi hai. naye hi kyun kai baristh patrkaron ko v hmne sahay , munda, mahto, soren samet anya parivaron ke darwajon mei nange nachte hue dekha hai. tb hamara khun khaulta hai dekhkar. lekin .. lekin ho jaata hai. bhagwan sadbudhi de vaise patrakar bhaiyon ko jo samaj ke karndhan mane jate hain aur khud ko samajhte hai. vah re patrkar . . . . bhai
Friday at 11:46 via mobile · Like · 1
Aman Kumar आप शायद जिस रिपोर्टर की बात कर रहे हैं..उसका इतिहास है कि वह भष्मासुर की तरह उन्ही लोगों को परेशानी में डालता है जो भी उसकी मदद करता है।
Friday at 11:51 · Like · 1
Neeraj Amitabh bhaiya anchal me to aur halat khrab hai, Patrakaron ki harkat dekh kar sharm aati hai.
Friday at 13:10 · Like · 1
Satya Prakash Prasad ye baat ho sahi hai sir pr jabtak media me bhai bhatiwaj chalega tab tak yahi hoga
Friday at 14:58 · Like · 1
Arbind Mishra yese logon ke karan hi patrkarita par se logon ka vishwash uthne lag gya hai. bahut dukhad ghatna hai sir.
Friday at 16:01 via mobile · Like · 1
Jaideep Deogharia If i am not wrong the journalist in discussion is not a new-age (young journalist) so it would be better if people dont accuse the generatio. Mera sabhi senior journalists se anurodh hai ki mutual contribution se fund karke hi ek quaterly meeting and introspection ki vyavastha karein. Jo naye ya purane patrakar hain unke samajik vyavahaar ki vivechna ka koi manch toh ho.
Friday at 16:11 · Like · 1
Jayanti Kumari कल मेरी एक पत्रकार मित्र बता रही थीं कि एक बिल्डर के चैनल का कोई टुटपुंजिया पत्रकारिता के नाम पर खुजली करने के लिए सूचना भवन पहुंचा था। कल ही फेलोशिप अवार्ड को लेकर पत्रकारों की मेंटर्स के साथ बैठक थी। खुजली वाले साहब ने अपने चरित्र के अनुसार अभद्रता के साथ अपनी परवरिश का परिचय दिया है। बेचारे की कुंठा लगती है। वैसे भी कहा जाता है कि असफल व्यक्ति दूसरों की सफलता के कारण कुंठित होता है, जिसका परिणाम अंततः असभ्यता के रूप में सामने आता है। आपके मित्र इन्हें गुंडा कहते होंगे, मेरी नज़रों में ऐसे लोग टुटपुंजिये हैं। Friday at 17:27 · Like · 3
Akash Singh सर जब मीडिया का स्तर ही गिर गया हो .......... काबिल लोग नौकरी के लिए चप्पलें घीस रहें हो और रोड छाप मीडिया में आकर माइक, कैमरा और कलम पकड़ लें तो इससे ज्यादा उनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है ......
Friday at 20:37 · Like · 1
Pradeep Kumar Singh विजय भैया, आपकी टिप्पणी चिंतनीय है। ऐसे लोगों को बेनकाब करना चाहिए। कांके के मानसिक अस्पताल में इलाज का खर्च हमलोग चंदा कर जुटा लेंगे।
Friday at 21:11 · Like · 4
Pradeep Kumar Singh विजय भैया, गुस्ताखी माफ, एक और इलाज है। कान के नीचे मिलकर संयुक्त रूप से बजाइए। दिमाग-अक्ल ठिकाने आ जाएगा।
Friday at 21:17 · Like · 4
Sunil Kedia pahle berojgar log insurence me aate the ab ptrakarita naya kam mila hai main aise aise log ko ptrakar ya uske aage beuro chief ke roop me janta hoon jo sirf peet
ptrakarita kar ya logo ko nicha dikha kar apni kuntha ko sant karte hai unki najar me sare paise wale chor aour galat kam kar paisa kamate hain apni nakami ko dusare ke samman ko thesh pahucha kar santustha hote hain.
Saturday at 09:29 · Like · 1
Sanjay Choudhary Khusi hoti hai jab bade bhaiya kisi galati ka ehsas karate hain. ham sabhi ko milkar is samasya se nibatna hoga.
Saturday at 13:22 · Like · 1
Jha Neeraj esiliye to ptrakar ka satkar aur chamatkar dono khatam ho gaya.
Yesterday at 11:10 · Like · 1
Zafar Hussain aese logon ne hi patrakarita ko badnaam kiya hai.
19 hours ago · Like
G.s.Ojha पत्रकार पत्रकार ही रहे सूचना आयुक्त या प्रेस एडवाइजर न बने । जनता का एक्सप्रेशन का अधिकार है उसके आप सिपाही मात्र है मालिक ना बने । हमलोग सब जानते हैं इसी लिए सिर्फ पत्रकार हैं। नेता अफसर बिज़नसमैन दलाल सब एक समान । न कोल् ब्लाक , न ठेक्का पट्टा । जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ 14 hours ago · Like
कमाल हैं 
उन्होंने खुद लिखा तो लिखा, अपने चाहनेवालों से भी मेरे खिलाफ दिल खोलकर गालियां लिखवायी............जरा देखिये एक लड़की जयंती कुमारी क्या लिखी हैं........
कभी मेरे साथ काम कर चुके, मेरे से जुनियर रह चुके अमन कुमार तो मुझे भस्मासुर तक बता दिये हैं, ये वहीं अमन कुमार हैं, जिनकी यशकीर्ति भड़ास4मीडिया.कॉम ने बहुत पहले इश्क कमीना के नाम से सारे लोगों के समक्ष रख चुकी हैं,यानी चलनी दूसे सूप के जिन्हें बहत्तर छेद और एक मित्र ने तो विजय पाठक जी को सलाह दे डाली कि वे मुझे कांके के मानसिक आरोग्य अस्पताल तक पहुंचा दें और इससे भी मन नहीं भरा तो वे मुझे कान के नीचे कुछ लगाने की बात कह रहे हैं, 
अब बात सामान्य लोगों और असामान्य लोगों से................
क्या जिस भाषा का प्रयोग विजय पाठक जी और उनके चाहनेवालों ने मेरे खिलाफ किया, क्या वो भाषा एक पत्रकार की हो सकती हैं। विजय पाठक जी ने तो ये बताया ही नहीं कि 11 अप्रैल को क्या हुआ था। असल में उन्हें ये बताना चाहिए था कि 11 अप्रैल को क्या हुआ था। गर वो बताते तब पता चलता कि असली गुंडा कौन हैं......................हालांकि जिन भाषा का प्रयोग विजय पाठक जी ने हमारे बारे में किया हैं, उन भाषा का प्रयोग मैं उनके लिए नहीं कर सकता, क्योंकि कल तक मैं उन्हें भैया कहकर बुलाता था और आज मैं उऩके लिए आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग करुं, ये मेरे माता - पिता ने नहीं सिखाया, क्योंकि बड़ा भाई, बड़ा भाई होता है...........आज किसी बात को लेकर वो नाराज हैं तो कल वे प्रसन्न भी हो सकते हैं, इसलिए गालियां और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग उनके लिए मैं करुं, कम से कम इस जन्म में तो मुझसे नहीं हो सकता............................
अब हम आपको बताते हैं कि 11 अप्रैल को क्या हुआ था........................
11 अप्रैल को रांची स्थित सूचना भवन के जनसंपर्क विभाग कार्यालय में 76 लोगों के बीच पत्रकारिता के क्षेत्र में फैलोशिप के लिए 38 लाख रुपये निर्धारित किये गये, जिसकी अग्रिम राशि 15-15 हजार रुपये चेक के माध्यम से प्रत्येक को दिये जा रहे थे। जिसकी जानकारी सिर्फ फैलोशिप दिलाने के लिए बनी टीम, उसमे शामिल जनसंपर्क अधिकारियों और अग्रिम राशि लेने और देनेवालों की थी, बाकी को इसकी सूचना नहीं दी गयी थी, यानी गुपचुप तरीके से इस कार्य का निपटारा होना था, जबकि पिछले साल इसी प्रकार के कार्यक्रम के लिए, बीएनआर होटल बुक किये गये थे, खूब प्रचार प्रसार किया गया था, जिस दिन कार्यक्रम हुए थे, उसके एक दिन पहले से लेकर एक दिन बाद तक कार्यक्रम की सभी समाचार पत्रों व इलेक्ट्रानिक मीडिया में जगह मिली थी, जबकि इस बार ऐसा देखने को नहीं मिला। हमारा सवाल य़हीं था - कि आखिर जब एक छोटी राशि इसी प्रकार के कार्यक्रम के लिए पिछले साल दी गयी तो इसका खूब प्रचार - प्रसार हुआ, इस बार तो बड़ी राशि हैं, ऐसे में, गुपचुप तरीके से ये कार्यक्रम क्यों आयोजित किया गया, इस प्रश्न का उत्तर न तो फैलोशिप टीम में शामिल सदस्य दे रहे थे और न ही वे अधिकारी जो जनसंपर्क विभाग से जूड़े थे। 
मेरा दूसरा सवाल था - कि आखिर सवालों से ये लोग क्यों बच रहे हैं, कभी उपर और कभी नीचे ये लोग क्यों भाग रहे थे। ये कार्यक्रम जनसंपर्क विभाग के कार्यालय में जब होना ही था तो आखिर इस कार्यक्रम को स्थगित कर, सीधे-सीधे सभी लोगों को ये क्यूं कह दिया गया कि वे चुपके से पन्द्रह-पन्द्रह हजार रुपये की चेक लेकर चलते बने..................
मेरा तीसरा सवाल एक ही व्यक्ति दो - दो जगह बैठकर, अपने चाहनेवालों पर इतनी कृपा क्यूं लूटा रहा हैं, क्या फैलोशिप ऐसे ली और दी जाती हैं....................
मैरा चौथा सवाल था कि फैलोशिप देना था वर्किंग जर्नलिस्टों को, तो फिर गैर पत्रकारों पर ये कृपा क्यूं लूटा दी गयी......................
मेरे मित्रों, इन सवालों का जवाब कोई नहीं दे रहा था, सभी भाग रहे थे, जो जहां था, वो कन्नी काट रहा था, मैं पूछ रहा हूं, जब आप सत्य हो, अखबार को आंदोलन बनाने की बात करते हो, तो आप क्यों भाग रहे हो.................
पर इन महानुभावों ने मेरे बातों का जवाव तो नहीं दिया, विजय पाठक जी ने उलटे मेरी शिकायत मेरे चैनल मालिक से कर दी। इस शिकायत में उन्होने क्या कहा, मैं नहीं जानता ये मेरे चैनल मालिक और विजय पाठक जी ही बता सकते हैं..............सवाल उठता हैं कि विजय पाठक जी को मेरे चैनल मालिक से शिकायत करने की आवश्यकता क्यूं पड़ गयी। मैं कोई भी समाचार करुंगा तो क्या विजय जी से पूछ कर करुंगा............
विजय जी ने जो अपने फेसबुक पर लिखा हैं, और कमेंटस मंगवाई हैं, मैं उऩसे आग्रह करुंगा कि वे अपने अखबार में इस प्रकरण को सच्चाई से स्थान क्यूं नहीं दे देते, अपनी भड़ास के लिए फेसबुक को क्यूं चुना, जबकि वे एक अखबार के संपादक हैं....................
आखिर वे सूचना भवन से मेरे खिलाफ अनाप-शनाप बकते हुए, गुस्से से क्यूं लाल-पीले होते हुए भागे, जबकि हिन्दुस्तान के चंदन मिश्र ने मुझसे खुलकर बातचीत की, मैंने उनका पक्ष भी रखा....................
अब सवाल सीधे विजय जी से.........................
क. क्या किसी को गुंडा कहना, आपके मुंह से शोभा देता हैं................
ख. क्या आपके द्वारा चैनल मालिक से रिपोर्टर की शिकायत करना शोभा देता हैं, क्या मैंने आपकी शिकायत किसी से की, गर कोई प्रमाण हैं तो बताये...........
ग. क्या मेरे चैनल अथवा मुझे समाचार संकलित करने के लिए आपका आदेश लेना होगा..............
घ. क्या आपने सूचना भवन में मेरे उपर टीका टिप्पणी नहीं की थी, और उस टीका टिप्पणी पर मैने आपके साथ कोई अभद्र व्यवहार किया था क्या..........
ड. आपकी गर कोई मुझसे शिकायत थी तो आपने डायरेक्ट मुझसे क्यों नहीं बातचीत की, क्या मैं आपकी बातों का अवहेलना कर देता, इसकी आशंका आपको थी क्या................
च. चलिए, जब आपने फेसबुक पर मुझे गुंडा करार दे ही दिया, और आपके मित्रों ने आपको सलाह दे ही डाली, तो उन सलाहों पर आप कब अमल कर रहे हैं............
छ.ईश्वर से डरिये, स्वयंभू मत बनिये, मैं क्या हूं, मुझे बताने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि मेरा साथ ईश्वर हमेशा रहता हैं, वो बताता रहता हैं कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए...............
ज. आप मेरे बारे में कुछ भी लिखिये, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं आपके खिलाफ कोई भी गंदी भाषा का प्रयोग नहीं करुंगा और न ही मेरे मित्र ऐसा करेंगे, क्योंकि मैंने श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ी हैं, जिसमें कर्मफल सिद्धांत की बात कही गयी हैं, यानी कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान, जैसा कर्म करेगा, वैसा फल देगा भगवान..................
झ. आप कोई पहले व्यक्ति नहीं, जिन्होंने मुझे गाली दी हैं, आप जैसे कई लोगों ने हमें गालियां दी हैं, मैं तो बचपन से ही गालिंया सुनता आया हूं, क्योंकि जिन्हें मेरी बाते अच्छी नहीं लगती, वे मुझे गालियां देकर ही मुझे सुशोभित करते हैं, क्योंकि उनके पास दुसरी वस्तु देने की कोई चीज भी नहीं होती, ऐसे भी आप जहां कार्य करते हैं, वहां मेरे बहुत सारे मित्र हैं, उनसे पूछ लीजियेगा, मैं किसी का कुछ नहीं लेता, गर कुछ नहीं लेता, तो फिर आपकी गालियां कहा पर पड़ी हैं, आप खुद चिंतन करिये.................
अरे मैं तो कबीर की फिलौसिफी पर चलता हूं..................
यानी
मन लागा, मेरा यार फकीरी में, जो सुख पाउं राम भजन में
वो सुख नाही अमीरी में, भला-बुरा सब का सुन लीजै
कर गुजरान, गरीबी में, मन लागा मेरा यार फकीरी में..........................

Friday, April 12, 2013

भाकपा माले का 9 वां राष्ट्रीय महाधिवेशन रांची में संपन्न.....

भाकपा माले का 9वां राष्ट्रीय महाधिवेशन रांची के जिला स्कूल में संपन्न हो गया। राष्ट्रीय महाधिवेशन रांची में होने से इस पार्टी को और नजदीक से देखने का मौका मिला। ऐसे तो इस पार्टी को जानने के लिए मुझे ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत भी नहीं, क्योंकि इस पार्टी के एकमात्र विधायक दिवंगत महेन्द्र प्रसाद सिंह के सत्चरित्र को मैंने नजदीक से देखा हैं, पता नहीं ऐसे - ऐसे सत्चरित्र और भ्रष्टाचार से आजीवन लड़नेवाले लोगों की हत्या क्यूं कर दी जाती हैं। देश के कोने कोने से आये माले के कार्यकर्ता और उसके नेता देश के अन्य दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं से अलग दीखे। माले का अधिवेशन 2 से 6 तक चलना था,  फिर 7 को सांस्कृतिक कार्यक्रम और 8 अप्रैल के आमसभा से होकर उसे गुजरना था, पर रांची में हो रहे नगर निकाय चुनाव और 6-7 अप्रैल के माओवादियों को बिहार-झारखंड बंद का इस पर असर दिखा। आनन -फानन में पूरे कार्यक्रम 7 को ही समाप्त करना पड़ा। 7 अप्रैल को झारखंड के विधानसभा मैदान में आयोजित रैली से कार्यक्रम का समापन हुआ। बहुत समय से मेरे मन में ये उथल -पुथल हो रहा था कि क्या भाकपा माले भी वहीं हैं, जैसा कि अन्य दल हैं, पर जिस प्रकार से देश के कोने - कोने से माले कार्यकर्ता आये, जिस प्रकार इन्होने मर्यादाओं में रहकर, रांची की जनता का दिल जीता, वो सचमुच प्रशंसनीय हैं।
हमें अच्छी तरह मालूम हैं, जब माले के कार्यकर्ता ने हमें पार्टी मुख्यालय बुलाया, तब वहां उत्तरप्रदेश, बंगाल और बिहार से आये कलाकार, अपनी कूचियों से कलाकृति बनाकर रंग भर रहे थे, साथ ही देश की अर्थव्यवस्था, नेताओं, कारपोरेट जगत और पत्रकारों की मिलीभगत से लूट रही जनता का चित्र उकेर रहे थे, उनके चित्र को देखकर ऐसा लगा कि गर मैं चित्रकार होता तो मैं भी इसी प्रकार का आज के परिप्रेक्ष्य में चित्र बना रहा होता, पर मैं चित्रकार तो हूं नहीं, पत्रकार हूं। इसमें कोई दो मत नहीं कि इस देश को तथाकथित नेताओं, पत्रकारों और पूंजीपतियों ने अपने हित साधने के लिए, यहां की जनता को सूली पर लटकाने का मन बना लिया हैं, कई तो लटक लिये हैं, और कई लटकने को विवश हैं। ऐसे हालत में जनता को एक सूत्र में पिरोने और एकमात्र विकल्प जनसंघर्ष ही हैं, ये वर्तमान में ज्यादा आवश्यक हैं, पर माले के महाधिवेशन की शुरुआत में देश के सारे के सारे वामपंथियों की एकजूटता हमें खली, वो इसलिए क्योंकि मंच पर उपस्थित इन नेताओं और पार्टियों को देश की जनता देख चुकी हैं। उसके उदाहरण भी कई हैं, जिसे यहां देना जरुरी हैं। जरा बंगाल में शासन करनेवाली माकपा को देखिये, सिंगुर में इसके द्वारा किये गये कारनामे बताते हैं कि ये कारपोरेट जगत का कितना ख्याल रखती है। जब देश में अमरीका परस्त नीतियों को संसद से पास कराने की बात हो रही थी, जब देश के संसद में सरकार बचाने के लिए नोटों के बंडल रखे जा रहे थे, तब उस समय वामपंथी लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी की क्या भूमिका थी, कैसे एक माकपा सांसद माकपा के विचारधाराओं की तिलांजलि दे, हज की यात्रा पर चला गया और कैसे मंच पर आसीन कई नेता जो अमरीका के खिलाफ खूब आग उगलते हैं, पर भारत को चारों तरफ से घेर रहा चीन, तिब्बत को निगलनेवाला चीन, भारत के जम्मूकश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के कई भूभागों को हड़प चुका चीन, उसे साम्राज्यवादी नहीं दिखाई देता। हमें लगता है कि कुछ चीजों को हटा दे तो ये माले का महाधिवेशन एक इतिहास बनाया हैं, पर कुछ ऐसी चीजें भी दे गया, जिससे एक बड़ा प्रश्न चिह्न भी रख गया हैं। आखिर जनता वामपंथियों पर क्यों विश्वास करें। अमरीकी सामान भारतीय बाजार में आये तो गलत और चीनी सामग्रियां भारतीय बाजार पर छा जाये, तो गलत नहीं। क्या ये वामपथी धाराएं देशहित में हैं। एक बात और महाधिवेशन के पहले दिन गदर आंदोलन के नेताओं व कार्यकर्ताओं को श्रद्धांजलि दी जा रही थी, उस दौरान हिंदुत्व को कटघरे में रख दिया गया पर इस्लाम को छोड़ दिया, आखिर क्यों................। ये समझ से परे हैं। हालांकि इसकी जरुरत ही नही थी, बेवजह किसी को नीचा दिखाना, उसके प्रचार के सिवा और कुछ नहीं, और ये माले का महाधिवेशन जहां जिसकी जरुरत नहीं, उसे प्रचार दे गया................................।